Chandogya Upanishad· Chāndogyopaniṣad
71
अध्याय 71 / 154

Adhyāya 71

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पूर्ण अध्याय पाठ5 श्लोक

अध्याय ७१

श्लोक 4.15.1

॥ य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यत एष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्मेति तद्यद्यप्यस्मिन्सर्पिर्वोदकं वा सिञ्चति वर्त्मनी एव गच्छति

|| ya eSho.akShiNi puruSho dR^ishyata eSha Atmeti hovAchaitadamR^itamabhayametadbrahmeti tadyadyapyasminsarpirvodakaM vA si~nchati vartmanI eva gachChati

हिन्दी अर्थ

अथ हैनं वागुवाच यदहं वसिष्ठोऽस्मि खं तद्वसिष्ठोऽसी्यथ हैनं चक्षुरुवाच यदहं पतिष्टास्मि फिर उससे वाक्‌ इन्द्रिये कहा--भे जो वसिष्ठ दसो तुष्टी वतिष्ठ हो ।' तदनन्तर उससे चक्चुने कदा- भे जो प्रतिष्ठा हसो

English

He said: 'The person that is seen in the eye, that is the Self. This is the immortal, the fearless, this is Brahman . Even though they drop melted butter or water on him, it runs away on both sides .

अध्याय ७१

श्लोक 4.15.2

एतँ संयद्वाम इत्याचक्षत एतँ हि सर्वाणि वामान्यभिसंयन्ति सर्वाण्येनं वामान्यभिसंयन्ति य एवं वेद

eta{\m+} saMyadvAma ityAchakShata eta{\m+} hi sarvANi vAmAnyabhisaMyanti sarvANyenaM vAmAnyabhisaMyanti ya evaM veda

हिन्दी अर्थ

फिर उससे श्रोत्रने कहाँ नो सम्पद्‌ ह सो तुम्ही सम्पद्‌ हो । तयश्चात्‌ उससे मन बोल-- चै जो आयतन अथ हैनं वागादयः प्राणस्य ; तदनन्तर वैरयङोग निस प्रकार ठस्य का्येणापाद्यन्त आहु राजक 8 रिमिव हरन्तो राज चिर , । परार वागादि इन्द्रानि अपने करय ोकमे समस्त इन्द्ियोको न वाक्‌ , न चु, न श्रोत्र जीर न मन ही कहते है; परंतु श्राणः सा कहते है, क्योंकि ये सब प्राण

English

'They call him Samyadvâma, for all blessings (vâma) go towards him (samyanti). All blessings go towards him who knows this.

अध्याय ७१

श्लोक 4.15.3

एष उ एव वामनीरेष हि सर्वाणि वामानि नयति सर्वाणि वामानि नयति य एवं वेद

eSha u eva vAmanIreSha hi sarvANi vAmAni nayati sarvANi vAmAni nayati ya evaM veda

हिन्दी अर्थ

न वै रोके वाचो न चक्लुषि रकम इन वाङ्‌ आदि समस्त न श्रोत्राणि न मनांसीति वागा- इन्दरियोको कोकिक अथवा शालज्ञ दीनि करणास्याचक्षते लोकिका । पुरुष न तो वाक्‌ कते हैँ जर न उसने कहा--भेरा अन्न क्या होगा ® तव वागादिने कहा- कुततो ओर पयसि लेकर सव॒ जीवोका यह जो कुछ अन्न ह सब तुण्हारा अन्न है , सो यह सव अन ( प्राण ) का अन्न है । अनः यह प्राणका

English

'He is also Vâmanî, for he leads (nayati) all blessings (vâma). He leads all blessings who knows this.

अध्याय ७१

श्लोक 4.15.4

एष उ एव भामनीरेष हि सर्वेषु लोकेषु भाति सर्वेषु लोकेषु भाति य एवं वेद

eSha u eva bhAmanIreSha hi sarveShu lokeShu bhAti sarveShu lokeShu bhAti ya evaM veda

हिन्दी अर्थ

स होवाच युख्यः प्राणः कवि उस सुरुष प्राणने कहा--भेरा लोकेऽनजातं प्रसिद्धमा श्वभ्यः प्रतिपत्तये कलन्पिताख्यायिका- परिदधति छम्भुको ह वासो भवस्यनस्नो ह भवति उसने कहा-- मेरा वशर क्या होगा ¢ तब वागादि बोटे-- "जर । इसीसे भोजन करनेवारे पुरुष भोजनके पूवं जीर पश्चात्‌ इसका जे आच्छादन कसते है । देसा करनेसे वह वख प्राप्त करनेवाला ओर

English

'He is also Bhâmanî, for he shines (bhâti) in all worlds. He who knows this, shines in all worlds.

अध्याय ७१

श्लोक 4.15.5

अथ यदु चैवास्मिञ्छव्यं कुर्वन्ति यदि च नार्चिषमेवाभिसंभवन्त्यर्चिषोऽहरह्न आपूर्यमाणपक्षमापूर्यमाणपक्षाद्यान्षडुदङ्ङेति मासाँस्तान्मासेभ्यः संवत्सरँ संवत्सरादादित्यमादित्याच्चन्द्रमसं चन्द्रमसो विद्युतं तत् पुरुषोऽमानवः स एनान्ब्रह्म गमयत्येष देवपथो ब्रह्मपथ एतेन प्रतिपद्यमाना इमं मानवमावर्तं नावर्तन्ते नावर्तन्ते

atha yadu chaivAsmi~nChavyaM kurvanti yadi cha nArchiShamevAbhisaMbhavantyarchiSho.aharahna ApUryamANapakShamApUryamANapakShAdyAnShaDuda~N~Neti mAsA{\m+}stAnmAsebhyaH saMvatsara{\m+} saMvatsarAdAdityamAdityAchchandramasaM chandramaso vidyutaM tat puruSho.amAnavaH sa enAnbrahma gamayatyeSha devapatho brahmapatha etena pratipadyamAnA imaM mAnavamAvartaM nAvartante nAvartante

हिन्दी अर्थ

स होवाच पुनः प्राणः, पूर्व उ प्राणने पिरि कदा--यह षदेव कल्पना, कि मे वासो कपना भी पदरेदीके समान है-- भविष्यति इति; आप इति सेरा वस कया होगा ¢ इसपर उस इस ८ प्राणदशन ) को सत्यकाम जागारने वैयाघ्रपद्य गो श्रतिके प्रति निरूपित करके कहा-“यदि इसे शुष्क स्थाणुके प्रति कटे

English

'Now (if one who knows this, dies), whether people perform obsequies for him or no, he goes to light (arkis) , from light to day, from day to the light half of the moon, from the light half of the moon to the six months during which the sun goes to the north, from the months to the year, from the year to the sun, from the sun to the moon, from the moon to the lightning. There is a person not human,

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/chhandogya.itx · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Chandogya Upanishad — Chapter 71
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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