Chandogya Upanishad· Chāndogyopaniṣad
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अध्याय 10 / 154

Adhyāya 10

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अध्याय १०

श्लोक 1.10.1

॥ मटचीहतेषु कुरुष्वाटिक्या सह जाययोषस्तिर्ह चाक्रायण इभ्यग्रामे प्रद्राणक उवास

|| maTachIhateShu kuruShvATikyA saha jAyayoShastirha chAkrAyaNa ibhyagrAme pradrANaka uvAsa

हिन्दी अर्थ

तथादषटऽपि प्रलोके्ष्मि- (तथा अ परलोके भी उत नपरोबरीयोन्नोको भविष्यतीतयु- उरो उद्ृट लोककी ही शरा स शाण्डिस्यके प्रति कहा । थह उद्रीथोपासनप्रसङ्खेन प्रस्ताव उद्गीथोपासनाके प्रसङगते हं व्यमितीदमारम्यते। आख्यायि- स्यि आगेका भन्थ भार्म मि जाता ह । यहं नो आख्यायिका £ ओले ओर पत्थर पड्नेसे कुरुदेशके सेतीके चपट हो जानेषर वह इभ्य भरामके भीतर (आटिकः ( जिसके स्तनादि स्रीजनोचित चिह प्रकट नहीं हुए है रेसी अस्पवयस्का ) पलीके साथ चक्रका पुत्र उषसि,

English

When the Kurus had been destroyed by (hail) stones , Ushasti Kâkrâyana lived as a beggar with his virgin wife at Ibhyagrâma.

अध्याय १०

श्लोक 1.10.2

स हेभ्यं कुल्माषान्खादन्तं बिभिक्षे तँ होवाच ।नेतोऽन्ये विद्यन्ते यच्च ये म इम उपनिहिता इति

sa hebhyaM kulmAShAnkhAdantaM bibhikShe ta{\m+} hovAcha | neto.anye vidyante yaccha ye ma ima upanihitA iti

हिन्दी अर्थ

मटचीहतेषु मरच्योऽशन- कुरुजंके मटचीहत शन यस्ताभिहतेषु नारितेषु इुरुषु मरची ओर ओर पत्यरको कटते है, ङरसस्यष्वित्यर्थः । तो दिते नसे छर्वेशके अर्थात्‌ इरदेशकी ईरो इस्त्यारोदो वा, तस्य राम कहते + उसकी पात्रता रखनेवास्र इम्यग्रामस्तस्मन्पद्राणकोऽना- कंदलाता है, उसके भामको इम्य- ग्राम कहते रै, उसमे अन्न प्राप न उने धुने हुए उडद खानेवाले एक महावतसे याचना की तब उसने उससे कहा--इन जुटे उददोके सिवा मेरे पस ओर नह है । जो कुछ एकत्र ये वे सव-के-सव ये मेने अपने भोजनपातरभ रख खथ ईं

English

Seeing a chief eating beans, he begged of him. The chief said: 'I have no more, except those which are put away for me here.'

अध्याय १०

श्लोक 1.10.3

एतेषां मे देहीति होवाच तानस्मै प्रददौ हन्तानुपानमित्युच्छिष्टं वै मे पीतँस्यादिति होवाच

eteShAM me dehIti hovAcha tAnasmai pradadau hantAnupAnamityuchChiShTaM vai me pIta{\m+}syAditi hovAcha

हिन्दी अर्थ

सोऽन्नार्थमटननिम्यं इुल्माषा- भन्नके ठियेभरूमते-षूमते उसने न्कुत्सितान्माषान्खादन्तं मक्षयन्त अकस्मात्‌ ९९ हाथीवानको घुने „ , उस उषस्तिसे हाथीवानने कहा-- त्‌ से दन्द दी दे दे-रेसा उपत्तिने कहा । तव महावते प उद्‌ उसे दे दिये ओर कहा "यह. अनुपान भी ठो ; इसपर क बोका-'इसे ठेनेसे मेरदरारा निश्चय ही उच्छिष्ट ज पीया जायगा एतेषामेतानित्यथैः,मे महयं, तेषाम्‌, इस पषठन्त प देदीति होवाच । तान्स इभ्यो- (तू सुने इन उददोक्तो ही है, पष उषस्तिने कहा । तव उस महावने

English

Ushasti said: 'Give me to eat of them.' He gave him the beans, and said: 'There is something to drink also! Then said Ushasti: 'If I drank of it, I should have drunk what was left by another, and is therefore unclean.'

अध्याय १०

श्लोक 1.10.4

न स्विदेतेऽप्युच्छिष्टा इति न वा अजीविष्यमिमानखादन्निति होवाच कामो म उदपानमिति

na svidete.apyuchChiShTA iti na vA ajIviShyamimAnakhAdanniti hovAcha kAmo ma udapAnamiti

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार कदनेवाले उद ःप्युक्तवन्तं प्रत्युवाचेतरः-- उषस्तिसे दूसरे ८ महावत ) ने ' मानलादश्निति होवाच कामो म उदकपानमिति श्या ये ( उडद ) भी उच्छिष्ट नहीं है ¢ उसने कहा -“इन्दे बिना खये तो म जीवित नहीं रह सकता था, जक्पान तो सुञ्ञे यथेच्छ वा अजीविष्यं न॒ जीविष्यामी- होवाच । काम इच्छातो मे द्ाध्मयसोबतः स्वात्मपरोपकार-

English

The chief said: 'Were not those beans also left over and therefore unclean?' 'No,' he replied; 'for I should not have lived, if I had not eaten them, but the drinking of water would be mere pleasure .'

अध्याय १०

श्लोक 1.10.5

स ह खादित्वातिशेषाञ्जायाया आजहार साग्र एव सुभिक्षा बभूव तान्प्रतिगृह्य निदधौ

sa ha khAditvAtisheShA~njAyAyA AjahAra sAgra eva subhikShA babhUva tAnpratigR^ihya nidadhau

हिन्दी अर्थ

है १ एेसा कटे जानेपर उषस्तिने कहा-- न उड््दोको बिना खये- बिना भक्षण क्रिये तो भे जीवित नहीं ® चाक्रायणने श्रद्राणक' अर्थात्‌ अयन्त आपदूस्त होनेपर ही उच्छिष्ट भोजन किया था--इससे यह सिद्ध होता है कि विधिका व्यतिक्रम जौवनरश्ाका करो वैष साधन न रहनेपर ही किया जा सकता ह अन्यथा कदापि नहीं । उन्द खाकर वह वचे हुए उड दोको अपनी पलीके स्मि ढे भय । वह पटल ही खूब भिक्षा प्रप्त कर चुकी थी अतः उसने उन ठक

English

Having eaten himself, Ushasti gave the remaining beans to his wife. But she, having eaten before, took them and put them away.

अध्याय १०

श्लोक 1.10.6

स ह प्रातः संजिहान उवाच यद्बतान्नस्य लभेमहि लभेमहि धनमात्राँराजासौ यक्ष्यते स मा सर्वैरार्त्विज्यैर्वृणीतेति

sa ha prAtaH saMjihAna uvAcha yadbatAnnasya labhemahi labhemahi dhanamAtrA{\m+}rAjAsau yakShyate sa mA sarvairArtvijyairvR^iNIteti

हिन्दी अर्थ

तांच स खादित्वातिरोषान- उन्हे खाकर वह बचे हुए उद तिचिष्टाञ्जायाये कारुण्यादाज- को करणावश्च अपनी मायकि छि हार । साटिक्यग्र एब इल्माष्‌- ठे जया । वह आपकी उदृदमि उसने परातःकारु शय्यात्याग करनेके अनन्तर का- यदि हमे कछ अन्न मिरु जाता तो हम कुछ धन प्राक्त कर ठेते, वर्योकि वद राना यज्ञ करनेवाला हे, वह समस्त ऋखिक्कमेकि छियि मेरा वरण कर रगा स तस्याः कमं जानन्प्रात- वह अपनी पलीके उस कार्यको किं इसने उदङ्‌ वचा रखे है, जानता था,जतः भातःसमय-उषःकार्मे शय्या अथवा

English

Rising the next morning, Ushasti said to her: 'Alas, if we could only get some food, we might gain a little wealth. The king here is going to offer a sacrifice, he should choose me for all the priestly offices.'

अध्याय १०

श्लोक 1.10.7

तं जायोवाच हन्त पत इम एव कुल्माषा इति तान्खादित्वामुं यज्ञं विततमेयाय

taM jAyovAcha hanta pata ima eva kulmAShA iti tAnkhAditvAmuM yaj~naM vitatameyAya

हिन्दी अर्थ

अपनी पलीके सुनते इए कहा-- '्यदि भूखसे विन्न होते इए हमें थोडा-सा अन्न मिरु नाता-यहां तं जायोवाच हन्त पत इम एव करस्माषा इति उससे उसकी पलीने कहा -्वामिन्‌ आपके दिये हुए व उदद ही ये मोद है; इन्दे रीनिये ॥ उषत्ि उन्दं लाकर ऋलिनो- द्वारा विस्तारपूर्वक कयि जानेवाके उस यज्ञम गया

English

His wife said to him: 'Look, here are those beans of yours.' Having eaten them, he went to the sacrifice which was being performed.

अध्याय १०

श्लोक 1.10.8

तत्रोद्गातॄनास्तावे स्तोष्यमाणानुपोपविवेश स ह प्रस्तोतारमुवाच

tatrodgAtR^InAstAve stoShyamANAnupopavivesha sa ha prastotAramuvAcha

हिन्दी अर्थ

क्योंकि यजनरूप क्रियाका फल उस राजाको दी प्राप्त होनेवाडा या ॥ एवुक्तवन्तं जायोषाच-- इस प्रकार कहते हुए उष हन्त गृहाण है पत इम एवं ये उसकी पलीने कहा--हैस्वाि्‌। राजयन्ञमें उषस्ति ओर ऋविजोका संवाद्‌ वहं जाकर वह आस्ताव ८ स्तुति ) के स्थानम स्तुतिकरते हृए । उद्गाताओंके समीप बैठ गया ओर उसने प्रस्तोतासे कदा- तत्र च गत्वोदधातूलु दराठपुरु- ओर बहो जाकर वह उद्गाता । माणालुपोपविवेश समीप उपवि- ह, उसे आस्ताव कहते है, उस्े । (हिस 1 । स्तुति करते हुए उद्गाताओकि समीप

English

He went and sat down on the orchestra near the Udgâtris, who were going to sing their hymns of praise. And he said to the Prastotri (the leader):

अध्याय १०

श्लोक 1.10.9

प्रस्तोतर्या देवता प्रस्तावमन्वायत्ता तां चेदविद्वान्प्रस्तोष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति

prastotaryA devatA prastAvamanvAyattA tAM chedavidvAnprastoShyasi mUrdhA te vipatiShyatIti

हिन्दी अर्थ

भस्तोतः ! जो देवता परस्ताव-भक्तिमे उसे विना जाने प्रस्तवन करेगा तो तेरा मस्तक गिर १५६ सीकरणाय । या देवता प्रस्तावं दसी भकार उसने उदूगातासे भी कहा- ह उद्गातः नो देवत उद्गीथे अनुगत है यदि तू उसे बिना जाने उदृगान करेगा तोते । इसी प्रकार प्रतिहतसि भी कहा--6 भव्हितः ! जो देवता प्रतिहारमे अनुगत यदित उसे बिना जाने प्रति. हरण्‌ करेगा तो तेरा मस्तक गिर जायगा ॥ तब वे प्रस्तोता आदि भपने-

English

'Prastotri, if you, without knowing the deity which belongs to the prastâva (the hymns &c. of the Prastotri), are going to sing it, your head will fall off.'

अध्याय १०

श्लोक 1.10.10

एवमेवोद्गातारमुवाचोद्गातर्या देवतोद्गीथमन्वायत्ता तां चेदविद्वानुद्गास्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति

evamevodgAtAramuvAchodgAtaryA devatodgIthamanvAyattA tAM chedavidvAnudgAsyasi mUrdhA te vipatiShyatIti

हिन्दी अर्थ

अथ हैनं यजमान उवाच भगवन्तं वा अहं विवि- तष उससे यजमाने कहा--“म आप पूज्य-चरणको जानना चाहता ह इसपर उसने कहा--भ चक्रका त्र उपस्ति ह अथानन्तरं = यज- तदनन्तर उस उषस्तिसे यजमान राजाने कहा भगवानूको-- रसा कदे जानेपर उसने कहा--

English

In the same manner he addressed the Udgâtri: 'Udgâtri, if you, without knowing the deity which belongs to the udgîtha (the hymns of the Udgâtri), are going to sing it, your head will fall off.'

अध्याय १०

श्लोक 1.10.11

एवमेव प्रतिहर्तारमुवाच प्रतिहर्तर्या देवता प्रतिहारमन्वायत्ता तां चेदविद्वान्प्रतिहरिष्यसि मूर्धा ते विपतिष्यतीति ते ह समारतास्तूष्णीमासांचक्रिरे

evameva pratihartAramuvAcha pratihartaryA devatA pratihAramanvAyattA tAM chedavidvAnpratihariShyasi mUrdhA te vipatiShyatIti te ha samAratAstUShNImAsAMchakrire

हिन्दी अर्थ

श्रीमानूके न मिटनेसे ही मने दूसरे लिर्जोका वरण किया था मेवमहं भगवन्तं बहुयुणमश्रौषं ही है, मने श्रीमान्को बहुत गुण- स्वैश्च ऋलिकरमभिरासज्यैः वान्‌ घना है । भने सम्पूणं छलि- पर्यैषिषं पर्येषणं कृतवानस्मि । । क्कमके स्थि जप सोल मेरे समस्त ऋत्विक्कमेकि रि श्रीमान्‌ ही रह येसा सुनकर उपस्तिने “दीक है' पेसा का- ओर बोला- “अच्छा तो मेरे द्वार भस्नतासे आज्ञा वि हुए ये ही छोग स्तुति करं; ओर तुम जितना

English

In the same manner he addressed the Pratihartri: 'Pratihartri, if you, without knowing the deity which belongs to the pratihâra (the hymns of the Pratihartri), are going to sing it, your head will fall off.' They stopped, and sat down in silence.

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Chandogya Upanishad — Chapter 10
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
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