अध्याय ७२
श्लोक 4.16.1
॥ एष ह वै यज्ञो योऽयं पवते एष ह यन्निदँ सर्वं पुनाति यदेष यन्निदँ सर्वं पुनाति तस्मादेष एव यज्ञस्तस्य मनश्च वाक्च वर्तनी
|| eSha ha vai yaj~no yo.ayaM pavate eSha ha yannida{\m+} sarvaM punAti yadeSha yannida{\m+} sarvaM punAti tasmAdeSha eva yaj~nastasya manashcha vAkcha vartanI
हिन्दी अर्थ
तद्ैतखराणद्वनं सत्यकामो व श जावालो गोश्रुतये नाम्ना वेया- न्दम पुत्रको वेयाघ्रप्य घरपद्याय व्याघरपदोऽपत्यं वेया- कहते है, उस ॒गोश्रुति नामवाटेसे यथोक्तप्राणदर्नविद इदं उपर्युक्त प्राणद्ेनके ज्ञातके सिय इस मन्थनामक कर्मका आरम्भ मन्थाख्यं कारभ्पते--- किया नता है-- खव यदि वह महछको प्राप्त होना चाहे तो उसे अमावास्याको दीक्षित होकर पूर्णिमाकी रात्रिको सर्वौषधके दधि नर मधुसम्बन्धी मन्थका मन्थन कर्" ज्येष्ठाय प्रेष्ठाय स्वाहा" पेसा कहते हुए अग्ने घृतका
English
Verily, he who purifies (Vâyu) is the sacrifice, for he (the air) moving along purifies everything. Because moving along he purifies everything, therefore he is the sacrifice. Of that sacrifice there are two ways, by mind and by speech.