अध्याय ३७
श्लोक 1
इति श्रीगारुडे महापुराणे पूर्वखण्डे प्रथमांशाख्ये आचारकाण्डे संध्याविधिर्नाम षट्त्रिंशो ऽध्यायः श्रीगरुडमहापुराणम्- ३७ हरिरुवाच ।गायत्त्री परमा देवी भुक्तिमुक्तिप्रदा च ताम् ।यो जपेत्तस्य पापानिविनश्यन्ति महान्त्यपि
iti śrīgāruḍe mahāpurāṇe pūrvakhaṇḍe prathamāṃśākhye ācārakāṇḍe saṃdhyāvidhirnāma ṣaṭtriṃśo 'dhyāyaḥ śrīgaruḍamahāpurāṇam- 37 hariruvāca / gāyattrī paramā devī bhuktimuktipradā ca tām / yo japettasya pāpānivinaśyanti mahāntyapi
हिन्दी अर्थ
सर्वप्रथम अपनी वैदिक शाखामें कहे गये मण्डपके मध्यभागमें चार हाथ परिमाणकी एक विधानके अनुसार या प्रणव-मन्त्र (३कार)-का वेदीका निर्माण कराये। उस वेदीके ऊपरी भागमें उच्चारण करके पाँच या उससे अधिक ऋत्विजोंके नदियोंके संगम-स्थलके किनारेसे लायी गयी बालुका साथ मध्य स्थानमें स्थित आचार्यका वरण करे । बिछाये। प्रधान कुण्डका निर्माण करवाकर उसके
English
The sun shall be meditated upon this. Listen to the M&lamantra:Orh Hrdm Hrirh Sah obeisance unto the sun.