अध्याय १०१
श्लोक 1
इति श्रीब्रह्माण्डे महापुराणे वायुप्रोक्ते मध्यमभागे तृतीय उपोद्धातपादे भार्गवचरिते गान्धर्वलक्षणं नाम द्विषष्टितमो ऽध्यायः ॥ ६२॥ सूत उवाच कुकुद्मिननस्तु तं लोकं रैवतस्य गतस्य ह ।त्दृता पुण्यजनैः सर्वा राक्षसैः साकुशस्थली
iti śrībrahmāṇḍe mahāpurāṇe vāyuprokte madhyamabhāge tṛtīya upoddhātapāde bhārgavacarite gāndharvalakṣaṇaṃ nāma dviṣaṣṭitamo 'dhyāyaḥ // 62// sūta uvāca kukudminanastu taṃ lokaṃ raivatasya gatasya ha / tdṛtā puṇyajanaiḥ sarvā rākṣasaiḥ sākuśasthalī
हिन्दी अर्थ
आप संक्षोभिणो प्रमृति जिनमें मुख्य हैं ऐसी अचि मालाओं से समां वृत्त उदार महान प्रदीप्त वाली हैं है विश्रमाढ्ये ! आप आत्मा को आवि- भरण करती हैं। आपका शुभ्र आखय है । है शुभ्रपंदे ! आपको नमस्कार है ।२रा शम्भु के सहित सिद्ध आदि शक्तियों से आप. वन्दयमान हैं। आपका
English
The hundred brothers of that virtuous and noble- souled king were afflicted by arrows. Therefore, they fled in every direction due to fear.