Chandogya Upanishad· Chāndogyopaniṣad
34
अध्याय 34 / 154

Adhyāya 34

4 श्लोकWhatsApp

पूर्ण अध्याय पाठ4 श्लोक

अध्याय ३४

श्लोक 2.21.1

॥ त्रयी विद्या हिंकारस्त्रय इमे लोकाः स प्रस्तावोऽग्निर्वायुरादित्यः स उद्गीथो नक्षत्राणि वयाँसि मरीचयः स प्रतिहारः सर्पा गन्धर्वाः पितरस्तन्निधनमेतत्साम सर्वस्मिन्प्रोतम्

|| trayI vidyA hiMkArastraya ime lokAH sa prastAvo.agnirvAyurAdityaH sa udgItho nakShatrANi vayA{\m+}si marIchayaH sa pratihAraH sarpA gandharvAH pitarastannidhanametatsAma sarvasminprotam

हिन्दी अर्थ

क्योंकि ये स्वरादि इन्द्ादिूप है, बलयुक्तं बोले जाने चाहिये । तथा उस्र समय भे इन्द्रम बल्का ५. वर्णोके स्पृष्ट, ईषल््ष्ट, इसमे स्वर ओर ऊर्मोका विड़त्‌, स्पर्शोका स्प हृस्व अवणंका संहृत भ्रयलन रोता ई । घर्मके तीन स्कन्ध (आघारस्तम्भ) ह यज्ञ अध्ययन ओर दन-- ह पसा स्कन्प है । तप ही दूसरा न्प है । भाचायंकुलमे रहनेवाली हमचारी जो आचारथकुल्मे अपने शरीरको अयन्त क्षीण कर देता हे

English

The hiṅkâra is the threefold knowledge, the prastâva these three worlds, the udgîtha Agni (fire), Vâyu (air), and Âditya (sun), the pratihâra the stars, the birds, and the rays, the nidhana the serpents, Gandharvas, and fathers. That is the Sâman, as interwoven in everything.

अध्याय ३४

श्लोक 2.21.2

स य एवमेतत्साम सर्वस्मिन्प्रोतं वेद सर्वँ ह भवति

sa ya evametatsAma sarvasminprotaM veda sarva{\m+} ha bhavati

हिन्दी अर्थ

त्रयच्िसंख्याका धर्मस्य भागा इत्यर्थः । के ते ! निर्व्तकेन गृहस्थेन निर्दिर्यते। त्रयीविद्या ओर व्याहतिरयोकी उत्यत्ति € प्रा कर केता है उसका निरूपण रूपणाथेमाद-- करनेके स्यि श्रुति कहती है-- प्रनापतिने रोककि उद्‌ स्यसे ध्यानरूप तप किया । उन अभितप्त लोकसे त्रयी विद्याकी उतयत्ि हुहै तथा उस अभितप्त त्रयी विदयासे “मूः,

English

He who thus knows this Sâman, as interwoven in everything, he becomes everything.

अध्याय ३४

श्लोक 2.21.3

तदेष श्लोको यानि पञ्चधा त्रीणी त्रीणि तेभ्यो न ज्यायः परमन्यदस्ति

tadeSha shloko yAni pa~nchadhA trINI trINi tebhyo na jyAyaH paramanyadasti

हिन्दी अर्थ

प्रनापतिरविराट्‌ कड्यपो वा प्रनापति अरथत्‌ विराट्‌ या करयप- रोकानुदिर्य तेषु सारनिध्रक्- जीने ओेकेकि उदेशयसे-उनमेसे सार याभ्यतपदभितापं कृतबान्ध्यानं महणकरनेकी इच्छासे अभिताप क्या तान्थभ्यतपत्तेभ्योऽभितसेभ्य ॐकारः संप्राखवत्त- यथा शङ्कुना सर्वाणि पर्णानि संतृण्णान्येवमोङ्कारेण- सर्वा वाक्संतृण्णोङ्कार प्वेद्‌ समोका एवेद - फ प्रनापतिने उन अक्षरोका जालोचन किया । उन आरोचित अक्षरोसे ओङ्कार उलत्न हुभा । निस प्रकार शङ्कं ( नसो › दवार सम्पूणं पते व्याप्त रहते हैँ उसी भकार ओङ्ारसे सम्पूणं वाक्‌ व्याप्त है ।

English

And thus it is said in the following verse: There are the fivefold three (the three kinds of sacrificial knowledge, the three worlds &c. in their fivefold form, i. e. as identified with the hiṅkâra, the prastâva, &c.), and the other forms of the Sâman. Greater than these there is nothing else besides.'

अध्याय ३४

श्लोक 2.21.4

यस्तद्वेद स वेद सर्वँ सर्वा दिशो बलिमस्मै हरन्ति सर्वमस्मीत्युपासित तद्व्रतं तद्व्रतम्

yastadveda sa veda sarva{\m+} sarvA disho balimasmai haranti sarvamasmItyupAsita tadvrataM tadvratam

हिन्दी अर्थ

ऽभिततेभ्य उश्कारः संप्रास्चवत्त- द्तरह्म॒कीदुशम्‌ १ इत्याह-- जातानि संत्रण्णानि विद्धानि । वह भंकारकी स्तुतिके स्यि ६।२॥ सामोपासनप्रसङ्धेन कमंगुण- सामोपसनाके प्रसङ्गसे कम॑का गुणमूत .(अङ्ग) हो जानेके कारण अब आओङ्कारको उपासनाकाण्डसे

English

He who knows this, knows everything. All regions offer him gifts. His rule is, 'Let him meditate (on the Sâman), knowing that he is. everything, yea, that he is everything .'

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Chandogya Upanishad — Chapter 34
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

Digitised text taken from the archive linked below. It has not been collated against a printed edition by this site.

पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

Numbering follows the imported source and may differ from other editions.