अध्याय ३८०
श्लोक 1
यमगीता अग्निर् उवाच यमगीतां प्रवक्ष्यामि उक्ता या नाचिकेतसे ।पठतां शृण्वतां भुक्त्यै मुक्त्यै मोक्षार्थिनां सतां
yamagītā agnir uvāca yamagītāṃ pravakṣyāmi uktā yā nāciketase / paṭhatāṃ śṛṇvatāṃ bhuktyai muktyai mokṣārthināṃ satāṃ
हिन्दी अर्थ
“मेरी यह त्रिगुणमयी माया अलौकिक है; इसका पार पाना बहुत कठिन है। जो केवल मेरी शरण लेते हैं, वे ही इस मायाको लाँघ पाते हैं। ये चार प्रकारके मनुष्य मेरा भजन करते हैं। इनमेंसे ज्ञानी तो मुझसे एकोभूत होकर स्थित रहता है। अविनाशी परम-तत्त्व (सच्तिदानन्दमय परमात्मा) 'ब्रह्म' है, स्वभाव अर्थात् जीवात्माको
English
Punarlkaksa (lotus-eyed) (should be contemplated) at Pu§kara, Gadadhara (one who wields the club) at Gaya, Raghava (Rama as the scion of Raghu) at Gitraku]a and Daityasudana (the destroyer of the demons) at Prabhasa.