अध्याय १३
श्लोक 1
पुरोर् वंशं वयं सूत श्रोतुम् इच्छाम तत्त्वतः द्रुह्यस्यानोर् यदोश् चैव तुर्वसोश् च पृथक् पृथक्
puror vaṃśaṃ vayaṃ sūta śrotum icchāma tattvataḥ druhyasyānor yadoś caiva turvasoś ca pṛthak pṛthak
हिन्दी अर्थ
कारण उस नदीने उनका प्रिय करना चाहा। चलते थे, उनमेंसे कोई ऐसा नहीं था, जो पुत्रवान् कल्याणमय नरेश देवावृधके अभीष्टकी सिद्धि कैसे न हो, सौसे कम दान करता हो, हजार या सौसे हो-इस चिन्तामें देरतक पड़ी रहनेपर भी पर्णाशा कम आयुवाला हो, अशुद्ध कर्म करता हो अथवा सहसा किसी निश्चयपर न पहुँच सकी । उसे ऐसी यज्ञ न करता हो। भोजवंशी आहुककी पूर्व दिशामें
English
O Sveta, we would like to hear precisely the line of sue* •cessors of Puru, Druhyu, Anu, Yadu and Turvasu, separately.