अध्याय २९३
श्लोक 1
इति श्रीगारुडे महापुराणे उत्तरखण्डे कृष्ण गरुडसंवादे तृतीयांशे ब्रह्मकाण्डे गुणवैषम्यभेदब्रह्मदेहस्वरूपगुणसाम्यनिरूपणं नाम चतुर्थो ऽध्यायः श्रीगरुडमहापुराणम्- ५ एतादृशे महत्तत्त्वे लक्ष्म्या सह हरिः स्वयम् ।प्रविवेश महाभाग क्षोभयामास वै हरिः
iti śrīgāruḍe mahāpurāṇe uttarakhaṇḍe kṛṣṇa garuḍasaṃvāde tṛtīyāṃśe brahmakāṇḍe guṇavaiṣamyabhedabrahmadehasvarūpaguṇasāmyanirūpaṇaṃ nāma caturtho 'dhyāyaḥ śrīgaruḍamahāpurāṇam- 5 etādṛśe mahattattve lakṣmyā saha hariḥ svayam / praviveśa mahābhāga kṣobhayāmāsa vai hariḥ
हिन्दी अर्थ
रूपमें भूमिपर गिरकर अपने स्वामी नारायणको निरन्तर स्मरण रखना ही प्राणीका वास्तविक कार्य प्रणाम किया। पुनः भद्रा कहने लगी। है तात! है। निश्चित ही यह मनुष्य-जन्म अत्यन्त दुर्लभ है, भगवान् विष्णुको नित्य-निरन्तर प्रणाम करना किंतु दुर्लभ होनेपर भी वैसे ही नश्वर है, जैसे जलमें चाहिए। जिस प्रकार वन्दना करनेसे वे देव प्रसन्न स्थित बुलबुला होता है। है तात! इस नश्वर शरीरका
English
In the mahat principle, as described above, lord Visnu entered together with Laksnil and activated the same.