अध्याय १०
श्लोक 1.10.1
॥ मटचीहतेषु कुरुष्वाटिक्या सह जाययोषस्तिर्ह चाक्रायण इभ्यग्रामे प्रद्राणक उवास
|| maTachIhateShu kuruShvATikyA saha jAyayoShastirha chAkrAyaNa ibhyagrAme pradrANaka uvAsa
हिन्दी अर्थ
तथादषटऽपि प्रलोके्ष्मि- (तथा अ परलोके भी उत नपरोबरीयोन्नोको भविष्यतीतयु- उरो उद्ृट लोककी ही शरा स शाण्डिस्यके प्रति कहा । थह उद्रीथोपासनप्रसङ्खेन प्रस्ताव उद्गीथोपासनाके प्रसङगते हं व्यमितीदमारम्यते। आख्यायि- स्यि आगेका भन्थ भार्म मि जाता ह । यहं नो आख्यायिका £ ओले ओर पत्थर पड्नेसे कुरुदेशके सेतीके चपट हो जानेषर वह इभ्य भरामके भीतर (आटिकः ( जिसके स्तनादि स्रीजनोचित चिह प्रकट नहीं हुए है रेसी अस्पवयस्का ) पलीके साथ चक्रका पुत्र उषसि,
English
When the Kurus had been destroyed by (hail) stones , Ushasti Kâkrâyana lived as a beggar with his virgin wife at Ibhyagrâma.