Agni Purana· Agni Purāṇa
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अध्याय 367 / 381

Adhyaya 368

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अध्याय ३६७

श्लोक 1

आत्यन्तिकलयगर्भोत्पत्तिनिरूपणं अग्निर् उवाच आत्यन्तिकं लयं वक्ष्ये ज्ञानादात्यन्तिको लयः ।आध्यात्मिकादिसन्तापं ज्ञात्वा स्वस्य विरागतः

ātyantikalayagarbhotpattinirūpaṇaṃ agnir uvāca ātyantikaṃ layaṃ vakṣye jñānādātyantiko layaḥ / ādhyātmikādisantāpaṃ jñātvā svasya virāgataḥ

हिन्दी अर्थ

वाचक हैं। अपामार्ग, शैखरिक, प्रत्यक्पर्णी तथा मयूरक-ये अपामार्ग (चिचिड़ा)-का बोध करानेवाले हैं। फञ्जिका (या हञ्जिका), ब्राह्मणी और भार्गी-ये ब्रह्मनेटिके वाचक हैं। द्रवन्ती,

English

Barley and sugarcane increase the strength of the elephants. Dried barley would derange the humours of the elephants.

अध्याय ३६७

श्लोक 2

आध्यात्मिकस्तु सन्तापःशारीरो मानसो द्विधा ।शारीरो बहुभिर्भेदैस्तापो ऽसौ श्रूयतां द्विज

ādhyātmikastu santāpaḥśārīro mānaso dvidhā / śārīro bahubhirbhedaistāpo 'sau śrūyatāṃ dvija

हिन्दी अर्थ

शम्बरी तथा वृषा-ये आखुपर्णी या मूसाकानीके बोधक हैं। मण्डूकपर्णी, भण्डीरी, समङ्गा और कालमेषिका-ये मजीठके नाम हैं। रोदनी, यवासा एवं कचूरके वाचक हैं। पृश्निपर्णी, पृथक्पर्णी, कलशि, धावनि और गुहा-ये पिठवनके नाम हैं। निर्दिग्धिका, स्पृशी, व्याघ्री, क्षुद्रा और दुःस्पर्शा-ये भटकटैया (या भजकटया)-के

English

In the event of severe injury in the war, balls of (flesh of) crows, hens, cuckoos and owls (could be given) mixed with honey.

अध्याय ३६७

श्लोक 3

त्यक्त्वा जीवो भोगदेहं गर्भमाप्रोति कर्मभिः ।आतिवाहिकसंज्ञस्तु देहो भवति वै द्विज

tyaktvā jīvo bhogadehaṃ garbhamāproti karmabhiḥ / ātivāhikasaṃjñastu deho bhavati vai dvija

हिन्दी अर्थ

अर्थमें आते हैं। अवल्गुज, सोमराजी, सुवलि, सोमवल्लिका, कालमेषी, कृष्णफला, वाकुची और

English

An incense (consisting) of pepper, fish, alkaline

अध्याय ३६७

श्लोक 4

केवलं स मनुष्याणां मृत्युकाल उपस्थिते ।याम्यैः पुंभिर्मनुष्याणां तच्छरीरं द्विजोत्तमाः

kevalaṃ sa manuṣyāṇāṃ mṛtyukāla upasthite / yāmyaiḥ puṃbhirmanuṣyāṇāṃ taccharīraṃ dvijottamāḥ

हिन्दी अर्थ

पूतिफली-ये वकुचीके वाचक हैं। कणा, उष्णा और उपकुल्या-ये पिप्पलीके बोधक हैं। श्रेयसी और गजपिप्पली-ये गजपिप्पलीके वाचक हैं। चव्य और चविका-ये चव्य अथवा वचाके नाम हैं। काकचिञ्ची, गुञ्जा और कृष्णला-ये तीन गुञ्जा (घुँघुची)-के अर्थमें आते हैं। विश्वा, विषा और प्रतिविषा-ये ' अतीस के बोधक हैं। वनशृङ्गाट और गोक्षुर--ये गोखुरूके वाचक हैं। नारायणी

English

(A liniment consisting of) long pepper, rice, oil, honey of different kinds applied along the eyelids is commended as sharpening the eyesight.

अध्याय ३६७

श्लोक 5

नीयते याम्यमार्गेण प्राणिनां मुने ।ततः स्वर्याति नरकं स भ्रमेद्घटयन्त्रवत्

nīyate yāmyamārgeṇa prāṇināṃ mune / tataḥ svaryāti narakaṃ sa bhramedghaṭayantravat

हिन्दी अर्थ

और शतमूली-ये शतावरीका बोध करानेवाले हैं। कालेयक, हरिद्रव, दार्वी, पचम्पचा और दारु-ये दारुहल्दीके नाम हैं। जिसकी जड़ सफेद हो, ऐसी वचा (बच)-का नाम हैमवती

English

The bed of an elephant would be powdered dry cow dung. It is commended that (the elephants) should be anoint¬ ed with clarified butter in the autumn and summer.

अध्याय ३६७

श्लोक 6

कर्मभूमिरियं ब्रह्मन् फलभूमिरसौ स्मृता ।यमो योनीश् च नरकं निरूपयति कर्मणा

karmabhūmiriyaṃ brahman phalabhūmirasau smṛtā / yamo yonīś ca narakaṃ nirūpayati karmaṇā

हिन्दी अर्थ

है। वचा, उग्रगन्धा, षड्ग्रन्था, गोलोमी और शतपर्विका-ये बचके अर्थमें आते हैं। आस्फोता और गिरिकर्णी-ये दो शब्द विष्णुक्रान्ता या अपराजिताके नाम हैं। सिंहास्य, वासक और वृष-ये अड़सेके अर्थमें आते हैं। मिशी, मधुरिका और छत्रा-ये वनसौंफके वाचक हैं । कोकिलाक्ष, इक्षुर और क्षुरये तालमखानाके नाम हैं। विडंग और कृमिघ्न-ये वायविडंगके वाचक

English

I shall describe the essence of (science relating to) the management of horses and the treatment of their diseases. In order to achieve dharma, artha (virtue) and kama (enjoyment and prosperity) (a king) should acquire (good) horses.

अध्याय ३६७

श्लोक 7

पूरणीयाश् च तेनैव यमञ्चैवानुपश्यतां ।वायुभूताः प्राणिनश् च गर्भन्ते प्राप्नुवन्ति हि

pūraṇīyāś ca tenaiva yamañcaivānupaśyatāṃ / vāyubhūtāḥ prāṇinaś ca garbhante prāpnuvanti hi

हिन्दी अर्थ

हैं। वज्रद्रु, खुक्, स्नुही और सुधा-ये सेहुँड्के अर्थमें आते हैं। मृद्वीका, गोस्तनी और द्राक्षा- ये दाख या मुनक्काके नाम हैं। वला तथा वाट्यालक-ये वरियारके वाचक हैं। काला

English

(The asterisms) aivini, Sravaa, hasta and the three uttaras {uttardsd4hay attaraphdlguni and uttarabhddrapada) are commended for the first ride on the horses.

अध्याय ३६७

श्लोक 8

यमदूतैर् मनुष्यस्तु नीयते तञ्च पश्यति ।धर्मी च पूज्यते तेन पापिष्ठस्ताड्यते गृहे

yamadūtair manuṣyastu nīyate tañca paśyati / dharmī ca pūjyate tena pāpiṣṭhastāḍyate gṛhe

हिन्दी अर्थ

और मसूरविदला--ये श्यामलता या श्यामत्रिधाराके अर्थमें आते हैं । त्रिपुटा, त्रिवृत्ता और त्रिवृत्त-ये शुक्ल त्रिधाराके वाचक हैं। मधुक, क्लीतक, यष्टिमधुका और मधुयष्टिका-ये जेठी मधुके नाम हैं। विदारी, क्षीरशुक्ला, इक्षुगन्धा, क्रोष्ट्री और यासिता-ये भूमिकूष्माण्डके बोधक हैं।

English

The early winter, winter and spring are commendable for riding the horses. The riding of the horses in the summer, autumn and rainy season is forbidden.

अध्याय ३६७

श्लोक 9

शुभाशुभं कर्म तस्य चित्रगुप्तो निरूपयेत् ।बान्धवानामशौचे तु देहे खल्वातिवाहिके

śubhāśubhaṃ karma tasya citragupto nirūpayet / bāndhavānāmaśauce tu dehe khalvātivāhike

हिन्दी अर्थ

शारिवा-ये श्यामालता अथवा गौरीसरके वाचक हैं। मोचा, रम्भा और कदली-ये केलेके नाम हैं। भण्टाकी और दुष्प्रधर्षिणी-ये भाँटेके अर्थमें

English

One should not whip the horses severely or with other kinds of sticks or at an improper place. One who rides a horse* at a place abounding in nails, thorns and bones, on a nigged ground, on a sandy and muddy ground and spoilt by • pits and falls without knowing the temper (of the steed) and without the saddle would be carried away by the horse even as he is seated on its back.

अध्याय ३६७

श्लोक 10

तिष्ठन्नयति धर्मज्ञ दत्तपिण्डाशनन्ततः ।तन्यक्त्वा प्रेतदेहन्तु प्राप्यान्यं प्रेतलोकतः(१)

tiṣṭhannayati dharmajña dattapiṇḍāśanantataḥ / tanyaktvā pretadehantu prāpyānyaṃ pretalokataḥ(1)

हिन्दी अर्थ

आते हैं। स्थिरा, ध्रुवा और सालपर्णी-ये सरिवनके नाम हैं। श्रृङ्गी, ऋषभ और वृष-ये काकड़ासिंगीके वाचक हैं। (यह अष्टवर्गकी प्रसिद्ध ओषधि है) गाङ्गेरुकी और नागबला-ये बलाके भेद हैं। इन्हें हिंदीमें गुलसकरी और गंगेरन भी कहते हैं। मुषली और तालमूलिका-ये मूसलीके नाम हैं। ज्योत्स्नी, पटोलिका और जाली-ये तरोईके अर्थमें आते हैं। अजशृङ्गी और विषाणी-ये

English

The mystical letter formii the essential part of the mantra of a

अध्याय ३६७

श्लोक 11

वसेत् क्षुधा तृषा युक्त आमश्राद्धान्नभुङ्नरः ।आतिवाहिकेदेहात्तु प्रेतपिण्डैर् विना नरः

vaset kṣudhā tṛṣā yukta āmaśrāddhānnabhuṅnaraḥ / ātivāhikedehāttu pretapiṇḍair vinā naraḥ

हिन्दी अर्थ

'मेडासिंगी'के वाचक हैं। लाङ्गलिकी और अग्निशिखा-ये करियारीका बोध करानेवाले हैं। ताम्बूली तथा नागवल्ली-ये ताम्बूल या पानके नाम हैं। हरेणु, रेणिका और कौन्ती-ये

English

After having repeated (the above prayer) into the ears (of his steed) the rider should confuse the enemy, saddle the horse and ride (the horse). (This would give him) victory in the battle.

अध्याय ३६७

श्लोक 12

न हि मोक्षमवाप्नोति पिण्डांस्तत्रैव सो ऽश्रुते ।कृते सपिण्डीकरणे नरः संवत्सरात्परं

na hi mokṣamavāpnoti piṇḍāṃstatraiva so 'śrute / kṛte sapiṇḍīkaraṇe naraḥ saṃvatsarātparaṃ

हिन्दी अर्थ

रेणुका नामक गन्धद्रव्यके वाचक हैं। हीबेरी और दिव्यनागर-ये नेत्रबाला और सुगन्धबालाके नाम हैं । कालानुसार्य, वृद्ध, अश्मपुष्प, शीतशिव और शैलेय-ये शिलाजीतके वाचक हैं। तालपर्णी, हैत्या, गन्ध, कुटी और मुरा-ये मुरा नामक सुगन्धित द्रव्यका बोध करानेवाले हैं। ग्रन्थिपर्ण, शुक और बर्हि (या बर्ह)-ये गठिवनके अर्थमें आते हैं। बला, त्रिपुटा और त्रुटि-ये छोटी

English

Generally the defects in the horses are produced in their bodies. The excellent riders should convert them into good qualities with much effort.

अध्याय ३६७

श्लोक 13

१ प्रेतलौकिके इति ख॥ :प् ३०२ प्रेतदेहं समुतमृज्य भोगदेहं प्रपद्यते ।भोगदेहावुभौ प्रोक्तावशुभशुभसंज्ञितौ

1 pretalaukike iti kha.. :p 302 pretadehaṃ samutamṛjya bhogadehaṃ prapadyate / bhogadehāvubhau proktāvaśubhaśubhasaṃjñitau

हिन्दी अर्थ

इलायचीके वाचक हैं। शिवा और तामलको- ये भुई आमलाके अर्थमें आते हैं। हनु और हहविलासिनी-ये नखी नामक गन्धद्रव्यके बोधक हैं। कुटन्नट, दाशपुर, वानेय और परिपेलव-ये

English

The good qualities that are due to the ability of the riders would appear as natural.

अध्याय ३६७

श्लोक 14

भुक्त्वा तु भोगदेहेन कर्मबन्धान्निपात्यते ।तं देहं परतस्तस्माद्भक्षयन्ति निशाचराः

bhuktvā tu bhogadehena karmabandhānnipātyate / taṃ dehaṃ paratastasmādbhakṣayanti niśācarāḥ

हिन्दी अर्थ

मोथाके नाम हैं। तपस्विनी तथा जटामांसी-ये जटामाँसीके अर्थमें आते हैं। पृक्का (या स्पृक्का), देवी, लता और लघु या (लशू)-ये ' असवरग के वाचक हैं। कर्चूरक और द्राविडक-ये कर्चूरके नाम हैं। गन्धमूली और शठी शब्द भी कचूरके ही अर्थमें आते हैं। ऋक्षगन्धा, छगलान्त्रा, आवेगी तथा वृद्धदारक-ये विधाराके नाम हैं। तुण्डिकेरी, रक्तफला, बिम्बिका और पीलुपर्णी-ये कन्दूरीके

English

Other riders would destroy even the natural qualities. Some know the good qualities. Some others know their defects. One is fortunate who knows (the qualities as well as the defects in) a horse. A stupid one is he who does not know both.

अध्याय ३६७

श्लोक 15

पापे तिष्ठति चेत् स्वर्गं तेन भुक्तं तदा द्विज ।तदा द्वितीयं गृह्णाति भोगदेहन्तु पापिनां

pāpe tiṣṭhati cet svargaṃ tena bhuktaṃ tadā dvija / tadā dvitīyaṃ gṛhṇāti bhogadehantu pāpināṃ

हिन्दी अर्थ

वाचक हैं। चाङ्गेरी, चुक्रिका और अम्बष्ठा-ये

English

If a soul with sin remaining has enjoyed heaven, then it takes a second body, an enjoying body, of the sinful.

अध्याय ३६७

श्लोक 16

भुक्त्वा पापन्तु वै पश्चाद्येन भुक्तं त्रिपिष्टपं ।शुचीनां श्रीमतां गेहे स्वर्गभ्रष्टो ऽभिजायते

bhuktvā pāpantu vai paścādyena bhuktaṃ tripiṣṭapaṃ / śucīnāṃ śrīmatāṃ gehe svargabhraṣṭo 'bhijāyate

हिन्दी अर्थ

अम्ललोड़िका (अम्लिलोना)-के बोधक हैं। स्वर्णक्षीरी और हिमावती-ये मकोयके नाम हैं। अम्लबेंतके अर्थमें आते हैं। जीवन्ती, जीवनी और जीवा--ये जीवन्तीके नाम हैं। भूमिनिम्ब और किरातक--ये चिरात्तिक्त या चिरायताके वाचक हैं। कूर्चशीर्ष और मधुरक-ये अष्टवर्गान्तक

English

Having enjoyed the sin afterwards, one who had enjoyed heaven, fallen from heaven, is born in the house of the pure and prosperous.

अध्याय ३६७

श्लोक 17

पुण्ये तिष्ठति चेत्पापन्तेन भुक्तं तदा भवेत् ।तस्मिन् सम्भक्षिते देहे शुभं गृह्णाति विग्रहम्

puṇye tiṣṭhati cetpāpantena bhuktaṃ tadā bhavet / tasmin sambhakṣite dehe śubhaṃ gṛhṇāti vigraham

हिन्दी अर्थ

'जीवक' नामक ओषधिके बोधक हैं । चन्द्र और कपिवृक-—ये समानार्थक शब्द हैं। (चन्द्रशब्द कर्पूर और काम्पिल्य आदि अर्थोमें आता है।) दद्रुघ्ल और एडगज--ये चकवड़ नामक वृक्षके

English

If sin remains with merit, he has enjoyed the sin; when that body is consumed, he takes an auspicious body.

अध्याय ३६७

श्लोक 18

कर्मण्यल्पावशेषे तु नरकादपि मुच्यते ।मुक्तस्तु नरकाद्याति तिर्यग्योनिं न संशयः

karmaṇyalpāvaśeṣe tu narakādapi mucyate / muktastu narakādyāti tiryagyoniṃ na saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

वाचक हैं। वर्षाभू और शोथहारिणी-ये गदहपुर्नाके अर्थमें आते हैं। कुनन्दती, निकुम्भस्त्रा, यमानी और वार्षिका-ये लताविशेषके वाचक हैं । लशुन, गुञ्जन, अरिष्ट, महाकंद और रसोन-ये लहसुनके नाम हैं। वाराही, वरदा (या वदरा) तथा गृष्टि- ये वराहीकंदके वाचक हैं। काकमाची और वायसी-ये समानार्थ शब्द हैं। शतपुष्पा, सितच्छत्रा, अतिच्छत्रा, मधुरामिसि, अवाकपुष्पी और कारवी—

English

When little of the karma remains, he is freed even from hell; freed from hell, he goes to an animal womb, without doubt.

अध्याय ३६७

श्लोक 19

जीवः प्रविष्टो गर्भन्तु कलले ऽप्यत्र तिष्ठति(२) ।घनीभूतं द्वितीये तु तृतीये ऽवयवास्ततः

jīvaḥ praviṣṭo garbhantu kalale 'pyatra tiṣṭhati(2) / ghanībhūtaṃ dvitīye tu tṛtīye 'vayavāstataḥ

हिन्दी अर्थ

ये सौंफके नाम हैं। सरणा, प्रसारिणी, कटम्भरा और भद्रवला-ये कुब्जप्रसारिणी नामक ओषधिके वाचक हैं। कर्वूर और शटी-ये भी कचूरके अर्थमें आते हैं। पटोल, कुलक, तिक्तक और

English

The soul that has entered the womb remains in the embryo; in the second month it becomes solid, in the third the limbs form.

अध्याय ३६७

श्लोक 20

चतुर्थे ऽस्थीनि त्वङ्मांसम्पञ्चमे रोमसम्भवः ।षष्ठे चेतो ऽथ जीवस्य दुःखं विन्दति सप्तमे

caturthe 'sthīni tvaṅmāṃsampañcame romasambhavaḥ / ṣaṣṭhe ceto 'tha jīvasya duḥkhaṃ vindati saptame

हिन्दी अर्थ

पटु-ये परवलके नाम हैं। कारवेल्ल और करिल्लक--ये करैलाके अर्थमें आते हैं। कूष्माण्डक और कर्कारु-ये कोंहड़ाके वाचक हैं। उर्वारु और कर्कटी-ये दोनों स्त्रीलिङ्ग शब्द ककड़ीके वाचक हैं। इक्ष्वाकु तथा कटुतुम्बी-ये कडवी लौकोके बोधक हैं। विशाला और इन्द्रवारुणी ये इन्द्रायन (तूँबी) नामक लताके नाम हैं। अर्शोघ्न, सूरण और कंद-ये सूरन या ओलके

English

In the fourth month bones, skin and flesh; in the fifth hair arises; in the sixth consciousness comes; in the seventh the soul feels suffering.

अध्याय ३६७

श्लोक 21

जरायुवेष्टिते देहे मूर्ध्नि बद्धाञ्जलिस् तथा ।मध्ये क्लीवस्तु वामे स्त्री दक्षिणे पुरुषस्थितिः

jarāyuveṣṭite dehe mūrdhni baddhāñjalis tathā / madhye klīvastu vāme strī dakṣiṇe puruṣasthitiḥ

हिन्दी अर्थ

वाचक हैं। मुस्तक और कुरुविन्द-ये दोनों शब्द भी मोथाके अर्थमें आते हैं। त्वक्सार,

English

In the body wrapped in the membrane, with joined palms at the head; in the middle a neuter, on the left a female, on the right a male is placed.

अध्याय ३६७

श्लोक 22

तिष्ठत्युदरभागे तु पृष्ठस्याभिमुखस् तथा ।यस्यां तिष्ठत्यसौ योनौ तां स वेत्ति न संशयः

tiṣṭhatyudarabhāge tu pṛṣṭhasyābhimukhas tathā / yasyāṃ tiṣṭhatyasau yonau tāṃ sa vetti na saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

कर्मार, वेणु, मस्कर और तेजन--ये वंश (बाँस)- के वाचक हैं। छत्रा, अतिच्छत्र और पालघ्न-- ये पानीमें पैदा होनेवाले तृणविशेषके बोधक हैं। मालातृणक और भूस्तृण--ये भी तृणविशेषके ही नाम हैं। ताड़के वृक्षका नाम ताल और तृणराज है। घोण्टा, क्रमुक तथा पूग--ये सुपारीके अर्थमें आते हैं

English

It stays in the belly, facing the back; the womb in which it stays, it knows, without doubt.

अध्याय ३६७

श्लोक 23

सर्वञ्च वेत्ति वृत्तान्तमारभ्य नरजम्मनः ।१ गच्छतीति क॥ :प् ३०३ अन्धकारञ्च महतीं पीडां विन्दति मानवः

sarvañca vetti vṛttāntamārabhya narajammanaḥ / 1 gacchatīti ka.. :p 303 andhakārañca mahatīṃ pīḍāṃ vindati mānavaḥ

हिन्दी अर्थ

शार्दूल और द्वीषी-ये व्याघ्र (बाघ)-के वाचक हैं। हर्यक्ष, केशरी (केसरी) तथा हरि ये सिंहके नाम हैं। कोल, पोत्री और वराह-- ये सूअरके तथा कोफ, ईहामृग और वृक

English

It knows the whole course of events from the beginning of human birth; and in darkness a man feels great pain.

अध्याय ३६७

श्लोक 24

मातुराहारपीतन्तु सप्तमे मास्युपाश्नुते ।अष्टमे नवमे मासि भृशमुद्विजत तथा

māturāhārapītantu saptame māsyupāśnute / aṣṭame navame māsi bhṛśamudvijata tathā

हिन्दी अर्थ

भेड्यिके अर्थमें आते हैं। लूता, ऊर्णनाभि, तन्तुवाय और मर्कट-ये मकड़ीके नाम हैं। वृश्चिक और शूककीट बिच्छुके वाचक हैं। (शूककीट' शब्द ऊन आदि चारनेवाले कीडेके अर्थमें भी आता है।) सारङ्ग और स्तोक-ये समान लिङ्गमें प्रयुक्त होनेवाले शब्द पपीहाके वाचक हैं। कृकवाकु तथा ताम्रचूड-ये कुक्कुट (मुर्ग)-के नाम हैं। पिक और कोकिल-ये

English

In the seventh month it partakes of what the mother eats and drinks; in the eighth and ninth month it is greatly agitated.

अध्याय ३६७

श्लोक 25

व्यवाये पीडामाप्नोति मातुर्व्यायामके तथा ।व्याधिश् च व्याधितायां स्यान्मुहूर्तं शतवर्षवत्

vyavāye pīḍāmāpnoti māturvyāyāmake tathā / vyādhiś ca vyādhitāyāṃ syānmuhūrtaṃ śatavarṣavat

हिन्दी अर्थ

कोयलके बोधक हैं। करट और अरिष्ट-काक (कौए)-के अर्थमें आते हैं। वक और कह- बगुलेके नाम हैं। कोक, चक्र और चक्रवाक ये चकवाके तथा कादम्ब और कलहंस-ये

English

It suffers pain from the mother's intercourse and from her exertion; sickness comes with her sickness, a moment like a hundred years.

अध्याय ३६७

श्लोक 26

सन्तप्यते कर्मभिस्तु कुरुते ऽथ मनोरथान् ।गर्भाद्विनिर्गतो ब्रह्मन् मोक्षज्ञानं करिष्यति

santapyate karmabhistu kurute 'tha manorathān / garbhādvinirgato brahman mokṣajñānaṃ kariṣyati

हिन्दी अर्थ

मधुरभाषी हंस या बत्तकके वाचक हैं। पतङ्गिका और पुत्तिका-ये मधुका छाता लगानेवाली छोटी मक्खियोंके नाम हैं और सरधा तथा मधुमक्षिका- ये बड़ी मधुमक्खीके अर्थमें आते हैं। (इसीको सरँगवा माछी भी कहते हैं।) द्विरिफ, पुष्पलिह,

English

Tormented by his deeds, he forms wishes; "Having come out of the womb, O Brahmin, I shall practise the knowledge of liberation."

अध्याय ३६७

श्लोक 27

सूतिवातैर् अधीभूतो निःसरेद्योनियन्त्रतः ।पीड्यमानो मासमात्रं करस्पर्शेन दुःखितः

sūtivātair adhībhūto niḥsaredyoniyantrataḥ / pīḍyamāno māsamātraṃ karasparśena duḥkhitaḥ

हिन्दी अर्थ

के नाम हैं। केकी तथा शिखी-मोरके नाम हैं। मोरकी वाणीको 'केका' कहते हैं। शकुन्त, शकुनि और द्विज--ये पक्षीके पर्याय हैं। स्त्रीलिङ्ग पक्षति-शब्द और पक्षमूल-ये पंखके वाचक हैं ।

English

Overcome by the winds of birth, he comes out through the womb-passage, pained for a month by the touch of hands.

अध्याय ३६७

श्लोक 28

खशब्दात् क्षुद्रश्रोतांसि देहे श्रोत्रं विविक्तता ।श्वासोच्छासौ गतिर्वायोर्वक्रसंस्पर्शनं तथा(१)

khaśabdāt kṣudraśrotāṃsi dehe śrotraṃ viviktatā / śvāsocchāsau gatirvāyorvakrasaṃsparśanaṃ tathā(1)

हिन्दी अर्थ

चञ्जु और तोटि-ये चोंचके अर्थमें आते हैं। इन दोनोंका स्त्रीलिङ्गमें ही प्रयोग होता है। उड्डीन और संडीन-ये पक्षियोंके उड्नेके विभिन्न प्रकारोंके नाम हैं। कुलाय और नीड शब्द घोंसलेके अर्थमें आते हैं। पेषी (या पेशी), कोष और अण्ड-ये अण्डेके नाम हैं। इनमें प्रथम दो शब्द केवल पुँल्लङ्गमें प्रयुक्त होते हैं। पृथुक,

English

From ether come the body's hollow channels and ears, and emptiness; breath in and out, the movement of wind, and the sense of touch.

अध्याय ३६७

श्लोक 29

अग्नेरूपं दर्शनं स्यादूष्मा पङ्क्तिश् च पित्तकं ।मेधा वर्णं बलं छाया तेजः शौर्यं शरीरके

agnerūpaṃ darśanaṃ syādūṣmā paṅktiś ca pittakaṃ / medhā varṇaṃ balaṃ chāyā tejaḥ śauryaṃ śarīrake

हिन्दी अर्थ

ये शिशुमात्रके बोधक हैं। संदोह, व्यूहक और गण, स्तोम, ओघ, निकर, ब्रात, निकुरम्ब,

English

Fire gives form, sight, warmth, digestion, bile; intelligence, colour, strength, lustre, brilliance and valour in the body.

अध्याय ३६७

श्लोक 30

जलात्स्वेदश् च रसनन्देहे वै संप्रजायते ।क्लेदो वसा रसा तक्रं शुक्रमूत्रकफादिकं

jalātsvedaś ca rasanandehe vai saṃprajāyate / kledo vasā rasā takraṃ śukramūtrakaphādikaṃ

हिन्दी अर्थ

कूटये सभी शब्द 'समूह' अर्थके वाचक हैं॥ ७१--७८ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें 'कोशविषयक भूमि, वनौषधि आदि वर्गका वर्णन” नामक तीन सौ तिरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ

English

From water arise sweat and the sense of taste; moisture, fat, serum, buttermilk-like fluid, semen, urine, phlegm and the like.

अध्याय ३६७

श्लोक 31

भूमेर्ध्राणं केशनखं गौरवं स्थिरतो ऽस्थितः ।मातृजानि मृदून्यत्र त्वङ्मांसहृदयानि च

bhūmerdhrāṇaṃ keśanakhaṃ gauravaṃ sthirato 'sthitaḥ / mātṛjāni mṛdūnyatra tvaṅmāṃsahṛdayāni ca

हिन्दी अर्थ

अग्निदेव कहते हैं-- अब मैं नाम-निर्देशपूर्वक वाचक हैं। स्त्रीको योषित्, योषा, अबला और मनुष्यवर्ग, ब्राह्मण-वर्ग, क्षत्रिय-वर्ग, वैश्य-वर्ग वधू कहते हैं। जो अपने अभीष्ट कामी पुरुषके और शूद्रवर्गका क्रमशः वर्णन करूँगा। ना, नर, साथ समागमकी इच्छासे किसी नियत संकेत- पञ्चजन और मर्त्य-ये मनुष्य एवं पुरुषके स्थानपर जाती है, उसे अभिसारिका कहते हैं।

English

From earth: the nose, hair, nails, heaviness and steadiness. From the mother come the soft parts: skin, flesh, and heart.

अध्याय ३६७

श्लोक 32

नाभिर्मज्जा(२) शकृन्मेदः क्लेदान्यामाशयानि च ।पितृजानि शिरास्नायुशुक्रञ्चैवात्मजानि तु

nābhirmajjā(2) śakṛnmedaḥ kledānyāmāśayāni ca / pitṛjāni śirāsnāyuśukrañcaivātmajāni tu

हिन्दी अर्थ

स्त्रीके नाम हैं। नग्निका और कोटवी शब्द नंगी स्त्रीका बोध करानेवाले हैं। (रजोधर्म होनेके पूर्व अवस्थावाली कन्याको भी 'नग्निका' कहते हैं ।) अर्धवृद्धा (अधबुढ़) स्त्रीको (जो गेरुआँ वस्त्र धारण करनेवाली और पति-विहीना हो) कात्यायनी कहते हैं। दूसरेके घरमें रहकर (स्वाधीन वृत्तिसे केश-प्रसाधन आदि कलाके द्वारा) जीवन- निर्वाह करनेवाली स्त्रीका नाम सैरन्ध्री है।

English

Navel, marrow, faeces, fat, fluids and the stomach-cavities; from the father come veins, sinews, and semen; from the self are...

अध्याय ३६७

श्लोक 33

कामक्रोधौ भयं हर्षो धर्माधर्मात्मता तथा ।आकृतिः स्वरवर्णौ तु मेहनाद्यं तथा च यत्

kāmakrodhau bhayaṃ harṣo dharmādharmātmatā tathā / ākṛtiḥ svaravarṇau tu mehanādyaṃ tathā ca yat

हिन्दी अर्थ

अन्तःपुरकी वह दासी, जो अभी बूढ़ी न हुई हो-जिसके सिरके बाल सफेद न हुए हों, असिक्नी कहलाती है । रजस्वला स्त्रीको मलिनी कहते हैं। वारस्त्री, गणिका और वेश्या-ये

English

Desire, anger, fear, joy, the nature of dharma and adharma, shape, voice and colour, and the organ of generation and the like.

अध्याय ३६७

श्लोक 34

१ श्वासोच्छासौ सनिर्वापौ वाह्यसंस्पर्शनमिति ञ॥ २ नाभिर्मेडमिति ख॥ , ञ॥ च :प् ३०४ ???

1 śvāsocchāsau sanirvāpau vāhyasaṃsparśanamiti ña.. 2 nābhirmeḍamiti kha.. , ña.. ca :p 304 ??? /

हिन्दी अर्थ

रंडियोंके नाम हैं। भाइयोंकी स्त्रियाँ परस्पर याता कहलाती हैं। पतिकी बहनको ननान्दा कहते हैं। सात पीढ़ीके अंदरके मनुष्य सपिण्ड और सनाभि कहे जाते हैं। समानोदर्य, सोदर्य, सगर्भ और सहज--ये समानार्थक शब्द सगे भाईका बोध करानेवाले हैं। सगोत्र, बान्धव, ज्ञाति, बन्धु, स्व तथा स्वजन-ये भी समान अर्थके बोधक हैं। दम्पती, जम्पती, भार्यापती, जायापती --

English

(Text corrupted in the source; only a note on variant readings of the breathing and touch lines survives.)

अध्याय ३६७

श्लोक 35

तामसानि तथाज्ञानं प्रमादालस्यतृट्क्षुधाः ।मोहमात्सर्यवैगुण्यशोकायासभयानि च

tāmasāni tathājñānaṃ pramādālasyatṛṭkṣudhāḥ / mohamātsaryavaiguṇyaśokāyāsabhayāni ca

हिन्दी अर्थ

ये पति-पत्नीके वाचक हैं। गर्भाशय, जरायु, उल्ब और कलल-ये चार शब्द गर्भको लपेटनेवाली झिल्लीके नाम हैं। कलल-शब्द पुँल्लिङ्ग और नपुंसकलिङ्ग -दोनोंमें आता है।

English

The tamasic are ignorance, negligence, laziness, thirst and hunger, delusion, envy, defect, grief, fatigue and fear.

अध्याय ३६७

श्लोक 36

कामक्रोधौ तथा शौर्यं यज्ञेप्सा बहुभाषिता ।अहङ्कारः परावज्ञा राजसानि महामुने

kāmakrodhau tathā śauryaṃ yajñepsā bahubhāṣitā / ahaṅkāraḥ parāvajñā rājasāni mahāmune

हिन्दी अर्थ

(यह शुक्र और शोणितके संयोगसे बने हुए गर्भाशयके मांस-पिण्डका भी वाचक है।) गर्भ और भ्रूण-ये दोनों शब्द गर्भस्थ बालकके लिये प्रयुक्त होते हैं। क्लीब, शण्ड (षण्ढ) और नपुंसक-ये पर्यायवाची शब्द हैं। डिम्भ-शब्द उत्तान सोनेवाले नवजात शिशुओंके अर्थमें आता है। बालकको माणवक कहते हैं। लंबे पेटवाले पुरुषके अर्थमें पिचण्डिल और बृहत्कुक्षि शब्दोंका

English

Desire, anger, valour, wish to sacrifice, much talk, egoism and contempt of others are rajasic, O great sage.

अध्याय ३६७

श्लोक 37

धर्मेप्सा मोक्षकामित्वं परा भक्तिश् च केशवे ।दाक्षिण्यं व्यवसायित्वं सात्विकानि विनिर्दिशेत्

dharmepsā mokṣakāmitvaṃ parā bhaktiś ca keśave / dākṣiṇyaṃ vyavasāyitvaṃ sātvikāni vinirdiśet

हिन्दी अर्थ

प्रयोग होता है। जिसकी नाक कुछ झुको हुई हो,

English

Desire for dharma, longing for liberation, supreme devotion to Keshava, courtesy and resolve: these one should declare sattvic.

अध्याय ३६७

श्लोक 38

चपलः क्रोधनो भीरुर्बहुभाषो कलिप्रियः ।स्वप्ने गगनगश् चैव बहुवातो नरो भवेत्

capalaḥ krodhano bhīrurbahubhāṣo kalipriyaḥ / svapne gaganagaś caiva bahuvāto naro bhavet

हिन्दी अर्थ

उसको अवभ्रट कहते हैं। जिसका कोई अङ्ग कम या विकृत हो वह विकलाङ्ग और पोगण्ड कहलाता है। आरोग्य और अनामय -ये नीरोगताके वाचक हैं। बहरेको एड और वधिर तथा कुबड़ेको कुब्ज और गडुल कहते हैं। रोग आदिके कारण जिसका हाथ खराब हो जाय, उसको तथा लूले मनुष्यको कुनि (या कुणि) कहा जाता है। क्षय, शोष और यक्ष्मा-ये

English

A man with much wind (vata) is fickle, irascible, timid, talkative, fond of quarrels, and in dreams he moves through the sky.

अध्याय ३६७

श्लोक 39

अकालपलितः क्रोर्धो महाप्राज्ञो रणप्रियः ।स्वप्ने च दीप्तिमत्प्रेक्षी बहुपित्तो नरो भवेत्

akālapalitaḥ krordho mahāprājño raṇapriyaḥ / svapne ca dīptimatprekṣī bahupitto naro bhavet

हिन्दी अर्थ

राजयक्ष्मा (थाइसिस, टीबी या तपेदिक)-के नाम हैं। प्रतिश्याय और पीनस-ये जुकामके अर्थमें आते हैं। स्त्रीलिङ्ग-क्षुत्, पुँल्लिङ्ग-क्षव और नपुंसक-क्षुत शब्द छींकके अर्थमें प्रयुक्त

English

A man with much bile (pitta) goes grey before his time, is quick to anger, very wise, fond of battle, and in dreams sees bright things.

अध्याय ३६७

श्लोक 40

स्थिरमित्रः स्थिरोत्साहः स्थिराङ्गो द्रविणान्वितः ।स्वप्ने जलसितालोकी बहुश्ले ष्मा नरो भवेत्

sthiramitraḥ sthirotsāhaḥ sthirāṅgo draviṇānvitaḥ / svapne jalasitālokī bahuśle ṣmā naro bhavet

हिन्दी अर्थ

होते हैं। कास और क्षवथु-ये खाँसीके नाम हैं। इनका प्रयोग पुँल्लिङ्गमें होता है। शोथ, श्वयथु और शोफ ये सूजनके अर्थमें आते हैं। पादस्फोट और विपादिका-ये बिवाईके नाम हैं। किलास और सिध्म-सेहुएँको कहते हैं। कच्छु, पाम, पामा और विचर्चिका-ये खुजलीके वाचक हैं। कोठ और मण्डलक उस कोढ़को कहते हैं, जिसमें गोलाकार चकत्ते पड़ जाते हैं। सफेद

English

A man with much phlegm (kapha) has steady friends, steady zeal, a firm body, and wealth; in dreams he sees water and white things.

अध्याय ३६७

श्लोक 41

रसस्तु प्राणिनां देहे जीवनं रुधिरं तथा ।लेपनञ्च तथा मांसमेधस्नेहकरन्तु तत्

rasastu prāṇināṃ dehe jīvanaṃ rudhiraṃ tathā / lepanañca tathā māṃsamedhasnehakarantu tat

हिन्दी अर्थ

कोढ्को कुष्ठ और श्वित्र कहते हैं । दुर्नामक और अर्शस् -ये बवासीरके नाम हैं। मल-मूत्रके निरोधको अनाह और विबन्ध कहते हैं। ग्रहणी और प्रवाहिका-ये संग्रहणी रोगके नाम हैं।

English

The fluid (rasa) in the bodies of beings gives life; so does blood, which sustains; flesh is what coats the body, and fat produces unctuousness.

अध्याय ३६७

श्लोक 42

धारणन्त्व् अस्थि मज्जा स्यात्पूरणं वीर्यवर्धनं ।शुक्रवीर्यकरं ह्य् ओजः प्राणकृज्जीवसंस्थितिः

dhāraṇantv asthi majjā syātpūraṇaṃ vīryavardhanaṃ / śukravīryakaraṃ hy ojaḥ prāṇakṛjjīvasaṃsthitiḥ

हिन्दी अर्थ

बीज, वीर्य, इन्द्रिय और शुक्र-ये वीर्यके पर्याय हैं। पलल, क्रव्य और आमिष-ये मांसके अर्थमें आते हैं। बुक्का और अग्रमांस-ये छातीके मांस (हत्पिण्ड)-का बोध करानेवाले हैं। ('बुक्का' शब्द केवल हृदयका भी वाचक है।) हृदय और हत्-ये मनके पर्याय हैं। मेदस्, वपा और वसा--ये मेदाके नाम हैं। गलेके पीछेको नाड़ीको मन्या कहते हैं। नाडी, धमनि और शिरा-ये

English

Bone is what supports; marrow is what fills and increases vigour; "ojas" makes semen and vigour, sustains the vital breath and the life's stability.

अध्याय ३६७

श्लोक 43

ओजः शुक्रात् सारतरमापीतं हृदयोपगं ।षडङ्गशक्थिनी बाहुर्मूर्धा जठरमीरितं

ojaḥ śukrāt sārataramāpītaṃ hṛdayopagaṃ / ṣaḍaṅgaśakthinī bāhurmūrdhā jaṭharamīritaṃ

हिन्दी अर्थ

नाड़ीके वाचक हैं। तिलक और क्लोम-ये शरीरमें रहनेवाले काले तिलके अर्थमें आते हैं।

English

Ojas, more essential than semen, is taken in and reaches the heart. The body is said to have six parts: thighs, arms, head, and belly.

अध्याय ३६७

श्लोक 44

षट्त्वचा वाह्यतो यद्वदन्या रुधिरधारिका ।विलासधारिणी चान्या चतुर्थी कुण्डधारिणी

ṣaṭtvacā vāhyato yadvadanyā rudhiradhārikā / vilāsadhāriṇī cānyā caturthī kuṇḍadhāriṇī

हिन्दी अर्थ

मस्तिष्क दिमागको और दूषिका आँखोंकी कीचड्को कहते हैं। अन्त्र और पुरीतत्-ये आँतके अर्थमें आते हैं। गुल्म और प्लीहा-बरवट (तिल्ली) - को कहते हैं। प्लीहा 'प्लीहन्' शब्दका पुँल्लिङ्गरूप है। अङ्ग-प्रत्यङ्गकी संधियोंके बन्धनको स्नायु और वस्नसा कहते हैं। कालखण्ड और यकृत्- जिगर या कलेजेके नाम हैं। कर्पर और कपाल शब्द ललाटके वाचक हैं। 'कपाल' शब्द पुँल्लिङ्ग

English

There are six layers of skin: the outer one, another that holds blood, another that holds delight (or sweat), and a fourth that holds ulcers (kunda).

अध्याय ३६७

श्लोक 45

पञ्चमी विद्रधिस्थानं षष्ठी प्राणधरा मता ।कलासप्तमौ मांसधरा द्वितीया रक्तधारिणी

pañcamī vidradhisthānaṃ ṣaṣṭhī prāṇadharā matā / kalāsaptamau māṃsadharā dvitīyā raktadhāriṇī

हिन्दी अर्थ

और नपुंसकलिङ्ग-दोनोंमें आता है। कीकस, कुल्य और अस्थि-ये हड्डीके नाम हैं। रक्त- मांससे रहित शरीरकी हड्डीको कङ्काल कहते हैं। पीठकी हड्डी (मेरुदण्ड)-का नाम कशेरुका है।

English

The fifth is the seat of abscesses; the sixth is held to support life; the seventh layers support flesh; the second holds blood.

अध्याय ३६७

श्लोक 46

यकृत्प्लीहाश्रया चान्या मेदोधरास्थिधारिणी ।मज्जाश्लेष्मपुरीषाणां धरा पक्वाशयस्थिता ।षष्ठी पित्तधरा शुक्रधरा शुक्राशयापरा

yakṛtplīhāśrayā cānyā medodharāsthidhāriṇī / majjāśleṣmapurīṣāṇāṃ dharā pakvāśayasthitā / ṣaṣṭhī pittadharā śukradharā śukrāśayāparā

हिन्दी अर्थ

'करोटि' शब्द स्त्रीलिङ्ग है और यह मस्तककी हड्डी (खोपड़ी)-के अर्थमें आता है। पँसलीकी हड्डीको पर्शुका कहते हैं। अङ्ग, प्रतीक, अवयव, शरीर, वर्ष्म तथा विग्रह-ये शरीरके पर्याय हैं। कट और श्रोणिफलक-ये चूतड़्के अर्थमें आते हैं। 'कट' शब्द पुँल्लिङ्ग है। कटि, श्रोणि और ककुद्मती-ये कमरका बोध करानेवाले हैं। (किन्हीं-किन्हींके मतमें उपर्युक्त पाँचों ही शब्द

English

Another rests on the liver and spleen; one holds fat and bone; there is a layer for marrow, phlegm and faeces, situated in the digestive receptacle; the sixth holds bile; another holds semen, in the seat of semen.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Agni Purana — Chapter 367
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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