अध्याय ३६
श्लोक 1
इति श्रीब्रह्माण्डे महापुराणे वायुप्रोक्ते पूर्वभागे द्वितीये ऽनुष्गपादे वेदव्यसनाख्यानं स्वायंभुवमन्वन्तरवर्णनं च नाम पञ्चत्रिंशत्तमो ऽध्यायः शांशपायन उवाच मन्वन्तराणि शेषाणि श्रोतुमिच्छाम्यनुक्रमात् ।मन्वन्तराधिपांश्चैव शक्रदेवपुरोगमान्
iti śrībrahmāṇḍe mahāpurāṇe vāyuprokte pūrvabhāge dvitīye 'nuṣgapāde vedavyasanākhyānaṃ svāyaṃbhuvamanvantaravarṇanaṃ ca nāma pañcatriṃśattamo 'dhyāyaḥ śāṃśapāyana uvāca manvantarāṇi śeṣāṇi śrotumicchāmyanukramāt / manvantarādhipāṃścaiva śakradevapurogamān
हिन्दी अर्थ
लिया था कि सब क्षथियों के कुसों का अन्त कर देने वाले परशुराम समा- गत हरो गये हैं तो वे बहुत ही कषुन्ध हुए ये और फिर उन्होंने राम के साथ संग्राम करने के लिए उद्योग किया था ।१६। इसके अनन्तर है गृप ! पञ्च- रथ शूरसेन प्रभृति शूरो ने अनेक अन्य राजाओं के सगथ परशुरामणी युद्ध “करने के लिए उद्यम किया था ।१७। इसके उपरान्त वे श्रेष्ठ क्षत्रिय अपनी चतुरङ्गिणी सेनाओं से समन्वित हुए ये और सब राम के पास प्राप्त हो गये थे । जिस तरह पावक पर गिरने वाले पतङ्गों को अग्नि भस्मसात् करके निवारित कर दिया करता है उसी भाति भागेवेन्द्र ने अपने एक ही रथ के
English
I wish to hear about the remaining Manvantaras in the proper sequence and also about the rulers of the Manvan- taras as well as those whose leaders are Sakra (Indra) and (other) Devas.