अध्याय ६५
श्लोक 4.9.1
॥ प्राप हाचर्यकुलं तमाचर्योऽभ्युवाद सत्यकाम३ इति भगव इति ह प्रतिशुश्राव
|| prApa hAcharyakulaM tamAcharyo.abhyuvAda satyakAma3 iti bhagava iti ha pratishushrAva
हिन्दी अर्थ
प्रनापतिर्छोकानभ्यतपन्लोका- पजापतिने शोकोको अर्थ् तद्रेषे ब्रह्मत्वक्म॑णि चाथान्य- ग्रहण करने की इच्छसे ध्यान फिर उसने इन तीन देवताओंको रक्ष्य करके तप क्रिया । उन तप क्रिये नाते हुए देवता्भसि उसने रस निकाठे । अग्निस ऋक्, वायुसे थजुः ओर भादिव्यसे साम ग्रहण क्यि पुनरप्येवमेवारन्याद्याः स किरि भी उसी प्रकार उसने एतास्तिस्रो देवता उदिश्याम्य- अग्नि जादि तीन देवताओंको रक्षय तपत् । ततोऽपि सारं रसं त्रयी- बनाकर तप क्रिया । उनसे भी त्रयी-
English
Thus he reached the house of his teacher. The teacher said to him: 'Satyakâma.' He replied: 'Sir.'