Brihadaranyaka Upanishad· Bṛhadāraṇyakopaniṣad
26
अध्याय 26 / 45

Adhyāya 26

3 श्लोकWhatsApp

पूर्ण अध्याय पाठ3 श्लोक

अध्याय २६

श्लोक 1

॥ विजहार षष्ठं ब्राह्मणम् ।मन्त्र १ [IV.vi.1] अथ वँशः पौतिमाष्यो गौपवनाद् गौपवनः पौतिमाष्यात् पौतिमाष्यो गौपवनाद् गौपवनः कौशिकात् कौशिकः कौण्डिन्यात् कौण्डिन्यः शाण्डिल्याच् छाण्डिल्यः कौशिकाच्च गौतमाच्च गौतमः

|| vijahAra ShaShThaM brAhmaNam . mantra 1 ##[IV.vi.1]## atha va{\m+}shaH pautimAShyo gaupavanAd gaupavanaH pautimAShyAt pautimAShyo gaupavanAd gaupavanaH kaushikAt kaushikaH kauNDinyAt kauNDinyaH shANDilyAch ChANDilyaH kaushikAchcha gautamAchcha gautamaH

हिन्दी अर्थ

घ्रुतकोशिकने पाराशर्यायणसे, पाराशर्यायणने पाराशर्यस, पाराय जानुकण्यंसे, जातुकण्यंने आसुरायणसे, ओर यास्कसे आसुरायणनं जेवणिसे, वैवणिने ओपजन्धनिसे, ओपजन्धनिने आमुरिसे आसुरिनं ॥ र्णब्रहा ग्रौर उससे उत्पन्न होनेवाला पूणं काथं आला सर्वान्तरो निरूपाधिको- केप्रलमम्रतत्वसाधनम्‌, धुना वहं ( परब्रह्म ) पूणं है ओर वह्‌ ( सोपाधिक ब्रह्य भी ) पूणं है । यहं ( कार्यस्मिक् ) पूणं ( कारणात्मक ) पूर्णसे ही उत्पन्न होता है। इसः

English

Now follows the stem :

अध्याय २६

श्लोक 2

मन्त्र २ [IV.vi.2] आग्निवेश्याद् अग्निवेश्यो गार्ग्याद् गार्ग्यो गार्ग्याद् गार्ग्यो गौतमाद् गौतमः सैतवात् सैतवः पाराशर्यायणात् पाराशार्यायणो गार्ग्यायणाद् गार्ग्यायण उद्दालकायनाद् उद्दालकायनो जाबालायनाज् जाबालायनो माध्यन्दिनायनान् माध्यन्दिनायनः सौकरायणात् सौकरायणः काषायणात् काषायणः सायकायनात् सायकायनः कौशिकायनेः कौशिकायनिः

mantra 2 ##[IV.vi.2]## AgniveshyAd agniveshyo gArgyAd gArgyo gArgyAd gArgyo gautamAd gautamaH saitavAt saitavaH pArAsharyAyaNAt pArAshAryAyaNo gArgyAyaNAd gArgyAyaNa uddAlakAyanAd uddAlakAyano jAbAlAyanAj jAbAlAyano mAdhyandinAyanAn mAdhyandinAyanaH saukarAyaNAt saukarAyaNaH kAShAyaNAt kAShAyaNaH sAyakAyanAt sAyakAyanaH kaushikAyaneH kaushikAyaniH

हिन्दी अर्थ

बहस्थथः । तत्‌ सम्पृणेमाकाश- व्यवहारापन्नं पूणं स्वेन सपे तदिदं विशेषापन्नं कार्यार आकाश ब्रह्म अकार है। आकाश यहां जड नहीं सनातन परमात्मा है। “जिसमे वायु रहता, वहु आकाश ही ख है-एेसा कौरव्पायणीपुत्रने कहा है । यहु ओङ्कार वेद है-एेसा ब्राह्मण जानते +

English

from Âgnivesya,

अध्याय २६

श्लोक 3

मन्त्र ३ [IV.vi.3] घृतकौशिकाद् घृतकौशिकः पाराशर्यायणात् पाराशर्यायणः पाराशर्यात् पाराशर्यो जातूकर्ण्याज् जातूकर्ण्य आसुरायणाच्च यास्काच्चा ऽऽसुरायणस्त्रैवणेस् त्रैवणिरौपजन्धनेर् औपजन्धनिरासुरेर् आसुरिर्भारद्वाजाद् भारद्वाज आत्रेयाद् आत्रेयो माण्टेर् माण्टिर्गौतमाद् गौतमो गौतमाद् गौतमो वात्स्याद् वात्स्यः शाण्डिल्याच् छाण्डिल्यः कैशोर्यात्काप्यात् कैशोर्यः काप्यः कुमारहारितात् कुमारहारितो गालवाद् गालवो विदर्भीकौण्डिन्याद् विदर्भीकौण्डिन्यो वत्सनपातो बाभ्रवाद् वत्सनपाद्बाभ्रव पथः सौभरात् पन्थाः सौभरोऽयास्यादाङ्गिरसाद् अयास्य आङ्गिरस आभूतेस्त्वाष्ट्राद् आभूतिस्त्वाष्ट्रो विश्वरूपात्त्वाष्ट्राद् विश्वरूपस्त्वाष्ट्रोऽव्श्विभ्याम् अश्विनौ दधीच आथर्वणाद् दध्यङ्ङाथर्वणोऽथर्वणो दैवाद् अथर्वा दैवो मृत्योः प्राध्वँसनान् मृत्युः प्राध्वँसनः प्रध्वँसनात् प्रध्वँसन एकर्षेर् एकर्षिर्विप्रचित्तेः विप्रचित्तिर्व्यष्टेर् व्यष्टिः सनारोः सनारुः सनातनात् सनातनः सनगात् सनगः परमेष्ठिनः परमेष्ठी ब्रह्मणो ब्रह्म स्वयम्भु ब्रह्मणे नमः

mantra 3 ##[IV.vi.3]## ghR^itakaushikAd ghR^itakaushikaH pArAsharyAyaNAt pArAsharyAyaNaH pArAsharyAt pArAsharyo jAtUkarNyAj jAtUkarNya AsurAyaNAchcha yAskAchchA .a.asurAyaNastraivaNes traivaNiraupajandhaner aupajandhanirAsurer AsurirbhAradvAjAd bhAradvAja AtreyAd Atreyo mANTer mANTirgautamAd gautamo gautamAd gautamo vAtsyAd vAtsyaH shANDilyAch ChANDilyaH kaishoryAtkApyAt kaishoryaH kApyaH kumArahAritAt kumArahArito gAlavAd gAlavo vidarbhIkauNDinyAd vidarbhIkauNDinyo vatsanapAto bAbhravAd vatsanapAdbAbhrava pathaH saubharAt panthAH saubharo.ayAsyAdA~NgirasAd ayAsya A~Ngirasa AbhUtestvAShTrAd AbhUtistvAShTro vishvarUpAttvAShTrAd vishvarUpastvAShTro.avshvibhyAm ashvinau dadhIcha AtharvaNAd dadhya~N~NAtharvaNo.atharvaNo daivAd atharvA daivo mR^ityoH prAdhva{\m+}sanAn mR^ityuH prAdhva{\m+}sanaH pradhva{\m+}sanAt pradhva{\m+}sana ekarSher ekarShirviprachitteH viprachittirvyaShTer vyaShTiH sanAroH sanAruH sanAtanAt sanAtanaH sanagAt sanagaH parameShThinaH parameShThI brahmaNo brahma svayambhu brahmaNe namaH

हिन्दी अर्थ

ॐ खं ब्रह्मेति मन्त्रोऽयं ॐ खं ब्रह्म यह मन्त्र हे। १8. इसका कहीं अन्यत्र विनियोग नहीं चान्यन्राविनयुक्त ईह ब्रह्मण हुमा, यहाँ ब्राह्मण इसका ध्यान- “जिस प्रकार शङ्कसे सम्पूणं पत्त व्याप्त रहते है” इत्यादि अन्य श्रुति- यह्‌ वेद इसलिये भी ओङ्कार म्रजापतिका देव, मनुष्य भ्रौर श्रसुर तीनोको एक ही अ्रक्षर द' से पृथक्‌-पृथक्‌ दम, दान श्रौर दयाका उपदेश अब दमादि तीन साधनोका

English

from Ghritakausika,

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/brihadaaraNyaka.itx · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Brihadaranyaka Upanishad — Chapter 26
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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