Brahma Purana· Brahma Purāṇa
173
अध्याय 173 / 246

Adhyaya 173

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अध्याय १७३

श्लोक 1

ऋषिसत्त्रम् इति ख्यातम् ऋषयः सप्त नारद निषेदुस् तपसे यत्र यत्र भीमेश्वरः शिवः

ṛṣisattram iti khyātam ṛṣayaḥ sapta nārada niṣedus tapase yatra yatra bhīmeśvaraḥ śivaḥ

हिन्दी अर्थ

करूँगा' यों कहकर कश्यप मुनि गौतमी नदीके तटपर गये और देवेश्वर भगवान् शिवको स्तुति करने लगे। समस्त दु:खोंको दूर करनेके लिये दो ही देवता समर्थ बताये गये हैं-एक तो परम

English

The holy centre well known as Samitlrtha subdues all sins. I shall narrate it. Listen to it attentively, O Narada.

अध्याय १७३

श्लोक 2

तत्रेदं वृत्तम् आख्यास्ये देवर्षिपितृबृंहितम् शृणु यत्नेन वक्ष्यामि सर्वकामप्रदं शुभम्

tatredaṃ vṛttam ākhyāsye devarṣipitṛbṛṃhitam śṛṇu yatnena vakṣyāmi sarvakāmapradaṃ śubham

हिन्दी अर्थ

सुनकर आगस्त्य मुनि दौड़े हुए आये। उन्होंने पवित्र गौतमी नदी और दूसरे करुणानिधि शिव

English

In the meantime, the holy sage Vasistha took up a Yasti (thick stick) and commanded demons to stop.

अध्याय १७३

श्लोक 3

सप्तधा व्यभजन् गङ्गाम् ऋषयः सप्त नारद वासिष्ठी दाक्षिणेयी स्याद् वैश्वामित्री तदुत्तरा

saptadhā vyabhajan gaṅgām ṛṣayaḥ sapta nārada vāsiṣṭhī dākṣiṇeyī syād vaiśvāmitrī taduttarā

हिन्दी अर्थ

कश्यप बोले--देवेश्वर शंकर! मेरी रक्षा यज्ञके भागी होंगे। जिस-जिस यज्ञमें इन्द्रका भाग कोजिये। लोकवन्दित परमेश्वर! मेरी रक्षा कीजिये। होगा, उसमें उनसे भी पहले मरुदृणोंका भाग सबको पवित्र करनेवाले वागीश! रक्षा कीजिये। होगा--इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। मरुदरणोंके सर्पोंका आभूषण पहननेवाले शिव! रक्षा कीजिये । साथ रहनेपर कभी कोई इन्द्रको जीत नहीं

English

Then the sacrifice began to function again. The Daitya who had his own intrinsic strength went away. Thereafter these holy centres became auspicious. They bestow the benefits of ten horse-sacrifices.

अध्याय १७३

श्लोक 4

वामदेव्य् अपरा ज्ञेया गौतमी मध्यतः शुभा भारद्वाजी स्मृता चान्या आत्रेयी चेत्य् अथापरा

vāmadevy aparā jñeyā gautamī madhyataḥ śubhā bhāradvājī smṛtā cānyā ātreyī cety athāparā

हिन्दी अर्थ

धर्मस्वरूप वृषभपर सवारी करनेवाले देवता! रक्षा सकता। फिर तो वे ही सदा विजयी रहेंगे।' इतना कोजिये। तीनों वेद जिनके नेत्र हैं, ऐसे भगवान् कहकर शंकरजीने मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यसे कहा-- त्रिलोचन! रक्षा कीजिये। गोधर लक्ष्मीश! रक्षा 'मुने! तुम शचीपति इन्द्रपर क्रोध न करो। कीजिये। गजचर्मका वस्त्र धारण करनेवाले शर्व ! महामते! शान्त हो जाओ। मरुदटूण अमर हो गये।'

English

Another should be known as Vamadevi, the auspicious Gautami in the middle, another is remembered as Bharadvaji, and another Atreyi,

अध्याय १७३

श्लोक 5

जामदग्नी तथा चान्या व्यपदिष्टा तु सप्तधा तैः सर्वैर् ऋषिभिस् तत्र यष्टुम् इष्टैर् महात्मभिः

jāmadagnī tathā cānyā vyapadiṣṭā tu saptadhā taiḥ sarvair ṛṣibhis tatra yaṣṭum iṣṭair mahātmabhiḥ

हिन्दी अर्थ

रक्षा कीजिये। त्रिपुरहर! रक्षा कीजिये । अर्द्धचन्द्रसे फिर दितिसे भी शिवजीने कहा--' देवि! मेरे एक विभूषित नाथ! रक्षा कोजिये। यज्ञेधर सोमनाथ ! ऐसा पुत्र हो, जो तीनों लोकोंके ऐश्वर्यसे सुशोभित रक्षा कीजिये। मनोवाञ्छित फलोंके दाता! रक्षा रहे--इस बातका चिन्तन करती हुई तुम तपस्यामें कीजिये। करुणाधाम ! रक्षा कीजिये। मङ्गलदाता ! प्रवृत्त हुई थी। तुम्हारा वह मनोरथ अब सफल

English

and Jamadagni's, thus named sevenfold. By all those sages, the great-souled ones desiring to sacrifice there,

अध्याय १७३

श्लोक 6

निष्पादितं महासत्त्रम् ऋषिभिः पारदर्शिभिः एतस्मिन्न् अन्तरे तत्र देवानां प्रबलो रिपुः

niṣpāditaṃ mahāsattram ṛṣibhiḥ pāradarśibhiḥ etasminn antare tatra devānāṃ prabalo ripuḥ

हिन्दी अर्थ

रक्षा कीजिये । सबकी उत्पत्तिके हेतुभूत परमात्मन्! हो गया। तुम्हारे ये पुत्र अधिक गुणशाली, रक्षा कीजिये। पालन करनेवाले वासव! रक्षा बलवान् और शूरवीर हैं। अत: अब तुम अपनी कीजिये। भास्कर ! वित्तेश ! रक्षा कीजिये। ब्रह्मवन्दित मानसिक चिन्ता छोड़ दो। सुन्दरी ! तुम संशयरहित शिव! रक्षा कीजिये। विश्वेश्वर! रक्षा कोजिये। होकर अन्य वर भी माँगो।'

English

a great session was completed by sages who had seen the far shore. In the meantime a powerful enemy of the gods arrived there,

अध्याय १७३

श्लोक 7

विश्वरूप इति ख्यातो मुनीनां सत्त्रम् अभ्यगात् ब्रह्मचर्येण तपसा तान् आराध्य यथाविधि विनयेनाथ पप्रच्छ ऋषीन् सर्वान् अनुक्रमात्

viśvarūpa iti khyāto munīnāṃ sattram abhyagāt brahmacaryeṇa tapasā tān ārādhya yathāvidhi vinayenātha papraccha ṛṣīn sarvān anukramāt

हिन्दी अर्थ

सिद्धेश्वर! रक्षा कीजिये। पूर्ण परमेश्वर! आपको। दिति बोलीं-भगवन्! लोकमें यही बड़ी नमस्कार है । करुणासागर शिव! भयंकर संसाररूपी बात समझी जाती है कि माता-पिताको पुत्रका दुर्गम प्रदेशमें विचरनेके कारण जिनका चित्त उद्विग्र दर्शन हो। विशेषतः माताके लिये यह बहुत ही हो रहा है, ऐसे जीवोंके लिये आप ही शरण हैँ। प्रिय बात है। इसमें भी रूप, सम्पत्ति, शौर्य और

English

famed as Vishvarupa, at the sages' session; having duly propitiated them by celibacy and austerity, he humbly asked all the sages in order:

अध्याय १७३

श्लोक 8

ध्रुवं सर्वे यथाकामं मम स्वास्थ्येन हेतुना यथा स्याद् बलवान् पुत्रो देवानाम् अपि दुर्धरः यज्ञैर् वा तपसा वापि मुनयो वक्तुम् अर्हथ

dhruvaṃ sarve yathākāmaṃ mama svāsthyena hetunā yathā syād balavān putro devānām api durdharaḥ yajñair vā tapasā vāpi munayo vaktum arhatha

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार स्तुति करनेवाले कश्यपजीके पराक्रमसे सम्पन्न एक भी पुत्र हो तो बड़े समक्ष भगवान् शंकर प्रकट हुए और उनसे वर भाग्यकी बात है । फिर यदि बहुत-से उत्तम और माँगनेके लिये कहा। कश्यपजीने विनीत होकर गुणवान् पुत्र प्राप्त हों तो क्या कहना। मेरे पुत्र भगवान् शिवसे इन्द्रकी समस्त चेष्टाओंका विस्तारपूर्वक आपके प्रभावसे विजयी और बली हुए। वे

English

"Surely, sages, you can tell, by sacrifices or austerity, how, as I wish, for the sake of my well-being, I may have a mighty son, hard even for the gods to withstand."

अध्याय १७३

श्लोक 9

तत्र प्राह महाबुद्धिर् विश्वामित्रो महामनाः

tatra prāha mahābuddhir viśvāmitro mahāmanāḥ

हिन्दी अर्थ

वर्णन किया। साथ ही यह भी बताया कि मेरे वास्तवमेँ इन्द्रके भाई और प्रजापतिके पुत्र हैं। पुत्रोंका जो नाश हो रहा है, उनमें परस्पर शत्रुता देव! जहाँ अगस्त्य और गौतमी गङ्गाके प्रसादके बढ़ रही है, इन्द्रको पाप और शापकी प्रापि हुई साथ-साथ आपका भी प्रसाद प्राप्त हो, वहाँ शुभ है, यह सब शान्त हो जाय। यह सुनकर भगवान् होनेमें क्या संदेह है। यद्यपि मैं कृतार्थ हो गयी,

English

There the greatly wise, great-minded Vishvamitra said:

अध्याय १७३

श्लोक 10

कर्मणा तात लभ्यन्ते फलानि विविधानि च त्रयाणां कारणानां च कर्म प्रथमकारणम्

karmaṇā tāta labhyante phalāni vividhāni ca trayāṇāṃ kāraṇānāṃ ca karma prathamakāraṇam

हिन्दी अर्थ

शंकरने कहा--' आपके जो उनचास पुत्र मरुद्रण तथापि भक्तिपूर्वक आपसे कुछ निवेदन करती हैं, वे सब सौभाग्यशाली और इन्द्रके साथ सदा हूँ। देव! मेरी बात सुनें और संसारका कल्याण

English

"By action, dear, various fruits are obtained; of the three causes, action is the first cause.

अध्याय १७३

श्लोक 11

ततश् च कारणं कर्ता ततश् चान्यत् प्रकीर्तितम् उपादानं तथा बीजं न च कर्म विदुर् बुधाः

tataś ca kāraṇaṃ kartā tataś cānyat prakīrtitam upādānaṃ tathā bījaṃ na ca karma vidur budhāḥ

हिन्दी अर्थ

गौ अर्थात् वृषभ (नन्दी)-को धारण करनेसे 'गोधर' और लक्ष्मीस्वरूपा पार्वतीके स्वामी होनेसे ' लक्ष्मीश' हैं। अथवा गोधरका अर्थ भूधर (गिरिराज हिमालय) है, उनकी लक्ष्मीस्वरूपा कन्याके स्वामी होनेके कारण शिव “गोधर लक्ष्मीश' हैं।

English

Then the doer is the cause; then another is declared, the material and the seed; the wise do not know action (alone).

अध्याय १७३

श्लोक 12

कर्मणां कारणत्वं च कारणे पुष्कले सति भावाभावौ फले दृष्टौ तस्मात् कर्माश्रितं फलम्

karmaṇāṃ kāraṇatvaṃ ca kāraṇe puṣkale sati bhāvābhāvau phale dṛṣṭau tasmāt karmāśritaṃ phalam

हिन्दी अर्थ

यम, आग्नेय, कपोत और उलूक-तीर्थकी महिमा २१९

English

Even when action is the cause and a complete cause is present, the fruit is seen as arising or not; therefore the fruit depends on action.

अध्याय १७३

श्लोक 13

कर्मापि द्विविधं ज्ञेयं क्रियमाणं तथा कृतम् कर्तव्यं क्रियमाणस्य साधनं यद् यद् उच्यते

karmāpi dvividhaṃ jñeyaṃ kriyamāṇaṃ tathā kṛtam kartavyaṃ kriyamāṇasya sādhanaṃ yad yad ucyate

हिन्दी अर्थ

करें । देववन्द्य ! संतानकी प्राप्ति संसारमें दुर्लभ है । यही गति होती है । जो तीर्थोका सेवन करते हुए विशेषतः माताके लिये पुत्रका होना और भी प्रिय जीवन व्यतीत करते हैं, उन्हें श्रेष्ठ संतानकी प्राप्ति हे । पुत्र भी यदि गुणवान्, धनवान् और आयुष्मान् होती है। जो दिति और गङ्गाके संगममें स्नान हुआ, तब तो कहना ही क्या है। इहलोक और करके अनादि, अपार, अजय, सच्चिदानन्दमय,

English

Action too is to be known as twofold: what is being done and what is done. What is to be done is the means for what is being done.

अध्याय १७३

श्लोक 14

तद्भावाः कर्मसिद्धौ च उभयत्रापि कारणम् यद् यद् भावयते जन्तुः कर्म कुर्वन् विचक्षणः

tadbhāvāḥ karmasiddhau ca ubhayatrāpi kāraṇam yad yad bhāvayate jantuḥ karma kurvan vicakṣaṇaḥ

हिन्दी अर्थ

परलोकमें उत्तम फलकी इच्छा रखनेवाले सभी लिङ्गस्वरूप, ज्योतिर्मय तथा अनामय महादेव प्राणियोंको गुणवान् पुत्रको प्राप्ति सदा ही अभीष्ट भगवान् सिद्धेश्वःका अनेक उपचारोंसे भक्तिपूर्वक है। अतः यहाँ स्रान करनेसे इस दुर्लभ फलकी पूजन करता है, चतुर्दशी और अष्टमीको इस प्राप्ति हो सके--ऐसा अनुग्रह कोजिये। स्तोत्रद्वारा स्तुति करता है तथा यहाँ गङ्गाके तटपर

English

Their states are the cause both in the success of action; whatever the discerning creature intends as he performs the action,

अध्याय १७३

श्लोक 15

तद्भावनानुरूपेण फलनिष्पत्तिर् उच्यते करोति कर्म विधिवद् विना भावनया यदि

tadbhāvanānurūpeṇa phalaniṣpattir ucyate karoti karma vidhivad vinā bhāvanayā yadi

हिन्दी अर्थ

भगवान् शंकर बोले--नि:संतान होना बहुत ब्राह्मणोंको अपनी शक्तिके अनुसार सुवर्ण देता बड़े पापका फल है। स्त्री या पुरुष--कोई भी और भोजन कराता हे, उसे अनेक पुत्र प्राप्त होते यदि निःसंतान हो तो यहाँ स्नान करनेमात्रसे हैं। वह सम्पूर्ण अभिलषित वस्तुओंको प्राप्त करके उसके इस दोषका नाश हो जाता है। जो इस अन्तमें भगवान् शिवके धाममें जाता है। जो इस

English

according to that intention the fruit is produced, it is said. If one performs action by rule but without intention,

अध्याय १७३

श्लोक 16

अन्यथा स्यात् फलं सर्वं तस्य भावानुरूपतः तस्मात् तपो व्रतं दानं जपयज्ञादिकाः क्रियाः

anyathā syāt phalaṃ sarvaṃ tasya bhāvānurūpataḥ tasmāt tapo vrataṃ dānaṃ japayajñādikāḥ kriyāḥ

हिन्दी अर्थ

स्तोत्रका पाठ करेगा, उसे यहाँ स्नान करनेका स्तोत्रके द्वारा कहीं भी मेरी छः महीने स्तुति फल प्राप्त होगा। जो तीन मासतक यहाँ स्नान और करता है, उसे पुत्र प्राप्त होता है। यदि उसको स्त्री दान करता है, उसे पुत्रकी प्राप्ति होती है । पुत्रहीन वन्ध्या हो तो भी वह निःसंदेह पुत्रवती होती है । स्त्री यहाँ स्नान करके पुत्र पा सकती है । ऋतुस्नाता। तबसे उस तीर्थका नाम पुत्रतीर्थ हो गया।

English

the fruit will differ, according to his state. Therefore austerity, vow, gift, chanting, sacrifice and other acts

अध्याय १७३

श्लोक 17

कर्मणस् त्व् अनुरूपेण फलं दास्यन्ति भावतः तस्माद् भावानुरूपेण कर्म वै दास्यते फलम्

karmaṇas tv anurūpeṇa phalaṃ dāsyanti bhāvataḥ tasmād bhāvānurūpeṇa karma vai dāsyate phalam

हिन्दी अर्थ

स्त्री यदि यहाँ आकर खान करे तो उसे अनेकों वहाँ स्नान-दान आदि करनेसे समस्त कामनाओंकी पुत्र प्राप्त होते हें । वह तीन महीनेके भीतर ही पूर्ति होती है । मरुदरणोंके साथ मैत्री होनेके कारण गर्भवती हो जाती है। जो पितृदोषसे तथा धन उसे मित्रतीर्थ भी कहते हें । यहाँ स्नान करनेसे अपहरण करनेके दोषसे पुत्र-लाभसे वञ्चित हें, इन्द्र निष्पाप हुए थे, इसलिये वह इन्द्रतीर्थ या

English

give fruit by intention in accordance with the action; therefore action gives fruit in accordance with intention.

अध्याय १७३

श्लोक 18

भावस् तु त्रिविधो ज्ञेयः सात्त्विको राजसस् तथा तामसस् तु तथा ज्ञेयः फलं कर्मानुसारतः

bhāvas tu trividho jñeyaḥ sāttviko rājasas tathā tāmasas tu tathā jñeyaḥ phalaṃ karmānusārataḥ

हिन्दी अर्थ

उनके लिये यह गौतमी नदी परम उद्धारका कारण शक्रतीर्थ भी कहलाता है । जहाँ इन्द्रको अपनी है। यहाँ पितरोंको पिण्डदान देने, तर्पण करने खोयी हुई लक्ष्मी प्राप्त हुई, वह कमलातीर्थ तथा कुछ सुवर्ण-दान करनेसे निश्चय ही पुत्र होता कहलाया। ये सब तीर्थ समस्त अभीष्ट पदार्थोको है। जो धरोहर हडप लेते, रल्रोंकी चोरी करते देनेवाले हैं। भगवान् शिव यह कहकर कि “यहाँ

English

Intention is to be known as threefold: sattvic, rajasic and tamasic; the fruit follows the action.

अध्याय १७३

श्लोक 19

भावनानुगुणं चेति विचित्रा कर्मणां स्थितिः तस्माद् इच्छानुसारेण भावं कुर्याद् विचक्षणः

bhāvanānuguṇaṃ ceti vicitrā karmaṇāṃ sthitiḥ tasmād icchānusāreṇa bhāvaṃ kuryād vicakṣaṇaḥ

हिन्दी अर्थ

तथा पितरोंका श्राद्ध-कर्म छोड़ देते हैं, उनके सब कामनाएँ पूर्ण होंगी' अन्तर्धान हो गये और बंशकी वृद्धि नहीं होती। जो पाप करके उसका कश्यप आदि सब लोग कृतकृत्य होकर जैसे प्रायश्चित्त किये बिना ही मर जाते हैं, उन सबको आये थे, वैसे लौट गये।

English

Varied is the standing of actions according to intention; therefore the discerning should form the intention according to his wish.

अध्याय १७३

श्लोक 20

पश्चात् कर्मापि कर्तव्यं फलदातापि तद्विधम् फलं ददाति फलिनां फले यदि प्रवर्तते

paścāt karmāpi kartavyaṃ phaladātāpi tadvidham phalaṃ dadāti phalināṃ phale yadi pravartate

हिन्दी अर्थ

यम, आग्नेय, कपोत और उलूक-तीर्थकी महिमा

English

Afterwards the action too is to be done; the giver of fruit too is of that kind; he gives fruit to the fruit-seekers when the fruit is under way.

अध्याय १७३

श्लोक 21

कर्मकारो न तत्रास्ति कुर्यात् कर्म स्वभावतः तद् एव चोपदानादि सत्त्वादिगुणभेदतः

karmakāro na tatrāsti kuryāt karma svabhāvataḥ tad eva copadānādi sattvādiguṇabhedataḥ

हिन्दी अर्थ

ete कहते हैं-यमतीर्थ पितरोंकी प्रसन्नताको देवता और मुनि उस तीर्थका सेवन करते हैं। मैं बढ़ानेवाला है। वह प्रत्यक्ष और परोक्ष-सब उसके प्रभावका वर्णन करता हुँ, जो सब पापोंका प्रकारको अभीष्ट वस्तुओंको देनेवाला है । सम्पूर्ण नाश करनेवाला है। एक बलवान् कपोत था, जो

English

There is no agent of action there; one acts by nature; and that material and the rest, by differences of the qualities, sattva and others,

अध्याय १७३

श्लोक 22

भावात् प्रारभते तद्वद् भावैः फलम् अवाप्यते धर्मार्थकाममोक्षाणां कर्म चैव हि कारणम्

bhāvāt prārabhate tadvad bhāvaiḥ phalam avāpyate dharmārthakāmamokṣāṇāṃ karma caiva hi kāraṇam

हिन्दी अर्थ

ये न्यासाद्यपहर्तारो रल्रापहवकारका: । श्राद्धकर्मविहीनाश्च तेषां बंशो न वद्धते॥ (१२४। १३०)

English

begins from intention; so the fruit is obtained by intentions. And action is the cause of dharma, wealth, desire and liberation.

अध्याय १७३

श्लोक 23

भावस्थितं भवेत् कर्म मुक्तिदं बन्धकारणम् स्वभावानुगुणं कर्म स्वस्यैवेह परत्र च

bhāvasthitaṃ bhavet karma muktidaṃ bandhakāraṇam svabhāvānuguṇaṃ karma svasyaiveha paratra ca

हिन्दी अर्थ

अनुह्वादके नामसे विख्यात था। उसकी पत्नी हेति अग्रिदेवके पास जाकर नाना प्रकारकी उक्तियोंसे नामकी यक्षिणी थी, जो इच्छानुसार रूप धारण स्तवन करना आरम्भ किया।

English

Action abiding in intention may be the giver of liberation or the cause of bondage. Action in accordance with one's nature is for oneself here and hereafter.

अध्याय १७३

श्लोक 24

फलानि विविधान्य् आशु करोति समतानुगम् एक एव पदार्थो ऽसौ भावैर् भेदः प्रदृश्यते

phalāni vividhāny āśu karoti samatānugam eka eva padārtho 'sau bhāvair bhedaḥ pradṛśyate

हिन्दी अर्थ

कर सकती थी। अनुहाद मृत्युके पुत्रका पुत्र था! हेति बोली--जिनका रूप और दान प्रत्यक्ष और हेति मृत्युकी पुत्रीकी पुत्री थी । समयानुसार है, सम्पूर्ण पदार्थ जिनके आत्मस्वरूप हें और उन दोनोंके भी अनेक पुत्र-पौत्र हुए। पक्षियोंका देवता जिनके द्वारा हवनीय पदार्थाका भोजन राजा उलूक अनुहादका प्रबल शत्रु था। गङ्गाके करते हैं, उन यज्ञभोक्ता स्वाहापति अग्निको में

English

It quickly produces various fruits, following equanimity; this one object is seen to differ by intentions.

अध्याय १७३

श्लोक 25

क्रियते भुज्यते वापि तस्माद् भावो विशिष्यते यथाभावं कर्म कुरु यथेप्सितम् अवाप्स्यसि

kriyate bhujyate vāpi tasmād bhāvo viśiṣyate yathābhāvaṃ karma kuru yathepsitam avāpsyasi

हिन्दी अर्थ

उत्तर-तटपर कपोतका आश्रम था और दक्षिण नमस्कार करती हूँ। जो देवताओंके मुख, देवताओंके किनारे पक्षिराज उलूक रहता था। उलूक भी हविष्यको वहन करनेवाले, देवताओंके होता और अपने पुत्र-पौत्रोंके साथ निवास करता था। कपोत देवताओंके दूत हैं, उन आदिदेव भगवान् अग्निकी और उलूक दोनों बहुत समयतक एक-दूसरेके मैं शरण लेती हूँ। जो शरीरके भीतर प्राणरूपमें

English

It is done or enjoyed, so intention is distinguished. Do action according to intention and you will obtain what you wish."

अध्याय १७३

श्लोक 26

एतच् छ्रुत्वा ऋषेर् वाक्यं विश्वामित्रस्य धीमतः तपस् तप्त्वा बहुकालं तामसं भावम् आश्रितः

etac chrutvā ṛṣer vākyaṃ viśvāmitrasya dhīmataḥ tapas taptvā bahukālaṃ tāmasaṃ bhāvam āśritaḥ

हिन्दी अर्थ

विरोधी होकर युद्ध करते रहे। दोनों ही अपने स्थित हैं और बाहर अन्नदातारूपमें विद्यमान हैं पुत्र-पौत्रोंको साथ लेकर लड़ते थे। यह बलवान् तथा जो यज्ञके साधन हैं, उन धनंजय (अग्निदेव) - शत्रुओंके साथ बलवानोंका युद्ध था। उनमेंसे उलूक की मैं शरण लेती हूँ।

English

Hearing the word of the wise sage Vishvamitra, having practised austerity for a long time, taking a tamasic intention,

अध्याय १७३

श्लोक 27

विश्वरूपः कर्म भीमं चकार सुरभीषणम् पश्यत्सु ऋषिमुख्येषु वार्यमाणो ऽपि नित्यशः

viśvarūpaḥ karma bhīmaṃ cakāra surabhīṣaṇam paśyatsu ṛṣimukhyeṣu vāryamāṇo 'pi nityaśaḥ

हिन्दी अर्थ

अथवा कपोत-किसीको भी जय-पराजय नहीं अग्नि बोले-पतिव्रते! मेरा यह अस्त्र अमोघ होती थी। कपोतने यमराज तथा अपने पितामह है; अतः जिस लक्ष्यपर इसका विश्राम हो सके, मृत्युकी आराधना करके याम्यास्त्र प्राप्त किया, उसको बताओ।

English

Vishvarupa did a terrible act, frightening the gods; though constantly forbidden, while the chief sages looked on,

अध्याय १७३

श्लोक 28

आत्मकोपानुसारेण भीमं कर्म तथाकरोत् भीषणे कुण्डखाते तु भीषणे जातवेदसि

ātmakopānusāreṇa bhīmaṃ karma tathākarot bhīṣaṇe kuṇḍakhāte tu bhīṣaṇe jātavedasi

हिन्दी अर्थ

अतः वह सबसे अधिक शक्तिशाली हो गया। कपोतीने कहा--अग्निदेव! आपका अस्त्र इसी प्रकार उलूक भी अग्निकी आराधना करके मुझपर ही विश्राम करे, मेरे पुत्र और पतिपर अत्यन्त बलवान् हो गया। वर पाकर दोनों ही नहीं । मुझे मारकर आप सत्यवादी हों। आपको उन्मत्त हो गये थे, अतः फिर उनमें बड़ा भयंकर नमस्कार है।

English

he did a fearful act according to his own anger, in a fearful fire-pit, in fearful fire,

अध्याय १७३

श्लोक 29

भीषणं रौद्रपुरुषं ध्यात्वात्मानं गुहाशयम् एवं तपन्तम् आलक्ष्य वाग् उवाचाशरीरिणी

bhīṣaṇaṃ raudrapuruṣaṃ dhyātvātmānaṃ guhāśayam evaṃ tapantam ālakṣya vāg uvācāśarīriṇī

हिन्दी अर्थ

युद्ध छिड गया। उसमें उलूकने कपोतके ऊपर अग्निदेबने कहा--पतित्रते! तुम्हारे सुवचन आग्नेयास्त्रका प्रहार किया। कपोतने भी उलूकपर और पतिभक्तिसे मैं बहुत संतुष्ट हँ । तुम्हारे स्वामी यमपाश तथा यमदण्डका प्रयोग किया। कपोतकी और पुत्रोंका अनिष्ट नहीं होगा। मैं उनको रक्षाका स्त्री हेति बड़ी पतिव्रता थी। उस महायुद्धमें अपने वचन देता हूँ। यह मेरा आग्नेयास्त्र तुम्हारे पतिको,

English

meditating on a fearful Rudra-Purusha, dwelling in the cave of the heart. Seeing him thus performing austerity, a bodiless voice spoke:

अध्याय १७३

श्लोक 30

जटाजूटं विनात्मानं न च वृत्रो व्यजीयत वृथात्मानं विश्वरूपो जुहुयाज् जातवेदसि

jaṭājūṭaṃ vinātmānaṃ na ca vṛtro vyajīyata vṛthātmānaṃ viśvarūpo juhuyāj jātavedasi

हिन्दी अर्थ

स्वामीके निकट अग्निको प्रज्वलित देख वह दु:खसे पुत्रोंको तथा तुमको भी नहीं जलायेगा; अतः तुम विहल हो गयी विशेषतः पुत्रोंको अग्निसे आवृत सुखपूर्वक लौट जाओ।

English

"Without the matted hair, himself, Vritra was not conquered. In vain would Vishvarupa offer himself into the fire.

अध्याय १७३

श्लोक 31

स एवेन्द्रः स वरुणः स च स्यात् सर्वम् एव च त्यक्त्वात्मानं जटामात्रं हुतवान् वृजिनोद्भवः

sa evendraḥ sa varuṇaḥ sa ca syāt sarvam eva ca tyaktvātmānaṃ jaṭāmātraṃ hutavān vṛjinodbhavaḥ

हिन्दी अर्थ

देख उसकी व्याकुलता और भी बढ़ गयी। उसने इसी बीचमें उलूकीने भी अपने पतिको देखा ।

English

He would be Indra, Varuna and everything; giving up himself, he offered only matted locks, born of sin.

अध्याय १७३

श्लोक 32

वृत्र इत्य् उच्यते वेदे स चापि वृजिनो ऽभवत् भीमस्य महिमानं को जानाति जगदीशितुः

vṛtra ity ucyate vede sa cāpi vṛjino 'bhavat bhīmasya mahimānaṃ ko jānāti jagadīśituḥ

हिन्दी अर्थ

अश्नन्ति हव्यानि च येन देवाः स्वाहापतिं यज्ञभुजं नमस्ये॥ मुखभूतं च देवानां देवानां हव्यवाहनम्। होतारं चापि देवानां देवानां दूतमेव च॥ तं देवं शरणं यामि आदिदेवं विभावसुम्। अन्तःस्थितः प्राणरूपो बहिश्चान्नप्रदो हि यः। यो यज्ञसाधनं यामि शरणं तं धनंजयम्॥

English

Vritra is spoken of in the Veda, and he too was born of sin. Who knows the greatness of the terrible one, lord of the world?

अध्याय १७३

श्लोक 33

सृजत्य् अशेषम् अपि यो न च सङ्गेन लिप्यते विररामेति संकीर्त्य सा वाण्य् एनं मुनीश्वराः

sṛjaty aśeṣam api yo na ca saṅgena lipyate virarāmeti saṃkīrtya sā vāṇy enaṃ munīśvarāḥ

हिन्दी अर्थ

यम, आग्नेय, कपोत और उलूक-तीर्थकी महिमा » २२१

English

He creates all and yet is not touched by attachment." Having said so, the voice stopped, lords of sages.

अध्याय १७३

श्लोक 34

भीमेश्वरं नमस्कृत्य जग्मुः स्वं स्वम् अथाश्रमम् विश्वरूपो महाभीमो भीमकर्मा तथाकृतिः

bhīmeśvaraṃ namaskṛtya jagmuḥ svaṃ svam athāśramam viśvarūpo mahābhīmo bhīmakarmā tathākṛtiḥ

हिन्दी अर्थ

वे यमपाशमें बॅधकर यमदण्डसे ताडित हो रहे। यों कहकर यमराजने अपने पाश समेट लिये थे। सती-साध्वी उलूको यह देखकर बहुत दुःखी और अग्रिदेवने आग्रेयास्त्रका निवारण कर दिया। हुई और भयसे व्याकुल हो यमराजके पास गयी। इतना ही नहीं, उन दोनों देवताओंने मिलकर

English

Having bowed to Bhimeshvara they went each to his own hermitage. Vishvarupa, very terrible, of terrible deeds and form,

अध्याय १७३

श्लोक 35

भीमभावो भीमतनुं ध्यात्वात्मानं जुहाव ह तस्माद् भीमेश्वरो देवः पुराणे परिपठ्यते तत्र स्नानं च दानं च मुक्तिदं नात्र संशयः

bhīmabhāvo bhīmatanuṃ dhyātvātmānaṃ juhāva ha tasmād bhīmeśvaro devaḥ purāṇe paripaṭhyate tatra snānaṃ ca dānaṃ ca muktidaṃ nātra saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

उलूकी बोली--देव! मनुष्य आपसे भयभीत कपोत और उलूकमे प्रेम करा दिया। फिर होकर भागते हैं, आपसे डरकर ब्रह्मचर्यका पालन पक्षियोंसे कहा--' तुमलोग इच्छानुसार वर माँगो।'

English

of terrible disposition, meditating on a terrible body, offered himself. Therefore the god is called Bhimeshvara in the Purana; bathing and giving there grant liberation, no doubt.

अध्याय १७३

श्लोक 36

इति पठति शृणोति यश् च भक्त्या विबुधपतिं शिवम् अत्र भीमरूपम् जगति विदितम् अशेषपापहारि स्मृतिपदशरणेन मुक्तिदश् च

iti paṭhati śṛṇoti yaś ca bhaktyā vibudhapatiṃ śivam atra bhīmarūpam jagati viditam aśeṣapāpahāri smṛtipadaśaraṇena muktidaś ca

हिन्दी अर्थ

करते हैं। आपके ही भयसे धीर पुरुष उत्तम दोनों पक्षी बोले--' भगवन्! हमने आपसके वैरके

English

One who with devotion recites or hears this, Shiva in his terrible form here as lord of gods, famed in the world, remover of all sin, by taking refuge in the remembrance of his place gives liberation.

अध्याय १७३

श्लोक 37

गोदावरी तावद् अशेषपाप समूहहन्त्री परमार्थदात्री सदैव सर्वत्र विशेषतस् तु यत्राम्बुराशिं समनुप्रविष्टा

godāvarī tāvad aśeṣapāpa samūhahantrī paramārthadātrī sadaiva sarvatra viśeṣatas tu yatrāmburāśiṃ samanupraviṣṭā

हिन्दी अर्थ

बर्ताव करते हैं और आपके ही डरसे कर्मोके अनुष्ठानमें लगते हैं। आपसे भय पाकर लोग उपवास करते और गाँव छोड़कर वनमें जाते हैं। आपके ही डरसे सौम्यभाव ग्रहण करते और

English

The Godavari, destroyer of the entire mass of sin, giver of the highest good, is always and everywhere so, but especially where she has entered the ocean.

अध्याय १७३

श्लोक 38

स्नात्वा तु तस्मिन् सुकृती शरीरी गोदावरीवारिधिसंगमे यः उद्धृत्य तीव्रान् निरयाद् अशेषात् स पूर्वजान् याति पुरं पुरारेः

snātvā tu tasmin sukṛtī śarīrī godāvarīvāridhisaṃgame yaḥ uddhṛtya tīvrān nirayād aśeṣāt sa pūrvajān yāti puraṃ purāreḥ

हिन्दी अर्थ

आपके ही भयसे सोमपान करते हैं। आपसे भयभीत पुरुष ही अन्नदान और गोदानमें प्रवृत्त होते हैं और आपसे डरकर ही मुमुक्षु ब्रह्मवादीकी चर्चा करते हैं ।

English

The righteous embodied one who bathes at the confluence of the Godavari and the sea, lifting his forefathers from all the severe hells, goes to Shiva's city.

अध्याय १७३

श्लोक 39

वेदान्तवेद्यं यद् उपासितव्यं तद् ब्रह्म साक्षात् खलु भीमनाथः दृष्टे हि तस्मिन् न पुनर् विशन्ति शरीरिणः संस्मृतिम् उग्रदुःखाम्

vedāntavedyaṃ yad upāsitavyaṃ tad brahma sākṣāt khalu bhīmanāthaḥ dṛṣṭe hi tasmin na punar viśanti śarīriṇaḥ saṃsmṛtim ugraduḥkhām

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार स्तुति करती हुई उलूकीसे दक्षिण दिशाके स्वामी यमराजने कहा--' तुम्हारा कल्याण हो। तुम वर माँगो। मैं तुम्हें मनके अनुकूल बर दूँगा।' यमराजको यह बात सुनकर पतिव्रता

English

That Brahman, to be worshipped, knowable by the Vedanta, is directly Bhimanatha; when he is seen, embodied beings do not again enter the dreadful sorrow of worldly existence.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_brahmapurANa-1-246.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Brahma Purana — Chapter 173
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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