Harivamsha Purana· Harivaṁśa Purāṇa
23
अध्याय 23 / 119

Adhyaya 23

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पूर्ण अध्याय पाठ112 श्लोक

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अध्याय २३

श्लोक 1

मुच्यते पातकेभ्यश् च अपुत्री न भवेत् कदा ।पूरोर् वंशम् अहं ब्रह्मञ् श्रोतुम् इच्छामि तत्त्वतः द्रुह्योश्चानोर् यदोश् चैव तुर्वसोश् च द्विजोत्तम विस्तरेणानुपूर्व्या च तद् भवान् वक्तुम् अर्हति

mucyate pātakebhyaś ca aputrī na bhavet kadā | pūror vaṃśam ahaṃ brahmañ śrotum icchāmi tattvataḥ druhyoścānor yadoś caiva turvasoś ca dvijottama vistareṇānupūrvyā ca tad bhavān vaktum arhati

हिन्दी अर्थ

प्रभावसे वरुण और चन्द्रमा-दोनोंकी मायाएँ अदृश्य हो गयीं। रणभूमिमें देवताओंपर प्रस्तर और लोहेके घन बरसने लगे॥ २६॥ जैसे पर्वतोंके कारण वहाँकी भूमिपर चलना कठिन हो जाता है, उसी प्रकार वहाँ गिरे हुए शिलाखण्डोंके समूहसे विषम और वृक्ष एवं पर्वतोंके बिछ जानेसे संकीर्ण हुई उस रणभूमिमें चलना-फिरना दूभर हो गया था॥ २७॥ उस युद्धमें ऐसा कोई देवता नहीं दिखायी देता था, जिसके शरीरपर पत्थरोंसे चोट न आयी हो, जिसपर शिलाओंकी मार न पड़ी हो तथा जो सब ओर गिरे हुए वृक्षसमूहोंसे अवरुद्ध न हो गया हो॥ २८॥ उस समय भगवान् गदाधरको छोड़कर शेष थी। सबके हाथसे धनुष नीचे गिर गये थे और आयुधोंके टूट जानेसे सबके मुखपर मलिनता छा गयी थी

English

¹⁰⁶ A minute division of time, the sixtieth part of the twinkling of

अध्याय २३

श्लोक 2

वृष्णिवंशप्रसङ्गेन स्वं वंशं पूर्वम् एव हि शृणु पूरोर् महाराज वंशम् अग्रे महात्मनः विस्तरेणानुपूर्व्या च यत्र जातो ऽसि पार्थिव

vṛṣṇivaṃśaprasaṅgena svaṃ vaṃśaṃ pūrvam eva hi śṛṇu pūror mahārāja vaṃśam agre mahātmanaḥ vistareṇānupūrvyā ca yatra jāto 'si pārthiva

हिन्दी अर्थ

अवश्य ही युद्धमें विराजमान श्रीमान् भगवान् विष्णु उस समय भी कम्पित नहीं हुए और सहनशील होनेके कारण उन जगत्पति भगवान् गदाधरको क्रोध भी नहीं आया॥ ३० ॥ श्याम मेघकी-सी कान्तिवाले और समयको पहचाननेवाले भगवान् जनार्दन युद्धमें समयकी बाट देखने लगे। वे देवता और असुरोंकी मुठभेड़ देखना चाहते थे॥३१॥ उधर मयदानवकी रची हुई माया रणभूमिमें उत्तरोत्तर बढ़ रही थी। उसे शान्त करनेके लिये भगवानने अग्नि और वायुको आज्ञा दी (कि तुम दोनों इस मायाको नष्ट करो) चोदितौ विष्णुवाक्येन तां मायां व्यपकर्षताम्

English

¹⁰⁷ A measure of time the thirtieth part of a _Kala_ or eighteen twinklings of the eye.

अध्याय २३

श्लोक 3

हन्त ते वर्तयिष्यामि पूरोर् वंशम् अनुत्तमम् द्रुह्योश्चानोर् यदोश् चैव तुर्वसोश् च परंतप

hanta te vartayiṣyāmi pūror vaṃśam anuttamam druhyoścānor yadoś caiva turvasoś ca paraṃtapa

हिन्दी अर्थ

हैत्यसेनां ददहतुर्युगान्तेष्विव मूच्छितो चेरतुर्दानवानीके क्रीडन्तावनलानिलौ दानवेषु विनष्टेषु कृतकर्मण पावके निष्प्रयत्रेषु देत्येषु त्रेलोक्ये मुक्तबन्धने। सम्प्रहष्टपु देवेषु साधु साध्विति सर्वशः

English

¹⁰⁸ A division of time.

अध्याय २३

श्लोक 4

पूरोः प्रवीरः पुत्रो ऽभून् मनस्युस् तस्य चात्मजः राजा चाभयदो नाम मनस्योर् अभवत् सुतः

pūroḥ pravīraḥ putro 'bhūn manasyus tasya cātmajaḥ rājā cābhayado nāma manasyor abhavat sutaḥ

हिन्दी अर्थ

दिक्षु सर्वासु शुद्धासु प्रवृत्ते धर्मसंस्तरे अपावृत्ते चन्द्रपथे अयनस्थे दिवाकरे। प्रकृतिस्थेषु लोकेषु नृषु चारित्रबन्धुषु यज्ञभागिषु देवेषु स्वर्गार्थ दर्शयत्सु च लोकपालेषु सर्वेषु दिक्षु संयानवर्तिषु। भावे तपसि शुद्धानामभावे दुष्टकर्मिणाम्

English

¹⁰⁹ A division of time, the thirtieth part of the day and night or an hour of forty-eight minutes.

अध्याय २३

श्लोक 5

तथैवाभयदस्यासीत् सुधन्वा च महीपतिः सुधन्वनः सुबाहुस् तु रौद्राश्वस् तस्य चात्मजः

tathaivābhayadasyāsīt sudhanvā ca mahīpatiḥ sudhanvanaḥ subāhus tu raudrāśvas tasya cātmajaḥ

हिन्दी अर्थ

देवपक्षे प्रमुदिते देत्यपक्षे विषीदति। त्रिपादविग्रहे धर्मे अधर्मे पादविग्रहे स्वधर्मस्थेषु वर्णेषु लोकेउस्मिन्ना श्रमेषु च तब एक-दूसरेके सहयोगसे बढ़े हुए तथा प्रबुद्ध होकर ज्वालाओंका भार वहन करनेवाले वे दोनों देवता भगवान् विष्णुकी आज्ञासे प्रेरित होकर उस मायाको दूर करने लगे॥ ३३॥ प्रवृद्ध होकर महायुद्धमें बवंडरकी तरह वेगसे घूमते हुए पावक और पवनदेवने उस पार्वती मायाको भस्म कर डाला। अत: वह नष्ट हो गयी

English

¹¹⁰ A lunar day, one-thirtieth of a whole lunation.

अध्याय २३

श्लोक 6

संपातिस् तस्य चात्मजः ।संपातेस् तु रहस्याती ।रौद्राश्वस्य दशार्णेयुः कृकणेयुस् तथैव च दशाप्सरसि सूनवः ।ऋचेयुश् प्रथमस् तेषां ।कक्षेयुः स्थण्डिलेयुश् च संनतेयुस् तथैव च

saṃpātis tasya cātmajaḥ |saṃpātes tu rahasyātī | raudrāśvasya daśārṇeyuḥ kṛkaṇeyus tathaiva ca daśāpsarasi sūnavaḥ | ṛceyuś prathamas teṣāṃ | kakṣeyuḥ sthaṇḍileyuś ca saṃnateyus tathaiva ca

हिन्दी अर्थ

प्रलयकालकी भाँति वायुका संयोग पाकर प्रबल हुए अग्निदेवने और अग्रिका संयोग पाकर बढ़े हुए वायुदेवने दानवसेनाको भस्म करना आरम्भ किया॥ ३५॥ रणभूमिमें पहले तो वेगसे आँधी चली और फिर वायुसे प्रज्वलित होकर अग्नि वेगपूर्वक फैलने लगी। (इस प्रकार) अग्निदेव और पवनदेव दोनों दानवोंकी सेनामें क्रीड़ा करते हुए हो-होकर गिरने लगे और (वायुके वेगसे) उनकी राख उड़ने लगी। इस प्रकार अग्निका काम पूरा हुआ (इधर) वायुके प्रचण्ड वेगसे आहत हो विमान सब ओर टूट-टूटकर गिरने लगे। मायाका बन्धन नष्ट हो गया तथा भगवान् विष्णुकी स्तुति होने लगी॥ ३८ ॥ दानवोंके प्रयत्ञ निष्फल हो गये, त्रिलोकीका बन्धन जाता रहा

English

¹¹¹ Three castes, Brāhmanas, or the priestly caste, Kshatriyas, the military caste and Vaishyas the mercantile caste.

अध्याय २३

श्लोक 7

ऋचेयुश् च जलेयुश् च स्थलेयुश् च महाबलः षष्ठश् चैव रुचेयुश् च जलेयुश् चैवसप्तमः ।धर्मेयुश् च दृढेयुश् च वनेयुर् दशमः स्मृतः ।वननित्यो वनेयुश् च पुत्रिकाश् च दश स्त्रियः

ṛceyuś ca jaleyuś ca sthaleyuś ca mahābalaḥ ṣaṣṭhaś caiva ruceyuś ca jaleyuś caivasaptamaḥ | dharmeyuś ca dṛḍheyuś ca vaneyur daśamaḥ smṛtaḥ | vananityo vaneyuś ca putrikāś ca daśa striyaḥ

हिन्दी अर्थ

और देवता सब ओर अत्यन्त हर्षमें भरकर 'साधु-साधु ' कहने लगे॥ ३९॥ सहसनेत्रधारी इन्द्रकी विजय हुई और मय दानवकी पराजय। सम्पूर्ण दिशाएँ शुद्ध हो गयीं और सब ओर धर्मका विस्तार होने लगा॥ ४० ॥ चन्द्रमाका मार्ग प्रशस्त हो गया। सूर्य अपने मार्गमें स्थित हुए। तीनों लोक अपनी स्वाभाविक स्थितिमें स्थित हो गये और मनुष्य सदाचारको ही अपना बन्धु (सहायक) मानने लगे॥ ४१ ॥ मृत्युकी मर्यादा नियत हो गयी। अग्निहोत्रका कार्य ठीक ढंगसे चलने लगा। देवता यज्ञोंमें भाग पाने तथा स्वर्गका मार्ग दिखाने लगे॥ ४२॥ समस्त लोकपाल अपनी-अपनी दिशामें निर्भय होकर विचरने लगे। शुद्धात्मा पुरुष तपस्यामें प्रवृत्त हो अभ्युदयके भागी होने लगे तथा दुराचारी मनुष्योंका विनाश होने लगा॥ ४३ ॥ देवताओंका दल प्रसन्न रहने लगा। हैत्योंक समुदायपर विषाद छा गया। धर्मके तीन पैर जम गये और अधर्मका एक ही पैर शेष रह गया॥ ४४॥ जिसपर चलनेवाले पुरुषोंके

English

¹¹² Three regions, heaven, earth and the region underneath the earth.

अध्याय २३

श्लोक 8

दशैते ऽप्सरसः पुत्रा वनेयुश् चावमः स्मृतः ।घृताच्याम् इन्द्रियाणीव मुख्यस्य जगदात्मनः ।भद्रा शूद्रा च मद्रा च मलदा मलहा तथा खला बला च राजेन्द्र तलदा सुरथापि च तथा गोपबला च स्त्री रत्नकूटा च ता दश

daśaite 'psarasaḥ putrā vaneyuś cāvamaḥ smṛtaḥ | ghṛtācyām indriyāṇīva mukhyasya jagadātmanaḥ | bhadrā śūdrā ca madrā ca maladā malahā tathā khalā balā ca rājendra taladā surathāpi ca tathā gopabalā ca strī ratnakūṭā ca tā daśa

हिन्दी अर्थ

लिये मोक्षका महान् द्वार खुल जाता है, वह सत्पुरुषोंका मार्ग पुन: चालू हो गया। इस जगत्में चारों वर्णों और चारों आश्रमोंक लोग अपने-अपने धर्मका पालन करने लगे सभी नरेश प्रजापालनमें तत्पर रहकर विशेष गीयमानासु गाथासु देवसंस्तवनादिषु॥ ४६ शोभा पाने लगे। देवताओंकी स्तुतिसे युक्त गाथाओंका प्रशान्तकलुषे लोके शान्ते तपसि दारुणे। अग्निमारुतयोस्तस्मिन् वृत्ते संग्रामकर्मणि। तन्मया विमला लोकास्ताभ्यां जयकृतप्रिया:

English

¹¹³ The three Vedas are Rik, Yajush and Saman.

अध्याय २३

श्लोक 9

ऋषिर् जातो ऽत्रिवंशे च तासां भर्ता प्रभाकरः रुद्रायां जनयाम् आस सोमं पुत्रं यशस्विनम्

ṛṣir jāto 'trivaṃśe ca tāsāṃ bhartā prabhākaraḥ rudrāyāṃ janayām āsa somaṃ putraṃ yaśasvinam

हिन्दी अर्थ

पूर्वदेवभयं श्रुत्वा मारुताग्निकृतं महत्। कालनेमिरिति ख्यातो दानव: प्रत्यदृश्यत भास्कराकारमुकुटः शिक्लिताभरणाडुद: । मन्दराचलसंकाशो. महारजतसंबृतः धूप्रकेशो हरिच्छूमश्रुर्दष्टालोष्ठपुटानन: । त्रैलोक्यान्तरविस्तारो धारयन् विपुलं वपु: ईरयन् मुखनिशःश्रासैर्वृष्टिमन्तो बलाहकान्ू

English

¹¹⁴ Three fires are (1) _Dakshināgni_ or a kind of sacred fire that which is taken from the domestic or consecrated fire and is placed to the south (2) _Garhapatya_ or a perpetual domestic fire (3) _Ahavaniya_ _i.e._, a fire into which oblation is offered.

अध्याय २३

श्लोक 10

स्वर्भानुना हते सूर्ये पतमाने दिवो महीम् तमोभिभूते लोके च प्रभा येन प्रवर्तिता

svarbhānunā hate sūrye patamāne divo mahīm tamobhibhūte loke ca prabhā yena pravartitā

हिन्दी अर्थ

दिधक्षन्तमिवायान्तं सर्वान् देवगणान् मृथे संवर्तकाले श्वुधितं दूप्त॑ मृत्युमिवोत्थितम् सब ओर गान होने लगा॥४६॥ सब लोगोंका कलुष मृदुल तपके रूपमें परिणत हो गयी। अग्रि और वायु- देवका वह युद्धविषयक महान् पराक्रम जब पूर्ण हो गया, तब निर्मल (प्रसन्न) हुए जगत्में उन्हींकी प्रधानता हो गयी; क्‍योंकि उनकी विजयमने लोगोंका प्रिय कार्य किया

English

¹¹⁵ The three Kalas are the present, past and future.

अध्याय २३

श्लोक 11

स्वस्ति ते ऽस्त्व् इति चोक्तो वै पतमानो दिवाकरः वचनात् तस्य विप्रर्षेर् न पपात दिवो महीम्

svasti te 'stv iti cokto vai patamāno divākaraḥ vacanāt tasya viprarṣer na papāta divo mahīm

हिन्दी अर्थ

था॥ ४७॥ अग्नि और बायुने हैत्योंपर महान् भय उपस्थित कर दिया है--यह सुनकर 'कालनेमि' नामसे विख्यात दानव उनके सामने आया॥४८॥ उसके मस्तकपर सूर्यके समान तेजस्वी मुकुट शोभा दे रहा था। उसने पैर आदिमें खन-खन शब्द करनेवाले नूपुर आदि आभूषण तथा भुजाओंमें बाजूबन्द धारण कर रखे थे। बहुमूल्य चाँदीके कवचसे आवृत होनेके कारण वह मन्दराचल- सा प्रतीत हो रहा था॥ ४९॥ उसने अपनी सौ भुजाओंमें उतने ही आयुध धारण किये थे, इसलिये वह अत्यन्त भयंकर जान पड़ता था। उसके मुख भी सौ ही थे। सौ मस्तकोंसे युक्त वह तेजस्वी दानव जब खड़ा होता था, उस समय सौ शिखरोंसे सुशोभित पर्वतके समान जान पड़ता था॥ ५०॥ इतना ही नहीं, वह ग्रीष्म-ऋतुमें सूखे वृक्षोंसे भरे हुए विशाल बनके भीतर प्रज्वलित हुए दावानलके समान देदीप्यमान हो रहा था॥ ५१॥ उसके केश धूम्रवर्णके थे; किंतु मूँछें हरे रंगकी दिखायी देती

English

¹¹⁶ The three-fold actions are those partaking of the quality of goodness, darkness, and ignorance respectively.

अध्याय २३

श्लोक 12

अत्रिश्रेष्ठानि गोत्राणि यश् चकार महातपाः यज्ञेष्व् अत्रिधनं चैव सुरैर् यस्य प्रवर्तितम्

atriśreṣṭhāni gotrāṇi yaś cakāra mahātapāḥ yajñeṣv atridhanaṃ caiva surair yasya pravartitam

हिन्दी अर्थ

थीं। उसकी दाढ़ें ओठोंसे बाहर निकली हुई थीं, जिससे उसके मुखकी अद्भुत शोभा होती थी। उसने ऐसा विशाल शरीर धारण कर रखा था, जो तीनों लोकोंमें फैला हुआ- सा प्रतीत होता था॥ ५२ ॥ वह अपनी भुजाओंसे आकाशको तौल रहा था, पैरोंकी ठोकरोंसे कितने ही पर्वतोंको दूर फेंक देता था और मुखके नि:श्वासोंसे वर्षा करनेवाले बादलोंको उड़ा देता था॥ ५३ ॥ उसके नेत्र विशाल और लाल थे। वह तिरछी दृष्टिसे देखा करता था। मन्दर अर्थात् स्वर्गलोकके सर्वश्रेष्ठ देवता देवराज इन्द्रके समान तेजस्वी जान पड़ता था। उसे देखकर ऐसा लगता था, मानो वह युद्धमें सम्पूर्ण देवताओंको भस्म कर डालनेकी इच्छासे आ रहा हो॥ ५४॥ वह देवताओंको डाँट बताता और दसों दिशाओंको आच्छादित करता आ रहा था। ऐसा जान पड़ता था मानो प्रलयकालमें दर्पले भरा हुआ भूखा काल उठ खड़ा हुआ हो

English

¹¹⁷ The three-fold means of attaining salvation are, the destruction of self, the acquisition of wealth and hard study.

अध्याय २३

श्लोक 13

स तासु जनयाम् आस पुत्रिकासु सनामकान् दश पुत्रान् महात्मानस् तपस्य् उग्रे रतान् सदा

sa tāsu janayām āsa putrikāsu sanāmakān daśa putrān mahātmānas tapasy ugre ratān sadā

हिन्दी अर्थ

दानवान् देवनिहतानुत्तिष्ठध्वमिति ब्रुवन् त॑ कालनेमिं समरे द्विषतां कालसंनिभम्। वीक्षन्तिस्मसुरा: सर्वे भयविक्लवमानसा: त॑ सम वीक्षन्ति भूतानि क्रमन्तं कालनेमिनम्। त्रिविक्रम॑ं विक्रमन्तं नारायणमिवापरम् प्राक्रामदसुरो युद्धे त्रासबन् सर्वदेवता:

English

¹¹⁸ The three-fold qualities are namely, those of goodness, darkness and ignorance.

अध्याय २३

श्लोक 14

ते तु गोत्रकरा राजन्न् ऋषयो वेदपारगाः स्वस्त्यात्रेया इति ख्याताः किं त्व् अत्रिधनवर्जिताः

te tu gotrakarā rājann ṛṣayo vedapāragāḥ svastyātreyā iti khyātāḥ kiṃ tv atridhanavarjitāḥ

हिन्दी अर्थ

ऋलनेमिर्बभौ हैत्य: विष्णुनेव पुरंदर: अथ विव्यधिरे देवा: सर्वे शक्रपुरोगमा:। दृष्ठा कालमिवायान्तं कालनेमिं भयावहम् जिसकी हथेली बहुत सुन्दर थी, अँगुलियोंके पर्व पुष्ट थे, जो मालाकार आभूषण (वलय)-से सुशोभित था तथा जिसका कवच कुछ खिसक गया था, ऐसे ऊँचे उठाये हुए मोटे-ताजे दाहिने हाथके अग्रभागसे वह देवताओंकी मार खाकर गिरे हुए दानवोंको उठनेका संकेत करके कह रहा था, कि (वीरो।) उठकर खड़े हो जाओ॥ ५६-५७॥ शत्रुओंके लिये कालके समान भयंकर वह कालनेमि नामक

English

¹¹⁹ Four classes of priests.

अध्याय २३

श्लोक 15

कक्षेयुतनयास् त्व् आसंस् त्रय एव महारथाः सभानरश् चाक्षुषश् च परमेक्षुस् तथैव च

kakṣeyutanayās tv āsaṃs traya eva mahārathāḥ sabhānaraś cākṣuṣaś ca paramekṣus tathaiva ca

हिन्दी अर्थ

दानव जब समरभूमिमें आया, उस समय वहाँ खड़े हुए समस्त देवता भयभीत चित्तसे उसकी ओर देखने लगे॥ ५८ ॥ ऊँचे-ऊँचे पग उठाकर आक्रमण करते हुए उस कालनेमिको समस्त प्राणियोंने त्रिविक्रमरूपसे तीनों लोकोंको नापनेके लिये पैर बढ़ाते हुए दूसरे नारायणके समान देखा॥ ५९॥ सम्पूर्ण देवताओंको त्रास देते हुए उस असुरने जब युद्धमें अपना पहला कदम उठाकर रखा, उस समय हवाके झोंकेसे उसके वस्त्र 'फहराने लगे॥६०॥ रणभूमिमें विचरते हुए उस दानवराजको असुरराज मयने आगे बढ़कर हृदयसे लगा लिया। उस समय मयके साथ कालनेमि हैत्यकी वैसे ही शोभा हुई, जैसे भगवान् विष्णुसे देवराज इन्द्र सुशोभित होते हैं॥ ६१॥ कालके समान भयंकर कालनेमिको आते देख इन्द्र आदि सब देवता भयसे व्यथित हो उठे

English

¹²⁰ Four stages of life namely that of a religious student, that of a householder, that of the anchorite, and that of the beggar.

अध्याय २३

श्लोक 16

सभानरस्य पुत्रस् तु विद्वान् कालानलो नृपः कालानलस्य धर्मज्ञः सृञ्जयो नाम वै सुतः

sabhānarasya putras tu vidvān kālānalo nṛpaḥ kālānalasya dharmajñaḥ sṛñjayo nāma vai sutaḥ

हिन्दी अर्थ

इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि कालनेमिप्रक्रमणे षट्चत्वारिंशो5ध्याय: 75 प्रजार श्रीमयहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें कालनेमिका आक्रमणविषयक छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ कालनेमिका युद्ध और प्रभाव दानवांश्वापि पिप्रीषु;ः कालनेमिर्महासुरः। व्यवर्धत महातेजास्तपान्ते जलदो यथा

English

¹²¹ (In anatomy) the blood before it receives the red particles, the

अध्याय २३

श्लोक 17

सृञ्जयस्याभवत् पुत्रो वीरो राजा पुरंजयः जनमेजयो महाराज पुरंजयसुतो ऽभवत्

sṛñjayasyābhavat putro vīro rājā puraṃjayaḥ janamejayo mahārāja puraṃjayasuto 'bhavat

हिन्दी अर्थ

त्रैलोक्यान्तर्गतं तं तु दृष्ट्ा ते दानवेश्वरा:। वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय ! जैसे गरमीके अन्तमें वर्षाकाल आनेपर मेघ बढ़ता है, उसी प्रकार महातेजस्वी महान् असुर कालनेमि दानवोंको पुष्ट करनेकी इच्छासे बढ़ने लगा॥ १॥ उसे तीनों लोकोंमें फैला हुआ देखकर वे सभी दानवराज इस प्रकार सहसा उठ खड़े हुए मानो उन्हें उत्तम अमृत मिल गया हो। उस समय प्राप्पेवामृतमुत्तमम्॥ २ उनकी सारी थकावट दूर हो गयी थी

English

¹²² The meaning is; as the cloud increases by the help of smoke, light, water and air so the embryo is nourished by food, fire and water. The air mentioned here refers to the vital power. The soul enters in the shape of the vital power.

अध्याय २३

श्लोक 18

पुरंजयान् महाराज पुत्रो ऽभूज्जनमेजयः ।जनमेजयस्य राजर्षेर् महासालो ऽभवत् सुतः देवेषु स परिज्ञातः प्रतिष्ठितयशास् तथा

puraṃjayān mahārāja putro 'bhūjjanamejayaḥ | janamejayasya rājarṣer mahāsālo 'bhavat sutaḥ deveṣu sa parijñātaḥ pratiṣṭhitayaśās tathā

हिन्दी अर्थ

तारकामयसंग्रामे सततं जयकाड्क्षिण:। रेजुरायोधनगता दानवा युद्धकाड्सक्षिण: प्रेक्षतां चाभवत् प्रीतिर्दानवं कालनेमिनम्॥ दानवाः कृतिनो जग्मु: कालनेमिनमुत्तमम् कालकल्पैश्न मुसलै: क्षेपणीयैश्न मुद्रैः। युगैरयनत्रश्ष॒ निर्मुक्तिरर्गलैश्वाग्रताडितैः

English

Vaishampayana said:—O my child, the question that you have put regarding Hari, the holder of Sranga bow, is indeed very great. Listen, I shall still describe the glory of Vishnu as much as lies in my power(1). Fortunately for you that our mind is bent upon listening to Vishnu's prowess. Hear, I shall describe the celestial origin of the lord (2). The Brāhmanas, well read in the Vedas, describe him as having a thousand eyes, thousand faces, thousand feet, thousand heads, thousand hands, as eternal, as having thousand tongues, as effulgent, as wearing thousand crowns, as giving away thousands presents, as having thousand origins and thousand arms (3–4); as sacrifice, oblation, Havya,¹²³ Hotā,¹²⁴ the sacred vessels, the sacrificial altar, the initiation, charu,¹²⁵ Sruva (5); as Sruk, Soma, Shurpa,¹²⁶ Musala,¹²⁷ Prakshanam, Dakshināyanam,¹²⁸ Adveryu, Sāmaga Brāhmana, as Sadasya,¹²⁹ Sadanam Sadas¹³⁰ (6); as Yupa, Samid, Kusha, Darvi,¹³¹ Chamasa, Ulukhala, Prāgvangsham,¹³² sacrifice, sacrificial ground, priest and Chayana¹³³ (7); as the small and big chariots, as the mobile creation, as the penance, as the good fruit thereof, as Sthandila¹³⁴ and Kushā (8); as _Mantra_, as fire that carries sacrificial offering, as Bhāga,¹³⁵ Bhagavaha,¹³⁶ Agrebhuj,¹³⁷ Somabhuj,¹³⁸ Ghritarchi,¹³⁹ Udaniya¹⁴⁰ (9); and in the sacrifice as the eternal Lord. That intelligent Lord of gods, Vishnu, having the mystic mark of Srivātsa on his breast, incarnated himself in thousands of forms. And thousands of his incarnations shall take place in future, Brahmā has said this (10-11). O great king, I shall describe at length, as accosted by you, the sacred and celestial theme, why the Divine lord Vishnu, the king of gods and the slayer of his enemies, took his birth leaving the celestial region, in the race of Vasudeva. For encompassing the well-being of the gods and men and the prosperity of all the worlds, the Soul of all, for a great work of his own, went through various incarnations (12–14). I shall describe the sacred and celestial incarnations of the Lord fraught with many virtues that have been recorded in metres and great Srutis (15). Purifying yourself and controlling your speech, listen to them, O Janamejaya. This highly sacred Purāna is equal to the Vedas (16). Hear, I shall describe this celestial story of Vishnu. O Bharata, whenever virtue suffers deterioration the Lord, for establishing it, incarnates Himself (17). O great king, he had one form partaking of the quality of goodness. In this form He is constantly practising hard austerities in Heaven (18). His second form¹⁴¹ is possessed by yoga sleep for bringing about the destruction of creatures; and from this sleep originate persons of misconceived spiritual culture (19). Having slept for a thousand _yugas_ He again appears for work. And after the completion of a thousand _yugas_, the god of gods, the lord of the universe, Vishnu, the Grandfather Brahmā, the Regents of all the worlds, the moon, the sun, the fire, Brahma, Kapila, Paramesthi, the gods, the seven Rishis, the highly illustrious, three-eyed god Siva, the air, the oceans and the mountains exist in His form (20–22). The great Sanatkumar and the high-souled Manu, the father of creation (also exist in His form). That ancient Lord, effulgent like the fire, has created all the forms (23). After the destruction of all creatures mobile and immobile, after the destruction of the gods and demons, serpents and Rakshasas that highly powerful Purusha killed the two irrepressible Dānavas, Madhu and Kaitava in the midst of the ocean and conferred upon them the boon of final liberation (24-25).

अध्याय २३

श्लोक 19

महामना नाम सुतो महासालस्य धार्मिकः जज्ञे वीरः सुरगणैः पूजितः स महामनाः

mahāmanā nāma suto mahāsālasya dhārmikaḥ jajñe vīraḥ suragaṇaiḥ pūjitaḥ sa mahāmanāḥ

हिन्दी अर्थ

विकोशैश्वासिभिस्ती क्षण: शूलैश्व शितनिर्मलै: कालनेमिं पुरस्कृत्य तस्थु: संग्राममूर्धनि दीप्ता शीतोष्णतेजोभ्यां चन्द्रभास्करवर्चसा वे मय और तार आदि सभी दानव कालनेमिके आ जानेसे भय और ज्राससे रहित हो गये, अतः उस तारकामय संग्राममें निर्तर विजयकी अभिलाषा रखते हुए युद्धकी आकाडुक्षासे रणभूमिमें खड़े हो शोभा पाने

English

While in the days of yore the lotus-navelled Lord lay in the water of the ocean there sprang from His navel the gods and the Rishis (26). This is the Lotus incarnation of the Lord as recorded in the Vedas and Srutis (27). Next the Boar incarnation of the Lord is recorded in Srutis, where Vishnu, the foremost of the celestials, assumed the form of a boar and raised up the earth with her forests and mountains, with His tusks sunk in the all-spreading ocean. The (four) Vedas were his feet, the sacrificial altar was his tusk, the sacrifices were his teeth, the funeral pile was his mouth, the fire was his tongue, and the Darbhas were the hairs of his body. The great ascetic Brahmā was his head, the days and nights were the eyes of that eldest Purusha, the various divisions of the Vedas were the ornaments of his ears, the progenitors were his nose, the chanting of the Sama Veda was his great voice. He was identical with virtue and truth. Penance was his nostril; dreadful beasts were his nails and he had long arms. The air was his soul, the _mantra_ was his hip, the sanctified Soma juice was his blood, the sacrificial altars were his shoulders. Havi was his smell, Havy and Kavya were his energies, Nagvangsha was his body. He was effulgent and sanctified by various forms of initiation. Dakshinā or gift was his heart. He was ascetic and great and the recitation of the Vedic hymns was the ornament of his lips. The great heroes, who stand in the way of virtue, were his ornaments. The various metres were his motion. The sacred Upanishad was his seat. The image of his wife was his help and he was tall like the summit of the mount Meru. This thousand-headed Prime Deity re-established the earth (28–37). Thus in the days of yore for encompassing the well-being of creatures the Lord, assuming the shape of a sacrificial boar, raised up the earth from the water of the ocean (38). This is an account of the boar incarnation. Listen now to an account of His man-lion incarnation where assuming the form of a lion he killed Hiranyakashipu.

अध्याय २३

श्लोक 20

महामनास् तु पुत्रौ द्वौ जनयाम् आस भारत उशीनरं च धर्मज्ञं तितिक्षुं च महाबलम्

mahāmanās tu putrau dvau janayām āsa bhārata uśīnaraṃ ca dharmajñaṃ titikṣuṃ ca mahābalam

हिन्दी अर्थ

लगे॥ ३॥ उस समय अस्त्रोंका अभ्यास करते और व्यूहमें सब ओर दौड़ लगाते हुए उन हैत्योंको कालनेमि दानवके दर्शनसे बड़ी प्रसन्नता हुई॥४॥ वहाँ जो भी मयके मुख्य-मुख्य सेनापति उपस्थित थे, वे सभी भय छोड़कर हर्ष और उत्साहके साथ युद्धके लिये एवं बलिपुत्र अरिष्ट, किशोर, उष्ट तथा देवताके समान तेजस्वी एवं मुँखसे युद्ध करनेवाला महान् असुर स्वर्भानु-- ये सभी अस्त्रवेत्ता और तपस्यामें नियमपूर्वक स्थित कालनेमिके पास जा पहुँचे॥६--८॥ वे सब हर्षसे उत्फुल्ल हृदयवाले दानव हाथोंमें उत्तम आयुध धारण किये, कालनेमिको आगे रखकर उसके सेनापतित्वमें युद्ध करनेके लिये संग्रामके मुहानेपर डट गये। कितने

English

O king, in the days of yore in the golden age, the first of the Daityas born, Hiranyakesipu, an enemy of the gods, practised most excellent penances (40). Observing the vow of silence and steadfastly carrying it on he alone, placed in the midst of water, spent eleven thousand and five hundred years (41). O sinless one, thereupon Brahmā was pleased with his self-control, equanimity of mind, asceticism and observance of rules and the vow of celibacy (42). O great king then the lord of all, the divine self-sprung Brahmā, the foremost of all, having the knowledge of Brahman, himself, in his effulgent and sun like car drawn by swans, came to him encircled by all the Adityas, Vasus, Sādhyas, Maruds, gods, Rudras, Viswas, Yakshas, Rakshas, Kinnaras, rivers, oceans, stars, Muhurthas, creatures ranging in the sky, planets, celestial saints, old ascetic Siddhas, the seven Rishis, the great royal saints and Apsaras. He then said to the Daitya:—"O you of firm vows, you are a disciple of mine. I have been pleased with your asceticism. Pray for a boon; may you fare well and acquire your wished-for objects (43–48)."

अध्याय २३

श्लोक 21

उशीनरस्य पत्न्यस् तु पञ्च राजर्षिवंशजाः नृगा कृमी नवा दर्वा पञ्चमी च दृषद्वती

uśīnarasya patnyas tu pañca rājarṣivaṃśajāḥ nṛgā kṛmī navā darvā pañcamī ca dṛṣadvatī

हिन्दी अर्थ

ही दानव अपने चौड़े और पुष्ट कंधोंसे युक्त हाथोंसे ही आयुधोंका काम लेते थे तथा बहुतेरे हैत्य भारी गदा, चक्र, फरसा, पर्वतोंके समान शिलाओंकी बड़ी-बड़ी चट्टान, वज़ आदिके आघातसे टूटकर गिरे हुए शिलाखण्ड, करनेमें समर्थ और सैकड़ोंके प्राण लेनेवाली बड़ी भारी तोपें, कालके समान भयंकर मूसल, क्षेपणीय (गुलेल आदि), मुद्र, युग (जुआ), खुले हुए यन्त्र, जिसके सिरेको हथौड़ेसे पीटकर तेज किया गया हो ऐसी अर्गला (डंडेला), फैले हुए पाश, प्रास (भाला), जीभ लपलपाते हुए सर्प, तीत्रगतिसे लक्ष्यकी ओर बढ़नेवाले बाण, प्रहार करने योग्य वज्र, दीप्तिमान् तोमर, नंगी तीखी तलवार और तेज किये हुए चमकीले शूल आदि अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न हो युद्धेके लिये डट गये॥ ९--१४॥ जहाँ चमकते हुए श्रेष्ठ अस्त्र-शस्त्र विद्युत्की भाँति प्रकाशित हो रहे थे, वह दानवसेना वर्षकालमें छिपे हुए नक्षत्रवाले मेष और बिजलीसे युक्त आकाशके समान शोभा पा रही थी॥ १५॥ इधर

English

Hiranyakasipu said;—O grand-father, I pray for this boon, that the gods, Asuras, Gandharvas, Yakshas, Nāgas, Rakshasas, men and goblins may not by any means kill me and that the Rishis, when enraged, may not imprecate a curse on me, and that the weapons, mountains, trees, dry or wet articles or any other things may not bring about my destruction. Let him alone be my destroyer who will be able, with his servants and army, to kill me only with the strokes of his arms. I, myself, shall be the moon, the sun, the air, the fire, air, ether, the stars, the ten quarters, desire, anger, Varuna, Vāsava, Yama, the lord of riches and Yaksha, the king of Kimpurushas (49-54).

अध्याय २३

श्लोक 22

उशीनरस्य पुत्रास् तु पञ्च तासु कुलोद्वहाः तपसा चैव महता जाता वृद्धस्य चात्मजाः

uśīnarasya putrās tu pañca tāsu kulodvahāḥ tapasā caiva mahatā jātā vṛddhasya cātmajāḥ

हिन्दी अर्थ

चन्द्रमा और सूर्यकी प्रभासे उद्धासित तथा उनके शीतल और उष्ण तेजके द्वारा देदीप्यमान हुई वह इन्द्रपालित देवसेना भी अनृपम शोभासे सम्पन्न हो रही थी यमेन्द्रधनहैर्गुता वरुणेन च धीमता। सम्प्रदी्ताग्मिपतवना नारायणपरायणा सा समुद्रौद्सदृशी दिव्या देवमहाचमू:। रराजास्त्रवती भीमा यक्षगन्धर्वशालिनी तद् युद्धमभवद् घोरं देवदानवसंकुलम्। क्षमापराक्रममयं दर्पस्थ विनयस्थ च

English

Thus addressed by the king of Daityas, O emperor, the self-sprung Deity smilingly said;—"O my child, I confer upon you these most wonderful and celestial boons. Undoubtedly you will attain to all your desired-for objects (55–56)." Having said this the divine grand-father repaired, by the etherial region, to his habitation Vairaja resorted to by the Brāhmana saints. Hearing that the water-sprung deity, the foremost of the celestials, had conferred this celestial boon on Daitya-king Hiranyakasipu, the gods, headed by Indra, communicated it to the Creator. Hearing of this conferring of the boons the Devas, the Nāgas, the Gandharvas and the Munis appeared before the grand-father (57–56).

अध्याय २३

श्लोक 23

नृगायास् तु नृगः पुत्रः कृम्याः कृमिर् अजायत नवायास् तु नवः पुत्रो दर्वायाः सुव्रतो ऽभवत्

nṛgāyās tu nṛgaḥ putraḥ kṛmyāḥ kṛmir ajāyata navāyās tu navaḥ putro darvāyāḥ suvrato 'bhavat

हिन्दी अर्थ

ताभ्यां बलाभ्यां संहृष्टाश्षेरुस्ते देवदानवा:। वबनाभ्यां पर्वतीयाभ्यां पुष्पिताभ्यां यथा गजा: दुन्दुभीनां निनदतां हैत्यानां निर्दोधु: स्‍्वनान्ू वायुके समान वेगवती तथा सौम्य भावसे सम्पन्न पताकारूपमें धारण करती थी, मेघमय वस्त्रोंसे आच्छन्न थी तथा ग्रह और नक्षत्र मानो उसके शुभ्र हास थे। यम, इन्द्र, कुबेर और बुद्धिमान् वरुणके द्वारा उसकी रक्षा की जा रही थी। उसमें प्रकाशमान अग्नि और वायुदेव भी

English

The Gods said—"O lord, by this boon the Asura will oppress us. Be thou propitiated and concert a measure for his destruction" (60). Hearing those words beneficial unto all the lord Prajapati, the omniscient, self-sprung Deity, the invisible and immortal creator of Havy, Kavya and all other creatures said to the gods (61–62). "Forsooth he must attain to the fruits of his asceticism. After he enjoys them the lord Vishnu will kill him." Hearing these words from the lotus-sprung Deity all the gods, filled with delight, repaired to their respective celestial habitations (63–64). As soon as he obtained the boon the Daitya Hiranyakasipu, elated with the pride thereof, began oppressing all the creatures (65). He first of all carried his work of oppression on the great, truthful and self-controlled Munis of firm vows living in the hermitages (66). Having vanquished all the gods of the three worlds and having brought them all under subjection the Daitya Hiranyakasipu lived in the celestial region (67). As long as he, elated with pride, lived in the celestial region the gods could not partake of the sacrificial offerings and the Daityas were entitled thereto (68).

अध्याय २३

श्लोक 24

दृषद्वत्यास् तु संजज्ञे शिबिर् औशीनरो नृप शिबेस् तु शिबयस् तात यौधेयास् तु नृगस्य ह

dṛṣadvatyās tu saṃjajñe śibir auśīnaro nṛpa śibes tu śibayas tāta yaudheyās tu nṛgasya ha

हिन्दी अर्थ

विद्यमान थे। वह भगवान् नारायणके आश्रित थी। देखनेमें उमड़े हुए समुद्रकी अगाध जलराशिके समान जान पड़ती थी। विविध प्रकारके अस्त्रोंसे सम्पन्न होनेके कारण भयंकर प्रतीत होती थी तथा यक्ष और गन्धर्व उसकी शोभा बढ़ा रहे थे॥ १७--१९ ॥ जैसे प्रलयकालमें झुलोक और पृथ्वी--दोनों एक-दूसरेसे टकराते हैं, उसी प्रकार उन दोनों सेनाओंमें उस समय वहाँ गहरी भिड़न्त हुई॥ २०॥ देवताओं और दानवोंसे भरा हुआ वह युद्ध बड़ा भयंकर हो चला। एक ओर उदारतापूर्ण क्षमा थी तो दूसरी ओर क्रूरतापूर्ण पराक्रम। यह दर्प और विनयका युद्ध था॥ २१॥ उन दोनों सेनाओंसे रोषमें भरे हुए भयंकर देवता और असुर निकले (तथा युद्धके लिये आगे बढ़े); ठीक उसी तरह जैसे पूर्व और पश्चिमके समुद्रोंसे श्लुब्ध मेघ प्रकट हुए हों॥ २२॥ उन दोनों सेनाओंसे हर्ष और उत्साहमें भरे हुए देवता और दानव युद्धके लिये निकले, मानो फूलोंसे सुशोभित दो

English

Thereupon the Adityas, Viswas and Vasus sought refuge with the highly powerful Nārāyana Vishnu, the lord of protection, who is Brahman identical with the gods and sacrifices, who is the presiding god of the Brāhmanas, who is eternal, the present and past and future and who is omniscient and adored of all the worlds (69–70).

अध्याय २३

श्लोक 25

नवस्य नवराष्ट्रं तु कृमेस् तु कृमिला पुरी सुव्रतस्य तथाम्बष्ठा तितिक्षोस् तु प्रजाः शृणु

navasya navarāṣṭraṃ tu kṛmes tu kṛmilā purī suvratasya tathāmbaṣṭhā titikṣos tu prajāḥ śṛṇu

हिन्दी अर्थ

पर्वतीय बनोंसे बहुसंखयक हाथी निकल आये हों उस समय दोनों दलोंके सैनिक बारम्बार नगाड़े पीटने और शह्ढु बजाने लगे। वाद्योंका वह तुमुल नाद पृथ्वी, आकाश तथा सम्पूर्ण दिशाओंमें भर गया॥ २४॥ प्रत्यञ्ञा खींचनेसे जो शब्द होता था, धनुषोंकी जो टंकार-ध्वनि होती थी तथा बजती हुई दुन्दुभियोंका जो गम्भीर नाद होता था, उन सबने मिलकर हैत्योंके गर्जन-तर्जनकी आवाजको छिपा दिया॥२५॥ वे देवता और दानव एक-दूसरेपर टूट पड़े और अपने-अपने प्रतिद्वन्द्दीको धराशायी करने लगे। द्वन्द्ययुद्धकी इच्छा रखनेवाले अन्यान्य योद्धाओंने अपनी भुजाओंद्वारा शत्रुओंकी भुजाएँ तोड़ डालीं ॥ २६॥ देवतालोग युद्धमें भयंकर वज्र तथा अच्छे लोहेके बने हुए परिघका प्रयोग करने लगे और दानव

English

The Gods said:—O. king of gods, O foremost of the celestials, do thou save us from the fear of Hiranyakasipu. Thou art the Supreme Lord of us all and of Brahmā and others. Thou art our Great God and Great Preceptor. O thou having eyes like the full-blown lotuses, O thou the destroyer of enemies, do thou become our help for bringing about the destruction of the demons (71–72).

अध्याय २३

श्लोक 26

शिबिपुत्रान् निबोध मे ॥शिबेश् च पुत्राश् चत्वारो वीरा वै लोकविश्रुताः ।वृषदर्भः सुवीरश् च कैकेयो मद्रकस् तथा ॥ तेषां जनपदाः स्फीताः कैकेया मद्रकास् तथा ।वृषदर्भाः सुवीराश् च ।तितिक्षुर् अभवद् राजा पूर्वस्यां दिशि भारत उषद्रथो महाबाहुस् तस्य फेनः सुतो ऽभवत्

śibiputrān nibodha me ||śibeś ca putrāś catvāro vīrā vai lokaviśrutāḥ | vṛṣadarbhaḥ suvīraś ca kaikeyo madrakas tathā || teṣāṃ janapadāḥ sphītāḥ kaikeyā madrakās tathā | vṛṣadarbhāḥ suvīrāś ca | titikṣur abhavad rājā pūrvasyāṃ diśi bhārata uṣadratho mahābāhus tasya phenaḥ suto 'bhavat

हिन्दी अर्थ

उनके ऊपर तलवारें और भारी गदाएँ चलाने लगे परिपेतुर्भुशं केचिन््युब्जा: केचित् ससर्जिरे बभझ्ञिरे रथान् केचित् केचित् सम्पूदिता रथे:। सम्बाधमेके सम्प्राप्य न शेकुश्चलितुं रथा: देवदानवसंक्षुब्धं॑ संकुलं॑ युद्धमाबभौ

English

Vishnu said:—O ye immortals, do ye renounce your fear. I promise you safety. O gods, you will, in no time, acquire as before the celestial region. I will slay this king of Dānavas, elated with pride, who is unslayable even by the immortals (73–74).

अध्याय २३

श्लोक 27

फेनात् तु सुतपा जज्ञे जज्ञे सुतपसः सुतः बलिर् मानुषयोनौ तु स राजा काञ्चनेषुधिः

phenāt tu sutapā jajñe jajñe sutapasaḥ sutaḥ balir mānuṣayonau tu sa rājā kāñcaneṣudhiḥ

हिन्दी अर्थ

तद् दानवमहामेघं देवायुधतडित्प्रभम्। अन्योन्यबाणवर्ष तद् युद्ध दुर्दिनमावभौ एतस्मिन्नन्तरे क्रुद्ध/ कालनेमिर्महासुरः। व्यवर्द्धत समुद्रौधे: पूर्यमाण इवाम्बुदः गदाओंके आघातसे कितने ही योद्धाओंके अक्ग चूर-चूर हो गये, कितनोंके शरीर बाणोंकी चोट खाकर टुकड़े-टुकड़े हो गये, कितने ही गहरी चोटसे पछाड़ खाकर पृथ्वीपर गिर पड़े और कितने ही पीठ ऊपर समराड्गणमें रोषावेशसे भरे हुए उभयपक्षके सैनिक घोड़े जुते हुए रथों और शीघ्रगामी विमानोंद्रारा आगे बढ़कर एक-दूसरेसे भिड़ गये ॥ २९॥ रणभूमिमें कितने ही रथी और पैदल योद्धा शत्रुके सामने आते और कितने ही

English

Vaishampāyana said:—Having said this and left the company of the king of gods and others the Lord Hari assumed the form of a half-lion and a half-man. Having pressed his one palm against another Hari, in his man-lion form, repaired to the court of Hiranyakasipu (75–76). His colour was like that of clouds and his voice was like the muttering thereof. He also became effulgent and fleet like a cloud (77). He, with his own hand, killed the highly powerful and proud Daitya, gifted with the prowess of a tiger and protected by the mighty Daityas (78). This is the man-lion incarnation. Next is that of a dwarf. Assuming this form destructive of the Daityas in the days of yore the powerful Vishnu, with his three foot steps, assailed the Asuras in the sacrifice of Bali

अध्याय २३

श्लोक 28

महायोगी स तु बलिर् बभूव नृपतिः पुरा पुत्रान् उत्पादयाम् आस पञ्च वंशकरान् भुवि

mahāyogī sa tu balir babhūva nṛpatiḥ purā putrān utpādayām āsa pañca vaṃśakarān bhuvi

हिन्दी अर्थ

पीठ दिखाकर भागने लगते थे। उस समय उन रथियोंको रथी और पैदलोंको पैदल योद्धा सामने आकर रोक लेते थे॥ ३० ॥ घरघराहटकी आवाजके साथ आगे बढ़नेवाले उन रथियोंके रथोंका तुमुल नाद आकाशमें परस्पर टकरानेवाले बादलोंकी गड़गड़ाहटके समान जान पड़ता था॥ ३१॥ कितने ही रथोंने विपक्षियोंके रथोंको तोड़ डाला और कितने ही शत्रुपक्षेके रथोंसे रौंदे जाकर धूलमें मिल गये। दूसरे बहुत-से रथ अन्यान्य रथोंद्वारा मार्ग अवरुद्ध हो जानेके कारण आगे बढ़नेमें असमर्थ हो गये॥ ३२॥ कितने ही दर्पमें भरे हुए योद्धा समराज्भणमें एक-दूसरेके शरीरको अपनी दोनों भुजाओंसे दूर हटाकर आगे बढ़ जाते थे। वहाँ ढाल और तलवार लिये हुए सैनिक जब शण्रुपर प्रहार करते थे, उस समय उनके आभूषण झंकृत हो उठते थे॥३३॥ दूसरे बहुत-से सिपाही, जो युद्धस्थलमें मारे जाकर अस्त्रोंसे विदीर्ण हो गये थे, उसी प्रकार रक्त वमन करते थे, जैसे वर्षाकालमें

English

Viprachitti, Shivi, Sangkaraya, Shangku, Ayashirās, the powerful Hayagriva, the fierce Ketumān, Ugra, Sogra, Vyagra, Mahāsura, Pushkara, Pushkala, Sayoshya, Aswapati, Pralhāda, Aswasirā, Kumbha, Sanghrāda, Gaganapriya, Amihrāda, Hari, Hara, Varāha, Sankara, Ruja, Sharabha, Salabha, Kupana, Kopana, Kratha, Vrihatkirti, Mahāgihva, Sankukarna, Mahāswana, Dirghajlbha, Arkanayana, Mriduchāpa, Mriduprya, Vāyu, Garishtha, Namuchi, Saruvara, Vijvara Mahān, Chakrahanta, Krodhahantā, Krodhavardhana, Kālaka, Kālakeya, Vritta, Krodha, Virochana, Garishtha, Varistha, Pralamva, Naraka, Indratāpana, Vātāpi, Valadarpita, Ketumān, Asiloma, Pulomā, Vāshkala, Pramada, Mada, Vaishika, Kālavadana, Kārala, Koushika, Shara, Ekāksha, Chadrahā, Rahu, Sanhārāshwa, Mahiswan, Shataghni, Chakrahasta, Parighapāni, demons with Ashma and Vindipāla weapons in their hands, with those maces and mortars in their hands, those with Parashwa weapon, maces, clubs spikes and various other weapons in their hands, those assuming various dreadful forms, those assuming the forms of tortoise and fowl, the faces of hares, asses, camels, boars, dreadful Makaras, jackals, mice, frogs leopards, cats, elephants, crocodiles, lambs, hogs, kine, buffaloes, Godhas, deer, Garuda, those having faces like swords and peacocks, those having armours made of the skin of elephants, some wearing antelope skin, some covering their bodies with barks, some wearing head-dresses, some wearing crowns, some wearing Asura ear-rings, some wearing Kiritins, some with long tufts of hair, some with conch-like necks—thus a numberless Daityas, wearing various dresses, adorned with diverse garlands and taking up their burning weapons, surrounded on all sides the powerful Hrishikesha (81-98). Assuming a highly dreadful form and grinding them all with his hands and feet the Lord immediately freed the earth of the demons (99). When he placed his foot-step on the earth, the sun, and the moon remained on his breast, and when he placed his foot-step in the sky they lay in his navel (100). And when he placed his foot-step on a better place (than all these) they lay on the knees of the highly powerful Vishnu. This has been related by the twice-born ones (101). Having thus slain all the leading Asuras the Lord Vishnu, the foremost of all the gods, saved the earth and conferred the celestial kingdom on the king of gods (102). Thus have I described the dwarf incarnation of the Great Vishnu. The Brāhmanas, well-read in the Vedas, describe it as the glorious conduct of Vishnu (103).

अध्याय २३

श्लोक 29

अङ्गः प्रथमतो जज्ञे वङ्गः सुह्मस् तथैव च पुण्ड्रः कलिङ्गश् च तथा बालेयं क्षत्रम् उच्यते बालेया ब्राह्मणाश् चैव तस्य वंशकरा भुवि

aṅgaḥ prathamato jajñe vaṅgaḥ suhmas tathaiva ca puṇḍraḥ kaliṅgaś ca tathā bāleyaṃ kṣatram ucyate bāleyā brāhmaṇāś caiva tasya vaṃśakarā bhuvi

हिन्दी अर्थ

मेघोंकी घटाएँ घिर आनेपर वर्षा करनेवाले बादल जलकी धारा गिराते हैं ॥ ३४॥ वह संग्राम अस्त्र-शस्त्रोंसे गुँथ गया था, दोनों ओरसे फेंकी और उछाली जानेवाली गदाओंसे मलिन हो रहा था तथा देवता और दानवोंके क्षोभसे व्याप्त होकर अत्यन्त भयानक प्रतीत होता था॥ ३५॥ वह युद्ध एक दुर्दिनके समान जान पड़ता था। उसमें दानव ही महान् मेघोंकी घटाके समान घिर आये थे, देवताओंके चमकीले अस्त्र-शस्त्र विद्युत्की- सी प्रभा बिखेर रहे थे तथा दोनों दलोंकी ओरसे एक- दूसरेपर जो बाणोंकी बौछार हो रही थी, वही मानो वर्षा थी॥ ३६ ॥ इसी बीच कुपित हुआ महान् असुर कालनेमि समुद्रकी जलराशिसे परिपूर्ण होकर बढ़नेवाले मेघके समान अपना विशाल रूप प्रकट करने लगा

English

The Great Vishnu, the soul of all, next incarnated himself as the highly forgiving Dattātreya. When the gods disappeared, the religious works, sacrifices and the four castes suffered deterioration, when truth was lost and untruth flourished, when all the creatures were about to perish, when virtue was on the verge of extinction the Lord re-established the four Vedas with sacrifices as well as the four castes (104-107). The boon-giving, intelligent Dattātreya conferred a boon on the Haihaya king Kārtavirya, saying:–"O king, these your two arms, by the power of my boon, shall be thousand-fold. O lord of the earth, you will rule over the entire earth and be conversant with virtue. Your enemies shall not be able to look at you" (108-110). O slayer of enemies, O emperor, as heard by me, I have described to you the most wonderful and auspicious incarnation of Vishnu. The Great Lord next incarnated himself as Jāmadagni (111). In this incarnation Rāma killed in battle Arjuna in the midst of his irrepressible army who were filled with wonder at his thousand arms (112). Having brought the king Arjuna on earth from his car and assailed that king roaring like clouds with all his kinsmen, Bhrigu's son Rāma chopped off his thousand arms with his sword (113-114). The earth, adorned with the mountains Meru and Mandara, contained _Kotis_ of Kshatryas. He divested the earth of the Kshatryas for twenty one times (115). Having divested the earth of the Kshatriyas the great ascetic son of Bhrigu undertook the celebration of a horse-sacrifice for the expiation of all his sins (116). In that sacrifice consisting of profuse gifts Bhrigu's son, with great delight, made a gift of the earth to Marichi's son Kashyapa (117). In that horse sacrifice the highly liberal and illustrious Rāma, the foremost of car-warriors, made presents of quick-coursing horses, cars, endless gold, kine and elephants (118). Even now practising hard austerities, Bhrigu's son, effulgent like a celestial, is living on the most excellent mountain Mahendra (119). This is the account of the Jāmadagni incarnation of the great and intelligent Vishnu, the foremost of gods, bearing the mystic mark of Srivatsa on his breast (120).

अध्याय २३

श्लोक 30

बलेस् तु ब्रह्मणा दत्तो वरः प्रीतेन भारत महायोगित्वम् आयुश् च कल्पस्य परिमाणतः संग्रामे चाप्य् अजेयत्वं धर्मे चैव प्रधानताम् ।त्रैलोक्यदर्शनं चापि प्राधान्यं प्रसवे तथा ।बलस्याप्रतिमत्वं वै धर्मतत्त्वार्थदर्शनम् ।चतुरो नियतान् वर्णांस् त्वं च स्थापयितेति ह

bales tu brahmaṇā datto varaḥ prītena bhārata mahāyogitvam āyuś ca kalpasya parimāṇataḥ saṃgrāme cāpy ajeyatvaṃ dharme caiva pradhānatām | trailokyadarśanaṃ cāpi prādhānyaṃ prasave tathā | balasyāpratimatvaṃ vai dharmatattvārthadarśanam | caturo niyatān varṇāṃs tvaṃ ca sthāpayiteti ha

हिन्दी अर्थ

गात्रे नगशिरःप्रख्या विनिष्पेषु्बलाहका: पदञ्ञास्या: कृष्णवपुषो लेलिहाना इवोरगा: दिव्यैराकाशमावत्रे .. पर्वतैरुच्छितैरिव अपातयद् देवगणान् वज्जेणेव महागिरीन्

English

In the twenty fourth Yuga, sending Viswāmitra before him and dividing himself into four parts the mighty-armed Lord Isvara became celebrated in the world as the king Dasaratha's son Rāma. He had eyes like lotuses and was effulgent like the sun (121-122). For extending his favour to the world, for destroying the Rākshasas and increasing virtue the highly illustrious Lord was thus born (123). The sages designate that king of men as the body of the masters of Bhutas. Viswamitra instructed that intelligent one in the use of various weapons for the destruction of the enemies of the gods who were irrepressible even unto them and who put obstacles in the sacrifices of the self-controlled ascetics. On their behalf that high-souled (prince) the foremost of the strong killed the two Rakshasas (Mārichi and Suvāhu) (124–126). Formerly in the sacrifice of the high-souled Janaka, he, easily out of sport, snapped the bow of Hara (127). Living in the forest for fourteen years in the company of Lakshmana Rāghava, ever engaged in the well-being of all creatures and conversant with all the forms of religion, carried on austerities for fourteen years (128). The beautiful Sitā, well-known in the world used to remain by his side always. She was the Lakshmi known before and followed her husband (129). Living in Janasthāna he accomplished the work of the gods. Rāghava practised these hard penances for fourteen years. Lakshmana followed the foot-steps of Sita and remained there as his servant (130). There were two Rākshasas, Virādha and Kavandha of dreadful prowess. They became so by the imprecation of a Gandharva. Discharging at them burning arrows effulgent like the fire, the rays of the sun or lightning, strong as the thunder-bolt of Indra, and the feathers whereof were made of gold Rāma killed them both (131-132). On behalf of Sugriva the highly-powerful Rāma killed Bali in battle and installed Sugriva on the throne (133). The gods, the Asuras, the Rakshasas and the Pisacas were not capable of slaying Rāvana. He was difficult of being vanquished by any in the battle-field. Rāvana, having the hue of a collection of red collyrium, had millions of Rākshasas as his guards. The three worlds were terrorized by him. He was invincible, irrepressible, proud and powerful like a tiger. Even the celestials could not look at him and he was elated with pride on account of the boon. He, assisted by his ministers, killed in battle this highly powerful and huge bodied Rāvana, the king of Rakshasas, resembling a massive cloud, along with his army (134-137). In the days of yore, Rāma killed Rāvana the son of Pulastya, with his brothers, sons, ministers and army, who was a confirmed villain, committed a great iniquity and was invincible in battle. Madhu's son the great Asura Lavana, a heroic Dānava, who was elated with pride on account of the boon (conferred on him), was killed in battle in the forest of Madhu, by Rāma, who was an expert in battle. Other Rākshasas were also slain by him (138-140). Having performed these feats Rāma, the foremost of the pious, collected continually materials for the celebration of ten horse sacrifices (141). During Rāma's regeme, not a single inauspicious sound was heard, hostile winds did not blow and no body lost his property (142). No widows bewailed, nobody met with misfortune and the whole world¹⁴² enjoyed peace during Rāma's rule (143). Creatures had no fear from the obstruction of water and air and the aged people had not to perform the obsequial rites of the boys (144). The Kshatriyas used to serve the Brāhmanas, the Vaisyas used to follow the Kshatriyas, and the Sudras, divested of pride, used to serve the three superior castes. The women never disregarded their husbands, and the husbands never ill-treated their wives. The whole world was in peace, and freed from robbers. Rāma alone was the lord and protector of all (145–146). During Rāma's rule people lived for a thousand years and had a thousand sons and no creature suffered from any disease (147). During Rama's rule, the gods, the Rishis and men assembled together in the world (148). Persons, well-read in the Puranas who consider Rāma as the source of all truths, have sung this hymn in honor of that intelligent one (149). "Ratha, the king of Ayodhyā, had a green hue, black eyes, nectarine speech, a shining face, arms extending up to the knees, a beautiful countenance and leonine shoulders". He ruled for eleven thousand years. In the kingdom of that high-souled king were continually heard the chanting of the Rig, Yajush and Sama Vedas, the twang of bows and the utterances "make gifts and eat" (150–152). The energetic and accomplished son of Dasaratha, Rāma, shining in his own effulgence, surpassed even the sun in his lustre (153). Having celebrated hundreds of holy sacrifices with perfect and most excellent gifts the highly powerful Raghava left Ayodhya and repaired to the celestial region (154). Having thus brought about the destruction of Rāvana with all his kinsmen, the omniscient and mighty-armed Rāma, the descendant of Ikshāku, returned to the region of the celestials (155).

अध्याय २३

श्लोक 31

इत्य् उक्तो विभुना राजा बलिः शान्तिं परां ययौ तस्य ते तनयाः सर्वे क्षेत्रजामुनिपुंगवाः ।संभूता दीर्घतपसः सुदेष्णायां महौजसः ।बलिस् तान् अभिषिच्ये ह पञ्च पुत्रान् अकल्मषान् ॥ कृतार्थः सो ऽपि योगात्मा योगम् आश्रित्य स प्रभुः ।अधृष्यः सर्वभूतानां कालापेक्षी चरत्य् उत ।कालेन महता राजन् स्वं च स्थानम् उपागमत्

ity ukto vibhunā rājā baliḥ śāntiṃ parāṃ yayau tasya te tanayāḥ sarve kṣetrajāmunipuṃgavāḥ | saṃbhūtā dīrghatapasaḥ sudeṣṇāyāṃ mahaujasaḥ | balis tān abhiṣicye ha pañca putrān akalmaṣān || kṛtārthaḥ so 'pi yogātmā yogam āśritya sa prabhuḥ | adhṛṣyaḥ sarvabhūtānāṃ kālāpekṣī caraty uta | kālena mahatā rājan svaṃ ca sthānam upāgamat

हिन्दी अर्थ

न शेकुश्चलितुं देवा: कालनेमिहता युधि। मुष्टिभिनिहता: केचित् केचिच्च विदलीकृता: । यक्षगन्धर्वपतय: पेतुः सह महोरगै: तेन वित्रासिता देवाः समरे कालनेमिना। न शेकुर्यत्नवन्तो5पि प्रतिकर्तु विचेतस: रणे वेैश्रवणस्तेन परिघेः कालरूपिभि:। व्यलपल्लोकपालेशस्त्याजितो धनदक्रियाम्

English

Vaishampāyana said;—In the Māthura Kalpa the high-souled Keshava, for the behoof of mankind, went through this incarnation which I have been, at present, describing (156). In this incarnation the powerful lord slew Salwa, Mainda, Dwivida, Kansa, Aristha, Vrishabha, Keshi, the demoness Putanā, the elephant Kuvalayapida, Chānura, Musthi and other demons in human forms (157-158). By Him of wonderful deeds the thousand arms of Vāna were chopped off. The Asura, Naraka and highly powerful Yavana were slain by him, in battle (159). He carried away by force all the jewels of the kings. And all the wicked kings of the earth were slain, by him (160). After the expiration of the ninth incarnation of the Dwapara Yuga included within the eighteenth Mahāyuga, the lord Vishnu, having sent beforehand Jātukarna, took his birth as Veda-Vyasa¹⁴³ (161). The one Veda was divided into four by that high-souled one. This Vyasa, the son of Satyavati,¹⁴⁴ procreated the race of Bharatas (162).

अध्याय २३

श्लोक 32

तेषां जनपदाः पञ्च वङ्गाङ्गाः सुह्मकास् तथा कलिङ्गाः पुण्ड्रकाश् चैव प्रजास् त्व् अङ्गस्य मे शृणु

teṣāṃ janapadāḥ pañca vaṅgāṅgāḥ suhmakās tathā kaliṅgāḥ puṇḍrakāś caiva prajās tv aṅgasya me śṛṇu

हिन्दी अर्थ

मस्तकपर बिजलीके चञ्लल आभूषण धारण किये, प्रज्बलित वज्रकी वर्षा करनेवाले, पर्वतशिखरोंके समान विशालकाय बादल उसके शरीरसे टकराकर चूर-चूर हो जाते थे॥ ३८ ॥ जब वह क्रोधपूर्वक लम्बी साँस खींचता था, उस समय उसकी भौंहोंमें बल पड़नेसे पसीनेकी बूँदें टपकने लगती थीं और मुखसे वज्र तथा प्रचण्ड वायुसे युक्त आगकी लपटें निकलती रहती थीं उसकी भुजाएँ आकाशमें तिरछी और ऊपरकी दिशामें काले सर्प अपनी जीभ लपलपा रहे हों॥ ४० ॥ जैसे ऊँचे पर्वत आकाशको घेर लेते हैं, उसी प्रकार उसके चलाये हुए नाना प्रकारके दिव्य अस्त्र-शस्त्र, धनुष और परिघोंने व्योम-मार्गको ढक दिया॥४१॥ वह युद्धके

English

O king these incarnations, of the Lord, undertaken for the behoof of mankind, have been described. I shall now present an account of the future incarnations (163). The Lord again, for the well-being of mankind, will appear as Kalki in the house of a Brāhmana by name Vishnuyashas in the village of Sambhala (164). After the expiration of the tenth incarnation He will send Yajnavalka before Him and then engage in a discussion with the followers of Buddhism, who believe in the transcient science, who always praise the present and speak ill of the sacrifices. After defeating them he will disappear at the confluence of the Ganges and Yamuna with his followers. When all the families will be ruined, when all the kings, with their ministers and soldiers will be destroyed there will be none to look after the people. When they will all be killed by internal dessensions and when their riches will be pilfered by one another, they will begin to weep, being stricken with grief. Thus assailed by misfortune at the end of the Kaliyuga all the creatures will meet with destruction along with the Yuga itself

अध्याय २३

श्लोक 33

अङ्गपुत्रो महान् आसीद् राजेन्द्रो दधिवाहनः दधिवाहनपुत्रस् तु राजा दिविरथस् तथा

aṅgaputro mahān āsīd rājendro dadhivāhanaḥ dadhivāhanaputras tu rājā divirathas tathā

हिन्दी अर्थ

मुहानेपर खड़ा था और वायुके वेगसे उसके वस्त्र ऊपरकी ओर फहरा रहे थे। उस समय वह संध्याकालकी धूपसे व्याप्त शिखरवाले प्रकाशयुक्त दूसरे मेरुके समान शोभा पाता था॥४२॥ अपनी जाँघोंके बेगसे फेंके गये शैल-शिखरों और बड़े-बड़े वृक्षोंद्वारा वह देवताओंको उसी तरह धराशायी करने लगा, जैसे इन्धने वज़से महान् पर्वतोंको पृथ्वीपर गिरा दिया था॥४३॥ उस युद्धमें कालनेमिकी मार खाकर घायल हुए देवता चलने- फिरनेकी भी शक्ति खो बैठे उसकी भुजाओंके आघातसे तथा शस्त्रों एवं खड़्गोंकी चोटसे उनके मस्तक और गन्धर्वराज और बड़े-बड़े नाग उसके मुक्कोंकी मारसे मर गये और कितने ही विदीर्ण होकर पृथ्वीपर गिर पड़े ॥ ४५॥ उस युद्धमें कालनेमिने देवताओंको इतना भयभीत कर दिया कि वे अपनी सुध-बुध खो बैठे और

English

After the termination of the Kali Yuga the Satya Yuga will again appear in due order. This is the outcome of the natural sequence and there can no perversion of it (169). These and various other celestial incarnations, consisting of gods, have been recorded in the Puranas by the Rishis conversant with the knowledge of Brahman (170). I have only given an outline of the incarnations of the Lord the preceptor of all the worlds, by the chanting of which even the gods are charmed and in which exist all the Srutis and Puranas (171-172). The ancestral manes of the person are delighted who, with folded palms, listens to or recites the incarnations of Vishnu of unlimited power. If a man listens to the illusive sports of this Lord of Yoga he is freed from all his sins and acquires, by the favour of the Lord, virtue, prosperity, ascetic wealth and various objects of enjoyment (173-174).

अध्याय २३

श्लोक 34

पुत्रो दिविरथस्यासीच् छक्रतुल्यपराक्रमः विद्वान् धर्मरथो नाम तस्य चित्ररथः सुतः

putro divirathasyāsīc chakratulyaparākramaḥ vidvān dharmaratho nāma tasya citrarathaḥ sutaḥ

हिन्दी अर्थ

बहुत यत्र करके भी उसका कोई प्रतीकार न कर सके ॥ ४६॥ उसने रणभूमिमें ऐरावतपर बैठे हुए सहसनेत्रधारी इन्द्रको बाणोंके बन्धनमें बाँधकर स्तब्ध कर दिया। वे वहाँसे चलनेमें भी असमर्थ हो गये समराजड्भरणमें कालनेमिने वरुणका पाश छीनकर उन्हें उससे वश्चजित कर दिया; अतः उनका युद्धविषयक सारा व्यापार ठप हो गया। वे निर्जल बादल और बिना पानीके समुद्रकी भाँति श्रीहीन हो गये॥ ४८॥ उस रणक्षेत्रमें उसके कालरूपी परिघोंकी मार खाकर लोकपालेश्वर कुबेर विलाप करने लगे। उसने उनसे धनाध्यक्ष कुबेरके कार्यका बलपूर्वक त्याग करा दिया यम: सर्वहरस्तेन दण्डप्रहदणो रणे। याम्यामवस्थां समरे नीतः स्वां दिशमाविशत्

English

¹²³ A food for gods.

अध्याय २३

श्लोक 35

तेन धर्मरथेनाथ तदा विष्णुपदे गिरौ यजता सह शक्रेण सोमः पीतो महात्मना

tena dharmarathenātha tadā viṣṇupade girau yajatā saha śakreṇa somaḥ pīto mahātmanā

हिन्दी अर्थ

स लोकपालानुत्साद्य कृत्वा तेषां च कर्म तत्। दिक्षु सर्वासु देहं स्व॑ चतुर्धा विदधे तदा चालयामास दीछ्तांशु स्वर्गद्वारात्स भास्करम्। सायनं चास्य विषयं जहार दिनकर्म च सोउग्निं देवमुखे दृष्ठा चकारात्ममुखे स्वयम्। बायुं च तरसा जित्वा चकारात्मवशानुगम् चकारात्मवशे वीर्याद देहभूताश्व सिन्धव:

English

¹²⁶ A winnowing basket.

अध्याय २३

श्लोक 36

अथ चित्ररथस्यापि पुत्रो दशरथो ऽभवत् लोमपाद इति ख्यातो यस्य शान्ता सुताभवत्

atha citrarathasyāpi putro daśaratho 'bhavat lomapāda iti khyāto yasya śāntā sutābhavat

हिन्दी अर्थ

सर्वलोकमयो हैत्य: सर्वलोकभयावह: स॒ लोकपालैकवपुश्चन्द्रसूर्यग्रहात्मवान्। पावकानिलसद्भातो रराज युधि दानवः पारमेछ्ो स्थित: स्थाने लोकानां प्रभवाप्यये। तुष्ठवुस्तं हैत्यगणा देवा इब पितामहम् सबके प्राण लेनेवाले दण्डधारी यमको भी उसने रणभूमिमें याम्यदशा (अचेतनावस्था)-को पहुँचा दिया, अत: वे भयभीत होकर अपनी दक्षिण दिशामें घुस गये ॥ ५० ॥ इस प्रकार समस्त लोकपालोंको दूर भगाकर

English

¹²⁷ A wooden pestle used for cleaning rice.

अध्याय २३

श्लोक 37

तस्य दाशरथिर् वीरश् चतुरङ्गो महायशाः ऋष्यशृङ्गप्रभावेन जज्ञे कुलविवर्धनः

tasya dāśarathir vīraś caturaṅgo mahāyaśāḥ ṛṣyaśṛṅgaprabhāvena jajñe kulavivardhanaḥ

हिन्दी अर्थ

उसने उन सबके कार्यका सम्पादन अपने हाथमें ले लिया और सम्पूर्ण दिशाओंमें स्थापित करनेके लिये अपने शरीरको चार प्रकारका बना लिया॥५१॥ उसने राहुके दिखाये हुए दिव्य नक्षत्रपथमें जाकर राजा सोमकी राजलक्ष्मी तथा उनके विशाल राज्यका भी अपहरण कर लिया ॥ ५२ ॥ उसने उद्दीप्त किरणोंवाले सूर्यको स्वर्गद्वारसे हटा दिया तथा अयनसहित उनके सारे राज्य और दिन- सम्बन्धी कर्मको भी उनसे छीनकर अपने अधिकारमें कर लिया॥ ५३ ॥ कालनेमिने अग्निको देवताओंके मुखमें स्थित देख स्वयं बलपूर्वक उन्हें अपने मुखमें स्थापित किया और वायुको भी वेगसे पराजित करके अपनी आज्ञाके अधीन कर लिया॥ ५४॥ समुद्रोंसहित सम्पूर्ण सरिताओंको बलपूर्वक ले आकर कालनेमिने अपने पराक्रमसे उन सबको वशमें कर लिया। समस्त सागर उसके शरीररूप हो गये थे॥ ५५॥ उसने आकाश और पृथ्वीके जलको अपने वशमें करके उसके ऊपर पर्वतोंद्वारा

English

¹²⁸ Offering of oblation.

अध्याय २३

श्लोक 38

चतुरङ्गस्य पुत्रस् तु पृथुलाक्ष इति स्मृतः पृथुलाक्षसुतो राजा चम्पो नाम महायशाः चम्पस्य तु पुरी चम्पा या पूर्वं मालिनी बभौ

caturaṅgasya putras tu pṛthulākṣa iti smṛtaḥ pṛthulākṣasuto rājā campo nāma mahāyaśāḥ campasya tu purī campā yā pūrvaṃ mālinī babhau

हिन्दी अर्थ

सुरक्षित पृथ्वीको स्थापित किया॥ ५६॥ समस्त लोकोंको भय देनेवाला वह महान् हैत्य पञ्चमहाभूतोंका अधिपति एवं सर्वलोकमय होकर स्वयम्भू ब्रह्मके समान शोभा पाने लगा॥ ५७॥ उस युद्धस्थलमें दानव कालनेमि एकमात्र स्वयं ही समस्त लोकपालोंके रूपमें प्रतिष्ठित हुआ था। चन्द्रमा, सूर्य और अन्य ग्रह सबके रूपमें उसका शरीर ही काम कर रहा था। अग्नि और वायु भी उसके शरीर बन गये थे, इस प्रकार उसकी बड़ी शोभा हो रही थी॥ ५८॥ समस्त लोकोंकी उत्पत्ति और प्रलयके कारणभूत ब्रह्मलोकमें स्थित होकर वह ब्रह्मा बन बैठा था। उस समय हैत्यगण उसकी उसी तरह स्तुति करते थे, जैसे देवता ब्रह्माकी करते हैं इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि आश्चर्यतारकामये सप्तचत्वारिंशो5ध्याय:

English

¹²⁹ Members of a sacrifice.

अध्याय २३

श्लोक 39

पूर्णभद्रप्रसादेन हर्यङ्गो ऽस्य सुतो ऽभवत् ततो विभाण्डकस् तस्य वारणं शत्रुवारणम् अवतारयाम् आस महीं मन्त्रैर् वाहनम् उत्तमम्

pūrṇabhadraprasādena haryaṅgo 'sya suto 'bhavat tato vibhāṇḍakas tasya vāraṇaṃ śatruvāraṇam avatārayām āsa mahīṃ mantrair vāhanam uttamam

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वरमें आश्चर्यवारकामय संग्रामविषयक सँतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ कालनेमि और भगवान् विष्णुका संवाद, श्रीविष्णुद्वारा कालनेमिका वध तथा देवताओंको आश्वासन देकर ब्रह्मलोकको प्रस्थान पशञ्ञ तं॑ नाभ्यवर्तन्त विपरीतेन कर्मणा। वेदो धर्म: क्षमा सत्यं श्रीक्ष नारायणा श्रया स्वारूढं स्वर्णपत्राढ्यं शिखिनं काश्यपं खगम्

English

¹³⁰ A house for the assembly of priests.

अध्याय २३

श्लोक 40

हर्यङ्गस्य सुतः कर्णो विकर्णस् तस्य चात्मजः राजा भद्ररथः स्मृतः ।पुत्रो भद्ररथस्यासीद् बृहत्कर्मा प्रजेश्वरः ।बृहद्दर्भः सुतस् तस्य यस्माज् जज्ञे बृहन्मनाः ॥ बृहन्मनास् तु राजेन्द्रो जनयाम् आस वै सुतम् ।नाम्ना जयद्रथं नाम यस्माद् दृढरथो नृपः ॥ आसीद् दृढरथस्यापि विश्वजिज् जनमेजय ।दायादस् तस्य कर्णस् तु ।तस्य पुत्रशतं त्व् आसीद् अङ्गानां कुलवर्धनम्

haryaṅgasya sutaḥ karṇo vikarṇas tasya cātmajaḥ rājā bhadrarathaḥ smṛtaḥ | putro bhadrarathasyāsīd bṛhatkarmā prajeśvaraḥ | bṛhaddarbhaḥ sutas tasya yasmāj jajñe bṛhanmanāḥ || bṛhanmanās tu rājendro janayām āsa vai sutam | nāmnā jayadrathaṃ nāma yasmād dṛḍharatho nṛpaḥ || āsīd dṛḍharathasyāpi viśvajij janamejaya | dāyādas tasya karṇas tu | tasya putraśataṃ tv āsīd aṅgānāṃ kulavardhanam

हिन्दी अर्थ

दृष्ठा हैत्यविनाशाय रणे स्वस्थमवस्थितम् । दानवो विष्णुमक्षोभ्यं बभाषे क्षुब्धभानस: अयं स विष्णुर्देवानां वैकुण्ठश्न दिवौकसाम्। अनन्तो भोगिनामप्सु स्वयम्भूश्व स्वयम्भुव: अय॑ स नाथो देवानामस्माकं विप्रिये स्थित: । अस्य क्रोधेन महता हिरण्यकशिपुरईतः

English

¹³¹ A ladle or spoon.

अध्याय २३

श्लोक 41

विकर्णस्य सुतस् त्व् आसीद् अङ्गदःकुलवर्धनः ।बृहद्दर्भसुतो यस् तु राजा नाम्नाबृहन्मनाः ।तस्य पत्नीद्वयम् चासीच् चैद्यस्यैते सुते शुभे ।यशोदेवी च सत्त्वी च ताभ्यां वंशः स भिध्यते ॥ जयद्रथस् तु राजेन्द्र यशोदेव्यां व्यजायत ।ब्रह्मक्षत्रोत्तरः सत्त्व्यां विजयो नाम विश्रुतः ॥ विजयस्य धृतिः पुत्रस् तस्य पुत्रो धृतव्रतः ।धृतव्रतस्य पुत्रस् तु सत्यकर्मा महाव्रतः ॥ सत्यकर्मसुतश् चापि सूतस् त्व् अधिरथस् तु वै ।यः कर्णं प्रतिजग्राह ततः कर्णस् तु सूतजः ॥ एतद् वः कथितं सर्वं कर्णं प्रति महाबलम् ।कर्णस्य वृषसेनस् तु वृषस् तस्यात्मजः स्मृतः ।धार्मिकः सर्ववर्णस् तु सेनस्तस्यात्मजो ऽभवत् ।एते ऽङ्गवंशजाः सर्वे राजानः कीर्तिता मया सत्यव्रता महात्मानः प्रजावन्तो महारथाः

vikarṇasya sutas tv āsīd aṅgadaḥkulavardhanaḥ | bṛhaddarbhasuto yas tu rājā nāmnābṛhanmanāḥ | tasya patnīdvayam cāsīc caidyasyaite sute śubhe | yaśodevī ca sattvī ca tābhyāṃ vaṃśaḥ sa bhidhyate || jayadrathas tu rājendra yaśodevyāṃ vyajāyata | brahmakṣatrottaraḥ sattvyāṃ vijayo nāma viśrutaḥ || vijayasya dhṛtiḥ putras tasya putro dhṛtavrataḥ | dhṛtavratasya putras tu satyakarmā mahāvrataḥ || satyakarmasutaś cāpi sūtas tv adhirathas tu vai | yaḥ karṇaṃ pratijagrāha tataḥ karṇas tu sūtajaḥ || etad vaḥ kathitaṃ sarvaṃ karṇaṃ prati mahābalam | karṇasya vṛṣasenas tu vṛṣas tasyātmajaḥ smṛtaḥ | dhārmikaḥ sarvavarṇas tu senastasyātmajo 'bhavat | ete 'ṅgavaṃśajāḥ sarve rājānaḥ kīrtitā mayā satyavratā mahātmānaḥ prajāvanto mahārathāḥ

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय ! कालनेमिके द्वारा शास्त्रविपरीत कर्म किये जानेके कारण वेद, धर्म, क्षमा, सत्य और भगवान् नारायणके आश्रयमें रहनेवाली लक्ष्मी--ये पाँचों उसके पास नहीं आये॥ १॥ उनके उपस्थित न होनेसे दानवराज कालनेमिको बड़ा क्रोध हुआ। वह भगवान् विष्णुके पद एवं वैकुण्ठधामको अपने अधीन कर लेनेकी इच्छासे उन श्रीनारायणदेवके धारण करनेवाले भगवान् नारायण गरुड़की पीठपर विराजमान हैं और दानवोंका विनाश करनेके लिये अपनी कल्याणमयी कौमोदकी गदाको घुमा रहे हैं॥ ३ ॥ उनके श्रीअड्जोंकी कान्ति सजल जलधरके समान श्याम है। उनपर विद्युतकी- सी दीप्तिसे दमकता हुआ रेशमी पीताम्बर शोभा पा रहा है। वे भगवान् विष्णु जिन कश्यपकुमार आकाशचारी गरुड़पर आरूढ़ हैं, उनके दोनों पंख सुवर्णके समान सुशोभित हैं और मस्तकपर शिखा शोभा दे रही है

English

¹³² The room opposite to that which contains the materials for an oblation and in which the family and friends of the sacrificer

अध्याय २३

श्लोक 42

ऋचेयोस् तु महाराज रौद्राश्वतनयस्य वै शृणु वंशम् अनुप्रोक्तं यत्र जातो ऽसि पार्थिव

ṛceyos tu mahārāja raudrāśvatanayasya vai śṛṇu vaṃśam anuproktaṃ yatra jāto 'si pārthiva

हिन्दी अर्थ

जिन्हें कोई भी क्षोभमें नहीं डाल सकता, उन भगवान् विष्णुको हैत्योंके विनाशके लिये रणक्षेत्रमें स्‍्वस्थभावसे खड़ा देख दानव कालनेमिका हृदय क्षोभसे भर गया और वह इस प्रकार कहने लगा--॥ ५॥ “यही हमारे पूर्ववर्ती दानवर्षियोंका तथा एकार्णववासी मधु एवं कैटभका सुप्रसिद्ध शत्रु है॥ ६॥ कहते हैं, यही हमलोगोंका वह मूर्तिमान् विग्रह (युद्ध) है, जिसे शान्त करना सर्वथा असम्भव है। इसने अनेक संग्रामोंमें हमारे बहुत-से पूर्वज दानवोंका वध किया है॥७॥ यह वही निर्दयी है, जो युद्धमें अस्त्र धारण करके बालकोंके समान निर्लज्ज होता है। इसीने दानवनारियोंके सीमन्तका सौभाग्यचिह्न सदाके लिये उतार दिया है॥ ८ ॥ यही वह देवताओंका पक्षपाती विष्णु और स्वर्गवासियोंका वैकुण्ठ है। यही जलमें रहनेवाले सर्पोंका अनन्त और स्वयम्भू ब्रह्माका भी ब्रह्मा है॥ ९॥ यही वह देवताओंका रक्षक है, जो सदा हमारा अप्रिय करनेमें ही लगा रहता है। इसीके महान् क्रोधसे

English

¹³³ A level square piece of ground made of bricks prepared for a

अध्याय २३

श्लोक 43

अनाधृष्यस् तु राजर्षिर् ऋचेयुश् चैकराट् स्मृतः ।ऋचेयोर् ज्वलना नाम भार्या वै तक्षकात्मजा ।ऋचेयुतनयो राजन् मतिनारो महीपतिः मतिनारसुताश् चासंस् त्रयः परमधार्मिकाः

anādhṛṣyas tu rājarṣir ṛceyuś caikarāṭ smṛtaḥ | ṛceyor jvalanā nāma bhāryā vai takṣakātmajā | ṛceyutanayo rājan matināro mahīpatiḥ matinārasutāś cāsaṃs trayaḥ paramadhārmikāḥ

हिन्दी अर्थ

हैत्यराज हिरण्यकशिपु मारे गये थे! अय॑ स निधने हेतुः सर्वेषां देवविद्विषाम्। यस्य तेजःप्रविष्टानि कुलान्यस्माकमाहवे अयं स कालो हैत्यानां कालभूते मयि स्थिते। अतिक्रान्तस्थ कालस्य फल प्राप्स्यति दुर्मति:

English

¹³⁴ The same as the previous footnote

अध्याय २३

श्लोक 44

तंसुरोघो ऽप्रतिरथः सुबाहुश् चैव धार्मिकः गौरी कन्या चविख्याता मान्धातृजननी शुभा ।सर्वे वेदव्रतस्नाता ब्रह्मण्याः सत्यवादिनः

taṃsurogho 'pratirathaḥ subāhuś caiva dhārmikaḥ gaurī kanyā cavikhyātā māndhātṛjananī śubhā | sarve vedavratasnātā brahmaṇyāḥ satyavādinaḥ

हिन्दी अर्थ

दिष्टय्ेदानीं समक्ष मे विष्णुरेष समागतः। अद्य मदबाणनिष्पिष्टो मामेव प्रणमिष्यति इमं नारायणं हत्वा दानवानां भयावहम् जघानैकार्णवे घोरे तावुभौ मधुकैटभौ। विनिवेश्य स्वके ऊरौ निहतौ दानवेश्वरौ पितरं मे जघानैको हिरण्यकशिपुं पुरा

English

¹³⁵ A portion of fire.

अध्याय २३

श्लोक 45

सर्वेकृतास्त्रा बलिनः सर्वे युद्धविशारदाः ।पुत्रो ऽप्रतिरथस्यासीत् कण्वः समभवन् नृपः ।मेधातिथिः सुतस् तस्य यस्मात् काण्वो ऽभवद् द्विजः ।इला नाम तु यस्यासीत् कन्या वै जनमेजय ब्रह्मवादिन्य् अधित्री च तंसुस् ताम् अध्यगच्छत

sarvekṛtāstrā balinaḥ sarve yuddhaviśāradāḥ | putro 'pratirathasyāsīt kaṇvaḥ samabhavan nṛpaḥ | medhātithiḥ sutas tasya yasmāt kāṇvo 'bhavad dvijaḥ | ilā nāma tu yasyāsīt kanyā vai janamejaya brahmavādiny adhitrī ca taṃsus tām adhyagacchata

हिन्दी अर्थ

शुभं गर्भमधत्तेममदितिर्देवतारणि: । यज्ञकाले बलेयों वै कृत्वा वामनरूपताम्। त्रीललोकानाजहारैकः क्रममाणस्त्रिभि: क्रमैः “इसीकी छायामें रहकर देवता यज्ञके मुखभागमें स्थित हो महर्षियोंद्वारा तीन' प्रकारसे हवन करके अर्पित किये गये हविष्यका उपभोग करते हैं॥११॥ यही समस्त देवद्रोही हैत्योंकी मृत्युमें प्रधान कारण है। समराद्भणमें हमारे कितने ही कुल इसके तेजमें प्रविष्ट होकर भस्म हो गये॥ १२॥ कहते हैं, यह वही सुविख्यात विष्णु है, जो युद्धमें देवताओंके लिये अपना जीवन निछावर किये रहता है। यह शत्रुओंपर सूर्यके समान तेजस्वी चक्र चलाया करता है॥१३॥ यही वह हैत्योंका काल है, परंतु आज इसका भी काल होकर मैं खड़ा हूँ। मेरे रहते हुए ही यह दुर्बुद्धि अपने पूर्वकालकी करतूतोंका फल पायेगा ॥ १४॥ सौभाग्यकी बात है कि इस समय

English

¹³⁶ Gayatri and other metrical verses.

अध्याय २३

श्लोक 46

तंसोः सुरौघो राजर्षिर् धर्मनेत्रो महायशाः ब्रह्मवादी पराक्रान्तस् तस्य भार्योपदानवी

taṃsoḥ suraugho rājarṣir dharmanetro mahāyaśāḥ brahmavādī parākrāntas tasya bhāryopadānavī

हिन्दी अर्थ

यह विष्णु मेरे सामने आ गया। आज यह मेरे बाणोंसे पिस जायगा और धरतीपर गिरकर मुझे ही प्रणाम करेगा॥ १५॥ आज समराड्भणमें दानवोंको भय देनेवाले इस नारायणका वध करके मैं शीघ्र ही इसके आश्रित रहनेवाले देवताओंका भी संहार कर डालूँगा। ऐसा करके अपने पूर्वजोंके ऋणसे उऋण हो सकूँगा, यह मेरे लिये बड़े सौभाग्यकी बात होगी। (मत्स्य, वराह आदि) दूसरी-दूसरी योनियोंमें जन्म धारण करके भी यह युद्धमें दानवोंकों ही सताया करता है। यद्यपि यह अनन्त (आकाशकी भाँति असीम एवं व्यापक) है तो भी पूर्वकालमें मूर्तिमानू होकर प्रकट हुआ। उस समय इसकी पद्मनाभ नामसे प्रसिद्धि हुई। इसने भयंकर एकार्णवमें विचरनेवाले दोनों भाई दानवराज मधु और कैटभको अपनी जाँघपर सुलाकर मार डाला था॥ १६--१८ ॥ इसीने पूर्वकालमें आधे नर और आधे सिंहके रूपमें दो प्रकारका शरीर धारण करके अकेले

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अध्याय २३

श्लोक 47

उपदानवी सुतांल् लेभे चतुरस् तान् सुरौघतः ततश् चोत्पादयाम् आस चतुरः पुरुनन्दनान् ।दुःषन्तम् अथ सुःषन्तं प्रवीरम् अनघं तथा

upadānavī sutāṃl lebhe caturas tān suraughataḥ tataś cotpādayām āsa caturaḥ purunandanān | duḥṣantam atha suḥṣantaṃ pravīram anaghaṃ tathā

हिन्दी अर्थ

ही मेरे पिता हिरण्यकशिपुका वध किया था जो देवतारूपी अग्निको प्रकट करनेके लिये अरणिके समान हैं, उन अदिति देवीने शुभ गर्भके रूपमें इसे धारण किया था। वही गर्भ बलिके यज्ञके समय अपनेको वामनरूपमें प्रकट करके आया। उस समय इसने अकेले ही तीन पगोंसे तीनों लोकोंको नापकर उन्हें बलिके अधिकारसे छीन लिया' १- अड्ज होम, प्रधान होम और प्रायश्चित्त होम-ये होमके तीन प्रकार हैं। कुछ लोग नित्य, नैमित्तिक और काम्य भेदसे उसे तीन प्रकारका बताते हैं। कुछ दूसरे विद्वान् आहवनीय, गार्हपत्य तथा दक्षिणाग्रि रूप उपाधिके भेदसे उसकी त्रिविधताका प्रतिपादन करते हैं ।

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अध्याय २३

श्लोक 48

दुःषन्तस्य तु दायादो भरतो नाम वीर्यवान् स सर्वदमनो नाम नागायुतबलो महान्

duḥṣantasya tu dāyādo bharato nāma vīryavān sa sarvadamano nāma nāgāyutabalo mahān

हिन्दी अर्थ

भूयस्त्विदानीं समरे सम्प्राप्ते तारकामये। “अब पुनः इस समय इस तारकामय संग्रामका मया सह समागम्य सह देवैर्विनड्छ्ष्यति॥ २९ अवसर प्राप्त होनेपर इसने पदार्पण किया है, किंतु क्षिप्पमाणो 5सुरेन्द्रेण न चुकोप गदाधरः। क्षमाबलेन महता सस्मितं वाक्यमब्रवीत्

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अध्याय २३

श्लोक 49

चक्रवर्ती सुतो जज्ञे दुःषन्तस्य महायशाः शकुन्तलायां भरतो यस्य नाम्ना स्थ भारताः

cakravartī suto jajñe duḥṣantasya mahāyaśāḥ śakuntalāyāṃ bharato yasya nāmnā stha bhāratāḥ

हिन्दी अर्थ

अल्पदर्पबलो हैत्य स्थित: क्रोधादसद्गदन्। हतस्त्वमात्मनो दोषै: क्षमां योइतीत्य भाषसे। अहं त्वां हैत्य पश्यामि पूर्वेषां मार्गगामिनम् । प्रजापतिकृत॑ सेतुं को भित्त्वा स्वस्तिमान् भवेत् अद्य त्वां नाशयिष्यामि देवव्यापारकारकम् स्वेषु स्वेषु च स्थानेषु स्थापयिष्यामि देवता: क्रोधाद् द्विगुणरक्ताक्षो विष्णुं वक्षस्यताडयत्

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अध्याय २३

श्लोक 50

दुःषन्तं प्रति राजाणं वाग् उवाचाशरीरिणी ।माता भस्त्रा पितुः पुत्रो येन जातः स एव सः ।भरस्व पुत्रं दुःषन्त मावमंस्थाः शकुन्तलाम् ॥ रेतोधाः पुत्र उन्नयति नरदेव यमक्षयात् ।त्वं चास्य धाता गर्भस्य सत्यम् आह शकुन्तला ।भरतस्य विनष्टेषु तनयेषु महीपतेः मातॄणां तात कोपेण यथा ते कथितं तदा

duḥṣantaṃ prati rājāṇaṃ vāg uvācāśarīriṇī | mātā bhastrā pituḥ putro yena jātaḥ sa eva saḥ | bharasva putraṃ duḥṣanta māvamaṃsthāḥ śakuntalām || retodhāḥ putra unnayati naradeva yamakṣayāt | tvaṃ cāsya dhātā garbhasya satyam āha śakuntalā | bharatasya vinaṣṭeṣu tanayeṣu mahīpateḥ mātṝṇāṃ tāta kopeṇa yathā te kathitaṃ tadā

हिन्दी अर्थ

उद्यतायुधनिस्त्रिशा दृष्ठा विष्णुमथाद्रवन् अब मेरे साथ भिड़कर यह देवताओंसहित नष्ट हो जायगा'॥ २१ ॥ ऐसा कहकर रणभूमिमें भगवान् नारायणपर अयोग्य वचनोंद्वारा नाना प्रकारके आशक्षेप करते हुए कालनेमिने उनके साथ युद्ध करना ही पसंद किया असुरराज कालनेमिके इस प्रकार आक्षेप करनेपर भी भगवान् गदाधरने उसपर क्रोध नहीं किया; क्योंकि वे महान् क्षमाबलसे सम्पन्न थे।' उन्होंने मुसकराते हुए कहा--॥ २३॥ “हैत्य! तुझमें दर्प और बल तो बहुत थोड़ा है, किंतु तू क्रोधके कारण ओछी बातें बकता हुआ यहाँ खड़ा है। अरे! तू क्षमा अथवा सहनशीलताका उल्लड्डून करके बढ़-बढ़कर बातें बना रहा है, इसलिये अपने ही दोषोंसे मारा जा चुका है॥ २४॥ मेरे विचारसे तो तू

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अध्याय २३

श्लोक 51

बृहस्पतेर् अङ्गिरसः पुत्रो राजन् महामुनिः अयाजयद् भरद्वाजो महद्भिः क्रतुभिर् विभुः

bṛhaspater aṅgirasaḥ putro rājan mahāmuniḥ ayājayad bharadvājo mahadbhiḥ kratubhir vibhuḥ

हिन्दी अर्थ

अधम है! तेरे इस वाग्बलको धिक्कार है। अरे! जहाँ पुरुष न हों, केवल स्त्रियाँ ही हों, वहाँ लोग इस तरहकी गर्जना करते हैं, जहाँ वीर पुरुष हों वहाँ नहीं' (क्योंकि वहाँ गर्जना करनेसे वे उन वीर पुरुषोंद्वारा मार डाले जाते हैं)॥ २५॥ 'हैत्य! मैं तो देखता हूँ, तू अपने पूर्वजोंके ही मार्गपर जानेवाला है। भला! प्रजापतिद्वारा नियत की हुई मर्यादाकों भक़ करके कौन सकुशल रह सकता है॥ २६॥ तू दानव होकर देवताओंका कार्य स्वयं कर रहा है--तूने उनका अधिकार उनसे छीन लिया है, इसलिये आज मैं तेरा विनाश कर डालूँगा और देवताओंको पुनः अपने-अपने स्थानों (पदों)-पर स्थापित कर दूँगा! वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय ! वक्ष:स्थलमें श्रीवत्सचिढ्ल धारण करनेवाले भगवान् नारायण जब उस रणभूमिमें ऐसी बातें कर रहे थे, उस समय वह दानव वहाँ क्रोधपूर्वक हँसने लगा। उसने तुरंत ही अपने

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अध्याय २३

श्लोक 52

अत्रैवोदाहरन्तीमं भरद्वाजस्य धीमतः ।धर्मसंक्रमणं चापि मरुद्भिर् भरताय वै ।पूर्वं तु वितथे तस्य कृते वै पुत्रजन्मनि ततो ऽथ वितथो नाम भरद्वाजात् सुतो ऽभवत्

atraivodāharantīmaṃ bharadvājasya dhīmataḥ | dharmasaṃkramaṇaṃ cāpi marudbhir bharatāya vai | pūrvaṃ tu vitathe tasya kṛte vai putrajanmani tato 'tha vitatho nāma bharadvājāt suto 'bhavat

हिन्दी अर्थ

हाथोंमें हथियार ले लिये॥ २८ ॥ उसने समरभूमिमें सब प्रकारके अस्त्रोंको ग्रहण करनेवाली अपनी सौ भुजाओंको ऊपर उठाकर भगवान् विष्णुके वक्ष:स्थलमें प्रहार किया। उस समय उसकी आँखें क्रोधंके कारण दुगुनी लाल हो रही थीं॥ २९॥ मय और तार आदि दानव भी रणभूमिमें भगवान् विष्णुको उपस्थित देख हाथोंमें भाँति-भाँतिके आयुध और तलवार लिये उनकी ओर दौड़े॥ ३०॥ सब प्रकारके आयुध लेकर उद्यत हुए अत्यन्त बलशाली हैत्योंके प्रहार करनेपर भी भगवान् श्रीहरि युद्धभूमिमें कभी कम्पित न होनेवाले पर्वतके समान विचलित नहीं हुए (अविचलभावसे खड़े रहे) संसक्तश्च सुपर्णेन कालनेमी महासुरः। सर्वप्राणेन महतीं गदामुद्यम्थ बाहुभि:

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अध्याय २३

श्लोक 53

ततो ऽथ वितथे जाते भरतस् तु दिवं ययौ ।वितथं चाभिषिच्याथ भरद्वाजो वनं ययौ ।वितथस्य तु दायादो भुवमन्युर् बभूव ह ।महाभूतोपमाश् चामी चत्वारो भुवमन्युजाः ।बृहत्क्षत्रो महावीर्यो नरो गार्ग्यश् च वीर्यवान् ॥ नरस्य सांकृतिः पुत्रस् तस्य पुत्रौ महाबलौ ।वरवी रन्तिदेवश् च ते च कात्यायनाः स्मृताः ॥ दायादा अपि गार्ग्यस्य शिबिर् विद्वान् बभूव ह ।स्मृताः शैब्यास् ततो गार्ग्याः क्षत्रोत्पन्ना द्विजातयः ॥ महावीर्यसुतश् चासीद् धीमान् नाम्ना पुरुक्षयः ।तस्य भार्या विशाला तु सुषुवे तत् सुतत्रयम् ।त्रैयाक्षणं पुष्करिणं तृतीयं सुषुवे कपिम् ॥ कपीनां प्रवरा ह्य् एते त्रयः प्रोक्ता महर्षयः ।गार्ग्याः संकृतयः काप्याः क्षत्रोत्पन्ना द्विजातयः ।संश्रिताङ्गिरसः पक्षं सर्वे जाता महाबलाः ॥ बृहत्क्षत्रस्य दायादः सुहोत्रो नाम धार्मिकः ।सुहोत्रस्य तु दायादो हस्ती नाम बभूव ह ।तेनेदं निर्मितं पूर्वं पुरं गजसमाह्वयम् ॥ हस्तिनश् चापि दायादास् त्रयः परमकीर्तयः ।अजमीढस्य पुत्रास् तु जाताः कुरुकुलोद्वह ॥ तपसो ऽन्ते सुमहतो राज्ञो वृद्धस्य धार्मिकाः ।भरद्वाजप्रसादेन जाता वंशविवर्धनाः ॥ अजमीढस्य केशिन्यां कण्वः समभवत् सुतः ।मेधातिथिः सुतस् तस्य तस्मात् काण्वायनाः स्मृताः ।स चापि वितथः पुत्राञ् जनयाम् आस पञ्च वै सुहोत्रं सुतहोतारं गयं गर्गं तथैव च

tato 'tha vitathe jāte bharatas tu divaṃ yayau | vitathaṃ cābhiṣicyātha bharadvājo vanaṃ yayau | vitathasya tu dāyādo bhuvamanyur babhūva ha | mahābhūtopamāś cāmī catvāro bhuvamanyujāḥ | bṛhatkṣatro mahāvīryo naro gārgyaś ca vīryavān || narasya sāṃkṛtiḥ putras tasya putrau mahābalau | varavī rantidevaś ca te ca kātyāyanāḥ smṛtāḥ || dāyādā api gārgyasya śibir vidvān babhūva ha | smṛtāḥ śaibyās tato gārgyāḥ kṣatrotpannā dvijātayaḥ || mahāvīryasutaś cāsīd dhīmān nāmnā purukṣayaḥ | tasya bhāryā viśālā tu suṣuve tat sutatrayam | traiyākṣaṇaṃ puṣkariṇaṃ tṛtīyaṃ suṣuve kapim || kapīnāṃ pravarā hy ete trayaḥ proktā maharṣayaḥ | gārgyāḥ saṃkṛtayaḥ kāpyāḥ kṣatrotpannā dvijātayaḥ | saṃśritāṅgirasaḥ pakṣaṃ sarve jātā mahābalāḥ || bṛhatkṣatrasya dāyādaḥ suhotro nāma dhārmikaḥ | suhotrasya tu dāyādo hastī nāma babhūva ha | tenedaṃ nirmitaṃ pūrvaṃ puraṃ gajasamāhvayam || hastinaś cāpi dāyādās trayaḥ paramakīrtayaḥ | ajamīḍhasya putrās tu jātāḥ kurukulodvaha || tapaso 'nte sumahato rājño vṛddhasya dhārmikāḥ | bharadvājaprasādena jātā vaṃśavivardhanāḥ || ajamīḍhasya keśinyāṃ kaṇvaḥ samabhavat sutaḥ | medhātithiḥ sutas tasya tasmāt kāṇvāyanāḥ smṛtāḥ | sa cāpi vitathaḥ putrāñ janayām āsa pañca vai suhotraṃ sutahotāraṃ gayaṃ gargaṃ tathaiva ca

हिन्दी अर्थ

कर्मणा तेन हैत्यस्य विष्णुर्विस्मथमागत: बवृथे स पुनलोंकान् क्रान्तुकाम इवौजसा सुवर्णनेमिपर्यन्त॑ वच्ननाभं॑ भयावहम्। मेदोमज्ञास्थिरुधिरैर्दिग्ध॑ दानवसम्भवै: सरत्रग्दाममालाविततं कामगं कामरूपिणम्

English

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अध्याय २३

श्लोक 54

सुहोत्रस्य च पुत्रस् तु च्यवनो नाम धार्मिकः ।कपिलं च महात्मानं सुतहोतुः सुतद्वयम् काशिकश् च महासत्त्वस् तथा गृत्समतिः प्रभुः

suhotrasya ca putras tu cyavano nāma dhārmikaḥ | kapilaṃ ca mahātmānaṃ sutahotuḥ sutadvayam kāśikaś ca mahāsattvas tathā gṛtsamatiḥ prabhuḥ

हिन्दी अर्थ

इतनेहीमें महान् असुर कालनेमि गरुड़के साथ लगाकर एक विशाल गदा उठायी, जो तेजसे प्रज्बलित हो रही थी। उस भयंकर गदाको उसने रोषमें भरकर गरुड़पर छोड़ दिया। उस हैत्यके इस कर्मसे भगवान् विष्णुको भी बड़ा विस्मय हुआ॥ ३२-३३ ॥ जिस समय गरुड़के मस्तकपर वह गदा गिरी, उस समय वह पंजोंके बलसे पृथ्वीपर आकर टिक गये। उनका सारा शरीर व्यथित हो गया था॥ ३४ ॥ गरुड़को गदाके आघातसे पीड़ित और अपने शरीरको भी क्षत-विक्षत देखकर भगवान् विष्णुके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये। उन्होंने चक्र हाथमें ले लिया॥ ३५॥ तदनन्तर भगवान् नारायणका वेग गरुड़के समान ही बढ़ने लगा। उनकी चारों भुजाएँ दसों दिशाओंको व्याप्त करती हुई बढ़ने लगीं॥ ३६॥ वे

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अध्याय २३

श्लोक 55

तथा गृत्समतेः पुत्रा ब्राह्मणाः क्षत्रिया विशः काश्यस्य काशयो राजन् पुत्रो दीर्घतपास् तथा

tathā gṛtsamateḥ putrā brāhmaṇāḥ kṣatriyā viśaḥ kāśyasya kāśayo rājan putro dīrghatapās tathā

हिन्दी अर्थ

दिशाओं, अवान्तर दिशाओं, आकाश और पृथ्वीको परिपूर्ण करते हुए इस प्रकार बढ़ने लगे, मानो पुनः बलपूर्वक तीनों लोकोंको आक्रान्त करना चाहते हों देवेश्ररोंकी विजयके लिये आकाशमें बढ़ते हुए उन भगवान् मधुसूदनकी गन्धर्वोसहित ऋषि स्तुति करने लगे॥ ३८॥ वे अपने मस्तकके किरीटसे स्वर्गलोककी भूमिपर रेखा-सी खींचते, फहराते हुए वस्त्रोंद्ाय बादलोंसहित आकाशको ढकते और चारों बाहोंसे सम्पूर्ण दिशाओंको आच्छादित करते हुए अपने दोनों पैरोंसे पृथ्वीको दबाकर खड़े हो गये॥३९॥ जिसकी प्रभा सूर्यकी किरणोंके समान उद्धासित होती है, जिसमें एक सहखत्र अरे लगे हुए हैं, जो शत्रुओंका विनाश करनेमें समर्थ है, जिसे प्रज्जलित अग्निके समान तेजस्वी बताया गया है, जो भयंकर होनेपर भी दर्शनीय है, इसीलिये जिसे सुदर्शन कहते हैं, जिसके किनारेपर सुवर्णमयी नेमि (हाल)

English

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अध्याय २३

श्लोक 56

बभूव दीर्घतपसो विद्वान् धन्वंतरिः सुतः धन्वंतरेस् तु तनयः केतुमान् इति विश्रुतः

babhūva dīrghatapaso vidvān dhanvaṃtariḥ sutaḥ dhanvaṃtares tu tanayaḥ ketumān iti viśrutaḥ

हिन्दी अर्थ

लगी हुई है, जिसकी नाभि वज्रके समान सुदृढ़ है, जो शत्रुओंकों भय देनेवाला है, दानवोंके मेद, मज्जा, अस्थि तथा रुधिरसे जिसकी पुष्टि हुई है, जो प्रहारके साधनोंमें अद्वितीय (अनृपम) है, उसके प्रान्तभागमें मण्डलाकार छुरे लगे हुए हैं, जो फूल-मालाकी लड़ियोंके समान विस्तृत है, इच्छानुसार चलने और मनमाना रूप धारण करनेमें समर्थ है॥ ४०--४२॥ क्षेपणाद् यस्य मुहान्ति लोका:सस्थाणुजड़मा: । क्रव्यादानि च॒ भूतानि तृप्ति यान्ति महाहवे तमप्रतिमकर्माणं समान सूर्यवर्चसा। अक्रमुद्यम्य समरे क्रोधदीमप्तो गदाधर:

English

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अध्याय २३

श्लोक 57

अथा केतुमतः पुत्रो वीरो भीमरथः स्मृतः सुतो भीमरथस्यासीद् दिवोदासःप्रजेश्वरः ।दिवोदास इति ख्यातः सर्वरक्षःप्रणाशनः

athā ketumataḥ putro vīro bhīmarathaḥ smṛtaḥ suto bhīmarathasyāsīd divodāsaḥprajeśvaraḥ | divodāsa iti khyātaḥ sarvarakṣaḥpraṇāśanaḥ

हिन्दी अर्थ

चिच्छेद बाहुं चक्रेण श्रीधर: कालनेमिन: तस्य हैत्यस्य चक्रेण प्रममाथ बलाद्धरि: उरसा पातयामास गरुडः कालनेमिनम् तस्मिन्निपतिते हैत्ये देवा: सर्पिगणास्तदा। साधु साध्विति वैकुण्ठं समेताः प्रत्यपूजयन्

English

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अध्याय २३

श्लोक 58

एतस्मिन्न् एव काले तु पुरीं वाराणसीं नृपः शून्यां निवेशयाम् आस क्षेमको नाम राक्षसः

etasminn eva kāle tu purīṃ vārāṇasīṃ nṛpaḥ śūnyāṃ niveśayām āsa kṣemako nāma rākṣasaḥ

हिन्दी अर्थ

अपरे ये तु हैत्या वै युद्धे दुष्टपराक्रमा:। ते सर्वे बाहुभिव्याप्ता न शेकुश्चलितुं रणे कांश्वित्केशेषु जग्राह कांश्वित्कण्ठे3भ्यपीडयत्। पाटयत्कस्यचिद् वक्त्र मध्ये कांश्रिदथाग्रहीतू् तेषु सर्वेषु हैत्येषु हतेषु पुरुषोत्तम:। तस्थौ शक्रप्रियं कृत्वा कृतकर्मा गदाधर: तस्मिन् विमर्द निर्वृत्ति संग्रामे तारकामये। तं देशमाजगामाशु ब्रह्म लोकपितामह:

English

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अध्याय २३

श्लोक 59

शप्ता हि सा मतिमता निकुम्भेन महात्मना शून्या वर्षसहस्रं वै भवित्रीति नरर्षभ

śaptā hi sā matimatā nikumbhena mahātmanā śūnyā varṣasahasraṃ vai bhavitrīti nararṣabha

हिन्दी अर्थ

सर्वैर्ब्रह्मर्षिभि: सार्ध गन्धर्वें: साप्सरोगणै: । देवदेवो हरिं देवं पूजयन् वाक्यमब्रवीत् समस्त शत्रुओंको भय देनेवाले जिस दिव्य अस्त्रकी साक्षात् ब्रह्माजीने सृष्टि की है, अत्याचारी असुरोंके प्रति महर्षियोंके मनमें जो रोष होते हैं, उनसे जो सदा आविष्ट रहता है, युद्धके अवसरोंपर जो दर्पसे भरा होता है, जिसके प्रहारसे चराचर प्राणियोंसहित तीनों लोक मोहमें पड़ जाते हैं और महासमरमें जिसके प्रभावसे मांसभक्षी प्राणियोंको तृप्ति प्राप्त होती है, उस अनृपम कर्म करनेवाले सूर्यतुल्य तेजस्वी चक्रको हाथमें उठाकर भगवान् गदाधर समराड्भणमें क्रोधसे उद्दीत हो उठे ॥ ४३--४५ ॥ लक्ष्मीको वक्ष:स्थलमें धारण करनेवाले श्रीहरिने समरभूमिमें अपने तेजसे दानवोंके तेजका अपहरण करके उस चक्रसे कालनेमिकी भुजाओंको काट डाला॥४६॥ साथ ही

English

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अध्याय २३

श्लोक 60

तस्यां तु शप्तमात्रायां दिवोदासः प्रजेश्वरः विषयान्ते पुरीं रम्यां गोमत्यां संन्यवेशयत्

tasyāṃ tu śaptamātrāyāṃ divodāsaḥ prajeśvaraḥ viṣayānte purīṃ ramyāṃ gomatyāṃ saṃnyaveśayat

हिन्दी अर्थ

जिनके अट्टहास करनेपर अग्रनिचूर्ण प्रकट होते थे, उस हैत्यके उन सौ भयंकर मुखोंको भी भगवान् विष्णुने उस चक्रके द्वारा बलपूर्वक मथ डाला॥ ४७॥ भुजाओं और मस्तकोंके कट जानेपर भी वह दानव कम्पित नहीं हुआ। उसका धड़ युद्धस्थलमें शाखारहित वृक्षेके समान फैलाकर वायुके समान वेग प्रकट करके कालनेमिको अपनी छातीके धक्केसे गिरा दिया॥४९॥ उसका वह मस्तक और भुजाओंसे रहित शरीर स्वर्गलोकको त्यागकर आकाशसे चक्कर काटता और भूतलको श्षुब्ध करता हुआ पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ ५०॥ उस हैत्यके धराशायी होनेपर ऋषियोंसहित सम्पूर्ण देवता साधु-साधु कहते हुए वहाँ आये और भगवान् विष्णुकी पूजा एवं प्रशंसा करने लगे॥ ५१॥ उसके सिवा जो दूसरे दुष्ट पराक्रमी

English

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अध्याय २३

श्लोक 61

भद्रश्रेण्यस्य पूर्वं तु पुरी वाराणसीभवत् ।यदुवंशप्रसूतस्य तपस्य् अभिरतस्य च ।भद्रश्रेण्यस्य पुत्राणां शतम् उत्तमधन्विनाम् हत्वा निवेशयाम् आस दिवोदासः प्रजेश्वरः

bhadraśreṇyasya pūrvaṃ tu purī vārāṇasībhavat | yaduvaṃśaprasūtasya tapasy abhiratasya ca | bhadraśreṇyasya putrāṇāṃ śatam uttamadhanvinām hatvā niveśayām āsa divodāsaḥ prajeśvaraḥ

हिन्दी अर्थ

हैत्य थे, वे सब भगवान् विष्णुकी भुजाओंसे अवरुद्ध होकर रणभूमिमें हिल-डुल भी न सके ॥ ५२॥ भगवान्ने किन्हींके केश पकड़कर उन्हें टाँग लिया, किन्हींके गले दबा दिये, किन्हींके मुख फाड़ दिये और कुछ हैत्योंकी कमर पकड़कर तोड़ डाली ॥५३॥ वे हैत्य गदा और चक्रके तेजसे दग्ध हो अपने धैर्य और प्राण खो बैठे। उनके सारे अड् आकाशसे भ्रष्ट होकर भूतलपर गिर पड़े॥ ५४॥ उन सब हैत्योंके मारे जानेपर इन्द्रका प्रिय करके कृतकृत्य हुए गदाधारी भगवान् पुरुषोत्तम वहाँ चुपचाप खड़े हो गये॥ ५५॥ तारकामय संग्रामकी वह मार-काट समाप्त होनेपर देवाधिदेव लोकपितामह ब्रह्मा समस्त ब्रह्मर्षियों, गन्धर्वों और अप्सराओंके साथ शीघ्र ही उस प्रदेशमें आ पहुँचे और श्रीनारायणदेवकी पूजा करते हुए बोले--

English

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अध्याय २३

श्लोक 62

दिवोदासस्य पुत्रस् तु वीरो राजा प्रतर्दनः प्रतर्दनस्य पुत्रौ द्वौ वत्सो भार्गव एव च

divodāsasya putras tu vīro rājā pratardanaḥ pratardanasya putrau dvau vatso bhārgava eva ca

हिन्दी अर्थ

कृतं देव महत्कर्म सुराणां शल्यमुद्धृतम्। वधेनानेन हैत्यानां वयं हि परितोषिता: यो5यं हतस्त्वया विष्णो कालनेमी महासुरः । त्वमेकोस्य मृथे हन्ता नान्‍्य: कश्चन विद्यते एष देवान् परिभवँल्लोकांश्व सचराचरान्। ऋषीणां कदनं कृत्वा मामपि प्रतिगर्जति तदनेन तवोग्रेण परितुष्टोउस्मि कर्मणा। यदयं कालतुल्याभ: कालनेमी निपातित:

English

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अध्याय २३

श्लोक 63

अलर्को राजपुत्रश् च राजा संनतिमान् भुवि हेहयस्य तु दायाद्यं हृतवान् वै महीपतिः

alarko rājaputraś ca rājā saṃnatimān bhuvi hehayasya tu dāyādyaṃ hṛtavān vai mahīpatiḥ

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मर्षयस्त्वां तत्रस्था: प्रतीक्षन्ते सदोगता: सुरेष्वपि सहैत्येषु वराणां वरदो भवान् निर्यातयैतत् त्रैलोक्यं स्फीत॑ निहतकण्टकम्। अस्मिन्नेव मृधे विष्णो शक्राय सुमहात्मने एवमुक्तो भगवता ब्रह्मणा हरिरव्यय:। देवाज्छक्रमुखान् सर्वानुवाच शुभया गिरा

English

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अध्याय २३

श्लोक 64

आजह्रे पितृदायाद्यं दिवोदासहृतं बलात् तस्यान्वये सुहोत्रो ऽभूद् राजा परमधार्मिकः ।भद्रश्रेण्यस्य पुत्रेण दुर्दमेन महात्मना दिवोदासेन बालो हि घृणया स विसर्जितः

ājahre pitṛdāyādyaṃ divodāsahṛtaṃ balāt tasyānvaye suhotro 'bhūd rājā paramadhārmikaḥ | bhadraśreṇyasya putreṇa durdamena mahātmanā divodāsena bālo hi ghṛṇayā sa visarjitaḥ

हिन्दी अर्थ

श्रवणावहितैर्देहि: पुरस्कृत्य पुरंदरम् अस्मिन्न: समरे सर्वे कालनेमिमुखा हताः। दानवा विक्रमोपेता: शक्रादपि महत्तरा: वैरोचनश्व हैत्येन्द्र: स्वर्भानुश्न महाग्रह: ऋशक्षेः सह यथायोगं काले चरतु चन्द्रमा: । अब्दं चर्तुमुखं सू्यों भजतामयनै: सह

English

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अध्याय २३

श्लोक 65

अष्टारथो नाम नृपः सुतो भीमरथस्य वै तेन पुत्रेषु बालेषु प्रहृतं तस्य भारत वैरस्यान्तं महाराज क्षत्रियेण विधित्सता

aṣṭāratho nāma nṛpaḥ suto bhīmarathasya vai tena putreṣu bāleṣu prahṛtaṃ tasya bhārata vairasyāntaṃ mahārāja kṣatriyeṇa vidhitsatā

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मजीनी कहा--देव! आपने यह बहुत बड़ा कार्य किया। देवताओंका काँटा निकाल दिया। हैत्योंके इस वधसे हमें बड़ा संतोष हुआ है॥५८॥ विष्णो! आपके द्वारा जो यह कालनेमि नामक महान् असुर मारा गया है, इसे एकमात्र आप ही युद्धमें मार सकते थे; दूसरा कोई ऐसा नहीं है॥५९॥ यह देवताओं तथा चराचर प्राणियोंसहित समस्त लोकोंका तिरस्कार करता था और ऋषियोंका संहार करके मेरे सामने भी गर्जना किया करता था॥६०॥ अत: आपने जो कालके समान प्रतीत होनेवाले इस कालनेमि नामक हैत्यको मार गिराया है, आपके इस उग्र पराक्रमसे मैं बहुत संतुष्ट हूँ॥ ६१॥ इसलिये आइये, आपका कल्याण हो। अब हमलोग उत्तम दिव्य लोकको चलें। वहाँ दिव्य सभामें बैठे हुए वहाँके निवासी ब्रह्मर्षि आपकी प्रतीक्षा करते हैं ॥६२॥ वक्ताओंमें श्रेष्ठ अच्युत ! वहाँ मैं तथा महर्षिगण दिव्य वाणीद्वारा आपकी विधिवत् अर्चना करेंगे

English

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अध्याय २३

श्लोक 66

सो ऽप्य् एवं पुत्रसंहारं कुर्वन् पञ्चत्वमागतः ।अलर्कः काशिराजस् तु ब्रह्मण्यः सत्यसंगरः अलर्कं प्रति राजानं श्लोको गीतः पुरातनम् ।षष्टिं वर्षसहस्राणि षष्टिं वर्षशतानि च

so 'py evaṃ putrasaṃhāraṃ kurvan pañcatvamāgataḥ | alarkaḥ kāśirājas tu brahmaṇyaḥ satyasaṃgaraḥ alarkaṃ prati rājānaṃ śloko gītaḥ purātanam | ṣaṣṭiṃ varṣasahasrāṇi ṣaṣṭiṃ varṣaśatāni ca

हिन्दी अर्थ

वर धारण करनेवालोंमें श्रेष्ठ नारायण! मैं आपको क्‍या वर दूँगा। हैत्यों और देवताओंमें जितने भी वर ( श्रेष्ठ मनोरथ) हैं, उन सबके दाता तो आप ही हैं विष्णो! इस युद्धस्थलमें ही आप महात्मा इन्द्रको त्रिलोकीका यह समृद्धिशाली और अकण्टक राज्य लौटा दीजिये॥ ६५॥ भगवान् ब्रह्मके ऐसा कहनेपर आदि समस्त देवताओंसे इस प्रकार कहा-- भगवान् विष्णु बोले--जितने देवता यहाँ आये हैं, वे सब लोग अपने शरीर और इन्द्रियोंको मेरी बात सुननेके लिये सावधान रखते हुए इन्द्रको आगे करके मैं जो कुछ कहता हूँ, उसे सुनें ॥ ६७॥ इस युद्धमें हमने

English

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अध्याय २३

श्लोक 67

तस्यासीत्सुमहद्राज्यं रूपयौवनशालिनः ।युवा रूपेण संपन्न आसीत् काशिकुलोद्वहः लोपामुद्राप्रसादेन परमायुर् अवाप सः

tasyāsītsumahadrājyaṃ rūpayauvanaśālinaḥ | yuvā rūpeṇa saṃpanna āsīt kāśikulodvahaḥ lopāmudrāprasādena paramāyur avāpa saḥ

हिन्दी अर्थ

इन्द्रसे भी बहुत बढ़े-चढ़े पराक्रमशाली कालनेमि आदि समस्त दानवोंको मार डाला है॥ ६८॥ इस महासंग्रामसे दो ही हैत्य बचकर निकले हैं--विरोचनकुमार हैत्यराज अब अपनी-अपनी अभीष्ट दिशाको पुनः ग्रहण करें। यम दक्षिण दिशाका और धनाध्यक्ष कुबेर उत्तर दिशाका पालन करें॥७०॥ चन्द्रमा समयानुसार नक्षत्रोंके साथ यथायोग्य विचरें और सूर्य अयनोंसहित ऋतुप्रधान वर्षका हूयन्तामग्रयो विप्रैवेंददृष्ठन कर्मणा देवाश्व बलिहोमेन स्वाध्यायेन महर्षयः। श्राद्धेन पितरश्वैव तृप्तिं यान्तु यथा पुरा

English

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अध्याय २३

श्लोक 68

वयसो ऽन्ते महाबाहुर् हत्वा क्षेमकराक्षसम् रम्यां निवेशयाम् आस पुरीं वाराणसीं नृपः

vayaso 'nte mahābāhur hatvā kṣemakarākṣasam ramyāṃ niveśayām āsa purīṃ vārāṇasīṃ nṛpaḥ

हिन्दी अर्थ

त्रयो वर्णाश्न लोकांस्त्रीन् वर्द्धयन्त्वात्मजैर्गुणै: तर्पयन्तः प्रवर्तन्तां शिवै: सौम्यैश्व कर्मभि: त्रैलोक्यमातरः सर्वा: सागर यान्तु निम्नगा: हैत्येभ्यस्त्यज्यतां भीश्व शान्तिं ब्रजत देवता: । स्वस्ति वो3स्तु गमिष्यामि ब्रहालोक॑ सनातनम्

English

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अध्याय २३

श्लोक 69

अलर्कस्य तु दायादः क्षेमो नाम महायशाः क्षेमको नाम पार्थिवः ।क्षेमकस्य तु पुत्रो वै ।क्षेमस्य केतुमान् पुत्रो वर्षकेतुस् ततो ऽभवत्

alarkasya tu dāyādaḥ kṣemo nāma mahāyaśāḥ kṣemako nāma pārthivaḥ | kṣemakasya tu putro vai | kṣemasya ketumān putro varṣaketus tato 'bhavat

हिन्दी अर्थ

स्वगृहे सर्वलोके वा संग्रामे वा विशेषतः । विश्रम्भो वो न मन्तव्यो नित्य क्षुद्रा हि दानवा: असम्यग्वर्तमानानां मोहं दास्यामि देवता: (यज्ञमें ) सदस्योंद्वारा सब ओरसे पूजित आज्यभाग विधिसे अग्नियोंमें आहुति दें ॥७२॥ अब पुनः पहलेकी ही भाँति बलि और होमकर्मके द्वारा देवताओंको, स्वाध्यायके द्वारा महर्षियोंको तथा श्राद्धकर्मके सम्पादनसे पितरोंको संतुष्ट किया जाय और वे पूर्णतः तृत्त हों

English

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अध्याय २३

श्लोक 70

वर्षकेतोस् तु दायादो विभुर् नाम प्रजेश्वरः आनर्तस् तु विभोः पुत्रः सुकुमारस् ततो ऽभवत्

varṣaketos tu dāyādo vibhur nāma prajeśvaraḥ ānartas tu vibhoḥ putraḥ sukumāras tato 'bhavat

हिन्दी अर्थ

वायुदेव अपने मार्गपर रहकर विचरण करें, अग्रिदेव रूपोंमें सदा प्रकाशित होते रहें तथा तीनों वर्णोके लोग अपने (शम, दम, तप एवं शौच आदि) सहज गुणोंसे तीनों लोकोंकी वृद्धि करें॥ ७४॥ यज्ञदीक्षाके अधिकारी द्विजातियोंद्वारा यज्ञोंका अनुष्ठान होता रहे और समस्त यजमानोंके यज्ञोंमें यथायोग्य दक्षिणाएँ दी जायेँ सूर्यदेव सम्पूर्ण इन्द्रियोंकी, चन्द्रदेव रसोंकी तथा वायुदेव प्राणियोंके प्राणोंकी तृप्ति एवं पुष्टि करते हुए अपने कल्याणकारी एवं सौम्य कर्मोद्वारा लोकहितमें प्रवृत्त हों॥ ७६ ॥ देवराज इन्द्रद्वारा पर्वतोंपर बरसाये हुए जलसे

English

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अध्याय २३

श्लोक 71

सुकुमारस्य पुत्रस् तु सत्यकेतुर् महारथः सुतो ऽभवन् महातेजा राजा परमधार्मिकः करन्तुर् नाम नृपतिस् तस्य पुत्रौ बभूवतुः ।ब्रह्मण्यौ सत्यसंपन्नौ भार्गो वत्सस् तथैव च ।वत्सस्य वत्सभूमिस् तु भार्गभूमिस् तु भार्गवात्

sukumārasya putras tu satyaketur mahārathaḥ suto 'bhavan mahātejā rājā paramadhārmikaḥ karantur nāma nṛpatis tasya putrau babhūvatuḥ | brahmaṇyau satyasaṃpannau bhārgo vatsas tathaiva ca | vatsasya vatsabhūmis tu bhārgabhūmis tu bhārgavāt

हिन्दी अर्थ

प्रकट होनेवाली सम्पूर्ण सरिताएँ, जो सबको जलरूपी दुग्ध पिलानेके कारण तीनों लोकोंके प्राणियोंके लिये माताके समान हैं, यथोचित गतिसे बहती हुई क्रमशः समुद्रमें मिल जायूँ॥ ७७ ॥ देवताओ ! अब तुम हैत्योंसे होनेवाले भयको त्याग दो और मनमें शान्ति धारण करो। तुम सब लोगोंका कल्याण हो। अब मैं सनातन ब्रह्मलोकको जाऊँगा॥ ७८॥ अपने घरमें अथवा समस्त जगतूमें या विशेषत: संग्राममें तुम्हें दानवोंका कभी विश्वास नहीं करना चाहिए; क्योंकि वे सदा ही नीचतापूर्ण बर्ताव करनेवाले होते हैं ॥ ७९ ॥ ये मौका पाते ही प्रहार कर बैठते हैं। इनकी मर्यादा सदा स्थिर रहनेवाली नहीं होती। तुमलोग सौम्य और सरल स्वभावके हो, अतः तुम्हारी बुद्धि सरलतापूर्ण बर्तावमें लगती है

English

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अध्याय २३

श्लोक 72

एते त्व् अङ्गिरसः पुत्रा जाता वंशे ऽथ भार्गवे ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश् च भरतर्षभ

ete tv aṅgirasaḥ putrā jātā vaṃśe 'tha bhārgave brāhmaṇāḥ kṣatriyā vaiśyāḥ śūdrāś ca bharatarṣabha

हिन्दी अर्थ

करनेवाले दुरात्मा हैत्योंको मैं अवश्य ही मोहमें डाल दूँगा॥ ८१॥ जब दानवोंकी ओरसे तुमलोगोंको दुर्निवार्य भय प्राप्त होगा, तब शीघ्र ही आकर मैं तुम्हें उनकी ओरसे निर्भव कर दूँगा वैशम्पायन उवाच वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय ! देवताओंसे ऐसा कहकर महायशस्वी तथा सत्यपराक्रमी भगवान् एवमुक्त्वा सुरगणान् विष्णु: सत्यपराक्रम: । विष्णु ब्रह्माजीके साथ ब्रह्मलोकको चले गये जगाम ब्रह्मणा सार्ध ब्रहालोक॑ महायशा: ॥ ८३ राजन्! तुमने मुझसे जो बात पूछी थी, उसका उत्तर मैंने अगर दे दिया। तारकामय संग्रामके अवसरपर दानवों और एतदाश्चर्यमभवत् संग्रामे तारकामये। भगवान् विष्णुके बीचमें यही आश्चर्यजनक घटना घटित इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि कालनेमिवधे5ष्टचत्वारिंशो ध्याय:

English

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अध्याय २३

श्लोक 73

कर्मभिस् ते तपोमूलैः स्थिताःकुरुकुलोद्वह ।सुहोत्रस्य बृहत् पुत्रो बृहतस् तनयास् त्रयः अजमीढो द्विमीढश् च पुरुमीढश् च वीर्यवान्

karmabhis te tapomūlaiḥ sthitāḥkurukulodvaha | suhotrasya bṛhat putro bṛhatas tanayās trayaḥ ajamīḍho dvimīḍhaś ca purumīḍhaś ca vīryavān

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिव॑शपर्वमें कालनेमिका वधविषयक अड़तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ एकोनपश्ञाशत्तमो5 ध्याय: ब्रह्मलोकमें भगवान् विष्णुका सत्कार न. उवाच जनमेजयने पूछा--ब्रह्मन् देवाधिदेव कमलयोनि सा ब्रह्माजीके साथ ब्रह्मलोकमें जाकर भगवान् विष्णुने क्या ब्रह्मणा देवदेवेन सार्थ सलिलयोनिना। किया?॥ १॥ हैत्योंके संहारका कार्य पूर्ण हो जानेपर ब्रह्मलोकगतो ब्रह्मन् वैकुण्ठ: कि चकार ह॥ १ देवताओंद्वारा जिनका भलीभाँति सत्कार किया गया था,

English

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अध्याय २३

श्लोक 74

अजमीढस्य पत्न्यस् तु तिस्रो वै यशसान्विताः नीली च केशिनी चैव धूमिनी च वराङ्गना

ajamīḍhasya patnyas tu tisro vai yaśasānvitāḥ nīlī ca keśinī caiva dhūminī ca varāṅganā

हिन्दी अर्थ

उन भगवान् विष्णुको आदिदेव ब्रह्माजी ब्रह्मलोकमें किमर्थ चादिदेवेन नीतः कमलयोनिना। किसलिये ले गये ?॥ २॥ ब्रह्मलोकमें उनका कौन-सा विष्णुर्देत्यवधे वृत्ते देवैश्ष कृतसत्क्रियः॥ २ स्थान है? वहाँ उन्होंने किस योगका आश्रय लिया किंस्थानंबं अथवा उन भूतभावन सर्वव्यापी श्रीहरिने किस नियमको ब्रहलोके चकिं स्थान कं वायोगमुपास्तस:। धारण किया?॥ ३॥ वहाँ रहते हुए भगवान् विष्णुकी क॑ वा दधार नियमं स विभुर्भूतभावन:॥ ३ विपुल सम्पत्तिको, जिसकी देवता, असुर और मनुष्य , जादिदे सभी पूजा करते हैं, यह सारा विशाल जगत् कैसे पाता कर्थ तस्या55सतस्तत्र विश्व जगदिदं महतू। है ?॥ ४॥ ग्रीष्म-ऋतुके अन्तमें (आषाढ़मासकी शुक्ला भ्ियमाप्नोति विपुलां सुरासुरनराचिताम्॥ ४ एकादशीको) भगवान् कैसे शयन करते हैं? वर्षाकाल 5 बीतनेपर (कार्तिककी शुक्ला एकादशीको) किस प्रकार कथं स्वपिति घर्मान्ते बुध्यते चाम्बुदप्लवे। जागते हैं? तथा ब्रह्मलोक (नारायणाश्रम)-में रहकर वे कथंच ब्रह्मलोकस्थो धुरं वहति लौकिकीम्॥ ५ सम्पूर्ण जगत्की रक्षाका भार कैसे वहन करते हैं?॥ यों दिव्यं ५॥ विप्रवर! दिव्य धाममें स्थित भगवान् विष्णुका जो चरितं तस्य विप्रेन्द्र दिव्यं भगवतो दिवि। दिव्य चरित्र है, वह सब यथार्थरूपसे विस्तारपूर्वक मैं विस्तरेण यथातत्त्वं सर्वमिच्छामि वेदितुमू।। ६ सुनना चाहता हँ

English

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अध्याय २३

श्लोक 75

अजमीढस्य केशिन्यां जज्ञे जह्नुः प्रतापवान् य आजह्रे महासत्त्रं सर्वमेधम् महामखम्

ajamīḍhasya keśinyāṃ jajñe jahnuḥ pratāpavān ya ājahre mahāsattraṃ sarvamedham mahāmakham

हिन्दी अर्थ

यहाँ कुल आठ प्रश्न हैं। पहले श्लोकमें जो प्रथम प्रश्न है, उसका उत्तर इसी अध्यायके श्लोक १२ से लेकर १७ तक देखना चाहिए। दूसरे श्लोकमें दूसरा प्रश्न अद्धित है। इसका उत्तर इसी अध्यायके २५ से २८ तकके श्लोकोंमें गूढ़भावसे दिया गया है। तीसरे श्लोकमें तीन प्रश्न हैं--तीसरा, चौथा और पाँचवाँ। उनमेंसे तीसरे प्रश्नका उत्तर अध्याय ५० के १ से ६ तकके श्लोकोंमें उपलब्ध होता है। चौथे और पाँचवें प्रश्नोंका उत्तर उसी अध्यायके ७ से ९ तकके श्लोकोंमें देखें। चौथे श्लोकमें जो छठा प्रश्न अद्धित है, उसका उत्तर गूढ़भावसे अध्याय ५० के श्लोक १२ से २२ तकमें है। सातवाँ और आठवाँ प्रश्न पाँचवें, छठे श्लोकोंमें ब्रह्मलोक॑ यथारूढो ब्रह्मणा सह मोदते काम तस्य गतिः सूक्ष्मा देवेरपि दुरासदा। यतू तु वक्ष्याम्यहं राज॑स्तन्मे निगदत: श्रूणु

English

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अध्याय २३

श्लोक 76

पतिलोभेन यं गङ्गा वितते ऽभिससार ह नेच्छतः प्लावयाम् आस तस्य गङ्गा च तत् सदः

patilobhena yaṃ gaṅgā vitate 'bhisasāra ha necchataḥ plāvayām āsa tasya gaṅgā ca tat sadaḥ

हिन्दी अर्थ

एष लोकमयो देवो लोकाश्चैतन्मयास्त्रय: । एष देवमयश्लेव देवाश्षेतन्मया दिवि तस्य पार न पश्यन्ति बहवः पारचिन्तका: । एष पारं परं चेव लोकानां वेद माधव: अस्य देवान्धकारस्य मार्गितव्यस्य हैवतैः। श्रुणु वै यत् तदा वृत्तं ब्रहालोके पुरातनम् स गत्वा ब्रह्मणो लोकं दृष्टा पैतामहं पदम्। ववन्देतानृषीन्सर्वान् विष्णुराषेण कर्मणा

English

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अध्याय २३

श्लोक 77

तया च प्लावितं दृष्ट्वा यज्ञवाटं समन्ततः सौहोत्रिर् अब्रवीद् गङ्गां क्रुद्धो भरतसत्तम

tayā ca plāvitaṃ dṛṣṭvā yajñavāṭaṃ samantataḥ sauhotrir abravīd gaṅgāṃ kruddho bharatasattama

हिन्दी अर्थ

अबन्दत महातेजा: कृत्वा पौर्वाह्लिकीं क्रियाम् भागं यज्ञियमश्नानं स्वदेहमपरं स्थितम् अभिवाद्याभिवाद्यानामृषीणां ब्रह्मवर्चसाम् । परिचक्राम सो5चित्त्यो ब्रह्मलोक॑ सनातनम् वैश्ञम्पायनजीने कहा--जनमेजय! भगवान् नारायणके जो कर्म हैं और जिस प्रकार बे ब्रह्मलोकमें स्थित होकर ब्रह्माजीके साथ आनन्दका अनुभव करते हैं, वह सब पहले मुझसे सुनो॥ ७॥ राजन् उनकी गति

English

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अध्याय २३

श्लोक 78

एष ते त्रिषु लोकेषु संक्षिप्यापः पिबाम्य् अहम् अस्य गङ्गे ऽवलेपस्य सद्यः फलम् अवाप्नुहि

eṣa te triṣu lokeṣu saṃkṣipyāpaḥ pibāmy aham asya gaṅge 'valepasya sadyaḥ phalam avāpnuhi

हिन्दी अर्थ

(लीला या चरित्र) उन्हींकी इच्छाके अनुरूप होती है, वह सूक्ष्म है, उसके तत्त्वको ठीक-ठीक समझ पाना मैं भगवान्के जिस चरित्रका वर्णन करने जा रहा हूँ, उसे तुम मेरे कथनानुसार सुनो॥ ८॥ ये श्रीनारायणदेव सर्वलोकमय हैं और ये तीनों लोक भी इन्हींके स्वरूप (विष्णुमय) हैं। ये ही सर्वदेवमय हैं और स्वर्गके सम्पूर्ण देवता एतन्मय (इन्हींके स्वरूप अर्थात् विष्णुमय) हैं॥९॥ प्रत्येक वस्तुके पार तत्त्व (अन्त, इयत्ता या चरम सीमा)-का चिन्तन करनेवाले बहुत-से विचारक उन भगवान्का पार नहीं देख पाते हैं, परंतु ये भगवान् माधव सम्पूर्ण जगत्के परम पार (अपने-आप)-को भलीभाँति जानते हैं॥१०॥ ये इन्द्रियोंके अविषय हैं और सम्पूर्ण देवता इन्हींका अनुसंधान करते रहते हैं। इन्हीं भगवान् विष्णुका उस समय ब्रह्मलोकमें घटित

English

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अध्याय २३

श्लोक 79

ततः पीतां महात्मानो गङ्गां दृष्ट्वा महर्षयः उपनिन्युर् महाभागां दुहितृत्वाय जाह्नवीम्

tataḥ pītāṃ mahātmāno gaṅgāṃ dṛṣṭvā maharṣayaḥ upaninyur mahābhāgāṃ duhitṛtvāya jāhnavīm

हिन्दी अर्थ

हुआ जो प्राचीन वृत्तान्त है, उसे सुनो॥११॥ उन भगवान् विष्णुने ब्रह्मलोकमें जाकर पितामहके निवासस्थानका दर्शन करके वेदोक्त विधिसे वहाँके समस्त ऋषियोंको प्रणाम किया॥ १२॥ उन महातेजस्वी श्रीहरिने पूर्वाह्ककालकी क्रिया पूर्ण करके प्रात:सवनके समय महर्षियोंकी दी हुई आहुति ग्रहण करनेवाले अग्रिदेवका दर्शन करके उन्हें प्रणाम किया उन्होंने वहाँ अपने ही दूसरे विग्रहको विराजमान देखा, जिसका यज्ञोंमें महर्षिगण घीकी आहुतियोंद्राआ यजन (पूजन) कर रहे थे और जो प्राप्त हुए यज्ञभागको स्वयं ही ग्रहण कर रहा था॥ १४॥ उन अचित्त्यस्वरूप भगवान्ने ब्रह्मतेजसे सम्पन्न एवं वन्दनीय ऋषियोंको प्रणाम करके उस सनातन ब्रह्मलोकमें घूमना आरम्भ किया॥ १५॥ उन्होंने वहाँ यज्ञोंमें स्थापित किये गये बहुत-से ऊँचे-ऊँचे यूपों (यज्ञ-स्तम्भों)-को देखा, जो

English

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अध्याय २३

श्लोक 80

युवनाश्वस्य पुत्रीं तु कावेरीं जह्नुर् आवहत् गङ्गाशापेन देहार्धं यस्याः पश्चान् नदीकृतम्

yuvanāśvasya putrīṃ tu kāverīṃ jahnur āvahat gaṅgāśāpena dehārdhaṃ yasyāḥ paścān nadīkṛtam

हिन्दी अर्थ

सिरेपर काठके बने हुए छल्लोंसे विभूषित थे। ब्रह्मर्षियोंने मख्ेषु च ब्रह्मर्षिभि: शतश: कृतलक्षणान्ू॥ १६ उनमें सैकड़ों प्रकारके चिह्न अद्धित किये थे अड्जित है। इनमें सातवेंका उत्तर अध्याय ५० के २२ से ४३ तकके श्लोकोंमें वर्णित है और चरित्र-विषयक आठवें प्रश्नका उत्तर अध्याय ७५० के ४४ वें श्लोकसे आरम्भ होकर आगेके सभी अध्यायोंमें है।

English

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अध्याय २३

श्लोक 81

जह्नोस् तु दयितः पुत्रो अजको नाम वीर्यवान् अजकस्य तु दायादो बलाकाश्वो महीपतिः

jahnos tu dayitaḥ putro ajako nāma vīryavān ajakasya tu dāyādo balākāśvo mahīpatiḥ

हिन्दी अर्थ

ऊचुस्तमृषयो देवा: सदस्या: सदसि स्थिता: । अध्योद्यतभुजा: सर्वे पवित्रान्तरपाणय: देवेषु वर्तते तद् वै तद्द्धि सर्व जनार्दनात्। यत् प्रवृत्तं च देवेभ्यस्तद् विद्धि मधुसूदनात् अग्नीषोममयं लोकं य॑ विदुर्विदुषो जना:। तंसोममग्निंलोकं च वेद विष्णुं सनातनम् मथ्यमानेषु भूतेषु तथा लोको जनार्दनात्

English

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अध्याय २३

श्लोक 82

बभूव मृगयाशीलः कुशिकस् तस्य चात्मजः पह्लवैः सह संवृद्धो राजा वनचरैः स ह

babhūva mṛgayāśīlaḥ kuśikas tasya cātmajaḥ pahlavaiḥ saha saṃvṛddho rājā vanacaraiḥ sa ha

हिन्दी अर्थ

तथा देवैश्व वेहैश्व लोकै श्र विहितो हरि: तथा प्राणेश्वरावाप्तिदेवानां दिवि वेष्णवी लोकततनन्‍्त्रधरो होष मन्त्रेर्मनत्र इवोच्यते इदं यज्ञियमातिथ्यं मन्त्रतः प्रतिगृह्मताम्

English

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अध्याय २३

श्लोक 83

कुशिकस् तु तपस् तेपे पुत्रम् इन्द्रसमं प्रभुः लभेयम् इति तं शक्रस् त्रासाद् अभ्येत्य जज्ञिवान्

kuśikas tu tapas tepe putram indrasamaṃ prabhuḥ labheyam iti taṃ śakras trāsād abhyetya jajñivān

हिन्दी अर्थ

एकोनपज्चाशत्तमो5ध्याय: वे घीकी आहुतियोंसे प्रकट हुए धूमकी सुगन्ध लेते, ब्राह्मणोंद्वारा उच्चारित वेदमन्त्रोंको सुनते और यज्ञोंद्वारा होती हुई अपनी ही आराधनाको देखते हुए वहाँ सब ओर विचरने लगे॥ १७॥ जो यज्ञमण्डपमें सदस्यरूपसे विराजमान थे, वे सब देवता और ऋषि हाथोंमें पवित्री धारण करके अर्घ्य देनेके लिये दोनों भुजाएँ ऊपर उठाकर उन भगवान्के विषयमें परस्पर इस प्रकार कह रहे थे--॥ १८॥ “देवताओंमें जो भी शक्ति-सामर्थ्य आदि है, वह सब उन्हें भगवान् जनार्दनसे ही प्राप्त हुआ है। देवताओंसे भी जो कुछ प्राप्त होता है, उसे भगवान् मधुसूदनका ही प्रसाद समझो॥ १९॥ संसारके मनुष्य विद्वानोंके मुखसे जिस जगत्को अग्नि और सोमका

English

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अध्याय २३

श्लोक 84

स गाधिर् अभवद् राजा मघवान् कौशिकः स्वयम् विश्वामित्रस् तु गाधेयो राजा विश्वरथश् च ह

sa gādhir abhavad rājā maghavān kauśikaḥ svayam viśvāmitras tu gādheyo rājā viśvarathaś ca ha

हिन्दी अर्थ

कार्य जानते हैं, उसके कारणभूत वे सोम और अग्नि तथा यह कार्यभूत जगत् भी सनातन विष्णुरूप ही है, यह बात तुम्हें भी विदित है॥२०॥ जैसे दूधसे दही बनता है और दहीसे मन्थन करनेपर घी प्रकट होता है, उसी प्रकार भूतों (देह और इन्द्रिय आदि)-के मथे जानेपर अर्थात् चित्तको एकाग्र करके सूक्ष्म तत्त्वका चिन्तन करनेपर यह ज्ञात हो जाता है कि सारा संसार भगवान् जनार्दनसे ही प्रकट हुआ है॥ २१॥ जैसे चेतनासे व्याप्त भूतों (शरीरों) और इन्द्रियोंद्रारा उनके नियन्ता परमात्माका स्वत: ज्ञापन या प्रतिपादन हो जाता है, उसी प्रकार अनुग्रह आदि गुणोंसे युक्त देवताओं, वेदों और लोकोंद्वारा (उनके अन्तर्यामी आत्मारूपसे) श्रीहरिका बोध हो जाता है॥ २२ ॥ जैसे भूतलपर देहधारी प्राणियोंको जो देह और इन्द्रियोंकी प्राप्ति हुई है, उनका सम्बन्ध पार्थिव भूतोंसे है, उसी प्रकार स्वर्गलोकमें देवताओंको जो बल और ऐश्वर्य प्राप्त हुए हैं, उनका सम्बन्ध भगवान्

English

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अध्याय २३

श्लोक 85

विश्वजिद् विश्वकृच् चैव तथा सत्यवती नृप ऋचीकाज् जमदग्निस् तु सत्यवत्याम् अजायत

viśvajid viśvakṛc caiva tathā satyavatī nṛpa ṛcīkāj jamadagnis tu satyavatyām ajāyata

हिन्दी अर्थ

विष्णुसे ही है॥ २३ ॥ ये भगवान् विष्णु ही यज्ञ करनेवाले यजमानोंको उनके यज्ञोंका फल प्रदान करते हैं। ये परम पवित्र और स्वतन्त्र हैं। सम्पूर्ण लोकोंका संचालनसूत्र इन्हींके हाथमें है। जैसे वाणीके माधुर्यका वर्णन वाणीद्वारा ही सम्भव होता है, उसी प्रकार श्रीविष्णुके स्वरूपका प्रतिपादन स्वयं विष्णु ही कर सकते हैं, दूसरोंके लिये इनकी महिमा अनिर्वचनीय है' तदनन्तर भगवान्को देखकर ऋषियोंने कहा-- सुरश्रेष्ठ आपका स्वागत है, महातेजस्वी पद्मनाभ! आप वेदमन्त्रोंद्रारा यह यज्ञसम्बन्धी आतिथ्य-सत्कार ग्रहण करें त्वमस्यथ यज्ञपूतस्य पात्र पाह्यस्थ पावन:।

English

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अध्याय २३

श्लोक 86

विश्वामित्रस्य तु सुता देवरातादयः स्मृताः प्रख्यातास् त्रिषु लोकेषु तेषां नामानि मे शृणु

viśvāmitrasya tu sutā devarātādayaḥ smṛtāḥ prakhyātās triṣu lokeṣu teṣāṃ nāmāni me śṛṇu

हिन्दी अर्थ

इस यज्ञपूत पाद्यके आप ही उत्तम पात्र हैं, क्योंकि अतिथिस्त्वं हि मन्त्रोक्त: स दृष्ट: संततं मत: ॥ २६ आप ही वेदमन्त्रोंद्राग पाचन अतिथि बताये गये हैं। अवैष्णवस्य यज्ञस्य न हि कर्म विधीयते सदक्षिणस्य यज्ञस्य त्वत्प्रसूतिः फलं लभेत्। अद्यात्मानमिहास्माभिरिज्यमानं निरीक्षसे

English

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अध्याय २३

श्लोक 87

देवश्रवाः कतिश् चैव यस्मात् कात्यायनाः स्मृताः शालापतिर् हिरण्याक्षो रेणुर् यस्याथ रेणुका

devaśravāḥ katiś caiva yasmāt kātyāyanāḥ smṛtāḥ śālāpatir hiraṇyākṣo reṇur yasyātha reṇukā

हिन्दी अर्थ

एवमस्त्विति तान् सर्वान् भगवान् प्रत्यपूजयत्। जिनके विषयमें हम सदा सुनते और जानते आये हैं, उन्हींका आज प्रत्यक्ष दर्शन हुआ (यह हमारे लिये सौभाग्यकी बात है) ॥ २६॥ आप सर्वव्यापी श्रीहरि जब युद्धेके लिये चले गये थे, तब हमारे यज्ञकर्म ठीक तरहसे हो नहीं पाते थे। जिसका सम्बन्ध भगवान् विष्णुसे न हो अर्थात् जिसमें वे उपस्थित न हों, उस यज्ञका कार्य ठीकसे सम्पन्न नहीं होता है॥ २७॥ (आज आपकी उपस्थितिसे हमारा यज्ञ सफल हो गया।) आपका प्रकट होना ही दक्षिणाओंसे सम्पन्न यज्ञका प्रमुख फल है। आज आप यहाँ अपने-आपको हमारे द्वारा पूजित देखेंगे ॥ २८ ॥ तब 'एवमस्तु' कहकर भगवान् विष्णुने उन सबका सम्मान किया। उनके द्वारा सम्मानित

English

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अध्याय २३

श्लोक 88

सांकृत्यो गालवो राजन् मौद्गल्यश्वेति विश्रुताः तेषां ख्यातानि गोत्राणि कौशिकानां महात्मनाम्

sāṃkṛtyo gālavo rājan maudgalyaśveti viśrutāḥ teṣāṃ khyātāni gotrāṇi kauśikānāṃ mahātmanām

हिन्दी अर्थ

हो लोकपितामह ब्रह्मा भी अपने लोकमें स्थित हो परम मुमुदे ब्रहलोकस्थो ब्रह्मा लोकपितामह: ॥ २९ आनन्दका अनुभव करने लगे इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि ब्रह्मलोकवर्णनं नामैकोनपञ्णनाशत्तमो5ध्याय: इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिव॑शपर्वमें ब्रह्मतोकका वर्णन नामक उनचासवाँ अध्याय पूरा हुआ

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अध्याय २३

श्लोक 89

पाणिनो बभ्रवश् चैव धानंजय्यास् तथैव च पार्थिवा देवराताश् च सालङ्कायनसौश्रवाः

pāṇino babhravaś caiva dhānaṃjayyās tathaiva ca pārthivā devarātāś ca sālaṅkāyanasauśravāḥ

हिन्दी अर्थ

नारायणाश्रममें भगवान् विष्णुका शयन और उत्थान तथा पास आये हुए ब्रह्मा आदि देवताओंसे उनके आगमनका प्रयोजन पूछना ऋषिभि: पूजितस्तैस्तु विवेश हरिरीश्वरः। पौराणं ब्रह्मसदनं दिव्यं नारायणाश्रमम् प्रणम्य चादिदेवाय ब्रह्मणे पद्मयोनये प्रविशन्नेव भगवानायुधानि व्यसर्जयत्

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अध्याय २३

श्लोक 90

लोहित्या यमदूतश् च तथा कारीषयः स्मृताः विश्रुताः कौशिका राजंस् तथान्ये सैन्धवायनाः ऋष्यन्तरविवाह्याश् च कौशिका बहवः स्मृताः

lohityā yamadūtaś ca tathā kārīṣayaḥ smṛtāḥ viśrutāḥ kauśikā rājaṃs tathānye saindhavāyanāḥ ṛṣyantaravivāhyāś ca kauśikā bahavaḥ smṛtāḥ

हिन्दी अर्थ

स्वधिष्ठितं देवगणैः शाश्वतैश्व महर्षिभि: वैशम्पायनजी कहते हैं-- जनमेजय ! उन ऋषियोंसे पूजित होकर सर्वेश्वर भगवान् विष्णुने पुराणप्रसिद्ध दिव्य ब्रह्मधाम (वैकुण्ठ)-में, जो उन श्रीनारायणदेवका आश्रम (विश्रामस्थान) है, प्रवेश किया॥ १ ॥ उन्होंने प्रसन्नचित्तसे उस यज्ञसभामें एकत्र हुए उन सब महर्षियोंसे विदा ले आदिदेव पद्मयोनि ब्रह्माजीको प्रणाम करके अपने ही नामसे प्रसिद्ध हुए उस नारायणाश्रममें प्रवेश किया। उसमें प्रवेश करते ही भगवान्ने सम्पूर्ण आयुधोंको त्याग दिया॥ २-३॥ वहाँ उन्हें अपना शयनागार दिखायी दिया, जो समुद्रके समान शोभा पा रहा था। उसमें सनातन देवगण और शाश्वत महर्षि निवास करते थे

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अध्याय २३

श्लोक 91

पौरवस्य महाराज ब्रह्मर्षेः कौशिकस्य च संबन्धो ह्य् अस्य वंशे ऽस्मिन् ब्रह्मक्षत्रस्य विश्रुतः

pauravasya mahārāja brahmarṣeḥ kauśikasya ca saṃbandho hy asya vaṃśe 'smin brahmakṣatrasya viśrutaḥ

हिन्दी अर्थ

लोकानामन्तकालज्ञा काली नयनशालिनी । उपतस्थे महात्मानं निद्रा तं कालरूपिणी हरिरेकार्णवोक्तेन ब्रतेन ब्रतिनां बर: उपासाझ्क्रिरे विष्णुं देवा: सर्षिगणास्तथा आइ्य॑ तस्यासनं पद्दां ब्रह्मण: सूर्यवर्चसम्। सहस्रपत्र॑ वर्णाढ्यं सुकुमारं सुपुष्पितम्

English

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अध्याय २३

श्लोक 92

विश्वामित्रात्मजानां तु शुनःशेपो ऽग्रजः स्मृतः भार्गवः कौशिकत्वं हि प्राप्तः स मुनिसत्तमः

viśvāmitrātmajānāṃ tu śunaḥśepo 'grajaḥ smṛtaḥ bhārgavaḥ kauśikatvaṃ hi prāptaḥ sa munisattamaḥ

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मसूत्रोद्यापतकर: स्वपन्नेव महामुनि:। आवर्तयति लोकानां सर्वेषां कालपर्ययम् संवर्तक (प्रलयकारी) मेघोंके अभिमानी देवता वहाँ विद्यमान थे। वह स्थान नक्षत्रोंके आश्रयभूत ज्योतिर्मण्डलसे व्याप्त था। जो वहाँ जानेके अधिकारी नहीं हैं, उनके लिये वह दिव्य धाम अन्धकारसे आवृत है अर्थात् उनकी वहाँपर पहुँच नहीं हो पाती है। कठिन है॥५॥ वहाँ न तो वायुकी, न चन्द्रमाकी और न सूर्यकी ही पहुँच हो पाती है। वह दिव्य देश भगवान् पद्मनाभके सच्चिदानन्दमय श्रीविग्रहकी तेजोराशिसे ही आवृत एवं प्रकाशित है॥ ६॥ जो पहले सहस्रों मस्तकोंसे

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अध्याय २३

श्लोक 93

शबरादयश् च सप्तान्ये विश्वामित्रस्य वै सुताः दृषद्वतीसुतश् चापि विश्वामित्राद् अथाष्टकः

śabarādayaś ca saptānye viśvāmitrasya vai sutāḥ dṛṣadvatīsutaś cāpi viśvāmitrād athāṣṭakaḥ

हिन्दी अर्थ

विभूषित विराट्ू-रूपधारी होकर शोभा पाते थे, उन्हीं भगवानने उस दिव्य धाममें प्रवेश करते ही जगत्के प्राणियोंकी कर्मवासनामयी जटाका भार सिरपर धारण किये वहाँ सोनेकी तैयारी की॥७॥ तदनन्तर लोकोंके अन्तकालको जाननेवाली कृष्णवर्णा कालरूपिणी निद्रा, जो नेत्रोंका आश्रय लेकर शोभा पाती है, उन परमात्मा श्रीहरिकी सेवामें उपस्थित हुई॥ ८॥ ब्रतधारियोंमें श्रेष्ठ श्रीहरिने समुद्र और मेघोंके जलसे शीतल दिव्य शय्यापर शयन किया। प्रलयकालमें सारे जगत्के एकार्णवमग्र हो जानेपर जिस नियमसे भगवान्के शयनका वर्णन पुराणोंमें मिलता है, उसीके अनुसार उस समय भी भगवान्ने शयन किया था॥ ९॥ जगतूके अभ्युदयके लिये शयन करनेवाले उन सर्वसमर्थ महात्मा विष्णुकी वहाँ रहनेवाले

English

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अध्याय २३

श्लोक 94

अष्टकस्य सुतो लौहिः प्रोक्तो जह्नुगणो मया आजमीढो ऽपरो वंशः श्रूयतां भरतर्षभ

aṣṭakasya suto lauhiḥ prokto jahnugaṇo mayā ājamīḍho 'paro vaṃśaḥ śrūyatāṃ bharatarṣabha

हिन्दी अर्थ

भगवान्की नाभिके मध्यभागसे एक कमल प्रकट होकर शोभा पाने लगा। उसकी कान्ति सूर्यके समान थी। वही ब्रह्माका आदि आसन है। उसमें सहस्न दल हैं, वह बीजरूपी विभिन्न वर्णोसे अद्धित, अत्यन्त कोमल एवं अच्छी तरह खिला हुआ है॥ ११ ॥ ब्रह्माजीकी जो पूर्वजन्मोंकी वासना (कर्म-संस्कार) है, वही सूत्ररूपसे मानो भगवान्का उठा हुआ हाथ है, उसके द्वारा वे सृष्टि आदिके लिये संकेत करते रहते हैं। इस प्रकार वे महामुनि श्रीहरि सोते हुए ही समस्त लोकोंके कालजनित उलट-फेर (सृष्टि- संहार)-की आवृत्ति किया करते हैं॥ १२॥ उनके खुले हुए मुखसे जो नि:श्वास वायु निर्गत होती है, उससे प्रेरित होकर प्रजाओंकी विभिन्न श्रेणियाँ बड़े वेगसे निकलती और उत्पन्न होती रहती हैं

English

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अध्याय २३

श्लोक 95

अजमीढात् तु नील्यां वै सुशान्तिर् उदपद्यत पुरुजातिः सुशान्तेस् तु बाह्याश्वः पुरुजातितः

ajamīḍhāt tu nīlyāṃ vai suśāntir udapadyata purujātiḥ suśāntes tu bāhyāśvaḥ purujātitaḥ

हिन्दी अर्थ

यहाँ आचार्य नीलकण्ठने शयनका अर्थ समाधि किया है, उनके मतमें यहाँ समुद्रसे निर्विकल्प समाधि और मेघसे सविकल्प समाधि परिलक्षित होती है और शीतलका अर्थ वे तापरहित करते हैं, जो समाधिका विशेषण है। इसी तरह बे एकार्णवोक्त ब्रतका अर्थ निर्विकल्प समाधिके लिये बताया गया 'संयम' मानते हैं । रा. सृष्टाः प्राणिनो मेध्या विभक्ता ब्रह्मणा स्वयम्। चतुर्धा स्वां गतिं जग्मुः कृतान्तोक्तेन कर्मणा नतं वेद स्वयं ब्रह्मा नापि ब्रह्मर्षयो5व्यया: । विष्णोर्निद्रामयं योगं प्रविष्टं तमसावृतम्

English

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अध्याय २३

श्लोक 96

बाह्याश्वतनयाः पञ्च बभूवुर् अमरोपमाः मुद्गलः सृञ्जयश् चैव राजा बृहदिषुस् तथा

bāhyāśvatanayāḥ pañca babhūvur amaropamāḥ mudgalaḥ sṛñjayaś caiva rājā bṛhadiṣus tathā

हिन्दी अर्थ

ते तु ब्रह्मषय: सर्वे पितामहपुरोगमा:। न विदुस्तं क्रचित् सुप्तं क्रविदासीनमासने जागर्ति को5त्र कः शेते कश्न शक्तश्च नेड़ते। को भोगवान् को द्युतिमान् कृष्णात् कृष्णतरक्ष क: विमृशन्ति स्म त॑ देवा दिव्याभिरुपपत्तिभि: । न चैन शेकुरन्वेष्ठ कर्मतो जन्मतो5पि वा पुराणास्तं पुराणेषु ऋषय: सम्प्रचक्षते

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अध्याय २३

श्लोक 97

यवीनरश् च विक्रान्तः कृमिलाश्वश् च पञ्चमः पञ्चेमे रक्षणायालं देशानाम् इति विश्रुताः

yavīnaraś ca vikrāntaḥ kṛmilāśvaś ca pañcamaḥ pañceme rakṣaṇāyālaṃ deśānām iti viśrutāḥ

हिन्दी अर्थ

श्रूयते चास्य चरितं देवेष्वपि पुरातनम्। महापुराणातू प्रभृति परं॑ तस्य न विद्यते यच्चास्य देवदेवस्य चरितं स्वप्रभावजम्। तेनेमा: श्रुतयो व्याप्ता वैदिक्यो लौकिकाश्न या: भवकाले भवत्येष लोकानां लोकभावन:ः । दानवानामभावाय जागर्ति मधुसूदनः यत्रैनं वीक्षितुं देवा न शेकुः सुप्तमव्ययम्। ततः स्वपिति घर्मान्ते जागरति जलदक्षये

English

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अध्याय २३

श्लोक 98

पञ्चानां विद्धि पाञ्चालान् स्फीतान् पुण्यजनावृतान् अलं संरक्षणे तेषां पाञ्चाला इति विश्रुताः

pañcānāṃ viddhi pāñcālān sphītān puṇyajanāvṛtān alaṃ saṃrakṣaṇe teṣāṃ pāñcālā iti viśrutāḥ

हिन्दी अर्थ

सहि वेदाश्च यज्ञाश्व यज्ञाड्रानि च सर्वश: । या तु यज्ञगतिः प्रोक्ता स एष पुरुषोत्तम: वे उत्पन्न हुए पवित्र प्राणी साक्षात् ब्रह्माजीके द्वारा ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्ररूपसे चार भागोंमें विभक्त किये जाते हैं। फिर वे चारों वर्णेके लोग अपने-अपने लिये बताये गये वेदोक्त कर्मका (निष्कामभावसे) अनुष्ठान करके अपनी परम गति (परमात्मा)-को प्राप्त कर लेते हैं॥ १४॥ योगनिद्राका आश्रय लेकर शयन करनेवाला जो भगवान् विष्णुका योगमायासे समावृत स्वरूप है, उसे स्वयं ब्रह्माजी तथा (ब्रह्मलोकके ) अविनाशी ब्रह्मर्षि भी नहीं जान पाते हैं॥ १५॥ वे ब्रह्मा आदि सभी ब्रह्मर्षि किसी देश-कालमें सोये और किसी देश-कालमें आसनपर बैठकर जागते हुए भगवान्के स्वरूपको यथार्थरूपसे समझ नहीं पाते हैं॥ १६॥ उन्हें यह ज्ञात नहीं होता कि

English

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अध्याय २३

श्लोक 99

मुद्गलस्य तु दायादो मौद्गल्यः सुमहायशाः सर्व एते महात्मानः क्षत्रोपेताद्विजातयः ।एते ह्य् अङ्गिरसः पक्षं संश्रिताः कण्वमौद्गलाः ॥ मुद्गलस्य सुतो ज्येष्ठो ब्रह्मर्षिः सुमहातपाः ।इन्द्रसेना यतो गर्भं वध्र्यश्वं प्रत्यपद्यत

mudgalasya tu dāyādo maudgalyaḥ sumahāyaśāḥ sarva ete mahātmānaḥ kṣatropetādvijātayaḥ | ete hy aṅgirasaḥ pakṣaṃ saṃśritāḥ kaṇvamaudgalāḥ || mudgalasya suto jyeṣṭho brahmarṣiḥ sumahātapāḥ | indrasenā yato garbhaṃ vadhryaśvaṃ pratyapadyata

हिन्दी अर्थ

यहाँ कौन जागता है ? कौन सोता है ? कौन सर्वशक्तिमान् होकर भी कोई चेष्टा नहीं करता है ? कौन भोगवान् है ? कौन परम कान्तिमान् है तथा कौन कृष्ण (सूक्ष्म)- से भी कृष्णतर (अत्यन्त सूक्ष्म) है?॥१७॥ देवता दिव्य युक्तियोंद्वारा इनके विषयमें विचार करते रहते हैं; परंतु वे अबतक इनके जन्म और कर्मके रहस्यका पता नहीं लगा सके हैं॥ १८ ॥ उन परमात्माने अपने नि:श्वासभूत वेदमन्त्रोंके द्वारा जिनका उपदेश किया है, उन वैदिकी गाथाओंद्वार जो उनके चरित्रको जानते थे, उन पुरातन ऋषियोंने ही पुराणोंमें उन परमेश्ररके स्वरूपका विशद विवेचन किया है॥ १९ ॥ देवताओंके यहाँ भी महापुराण आदिसे इनके पुरातन चरित्रका श्रवण किया जाता है। उनका कहीं अन्त नहीं है॥२०॥ उन देवाधिदेव परमात्माका उनके प्रभावसे (पराक्रम आदिके द्वारा) प्रकट हुआ जो लीला-चरित्र है, उसीसे ये वैदिकी और लौकिकी श्रुतियाँ भरी हुई हैं॥२१॥ लोकोंकी सृष्टिके

English

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अध्याय २३

श्लोक 100

वध्र्यश्वान् मिथुनंजज्ञे मेनकायाम् इति श्रुतिः ।दिवोदासश् च राजर्षिर् अहल्या च यशस्विनी ॥ शरद्वतस्य दायादम् अहल्या संप्रसूयत ।शतानन्दम् ऋषिश्रेष्ठं तस्यापि सुमहायशाः ।पुत्रः सत्यधृतिर् नाम धनुर्वेदस्य पारगः ॥ तस्य सत्यधृते रेतो दृष्ट्वाप्सरसम् अग्रतः ।अथ स्कन्नं शरस्तम्बे मिथुनं समपद्यत ॥ कृपया तच् च जग्राह शंतनुर् मृगयां गतः ।कृपः स्मृतः स वै तस्माद् गौतमी च कृपी तथा ।एते शारद्वताः प्रोक्ता एते ते गौतमाः स्मृताः ॥ अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि दिवोदासस्य संततिम् ।दिवोदासस्य दायादो ब्रह्मर्षिर् मित्रयुर् नृपः ॥ मैत्रेयाणां ततः सोमो मैत्रेयास् तु ततः स्मृताः ।एते विपञ्चिताः पक्षाः क्षत्रोपेतास् तु भार्गवाः ।आसीत् पञ्चवनः पुत्रः सृञ्जयस्य महात्मनः सुतः पञ्चवनस्यापि सोमदत्तो महीपतिः

vadhryaśvān mithunaṃjajñe menakāyām iti śrutiḥ | divodāsaś ca rājarṣir ahalyā ca yaśasvinī || śaradvatasya dāyādam ahalyā saṃprasūyata | śatānandam ṛṣiśreṣṭhaṃ tasyāpi sumahāyaśāḥ | putraḥ satyadhṛtir nāma dhanurvedasya pāragaḥ || tasya satyadhṛte reto dṛṣṭvāpsarasam agrataḥ | atha skannaṃ śarastambe mithunaṃ samapadyata || kṛpayā tac ca jagrāha śaṃtanur mṛgayāṃ gataḥ | kṛpaḥ smṛtaḥ sa vai tasmād gautamī ca kṛpī tathā | ete śāradvatāḥ proktā ete te gautamāḥ smṛtāḥ || ata ūrdhvaṃ pravakṣyāmi divodāsasya saṃtatim | divodāsasya dāyādo brahmarṣir mitrayur nṛpaḥ || maitreyāṇāṃ tataḥ somo maitreyās tu tataḥ smṛtāḥ | ete vipañcitāḥ pakṣāḥ kṣatropetās tu bhārgavāḥ | āsīt pañcavanaḥ putraḥ sṛñjayasya mahātmanaḥ sutaḥ pañcavanasyāpi somadatto mahīpatiḥ

हिन्दी अर्थ

समय ये लोकभावन मधुसूदन सगुणरूपसे प्रकट होते हैं और दानवोंके विनाशके लिये सदा जागरूक रहते हैं ॥ २२॥ जहाँ सो जानेपर इन अविनाशी प्रभुको देवता भी नहीं देख सके थे, वहीं ये वर्षाकालमें (आषाढ़ शुक्ला एकादशीसे कार्तिक शुक्ला एकादशीतक) सोते और वर्षा व्यतीत होनेपर जागते हैं॥२३॥ भगवान् विष्णु ही वेद, यज्ञ तथा समस्त यज्ञाड़ (यज्ञके उपकरण) हैं। यज्ञोंद्वारा प्राप्त होनेवाली जो परम गति बतायी गयी है, वह भी ये भगवान् पुरुषोत्तम ही हैं १. यहाँ कृष्णका अर्थ कृश अर्थात् सूक्ष्म है।

English

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अध्याय २३

श्लोक 101

सोमदत्तस्य दायादः सहदेवो महायशाः सहदेवसुतश् चापि सोमको नाम पार्थिवः

somadattasya dāyādaḥ sahadevo mahāyaśāḥ sahadevasutaś cāpi somako nāma pārthivaḥ

हिन्दी अर्थ

शरत्प्रवृत्तयज्ञोडयं जागरति मधुसूदन: तदिदं वार्षिक॑ चक्र कारयत्यम्बुदेश्वर:। वैष्णवं कर्म कुर्वाण: सुप्ते विष्णौ पुरंदर: साकस्माद् द्वेषिणी घोरा कालरात्रिमहीक्षिताम् सैषा भवति लोकस्य निद्रा सर्वस्य लौकिकी

English

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अध्याय २३

श्लोक 102

अजमीढात् पुनर् जातः क्षीणे वंशे तु सोमकः ।सोमकस्य सुतो जन्तुर् यस्य पुत्रशतं बभौ तेषां यवीयान् पृषतो द्रुपदस्य पिता प्रभुः

ajamīḍhāt punar jātaḥ kṣīṇe vaṃśe tu somakaḥ | somakasya suto jantur yasya putraśataṃ babhau teṣāṃ yavīyān pṛṣato drupadasya pitā prabhuḥ

हिन्दी अर्थ

मृत्युकाले च भूतानां प्राणान् नाशयते भृशम् देवेष्वपि दधारैनां नान्‍यो नारायणादूते। सखी सर्वहरस्यैषा माया विष्णुशरीरजा लोकानल्पेन कालेन ग्रसते लोकमोहिनी भगवान्के शयनकालनमें मन्त्रपूत यज्ञकर्मोंका अनुष्ठान नहीं होता है। शरदू-ऋतुमें जब ये मधुसूदन जागते हैं, उस समय वाजपेय आदि यज्ञोंका अनुष्ठान आरम्भ हो जाता है॥२५॥ भगवान् विष्णुके शयन करनेपर

English

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अध्याय २३

श्लोक 103

धृष्टद्युम्नः तुद्रुपदाद् धृष्टकेतुश् च तत्सुतः ॥ आजमीढाः स्मृता ह्य् एते महात्मानस् तु सोमकाः ।पुत्राणाम् अजमीढस्य सोमकत्वं महात्मनः ।महिषी त्व् अजमीढस्य धूमिनी पुत्रगृद्धिनी तृतीया तव पूर्वेषां जननी पृथिवीपते

dhṛṣṭadyumnaḥ tudrupadād dhṛṣṭaketuś ca tatsutaḥ || ājamīḍhāḥ smṛtā hy ete mahātmānas tu somakāḥ | putrāṇām ajamīḍhasya somakatvaṃ mahātmanaḥ | mahiṣī tv ajamīḍhasya dhūminī putragṛddhinī tṛtīyā tava pūrveṣāṃ jananī pṛthivīpate

हिन्दी अर्थ

मेघोंके स्वामी देवराज इन्द्र स्वयं ही प्रजापालनरूप वैष्णवकर्मका सम्पादन करते हैं और वे ही लोगोंसे वर्षा-ऋतुमें होनेवाले जलसम्बन्धी कर्म (उपाकर्म एवं श्राद्ध-तर्पण आदि)-का अनुष्ठान करवाते हैं ॥ २६॥ यह जो गहन तमोमयी माया है, वही संसारमें निद्रारूपसे स्थित है। वह अकारण ही सबसे द्वेष रखनेवाली और भयंकर है तथा युद्धक्षेत्रमें उतरे हुए राजाओंके लिये कालरात्रिके समान है॥२७॥ उस तामसी मायाका शरीर है रात्रि, जिसका द्वार है अन्धकार। वह दिनका नाश करनेवाली तथा निद्राद्वारा भूतलके समस्त प्राणियोंके आधे जीवनको हर लेनेवाली है। उसका स्वरूप भयंकर है॥ २८॥ इस निशा एवं निद्रारूपिणी मायासे आविष्ट हुआ कोई भी प्राणी बार्म्बार जँभाई लेने लगता है और महासागरमें डूबते हुए मनुष्यके समान विवश होकर उसके वेगको सहन नहीं कर पाता है

English

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अध्याय २३

श्लोक 104

सा तु पुत्रार्थिनी देवी व्रतचर्यासमाहिता तपो वर्षाशतं तेपे स्त्रीभिः परमदुश्चरम्

sā tu putrārthinī devī vratacaryāsamāhitā tapo varṣāśataṃ tepe strībhiḥ paramaduścaram

हिन्दी अर्थ

पृथ्वीपर रहनेवाले मरणधर्मा मनुष्योंको यह निद्रा भोजन अथवा किसी प्रकारके परिश्रमके कारण प्राप्त होती है। इस प्रकार यह लौकिकी निद्रा जगत्के सभी प्राणियोंको आती है॥ ३० ॥ पृथ्वीपर देहधारियोंको जो निद्रा आती है, वह प्रायः सो लेनेके बाद स्वयं ही नष्ट हो जाती है, परंतु जब प्राणियोंका मृत्युकाल उपस्थित होता है, उस समय यह उनके प्राणोंका प्रबल वेगसे नाश कर डालती है॥३१॥ देवताओंमें भी भगवान् नारायणके सिवा दूसरा कोई इसे धारण नहीं कर सका (और न इसपर काबू ही पा सका है)। भगवान् विष्णुके शरीरसे प्रकट हुई यह माया सर्वसंहारकारी कालकी सखी (सहायिका) है॥३२॥ वही यह माया भगवान् नारायणके मुखमण्डलमें उनके नेत्रकमलोंके भीतर स्थित देखी गयी है। यही कमलनयनी नारीके रूपमें भी प्रकट होती है। सम्पूर्ण विश्वको मोहमें डालनेवाली निद्रामयी माया अल्पकालमें ही समस्त लोकोंको ग्रस

English

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अध्याय २३

श्लोक 105

हुत्वाग्निं विधिवत् सा तु पवित्रमितभोजना अग्निहोत्रकुशेष्व् एव सुष्वाप जनमेजय

hutvāgniṃ vidhivat sā tu pavitramitabhojanā agnihotrakuśeṣv eva suṣvāpa janamejaya

हिन्दी अर्थ

१. श्रुति कहती है--'शरदि वाजपेयेन यजेत।' अर्थात् 'शरदू-ऋतुमें वाजपेय यज्ञके द्वारा भगवानकी आराधना करे।' (नी० क०) एवमेषा हितार्थाय लोकानां कृष्णवर्त्मना। प्रवियते सेवनीया हि पत्येव च पतिव्नता स्वपिति सम तदा विष्णुमोहयञ्जगदव्यय: स तु द्वापरपर्यन्ते ज्ञात्वा लोकान् सुदु:खितान्। प्राबुध्यत महातेजा: स्तूयमानो महर्षिभि:

English

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अध्याय २३

श्लोक 106

धूमिन्या स तया देव्या अजमीढः समेयिवान् ऋक्षं सा जनयाम् आस धूमवर्णं सुदर्शनम्

dhūminyā sa tayā devyā ajamīḍhaḥ sameyivān ṛkṣaṃ sā janayām āsa dhūmavarṇaṃ sudarśanam

हिन्दी अर्थ

इमे ते ब्रह्मणा सार्ध देवा दर्शनकाड्नक्षेण: इमे त्वां ब्रह्मविद्वांसो ब्रह्मसंस्‍्तववादिन:। वर्धयन्ति हषीकेश ऋषय: संशितत्रता: इमे त्वां सप्त मुन॒यः सहिता मुनिमण्डलै:। स्तुवन्ति देव दिव्याभिगेयाभिर्गीभिरज़्सा कारणं किंचिदुत्पन्नं देवानां कार्यगौरवात्

English

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अध्याय २३

श्लोक 107

ऋक्षात् संवरणो जज्ञे कुरुः संवरणात् तथा यः प्रयागाद् अपक्रम्य कुरुक्षेत्रं चकार ह

ṛkṣāt saṃvaraṇo jajñe kuruḥ saṃvaraṇāt tathā yaḥ prayāgād apakramya kurukṣetraṃ cakāra ha

हिन्दी अर्थ

उदतिष्ठद्धृषीकेश: अया परमया ज्वलनू तत्त्वदृष्टार्थथा वाचा धर्महित्वर्थयुक्तया जिनका मार्ग सूक्ष्म है, उन परमात्मा श्रीहरिने समस्त लोकोंके हितके लिये (अर्थात् उन्हें विश्राम-सुखका अनुभव करानेके लिये) इस निद्राको धारण किया है। जैसे पति पतिक्रता स्त्रीका सेवन करता है, उसी प्रकार विश्राम- सुखकी इच्छावाले प्रत्येक व्यक्तिको समय-समयपर इसका सेवन करना चाहिए ॥ ३४॥ इस तरह अविनाशी भगवान् विष्णु उस योगनिद्रासे आच्छन्न हो सम्पूर्ण जगत्को मोहमें डालते हुए उस समय नारायणाश्रममें शयन करने लगे

English

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अध्याय २३

श्लोक 108

तद् वैतत् स महाभागो वर्षाणि सुबहून्य् अथ ।तप्यमाने तदा शक्रो यत्रास्य वरदो बभौ ।पुण्यं च रमणीयं च पुण्यकृद्भिर् निषेवितम् तस्यान्ववायः सुमहान् यस्य नाम्ना स्थ कौरवाः

tad vaitat sa mahābhāgo varṣāṇi subahūny atha | tapyamāne tadā śakro yatrāsya varado babhau | puṇyaṃ ca ramaṇīyaṃ ca puṇyakṛdbhir niṣevitam tasyānvavāyaḥ sumahān yasya nāmnā stha kauravāḥ

हिन्दी अर्थ

वहाँ सोते हुए महात्मा नारायणके हजारों वर्ष बीत गये। सत्ययुग तथा उत्तम त्रेतायुग भी समाप्त हो गये द्वापके अन्तमें समस्त लोकोंको अत्यन्त दुःखसे पीड़ित जान महर्षियोंद्वारा अपनी स्तुति सुनते हुए वे महातेजस्वी भगवान् श्रीहरि जाग उठे ऋषि बोले--भगवन्! जैसे पहलेके उपभोगमें लगी हुई फूलमालाको त्याग दिया जाता है, उसी प्रकार आप अपनी इस सहज निद्राको त्याग दीजिये। ब्रह्माजीके साथ ये समस्त देवता आपके दर्शनकी अभिलाषासे खड़े हैं॥ ३८ ॥ हृषीकेश ! ये उत्तम ब्रतका पालन करनेवाले ब्रह्मवेत्ता महर्षि वेदोक्त स्तोत्रोंका पाठ करते हुए आपका अभिनन्दन करते (आपको बधाई देते) हैं॥ ३९॥ भूतभावन विष्णो! ये जो आपके ही स्वरूपभूत पृथ्वी, जल, अग्नि,

English

¹⁴⁰ A name of fire. Other words have been explained in previous notes.

अध्याय २३

श्लोक 109

कुरोश् च पुत्राश् चत्वारः सुधन्वा सुधनुस् तथा परीक्षिच् च महाबाहुः प्रवरश् चारिमेजयः

kuroś ca putrāś catvāraḥ sudhanvā sudhanus tathā parīkṣic ca mahābāhuḥ pravaraś cārimejayaḥ

हिन्दी अर्थ

वायु और आकाशरूप महाभूतोंके अधिष्ठाता देवता हैं, इनके शुभ वचन आप सुनें॥४०॥ देव! ये मुनि- आपकी स्तुति करते हैं॥४१॥ कमलनयन! उठिये। महातेजस्वी पद्मनाभ ! देवताओंके गुरुतर कार्यवश आपको जगानेके लिये कुछ कारण उत्पन्न हो गया है वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय तब सारे जलको समेटकर तथा अनधिकारियोंके लिये योगमायाने जो तमोमय आवरण लगा दिया था, उसको भी दूर करके भगवान् हृषीकेश अपनी उत्कृष्ट शोभासे प्रकाशित होते हुए उठे॥ ४३॥ उन्होंने देखा, ब्रह्मासहित समस्त

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¹⁴⁰ A name of fire. Other words have been explained in previous notes.

अध्याय २३

श्लोक 110

सुधन्वनस् तु दायादः सुहोत्रो मतिमान् स्मृतः ।च्यवनस् तस्य पुत्रस् तु राजा धर्मार्थकोविदः ॥ च्यवनात् कृतयज्ञस् तु इष्ट्वा यज्ञैः स धर्मवित् ।विश्रुतं जनयाम् आस पुत्रम् इन्द्रसखं नृपः ॥ चैद्योपरिचरं वीरं वसुं नामान्तरिक्षगम् ।चैद्योपरिचराज् जज्ञे गिरिका सप्त मानवान् ॥ महारथो मगधराड् विश्रुतो यो बृहद्रथः ।प्रत्यग्रहः कुशश् चैव यम् आहुर् मणिवाहनम् ।मारुतश् च यदुश् चैव मत्स्यकाली च सत्तमः ॥ बृहद्रथस्य दायादः कुशाग्रो नाम विश्रुतः ।कुशाग्रस्यात्मजो विद्वान् ऋषभो नाम वीर्यवान् ॥ दायादस् तस्य विक्रान्तो राजा सत्यहितः स्मृतः ।तस्य पुत्रः स धर्मात्मा नाम्ना ऊर्जस् तु जज्ञिवान् ।ऊर्जस्य संभवः पुत्रो यस्य जज्ञे स वीर्यवान् ॥ शकले द्वे स वै जातो जरया संधितः स तु ।जरया संधितो यस्माज् जरासंधस् ततः स्मृतः ॥ सर्वक्षत्रस्य जेतासौ जरासंधो महाबलः ।जरासंधस्य पुत्रो वै सहदेवः प्रतापवान् ॥ सहदेवात्मजः श्रीमान् उदायिः स महायशाः ।उदायिर् जनयाम् आस पुत्रं परमधार्मिकम् ।श्रुतधर्मेति नामानं मगधान् यो ऽवसद् विभुः ।वृषभस्य तुदायादः पुष्पवान् नाम धार्मिकः ।परीक्षितस् तु तनयो धार्मिको जनमेजयः जनमेजयस्य दायादास् त्रय एव महारथाः ।जह्नोस् तुकथयिष्यामि यत्र जातो ऽसि पार्थिव ॥ जह्नुस् त्व् अजनयत् पुत्रं सुरथं नाम भूमिपम् ।श्रुतसेनो ऽग्रसेनौ च भीमसेनश् च नामतः

sudhanvanas tu dāyādaḥ suhotro matimān smṛtaḥ | cyavanas tasya putras tu rājā dharmārthakovidaḥ || cyavanāt kṛtayajñas tu iṣṭvā yajñaiḥ sa dharmavit | viśrutaṃ janayām āsa putram indrasakhaṃ nṛpaḥ || caidyoparicaraṃ vīraṃ vasuṃ nāmāntarikṣagam | caidyoparicarāj jajñe girikā sapta mānavān || mahāratho magadharāḍ viśruto yo bṛhadrathaḥ | pratyagrahaḥ kuśaś caiva yam āhur maṇivāhanam | mārutaś ca yaduś caiva matsyakālī ca sattamaḥ || bṛhadrathasya dāyādaḥ kuśāgro nāma viśrutaḥ | kuśāgrasyātmajo vidvān ṛṣabho nāma vīryavān || dāyādas tasya vikrānto rājā satyahitaḥ smṛtaḥ | tasya putraḥ sa dharmātmā nāmnā ūrjas tu jajñivān | ūrjasya saṃbhavaḥ putro yasya jajñe sa vīryavān || śakale dve sa vai jāto jarayā saṃdhitaḥ sa tu | jarayā saṃdhito yasmāj jarāsaṃdhas tataḥ smṛtaḥ || sarvakṣatrasya jetāsau jarāsaṃdho mahābalaḥ | jarāsaṃdhasya putro vai sahadevaḥ pratāpavān || sahadevātmajaḥ śrīmān udāyiḥ sa mahāyaśāḥ | udāyir janayām āsa putraṃ paramadhārmikam | śrutadharmeti nāmānaṃ magadhān yo 'vasad vibhuḥ | vṛṣabhasya tudāyādaḥ puṣpavān nāma dhārmikaḥ | parīkṣitas tu tanayo dhārmiko janamejayaḥ janamejayasya dāyādās traya eva mahārathāḥ | jahnos tukathayiṣyāmi yatra jāto 'si pārthiva || jahnus tv ajanayat putraṃ surathaṃ nāma bhūmipam | śrutaseno 'grasenau ca bhīmasenaś ca nāmataḥ

हिन्दी अर्थ

और उसीके सम्बन्धमें ये कुछ कहना चाहते हैं। उन्हें यह भी ज्ञात हो गया कि ये लोग जगत्के हितके लिये ही यहाँ पधारे हैं ॥ ४४॥ निद्राके द्वारा जिनके नेत्रोंको विश्राम मिल चुका था, उन भगवान् श्रीहरिने धर्मसम्मत, युक्तिसंगत तथा तात्त्विक अर्थसे युक्त वाणीद्वारा उस समय उन देवताओंसे इस प्रकार कहा कुतो वो विग्रहो देवा: कुतो वो भयमागतम् कस्यवा केन वा कार्य किं वा मयि न वर्तते किं खल्वकुशलं लोके वर्तते दानवोत्थितम्। नृणामायासजननं शीघ्रमिच्छामि वेदितुम्

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अध्याय २३

श्लोक 111

एते सर्वे महाभागा विक्रान्ता बलशालिनः ।जनमेजयस्य पुत्रौ तु सुरथो मतिमांस् तथा सुरथस्य तु विक्रान्तः पुत्रो जज्ञे विदूरथः

ete sarve mahābhāgā vikrāntā balaśālinaḥ | janamejayasya putrau tu suratho matimāṃs tathā surathasya tu vikrāntaḥ putro jajñe vidūrathaḥ

हिन्दी अर्थ

एष ब्रह्मविदां मध्ये विहाय शयनोत्तमम्। श्रीभगवान् बोले--देवताओ ! तुम्हारा किससे युद्ध छिड़ा हुआ है? कहाँसे तुमपर भय आया है? अथवा किस देवताको किस वस्तुकी आवश्यकता पड़ गयी है ? बताओ, कौन ऐसी वस्तु है, जो मेरे पास नहीं है? (अर्थात् मेरे पास सब कुछ है और मैं तुम्हें सब कुछ दूँगा) ॥ ४६। दानवोंकी ओरसे कौन-सा ऐसा कार्य किया गया है, जो लोकके लिये अमड्गलकारी और मनुष्योंके लिये कष्टजनक सिद्ध हुआ है? यह मैं शीघ्र जानना चाहता हूँ॥ ४७॥ आप सभी ब्रह्मवेत्ताओंके बीचमें इस उत्तम शय्याको त्यागकर यह मैं आपके कल्याण- साधनके लिये तैयार खड़ा हूँ। बताइये, आपकी क्‍या

English

¹⁴⁰ A name of fire. Other words have been explained in previous notes.

अध्याय २३

श्लोक 112

विदूरथस्य दायाद ऋक्ष एव महारथः द्वितीयः स बभौ राजा नाम्ना तेनैव संज्ञितः

vidūrathasya dāyāda ṛkṣa eva mahārathaḥ dvitīyaḥ sa babhau rājā nāmnā tenaiva saṃjñitaḥ

हिन्दी अर्थ

शिवाय भवतामर्थे स्थित: कि करवाणि व: ॥ ४८ सेवा करूँ इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वीणि विष्णोयोगशयनोत्थाने पशञ्चाशत्तमो5ध्याय: इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें भगवान् विष्णुका योगशय्यासे उत्थानविषयक पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ

English

¹⁴⁰ A name of fire. Other words have been explained in previous notes.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_harivaMza.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Harivamsha Purana — Chapter 23
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

Digitised text taken from the archive linked below. It has not been collated against a printed edition by this site.

पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

Numbering follows the imported source and may differ from other editions.