Agni Purana· Agni Purāṇa
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अध्याय 98 / 381

Adhyaya 98

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अध्याय ९८

श्लोक 1

गौरीप्रतिष्ठाकथनं ईश्वर उवाच वक्ष्ये गौरीप्रतिष्ठाञ्च पूजया सहितां शृणु ।मण्डपाद्यं पुरो यच्च(१) संस्थाप्य चाधिरोपयेत्

gaurīpratiṣṭhākathanaṃ īśvara uvāca vakṣye gaurīpratiṣṭhāñca pūjayā sahitāṃ śṛṇu / maṇḍapādyaṃ puro yacca(1) saṃsthāpya cādhiropayet

हिन्दी अर्थ

पिता-माताका आवाहन आदि करके शिशु (शिष्य) - के हदयमें ताडून करे। पूर्वोक्त विधिके अनुसार पहले अम्त्र-मन्त्रद्वारा हृदयमें प्रवेश करके ज्योतीरूपाय परमेश्वराय अचेतन अचेतन व्योमन् जीवचैतन्यको कलापाशसे विलग करे। फिर

English

Listen! I shall describe the mode of installation together with the worship (of the image) of (goddess) Gauri (consort of lord Siva). The sacrificial shed etc. should be erected and (the image of the goddess) should be placed therein.

अध्याय ९८

श्लोक 2

शय्यायान्तांश् च विन्यस्य मन्त्रान्मूर्त्यादिकान् गुह ।आत्मविद्याशिवान्तञ्च(२) कुर्यादीशनिवेशनं

śayyāyāntāṃś ca vinyasya mantrānmūrtyādikān guha / ātmavidyāśivāntañca(2) kuryādīśaniveśanaṃ

हिन्दी अर्थ

व्योमन्।'—ये इक्कीस पद हैं

English

O Guha (son of lord Siva and Parvatl )! After having

अध्याय ९८

श्लोक 3

शक्तिं परां ततो(३) न्यस्य हुत्वा(४) जप्त्वा च पूर्ववत् ।सन्धाय च तथा पिण्डीं(५) क्रियाशक्तिस्वरूपिणीं

śaktiṃ parāṃ tato(3) nyasya hutvā(4) japtvā ca pūrvavat / sandhāya ca tathā piṇḍīṃ(5) kriyāśaktisvarūpiṇīṃ

हिन्दी अर्थ

अब रुद्रं और भुवनोंका स्वरूप बताया जाता है-प्रमथ, वामदेव, सर्वदेवोद्भव, भवोद्भव, भुवन एवं रुद्र जानने चाहिए

English

After having located the goddess of absolute energy, offered oblations and recited (the mantras ) as before, the pedestal of the form of the energy of action should be placed.

अध्याय ९८

श्लोक 4

सदेशव्यापिकां ध्यात्वा न्यस्तरत्नादिकां तथा ।एवं संस्थाप्य तां पश्चाद्देवीन्तस्यान्नियोजयेत्

sadeśavyāpikāṃ dhyātvā nyastaratnādikāṃ tathā / evaṃ saṃsthāpya tāṃ paścāddevīntasyānniyojayet

हिन्दी अर्थ

विद्याकलामें अघोर-मन्त्र है, 'म' और 'र' बीज हैं, पूषा और हस्तिजिह्णा-दो नाडियाँ हैं, व्यान और नाद--ये दो प्राणवायु हैं। एकमात्र रूप ही विषय है। पैर और नेत्र दो इ्द्रियाँ हैं। शब्द,

English

Then the pervading energy should be invoked and locat¬ ed therein. Then the mother goddess known also as Siva should

अध्याय ९८

श्लोक 5

परशक्तिस्वरूपान्तां स्वाणुना(६) शक्तियोगतः ।ततो न्यसेत् क्रियाशक्तिं पीठे ज्ञानञ्च विग्रहे

paraśaktisvarūpāntāṃ svāṇunā(6) śaktiyogataḥ / tato nyaset kriyāśaktiṃ pīṭhe jñānañca vigrahe

हिन्दी अर्थ

स्पर्श तथा रूपये तीन गुण कहे गये हैं। सुषुप्त अवस्था है और रुद्रदेव कारण हैं। भुवन आदि समस्त वस्तुओंको भावनाद्वारा विद्याके अन्तर्गत देखे। इसके लिये संधान-मन्त्र है-' ३ हूं हैं हां।' तत्पश्चात् रक्तवर्ण एवं स्वस्तिकके चिहसे अङ्कित त्रिकोणाकार मण्डलका चिन्तन करे। शिष्यके वक्षमें ताडन, कलापाशका छेदन, शिष्यके हृदयमें प्रवेश, उसके जीवचैतन्यका पाश-

English

Then the pervading energy should be invoked and locat¬ ed therein. Then the mother goddess known also as Siva should

अध्याय ९८

श्लोक 6

ततोपि व्यापिनीं शक्तिं समावाह्य नियोजयेत् ।अम्बिकां शिवनाम्नीञ्च समालभ्य(७) प्रपूजयेत्

tatopi vyāpinīṃ śaktiṃ samāvāhya niyojayet / ambikāṃ śivanāmnīñca samālabhya(7) prapūjayet

हिन्दी अर्थ

बन्धनसे वियोजन तथा हृदयप्रदेशसे जीवचैतन्य एवं विद्याकलाका आकर्षण और ग्रहण करे

English

Then the pervading energy should be invoked and locat¬ ed therein. Then the mother goddess known also as Siva should

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_agnipurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Agni Purana — Chapter 98
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

Numbering follows the imported source and may differ from other editions.