Harivamsha Purana· Harivaṁśa Purāṇa
23
अध्याय 23 / 119

Adhyaya 23

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पूर्ण अध्याय पाठ56 श्लोक

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अध्याय २३

श्लोक 113

द्वाव् ऋक्षौ तव वंशे ऽस्मिन् द्वाव् एव च परीक्षितौ भीमसेनास् त्रयो राजन् द्वाव् एव जनमेजयौ

dvāv ṛkṣau tava vaṃśe 'smin dvāv eva ca parīkṣitau bhīmasenās trayo rājan dvāv eva janamejayau

हिन्दी अर्थ

ब्रह्माजीका भगवान् विष्णुसे जगत्की वर्तमान अवस्थाका वर्णन करते हुए पृथ्वीका भार उतारनेके लिये मन्त्रणा करनेका अनुरोध तच्छुत्वा विष्णुगदितं ब्रह्मा लोकपितामह: । उवाच परमं वाक्य हितं सर्वदिवौकसाम् येषां भवानभयदः कर्णधारो रणे रणे शक्रे जयति देवेशे त्वयि चासुरसूदने। धर्मे प्रयतमानानां मानवानां कुतो भयम्

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अध्याय २३

श्लोक 114

ऋक्षस्य तु द्वितीयस्य भीमसेनो ऽभवत् सुतः प्रतीपो भीमसेनस्य प्रतीपस्य तु शांतनुः देवापिर् बाह्लिकश् चैव त्रय एव महारथाः

ṛkṣasya tu dvitīyasya bhīmaseno 'bhavat sutaḥ pratīpo bhīmasenasya pratīpasya tu śāṃtanuḥ devāpir bāhlikaś caiva traya eva mahārathāḥ

हिन्दी अर्थ

सत्ये धर्मे च निरतान् मानवान् विगतज्वरान्। नाकाले धर्मिणो मृत्यु: शक्नोति प्रसमीक्षितुम् वैजश्ञम्पायनजी कहते हैं--'जनमेजय! भगवान् विष्णुका वह कथन सुनकर लोकपितामह ब्रह्माने समस्त देवताओंके लिये हितकारक उत्तम बात कही-- असुरोंका संहार करनेवाले विष्णुदेव ! युद्धके अवसरोंपर जिनके आप-जैसे अभयदायक कर्णधार हों, उन देवताओंको कोई भय नहीं॥ २॥ जबतक देवराज इन्द्र विजयी हैं और असुरोंका संहार करनेवाले आप रक्षाके लिये उद्यत हैं, तबतक धर्मके लिये प्रयत्रशील रहनेवाले मनुष्योंको भी किससे भय हो सकता है॥३॥ जो मनुष्य सत्य और धर्ममें तत्पर रहकर चिन्तारहित हो धर्मके अनुष्ठानमें लगे हुए हैं, उनकी ओर अकालमृत्यु आँख उठाकर

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अध्याय २३

श्लोक 115

शांतनोः प्रसवस् त्व् एष यत्र जातो ऽसि पार्थिव बाह्लिकस्य तु राज्यं वै सप्तबाह्ल्यं विशां पते

śāṃtanoḥ prasavas tv eṣa yatra jāto 'si pārthiva bāhlikasya tu rājyaṃ vai saptabāhlyaṃ viśāṃ pate

हिन्दी अर्थ

देख भी नहीं सकती है॥४॥ मनुष्योंक अधिपति जो पृथ्वीपालक नरेश हैं, वे भी प्रजाकी आयके छठे भागका 'कर'के रूपमें उपभोग करते हुए आपसमें कभी भेद या कलह नहीं करते हैं' ते प्रजानां शुभकराः करहैरविगर्हिता:। सुकरेर्विप्रयुक्तार्था: कोशमापूरयन्त्युत यजन्ते च यथाकालं यज्ञैविपुलदक्षिणै:ः वेदानधीत्य दीक्षाभिर्महर्षीन् ब्रह्मचर्यया। श्राद्धैश्च मेध्यै: शतशस्तर्पयन्ति पितामहान्

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अध्याय २३

श्लोक 116

बाह्लिकस्य सुतश् चैव सोमदत्तो महायशाः जज्ञिरे सोमदत्तात् तु भूरिर् भूरिश्रवाः शलः

bāhlikasya sutaś caiva somadatto mahāyaśāḥ jajñire somadattāt tu bhūrir bhūriśravāḥ śalaḥ

हिन्दी अर्थ

बैदिकं लौकिकं चैव धर्मशास्त्रोक्तमेव च भूयः कृतयुगं कर्तुमुत्सहन्ते नराधिपा: तेषामेव प्रभावेण शिवं वर्षति वासवः। यथार्थ च ववुर्वाता विरजस्का दिशो दश अनुलोमकरः सूर्यस्त्वयने द्वे चचार ह। हव्यैश्व विविधेस्तृप्त: शुभगन्धो हुताशन:

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अध्याय २३

श्लोक 117

उपाध्यायस् तु देवानां देवापिर् अभवन् मुनिः च्यवनस्य पुत्रः कृतक इष्टश् चासीन् महात्मनः

upādhyāyas tu devānāṃ devāpir abhavan muniḥ cyavanasya putraḥ kṛtaka iṣṭaś cāsīn mahātmanaḥ

हिन्दी अर्थ

तर्पयत्सु महीं कृत्स्नां नुणां कालभयं कुत: 'वे सदा ही प्रजाकी भलाई करते हैं, इसलिये “कर' देनेवाले लोग उनकी निन्दा नहीं करते। राजाओंको जब अर्थकी कमी पड़ती है, तब वे न्‍्यायोचित करोंके द्वारा ही अपना खजाना भरते हैं॥६॥ वे क्षमापरायण हो अपने समस्त समृद्धिशाली जनपदोंका पालन करते हैं। कभी किसीको कठोर दण्ड नहीं देते हैं तथा चारों वर्णोकी यथोचित रीतिसे रक्षा करते हैं ॥७॥ (वे स्वयं किसीको उद्दिग्न नहीं करते हैं, इसलिये) कोई भी प्राणी उन्हें उद्देगमें नहीं डालते हैं। मन्त्रियोंद्वारा वे भलीभाँति सम्मानित होते हैं तथा चतुरड्िणी सेनाओंसे सुरक्षित होकर (सन्धि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव और समाश्रय--इन) छ: गुणोंका यथावसर उपयोग करते

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अध्याय २३

श्लोक 118

शांतनुस् त्व् अभवद् राजा कौरवाणां धुरंधरः

śāṃtanus tv abhavad rājā kauravāṇāṃ dhuraṃdharaḥ

हिन्दी अर्थ

रहते हैं॥ ८॥ सभी नरेश धरनुर्वेदके अभ्यासमें तत्पर हैं, सभी वेदोंके परिनिष्ठित विद्वान् हैं और यथासमय प्रचुर दक्षिणायुक्त यज्ञोंद्वारा भगवानकी आराधना करते रहते हैं॥९॥ वे दीक्षा ग्रहण एवं ब्रह्मचर्यके पालनपूर्वक वेदोंका अध्ययन करके महर्षियोंको तथा पवित्र श्राद्ध- कर्मोद्वारा सैकड़ों बार पितरोंको तृप्त करते रहते हैं भूतलपर जो वैदिक, लौकिक तथा धर्मशास्त्रकथित तीन प्रकारके कर्म दृष्टिगोचर होते हैं, उनमेंसे कोई भी कर्म इन राजाओंको अज्ञात नहीं है॥११॥ उन्हें परावर- तत्त्वका साक्षात्कार हो चुका है। वे सभी नरेश महर्षियोंके समान तेजस्वी हैं और पुनः इस पृथ्वीपर सत्ययुगको लानेका उत्साह रखते हैं॥ १२॥ उन्हींके प्रभावसे देवराज इन्द्र जगत्में कल्याणकारी जलकी वर्षा करते हैं, वायु यथोचित गतिसे प्रवाहित होती है और दसों दिशाएँ

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अध्याय २३

श्लोक 119

शांतनोःसंप्रवक्ष्यामि यत्र जातो ऽसि पार्थिव ॥ गाङ्गं देवव्रतं नाम पुत्रं सो ऽजनयत् प्रभुः ।स तु भीष्म इति ख्यातः पाण्डवानां पितामहः ।काली विचित्रवीर्यं तु जनयाम् आस भारत शांतनोर् दयितं पुत्रं धर्मात्मानम् अकल्मषम्

śāṃtanoḥsaṃpravakṣyāmi yatra jāto 'si pārthiva || gāṅgaṃ devavrataṃ nāma putraṃ so 'janayat prabhuḥ | sa tu bhīṣma iti khyātaḥ pāṇḍavānāṃ pitāmahaḥ | kālī vicitravīryaṃ tu janayām āsa bhārata śāṃtanor dayitaṃ putraṃ dharmātmānam akalmaṣam

हिन्दी अर्थ

स्वच्छ रहती हैं ॥ १३ ॥ पृथ्वीपर कोई उत्पात नहीं होता, आकाशमें सभी ग्रह समुचित गतिसे विचरण करते हैं तथा नक्षत्रोंसहित चन्द्रमा भी उनके साथ संयुक्त होकर सौम्यगतिसे विचरण कर रहे हैं॥ १४॥ जगतू्के लिये अनुकूल किरणोंसे युक्त हुए भगवान् सूर्य दोनों अयनोंमें विचरते हैं तथा उत्तम गन्धसे सुवासित अग्निदेव नाना प्रकारके हविष्योंकी आहुति पाकर तृप्त होते हैं जब इस प्रकार राजालोग भलीभाँति सत्कमोमें प्रवृत्त हैं, यज्ञ आदि कर्म दिनोंदिन बढ़ रहे हैं और वे नरेश समस्त भूमण्डलको निरन्तर तृप्त एवं संतुष्ट कर रहे हैं, तब मनुष्योंको कालका भय कैसे हो सकता है! तेषां ज्वलितकीर्तीनामन्योन्यवशवर्तिनाम्। राज्ञां बलैर्बलवतां पीड्यते वसुधातलम्

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अध्याय २३

श्लोक 120

कृष्णद्वैपायनच् चैव क्षेत्रे वैचित्रवीर्यके धृतराष्ट्रं च पाण्डुं च विदुरं चाप्य् अजीजनत्

kṛṣṇadvaipāyanac caiva kṣetre vaicitravīryake dhṛtarāṣṭraṃ ca pāṇḍuṃ ca viduraṃ cāpy ajījanat

हिन्दी अर्थ

सेयं भारपरिश्रान्ता पीड्यमाना नराधिपैः। पृथिवी समनृप्राप्ता नौरिवासन्नविप्लवा पुरे पुरे नरपतिः कोटिसंख्यर्बलै्वृतः। राष्ट्र राष्ट्र च बहवो ग्रामा: शतसहस्त्रश: सेयं निरामयं कृत्वा निश्चेष्ठा कालमग्रतः। प्राप्ता ममालयं विष्णो भवांश्वास्या: परा गतिः कर्मभूमिर्मनुष्याणां भूमिरेषा व्यथां गता। यथा न सीदेत् तत् कार्य जगत्येषा हि शाश्वती

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अध्याय २३

श्लोक 121

धृतराष्ट्रस् तु गान्धार्यां पुत्रानजनयच् छतम् ।तेषां दुर्योधनः श्रेष्ठः सर्वेषाम् एव स प्रभुः ।पाण्डोर् धनंजयः पुत्रः सौभद्रस् तस्य चात्मजः अभिमन्योः परीक्षित् तु पिता तव जनेश्वर

dhṛtarāṣṭras tu gāndhāryāṃ putrānajanayac chatam | teṣāṃ duryodhanaḥ śreṣṭhaḥ sarveṣām eva sa prabhuḥ | pāṇḍor dhanaṃjayaḥ putraḥ saubhadras tasya cātmajaḥ abhimanyoḥ parīkṣit tu pitā tava janeśvara

हिन्दी अर्थ

क्रियालोपश्च लोकानां पीडित॑ च जगद् भवेत् सत्पथे हि स्थिताः सर्वे राजानो राष्ट्रवर्धना:। नराणां च त्रयो वर्णा ब्राह्मणाननुयायिन: “परंतु जिनकी कीर्ति सब ओर जगमग हो रही है तथा जो एक-दूसरेके वशवर्ती होकर मेल-मिलापसे रहते हैं, उन बलवान् राजाओंके पास जो असंख्य सेनाएँ हैं, उनके भारसे पृथ्वीको बड़ी पीड़ा हो रही है इस प्रकार भारसे थकी हुई यह पृथ्वी उन नरेशोंसे पीड़ित होकर आपकी शरणमें आयी है। इसकी दशा उस नावकी-सी हो रही है, जिसके डूबनेका समय अत्यन्त निकट हो॥ १८ ॥ उन राजाओंके रूप प्रलयकालकी

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अध्याय २३

श्लोक 122

एष ते पौरवो वंशो यत्र जातो ऽसि पार्थिव तुर्वसोस् तु प्रवक्ष्यामि द्रुह्योश् चानोर् यदोस् तथा

eṣa te pauravo vaṃśo yatra jāto 'si pārthiva turvasos tu pravakṣyāmi druhyoś cānor yados tathā

हिन्दी अर्थ

अग्निके समान तेजस्वी हैं। उनसे पीड़ित होनेके कारण इस पृथ्वीके पर्वतरूपी बन्धन ढीले पड़ने लगे हैं अर्थात् इस नौकारूपिणी पृथ्वीमें जो कीलें ठुकी हुई थीं, वे अब उखड़ने लगी हैं, अतः यह रसातलकी जलराशिमें डूबनेकी आशड्डासे व्याकूुल हो उठी है और इसके शरीरमें बारम्बार पसीना आ रहा है॥ १९॥ क्षत्रियोंके शरीर, तेज और बलसे तथा मनुष्योंके दूरतक फैले हुए राज्योंसे यह पृथ्वी थकती-सी जा रही है॥ २०॥ नगर- नगरमें वहाँका नरेश एक-एक करोड़ सैनिकोंसे सम्पन्न है तथा प्रत्येक राज्यमें कई लाख ग्राम हैं॥ २१॥ सहसरों भूपालों, उन बलवान भूपालोंकी सेनाओं तथा दस-दस हजार गाँवोंसे युक्त उनके राष्ट्रोंसो यह भूमि इतनी भर गयी है कि कहीं थोड़ी-सी भी जगह खाली नहीं है॥ २२॥ विष्णुदेव! यह पृथ्वी निश्वेष्ट होकर निरामय कालको आगे करके मेरे निवासस्थानमें आयी थी। अब आप इसकी परम गति हैं॥ २३॥ जगत्की आधारभूता

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अध्याय २३

श्लोक 123

तुर्वसोस् तु सुतो वह्निर् वह्नेर् गोभानुर् आत्मजः गोभानोस् तु सुतो राजा त्रिशानुर् अपराजितः

turvasos tu suto vahnir vahner gobhānur ātmajaḥ gobhānos tu suto rājā triśānur aparājitaḥ

हिन्दी अर्थ

यह सदा रहनेवाली भूमि, जो मनुष्योंकी कर्मभूमि है, बड़ा कष्ट पा रही है। यह अधिक भारके कारण दबकर बिखर न जाय, ऐसा कोई उपाय करना चाहिए मधुसूदन! इसके पीड़ित होनेपर महान् दोष प्राप्त हो सकता है। सब लोगोंकी सारी क्रियाएँ लुप्त हो जायँगी यह राजाओंके भारी सैन्यसमुदायसे पीड़ित होकर थकती चली जा रही है। यह बात इसीसे स्पष्ट है कि यह अचला भूमि अपनी स्वाभाविक क्षमाको त्यागकर विचलित हो उठी है॥ २६॥ हमने इसीसे इसकी सारी बातें सुनी हैं और आपने भी उन्हें सुन लिया, अतः हम इसका भार दूर करनेके लिये आपके साथ मन्त्रणा (विचार) करना चाहते हैं॥ २७॥ भूतलके समस्त राजा सम्मार्गमें स्थित हो अपने राष्ट्रोंकी वृद्धि कर रहे हैं। मनुष्योंके

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अध्याय २३

श्लोक 124

करंधमस् तु त्रिशानोर् मरुत्तस् तस्य चात्मजः अन्यस् त्व् आविक्षितो राजा मरुत्तः कथितस् तव

karaṃdhamas tu triśānor maruttas tasya cātmajaḥ anyas tv āvikṣito rājā maruttaḥ kathitas tava

हिन्दी अर्थ

क्षत्रिय आदि तीनों वर्ण ब्राह्मणोंके अनुगामी हैं' सर्व सत्यपरं वाक्य वर्णा धर्मपरास्तथा। सर्वे बेदपरा विप्रा: सर्वे विप्रपया नराः एवं जगति वर्तन्ते मनुष्या धर्मकारणात्। यथा धर्मवधो न स्यातू तथा मन्त्र: प्रवर्त्सताम् सतां गतिरियं नान्‍्या धर्म श्चास्या: सुसाधनम्। राज्ञां चैव वधः कार्यो धरण्या भारनिर्णये

English

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अध्याय २३

श्लोक 125

अनपत्यो ऽभवद् राजा यज्वा विपुलदक्षिणः दुहिता संमता नाम तस्यासीत् पृथिवीपतेः

anapatyo 'bhavad rājā yajvā vipuladakṣiṇaḥ duhitā saṃmatā nāma tasyāsīt pṛthivīpateḥ

हिन्दी अर्थ

तदागच्छ महाभाग सह वै मन्त्रकारणात्। ब्रजामो मेरुशिखरं पुरस्कृत्य वसुंधराम् एतावदुक्त्वा राजेन्द्र ब्रह्मा लोकपितामह:ः । पृथिव्या सह विश्वात्मा विरराम महाद्युति: “'मनुष्योंकी सारी बातें सत्यके ही आश्रित हैं। सभी वर्ण अपने-अपने धर्ममें तत्पर हैं। समस्त ब्राह्मण वेदोंके स्वाध्यायमें लगे हुए हैं तथा सभी मनुष्य ब्राह्मणोंकी सेवामें संलग्न रहते हैं॥ २९ ॥ इस प्रकार संसारके सभी मानव धर्मपूर्वक बर्ताव करते हैं। अतः ऐसी कोई

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अध्याय २३

श्लोक 126

दक्षिणार्थं हि सा दत्ता संवर्ताय महात्मने दुःषन्तं पौरवं चापि लेभे पुत्रम् अकल्मषम्

dakṣiṇārthaṃ hi sā dattā saṃvartāya mahātmane duḥṣantaṃ pauravaṃ cāpi lebhe putram akalmaṣam

हिन्दी अर्थ

परंतु धर्मको हानि न पहुँचे॥३०॥ यही सत्पुरुषोंकी गति है, दूसरी नहीं और धर्म ही इसका उत्तम साधन है। इस पृथ्वीका भार दूर करनेके लिये राजाओंका बध आवश्यक कार्य है॥ ३१॥ अतः महाभाग! आइये, हम सब लोग इस विषयपर एक साथ विचार करनेके लिये पृथ्वीको आगे करके मेरुपर्वतके शिखरपर चलें' महाराज जनमेजय ! सम्पूर्ण विश्वके आत्मा महातेजस्वी लोकपितामह ब्रह्मा, जो पृथ्वीके साथ आये थे, भगवान्से इतनी बात कहकर चुप हो गये इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वणि भारावतरणे एकपश्ञाशत्तमो5ध्याय:

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अध्याय २३

श्लोक 127

एवं ययातेः शापेन जरासंक्रमणे तदा पौरवं तुर्वसोर् वंशः प्रविवेश नृपोत्तम

evaṃ yayāteḥ śāpena jarāsaṃkramaṇe tadā pauravaṃ turvasor vaṃśaḥ praviveśa nṛpottama

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत हरिवंशपर्वमें ( एथ्वी-) भारावतरणविषयक इक्यावनवाँ अध्याय पूरा हुआ भगवान् विष्णु तथा सब देवताओंका मेरुपर्वतकी दिव्य सभामें उपस्थित होना और वहाँ पृथ्वीका भगवानूसे भार उतारनेके लिये प्रार्थना करना प्रतस्थे दुर्दिनाकार: सदुर्दिन इवाचल: पीते वसानो वसने लोकानां गुरुरव्ययः। हरि: सो5भवदालक्ष्य: स संध्या भ्र हवाचल:

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अध्याय २३

श्लोक 128

दुःषन्तस्य तु दायादः शरुत्थामः प्रजेश्वरः शरुत्थामाद् अथाक्रीडश् चत्वारस् तस्य चात्मजाः

duḥṣantasya tu dāyādaḥ śarutthāmaḥ prajeśvaraḥ śarutthāmād athākrīḍaś catvāras tasya cātmajāḥ

हिन्दी अर्थ

बैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय ! तब “बहुत अच्छा' कहकर भगवान् विष्णु उन सबके साथ वहाँसे चल दिये। उनकी वाणी वर्षाकालके मेघकी भाँति गम्भीर थी, उनका श्रीविग्रह मेघके समान श्याम था तथा वे मेघयुक्त पर्वतके समान जान पड़ते थे॥१॥ उनका जटामण्डलमण्डित उदरभाग मुक्तामणियोंकी मालासे उद्दीतत होकर चन्द्रमाकी प्रभासे युक्त मेघके समान कान्ति धारण करता था। उस उदरको धारण करनेवाले भगवान् श्रीहरि अपूर्व शोभासे सम्पन्न दिखायी देते थे उनके विस्तृत वक्ष:स्थलमें उठी हुई रोमावलियोंसे युक्त शोभाशाली श्रीवत्स दोनों स्तनोंके मुखतक फैलकर

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अध्याय २३

श्लोक 129

पाण्ड्यश् च केरलश् चैव कोलश् चोलश् च पार्थिवः तेषां जनपदाः स्फीताः पाण्ड्यश् चोलश् च केरलाः

pāṇḍyaś ca keralaś caiva kolaś colaś ca pārthivaḥ teṣāṃ janapadāḥ sphītāḥ pāṇḍyaś colaś ca keralāḥ

हिन्दी अर्थ

सम्पूर्ण जगत्के गुरु अविनाशी भगवान् विष्णु संध्याकालिक मेघोंसे युक्त पर्वतके समान मनोहर दिखायी देते थे नातिदीर्घेण कालेन सम्प्राप्ता रत्नपर्वतम्। ददृशुर्देवतास्तत्र तां सभां कामरूपिणीम् काञ्जनस्तम्भरचितां वज्संधानतोरणाम् रत्नजालान्तरवतीं कामगां रत्नभूषिताम्

English

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अध्याय २३

श्लोक 130

द्रुह्योस् तु तनयो राजन् बभ्रुसेनश् च पार्थिवः अङ्गारसेतुस् तत्पुत्रो मरुतां पतिर् उच्यते

druhyos tu tanayo rājan babhrusenaś ca pārthivaḥ aṅgārasetus tatputro marutāṃ patir ucyate

हिन्दी अर्थ

क्लृप्तरन्नसमाकीर्णा सर्वर्तुकुसुमोत्कटाम् । देवमायाधरां दिव्यां विहितां विश्वकर्मणा बभाषे धरणी वाक्यं खेदातू करुणभाषिणी त्वया धार्या त्वहं देव त्वया वै धार्यते जगत् । त्वं धारयसि भूतानि भुवनानि बिभर्षि च त्वया धृतं धारयामि नाधृतं धारयाम्यहम्। नहि तद् विद्यते भूतं यत् त्वया नानुधार्यते

English

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अध्याय २३

श्लोक 131

यौवनाश्वेन समरे कृच्छ्रेण निहतो बली युद्धं सुमहद् आसीद् धि मासान् परि चतुर्दश

yauvanāśvena samare kṛcchreṇa nihato balī yuddhaṃ sumahad āsīd dhi māsān pari caturdaśa

हिन्दी अर्थ

ब्रह्माजीके पीछे-पीछे गरुड़पर बैठकर यात्रा करते हुए उन भगवान् नारायणका सभी देवता अनुसरण कर रहे थे। उन सबके नेत्र उन्हींकी ओर लगे हुए थे थोड़े ही समयमें सब देवता रत्नमय मेरुपर्वतपर आ पहुँचे। वहाँ उन्होंने ब्रह्मजीकी उस सभाको देखा, जो इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली थी॥६॥ मेरुपर्वतके शिखरपर स्थापित हुई वह दिव्य सभा सूर्यके समान तेजसे सम्पन्न थी। उसमें सोनेके खंभे लगे थे तथा उसके 'फाटकमें रत्न जड़े हुए थे॥७॥ मानसिक संकल्पके अनुसार स्वतः निर्मित हुए विचित्र चित्र उसकी शोभा बढ़ाते थे। सैकड़ों विमानोंकी पंक्तियाँ वहाँ विराजमान थीं। उसमें रत्नोंके बने झरोखे लगे थे। वह इच्छानुसार विचरण करनेवाली सभा नाना प्रकारके दिव्य रत्रोंसे सजी हुई थी॥८॥ उसमें बहुमूल्य रत्न जड़े हुए थे। सभी ऋतुओंके फूलोंसे वह व्याप्त थी। उस दिव्य

English

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अध्याय २३

श्लोक 132

अङ्गारस्य तु दायादो गान्धारो नाम पार्थिवः ख्यायते यस्य नाम्ना वै गान्धारविषयो महान् गान्धारदेशजाश् चैव तुरगा वाजिनां वराः

aṅgārasya tu dāyādo gāndhāro nāma pārthivaḥ khyāyate yasya nāmnā vai gāndhāraviṣayo mahān gāndhāradeśajāś caiva turagā vājināṃ varāḥ

हिन्दी अर्थ

सभाका निर्माण साक्षात् विश्वकर्मने किया था। वह कल्याणमयी सभामें प्रविष्ट हुए और यथायोग्य स्थानपर विधिपूर्वक बैठे ॥ १० ॥ वे वहाँ योग्यतानुसार बताये हुए विमानों, आसनों, भद्रासनों, पीठों, कालीनों तथा दूसरे- दूसरे बिछौनोंपर विराजमान हुए॥ ११॥ तब ब्रह्माजीके भलीभाँति आज्ञा देनेपर अपने वेगसे बड़े-बड़े वृक्षोंको तोड़ देनेवाले वायुदेव उठे और “कोई एक शब्द भी मुँहसे न निकाले। सब लोग मौन रहें।' ऐसा कहते हुए सारी सभामें सब ओर घूम आये ॥ १२॥ जब देवताओंका वह समुदाय भलीभाँति नीरव तथा निस्तब्ध हो गया, तब वहाँ करुणाजनक वचन बोलनेवाली पृथ्वीने दुःखपूर्वक यह बात कही

English

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अध्याय २३

श्लोक 133

अनोस् तु पुत्रो धर्मो ऽभूद् धृतस् तस्यात्मजो ऽभवत् धृतात् तु दुदुहो जज्ञे प्रचेतास् तस्य चात्मजः प्रचेतसः सुचेतास् तु कीर्तिता ह्य् अनवो मया

anos tu putro dharmo 'bhūd dhṛtas tasyātmajo 'bhavat dhṛtāt tu duduho jajñe pracetās tasya cātmajaḥ pracetasaḥ sucetās tu kīrtitā hy anavo mayā

हिन्दी अर्थ

पृथ्वी बोली--देव ! (मैं रसातलमें धसी जा रही हूँ अत:) आप मुझे धारण करें; क्योंकि आपके आधारपर ही यह सम्पूर्ण जगत् टिका हुआ है। आप ही समस्त भूतोंको धारण और सभी भुवनोंका भरण-पोषण करते हैं॥ १४॥ आप अपने ही तेज और बलसे जो कुछ भी धारण करते हैं, उसीको आपके प्रसादसे मैं भी यत्रपूर्वक धारण करती हूँ॥ १५॥ आपके धारण किये हुएको ही मैं धारण करती हूँ। जिसे आपने धारण न कर रखा हो, ऐसी कोई वस्तुको मैं धारण नहीं करती। ऐसा कोई भूत नहीं है, जिसे आप निरन्तर धारण न करते हों त्वमेव कुरुषे देव नारायण युगे युगे। मम भारावतरणं जगतो हितकाम्यया

English

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अध्याय २३

श्लोक 134

यदोर् वंशंप्रवक्ष्यामि ज्येष्ठस्योत्तमतेजसः ।विस्तरेणनुपूर्व्या च गदतो मे निशामय ।यस्य श्रवणमात्रेण पातकेभ्यःप्रमुच्यते ।बभूवुस् तु यदोः पुत्राः पञ्च देवसुतोपमाः सहस्रदः पयोदश् च क्रोष्टा नीलो ऽञ्जिकस् तथा

yador vaṃśaṃpravakṣyāmi jyeṣṭhasyottamatejasaḥ | vistareṇanupūrvyā ca gadato me niśāmaya | yasya śravaṇamātreṇa pātakebhyaḥpramucyate | babhūvus tu yadoḥ putrāḥ pañca devasutopamāḥ sahasradaḥ payodaś ca kroṣṭā nīlo 'ñjikas tathā

हिन्दी अर्थ

कर्णस््रोतोद्धवी तौ हि विष्णोरस्य महात्मन:। महार्णवे प्रस्वपत: काष्टकुण्ड्यूसमौ स्थितौ वायुप्राणौ तु तो गृह्य ब्रह्मा पर्यमृशच्छनै: । एकं मृदुतरं मेने कठिनं वेद चापरम् तौ हैत्यौ कृतनामानौ चेरतुर्बलदर्पितौ। सर्वमेकार्णवं लोक॑ योद्धुकामौ सुदुर्जयौ तावागतौ समालोक्य ब्रह्म लोकपितामहः । एकार्णवाम्बुनिचये.तत्रैवान्तरधीयत

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अध्याय २३

श्लोक 135

सहस्रदस्य दायादास् त्रयः परमधार्मिकाः शतजिन् नाम पार्थिवः ।शतजितः सुताः ख्यातास् ।हेहयश् च हयश् चैव राजन् वेणुहयस् तथा

sahasradasya dāyādās trayaḥ paramadhārmikāḥ śatajin nāma pārthivaḥ | śatajitaḥ sutāḥ khyātās | hehayaś ca hayaś caiva rājan veṇuhayas tathā

हिन्दी अर्थ

रोचयामास वसतिं गुद्मां ब्रह्मा चतुर्मुख: अथ दीर्घस्य कालस्य तावुभौ मधुकैटभौ। आजम्मतुस्तमुद्देशं यत्र ब्रह्मा व्यवस्थित: देव! नारायण! आप ही प्रत्येक युगमें जगत्के हितकी कामनासे मेरा भार उतारते हैं॥ १७॥ सुरश्रेष्ठ । आपहीके तेजसे आक्रान्त होकर मैं रसातलको जा पहुँची हूँ और अपने उद्धारके लिये आपकी ही शरणमें आयी हूँ। आप मेरी रक्षा करें॥१८॥ दानवों तथा दुरात्मा राक्षसोंसे पीड़ित होकर मैं सदा आप सनातन पुरुषकी ही शरणमें आती हूँ और आती रहूँगी

English

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अध्याय २३

श्लोक 136

हेहयस्याभवत् पुत्रो धर्मनेत्र इति श्रुतः धर्मनेत्रस्य कान्तस् तु कान्तपुत्रास् ततो ऽभवन्

hehayasyābhavat putro dharmanetra iti śrutaḥ dharmanetrasya kāntas tu kāntaputrās tato 'bhavan

हिन्दी अर्थ

मुझे तभीतक अधिक भय रहता है, जबतक कि मैं अपना भार धारण करनेवाले आप परमेश्वरकी मनसे शरण नहीं लेती हूँ। इस बातको मैं सैकड़ों बार देख चुकी हूँ॥ २०॥ पुरातन युगके प्रारम्भकालमें कमलयोनि ब्रह्माजीने मुझे जलके ऊपर स्थापित किया था और मेरी मृत्तिकाको मुट्ठीमें बाँधकर उसके द्वारा पहले दो बड़े- बड़े असुरोंकी मूर्तियाँ बनायीं॥ २१॥ वे दोनों पहले- पहल महासागरमें सोते हुए इन महात्मा भगवान् विष्णुके कानोंकी मैलसे उत्पन्न हुए थे और काठ एवं दीवारके समान अचेतन अवस्थामें स्थित थे (इन्हींकी आकृतियोंको भगवानने मिट्टीसे सँवारा था)॥ २२॥ फिर ब्रह्माजीकी उत्तम प्रेरणासे स्वयं वायुदेवने उनके भीतर प्रवेश किया। इसके बाद वे दोनों महान् असुर आकाशको आच्छादित करते हुए बढ़ने लगे॥ २३॥ वायुरूपी प्राणसे युक्त हुए उन दोनों असुरोंको गोदमें लेकर ब्रह्माजीने उनके अज्जोंपर धीरे-धीरे हाथ फेरा। उनमेंसे एकका शरीर तो उन्हें

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अध्याय २३

श्लोक 137

साहञ्जस्य महिष्मांस् तु भद्रश्रेण्यश् चतत्सुतः ।साहञ्जनी नामपुरी तेन राज्ञा निवेशिता ॥ साहञ्जस्य तु दायादो महिष्मान् नाम पार्थिवः ।माहिष्मती नाम पुरी येन राज्ञा निवेशिता ॥ आसीन् महिष्मतः पुत्रो भद्रश्रेण्यः प्रतापवान् ।वाराणस्यधिपो राजा कथितः पूर्वम् एव तु ।भद्रश्रेण्यस्य दायादो दुर्दमो नाम विश्रुतः ॥ दुर्दमस्य सुतो धीमान् कनको नाम नामतः ।कनकस्य तु दायादाश् चत्वारो लोकविश्रुताः ।कृतवीर्यः कृतौजाश् च कृतधन्वा तथैव च कृताग्निश् च चतुर्थो ऽभूत् कृतवीर्यात् तथार्जुनः

sāhañjasya mahiṣmāṃs tu bhadraśreṇyaś catatsutaḥ | sāhañjanī nāmapurī tena rājñā niveśitā || sāhañjasya tu dāyādo mahiṣmān nāma pārthivaḥ | māhiṣmatī nāma purī yena rājñā niveśitā || āsīn mahiṣmataḥ putro bhadraśreṇyaḥ pratāpavān | vārāṇasyadhipo rājā kathitaḥ pūrvam eva tu | bhadraśreṇyasya dāyādo durdamo nāma viśrutaḥ || durdamasya suto dhīmān kanako nāma nāmataḥ | kanakasya tu dāyādāś catvāro lokaviśrutāḥ | kṛtavīryaḥ kṛtaujāś ca kṛtadhanvā tathaiva ca kṛtāgniś ca caturtho 'bhūt kṛtavīryāt tathārjunaḥ

हिन्दी अर्थ

अत्यन्त कोमल प्रतीत हुआ और दूसरेका कठोर तब जलजजन्मा भगवान् ब्रह्माने उन दोनोंका नामकरण- संस्कार किया और कहा--यह जो मृदु (कोमल) है, इसका नाम “मधु' होगा और जो कठोर है, वह 'कैटभ' अत्यन्त दुर्जय हैत्य बलके घमंडसे मतवाले होकर युद्धकी इच्छासे समस्त एकार्णव जगतूमें विचरने लगे॥ २६॥ उन दोनोंको युद्धेके लिये आया देख लोकपितामह ब्रह्मा वहीं एकार्णवकी जलराशिमें अदृश्य हो गये॥ २७॥ उन चतुर्मुख ब्रह्माने भगवान् पद्मनाभकी नाभिके मध्यभागसे प्रकट हुए कमलपर ही गुप्तरूपसे निवास करना पसंद किया॥ २८॥ वे दोनों भगवान् नारायण और ब्रह्मा जलके भीतर स्थित हो बहुत वर्षोतक

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अध्याय २३

श्लोक 138

यः स बाहुसहस्रेण सप्तद्वीपेश्वरो ऽभवत् जिगाय पृथिवीम् एको रथेनादित्यवर्चसा

yaḥ sa bāhusahasreṇa saptadvīpeśvaro 'bhavat jigāya pṛthivīm eko rathenādityavarcasā

हिन्दी अर्थ

सोते रहे । कभी हिलेतक नहीं ॥ २९ ॥ तदनन्तर दीर्घकाल व्यतीत होनेके पश्चात् वे दोनों भाई मधु और कैटभ उस स्थानपर आये, जहाँ ब्रह्माजी विराजमान थे दूष्ठा तावसुरौ घोरौ महाकायौ दुरासदौ। ब्रह्मणा ताडितो विष्णु: पद्मनालेन वै तदा। उत्पपाताथ शयनातू पद्मानाभो महाद्युति: एकार्णवे तदा लोके त्रैलोक्ये जलतां गते अथातो दीर्घकालस्थ तौ हैत्यौ युद्धदुर्मदौ । ऊचतुः प्रीतमनसौ देवं नारायणं हरिम्

English

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अध्याय २३

श्लोक 139

स हि वर्षशतं तप्त्वा तपः परमदुश्चरम् दत्तम् आराधयाम् आस कार्तवीर्यो ऽत्रिसंभवम्

sa hi varṣaśataṃ taptvā tapaḥ paramaduścaram dattam ārādhayām āsa kārtavīryo 'trisaṃbhavam

हिन्दी अर्थ

स तु गृह मृधे दोर्भ्या हैत्यौ तावभ्यपीडयत्। जम्मतुर्निधनं चापि तावुभौ मधुकैटभौ नारायणश्न भगवान् असृजत् स पुनः प्रजा: देत्ययोमेंदसाच्छन्ना मेदिनीति ततः स्मृता। प्रभावात् पद्मनाभस्य शा श्वती जगती कृता विषाणेनाहमेकेन तोयमध्यात् समुद्धृता

English

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अध्याय २३

श्लोक 140

तस्मै दत्तो वरान् प्रादाच् चतुरो भूरितेजसः पूर्वं बाहुसहस्रं तु प्रार्थितं परमं वरम्

tasmai datto varān prādāc caturo bhūritejasaḥ pūrvaṃ bāhusahasraṃ tu prārthitaṃ paramaṃ varam

हिन्दी अर्थ

बले: सकाशाद् हैत्यस्य विष्णुना प्रभविष्णुना उन दुर्जय, विशालकाय एवं भयंकर असुरोंको देखकर ब्रह्माजीनी कमलकी नालसे भगवानू विष्णुको ठोंका (उन्हें जग जानेके लिये संकेत किया)। तब महातेजस्वी भगवान् पद्मनाभ शय्यासे उछलकर खड़े हो गये ॥ ३१॥ उस एकार्णव जगतूमें, जब कि तीनों लोक जलमें मिल गये थे, उन दोनों असुरों तथा भगवान् विष्णुमें घोर युद्ध हुआ॥ ३२ ॥ उस समय सहसीरों वर्षोतक वह तुमुल युद्ध चलता रहा, किंतु वे दोनों असुर युद्धमें थके नहीं॥ ३३॥ दीर्घकालतक युद्ध करके वे दोनों रणदुर्मद हैत्य मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए और भगवान् नारायण हरिसे इस प्रकार बोले-- ॥ ३४ ॥ “देव ! तुम्हारे युद्धसे हम दोनों भाई बहुत प्रसन्न हैं। तुम हमारे लिये

English

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अध्याय २३

श्लोक 141

अधर्मे धीयमानस्य सद्भिः स्यान् मे निबर्हणम् उग्रेण पृथिवीं जित्वा धर्मेणैवानुरञ्जनम्

adharme dhīyamānasya sadbhiḥ syān me nibarhaṇam ugreṇa pṛthivīṃ jitvā dharmeṇaivānurañjanam

हिन्दी अर्थ

स्पृहणीय मृत्यु हो; किंतु हम दोनोंको वहीं मारो, जहाँकी पृथ्वी जलमें डूबी हुई न हो॥ ३५॥ सुरश्रेष्ठ! मारे जानेपर हम दोनों आपके पुत्रभावको प्राप्त होंगे; क्योंकि ब्रह्माजीने विधान बना दिया है कि जो हमें युद्धमें जीत ले, हम उसीके पुत्र हों'॥३६॥ उनकी बात सुनकर भगवान् विष्णुने उस युद्धस्थलमें उन हैत्योंको दोनों हाथोंसे पकड़कर दबाया। इससे मधु और कैटभ दोनोंकी मृत्यु हो गयी॥ ३७॥ मरनेपर उन दोनोंकी लाशें जलमें डूबकर एक हो गयीं। फिर जलकी लहरोंसे मथित होकर उन दोनों हैत्योंने जो मेद छोड़ा, उससे आच्छादित होकर वहाँका जल अदृश्य हो गया। उसीपर भगवान् नारायणने नाना प्रकारके जीवोंकी सृष्टि की उन हैत्योंके मेदसे सारी पृथ्वी ढक गयी, इसलिये “'मेदिनी ' नामसे विख्यात हुई। भगवान् पद्मनाभके प्रभावसे यह जगत्के लिये शाश्रत आधार बन गयी

English

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अध्याय २३

श्लोक 142

संग्रामान् सुबहूञ् जित्वा हत्वा चारीन् सहस्रशः संग्रामे वर्तमानस्य वधं चाभ्यधिकाद् रणे

saṃgrāmān subahūñ jitvā hatvā cārīn sahasraśaḥ saṃgrāme vartamānasya vadhaṃ cābhyadhikād raṇe

हिन्दी अर्थ

पूर्वकालमें वाराहरूप धारण करके इन्हीं भगवान् नारायणने मार्कण्डेयजीके देखते-देखते मुझे एक दाढ़पर उठाकर पानीके भीतरसे बाहर निकाला था॥४१॥ फिर उस दिन आपलोगोंके सामने ही प्रभावशाली भगवान् विष्णुने अपने पग बढ़ाकर त्रिलोकीको नापते हुए मुझे हैत्यराज बलिके पाससे छीन लिया ॥ ४२॥ इस समय भी अत्यन्त कष्टमें पड़कर अनाथ-सी हो रही हूँ और इन्हीं शरणागतवत्सल जगन्नाथ गदाधरकी शरणमें आयी हूँ अग्नि सुवर्णका गुरु है। सूर्य समस्त किरणोंके गुरु माने गये हैं। नक्षत्रोंके गुरु चन्द्रमा हैं, परंतु मेरे गुरु ये भगवान् नारायण ही हैं यदहं धारयाम्येका जगत् स्थावरजड्भमम्। मया धृतं धारयते सर्वमेतद् गदाधर:

English

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अध्याय २३

श्लोक 143

तस्य बाहुसहस्रं तु युध्यतः किल भारत योगाद् योगेश्वरस्याग्रे प्रादुर्भवति मायया

tasya bāhusahasraṃ tu yudhyataḥ kila bhārata yogād yogeśvarasyāgre prādurbhavati māyayā

हिन्दी अर्थ

स मां ब्रह्मर्षिरप्याह किमुर्वि त्वमवाडन्मुखी। वीरपल्लीत्रतमिदं धारयन्ती विषीदस्सि साहं विज्ञापितवती कश्यपं लोकभावनम्। पतयो मे हता ब्रह्मन् भार्गवेण महात्मना स श्रुत्वा भगवान् वाक्य बाढमित्यब्रवीत् प्रभु: । ततो मां मानवेन्द्राय मनवे स प्रदत्तवान् अकेली मैं जिस चराचर जगत्को धारण करती हूँ, मेरे द्वारा धारण किये गये इस समस्त जगत्को (तथा मुझे भी) भगवान् गदाधर ही धारण करते हैं

English

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अध्याय २३

श्लोक 144

तेनेयं पृथिवी कृत्स्ना सप्तद्वीपा सपत्तना ससमुद्रा सनगरा उग्रेण विधिना जिता

teneyaṃ pṛthivī kṛtsnā saptadvīpā sapattanā sasamudrā sanagarā ugreṇa vidhinā jitā

हिन्दी अर्थ

इन्होंने ही जमदग्रिनन्दन परशुरामके रूपमें प्रकट होकर मेरा भार उतारनेकी इच्छासे रोषपूर्वक मुझे इक्कीस बार क्षत्रियोंसे रहित किया था॥४६॥ मैं वही हूँ, जिसे रणयज्ञकी वेदीमें प्रतिष्ठित करके भृगुनन्दन परशुरामने राजाओंके रक्तसे तृत्त किया था और पिताके श्राद्धमें महर्षि कश्यपको मेरा दान कर दिया था॥४७॥ मैं क्षत्रियोंक रक्तसे भीगी हुई थी। मेरे शरीरसे (मरे हुए राजाओंके) मांस, मेद और अस्थियोंकी दुर्गन्ध फैल रही थी। उसी दशामें रजस्वला युवतीकी भाँति मैं महर्षि कश्यपकी सेवामें उपस्थित हुई ॥ ४८ ॥ उस समय बत्रह्मर्षि कश्यपने मुझसे कहा--'वसुधे ! क्या कारण है, तू नीचे मुख किये वीर-पत्नीके इस ब्रतको धारण करके विषादमें डूबी हुई है?॥४९॥ उस समय मैंने लोकपिता कश्यपजीको यह सूचित किया--ब्रह्मन्! महात्मा परशुरामने मेरे पतियोंको मार डाला है॥ ५० ॥ शस्त्रग्रहण ही जिनकी जीविकाका साधन था, उन पराक्रमी क्षत्रियोंसे हीन

English

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अध्याय २३

श्लोक 145

तेन सप्तसु द्वीपेषु सप्त यज्ञशतानि वै प्राप्तानि विधिना राज्ञा श्रूयन्ते जनमेजय

tena saptasu dvīpeṣu sapta yajñaśatāni vai prāptāni vidhinā rājñā śrūyante janamejaya

हिन्दी अर्थ

होकर मैं विधवा हो गयी हूँ। मेरे सारे नगर राजाओंसे शून्य हो गये हैं, अतः अब मुझमें जीवित रहनेका उत्साह नहीं रह गया है ॥ ५१॥ अतः भगवन्! मुझे ऐसा कोई नरेश पति दीजिये, जो आपके समान ही शक्तिशाली हो और समुद्रसे घिरी हुई मेरी ग्राम और नगरोंसहित रक्षा कर सके'॥५२॥ प्रभावशाली भगवान् कश्यपने मेरी यह बात सुनकर कहा “बहुत अच्छा '। फिर उन्होंने मुझे राजा मनुके हाथमें दे दिया॥५३॥ इस प्रकार मैं विपुलेनास्मि कालेन पार्थिवात् पार्थिवं गता॥ ५४ वैस्वत मनुसे प्रकट हुए दिव्य इक्ष्वाकुकुलमें आ ते च कालवएशूं प्राप्य मय्येव प्रलयं गता:

English

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अध्याय २३

श्लोक 146

सर्वे यज्ञा महाबाहो तस्यासन् भूरिदक्षिणाः सर्वे काञ्चनयूपाश् च सर्वे काञ्चनवेदयः

sarve yajñā mahābāho tasyāsan bhūridakṣiṇāḥ sarve kāñcanayūpāś ca sarve kāñcanavedayaḥ

हिन्दी अर्थ

मत्कृते विग्रहा लोके वृत्ता वर्तन्त एव च। क्षत्रियाणां बलवतां संग्रामेष्वनिवर्तिनाम् पहुँची। उस कुलके सभी लोग नरेश थे। वहाँ दीर्घकालतक एक राजासे दूसरे राजाके अधिकारमें आती रही इस प्रकार मैं बुद्धिमान् राजा मनुके हाथमें सौंपी गयी और महर्षिसमुदायके तुल्य तेजस्वी सहस्नों राजाओंके उपभोगमें आयी॥ ५५॥ बहुत-से शूरवीर क्षत्रिय मुझे जीतकर स्वर्गलोकको चले गये। वे कालके अधीन होकर मुझमें ही लीन हुए थे॥५६॥ जगत्में मेरे ही लिये युद्धस्थलोंमें कभी पीठ न दिखानेवाले बलवान क्षत्रियोंक परस्पर युद्ध हुए हैं और हो रहे हैं

English

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अध्याय २३

श्लोक 147

सर्वे देवैर् महाराज विमानस्थैर् अलंकृताः गन्धर्वैर् अप्सरोभिश् च नित्यम् एवोपशोभिताः

sarve devair mahārāja vimānasthair alaṃkṛtāḥ gandharvair apsarobhiś ca nityam evopaśobhitāḥ

हिन्दी अर्थ

एतद् युधष्मत्प्रवृत्तेन हैवेन परिपाल्यते। आपलोगोंके द्वारा परिचालित हैवके द्वारा ही इस जगदिद्धितार्थ कुरुत राज्ञां हेतुं रणक्षये॥ ५८ जव्का परिपालन होता है, अतः आप जगत्के हितके यद्यस्ति मयि कारुण्यं भारशैधिल्यकारणात्। एकश्चक्रधर: श्रीमानभयं मे प्रयच्छतु

English

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अध्याय २३

श्लोक 148

यस्य यज्ञे जगौ गाथां गन्धर्वो नारदस् तथा वरीदासात्मजो विद्वान् महिम्ना तस्य विस्मितः

yasya yajñe jagau gāthāṃ gandharvo nāradas tathā varīdāsātmajo vidvān mahimnā tasya vismitaḥ

हिन्दी अर्थ

लिये ऐसा कोई उपाय कीजिये, जिससे रणभूमिमें राजाओंका संहार हो॥५८॥ यदि मुझपर भगवान्की दया हो तो यह एकमात्र चक्रधारी श्रीमान् भगवान् विष्णु मेरा भार शिथिल करनेके लिये मुझे अभयदान दें मैं भारसे संतत्त होकर शरण खोजती हुई जिनकी शरणमें आयी हूँ, वे ही ये भगवान् विष्णु यदि मेरा भार उतारना भारो यद्यवरोप्तव्यो विष्णुरेव ब्रवीतु माम्॥ ६० उचित समझें तो इसके लिये मुझे आश्वासन दें इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे हरिवंशपर्वण धरणीवाक्ये द्विपश्लाशत्तमो5ध्याय:

English

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अध्याय २३

श्लोक 149

न नूनं कार्तवीर्यस्य गतिं यास्यन्ति पार्थिवाः यज्ञैर् दानैस् तपोभिर् वा विक्रमेण श्रुतेन वा

na nūnaṃ kārtavīryasya gatiṃ yāsyanti pārthivāḥ yajñair dānais tapobhir vā vikrameṇa śrutena vā

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार श्रीमहाभारत खिलभाग हारिवंशके अन्तर्गत हरिव॑शपर्वमें एथ्वीका वाक्यविषयक बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ब्रह्माजीकी आज्ञासे देवताओंका अंशावतरण शरीरकर्ता लोकानां त्वं हि लोकस्य चेश्वर: यत् कर्तव्यं महेन्द्रेण यमेन वरुणेन च। यद् वा कार्य धनेशेन स्वयं नारायणेन वा

English

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अध्याय २३

श्लोक 150

पञ्चाशीतिसहस्राणि अव्याहतबलः समाः ।अकरोद् अर्जुनो राज्यं हरिं चैवान्वहं स्मरन् ।अनष्टवित्तस्मरणे बुभुजे ऽक्षय्यषड्वसु ।स हि सप्तसु द्वीपेषु खड्गी चर्मी शरासनी रथी द्वीपान् अनुचरन् योगी संदृश्यते नृभिः

pañcāśītisahasrāṇi avyāhatabalaḥ samāḥ | akarod arjuno rājyaṃ hariṃ caivānvahaṃ smaran | anaṣṭavittasmaraṇe bubhuje 'kṣayyaṣaḍvasu | sa hi saptasu dvīpeṣu khaḍgī carmī śarāsanī rathī dvīpān anucaran yogī saṃdṛśyate nṛbhiḥ

हिन्दी अर्थ

यद् वा चन्द्रमसा कार्य भास्करेणानिलेन वा। आदिल्यैर्वसुभिर्वापि रुद्रै्वा लोकभावने: अश्विभ्यां देववैद्याभ्यां साध्यैर्वा त्रिदशालये:। बृहस्पत्युशनो भ्यां वा कालेन कलिनापि वा महेश्वरण वा ब्रह्मन् विशाखेन गुहेन वा। यक्षराक्षसगन्धर्वे श्वारणैर्वा महोरगै: वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय ! पृथ्वीकी यह बात सुनकर वे सभी देवता उसके प्रयोजनको सिद्ध करनेवाले कर्तव्यका चिन्तन करते हुए ब्रह्माजीसे इस प्रकार बोले--॥ १॥ 'भगवन्! आप इस पृथ्वीके बढ़े

English

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अध्याय २३

श्लोक 151

अनष्टद्रव्यता चैव न शोको न च विभ्रमः ।प्रभावेण महाराज्ञः प्रजा धर्मेण रक्षतः ॥ स सर्वरत्नभाक् सम्राट् चक्रवर्ती बभूव ह ।स एव पशुपालो ऽभूत् क्षेत्रपालः स एव च ।स एव वृष्ट्या पर्जन्यो योगित्वाद् अर्जुनो ऽभवत् ॥ स वै बाहुसहस्रेण ज्याघातकठिनत्वचा ।भाति रश्मिसहस्रेण शरदीव च भास्करः ॥ स हि नागान् मनुष्येषु माहिष्मत्यां महाद्युतिः ।कर्कोटकसुताञ् जित्वा पुर्यां तस्यां न्यवेशयत् ॥ स वै वेगं समुद्रस्य प्रावृट्काले ऽम्बुजेक्षणः ।क्रीडन्न् इव भुजोद्भिन्नं प्रतिस्रोतश् चकार ह ॥ लुण्ठिता क्रीडता तेन फेनस्रग्दाममालिनी ।चलदूर्मिसहस्रेण शङ्किताभ्येति नर्मदा ॥ तस्य बाहुसहस्रेण क्षुभ्यमाणे महोदधौ ।भयान् निलीना निश्चेष्टाः पातालस्था महासुराः ॥ चूर्णीकृतमहावीचिं चलन्मीनमहातिमिम् ।मारुताविद्धफेनौघम् आवर्तक्षोभदुःसहम् ॥ प्रावर्तयत् तदा राजा सहस्रेण च बाहुना ।देवासुरसमाक्षिप्तः क्षीरोदम् इव मन्दरः ॥ मन्दरक्षोभचकिता अमृतोत्पादशङ्किताः ।सहसोत्पतिता भीता भीमं दृष्ट्वा नृपोत्तमम् ॥ नता निश्चलमूर्धानो बभूवुस् ते महोरगाः ।सायाह्ने कदलीखण्डैः कम्पितास् तस्य वायुना ॥ स वै बद्ध्वा धनुर् ज्याभिर् उत्सिक्तं पञ्चभिः शरैः ।लङ्केशं मोहयित्वा तु सबलं रावणं बलात् ।निर्जित्यैव समानीय माहिष्मत्यां बबन्ध तम् ॥ श्रुत्वा तु बद्धं पौलस्त्यं रावणं त्व् अर्जुनेन तु ।ततो गत्वा पुलस्त्यस् तम् अर्जुनं ददृशे स्वयम् ।मुमोच रक्षः पौलस्त्यं पुलस्त्येनानुयाचितः ॥ यस्य बाहुसहस्रस्य बभूव ज्यातलस्वनः ।युगान्ते त्व् अम्बुदस्येव स्फुटतो ह्य् अशनेर् इव ॥ अहो बत मृधे वीर्यं भार्गवस्य यद् अच्छिनत् ।राज्ञो बाहुसहस्रं तु हैमं तालवनं यथा ॥ तृषितेन कदा चित् स भिक्षितश् चित्रभानुना ।पञ्चाशीतिसहस्राणि वर्षाणां वै नराधिपः ।उवास ताम् अनुसरन्न् अवगाढोमहार्णवं ।चकारोद्धतवेलान्तम् अकालप्रावृडुद्धतं ।स भिक्षाम् अददाद् वीरः सप्त द्वीपान् विभावसोः पुराणिग्रामघोषांश् च विषयांश् चैव सर्वशः ।जज्वाल तस्य सर्वाणि चित्रभानुर् दिधक्षया ॥ स तस्य पुरुषेन्द्रस्य प्रभावेण महात्मनः ।ददाह कार्तवीर्यस्य शैलांश् चैव वनानि च ॥ स शून्यम् आश्रमं रम्यं वरुणस्यात्मजस्य वै ।ददाह बलवद्भीतश् चित्रभानुः स हैहयः ।यं लेभे वरुणः पुत्रं पुरा भास्वन्तम् उत्तमम् ।वसिष्ठं नाम स मुनिः ख्यात आपव इत्य् उत ।यत्रापवस् तु तं क्रोधाच् छप्तवान् अर्जुनं विभुः

anaṣṭadravyatā caiva na śoko na ca vibhramaḥ | prabhāveṇa mahārājñaḥ prajā dharmeṇa rakṣataḥ || sa sarvaratnabhāk samrāṭ cakravartī babhūva ha | sa eva paśupālo 'bhūt kṣetrapālaḥ sa eva ca | sa eva vṛṣṭyā parjanyo yogitvād arjuno 'bhavat || sa vai bāhusahasreṇa jyāghātakaṭhinatvacā | bhāti raśmisahasreṇa śaradīva ca bhāskaraḥ || sa hi nāgān manuṣyeṣu māhiṣmatyāṃ mahādyutiḥ | karkoṭakasutāñ jitvā puryāṃ tasyāṃ nyaveśayat || sa vai vegaṃ samudrasya prāvṛṭkāle 'mbujekṣaṇaḥ | krīḍann iva bhujodbhinnaṃ pratisrotaś cakāra ha || luṇṭhitā krīḍatā tena phenasragdāmamālinī | caladūrmisahasreṇa śaṅkitābhyeti narmadā || tasya bāhusahasreṇa kṣubhyamāṇe mahodadhau | bhayān nilīnā niśceṣṭāḥ pātālasthā mahāsurāḥ || cūrṇīkṛtamahāvīciṃ calanmīnamahātimim | mārutāviddhaphenaugham āvartakṣobhaduḥsaham || prāvartayat tadā rājā sahasreṇa ca bāhunā | devāsurasamākṣiptaḥ kṣīrodam iva mandaraḥ || mandarakṣobhacakitā amṛtotpādaśaṅkitāḥ | sahasotpatitā bhītā bhīmaṃ dṛṣṭvā nṛpottamam || natā niścalamūrdhāno babhūvus te mahoragāḥ | sāyāhne kadalīkhaṇḍaiḥ kampitās tasya vāyunā || sa vai baddhvā dhanur jyābhir utsiktaṃ pañcabhiḥ śaraiḥ | laṅkeśaṃ mohayitvā tu sabalaṃ rāvaṇaṃ balāt | nirjityaiva samānīya māhiṣmatyāṃ babandha tam || śrutvā tu baddhaṃ paulastyaṃ rāvaṇaṃ tv arjunena tu | tato gatvā pulastyas tam arjunaṃ dadṛśe svayam | mumoca rakṣaḥ paulastyaṃ pulastyenānuyācitaḥ || yasya bāhusahasrasya babhūva jyātalasvanaḥ | yugānte tv ambudasyeva sphuṭato hy aśaner iva || aho bata mṛdhe vīryaṃ bhārgavasya yad acchinat | rājño bāhusahasraṃ tu haimaṃ tālavanaṃ yathā || tṛṣitena kadā cit sa bhikṣitaś citrabhānunā | pañcāśītisahasrāṇi varṣāṇāṃ vai narādhipaḥ | uvāsa tām anusarann avagāḍhomahārṇavaṃ | cakāroddhatavelāntam akālaprāvṛḍuddhataṃ | sa bhikṣām adadād vīraḥ sapta dvīpān vibhāvasoḥ purāṇigrāmaghoṣāṃś ca viṣayāṃś caiva sarvaśaḥ | jajvāla tasya sarvāṇi citrabhānur didhakṣayā || sa tasya puruṣendrasya prabhāveṇa mahātmanaḥ | dadāha kārtavīryasya śailāṃś caiva vanāni ca || sa śūnyam āśramaṃ ramyaṃ varuṇasyātmajasya vai | dadāha balavadbhītaś citrabhānuḥ sa haihayaḥ | yaṃ lebhe varuṇaḥ putraṃ purā bhāsvantam uttamam | vasiṣṭhaṃ nāma sa muniḥ khyāta āpava ity uta | yatrāpavas tu taṃ krodhāc chaptavān arjunaṃ vibhuḥ

हिन्दी अर्थ

हुए भारको उतारिये; क्योंकि आप ही सब लोगोंके शरीरकी सृष्टि करनेवाले तथा सम्पूर्ण जगत्के ईश्वर हैं॥ २॥ इस विषयमें देवराज इन्द्र, वरुण और यमको क्या करना चाहिए? धनाध्यक्ष कुबेर अथवा साक्षात् भगवान् नारायणका भी क्‍या कर्तव्य है 2॥ ३॥ चन्द्रमा, सूर्य, वायु, बारह आदित्य, आठ वसु तथा लोकोंका कल्याण करनेवाले ग्यारह रुद्रोंको भी इस विषयमें क्या करना चाहिए ?॥ ४॥ दोनों देववैद्य अश्विनीकुमार, स्वर्गवासी साध्यगण, बृहस्पति, शुक्राचार्य, काल तथा कलिका भी इस समय क्‍या कर्तव्य है 2॥ ५॥ ब्रह्मन्! भगवान् महे धर, विशाख, स्वामिकार्तिकेय, यक्ष, राक्षस, गन्धर्व, चारण तथा बड़े-बड़े नागोंको भी इस कार्यके सम्बन्धमें क्‍या करना है 2॥ ६॥ सुरेश्वर ! पक्षी, पर्वत, बड़ी-बड़ी लहरोंसे युक्त समुद्र तथा गड्डा आदि दिव्य सरिताएँ भी इस विषयमें क्या कर सकती हैं ?'

English

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अध्याय २३

श्लोक 152

यस्मान् न वर्जितम् इदं वनं ते मम हेहय तस्मात् ते दुष्करं कर्म कृतम् अन्यो हरिष्यति अर्जुनो नाम कौरव्यः पाण्डवः कुन्तिनन्दनः

yasmān na varjitam idaṃ vanaṃ te mama hehaya tasmāt te duṣkaraṃ karma kṛtam anyo hariṣyati arjuno nāma kauravyaḥ pāṇḍavaḥ kuntinandanaḥ

हिन्दी अर्थ

यदि ते पार्थिवं कार्य कार्य पार्थ्िवविग्रहे सुराणामेककार्याणां श्रुत्वैतन्निश्चितं मतम्। देव: परिवृतः प्राह वाक्यं लोकपितामह: भावयन्तो भुवंदेवीं लब्ध्वा त्रिभुवनश्रियम् इतिवृत्तेश्न॒ बहुभि: पुराणप्रभवैर्गुणैः

English

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अध्याय २३

श्लोक 153

रामो नाममहाबाहुर् जामदग्न्यः प्रतापवान् ।छित्त्वा बाहुसहस्रं ते प्रमथ्य तरसा बली तपस्वी ब्राह्मणश् च त्वां हनिष्यति स भार्गवः

rāmo nāmamahābāhur jāmadagnyaḥ pratāpavān | chittvā bāhusahasraṃ te pramathya tarasā balī tapasvī brāhmaṇaś ca tvāṃ haniṣyati sa bhārgavaḥ

हिन्दी अर्थ

“प्रभो! शीघ्र आज्ञा दें, हम अपने अंशका प्रदयोःग किस प्रकार करें ? यदि आपको पृथ्वीके हितका काद॑ अवश्य करना है तो बताइये, राजाओंमें युद्धकी ज्वाला जगानेके लिये हम सब किस उपायसे काम लें ? पितामह! हम सब लोग किस प्रकार अंशावतार ग्रहण करें। हममेंसे जो देवता अन्तरिक्षमें रहते हैं तथा जो पृथ्वीपर पार्थिवरूपसे विराजमान हैं, वे सब सदस्य (ऋत्विज्) ब्राह्मणों तथा राजाओंके कुलमें अवतीर्ण हों तथा हमलोग भूतलपर अपने अयोनिज शरीरोंकी भी सृष्टि करें'॥९-१०॥ एक कार्यके लिये यत्रशील हुए हुए लोकपितामह ब्रह्माजीनी यह बात कही--

English

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अध्याय २३

श्लोक 154

अनष्टद्रव्यता यस्य बभूवामित्रकर्शन प्रभावेण नरेन्द्रस्य प्रजा धर्मेण रक्षतः

anaṣṭadravyatā yasya babhūvāmitrakarśana prabhāveṇa narendrasya prajā dharmeṇa rakṣataḥ

हिन्दी अर्थ

'सुरश्रेष्ठणण! तुमलोगोंका जो निश्चय है. वह मुझे भी अच्छा लगता है। तुमलोग भूतलपर अपने ही समान तेजस्वी अपने शरीरके अंशोंको प्रकट ऋगे ॥ १२॥ श्रेष्ठ लो और तीनों लोकोंकी लक्ष्मीको ए८ऋः भूदेवीकी रक्षा करते हुए वहाँ रहो॥ १३॥ मैं एृध्वोपर आनेवाले इस भयको पहलेसे ही जानता था। ऋह: भूललपर स्थित भरतवंशके लिये मैंने जो कुछ (ठिच्चर जिया है, उसे सुनो॥ १४॥ पहलेकी बात है, मैं एवं समद्रके पश्चिम तटपर अपने पुत्र महात्मा कश्यपके साथ जैटा था। उस समय लोक और वेदका अनुसरण ऋरनंठालो प्राचीन कथाओं तथा बहुत-से उत्तम गुणवाल पैगणिऊ इतिहासोंकी

English

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अध्याय २३

श्लोक 155

रामात् ततो ऽस्य मृत्युर् वै तस्य शापान् महामुनेः वरश् चैष हि कौरव्य स्वयम् एव वृतः पुरा

rāmāt tato 'sya mṛtyur vai tasya śāpān mahāmuneḥ varaś caiṣa hi kauravya svayam eva vṛtaḥ purā

हिन्दी अर्थ

कथावार्ताओंको कहते-सुनते हुए मेंर समोप मूर्तिमती गड़ाके साथ मूर्तिमान् समुद्र शीघ्रतापृवबंक आया। उसके साथ मेघोंकी घटा तथा वायुका भी आगमन हुआ था॥ १७॥ वह ऊँची-नीची लहरोंके कारण वेग एवं तरड्रोंसे युक्त अपनी गतिको विषम बनाता हुआ आया था। जलजन्तुओंके कारण विचित्र दिखायो देनेवाले जलरूपी वस्त्रसे उसका शरीर ढका हुआ था उसके शरीरकी कान्ति शट्ढु और मुक्ताओंसे अत्यन्त निर्मल दिखायी देती थी। वह मूँगे और मणियोंके आभूषणोंसे विभूषित तथा पूर्ण चन्द्रमासे संयुक्त होनेके कारण उद्देलित हो मेघके समान गम्भीर गर्जना कर रहा था॥ १९॥ उसने मेरा तिरस्कार-सा करते हुए अपनी मर्यादाका उललड्नन करके अपने चञ्लल एवं नमकीन जलबिन्दुओंसे मुझे भिगो दिया'

English

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अध्याय २३

श्लोक 156

तस्य पुत्रशतस्यासन् पञ्च शेषा महात्मनः कृतास्त्रा बलिनः शूरा धर्मात्मानो यशस्विनः

tasya putraśatasyāsan pañca śeṣā mahātmanaḥ kṛtāstrā balinaḥ śūrā dharmātmāno yaśasvinaḥ

हिन्दी अर्थ

उक्त: संरब्धया वाचा शान्तोडइसीति मया तदा सकारणां मतिं कृत्वा युष्माकं हितकाम्यया भविष्यसि नृणां भर्ता भारतानां कुलोद्वह: सुतनुर्यशसा लोके शान्तनुस्त्वं भविष्यसि

English

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अध्याय २३

श्लोक 157

शूरसेनश् च शूरश् च धृष्टोक्तः कृष्ण एव च जयध्वजश् च नाम्नासीद् आवन्त्यो नृपतिर् महान् कार्तवीर्यस्य तनया वीर्यवन्तो महारथाः

śūrasenaś ca śūraś ca dhṛṣṭoktaḥ kṛṣṇa eva ca jayadhvajaś ca nāmnāsīd āvantyo nṛpatir mahān kārtavīryasya tanayā vīryavanto mahārathāḥ

हिन्दी अर्थ

मां प्रभो देवदेवानां क्रिमर्थ शप्तवानसि यद्यहं चलितो ब्रह्मन् कोउत्र दोषो महात्मनः अन्न मे कि नु भगवन् विद्यते शापकारणम् उद्धतैश्व महावातैः प्रवृद्धैश्ष बलाहके:ः। पर्वणा चेन्दुयुक्तेन त्रिभि: क्षुब्धोडस्मि कारणै:

English

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अध्याय २३

श्लोक 158

जयध्वजस्य पुत्रस् तु तालजङ्घो महाबलः तस्य पुत्राः शताख्यास् तु तालजङ्घा इति श्रुताः

jayadhvajasya putras tu tālajaṅgho mahābalaḥ tasya putrāḥ śatākhyās tu tālajaṅghā iti śrutāḥ

हिन्दी अर्थ

“जब समुद्र अपने उमड़े हुए जलसे उस स्थानको नष्ट-भ्रष्ट करनेके लिये उद्यत हुआ, तब मैंने क्रोधभरी वाणीमें उससे कहा--' तू शान्त हो जा!'॥ २१॥ 'शान्त हो जा' इतना कहते ही समुद्र तनुता (सूक्ष्मता)-को प्राप्त हो गया। उसकी ऊर्मि और तरख्ोंका प्रभाव दब गया और वह राजलक्ष्मीसे प्रकाशित होता हुआ मेरे समीप खड़ा हो गया॥ २२॥ फिर मैंने मन-ही-मन पृथ्वीके भार उतारनेके हेतुका विचार करके तुमलोगोंके हितकी कामनासे गड्गजासहित समुद्रको पुनः शाप देते हुए कहा'॥ २३॥ समुद्र! तू राजाके समान शरीर धारण करके मेरे निकट आया है, अत: जा, तू इस पृथ्वीका पालन करनेवाला राजा ही होगा॥ २४॥ वहाँ भी अपनी सहज लीलाको धारण किये अपने तेजसे तू मनुष्योंका भरण-पोषण करनेवाला तथा भरतवंशका भार वहन करनेमें समर्थ होगा॥ २५॥ “शान्त हो जा' मेरे इतना कहते ही जो तू शान्त होकर तनुता (सूक्ष्मता)-

English

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अध्याय २३

श्लोक 159

तेषां कुले महाराज हेहयानां महात्मनाम् वीतिहोत्राः सुजाताश् च भोजाश् चावन्तयस् तथा

teṣāṃ kule mahārāja hehayānāṃ mahātmanām vītihotrāḥ sujātāś ca bhojāś cāvantayas tathā

हिन्दी अर्थ

को प्राप्त हुआ है, इसलिये तू सुन्दर शरीरसे युक्त एवं यशस्वी होकर संसारमें 'शान्तनु' नामसे विख्यात होगा॥ २६॥ यह विशाल-लोचना, सर्वाड्रसुन्दरी, सरिताओंमें श्रेष्ठ मूर्तिमती गड्भा भी वहाँ तुम्हारी सेवामें उपस्थित होगी॥ २७॥ मेरे ऐसा कहनेपर क्षोभमें भरा हुआ समुद्र मेरी ओर देखकर बोला--' देवदेवेश्वर! आपने मुझे शाप क्यों दिया 27॥ २८॥ मेरा यह शरीर तो आपकी आज्ञाका पालक है। आपने ही इसकी रचना की है और यह सदा आपकी सेवामें ही तत्पर रहता है। मैं आपका पुत्र हूँ। आपने स्वयं ही मुझे ऐसे वचनोंद्वारा, जो आपके और मेरे अनुरूप नहीं हैं, शाप कैसे दे दिया? भगवन्! आपकी ही कृपासे पूर्णिमाके दिन में बड़े वेगसे बढ़ जाता हूँ। ब्रह्मन्! इस सहज नियमसे प्रेरित होकर यदि मैं अपनी मर्यादासे विचलित हो गया तो इसमें मेरा अपना दोष क्या है ?॥ ३०॥ भगवन्! आज पूर्णिमाके

English

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अध्याय २३

श्लोक 160

तौण्डिकेरा इति ख्यातास् तालजङ्घास् तथैव च भरताश् च सुजाताश् च बहुत्वान् नानुकीर्तिताः

tauṇḍikerā iti khyātās tālajaṅghās tathaiva ca bharatāś ca sujātāś ca bahutvān nānukīrtitāḥ

हिन्दी अर्थ

दिन प्रबल वायुद्वारा फेंके गये मेरे जलसे यदि आपका स्पर्श हो गया, आप भीग गये तो इसमें मुझे शाप प्राप्त होनेका क्या कारण है ?॥ ३१॥ उठी हुई प्रचण्ड आँधी, बढ़े हुए महान् मेघ और उगे हुए चन्द्रमासे युक्त पूर्णिमाका पर्व--इन तीन कारणोंसे मैं श्लुब्ध (उद्देलित) हो उठा था।' एवं यद्यपराद्धो 5हं कारणैस्त्वत्प्रकल्पितै: । क्षन्तुमईसि मे ब्रह्मज्छापो 5यं विनिवर्त्यताम् कारुण्यं कुरु देवेश प्रमाणं यद्यवेक्षसे

English

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अध्याय २३

श्लोक 161

वृषप्रभृतयो राजन् यादवाः पुण्यकर्मिणः वृषो वंशधरस् तत्र तस्य पुत्रो ऽभवन् मधुः मधोः पुत्रशतं त्व् आसीद् वृषणस् तस्य वंशभाक्

vṛṣaprabhṛtayo rājan yādavāḥ puṇyakarmiṇaḥ vṛṣo vaṃśadharas tatra tasya putro 'bhavan madhuḥ madhoḥ putraśataṃ tv āsīd vṛṣaṇas tasya vaṃśabhāk

हिन्दी अर्थ

अस्यास्तु देवगड़ाया गां गतायास्त्वदाज्ञया। मम दोषात् सदोषाया: प्रसादं कर्तुमहसि अकारणज्ञ देवानां त्रस्तं शापानलेन तम् शापे5स्मिन् सरितां नाथ भविष्य श्रुणु कारणम् पालयंश्वतुरों वर्णान् रंस्यसे सलिलेश्वर

English

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अध्याय २३

श्लोक 162

वृषणाद् वृष्णयः सर्वे मधोस् तु माधवाः स्मृताः यादवा यदुना चाग्रे निरुच्यन्ते च हेहयाः

vṛṣaṇād vṛṣṇayaḥ sarve madhos tu mādhavāḥ smṛtāḥ yādavā yadunā cāgre nirucyante ca hehayāḥ

हिन्दी अर्थ

तत्काल रमणीयाड्री गड़ा परिचरिष्यति त्वरता चैव कर्तव्यं त्वयेदं मम शासनम्। प्राजापत्येन विधिना गड़या सह सागर “ब्रह्मनू! इस तरह आपके बनाये हुए कारणों (नियमों )-से ही क्षुब्ध होकर यदि मैंने अपराध किया है तो आप उसके लिये मुझे क्षमा कर दें और इस शापको लौटा लें॥३३॥ देवेश्वर! मुझे दूसरा कोई सहारा देनेवाला नहीं है। मैं शापसे शिथिल हो गया हूँ। यदि आप शरणागतकी रक्षाका प्रतिपादन करनेवाले प्रमाणपर दृष्टि रखते हैं तो मुझपर अवश्य दया करें॥ ३४॥ यह देवनदी गड्भा आपकी ही आज्ञासे

English

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अध्याय २३

श्लोक 163

शूराश् च शूरवीराश् च शूरसेनास् तथानघ ॥ शूरसेन इति ख्यातस् तस्य देशो महात्मनः ।न तस्य वित्तनाशः स्यान् नष्टं प्रतिलभेच् च सः कार्तवीर्यस्य यो जन्म कथयेद् इह नित्यशः

śūrāś ca śūravīrāś ca śūrasenās tathānagha || śūrasena iti khyātas tasya deśo mahātmanaḥ | na tasya vittanāśaḥ syān naṣṭaṃ pratilabhec ca saḥ kārtavīryasya yo janma kathayed iha nityaśaḥ

हिन्दी अर्थ

इस भूतलपर अवतीर्ण हुई है। (इसका कोई दोष नहीं है) इसे मेरे दोषसे ही दोषकी भागिनी होना पड़ा है, अत: आप इसपर कृपा करें॥ ३५॥ महासागर था; अतः मेरी शापाग्नरिसे भयभीत हो उठा था। उस समय मैंने मधुर वाणीद्वारा उसे सान्त्वना देते हुए कहा-- ॥ ३६॥ महोदथे! शान्त हो जाओ। तुम्हें डरना नहीं चाहिए। मैं तुमपर प्रसन्न हूँ। नदीश्वर ! इस शापमें जो भावी कारण (उद्देश्य) है, उसे बताता हूँ, सुनो--॥३७॥ सरिताओंके स्वामी समुद्र ! तुम अपने तेजसे इस सागर-शरीरको छोड़कर अर्थात् योगबलसे अपने-आपको दो रूपोंमें विभक्त करके (एकसे तो यहाँ रह जाओ और दूसरे रूपसे) जाओ और भरतवंशमें अपने शरीरको गर्भमें स्थापित करो

English

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अध्याय २३

श्लोक 164

वित्तवांश् च भवेच् चैव धर्मश्चैव विवर्धते ।यथा सृष्टिर् यदोर् जाता तथा स्वर्गे महीयते ।किमर्थं तद् वनं दग्धम् आपवस्य महात्मनः ।कार्तवीर्येण विक्रम्य तन् मे ब्रूहि प्रपृच्छतः ॥ रक्षिता स हि राजर्षिः प्रजानाम् इति नः श्रुतम् ।कथं स रक्षिता भूत्वा नाशयाम् आस तद्वनम् ॥ आदित्यो विप्ररूपेण कार्तवीर्यम् उपस्थितः ।तृप्तिम् एकाम् प्रयच्छस्व आदित्यो ऽहम् उपस्थितः ॥ भगवन् केन तृप्तिस् ते भवेद् ब्रूहि विभावसो ।कीदृशं भोजनं दद्मि श्रुत्वा ते विदधाम्य् अहम् ॥ स्थावरं देहि मे सर्वम् आहारं वदतां वर ।तेन तृप्सिर् भवेन् मह्यं तेन तुष्टिश् च पार्थिव ॥ न शक्यं स्थावरं सर्वं तेजसा मानुषेण तु ।निर्दग्धुं तपतां श्रेष्ठ त्वाम् एव प्रणमाम्य् अहम् ॥ तुष्टस् ते ऽहं शरान् दद्मि चाक्षयान् सर्वतोमुखान् ।ये [प्र]क्षिप्ताः संज्वलन्ति मम तेजःसमन्विताः ॥ आविष्टस् तेजसा मे ऽद्य स्थावरं शोषयिष्यसि ।शुष्कं भस्म करिष्यामि तेन तृप्तिर् नराधिप ॥ ततः शरांस् तदादित्यो अर्जुनाय तदा ददौ ।ततः स प्राच्यम् अदहत् स्थावरं सर्वम् एव तत् ॥ आश्रमान् अथ ग्रामांश् च घोषांश् च नगराण्य् अपि ।तपोवनानि रम्याणि वनान्य् उपवनानि च ॥ एवं स प्राच्यम् अदहत् ततः सर्वं प्रदक्षिणम् ।निर्वृक्षा निस्तृणा भूमिर् दग्धा सा योगतेजसा ॥ एतस्मिन्न् एव काले तु आपवो जलम् आश्रितः ।दश वर्षसहस्राणि जलवासी महान् ऋषिः ॥ पूर्णे व्रते महातेजा उदतिष्ठन् महान् ऋषिः ।क्रोधाच् छशाप राजर्षिं कीर्तितं वै यथा मया ।एते ययातिपुत्राणां पञ्च वंशा विशां पते कीर्तिता लोकवीराणां ये लोकान् धारयन्ति वै भूतानीव महाराज पञ्च स्थावरजङ्गमम्

vittavāṃś ca bhavec caiva dharmaścaiva vivardhate | yathā sṛṣṭir yador jātā tathā svarge mahīyate | kimarthaṃ tad vanaṃ dagdham āpavasya mahātmanaḥ | kārtavīryeṇa vikramya tan me brūhi prapṛcchataḥ || rakṣitā sa hi rājarṣiḥ prajānām iti naḥ śrutam | kathaṃ sa rakṣitā bhūtvā nāśayām āsa tadvanam || ādityo viprarūpeṇa kārtavīryam upasthitaḥ | tṛptim ekām prayacchasva ādityo 'ham upasthitaḥ || bhagavan kena tṛptis te bhaved brūhi vibhāvaso | kīdṛśaṃ bhojanaṃ dadmi śrutvā te vidadhāmy aham || sthāvaraṃ dehi me sarvam āhāraṃ vadatāṃ vara | tena tṛpsir bhaven mahyaṃ tena tuṣṭiś ca pārthiva || na śakyaṃ sthāvaraṃ sarvaṃ tejasā mānuṣeṇa tu | nirdagdhuṃ tapatāṃ śreṣṭha tvām eva praṇamāmy aham || tuṣṭas te 'haṃ śarān dadmi cākṣayān sarvatomukhān | ye [pra]kṣiptāḥ saṃjvalanti mama tejaḥsamanvitāḥ || āviṣṭas tejasā me 'dya sthāvaraṃ śoṣayiṣyasi | śuṣkaṃ bhasma kariṣyāmi tena tṛptir narādhipa || tataḥ śarāṃs tadādityo arjunāya tadā dadau | tataḥ sa prācyam adahat sthāvaraṃ sarvam eva tat || āśramān atha grāmāṃś ca ghoṣāṃś ca nagarāṇy api | tapovanāni ramyāṇi vanāny upavanāni ca || evaṃ sa prācyam adahat tataḥ sarvaṃ pradakṣiṇam | nirvṛkṣā nistṛṇā bhūmir dagdhā sā yogatejasā || etasminn eva kāle tu āpavo jalam āśritaḥ | daśa varṣasahasrāṇi jalavāsī mahān ṛṣiḥ || pūrṇe vrate mahātejā udatiṣṭhan mahān ṛṣiḥ | krodhāc chaśāpa rājarṣiṃ kīrtitaṃ vai yathā mayā | ete yayātiputrāṇāṃ pañca vaṃśā viśāṃ pate kīrtitā lokavīrāṇāṃ ye lokān dhārayanti vai bhūtānīva mahārāja pañca sthāvarajaṅgamam

हिन्दी अर्थ

जलके स्वामी महासागर ! उस भरतवंशमें भूपाल बनकर राजलक्ष्मीसे सम्पन्न हो तुम चारों वर्णोका पालन करते हुए बड़े सुखसे रहोगे॥३९॥ यह जो तुम्हारी प्रिया सरिताओंमें श्रेष्ठ गड्ा है, यह भी उस समय रमणीय अज्ञोंसे सुशोभित परम सुन्दर रूप धारण करके वहाँ तुम्हारी सेवा करेगी॥४०॥ सागर! तुम मेरी आज्ञासे वहाँ इस जाह्वीके साथ आनन्दपूर्वक रहते हुए मुझे जलसे भिगोनेके कारण मिले हुए इस शापके दुःखको इस आज्ञाका पालन करना चाहिए। वहाँ इस गड़ाके साथ तुम्हारा प्राजापत्यविधिसे विवाह होगा आठों वसु स्वर्गसे भ्रष्ट होकर रसातलमें जा पहुँचे हैं। उन्हें मनुष्यरूपमें उत्पन्न करनेके लिये मैंने तुम्हें नियुक्त किया है॥४३॥ अग्रिदेवके समान गुणशाली तथा देवताओंकी प्रसन्नताको बढ़ानेवाले उन आठों

English

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अध्याय २३

श्लोक 165

श्रुत्वा पञ्चविसर्गं तु राजा धर्मार्थकोविदः वशी भवति पञ्चानाम् आत्मजानां तथेश्वरः

śrutvā pañcavisargaṃ tu rājā dharmārthakovidaḥ vaśī bhavati pañcānām ātmajānāṃ tatheśvaraḥ

हिन्दी अर्थ

वसुओंको संतानरूपसे उत्पन्न करनेके लिये यह गड्ढा तुमसे गर्भ धारण करे' विचित्रवीर्यों द्युतिमानासीदू राजा प्रतापवान् शुभे कुन्ती च माद्री च देवयोषोपमे तु ते धृतराष्ट्रस्य राज्ञस्तु भार्यका तुल्यचारिणी। गान्धारी भुवि विख्याता भर्तुर्नित्यं ब्रते स्थिता

English

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अध्याय २३

श्लोक 166

लभेत् पञ्च वरांश् चैष दुर्लभान् इह लौकिकान् आयुः कीर्तिं धनं पुत्रान् ऐश्वर्यं भूय एव च धारणाच् छ्रवणाच् चैव पञ्चवर्गस्य भारत

labhet pañca varāṃś caiṣa durlabhān iha laukikān āyuḥ kīrtiṃ dhanaṃ putrān aiśvaryaṃ bhūya eva ca dhāraṇāc chravaṇāc caiva pañcavargasya bhārata

हिन्दी अर्थ

धक्ष्यते शट्डूरस्यांशः पावकेनास्त्रतेजसा 'सागर! तुम वसुओंको शीघ्र ही जन्म देकर कुरुकुलकी महत्ता बढ़ानेके अनन्तर उस मानव-शरीरका त्याग करके पुनः अपने समुद्ररूपमें प्रवेश करोगे सुरश्रेष्टणण! इस प्रकार मैंने भविष्यमें होनेवाले पृथ्वीके राजसमूहरूपी भारकों देखकर तुम्हारे हितके लिये पहले ही यह कार्य कर दिया है॥४६॥ इस तरह भूतलपर शान्तनुके वंशका बीजारोपण मैंने कर दिया है। स्वर्गमें रहनेवाले जो वसु थे, वे गड्गाके गर्भसे उत्पन्न हो चुके और उनमेंसे ये सात बसु यहाँ आ गये, परंतु एकमात्र आठवाँ वसु गड्ढाका पुत्र होकर अबतक वहाँ पृथ्वीपर ही लटक रहा है॥४७-४८॥ शान्तनुकी दूसरी पत्नी

English

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अध्याय २३

श्लोक 167

लोभते मनुजः श्रैष्ठ्यं सर्वपापैः प्रमुच्यते ।क्रोष्टोस् तु शृणु राजेन्द्र वंशम् उत्तमपूरुषम् यदोर् वंशधरस्येह यज्वनः पुण्यकर्मणः

lobhate manujaḥ śraiṣṭhyaṃ sarvapāpaiḥ pramucyate | kroṣṭos tu śṛṇu rājendra vaṃśam uttamapūruṣam yador vaṃśadharasyeha yajvanaḥ puṇyakarmaṇaḥ

हिन्दी अर्थ

सत्यवतीके साथ पतिका समागम होनेपर भीष्मकी अपेक्षा जो दूसरा पुत्र उत्पन्न हुआ था, उसका नाम विचित्रवीर्य था। वह कुरुकुलका तेजस्वी एवं प्रतापी राजा था विचित्रवीर्यके दो ही पुत्र इस समय पृथ्वीपर वर्तमान हैं। वे दोनों ही राजा एवं पुरुषोंमें श्रेष्ठ हैं। धृतराष्ट और पाण्डु नामसे उनकी ख्याति है॥५०॥ उनमेंसे पाण्डुकी दो शोभासम्पन्न सुन्दरी पत्नियाँ हैं, जो देवाड़्नाओंके समान रूपवती हैं। उनके नाम हैं--कुन्ती और माद्री राजा धृतराष्ट्रकी एक ही पत्नी है, जो इस भूतलपर गान्धारीके नामसे विख्यात है। वह पतिके समान आचारसे रहनेवाली और सदा पातित्रत्यधर्मका पालन करनेवाली है॥ ५२॥ उन दोनों राजाओंके पुत्रोंमें महान् युद्ध होनेवाला

English

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अध्याय २३

श्लोक 168

क्रोष्टोर् हि वंशं श्रुत्वेमं सर्वपापैः प्रमुच्यते यस्यान्ववायजो विष्णुर् हरिर् वृष्णिकुलप्रभुः

kroṣṭor hi vaṃśaṃ śrutvemaṃ sarvapāpaiḥ pramucyate yasyānvavāyajo viṣṇur harir vṛṣṇikulaprabhuḥ

हिन्दी अर्थ

है। तुमलोग उन्हींके पक्ष और विपक्षमें पृथक्-पृथक् अपने वंश उत्पन्न करो॥५३॥ उनके पैतृक राज्यके बँटवारेके सम्बन्धमें विवाद होनेपर बड़ा भारी संग्राम छिड़ जायगा और उसमें बहुत-से नरेशोंका विनाश होगा। वह महान् युद्ध प्रलयकालके समान भयंकर एवं संहारकारी होगा॥ ५४॥ जब सेनासहित राजालोग उस युद्धमें उपस्थित होंगे, उस समय एक-दूसरेसे लड़-भिड़कर उन सबकी शान्ति (मृत्यु) हो जायगी। उस दशामें इस भूतलके सभी नगर और राष्ट्र निर्जन-से हो जायँगे और यह पृथ्वी शिथिलताको प्राप्त हो जायगी॥ ५५ ॥ द्वापरयुगके अन्तमें घटित होनेवाले इस भावी विनाशको मैंने पहलेसे ही देख लिया है। उस समय अपने सैनिक मनुष्योंसहित युद्धोसे जो लोग बच जायँगे, उन्हें रातमें अचेत होकर सोते समय भगवान् शट्डूरका अंशभूत अश्वत्थामा अग्नितुल्य अस्त्रके तेजसे जलाकर भस्म कर डालेगा

English

¹⁴⁰ A name of fire. Other words have been explained in previous notes.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_harivaMza.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Harivamsha Purana — Chapter 23
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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