Agni Purana· Agni Purāṇa
375
अध्याय 375 / 381

Adhyaya 376

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अध्याय ३७५

श्लोक 1

ब्रह्मज्ञानं अग्निर् उवाच ब्रह्मज्ञानं प्रवक्ष्यामि संसाराज्ञानमुक्तये ।अयमात्मा पर्ं ब्रह्म अहमस्मीति मुच्यते

brahmajñānaṃ agnir uvāca brahmajñānaṃ pravakṣyāmi saṃsārājñānamuktaye / ayamātmā parṃ brahma ahamasmīti mucyate

हिन्दी अर्थ

जिसकी आराध्यदेवमें पराभक्ति है और जैसी महात्माको इन कहे हुए विषयोंका यथार्थ ज्ञान होता है॥ १७--३६॥

English

The poison that came out from the milky ocean when it was churned.

अध्याय ३७५

श्लोक 2

देह आत्मा न भवति दृस्यत्वाच्च घटादिवत् ।प्रसप्ते मरणे देहादात्मान्यो ज्ञायते ध्रुवं

deha ātmā na bhavati dṛsyatvācca ghaṭādivat / prasapte maraṇe dehādātmānyo jñāyate dhruvaṃ

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार आदि आग्नेय महापृराणमें 'यम-नियम-निरूपण' नामक तीन सौ बहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ

English

After having assigned the five constituents and contemplating Him, the Rudra hymns are repeated in order. The hymn (beginning with) yajjSgrata is known to be repeated mentally. The sage (of that hymn) is HvasaAkalpa (resolve) and the metre is said to be triffubh (consisting of 11 syllables in a quarter).

अध्याय ३७५

श्लोक 3

देहः स चेदव्यवहरेद्विकार्यादिसन्निभः ।चक्षुरादीनीन्द्रियाणि नात्मा वै करणं त्वतः

dehaḥ sa cedavyavaharedvikāryādisannibhaḥ / cakṣurādīnīndriyāṇi nātmā vai karaṇaṃ tvataḥ

हिन्दी अर्थ

आसन, प्राणायाम और प्रत्याहारका वर्णन अग्निदेव कहते हैं-मुने! पद्मासन आदि नाना प्रकारके 'आसन' बताये गये हैं। उनमेंसे कोई भी आसन बाँधकर परमात्माका चिन्तन करना चाहिए। पहले किसी पवित्र स्थानमें अपने

English

RV. 10.901a.

अध्याय ३७५

श्लोक 4

मनो धीरपि आत्मा न दीपवत् करणं त्वतः ।प्राणो ऽप्यात्मा न भवति सुषुप्ते चित्प्रभावतः

mano dhīrapi ātmā na dīpavat karaṇaṃ tvataḥ / prāṇo 'pyātmā na bhavati suṣupte citprabhāvataḥ

हिन्दी अर्थ

बैठनेके लिये स्थि आसन बिछावे, जो न अधिक ऊँचा हो और न अधिक नीचा। सबसे नीचे कुशका आसन हो, उसके ऊपर मृगचर्म और मृगचर्मके ऊपर वस्त्र बिछाया गया हो। उस

English

TA. 3.13.1a. C/. adbhyafy sambhrtab.

अध्याय ३७५

श्लोक 5

जाग्रत्स्वप्ने च चैतन्यं सङ्कीर्णत्वान्न बुध्यते ।विज्ञानरहितः प्राणः सुषुप्ते ज्ञायते यतः

jāgratsvapne ca caitanyaṃ saṅkīrṇatvānna budhyate / vijñānarahitaḥ prāṇaḥ suṣupte jñāyate yataḥ

हिन्दी अर्थ

आसनपर बैठकर मन और इऱ्द्रियोंकी चेष्टाओंको रोकते हुए चित्तको एकाग्र करे तथा अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये योगाभ्यासमें संलग्न हो जाय। उस समय शरीर, मस्तक और गलेको अविचलभावसे एक सीधमें रखते हुए स्थिर बैठे। केवल अपनी नासिकाके अग्रभागको देखे; अन्य दिशाओंकी ओर दृष्टिपात न करे। दोनों पैरोंकी एड़ियोंसे अण्डकोष और लिङ्गकी रक्षा करते हुए दोनों

English

Gould not be traced.

अध्याय ३७५

श्लोक 6

अतो नात्मेन्द्रियं तस्मादिन्त्रियादिकमात्मनः ।अहङ्कारो ऽपि नैवात्मा देहवद्व्यभिचारतः

ato nātmendriyaṃ tasmādintriyādikamātmanaḥ / ahaṅkāro 'pi naivātmā dehavadvyabhicārataḥ

हिन्दी अर्थ

ऊरुओं (जाँघों)-के ऊपर भुजाओंको यत्नपूर्वक तिरछी करके रखे तथा बायें हाथकी हथेलीपर दाहिने हाथके पृष्ठभागको स्थापित करे और मुंहको कुछ ऊँचा करके सामनेकी ओर स्थिर

English

Same as Rudradhyaya.

अध्याय ३७५

श्लोक 7

उक्तेभ्यो व्यतिरिक्तो ऽयमात्मा सर्वहृदि स्थितः ।सर्वद्रष्टा च भोक्ता च नक्तमुज्ज्वलदीपवत्

uktebhyo vyatirikto 'yamātmā sarvahṛdi sthitaḥ / sarvadraṣṭā ca bhoktā ca naktamujjvaladīpavat

हिन्दी अर्थ

रखे। इस प्रकार बैठकर प्राणायाम करना चाहिए अपने शरीरके भीतर रहनेवाली वायुको “प्राण' कहते हैं। उसे रोकनेका नाम है-- 'आयाम'। अतः 'प्राणायाम'का अर्थ हुआ “प्राणवायुको रोकना'। उसकी विधि इस प्रकार

English

RV. 10.90.1a.

अध्याय ३७५

श्लोक 8

समाध्यारम्भकाले च एवं सञ्चिन्तयेन्मुनिः ।यतो ब्रह्मण आकाशं खाद्वायुर्वायुतो ऽनलः

samādhyārambhakāle ca evaṃ sañcintayenmuniḥ / yato brahmaṇa ākāśaṃ khādvāyurvāyuto 'nalaḥ

हिन्दी अर्थ

है अपनी अँगुलीसे नासिकाके एक छिद्रको दबाकर दूसरे छिद्रसे उदरस्थित वायुको बाहर निकाले। 'रेचन' अर्थात् बाहर निकालनेके कारण इस क्रियाको 'रेचक' कहते हैं। तत्पश्चात् चमड़ेकी

English

See 1 above.

अध्याय ३७५

श्लोक 9

अग्नेरापो जलात्पृथ्वी ततः सूक्ष्मं शरीरकं ।अपञ्चीकृतभूतेभ्य आसन् पञ्चीकृतान्यतः

agnerāpo jalātpṛthvī tataḥ sūkṣmaṃ śarīrakaṃ / apañcīkṛtabhūtebhya āsan pañcīkṛtānyataḥ

हिन्दी अर्थ

धोंकनीके समान शरीरको बाहरी वायुसे भरे। भर जानेपर कुछ कालतक स्थिरभावसे बैठा रहे । बाहरसे वायुको पूर्ति करनेके कारण इस क्रियाका नाम “पूरक' है। वायु भर जानेके पश्चात् जब साधक न तो भीतरी वायुको छोड़ता है और न बाहरी वायुको ग्रहण ही करता है, अपितु भरे हुए घड़ेकी भाँति अविचल-भावसे स्थिर रहता है, उस समय कुम्भवत् स्थिर होनेके कारण उसकी

English

From fire come water, from water earth, and then the subtle body; from the elements not yet quintuplicated, these quintuplicated ones arose.

अध्याय ३७५

श्लोक 10

स्थूलं शरीरं ध्यात्वास्माल्लयं ब्रह्मणि चिन्तयेत् ।पञ्चीकृतानि भूतानि तत्कार्यञ्च विराट्स्मृतम्

sthūlaṃ śarīraṃ dhyātvāsmāllayaṃ brahmaṇi cintayet / pañcīkṛtāni bhūtāni tatkāryañca virāṭsmṛtam

हिन्दी अर्थ

वह चेष्टा 'कुम्भक' कहलाती है। बारह मात्रा (पल) -का एक 'उद्धात' होता है । इतनी देरतक

English

Having meditated on the gross body, one should contemplate its dissolution in Brahman. The quintuplicated elements and their product are called Virat.

अध्याय ३७५

श्लोक 11

एतत् स्थूलं शरीरं हि आत्मनो ज्ञानकल्पितं ।इन्द्रियैर् अथ विज्ञानं धीरा जागरितं विदुः

etat sthūlaṃ śarīraṃ hi ātmano jñānakalpitaṃ / indriyair atha vijñānaṃ dhīrā jāgaritaṃ viduḥ

हिन्दी अर्थ

वायुको रोकना कनिष्ठ श्रेणीका प्राणायाम है। दो उद्धात अर्थात् चौबीस मात्रातक किया जानेवाला कुम्भक मध्यम श्रेणीका माना गया है तथा तीन उद्धात यानी छत्तीस मात्रातकका कुम्भक उत्तम श्रेणीका प्राणायाम है। जिससे शरीरसे पसीने

English

This gross body is imagined by knowledge of the Self. The wise know the waking state as awareness through the senses.

अध्याय ३७५

श्लोक 12

विश्वस्तदभिमानी स्यात् त्रयमेतदकारकं ।अपञ्चीकृतभूतानि तत्कार्यं लिङ्गमुच्यते

viśvastadabhimānī syāt trayametadakārakaṃ / apañcīkṛtabhūtāni tatkāryaṃ liṅgamucyate

हिन्दी अर्थ

लगने लगे, वह प्राणायाम अत्यन्त उत्तम है।

English

The one identified with it is Vishva; these three are non-agents. The unquintuplicated elements and their product are called the subtle body.

अध्याय ३७५

श्लोक 13

संयुक्तं सप्तदशभिर्हिरण्यगर्भसंज्ञितं ।शरीरमात्मनः सूक्ष्मं लिङ्गमित्यभिधीयते

saṃyuktaṃ saptadaśabhirhiraṇyagarbhasaṃjñitaṃ / śarīramātmanaḥ sūkṣmaṃ liṅgamityabhidhīyate

हिन्दी अर्थ

अधिकार न हो जाय, उनपर सहसा आरोहण न करे, अर्थात् क्रमशः अभ्यास बढ़ाते हुए उत्तरोत्तर जीत लेनेपर हिचकी और साँस आदिके रोग दूर हो जाते हैं तथा मल-मूत्रादिके दोष भी धीरे- धीरे कम हो जाते हैं। नीरोग होना, तेज चलना, मनमें उत्साह होना, स्वरमें माधुर्य आना, बल

English

Joined with seventeen parts, it is named Hiranyagarbha; the subtle body of the Self is called the "linga".

अध्याय ३७५

श्लोक 14

जाग्रत्संस्कारजः स्वप्नः प्रत्ययो विषयात्मकः ।आत्मा तदुपमानी स्त्यात्तैजसो ह्य् अप्रपञ्चतः

jāgratsaṃskārajaḥ svapnaḥ pratyayo viṣayātmakaḥ / ātmā tadupamānī styāttaijaso hy aprapañcataḥ

हिन्दी अर्थ

बढ़ना, शरीरवर्णमें स्वच्छताका आना तथा सब प्रकारके दोषोंका नाश हो जाना--ये प्राणायामसे होनेवाले लाभ हैं। प्राणायाम दो तरहके होते हैं -' अगर्भ' और 'सगर्भ'। जप और ध्यानके

English

Dream is born of impressions from waking, a cognition whose content is objects; the Self identified with it is Taijasa, without the world-spread.

अध्याय ३७५

श्लोक 15

स्थूलसूक्ष्मशरीराख्यद्वयस्यैकं हि कारणं ।आत्मा ज्ञानञ्च साभासं तदध्याहृतमुच्यते

sthūlasūkṣmaśarīrākhyadvayasyaikaṃ hi kāraṇaṃ / ātmā jñānañca sābhāsaṃ tadadhyāhṛtamucyate

हिन्दी अर्थ

बिना जो प्राणायाम किया जाता है, उसका नाम 'अगर्भ है तथा जप और ध्यानके साथ किये जानेवाले प्राणायामको 'सगर्भ' कहते हैं । इन्द्रियोंपर विजय पानेके लिये सगर्भ प्राणायाम ही उत्तम होता है; उसीका अभ्यास करना चाहिए। ज्ञान और वैराग्यसे युक्त होकर प्राणायामके अभ्याससे

English

The one cause of the two, the gross and subtle bodies, is the Self and knowledge with reflection; this is called superimposition.

अध्याय ३७५

श्लोक 16

न सन्नासन्न सदसदेतत्सावयवं न तत् ।निर्गतावयवं नेति नाभिन्नं भिन्नमेव च

na sannāsanna sadasadetatsāvayavaṃ na tat / nirgatāvayavaṃ neti nābhinnaṃ bhinnameva ca

हिन्दी अर्थ

इन्द्रियोंको जीत लेनेपर सबपर विजय प्राप्त हो जाती है। जिसे 'स्वर्ग? और 'नरक' कहते हैं, वह सब इन्द्रियाँ ही हैं। वे ही वशमें होनेपर स्वर्गमें पहुँचाती हैं और स्वतन्त्र छोड़ देनेपर

English

It is neither being nor non-being nor both; it is not with parts, nor without parts; neither different nor not different, yet different.

अध्याय ३७५

श्लोक 17

भिन्नाभिन्नं ह्य् अनिर्वाच्यं बन्धसंसारकारकं ।एकं स ब्रह्म विज्ञानात् प्राप्तं नैव च कर्मभिः

bhinnābhinnaṃ hy anirvācyaṃ bandhasaṃsārakārakaṃ / ekaṃ sa brahma vijñānāt prāptaṃ naiva ca karmabhiḥ

हिन्दी अर्थ

नरकमें ले जाती हैं। शरीरको 'रथ' कहते हैं, इन्द्रियाँ ही उसके 'घोड़े' हैं, मनको 'सारथि' कहा गया है और प्राणायामको 'चाबुक' माना गया है। ज्ञान और वैराग्यकी बागडोरमें बँधे हुए मनरूपी घोड़ेको प्राणायामसे आबद्ध करके जब अच्छी तरह काबूमें कर लिया जाता है तो वह थीरे-धीरे स्थिर हो जाता है। जो मनुष्य सौ वर्षोसे कुछ अधिक कालतक प्रतिमास

English

Different and non-different, indescribable, it causes bondage and samsara. The One is Brahman, attained by knowledge, not by works.

अध्याय ३७५

श्लोक 18

सर्वात्मना हीन्द्रियाणां संहारः कारणात्मनां ।बुद्धेः स्थानं सुषुप्तं स्यात्तद्द्वयस्याभिमानवान्

sarvātmanā hīndriyāṇāṃ saṃhāraḥ kāraṇātmanāṃ / buddheḥ sthānaṃ suṣuptaṃ syāttaddvayasyābhimānavān

हिन्दी अर्थ

कुशके अग्रभागसे जलकी एक बूँद लेकर उसे पीकर रह जाता है, उसकी वह तपस्या और प्राणायाम -दोनों बराबर हैं। विषयोंके समुद्रमें प्रवेश करके वहाँ फँसी हुई इन्द्रियोंको जो

English

The withdrawal of all the senses into their cause is the state of the intellect, deep sleep; the one identified with both is...

अध्याय ३७५

श्लोक 19

प्राज्ञ आत्मा त्रयञ्चैतत् मकारः प्रणवः स्मृतः ।अकारश् च उकारो ऽसौ मकारो ह्य् अयमेव च

prājña ātmā trayañcaitat makāraḥ praṇavaḥ smṛtaḥ / akāraś ca ukāro 'sau makāro hy ayameva ca

हिन्दी अर्थ

आहूत करके, अर्थात् लौटाकर अपने अधीन करता है, उसके इस प्रयत्नको ' प्रत्याहार' कहते हैं। जैसे जलमें डूबा हुआ मनुष्य उससे निकलनेका प्रयत्न करता है, उसी प्रकार संसार- समुद्रमें डूबे हुए अपने-आपको स्वयं ही निकालनेका प्रयत्न करे। भोगरूपी नदीका वेग अत्यन्त बढ़ जानेपर उससे बचनेके लिये अत्यन्त सुदृढ़ ज्ञानरूपी वृक्षका आश्रय लेना

English

Prajna. The Self and these three are held to be "m", the Pranava: "a", "u", and "m" are this very thing.

अध्याय ३७५

श्लोक 20

अहं साक्षी च चिन्मात्रो जाग्रत्स्वप्नादिकस्य च ।नाज्ञानञ्चैव तत्कार्यं संसारादिकबन्धनं

ahaṃ sākṣī ca cinmātro jāgratsvapnādikasya ca / nājñānañcaiva tatkāryaṃ saṃsārādikabandhanaṃ

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराणमें "आसन, प्राणायाम तथा प्रत्याहारका वर्णन नामक तीन सौ तिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ

English

I am the witness, mere consciousness, of waking, dream and the rest; ignorance and its effect, the bonds of samsara and so on, are not mine.

अध्याय ३७५

श्लोक 21

नित्यशुद्धबन्धमुक्तसत्यमानन्दमद्वयं ।ब्रह्माहमस्म्यहं ब्रह्म परं ज्योतिर्विमुक्त ॐ

nityaśuddhabandhamuktasatyamānandamadvayaṃ / brahmāhamasmyahaṃ brahma paraṃ jyotirvimukta oṃ

हिन्दी अर्थ

अग्निदेव कहते हैं-मुने! 'ध्यै- भगवान् विष्णुका बारंबार चिन्तन करना ' ध्यान' चिन्तायाम्'--यह धातु है। अर्थात् ध्यै' धातुका कहलाता है। समस्त उपाधियोंसे मुक्त मनसहित प्रयोग चिन्तनके अर्थमें होता है। ('ध्यै'से ही आत्माका ब्रह्मविचारमें परायण होना भी ' ध्यान' ' ध्यान! शब्दकी सिद्धि होती है) अतः स्थिरचित्तसे ही है। ध्येयरूप आधारमें स्थित एवं सजातीय प्रतीतियोंसे युक्त चित्तको जो विजातीय प्रतीतियोंसे रहित प्रतीति होती है, उसको भी ' ध्यान' कहते हैं। जिस किसी प्रदेशमें भी ध्येय वस्तुके चिन्तनमें एकाग्र हुए चित्तको प्रतीतिके साथ जो

English

Eternal, pure, free from bondage, truth, bliss, without a second — I am Brahman; I am the supreme light, liberated. Om.

अध्याय ३७५

श्लोक 22

अहं ब्रह्म परं ज्ञानं समाधिर्बन्धघातकः ।चिरमानन्दकं ब्रह्म सत्यं ज्ञानमनन्तकं

ahaṃ brahma paraṃ jñānaṃ samādhirbandhaghātakaḥ / ciramānandakaṃ brahma satyaṃ jñānamanantakaṃ

हिन्दी अर्थ

अभेद- भावना होती है, उसका नाम भी “ध्यान! है। इस प्रकार ध्यानपरायण होकर जो अपने शरीरका परित्याग करता है, वह अपने कुल, स्वजन और मित्रोंका उद्धार करके स्वयं

English

I am Brahman, supreme knowledge; samadhi destroys bondage. Brahman is lasting bliss, truth, knowledge, infinity.

अध्याय ३७५

श्लोक 23

अयमात्मा परम्ब्रह्म तद् ब्रह्म त्वमसीति च ।गुरुणा बोधितो जीवो ह्य् अहं ब्रह्मास्मि वाह्यतः

ayamātmā parambrahma tad brahma tvamasīti ca / guruṇā bodhito jīvo hy ahaṃ brahmāsmi vāhyataḥ

हिन्दी अर्थ

भगवत्स्वरूप हो जाता है। इस तरह जो प्रतिदिन एक या आधे मुहूर्ततक भी श्रद्धापूर्वक श्रीहरिका ध्यान करता है, वह भी जिस गतिको प्राप्त करता है, उसे सम्पूर्ण महायज्ञोंके द्वारा भी कोई नहीं पा तत्त्ववेत्ता योगीको चाहिए कि वह ध्याता, ध्यान, ध्येय तथा ध्यानका प्रयोजन--इन चार वस्तुओंका ज्ञान प्राप्त करके योगका अभ्यास करे। योगाभ्याससे मोक्ष तथा आठ प्रकारके

English

"This Self is Supreme Brahman", "That is Brahman", "You are That" — the soul, instructed by the teacher, is "I am Brahman", even outwardly.

अध्याय ३७५

श्लोक 24

सो ऽसावादित्यपुरुषः सो ऽसावहमखण्ड ॐ ।मुच्यते ऽसारसंसाराद्ब्रह्मज्ञो ब्रह्म तद्भवेत्

so 'sāvādityapuruṣaḥ so 'sāvahamakhaṇḍa oṃ / mucyate 'sārasaṃsārādbrahmajño brahma tadbhavet

हिन्दी अर्थ

महान् ऐश्वर्यों (अणिमा आदि सिद्धियों)-की

English

"That Person in the sun, I am he, the undivided. Om." The knower of Brahman is freed from this worthless samsara and becomes Brahman.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Agni Purana — Chapter 375
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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