Harivamsha Purana· Harivaṁśa Purāṇa
28
अध्याय 28 / 119

Adhyaya 28

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अध्याय २८

श्लोक 1

भजमानस्य पुत्रो ऽथ रथमुख्यो विदूरथः राजाधिदेवः शूरस् तु विदूरथसुतो ऽभवत्

bhajamānasya putro 'tha rathamukhyo vidūrathaḥ rājādhidevaḥ śūras tu vidūrathasuto 'bhavat

हिन्दी अर्थ

विद्यानां ब्रह्मविद्या त्वमोड्लरो5थ वषट् तथा तुम्हारे केश बिखरे हुए हैं। तुम्हीं प्राणियोंकी मृत्यु हो। मधुसे युक्त तथा मांससे रहित बलि तुम्हें प्रिय है। तुम्हीं लक्ष्मी हो तथा तुम्हीं दानवोंका वध करनेके लिये अलक्ष्मी बन जाती हो ॥ १२॥ तुम्हीं सावित्री, देवमाता अदिति तथा समस्त भूतोंकी जननी हो। कन्याओंका ब्रह्मचर्य तुम्हीं हो और विवाहिता युवतियोंका सौभाग्य भी तुम्हीं हो॥१३॥ तुम्हीं यज्ञोंकी अन्तर्वेदी तथा ऋत्विजोंकी दक्षिणा हो। किसानोंकी सीता (हल जोतनेसे उभरी हुई रेखा) तथा समस्त प्राणियोंको धारण करनेवाली धरणी भी तुम्हीं हो॥ १४॥ नौका या जहाजसे यात्रा करनेवाले व्यापारियोंको प्राप्त होनेवाली सिद्धि भी तुम्हीं हो। तुम्हीं समुद्रकी तट-भूमि, यक्षोंकी प्रथम यक्षी

English

Saying 'may it be so' and saluting that foremost of Munis Hiranyakasipu, the king of Dānavas, was pleased and returned to the celestial region

अध्याय २८

श्लोक 2

राजाधिदेवस्य सुता जज्ञिरे वीर्यवत्तराः दत्तातिदत्तौ बलिनौ शोणाश्वः श्वेतवाहनः

rājādhidevasya sutā jajñire vīryavattarāḥ dattātidattau balinau śoṇāśvaḥ śvetavāhanaḥ

हिन्दी अर्थ

(कुबेरकी माता) तथा नागोंकी जननी सुरसा हो देवि! तुम ब्रह्मवादिनी दीक्षा तथा परम शोभा हो। ज्योतिर्मय ग्रहों एवं तारिकाओंकी प्रभा हो तथा नक्षत्रोंमें रोहिणी हो॥ १६ ॥ राजद्ठारों, तीर्थों तथा नदियोंके संगमोंमें तुम पूर्ण लक्ष्मीरूपसे स्थित हो। तुम्हीं चन्द्रमामें पूर्णिमारूपसे महर्षि वाल्मीकिमें सरस्वतीरूपसे, श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासमें स्मृतिरूपसे तथा ऋषि-मुनियोंमें धर्म-बुद्धिरूपसे स्थित हो। देवताओंमें सत्यसंकल्पात्मक चित्तवृत्ति भी तुम्हीं हो॥ १८॥ तुम समस्त भूतोंमें सुगा देवी हो और अपने कर्मोद्वारा सदा प्रशंसित होती हो। इन्द्रकी मनोहर दृष्टि भी तुम्हीं हो; सहस्तरों नेत्रोंसे युक्त होनेके कारण 'सहस्ननयना' नामसे तुम्हारी ख्याति है॥ १९॥ तुम तपस्वी मुनियोंकी देवी हो। अग्रिहोत्र करनेवाले ब्राह्मणोंकी अरणी हो।

English

Varuna said:—This is that illusion, which the deities cannot bear, and that had been created in the days of yore by Urva's son Aurva (74). With the death of that Daitya it has undoubtedly been shorn of its power. It had been imprecated with a curse in the days of yore by him who had created it (75) If we can strike against this illusion the king of gods will be happy. Give me, O Sakra, my friend Nishakara (the moon) who is born of water (76). Being united with him and Yados¹⁶⁴ and controlling my senses, I shall by your favour, undoubtedly destroy this illusion

अध्याय २८

श्लोक 3

शमी च दण्डशर्मा च दत्तशत्रुश् च शत्रुजित् श्रवणा च श्रविष्ठा च स्वसारौ संबभूवतुः

śamī ca daṇḍaśarmā ca dattaśatruś ca śatrujit śravaṇā ca śraviṣṭhā ca svasārau saṃbabhūvatuḥ

हिन्दी अर्थ

समस्त प्राणियोंकी क्षुधा तथा देवताओंमें सदा बनी मेधा हो। वसुओंकी वसुमती भी तुम्हीं हो। तुम्हीं मनुष्योंकी आशा तथा कृतकृत्य पुरुषोंकी पुष्टि हो तथा अत्यन्त दारुण रेवती हो॥ २२॥ समस्त प्राणियोंको मोहमें डालनेवाली निद्रा भी तुम्हीं हो। तुम क्षत्रिया हो, विद्याओंमें ब्रह्मविद्या हो तथा तुम्हीं ३७कार एवं वषट्कार हो॥ २३ ॥ ऋषि तुम्हें नारियोंमें पुराण-प्रसिद्ध पार्वतीदेवीके रूपमें जानते हैं। तुम साध्वी स्त्रियोंमें अरुन्धती हो, जैसा कि प्रजापतिका कथन है॥ २४॥ तुम अपने पर्यायवाची दिव्य नामोंद्वारा इन्द्राणीके रूपमें विख्यात हो। तुमने इस समस्त चराचर जगतू्को व्याप्त कर रखा है

English

¹⁵⁴ One who eats grain without its having been threshed, anchorite.

अध्याय २८

श्लोक 4

शमीपुत्रः प्रतिक्षत्रः प्रतिक्षत्रस्य चात्मजः स्वयंभोजः स्वयंभोजाद् धृदिकः संबभूव ह

śamīputraḥ pratikṣatraḥ pratikṣatrasya cātmajaḥ svayaṃbhojaḥ svayaṃbhojād dhṛdikaḥ saṃbabhūva ha

हिन्दी अर्थ

नदीतीरेषु चौरेषु कान्तारेषु भयेषु च प्रवासे राजबन्धे च शत्रूणां च प्रमर्दने। प्राणात्ययेषु सर्वेषु त्वं हि रक्षा न संशय: त्वयि मे हृदयं देवि त्वयि चित्तं मनस्त्वयि। रक्ष मां सर्वपापेभ्य: प्रसादं कर्तुमहसि त्रिभिमासे: काइस्षितं च फल॑ बै सम्प्रयच्छसि। घषड्भिमसिर्वरिष्ठ तु वरमेक॑ प्रयच्छसि

English

¹⁵⁵ Breaking or bruising anything with a stone.

अध्याय २८

श्लोक 5

तस्य पुत्रा बभूवुर् हि सर्वे भीमपराक्रमाः कृतवर्माग्रजस् तेषां शतधन्वा तु मध्यमः

tasya putrā babhūvur hi sarve bhīmaparākramāḥ kṛtavarmāgrajas teṣāṃ śatadhanvā tu madhyamaḥ

हिन्दी अर्थ

संवत्सरेण सिद्धि तु यथाकामं प्रयच्छसि सत्यं ब्रह्म च दिव्यं च द्वैणवायनवचो यथा। नृणां बन्धं वध॑ घोरं पुत्रनाशं धनक्षयम् भविष्यसि महाभागे वरदा कामरूपिणी मोहयित्वा च तं कंसमेका त्वं भोक्ष्यसे जगत्। अहमप्यात्मनो वृत्ति विधास्ये गोषु गोपवत्

English

¹⁵⁶ Those who practise penances on the peak of a mountain.

अध्याय २८

श्लोक 6

देवान्तश् च नरान्तश् च भिषग् वैतरणश् च यः सुदान्तश् चाधिदान्तश् च कीनाशो दामदम्भकौ

devāntaś ca narāntaś ca bhiṣag vaitaraṇaś ca yaḥ sudāntaś cādhidāntaś ca kīnāśo dāmadambhakau

हिन्दी अर्थ

स्ववृद्धयर्थमहं चेव करिष्ये कंसगोपताम्। एवं तां स समादिश्य गतोउ्तर्धानमी श्वरः समस्त संग्रामोंमें, आगसे जलते हुए घरोंमें, नदीके तटोंपर, चोरों और लुटेरोंके दलोंमें, दुर्गम स्थानोंमें, भयके सभी अवसरोंमें, परदेशमें, राजाके द्वारा बन्धन प्राप्त होनेपर, शत्रुओंका मर्दन करते समय एवं सभी प्राणसंकटकी घड़ियोंमें तुम्हीं सबकी रक्षा करनेवाली हो, इसमें संशय नहीं है॥ २६-२७ ॥ देवि! मेरा हृदय तुममें लगा हुआ है। मेरा चित्त और मन भी तुम्हारे ही चिन्तन एवं मननमें तत्पर है। तुम समस्त पापोंसे मेरी रक्षा करो। तुम्हें मुझपर कृपा करनी चाहिए॥ २८ ॥ जो मनुष्य मेरे (विष्णु)-द्वारा किये गये तथा व्यासजीके द्वारा पद्यमें आबद्ध किये हुए इस सुन्दर दिव्य स्तोत्रका प्रातःकाल उठकर शुद्धभावसे संयतचित्त होकर पाठ करता है, उसे तुम तीन ही महीनोंमें

English

¹⁵⁷ Those who practise penances in the midst of fire.

अध्याय २८

श्लोक 7

देवान्तस्याभवत् पुत्रो विद्वान् कम्बलबर्हिषः क्रोष्टोः पुत्रो ऽनमित्रस् तु तस्माद् वै देवमीढुषः ।असमौजास् तथा वीरो नासमौजाश् च ताव् उभौ

devāntasyābhavat putro vidvān kambalabarhiṣaḥ kroṣṭoḥ putro 'namitras tu tasmād vai devamīḍhuṣaḥ | asamaujās tathā vīro nāsamaujāś ca tāv ubhau

हिन्दी अर्थ

मनोवाओ्छित फल प्रदान कर देती हो तथा जो छः महीनोंतक लगातार पाठ करता रहे, उसे कोई एक विशिष्ट तुम उपासकको दिव्य दृष्टि प्रदान करती हो और एक वर्षतक आराधना करनेपर उसे उसकी इच्छाके अनुसार सिद्धि देती हो॥३१॥ श्रीकृष्णद्वैणायन व्यासजीने जैसा बताया है, उसके अनुसार तुम्हीं सत्य एवं दिव्य ब्रह्म हो। महाभागे। तुम पूजित होनेपर मनुष्योंके बन्धन, भयानक वध, पुत्र और धनके नाश तथा रोग और मृत्युका भय दूर कर दोगी और इच्छानुसार रूप धारण करके उपासकोंके लिये वरदायिनी होओगी ॥ ३२-३३ ॥ इतना ही नहीं, तुम उस कंसको मोहमें डालकर अकेली ही सम्पूर्ण जगत्का उपभोग करोगी। मैं भी ब्रजमें गौओंके बीचमें रहकर गोपके समान ही अपना व्यवहार बनाऊँगा॥ ३४॥ मैं अपनी पुष्टिके लिये कंसके गौओंकी चरवाही करूँगा।

English

¹⁵⁸ Chastity in thought, words and deeds.

अध्याय २८

श्लोक 8

अजातपुत्राय सुतान् प्रददाव् असमौजसे सुदंष्ट्रं च सुचारुं च कृष्णम् इत्य् अन्धकाः स्मृताः

ajātaputrāya sutān pradadāv asamaujase sudaṃṣṭraṃ ca sucāruṃ ca kṛṣṇam ity andhakāḥ smṛtāḥ

हिन्दी अर्थ

योगनिद्राको ऐसा आदेश देकर भगवान् विष्णु अन्तर्धान हो गये॥ ३५॥ उस समय उस देवीने भी उन्हें नमस्कार करके “बहुत अच्छा' कहकर उनकी आज्ञाके पालन करनेका निश्चित विचार कर लिया॥ ३६॥ जो मनुष्य बारम्बार इस स्तोत्रका पाठ अथवा श्रवण करता है, वह अपने सम्पूर्ण मनोरथोंकी सिद्धि प्राप्त कर लेता है, इसमें कोई संशय नहीं है इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि स्वणगर्भविधाने आर्यास्तुतो तृतीयो5ध्याय: इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिव॑शके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें स्‍्वनयर्थ-विधान तथा आयदिवीकी स्तुतिविषयक वीसरा अध्याय पूरा हुआ

English

¹⁵⁹ The consummation of the Yoga practices and the attainment of the object thereof.

अध्याय २८

श्लोक 9

एते चान्ये च बहवो अन्धकाः कथितास् तव ।अन्धकानाम् इमं वंशं धारयेद् यस् तु नित्यशः ।आत्मनो विपुलं वंशं लभते नात्र संशयः ।गान्धारी चैव माद्री च क्रोष्टोर् भार्ये बभूवतुः गान्धारी जनयाम् आस सुमित्रं मित्रनन्दनम्

ete cānye ca bahavo andhakāḥ kathitās tava | andhakānām imaṃ vaṃśaṃ dhārayed yas tu nityaśaḥ | ātmano vipulaṃ vaṃśaṃ labhate nātra saṃśayaḥ | gāndhārī caiva mādrī ca kroṣṭor bhārye babhūvatuḥ gāndhārī janayām āsa sumitraṃ mitranandanam

हिन्दी अर्थ

कंसद्वारा देवकीके नवजात शिशुओंकी हत्या, योगमायाद्वारा सातवें गर्भका संकर्षण, श्रीकृष्णका प्राकट्य और नन्दभवनमें प्रवेश, कंसद्वारा नन्दकन्याको मारनेका प्रयथल और उसका दिव्य रूपमें दर्शन देना, कंसद्वारा क्षमा-प्रार्थाा और देवकीद्वारा उसे क्षमा-दान कृते गर्भविधाने तु देवकी देवतोपमा। जग्राह सप्त तान् गर्भान् यथावत् समुदाहतान् रोहिणीमिव सोमस्य वसुदेवस्य धीमत: कर्षणेनास्य गर्भस्य स्वगर्भ चाहितस्य वै। संकर्षणो नाम सुतः शुभे तव भविष्यति

English

¹⁶⁰ It means here hypocrisy.

अध्याय २८

श्लोक 10

माद्री युधाजितं पुत्रं ततो वै देवमीढुषम् अनमित्रम् अमित्राणां जेतारं च महाबलम्

mādrī yudhājitaṃ putraṃ tato vai devamīḍhuṣam anamitram amitrāṇāṃ jetāraṃ ca mahābalam

हिन्दी अर्थ

तस्य गर्भस्य मार्गेण गर्भमाधत्त देवकी। यदर्थ सप्त ते गर्भा: कंसेन विनिपातिता: विष्णो: शरीरजां निद्गां विष्णुनिर्देशकारिणीम् गर्भकाले त्वसम्पूर्णे अष्टमे मासि ते स्त्रियौ। देवकी च यशोदा च सुषुवाते सम॑ तदा वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय ! तदनन्तर पतिद्वारा गर्भाधान किये जानेपर देवताके समान तेजस्विनी देवकीने पहले बताये हुए सात गर्भोको क्रमश: यथोचितरूपसे ग्रहण किया॥ १॥ पहले जो छ: गर्भ

English

¹⁶¹ Regulations observed by Rishis living in the forest.

अध्याय २८

श्लोक 11

अनमित्रसुतो निघ्नो निघ्नस्य द्वौ बभूवतुः प्रसेनश् चाथ सत्राजिच् छत्रुसेनाजिताव् उभौ

anamitrasuto nighno nighnasya dvau babhūvatuḥ prasenaś cātha satrājic chatrusenājitāv ubhau

हिन्दी अर्थ

प्रकट हुए, उन सबको कंसने पत्थरपर पटककर मार डाला। जब सातवाँ गर्भ प्राप्त हुआ, तब योगमायाने उसे रोहिणीके उदरमें स्थापित कर दिया॥ २॥ रजस्वला रोहिणी आधी रातके समय अपने भीतर स्थापित हुए उस गर्भको गिरानेकी चेष्टा करने लगी; परंतु सहसा निद्रासे आविष्ट होकर वह स्वयं पृथ्वीपर गिर पड़ी उसने अपने पेटसे निकले हुए उस गर्भको स्वनकी भाँति देखकर फिर नहीं देखा (क्योंकि योगमायाने उसे अदृश्य कर दिया था); इससे दो घड़ीतक उसके मनमें बड़ी व्यथा हुई॥ ४॥ रात्रिके अन्धकारमें बुद्धिमान् वसुदेवकी पत्नी रोहिणी चन्द्रमाकी प्यारी भार्या रोहिणीके समान दिखायी देती थी। वह उस गर्भके लिये उद्ठिग्न हो रही थी। उस समय निद्राने उससे कहा-- ॥ ५॥ 'शुभे ! तुम्हारे उदरमें स्थापित हुआ जो यह गर्भ है, इसका आकर्षण

English

¹⁶² Wood for kindling a fire exciting it by attrition.

अध्याय २८

श्लोक 12

प्रसेनो द्वारवत्यां तु निविशन्त्यां महामणिम् दिव्यं स्यमन्तकं नाम समुद्राद् उपलब्धवान्

praseno dvāravatyāṃ tu niviśantyāṃ mahāmaṇim divyaṃ syamantakaṃ nāma samudrād upalabdhavān

हिन्दी अर्थ

हुआ है, इस कारण यह पुत्र संकर्षण नामसे प्रसिद्ध होगा'॥ ६॥ इस प्रकार उस पुत्रको पाकर रोहिणी मन- ही-मन प्रसन्न हुई; किंतु लजासे उसका मुख कुछ नीचेको झुक गया। फिर तो वह उत्तम प्रभासे युक्त रोहिणीके समान अपने भवनके भीतर चली गयी ॥ ७॥ उधर देवकीके उस सातवें गर्भकी खोज होने लगी; इतनेहीमें उसने आठवाँ गर्भ धारण किया, जिसके लिये कंसने उसके पहलेके सात गर्भ मार गिराये थे॥ ८॥ कंसके मन्त्री उस आठवें गर्भकी रक्षामें यत्रपूर्वक लग गये। इधर भगवान् विष्णु भी स्वेच्छासे ही उस गर्भमें निवास करने लगे॥९॥ उसी दिन (गोकुलमें) यशोदाने भी भगवान् विष्णुकी आज्ञाका पालन करनेवाली तथा उन्हींके शरीरसे प्रकट हुई योगनिद्राको अपने गर्भमें धारण किया॥ १० ॥ गर्भका समय पूर्ण होनेसे पहले ही आठवें मासमें उन दोनों स्त्रियों-देवकी और यशोदाने प्रायः एक ही साथ प्रसव किया

English

¹⁶³ Kusa or sacrificial grass.

अध्याय २८

श्लोक 13

तस्य सत्राजितः सूर्यः सखा प्राणसमो ऽभवत् ।स कदाचिन् निशापाये रथेन रथिनां वरः ।अब्धिकूलम् उपस्प्रष्टुम् उपस्थातुं ययौ रविम् ।तस्योपतिष्ठतः सूर्यं विवस्वान् अग्रतः स्थितः ।अस्पष्टमूर्तिर् भगवांस् तेजोमण्डलवान् प्रभुः ॥ अथ राजा विवस्वन्तम् उवाच स्थितम् अग्रतः ।यथैव व्योम्नि पश्यामि सदा त्वां ज्योतिषां पते ।तेजोमण्डलिनं देवं तथैव पुरतः स्थितम् ।को विशेषो ऽस्ति मे त्वत्तः सख्येनोपागतस्य वै ।एतच् छ्रुत्वा तु भगवान् मणिरत्नं स्यमन्तकम् ॥ स्वकण्ठाद् अवमुच्यैव एकान्ते न्यस्तवान् भुवि ।ततो विग्रहवन्तं तं ददर्श नृपतिस् तदा ।प्रीतिमान् अथ तं दृष्ट्वा मुहूर्तं कृतवान् कथाम् ।तम् अभिप्रस्थितं भूयो विवस्वन्तं स सत्रजित् ।लोकान् उद्भासयस्य् एतान् येन त्वं सततं प्रभो ॥ तद् एतन् मणिरत्नं मे भगवन् दातुम् अर्हसि ।ततः स्यमन्तकमणिं दत्तवांस् तस्य भास्करः ।स तम् आबध्य नगरीं प्रविवेश महीपतिः ।तं जनाः पर्यधावन्त सूर्यो ऽयं गच्छतीति ह ।पुरीं विस्मापयित्वा स राजा त्व् अन्तःपुरं ययौ ॥ तत् प्रसेनजिते दिव्यं मणिरत्नं स्यमन्तकम् ।ददौ भ्रात्रे नरपतिः प्रेम्णा सत्राजिद् उत्तमम् ।सत्राजित् स्वगृहं श्रीमत् कृतकौतुकमङ्गलम् ।प्रविश्य देवसदने मणिं विप्रैर् न्यवेदयत् ॥ दिने दिने स्वर्णभारान् अष्टौ स स्रवति प्रभो ।अवतार्य गलात् तूर्णम् एकान्ते संन्यवेशयत् ।ततः सत्राजितः सूर्यं ज्वलन्तं वपुषा तदा ।प्रणिपत्य महात्मानं कृताञ्जलिर् अवस्थितः ॥ स्तुत्वा च विविधैः स्तोत्रैः प्रीणयाम् आस भास्करम् ।ततः प्रसन्नो भगवान् वृणीष्व वरम् ईप्सितम् ॥ इत्य् उवाच स राजानं स च वव्रे मणिं तदा ।स चापि तं मणिं दत्त्वा तत्रैवान्तरधीयत ॥ सत्राजिच् च महाराज मणिरत्नं स्यमन्तकम् ।स मणिः स्यन्दते रुक्मं वृष्ण्यन्धकनिवेशने कालवर्षी च पर्जन्यो न च व्याधिभयं भवेत्

tasya satrājitaḥ sūryaḥ sakhā prāṇasamo 'bhavat | sa kadācin niśāpāye rathena rathināṃ varaḥ | abdhikūlam upaspraṣṭum upasthātuṃ yayau ravim | tasyopatiṣṭhataḥ sūryaṃ vivasvān agrataḥ sthitaḥ | aspaṣṭamūrtir bhagavāṃs tejomaṇḍalavān prabhuḥ || atha rājā vivasvantam uvāca sthitam agrataḥ | yathaiva vyomni paśyāmi sadā tvāṃ jyotiṣāṃ pate | tejomaṇḍalinaṃ devaṃ tathaiva purataḥ sthitam | ko viśeṣo 'sti me tvattaḥ sakhyenopāgatasya vai | etac chrutvā tu bhagavān maṇiratnaṃ syamantakam || svakaṇṭhād avamucyaiva ekānte nyastavān bhuvi | tato vigrahavantaṃ taṃ dadarśa nṛpatis tadā | prītimān atha taṃ dṛṣṭvā muhūrtaṃ kṛtavān kathām | tam abhiprasthitaṃ bhūyo vivasvantaṃ sa satrajit | lokān udbhāsayasy etān yena tvaṃ satataṃ prabho || tad etan maṇiratnaṃ me bhagavan dātum arhasi | tataḥ syamantakamaṇiṃ dattavāṃs tasya bhāskaraḥ | sa tam ābadhya nagarīṃ praviveśa mahīpatiḥ | taṃ janāḥ paryadhāvanta sūryo 'yaṃ gacchatīti ha | purīṃ vismāpayitvā sa rājā tv antaḥpuraṃ yayau || tat prasenajite divyaṃ maṇiratnaṃ syamantakam | dadau bhrātre narapatiḥ premṇā satrājid uttamam | satrājit svagṛhaṃ śrīmat kṛtakautukamaṅgalam | praviśya devasadane maṇiṃ viprair nyavedayat || dine dine svarṇabhārān aṣṭau sa sravati prabho | avatārya galāt tūrṇam ekānte saṃnyaveśayat | tataḥ satrājitaḥ sūryaṃ jvalantaṃ vapuṣā tadā | praṇipatya mahātmānaṃ kṛtāñjalir avasthitaḥ || stutvā ca vividhaiḥ stotraiḥ prīṇayām āsa bhāskaram | tataḥ prasanno bhagavān vṛṇīṣva varam īpsitam || ity uvāca sa rājānaṃ sa ca vavre maṇiṃ tadā | sa cāpi taṃ maṇiṃ dattvā tatraivāntaradhīyata || satrājic ca mahārāja maṇiratnaṃ syamantakam | sa maṇiḥ syandate rukmaṃ vṛṣṇyandhakaniveśane kālavarṣī ca parjanyo na ca vyādhibhayaṃ bhavet

हिन्दी अर्थ

यामेव रजनीं कृष्णो जज्ञे वृष्णिकुलोद्वह: । तामेव रजनीं कन्‍्यां यशोदापि व्यजायत नन्दगोपस्य भार्यका वसुदेवस्य चापरा। तुल्यकालं च गर्भिण्यौ यशोदा देवकी तथा देवक्यजनयद् विष्णुं यशोदा तां तु दारिकाम्। मुहूर्ते अभिजिति प्राप्ते सार्धरात्रे विभूषिते शिवाश्च प्रववुर्वाताः प्रशान्तमभवद् रज: । ज्योतींष्यतिव्यकाशन्त जायमाने जनार्दने

English

¹⁶³ Kusa or sacrificial grass.

अध्याय २८

श्लोक 14

लिप्सां चक्रे प्रसेनात् तु मणिरत्नं स्यमन्तकम् गोविन्दो न च तं लेभे शक्तो ऽपि न जहार सः

lipsāṃ cakre prasenāt tu maṇiratnaṃ syamantakam govindo na ca taṃ lebhe śakto 'pi na jahāra saḥ

हिन्दी अर्थ

जायमानो हि भगवान्नयनै्मोहयन् प्रभु: अनाहता दुन्दुभयो देवानां प्राणदन् दिवि। आकाशात् पुष्पवृष्टिं च ववर्ष त्रिदशे श्वर: जायमाने हषीकेशे प्रहष्टमभवज्जगत्। इन्द्रश्न त्रिदशैः सार्थ तुष्टाव मधुसूदनम् वसुदेवश्च तं रात्रौ जात॑ पुत्रमधोक्षजम्।

English

¹⁶³ Kusa or sacrificial grass.

अध्याय २८

श्लोक 15

कदाचिन् मृगयां यातः प्रसेनस् तेन भूषितः स्यमन्तककृते सिंहाद् वधं प्राप वनेचरात्

kadācin mṛgayāṃ yātaḥ prasenas tena bhūṣitaḥ syamantakakṛte siṃhād vadhaṃ prāpa vanecarāt

हिन्दी अर्थ

उवाच वसुदेवस्तु रूपं संहर वै प्रभो भीतो5हं देव कंसस्य तस्मादेवं ब्रवीम्यहम् । मम पुत्रा हतास्तेन तब ज्येष्ठाम्बुजेक्षण वसुदेववच: श्रुत्वा रूपं चाहरदच्युतः। अनुज्ञाप्प पितृत्वेन नन्दगोपगृह नय वृष्णिकुलका भार वहन करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण जिस रातमें प्रकट हुए, उसी रातमें यशोदाने भी एक कन्याको जन्म दिया॥१२॥ एक यशोदा नन्दगोपको भार्या थी और दूसरी देवकी वसुदेवकी। वे दोनों प्रायः

English

¹⁶³ Kusa or sacrificial grass.

अध्याय २८

श्लोक 16

अथ सिंहं प्रधावन्तम् ऋक्षराजो महाबलः निहत्य मणिरत्नं तम् आदाय बिलम् आविशत्

atha siṃhaṃ pradhāvantam ṛkṣarājo mahābalaḥ nihatya maṇiratnaṃ tam ādāya bilam āviśat

हिन्दी अर्थ

एक ही समयमें गर्भवती हुईं॥ १३॥ (आठवें मासमें) आधी रातके समय सुन्दर अभिजित् मुहूर्तका योग प्राप्त होनेपर देवकीने भगवान् विष्णुको पुत्ररूपसे जन्म दिया और यशोदाने उस कन्याको॥ १४॥ भगवान् श्रीकृष्णके जन्म (अवतार) ग्रहण करते समय समुद्रोंमें ज्वार-सा उठने लगा। पृथ्वीको धारण करनेवाले शेष आदि विचलित गयीं ॥ १५॥ श्रीकृष्णके अवतार लेते समय शीतल मन्द गयी तथा ग्रह और नक्षत्र अत्यन्त प्रकाशित होने लगे

English

¹⁶³ Kusa or sacrificial grass.

अध्याय २८

श्लोक 17

ततो वृष्ण्यन्धकाः कृष्णं प्रसेनवधकारणात् प्रार्थनां तां मणेर् बुद्ध्वा सर्व एव शशङ्किरे

tato vṛṣṇyandhakāḥ kṛṣṇaṃ prasenavadhakāraṇāt prārthanāṃ tāṃ maṇer buddhvā sarva eva śaśaṅkire

हिन्दी अर्थ

जब भगवान् श्रीकृष्ण प्रकट हुए, उस समय अभिजितू नामक मुहूर्त था, रोहिणी नक्षत्रका योग होनेसे अष्टमीकी वह रात जयन्ती कहलाती थी और विजय नामक सूक्ष्मस्वरूप पापहारी तथा सर्वसमर्थ भगवान् नारायणने प्रकट होते ही अपने नेत्रोंस सबका मन मोह लिया स्वर्गलोकमें बिना बजाये ही देवताओंकी दुन्दुभियाँ बज उठीं। देवेश्वर इन्द्र आकाशसे फूलोंकी वर्षा करने मड्ुलमय वचनोंद्वारा भगवान् मधुसूदनकी स्तुति करते हुए उनकी सेवामें उपस्थित हुए॥ २० ॥ भगवान् श्रीकृष्णका प्राकट्य होते ही सम्पूर्ण जगत्में हर्षोल्लास छा गया।

English

¹⁶³ Kusa or sacrificial grass.

अध्याय २८

श्लोक 18

स शङ्क्यमानो धर्मात्मा नकारी तस्य कर्मणः आहरिष्ये मणिम् इति प्रतिज्ञाय वनं ययौ

sa śaṅkyamāno dharmātmā nakārī tasya karmaṇaḥ āhariṣye maṇim iti pratijñāya vanaṃ yayau

हिन्दी अर्थ

की॥ २१॥ वसुदेवने भी रात्रिमें प्रकट हुए अपने पुत्ररूप भगवान् अधोक्षजका स्तवन किया। उन्हें श्रीवत्सके चिह्ल और दिव्य लक्षणोंसे सम्पन्न देखकर वसुदेवने कहा-- प्रभो! आप अपने स्वरूपको समेट लीजिये देव! मैं कंसके भयसे डरा हुआ हूँ, इसीलिये ऐसी बात कहता हूँ। कमलनयन! उसने मेरे बहुत-से पुत्र मार डाले हैं, जो तुमसे जेठे थे' वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय ! वसुदेवका यह वचन सुनकर भगवान् अच्युतने पिता होनेके कारण उनकी आज्ञा स्वीकार कर ली और उनसे कहा, “आप मुझे नन्‍्दगोपके घर पहुँचा दीजिये (तथा उनकी नवजात कन्याको यहाँ उठा लाइये)।' ऐसा कहकर उन्होंने अपने चतुर्भुजरूपका उपसंहार कर लिया

English

¹⁶³ Kusa or sacrificial grass.

अध्याय २८

श्लोक 19

देवद्विजातिभक्तो ऽयं श्रियः सर्वेचरो ऽपि च ।यत्र प्रसेनो भृगयाम् आचरत् तत्र चाप्य् अथ ।प्रसेनस्य पदं गृह्य पुरुषैर् आप्तकारिभिः ऋक्षवन्तं गिरिवरं विन्ध्यं च गिरिम् उत्तमम्

devadvijātibhakto 'yaṃ śriyaḥ sarvecaro 'pi ca | yatra praseno bhṛgayām ācarat tatra cāpy atha | prasenasya padaṃ gṛhya puruṣair āptakāribhiḥ ṛkṣavantaṃ girivaraṃ vindhyaṃ ca girim uttamam

हिन्दी अर्थ

वसुदेवस्तु संगृह्य दारकं श्षिप्रमेव च। यशोदाया गृहं रात्रो विवेश सुतवत्सल: प्रगृह्न दारिकां चैव देवकीशयने न्‍्यसत् वसुदेवः कृतार्थों वै निर्जगाम निवेशनात् उग्रसेनसुतायाथ कंसायानकदुन्दुभिः । निवेदयामास तदा तां कन्यां वरवर्णिनीम्

English

¹⁶³ Kusa or sacrificial grass.

अध्याय २८

श्लोक 20

अन्वेषयन् परिश्रान्तः स ददर्श महामनाः साश्वं हतं प्रसेनं तु नाविन्दच् चैव तं मणिम्

anveṣayan pariśrāntaḥ sa dadarśa mahāmanāḥ sāśvaṃ hataṃ prasenaṃ tu nāvindac caiva taṃ maṇim

हिन्दी अर्थ

आजगाम गृहद्वारं वसुदेवस्य वीर्यवान् ततो हाहाकृताः सर्वा देवकीभवतने स्त्रिय: । उवाच देवकी दीना बाष्पगदूदया गिरा दारिका तु प्रजातेति कंसं समभियाचती। श्रीमन्तो मे हताः सप्त पुत्रगर्भास्त्वया विभो दारिकेयं हतेवैषा पश्यस्व यदि मन्यसे। दृष्टा कंसस्तु तां कन्यामाकृष्यत मुदा युतः

English

¹⁶³ Kusa or sacrificial grass.

अध्याय २८

श्लोक 21

अथ सिंहः प्रसेनस्य शरीरस्याविदूरतः ऋक्षेन निहतो दृष्टः पादैर् ऋक्षस्य सूचितः

atha siṃhaḥ prasenasya śarīrasyāvidūrataḥ ṛkṣena nihato dṛṣṭaḥ pādair ṛkṣasya sūcitaḥ

हिन्दी अर्थ

तब पुत्रवत्सल वसुदेव शीघ्र ही उस बालककों गोदमें लेकर रातके समय यशोदाके घरमें घुस गये यशोदाको उनके आनेका कुछ पता न चला। वहाँ उन्होंने अपने बालककों रख दिया और उस कन्याकों लेकर अपने निवासस्थानमें आनेके बाद उसे देवकीकी शब्यापर सुला दिया॥ २६॥ इस प्रकार उन दोनों नवजात बालकोंकी अदला-बदली करके कृतार्थ हुए वसुदेवजी भयसे व्याकुल हो उस घरसे बाहर निकल गये॥ २७॥ आनकदुन्दुभि नामसे प्रसिद्ध वसुदेवने उग्रसेनपुत्र कंसके पास जाकर उसे अपनी सुन्दरी कनन्‍्याके जन्मका समाचार निवेदन किया॥ २८ ॥ यह सुनकर पराक्रमी कंस बड़ी उतावलीके साथ पैर बढ़ाता हुआ बेगशाली रक्षकोंको साथ लिये वसुदेवके गृहके द्वारपर आया॥ २९ ॥ वहाँ द्वारपर पहुँचते ही उसने तुरंत पूछा--'कौन-सा बच्चा पैदा हुआ है?

English

¹⁶³ Kusa or sacrificial grass.

अध्याय २८

श्लोक 22

पादैस् तैर् अन्वियायाथ गुहाम् ऋक्षस्य माधवः महत्य् ऋक्षबिले वाणीं शुश्राव प्रमदेरिताम्

pādais tair anviyāyātha guhām ṛkṣasya mādhavaḥ mahaty ṛkṣabile vāṇīṃ śuśrāva pramaderitām

हिन्दी अर्थ

उसे शीघ्र मेरे हवाले कर दो' ऐसी बातें कहकर वह वहाँ जोर-जोरसे गर्जन-तर्जज करने लगा॥३०॥ तब देवकीके घरमें एकत्रित हुई सारी स्त्रियाँ हाहाकार करने लगीं। देवकीने अत्यन्त दीन होकर अश्रुगद्द वाणीमें कहा--॥ ३१ ॥ “प्रभो! यह तो कन्या पैदा हुई है', ऐसा कहकर वह कंससे उसके लिये याचना करती हुई गर्भावस्‍थामें ही थे, मार डाले हैं॥३२॥ यह तो कन्या है। यह बेचारी आप ही मरी हुई है, देखो! यदि समझमें आये तो मेरी बात मान लो (यह कन्या मुझे दे दो)।' कंस उस कन्याको देखकर उसकी ओर आकृष्ट हुआ और मन-ही-मन प्रसन्नताका अनुभव करने लगा

English

¹⁶³ Kusa or sacrificial grass.

अध्याय २८

श्लोक 23

धात्र्या कुमारम् आदाय सुतं जाम्बवतो नृप क्रीडापयन्त्या मणिना मा रोदीर् इत्य् अथेरिताम्

dhātryā kumāram ādāya sutaṃ jāmbavato nṛpa krīḍāpayantyā maṇinā mā rodīr ity atheritām

हिन्दी अर्थ

उसने कहा--'जब यह कन्या मरी ही हुई है, तब इसे पैदा हुई कहकर इसकी ओर मन चलाना व्यर्थ है।' वह कन्या अभी गर्भशय्यापर क्लेशपूर्वक लेटी हुई थी। अभी उसके केश गर्भस्थ जलसे भीगे हुए थे। उसी अवस्थामें वह कंसके आगे पृथ्वीपर रख दी गयी। उस समय वह पृथ्वीके समान ही जान पड़ती थी। उस दुरात्मा पुरुष कंसने उसे पकड़कर घुमाया और तुच्छ मानकर ऊपरसे ही सहसा शिलापर दे मारा वह शिलापृष्ठपर फेंकी गयी, परंतु उसपर चूर-चूर होनेसे पहले ही आकाशमें उड़ गयी। उस गर्भदेहको त्यागकर कंसको ललकारती हुई वह सहसा आकाशमें जा पहुँची। उस समय उसके लम्बे-लम्बे केश खुले हुए थे। दिव्य फूलोंक हार और अनुलेपन उसकी शोभा बढ़ाते थे ॥ ३४--३७॥

English

¹⁶³ Kusa or sacrificial grass.

अध्याय २८

श्लोक 24

सिंहः प्रसेनम् अवधीत् सिंहो जाम्बवता हतः सुकुमारक मा रोदीस् तव ह्य् एष स्यमन्तकः

siṃhaḥ prasenam avadhīt siṃho jāmbavatā hataḥ sukumāraka mā rodīs tava hy eṣa syamantakaḥ

हिन्दी अर्थ

२९० श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे . उसके समस्त अड्भोंकी शोभा बढ़ गयी थी। मस्तकपर उज्वल मुकुटसे विभूषित हो वह देवी सदाके लिये कन्या (कुमारी) ही रह गयी। उसकी आकृति दिव्य थी और सब देवता उसकी स्तुति करते थे॥३८॥ वह अपने अज्भोंपप नील और पीत वस्त्र धारण किये हुए थी। उसके उन्नत उरोज हाथीके कुम्भस्थलके समान जान पड़ते थे। उसका जघनप्रदेश रथके समान विस्तृत था। मुख चन्द्रमाके सदृूश मनोरम था। वह चार भुजाओंसे सुशोभित थी॥ ३९॥ उसकी अड्गकान्ति विद्युतके समान प्रकाशित हो रही थी। दोनों नेत्र प्रभातकालके सूर्यकी भाँति लाल थे। मेघोंके समान उन्नत उरोजोंबाली वह देवी बादलोंसे युक्त संध्याके

English

¹⁶³ Kusa or sacrificial grass.

अध्याय २८

श्लोक 25

व्यक्तीकृतश् च शब्दः स तूर्णं चापि ययौ बिलम् प्रविश्य चापि भगवांस् तम् ऋक्षबिलम् अञ्जसा ।स्थापयित्वा बिलद्वारि यदूंल् लाङ्गलिना सह ।शार्ङ्गधन्वा बिलस्थं तु जाम्बवन्तं ददर्श ह

vyaktīkṛtaś ca śabdaḥ sa tūrṇaṃ cāpi yayau bilam praviśya cāpi bhagavāṃs tam ṛkṣabilam añjasā | sthāpayitvā biladvāri yadūṃl lāṅgalinā saha | śārṅgadhanvā bilasthaṃ tu jāmbavantaṃ dadarśa ha

हिन्दी अर्थ

समान सुशोभित हो रही थी ॥ ४० ॥ अन्धकारसे आच्छन्न हुई रात्रिके समय जब कि भूतोंके समुदाय सब ओर भरे हुए थे, वह दीप्तिमती देवी नाचती, हँसती और चारों ओर उछलती-कूदती हुई अद्भुत शोभा पा रही थी उसका स्वरूप बड़ा ही भयंकर था। वह आकाशमें पहुँचकर परम उत्तम मधुका पान तथा बड़े जोरसे अट्टहास करने लगी। फिर रोषमें भरकर कंससे बोली-- “कंस! ओ कंस! तूने अपने ही विनाशके लिये जो मुझे मार डालनेका प्रयत्न किया है और सहसा उठाकर शिलापर दे मारा है, उसके कारण मैं भी तेरे अन्तकालमें जिस समय तू शत्रुके द्वारा घमीटा जा रहा होगा, अपने हाथोंसे तेरी इस देहको फाड़कर तेरा गरम-गरम रक्त पीऊँगी '॥ ४३-४४ ॥ ऐसा घोर वचन कहकर वह देवी यथेष्ट मार्गसे अपने गणोंसहित आकाश और देवलोकमें विचरने लगी॥४५॥ वहाँ वृष्णिवंशियोंके समुदायसे

English

¹⁶³ Kusa or sacrificial grass.

अध्याय २८

श्लोक 26

युयुधे वासुदेवस् तु बिले जाम्बवता सह बाहुभ्याम् एव गोविन्दो दिवसान् एकविंसतिम्

yuyudhe vāsudevas tu bile jāmbavatā saha bāhubhyām eva govindo divasān ekaviṃsatim

हिन्दी अर्थ

भलीभाँति पूजित हो वह कन्या बढ़ने लगी। वसुदेवकी आज्ञासे उस समय उसका पुत्रवत् पालन होने लगा जनमेजय ! तुम इस देवीको प्रजापालक भगवान् विष्णुके अंशसे उत्पन्न हुई समझो। वह एक होती हुई अनंशा-- अंशरहित अर्थात् अविभक्त थी, इसलिये एकानंशा कहलाती थी। योगबलसे कन्यारूपमें प्रकट हुई वह देवी भगवान् श्रीकृष्णकी रक्षाके लिये आविर्भूत हुई थी जैसे वात्सल्यभाव रखनेवाले उपासक भगवान्के बाल-विग्रहकी उपासना या पूजा करते समय प्यार करते, लाड़ लड़ाते और उनके पालन-पोषण एवं संवर्धनका ध्यान रखते हैं, उसी प्रकार वसुदेवकी आज्ञासे उस चिदानन्दमयी देवीका कन्यारूपसे यादवोंके यहाँ पूजन होने लगा। यद्यपि वह आकाशमें चली गयी तो भी उनके आवाहन करनेपर उनके यहाँ पधारकर उनके वात्सल्य और लाड़-प्यारको वह ग्रहण करती रही। ऐसा समझना चाहिए।

English

¹⁶³ Kusa or sacrificial grass.

अध्याय २८

श्लोक 27

स वै भगवतानेन युयुधे स्वामिनात्मनः ।पुरुषं प्राकृतो मत्वा कुपितो नानुभाववित् ।द्वंद्वयुद्धं सुतुमुलम् उभयोर् विजिगीषतोः ।आयुधाश्मद्रुमैर् दोर्भिः क्रव्यार्थे श्येनयोर् इव ।प्रविष्टे तु बिलं कृष्णे वसुदेवपुरःसराः अदृष्ट्वा निर्गमं शौरेः प्रविष्टस्य बिलं जनाः ।प्रतीक्ष्य द्वादशाहानि दुःखिताः स्वपुरं ययुः ।पुनर् द्वारवतीम् एत्य हतं कृष्णं न्यवेदयन्

sa vai bhagavatānena yuyudhe svāminātmanaḥ | puruṣaṃ prākṛto matvā kupito nānubhāvavit | dvaṃdvayuddhaṃ sutumulam ubhayor vijigīṣatoḥ | āyudhāśmadrumair dorbhiḥ kravyārthe śyenayor iva | praviṣṭe tu bilaṃ kṛṣṇe vasudevapuraḥsarāḥ adṛṣṭvā nirgamaṃ śaureḥ praviṣṭasya bilaṃ janāḥ | pratīkṣya dvādaśāhāni duḥkhitāḥ svapuraṃ yayuḥ | punar dvāravatīm etya hataṃ kṛṣṇaṃ nyavedayan

हिन्दी अर्थ

कन्यैव साभवत्नित्यं दिव्या देवैरभिष्ठता तस्मात् तवान्तकाले5हं कृष्यमाणस्य शत्रुणा। पाटयित्वा करैदेहमुष्णं पास्यामि शोणितम् खं सा देवालयं देवी सगणा विचचार ह पुत्रवत् पाल्यमाना सा वसुदेवाज्ञया तदा

English

¹⁶³ Kusa or sacrificial grass.

अध्याय २८

श्लोक 28

निशम्य देवकी राजन् रुक्मिण्य् आनकदुंदुभिः ।सुहृदो ज्ञातयो ऽशोचन् बिलात् कृष्णम् अनिर्गतम् ।वासुदेवस् तु निर्जित्य जाम्बवन्तं महाबलम् जाम्बवन्तं विनिर्जित्य वासुदेवो महाबलम् ।लेभे जाम्बवतीं कन्याम् ऋक्षराजस्य संमताम्

niśamya devakī rājan rukmiṇy ānakaduṃdubhiḥ | suhṛdo jñātayo 'śocan bilāt kṛṣṇam anirgatam | vāsudevas tu nirjitya jāmbavantaṃ mahābalam jāmbavantaṃ vinirjitya vāsudevo mahābalam | lebhe jāmbavatīṃ kanyām ṛkṣarājasya saṃmatām

हिन्दी अर्थ

विद्धि चैनामथोत्पन्नामंशाद् देवीं प्रजापते: । एकानंशां योगकन्यां रक्षार्थ केशवस्य तु देववद् दिव्यवपुषा कृष्ण: संरक्षितो यया विविक्ते देवकीं चैव ब्रीडित: समभाषत अन्य एवान्यतो देवि मम मृत्युरुपस्थित:

English

¹⁶³ Kusa or sacrificial grass.

अध्याय २८

श्लोक 29

मणिं स्यमन्तकं चैव जग्राहात्मविशुद्धये अनुनीयर्क्षराजानं निर्ययौ च तदा बिलात्

maṇiṃ syamantakaṃ caiva jagrāhātmaviśuddhaye anunīyarkṣarājānaṃ niryayau ca tadā bilāt

हिन्दी अर्थ

देव पुरुषकारेण न चातिक्रान्तवानहम् हेतुभूतस्त्वह॑ तेषां सति कालविपर्यये काल एव नृणां शत्रु: कालश्च परिणामक:ः । कालो नयति सर्व वै हेतुभूतस्तु मद्विध: आगमिष्यन्ति वै देवि यथाभागमुपद्रवा:। इदं तु कष्ट यज्न्तु: कर्ताहमिति मन्यते

English

¹⁶³ Kusa or sacrificial grass.

अध्याय २८

श्लोक 30

द्वारकाम् अगमत् कृष्णः श्रिया परमया युतः ।एवं स मणिम् आहृत्य विशोध्यात्मानम् अच्युतः ददौ सत्राजिते तं वै सर्वसात्वतसंसदि

dvārakām agamat kṛṣṇaḥ śriyā paramayā yutaḥ | evaṃ sa maṇim āhṛtya viśodhyātmānam acyutaḥ dadau satrājite taṃ vai sarvasātvatasaṃsadi

हिन्दी अर्थ

मा कार्षी: पुत्रजां चिन्तां विलापं शोकजं त्यज। एवं प्रायो नृणां योनिर्नास्ति कालस्य संस्थिति: एष ते पादयोमूर्श्ना पुत्रवत् तव देवकि। मदृतस्त्यज्यतां रोषो जानाम्यपकृतं त्वयि इत्युक्तवन्तं कंसं सा देवकी वाक्यमन्रवीत् । उत्तिष्ठोत्तिष्ठ वत्सेति कंसं मातेव जल्पती

English

¹⁶³ Kusa or sacrificial grass.

अध्याय २८

श्लोक 31

एवं मिथ्याभिशस्तेन कृष्णेनामित्रघातिना आत्मा विशोधितः पापाद् विनिर्जित्य स्यमन्तकम्

evaṃ mithyābhiśastena kṛṣṇenāmitraghātinā ātmā viśodhitaḥ pāpād vinirjitya syamantakam

हिन्दी अर्थ

ममाग्रतो हता गर्भा ये त्ववा कामरूपिणा। कारणंत्वंनवैपुत्र कृतान्तो5प्यत्र कारणम् यदुकुलमें उत्पन्न हुए. समस्त देवता उस देवीका आराध्यदेवके समान पूजन करते थे; क्योंकि उसने अपने दिव्य देहसे श्रीकृष्णकी रक्षा की थी उसके चले जानेपर कंसने उसे ही अपनी मृत्यु समझा और एकान्तमें देवकीके पास जाकर लज्जित हो वह इस प्रकार बोला कंसने कहा--बहिन! मैंने मृत्युकों टालनेका प्रयत्त किया और इसी धोखेमें मैंने तुम्हारे बच्चोंको मार डाला, परंतु देवि! कोई दूसरा ही दूसरी जगहसे मेरी मृत्यु बनकर उपस्थित हो गया है॥ ५० ॥ मैंने क्रूरतापूर्वक

English

¹⁶³ Kusa or sacrificial grass.

अध्याय २८

श्लोक 32

सत्राजितो दश त्व् आसन् भार्यास् तासां शतं सुताः ख्यातिमन्तस् त्रयस् तेषां भङ्गकारस् तु पूर्वजः

satrājito daśa tv āsan bhāryās tāsāṃ śataṃ sutāḥ khyātimantas trayas teṣāṃ bhaṅgakāras tu pūrvajaḥ

हिन्दी अर्थ

अपने उद्देश्यकी सिद्धिके लिये प्रयास किया; किंतु जो मेरे अपने जन थे, उनपर ही मैं प्रहार कर बैठा। मैं हैवके विधानको अपने पुरुषार्थसे लाँघ न सका बहिन! अपने गर्भोके लिये चिन्ता न करो। पुत्रोंकी मृत्युके कारण होनेवाले शोक-संतापको त्याग दो। काल ही उनके विपरीत हो गया था। मैं तो उनके वधर्में केवल निमित्तमात्र बन गया हूँ॥ ५२ ॥ काल ही मनुष्योंका शत्रु है, काल ही एक अवस्थासे दूसरी अबस्थामें ला देता है और काल ही सबको संसारसे उठा ले जाता है। मेरे-जैसा व्यक्ति तो इसमें निमित्तमात्र ही होता है॥ ५३॥ देवि अपने भाग्य या कर्मके अनुसार उपद्रव तो आयेंगे ही, किंतु कष्टकी बात यही है कि जीव इसमें अपनेको ही कर्ता मानने लगता है॥ ५४ ॥ पुत्रोंके वियोगसे होनेवाली चिन्ता न करो। शोकजनित विलापको त्याग दो। मनुष्य-योनिकी प्रायः ऐसी ही दशा है। कालको

English

¹⁶³ Kusa or sacrificial grass.

अध्याय २८

श्लोक 33

वीरो वातपतिश् चैव उपस्वावांस् तथैव च कुमार्यश् चापि तिस्रो वै दिक्षु ख्याता नराधिप

vīro vātapatiś caiva upasvāvāṃs tathaiva ca kumāryaś cāpi tisro vai dikṣu khyātā narādhipa

हिन्दी अर्थ

टालना या मिटा देना असम्भव है॥५५॥ देवकी! यह लो, मैं पुत्रकी भाँति तुम्होरे चरणोंपर मस्तक रखकर पड़ा हूँ। जानता हूँ, मैंने तुम्हागा अपराध किया है तो भी मेरे प्रति अपना रोष त्याग दो (यह मेरी प्रार्थना है) ॥ ५६॥ जब कंसने ऐसी बात कही, तब देवकीके मुखपर आँसुओंकी धारा बह चली। वह पतिकी ओर देखती हुई अत्यन्त दीन होकर कंससे माताके समान कहने लगी--'बेटा! उठो! उठो!” देवकीने फिर कहा--वत्स ! तुम तो इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले हो। तुमने मेरे सामने ही जिन- जिन गर्भस्थ शिशुओंकी हत्या की है, उसमें केवल तुम्हीं कारण हो--ऐसी बात नहीं है, काल भी इसमें गर्भकर्तनमेतन्मे सहनीयं त्वया कृतम्। पादयो: पतता मूर्श्ा स्वं च कर्म जुगुप्सता

English

¹⁶³ Kusa or sacrificial grass.

अध्याय २८

श्लोक 34

सत्यभामोत्तमा स्त्रीणां व्रतिनी च दृढव्रता तथा पद्मावती चैव भार्याः कृष्णस्य ता ददौ

satyabhāmottamā strīṇāṃ vratinī ca dṛḍhavratā tathā padmāvatī caiva bhāryāḥ kṛṣṇasya tā dadau

हिन्दी अर्थ

कालपक्वमिदं सर्व हेतुभूतस्तु त्वद्विधः। अजाते दर्शन नास्ति यथा वायुस्तथेव च तद् गच्छ पुत्र मा ते भून्मदूतं मृत्युकारणम् मातापित्रोस्तु कार्येण जन्मतस्तूपपद्यते। निशम्य देवकीवाक्यं स कंसः स्व॑ं निवेशनम्

English

¹⁶³ Kusa or sacrificial grass.

अध्याय २८

श्लोक 35

सभाक्षो भङ्गकारात् तु नारेयश् च नरोत्तमौ जज्ञाते गुणसंपन्नौ विश्रुतौ गुणसंपदा

sabhākṣo bhaṅgakārāt tu nāreyaś ca narottamau jajñāte guṇasaṃpannau viśrutau guṇasaṃpadā

हिन्दी अर्थ

परंतु आज तुम अपने कर्मकी निन्दा करते हुए जो मेरे पैरॉंपर सिर रखकर पड़ गये, इससे तुम्हारे द्वारा किये गये इस गर्भोच्छेदरूप असह्य कष्टको भी मैं किसी तरह सह लूँगी॥५९॥ गर्भमें भी मृत्यु निश्चितरूपसे होती है। बाल्यावस्थामें भी वह टलती नहीं है। जवान मनुष्य भी मृत्युके अधीन होता है और वृद्ध पुरुष तो मरा हुआ है ही ॥६०॥ इस सम्पूर्ण जगत्को काल ही पका देता है (मार डालता है)। तुम्हारे-जैसे लोग तो केवल निमित्तमात्र होते हैं। जिसका जन्म नहीं हुआ है, उसका दर्शन नहीं होता। जैसे वायुकी सत्ता होनेपर भी वह दिखायी नहीं देती, उसी प्रकार जीवकी सत्ता होनेपर भी जन्मसे पहले वह दृष्टिगोचर नहीं होता है॥६१॥ जो जन्म ले चुका है, वह भी मृत्युके बाद अजातभावको ही प्राप्त हो जाता है (अर्थात् उसका भी दर्शन नहीं होता)। विधाता उसे जहाँ ले जाते हैं, वहाँ वह चला जाता है; अतः पुत्र! तुम जाओ। मुझे जो

English

¹⁶³ Kusa or sacrificial grass.

अध्याय २८

श्लोक 36

मधोः पुत्रस्य जज्ञे ऽथ पृश्निः पुत्रो युधाजितः जज्ञाते तनयौ पृश्नेः श्वफल्कश् चित्रकस् तथा

madhoḥ putrasya jajñe 'tha pṛśniḥ putro yudhājitaḥ jajñāte tanayau pṛśneḥ śvaphalkaś citrakas tathā

हिन्दी अर्थ

पुत्रोंकी मृत्युके कारण दुःख हो रहा है, उसके लिये तुम्हारे हृदयमें विचार न हो॥६२॥ पहले मौत प्रहार करती है, इसके बाद मृत्युके शेष हेतुओंकी प्रवृत्ति होती है। विधि (संस्कार), पूर्वदृष्ट कर्म (जन्मान्तरीय कर्म या प्रारब्ध), प्रजाकी सृष्टि करनेवाले काल, वास्तवमें घटित हुए तात्कालिक कारण, माता-पिताके दूषित अन्न-भक्षण आदि कार्य तथा जातिगत स्वभावसे भी मृत्यु सम्भव होती है (इन्हीं सब कारणोंसे मेरे बच्चे मारे गये और तुम इसमें निमित्त बने, अतः इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है) ॥६३ २॥ वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय ! देवकीका यह वचन सुनकर कंस अपनी असफलतापर श्षुब्ध हो मन-ही-मन जलता हुआ अपने भवनमें चला गया। अपने किये प्रयत्नके प्रतिहत (विफल) हो जानेपर वह

English

¹⁶³ Kusa or sacrificial grass.

अध्याय २८

श्लोक 37

श्वफल्कः काशिराजस्य सुतां भार्याम् अविन्दत गांदीं तस्यास् तु गांदीत्वं सदा गाः प्रददौ हि सा

śvaphalkaḥ kāśirājasya sutāṃ bhāryām avindata gāṃdīṃ tasyās tu gāṃdītvaṃ sadā gāḥ pradadau hi sā

हिन्दी अर्थ

मनमें बहुत ही खिन्न और दीन हो गया था, अतः वहाँसे चुपचाप चला गया इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वण श्रीकृष्णजन्मनि चतुर्थो5ध्याय: इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें श्रीकृष्णजन्मविषयक चौथा अध्याय पूरा हुआ 38 प्रक्कांप्थाबछप्रावा 5००० 2840०

English

¹⁶³ Kusa or sacrificial grass.

अध्याय २८

श्लोक 38

तस्यां जज्ञे तदा वीरः श्रुतवान् इति भारत अक्रूरो ऽथ महाभागो यज्वा विपुलदक्षिणः

tasyāṃ jajñe tadā vīraḥ śrutavān iti bhārata akrūro 'tha mahābhāgo yajvā vipuladakṣiṇaḥ

हिन्दी अर्थ

वसुदेवजीका नन्दको ब्रजमें लौटनेकी सम्मति देना और नन्दजीका गोब्रजकी शोभा निहारते हुए वहाँ पधारना प्रागेव वसुदेवस्तु ब्रजे शुभ्राव रोहिणीम्। प्रजातां पुत्रमेवाग्रे चन्द्रात् कान्ततराननम् गच्छानया सहैव त्वं ब्रजमेव यशोदया तत्र तौ दारकौ गत्वा जातकर्मादिभिर्गुणै:। योजयित्वा ब्रजे तात संवर्धय यथासुखम्

English

¹⁶³ Kusa or sacrificial grass.

अध्याय २८

श्लोक 39

उपासङ्गस् तथा मद्गुर् मृदुरश् चारिमर्दनः गिरिक्षिपस् तथोपेक्षः शत्रुहा चारिमेजयः

upāsaṅgas tathā madgur mṛduraś cārimardanaḥ girikṣipas tathopekṣaḥ śatruhā cārimejayaḥ

हिन्दी अर्थ

विघ्ना हि बहवो लोके बालानुत्तरासयन्ति हि वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय ! वसुदेवजीने प्रसवसे पहले ही रोहिणीको ब्रजमें भेज दिया था। जब उन्होंने सुना कि रोहिणीने पहले ही एक ऐसे पुत्रको जन्म दिया है, जिसका मुख चन्द्रमासे भी अधिक कान्तिमान् है, तब वे तुरंत ही (कंसका कर चुकानेके लिये पत्नीसहित मथुरामें आये हुए) नन्दगोपके पास जाकर मड़लमयी वाणीमें बोले--'मित्र! तुम इन यशोदाजीके साथ ही शीघ्र ब्रजको लौट जाओ तात! वहाँ जाकर उन दोनों बालकोंको जातकर्म आदि संस्कारोंसे सम्पन्न करके ब्रजमें ही सुखपूर्वक उनका पालन-पोषण और संवर्धन करो '॥ ३॥ ब्रजमें रोहिणीके गर्भसे उत्पन्न हुआ जो मेरा शिशु पुत्र है, उसकी भी रक्षा

English

¹⁶³ Kusa or sacrificial grass.

अध्याय २८

श्लोक 40

चर्मभृच् चारिवर्मा च गृध्रम् ओजा नरस् तथा आवाहप्रतिवाहौ च सुन्दरा च वराङ्गना

carmabhṛc cārivarmā ca gṛdhram ojā naras tathā āvāhaprativāhau ca sundarā ca varāṅganā

हिन्दी अर्थ

करना। भाई मैं तो पितृपक्षोंमें पुत्रवानोंके द्वारा निन्दनीय ही होऊँगा; क्योंकि मैं ऐसा भाग्यहीन हूँ कि अपने एकमात्र शिशुपुत्रका मुख नहीं देख पाता हूँ। यद्यपि मुझे इस बातका ज्ञान है कि सुख-दुःख और संयोग-वियोग आदि प्रारब्धके ही अधीन हैं; तथापि निरन्तर बना रहनेवाला भय मुझ बुद्धिमानकी भी बुद्धिको बलपूर्वक हर लेता है। इस निर्दय कंससे मुझे सदा यह डर लगा रहता है कि कहीं यह मेरे इस शिशुका भी वध न कर डाले। अतः तात! नन्दगोप! तुम मेरे पुत्र रोहिणीकुमारकी जिस उपायसे भी रक्षा कर सको, करो। बाल-द्रोहियोंके स्वरूपका यथावद्रूपसे विचार करके जैसे बने, उसके जीवनकी रक्षा करो; क्‍योंकि जगत्में बहुत-से ऐसे विपघ्न खड़े हुए हैं, जो बालकोंको त्रास दे रहे हैं॥ ४--७॥ मेरा वह पुत्र बड़ा है और तुम्हारा यह बालक छोटा। तुम इन दोनोंको ही सुखपूर्वक समान दृष्टिसे देखो। जैसे इनके नाम एक-से (एक अर्थवाले)

English

¹⁶³ Kusa or sacrificial grass.

अध्याय २८

श्लोक 41

विश्रुता साम्बमहिषी कन्या चास्य वसुंधरा रूपयौवनसंपन्ना सर्वसत्त्वमनोहरा

viśrutā sāmbamahiṣī kanyā cāsya vasuṃdharā rūpayauvanasaṃpannā sarvasattvamanoharā

हिन्दी अर्थ

हैं, उसी तरह इनपर तुम्हारा वात्सल्य भी एक-सा ही होना चाहिए॥ ८॥ नन्दगोप ! इन दोनोंकी अवस्था प्रायः समान है। ये दोनों जिस तरह साथ-साथ तुम्हारे उस शोभेतां गोब्रजे तस्मिन् नन्दगोप तथा कुरू ॥ ९ ब्रजमें बढ़ते हुए शोभा पा सकें, वैसा यत्न करो' जैसे कृष्णका अर्थ है अपनी ओर खींचनेवाला, उसी तरह संकर्षणका भी है। बाल्ये केलिकिलः सवों बाल्ये मुह्मति मानव:। बाल्ये चण्डतम: सर्वस्तत्र यत्नपरो भव

English

¹⁶³ Kusa or sacrificial grass.

अध्याय २८

श्लोक 42

अक्रूरेणौग्रसेन्यां तु सुगात्र्यां कुरुनन्दन सुदेवश् चोपदेवश् च जज्ञाते देववर्चसौ

akrūreṇaugrasenyāṃ tu sugātryāṃ kurunandana sudevaś copadevaś ca jajñāte devavarcasau

हिन्दी अर्थ

न च वृन्दावने कार्यों गवां घोष: कथंचन। भेतव्यं तत्र वसतः केशिनः पापदर्शिन: सरीसृपेभ्य: कीटेभ्य: शकुनिभ्यस्तथेव च। गोष्ठेषु गोभ्यो वत्सेभ्यो रक्ष्यौ ते द्वाविमौ शिशू रहस्यं वसुदेवेन सो3नुज्ञातों महात्मना। यान॑ यशोदया सार्धमारुरोह मुदान्वित: कुमारस्कन्धवाह्यायां शिबिकायां समाहित: । संवेशयामास शिशुं शयनीयं महामति:

English

¹⁶³ Kusa or sacrificial grass.

अध्याय २८

श्लोक 43

चित्रकस्याभवन् पुत्राः पृथुर् विपृथुर् एव च अश्वसेनो ऽश्वबाहुश् च सुपार्श्वकगवेषणौ

citrakasyābhavan putrāḥ pṛthur vipṛthur eva ca aśvaseno 'śvabāhuś ca supārśvakagaveṣaṇau

हिन्दी अर्थ

बहूदकेन मार्गेण यमुनातीरगामिना यमुनातीरसम्बद्धं शीतमारुतसेवितम् विरुतश्रापहै रम्यं लतावल्लीमहाद्ु॒मम् । गोभिस्तृणविलग्नराभि: स्यन्दन्तीभिरलंकृतम् 'बाल्यावस्थामें सब लोग खेल-कूदसे मन बहलाते हैं। बालकपनमें प्राय: सभी मनुष्य मोहग्रस्त रहते हैं। उन्हें कर्तव्याकर्तव्यका बोध नहीं रहता तथा बचपनमें सभी बात-बातपर बहुत चिढ़ते और रूठते हैं; अतः

English

¹⁶³ Kusa or sacrificial grass.

अध्याय २८

श्लोक 44

अरिष्टनेमेस् तु सुता धर्मो धर्मभृद् एव च सुबाहुर् बहुबाहुश् च श्रविष्ट्ःआश्रवणे स्त्रियौ

ariṣṭanemes tu sutā dharmo dharmabhṛd eva ca subāhur bahubāhuś ca śraviṣṭḥāśravaṇe striyau

हिन्दी अर्थ

बच्चोंको इन सभी दशाओंमें सँभालते हुए उनके लालन- पालनके लिये प्रयत्तशील रहो ॥ १०॥ देखो, वृन्दावनमें किसी तरह भी गौओंके ठहरनेका स्थान न बनाना। वहाँ निवास करनेवाले पापदर्शी केशीसे तुम्हें सदा डरते रहना चाहिए॥ ११॥ वनमें साँप-बिच्छू, कीड़े-मकोड़े तथा पक्षियोंसे और गोब्रजमें गौओं तथा बछड़ोंसे इन दोनों शिशुओंकी तुम्हें सदा रक्षा करनी चाहिए बैठकर शीघ्रतापूर्वक यहाँसे पधारो। ये दायें-बायें उड़नेवाले पक्षी मानो तुम्हें जानेके लिये कह रहे हैं--विदा दे रहे हैं'॥ १३॥ महात्मा वसुदेवके द्वारा किसी गुप्त रहस्यका ज्ञान करा दिये जानेपर नन्‍्दबाबा यशोदाजीके साथ जिसे कंधेपर ढो सकें, ऐसी शिबिका (डोली)-में अपने शयन करनेयोग्य शिशुको सुला दिया

English

¹⁶³ Kusa or sacrificial grass.

अध्याय २८

श्लोक 45

इमां मिथ्याभिशस्तिं यः कृष्णस्य समुदाहृताम् वेद मिथ्याभिशापास् तं न स्पृशन्ति कदाचन

imāṃ mithyābhiśastiṃ yaḥ kṛṣṇasya samudāhṛtām veda mithyābhiśāpās taṃ na spṛśanti kadācana

हिन्दी अर्थ

फिर यमुनाजीके किनारे-किनारे जानेवाले ऐसे एकान्त मार्गसे वे चले, जहाँ जलकी बहुतायत थी और ठंडी- ठंडी हवा चल रही थी॥१६॥ गोवर्धनके निकटवर्ती शुभ प्रदेशमें पहुँचकर उन्होंने गौओंका ब्रज देखा, जो यमुनाजीके तटसे जुड़ा हुआ था और शीतल वायु उसकी सेवा करती थी॥ १७॥ विशेष प्रकारकी बोली बोलनेवाले शिकारी जीवोंके रहनेसे उस प्रदेशकी रमणीयता बढ़ गयी थी। वहाँ लता और वह्लरियोंसे लिपटे हुए बड़े-बड़े वृक्ष शोभा पा रहे थे। घास चरती और थनोंसे दूध झरती हुई गौओंसे वह स्थान अलंकृत था वहाँ गौओंके चरने-फिरनेके लिये सम भूमि थी, विषम नहीं; जलाशयोंमें उतरनेके लिये जो मार्ग थे, वे भी सम ही थे। बैलों या साँड़ोंके कंधोंकी टक्करसे तथा उनके सींगोंकी रगड़से वहाँके कई वृक्ष घिसे हुए दिखायी देते

English

¹⁶³ Kusa or sacrificial grass.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_harivaMza.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Harivamsha Purana — Chapter 28
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

Digitised text taken from the archive linked below. It has not been collated against a printed edition by this site.

पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

Numbering follows the imported source and may differ from other editions.