अध्याय २४२
श्लोक 1
इति श्रीगारुडे महापुराणे उत्तरखण्डे द्वितीयांशे प्रतका(ख)ण्डे श्रीकृष्णगरुडसंवादे और्ध्वदेहिकविधिकर्मविपाकयोर्वर्णनं नाम द्वितीयो ऽध्यायः श्रीगरुडमहापुराणम्- ३ सूत उवाच ।एवमुत्साहितः पक्षी स्वरूपं निरयस्य तु ।पप्रच्छनरकाण्येवं श्रुत्वा चोत्कूलितान्तरः
iti śrīgāruḍe mahāpurāṇe uttarakhaṇḍe dvitīyāṃśe pratakā(kha)ṇḍe śrīkṛṣṇagaruḍasaṃvāde aurdhvadehikavidhikarmavipākayorvarṇanaṃ nāma dvitīyo 'dhyāyaḥ śrīgaruḍamahāpurāṇam- 3 sūta uvāca / evamutsāhitaḥ pakṣī svarūpaṃ nirayasya tu / papracchanarakāṇyevaṃ śrutvā cotkūlitāntaraḥ
हिन्दी अर्थ
नरकलोककी प्राप्ति होती है। प्राप्त करनेमें जो प्राणी सफल हो जाते हैं, सबसे ऊपर भयंकर गर्मीसे संतप्त रौरव वे सुन्दर-सुन्दर गीत गाते, वाद्य बजाते और नामक नरक है। उसके नीचे अत्यन्त दुःखदायी नृत्यादि करते हुए प्रसन्नचित्त गन्धर्वोके साथ, महारौरव है। उस नरकसे नीचे शीतल और उस अच्छे-से-अच्छे हार, नूपुर आदि नाना प्रकारके
English
Thus encouraged, Ganida asked about the descrip¬ tion of Hells, being curious to know about tbeir nature and function.