Harivamsha Purana· Harivaṁśa Purāṇa
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अध्याय 31 / 119

Adhyaya 31

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अध्याय ३१

श्लोक 111

कृत्वात्मानं महाबाहुश् चतुर्धा प्रभुर् ईश्वरः लोके राम इति ख्यातस् तेजसा भास्करोपमः

kṛtvātmānaṃ mahābāhuś caturdhā prabhur īśvaraḥ loke rāma iti khyātas tejasā bhāskaropamaḥ

हिन्दी अर्थ

करूँगा॥ ५॥ तुमलोग प्रचण्ड वायुके साथ विचरते हुए जब घोर वर्षा करोगे, तब उससे आहत एवं पीड़ित हुई देंगी'॥ ६॥ श्रीकृष्णद्वारा अपने उत्सव एवं शासनका जलधरोंको इस प्रकार अपनी आज्ञा सुना दी॥७॥ तब वे घोर गर्जना करनेवाले पर्वताकार भयंकर काले मेघ आकाशमें सब ओर छा गये ॥ ८ ॥ उस समय इन्द्रधनुषसे विभूषित हो बिजली गिराते हुए उन मेघोंने आकाशको अन्धकारपूर्ण कर दिया॥ ९॥ कुछ मेघ दूसरे हाथियोंसे सटकर चलते हुए हाथियोंके समान प्रतीत होते थे। दूसरे मगरोंके समान प्रकाशित होते थे तथा अन्य बड़े-बड़े बादल आकाशमें नागोंके समान विचरने लगे

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अध्याय ३१

श्लोक 112

प्रसादनार्थं लोकस्य रक्षसां निग्रहाय च धर्मस्य च विवृद्ध्यर्थं जज्ञे तत्र महायशाः तम् अप्य् आहुर् मनुष्येन्द्रं सर्वभूतपतेस् तनुम्

prasādanārthaṃ lokasya rakṣasāṃ nigrahāya ca dharmasya ca vivṛddhyarthaṃ jajñe tatra mahāyaśāḥ tam apy āhur manuṣyendraṃ sarvabhūtapates tanum

हिन्दी अर्थ

जैसे हजारों हाथियोंके झुंड एक-दूसरेसे अपने शरीरको आबद्ध करके चल रहे हों, वैसे ही प्रतीत होनेवाले उन जलधरोंने आकाशको आच्छादित करके वहाँ बड़ा भारी दुर्दिन उपस्थित कर दिया धाराभिस्तुल्यरूपाभिर्ववृषुस्ते बलाहका: नष्टसूयेन्दुसदृशैमेंघैनंभसि. दारुणैः। अतिवृष्टेन लोकस्य विरूपमभवद् वपु: मेघौघधैर्निष्प्रभाकारमदृश्यग्रहतारकम्। अन्द्रसूर्याशुरहितं खं बभूवातिनिष्प्रभम्

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अध्याय ३१

श्लोक 113

तस्मै दत्तानि चास्त्राणि विश्वामित्रेण धीमता वधार्थं देवशत्रूणां दुर्धराणि सुरैर् अपि

tasmai dattāni cāstrāṇi viśvāmitreṇa dhīmatā vadhārthaṃ devaśatrūṇāṃ durdharāṇi surair api

हिन्दी अर्थ

प्राप्तोअन्तकालो लोकानां व्यक्तमेकार्णवा मही। इति गोपगणा वाक्य व्याहरन्ति भयार्दिता: काश्रित् प्राणाज्जहुः श्रान्ता निपेतु: काश्रिदातुरा:। काश्चित्सवत्सा: पतिता गाव: शीकरवेजिता: काश्चिदाक्रम्य क्रोडेन वत्सांस्तिष्ठन्ति मातर: । मनुष्योंके हाथ, हाथियोंके शुण्डदण्ड तथा बाँसके तुल्य मोटी धाराएँ प्रकट करके वे मेघ वहाँ सब ओर वर्षा करने लगे॥१२॥ मनुष्योंकी आँखोंने आकाशमें छाये हुए उस दुरवगाह अनन्त अगाध एवं महान् दुर्दिनको

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अध्याय ३१

श्लोक 114

यज्ञविघ्नकरौ येन मुनीनां भावितात्मनाम् मारीचश् च सुबाहुश् च बलेन बलिनां वरौ निहतौ च निराशौ च कृतौ तेन महात्मना

yajñavighnakarau yena munīnāṃ bhāvitātmanām mārīcaś ca subāhuś ca balena balināṃ varau nihatau ca nirāśau ca kṛtau tena mahātmanā

हिन्दी अर्थ

समुद्रके समान ही माना॥ १३॥ आकाशमें चारों ओर पर्वताकार मेघ गर्जना कर रहे थे। उस समय पक्षियोंने उड़ना बंद कर दिया तथा विभिन्न जातिके पशु इधर- उधर भागने लगे॥ १४॥ चन्रमा और सूर्यको भी नष्ट कर देनेवाले प्रलयकालके समान आकाशमें छाये हुए उन भयंकर मेघोंने अपनी अतिवृष्टिके कारण समस्त पार्थिव जगत्के रूपको विकृत कर दिया॥ १५॥ मेघोंकी घटाएँ घिर आनेसे व्योममण्डल प्रभाशून्य हो गया। ग्रह और तारे दृष्टिपवसे ओझल हो गये। चन्द्रमा और सूर्यकी किरणोंका पता नहीं चलता था। अतः सारा आकाश अन्धकारसे आच्छन्न हो गया॥ १६॥ मेघोंके बरसाये हुए तथा बारम्बार बरसाये जाते हुए जलसे आवृत हो वहाँ सब ओरकी भूमि जलमयी-सी प्रतीत होने लगी

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अध्याय ३१

श्लोक 115

वर्तमाने मखे येन जनकस्य महात्मनः भग्नं माहेश्वरं चापं क्रीडता लीलया पुरा

vartamāne makhe yena janakasya mahātmanaḥ bhagnaṃ māheśvaraṃ cāpaṃ krīḍatā līlayā purā

हिन्दी अर्थ

उस समय वहाँ मोर जोर-जोरसे बोलने लगे। पक्षियोंकी आवाज बहुत कम हो गयी। नदियोंमें बाढ़ आ गयी और किनारेके वृक्ष प्रवाहमें बह गये॥ १८॥ मेघोंकी गर्जना तथा पर्जन्यदेवके गम्भीर नादसे डाँटे गयेकी भाँति वृक्षोंसहित तृण काँपने लगे॥१९॥ उस समय भयसे पीड़ित हुए गोप आपसमें कहने लगे कि “निश्चय ही समस्त लोकोंका अन्तकाल आ पहुँचा है और पृथ्वी एकार्णवमें मग्र हो रही है'॥ २०॥ उस उत्पातस्वरूप जलकी भारी वर्षासे अत्यन्त ताड़ित एवं पीड़ित हुई गौएँ रँभानेकी ध्वनिमें करुण-क्रन्दन करती हुई हिल-डुल भी न सकीं। ऐसा जान पड़ता था, उनके सारे अड्भ अकड़ गये हैं उनकी जाँघें और पैर हिल नहीं पाते थे, खुर और मुख निश्चेष्ट थे, भीगे हुए शरीरमें रोंगटे खड़े हो गये थे और पेट तथा थन अत्यन्त दुबले होकर सिकुड़ गये थे

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अध्याय ३१

श्लोक 116

यः समाः सर्वधर्मज्ञश् चतुर्दश वने ऽवसत् लक्ष्मणानुचरो रामः सर्वभूतहिते रतः

yaḥ samāḥ sarvadharmajñaś caturdaśa vane 'vasat lakṣmaṇānucaro rāmaḥ sarvabhūtahite rataḥ

हिन्दी अर्थ

कुछ गौओंने पीड़ासे श्रान्त होकर अपने प्राण त्याग दिये। कुछ आतुर होकर गिर पड़ीं और कितनी ही गौएँ जलके छींयेंसे उद्विग्न होकर बछड़ोंसहित धराशायिनी हो गयीं कुछ गौमाताएँ बछड़ोंको अपने अड्डमें छिपाकर खड़ी थीं, कितनी ही बछड़ोंकी ओरसे विमुख हो गयी थीं, उनकी जाँघें शिथिल हो रही थीं, कुछ दाना-धास न मिलनेके कारण उनके पेट भीतरको धँस गये थे। वर्षसे परास्त होकर पीड़ित हुई गौएँ थर-थर काँपती हुई पृथ्वीपर गिर पड़ती थीं वत्साश्ोन्मुखका बाला दामोदरमुखाः स्थिता:। त्राहीति वरदनैर्दीनिः कृष्णमूचुरिवार्दिता:

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अध्याय ३१

श्लोक 117

रूपिणी यस्य पार्श्वस्था सीतेति प्रथिता जनैः पूर्वोचितत्वाद्या लक्ष्मीर् भर्तारम् अनुगच्छति

rūpiṇī yasya pārśvasthā sīteti prathitā janaiḥ pūrvocitatvādyā lakṣmīr bhartāram anugacchati

हिन्दी अर्थ

गोपांश्वासन्ननिधनान् कृष्ण: कोपं॑ समादधे अद्याहमिममुत्पाट्य सकाननवनं गिरिम्। कल्पयेयं गवां स्थान वर्षत्राणाय दुर्धरम् एवं स चिन्तयित्वा तु कृष्ण: सत्यपराक्रम: । दोर्भ्यामुत्पाटयामास कृष्णो गिरिरिवापर:

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अध्याय ३१

श्लोक 118

चतुर्दश वने तप्त्वा तपो वर्षाणि राघवः जनस्थाने वसन् कार्यं त्रिदशानां चकार सः

caturdaśa vane taptvā tapo varṣāṇi rāghavaḥ janasthāne vasan kāryaṃ tridaśānāṃ cakāra saḥ

हिन्दी अर्थ

गृहभाव॑ गतस्तत्र गृहाकारेण वर्चसा छोटे-छोटे बछड़े मुँह ऊपर उठाकर दामोदरकी ओर देखते हुए खड़े थे, मानो वे पीड़ित बछड़े अपने दीन मुखोंसे श्रीकृष्णको सम्बोधित करके कह रहे थे कि 'प्रभो। हमारी रक्षा कीजिये'॥ २५॥ इस दुर्दिनके आनेसे गौओंका वह महासंहार होता देख और गोपोंको भी मौतके निकट पहुँचा हुआ जान श्रीकृष्णने इन्द्रके प्रति महान् कोप धारण किया॥ २६ ॥ प्रिय वचन बोलनेवाले श्रीकृष्णने कुछ देर सोच-विचारकर रोषावेशसे युक्त हो स्वयं ही अपने-आपसे इस प्रकार कहा--'इस वर्षासे बचनेका उपाय मैंने देख लिया॥ २७॥ आज मैं वन और काननोंसहित इस दुर्धर गोवर्धन पर्वतको उखाड़कर गौओंको वर्षासे बचानेके लिये सुरक्षित स्थानका निर्माण करूँगा

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अध्याय ३१

श्लोक 119

सीतायाः पदम् अन्विच्छन् निजघान महामनाः विराधं च कबन्धं च राक्षसौ भीमविक्रमौ जघान पुरुषव्याघ्रौ गन्धर्वौ शापविक्षतौ

sītāyāḥ padam anvicchan nijaghāna mahāmanāḥ virādhaṃ ca kabandhaṃ ca rākṣasau bhīmavikramau jaghāna puruṣavyāghrau gandharvau śāpavikṣatau

हिन्दी अर्थ

मेरे द्वारा धारण किया हुआ यह पर्वत पृथ्वीपर बने हुए घरके समान होकर ब्रजसहित समूची गौओंका परित्राण करेगा और मेरे अधीन हो जायगा'॥ २९॥ इस प्रकार सोच-विचारकर सत्यपराक्रमी श्रीकृष्ण अपनी दोनों भुजाओंका बल दिखाते हुए उस निकटवर्ती पर्वतको दोनों हाथोंसे पकड़कर उखाड़ लिया। उस समय श्रीकृष्ण दूसरे पर्वतके समान ही जान पड़ते थे॥ ३० ॥ भगवान्के बायें हाथसे धारण किया गया और मेघोंसे सटा हुआ वह पर्वत उनके गृहाकारक तेज या संकल्पसे वहाँ गृहभावको प्राप्त हो गया॥३१॥ जिस समय वह पर्वत पृथ्वीसे उखाड़ा जाने लगा, उस समय उसके शिखरोंपर जो टूटी- 'फूटी शिलाएँ थीं, वे खिसककर गिरने लगीं और बहुत- से वृक्ष भी धराशायी हो गये॥ ३२॥ उस समय चक्कर काटते हुए शिखरों, खण्डित होते हुए वृक्षों तथा काँपती हुई ऊँची चोटियोंके कारण वह अविचल पर्वत आकाशचारी पक्षीके समान प्रतीत होने लगा

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अध्याय ३१

श्लोक 120

हुताशनार्कांशुतडित्प्रकाशैः प्रतप्तजाम्बूनदचित्रपुङ्खैः सुरेन्द्रवज्राशनितुल्यसारैः शरैः शरीरेषु वियोजितौ बलात्

hutāśanārkāṃśutaḍitprakāśaiḥ prataptajāmbūnadacitrapuṅkhaiḥ surendravajrāśanitulyasāraiḥ śaraiḥ śarīreṣu viyojitau balāt

हिन्दी अर्थ

पार्थवर्ती चञ्लल झरने मेघोंके समूहोंसे मिलकर एकताको प्राप्त हो गये। वह पर्वत हिलने लगा और उसकी प्रस्तरराशि विदीर्ण होकर बिखरने लगी उस पर्वतके नीचे गर्भगृहमें बैठे हुए वे सब लोग न तो बरसते हुए मेघोंका, न पत्थर बरसानेवाले पर्वतका और न गरजती हुई वायुका ही स्वरूप जान सके झरनोंसे मिले हुए पर्वताकार नील मेघोंसे मिश्रित हुआ वह पर्वत पंख उठाये हुए मोरके समान प्रतीत होता था करते थे कि यह पर्वत अपने मेघरूपी पंखोंसे ऊपरको उड़नेके लिये उद्यत-सा प्रतीत होता है

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अध्याय ३१

श्लोक 121

सुग्रीवस्य कृते येन वानरेन्द्रो महाबलः वाली विनिहतः संख्ये सुग्रीवश् चाभिषेचितः

sugrīvasya kṛte yena vānarendro mahābalaḥ vālī vinihataḥ saṃkhye sugrīvaś cābhiṣecitaḥ

हिन्दी अर्थ

रीतीर्निर्वर्तगामास काशञ्जनाझनराजती: कानिचिच्छिधिलानीव संच्छिन्नार्द्धानि कानिचित्। गिरेमेंघप्रविष्टानि तस्य श्रुद्राणि चाभवन् निःसृताः पृथुमूर्धान: स्वस्तिकार्धविभूषिता: । द्विजिहपतय:ः क्रुद्धाः: खेचरा: खे समन्तत: अतिवृष्टस्थ तैमेंघेस्तस्थ रूपं बभूव ह। स्तम्भितस्येव रुद्रेण त्रिपुरस्थ विहायसि

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अध्याय ३१

श्लोक 122

देवासुरगणानां हि यक्षराक्षसपक्षिणाम् यत्रावध्यं राक्षसेन्द्रं रावणं युधि दुर्जयम्

devāsuragaṇānāṃ hi yakṣarākṣasapakṣiṇām yatrāvadhyaṃ rākṣasendraṃ rāvaṇaṃ yudhi durjayam

हिन्दी अर्थ

बाहुदण्डेन कृष्णस्य विधृतं सुमहत् तदा। नीलाभ्रपटलच्छन्नं तदगिरिच्छत्रमाब॒भौ बाहूपधाने कृष्णस्य प्रसुप्त इव खे गिरिः वह पर्वत श्रीकृष्णी हथेलीपर टिका हुआ था। भूतलसे उसके मूलभागका सम्बन्ध टूट चुका था। उस दशामें वह सोने, कोयले, चाँदी तथा गेरू आदि धातुओंको प्रकट करने लगा॥३८॥ उस पर्वतके कुछ शिखर शिथिल-से हो गये थे, कुछ आधे भागसे टूट गये थे और कितने ही शिखर बादलोंके भीतर घुस गये थे

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अध्याय ३१

श्लोक 123

गुप्तं राक्षसकोटीभिर् नीलाञ्जनचयोपमम् त्रैलोक्यरावणं क्रूरं राक्षसं राक्षसेश्वरम्

guptaṃ rākṣasakoṭībhir nīlāñjanacayopamam trailokyarāvaṇaṃ krūraṃ rākṣasaṃ rākṣaseśvaram

हिन्दी अर्थ

पर्वतके हिलनेके साथ ही उसके ऊपरके वृक्ष कम्पित हो उठे और उनके नाना प्रकारके फूल पृथ्वीपर सब सर्पराज, जो आकाशमें उड़नेकी शक्ति रखते थे, कुपित होकर आकाशमें सब ओर निकल पड़े। उनके शरीर आधे स्वस्तिकसे विभूषित थे॥ ४१॥ पक्षियोंके समुदाय वर्षा और भयसे बड़े कष्टमें पड़ गये। वे उड़-उड़कर आकाशमें जाते और वहाँसे पुनः नीचे मुख किये गिर पड़ते थे॥४२॥ बहुत-से सिंह रोषमें भरकर सजल जलधरोंके समान दहाड़ रहे थे। बड़े-बड़े बाघ मथे जानेवाले माँटोंके समान गम्भीर घोष करते थे उस पर्वतकी विषम भूमि सम हो गयी और समभूमि

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अध्याय ३१

श्लोक 124

दुर्जरं दुर्धरं दृप्तं शार्दूलसमविक्रमम् दुर्निरीक्ष्यं सुरगणैर् वरदानेन दर्पितम्

durjaraṃ durdharaṃ dṛptaṃ śārdūlasamavikramam durnirīkṣyaṃ suragaṇair varadānena darpitam

हिन्दी अर्थ

विषम होकर अत्यन्त दुर्गग हो गयी, इससे उसके स्वरूपमें इतना उलट-फेर हो गया कि वह किसी और ही पर्वत-सा दिखायी देता था॥४४॥ उन मेघोंके द्वारा अतिवृष्टि होनेसे उस पर्वतका रूप वैसा ही हो गया, जैसा कि आकाशमें भगवान् रुद्रके द्वारा स्तम्भित किये गये त्रिपुरका रूप दिखायी देता था॥४५॥ भगवान् श्रीकृष्णके बाहुदण्डसे धारण किया गया तथा काले मेघ समूहोंसे आच्छादित हुआ वह पर्वतरूपी छत्र बड़ी शोभा पा रहा था॥४६॥ सोनेकी इच्छा-सी रखनेवाला वह पर्वत आकाशमें श्रीकृष्णकी बाँहका तकिया लगाकर सोया हुआ-सा जान पड़ता था। उस समय उसका गुफारूपी मुख बादलोंकी चादरसे ढका हुआ था उस पर्वतपर जो वृक्ष थे, उनपर पक्षियोंकी बोली नहीं सुनायी देती थी। वहाँके वन मयूरोंकी केका-ध्वनिसे शून्य हो गये थे। ऐसे वृक्षों और वनोंसे घिरा हुआ वह पर्वत अपने शिखरोंके साथ निरालम्ब-सा प्रतीत

English

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अध्याय ३१

श्लोक 125

जघान सचिवैः सार्धं ससैन्यं रावणं युधि महाभ्रघनसंकाशं महाकायं महाबलम्

jaghāna sacivaiḥ sārdhaṃ sasainyaṃ rāvaṇaṃ yudhi mahābhraghanasaṃkāśaṃ mahākāyaṃ mahābalam

हिन्दी अर्थ

होता था॥४८॥ उसके श्रंग अस्त-व्यस्त होकर चक्कर काटते और जोर-जोरसे हिलते थे। उनके कारण उस पर्वतके वन और शिखर ज्वरसे पीड़ित हुए-से प्रतीत होते थे स लम्बमान: कृष्णस्य भुजाग्रे सघनो गिरिः । चअक्रारूढ इवाभाति देशो नृपतिपीडितः निवेश्य तं करे शैलं तोलयित्वा च सस्मितम्। प्रोवाच गोप्ता गोपानां प्रजापतिरिव स्थित: एतद् देवैरसम्भाव्यं दिव्येन विधिना मया। कृतं गिरिगृहं गोपा निर्वातं शरणं गवाम्

English

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अध्याय ३१

श्लोक 126

तम् आगस्कारिणं क्रूरं पौलस्त्यं पुरुषर्षभः सभ्रातृपुत्रसचिवं ससैन्यं क्रूरनिश्चयम् ।रावणं निजघानाशु रामो भूतपतिः पुरा

tam āgaskāriṇaṃ krūraṃ paulastyaṃ puruṣarṣabhaḥ sabhrātṛputrasacivaṃ sasainyaṃ krūraniścayam | rāvaṇaṃ nijaghānāśu rāmo bhūtapatiḥ purā

हिन्दी अर्थ

त्रैलोक्यमप्युत्सहते रक्षितुं किं पुनर्त्रजम् कृष्णो5पि मूले शैलस्य शैलस्तम्भ इवोच्छित:। दधारैकेन हस्तेन शैलं प्रियमिवातिधिम् उस पर्वतके मस्तक (शिखर)-पर पहुँचे हुए वायुरूपी वाहनवाले मेघ देवराज इन्द्रके द्वारा शीघ्रता करनेके लिये प्रेरित होनेपर अक्षय जलकी वर्षा करने लगे॥ ५० ॥ भगवान् श्रीकृष्णकी भुजाके अग्रभागमें लटकता हुआ मेघोंसहित वह पर्वत किसी शत्रु राजाके द्वारा पीड़ित हुए देशकी भाँति चक्रपर चढ़ा हुआ-सा प्रतीत होता था॥५१॥ वह मेघोंका समुदाय उस पर्वतको चारों ओरसे घेरकर उसी तरह खड़ा था, जैसे समृद्धिशाली

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अध्याय ३१

श्लोक 127

मधोश् च तनयो दृप्तो लवणो नाम दानवः हतो मधुवने भीमो वरदत्तो महासुरः समरे युद्धशौण्डेन तथान्ये चापि राक्षसाः

madhoś ca tanayo dṛpto lavaṇo nāma dānavaḥ hato madhuvane bhīmo varadatto mahāsuraḥ samare yuddhaśauṇḍena tathānye cāpi rākṣasāḥ

हिन्दी अर्थ

महान् जनपद नगर या राजधानीको अपने सामने रखकर चारों ओर निवास करता है॥ ५२॥ उस पर्वतको अपने हाथपर रखकर उसे संतुलित रखते हुए प्रजापतिके समान खड़े हुए गोपरक्षक भगवान् श्रीकृष्णने मुसकराते हुए कहा-- ॥ ५३॥ “गोपगण! मैंने दिव्य विधिसे यह पर्वतका घर बना दिया है, जिसे बनाना देवताओंके लिये भी असम्भव था। इसमें वर्षा और वायुका प्रवेश नहीं है। यह गौओंके लिये उत्तम आश्रय है॥५४॥ यहाँ शान्ति पानेके लिये गौओंके यूथ शीघ्र प्रवेश करें और इन वायुरहित स्थानोंमें सुखपूर्वक निवास करें जो जैसे बड़े-छोटे हों, जिनके जैसे यूथ हों, जिनके पास जैसी साधन-सामग्री हो, उसके अनुसार तुम सब लोग सुखपूर्वक इस स्थानका बँटवारा कर लो। मैंने वर्षाका भलीभाँति निवारण कर दिया है॥ ५६॥ मैंने

English

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अध्याय ३१

श्लोक 128

एतानि कृत्वा कर्माणि रामो धर्मभृतां वरः दशाश्वमेधाञ् जारूथ्यान् आजहार निरर्गलान्

etāni kṛtvā karmāṇi rāmo dharmabhṛtāṃ varaḥ daśāśvamedhāñ jārūthyān ājahāra nirargalān

हिन्दी अर्थ

निर्माण कर दिया है। इसकी लम्बाई पाँच कोस और चौड़ाई एक कोसकी है। यह महान भूभाग तीनों लोकोंकी आँधी-पानीसे रक्षा कर सकता है, फिर ब्रजकी तो बात ही कया है ?'॥ ५७॥ यह सुनकर भीतरकी ओर गौओंके रँभानेके साथ ही गोपोंकी किलकारियोंका तुमुल नाद गूँज उठा और बाहरकी ओर मेघोंकी गम्भीर गर्जना होने लगी॥ ५८ ॥ तदनन्तर गोपोंद्वारा एक-एक यूथके रूपमें विभक्त की हुई गौएँ उस पर्वतकी विशाल गुफामें, जिसका भीतरी भाग बहुत बड़ा था, प्रवेश करने लगीं॥ ५९ ॥ भगवान् श्रीकृष्ण भी उस पर्वतके मूलभागमें प्रस्तरनिर्मित ऊँचे खम्भेके समान खड़े हो गये। उन्होंने उस पहाड़को अपने प्रिय अतिथिकी भाँति एक हाथसे शत्रु राजाद्वारा आक्रान्त देशके लोग रथ, शकट आदि वाहनोंपर आरूढ़ होकर जब पलायन करने लगते हैं, उस समय उन्हें चक्रारूढ़ कहा जाता है; उसी प्रकार इन्द्रसे पीड़ित पर्वत भगवान् श्रीकृष्णफे हाथरूपी चक्रपर आरूढ़ हुआ दिखायी

English

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अध्याय ३१

श्लोक 129

नाश्रूयन्ताशुभा वाचो नाकुलं मारुतो ववौ न वित्तहरणं चासीद् रामे राज्यं प्रशासति

nāśrūyantāśubhā vāco nākulaṃ māruto vavau na vittaharaṇaṃ cāsīd rāme rājyaṃ praśāsati

हिन्दी अर्थ

अतिहैवं तु कृष्णस्य दृष्ठा तत् कर्म वज्रभूत्। मिथ्याप्रतिज्ञो जलदान् वारयामास वै विभु: गताश्रे विमले व्योम्नि दिवसे दीप्रभास्करे कृष्णो5पि तं गिरिश्रेष्ठ स्वस्थाने स्थावरात्मवान्। तत्पश्चात् वर्षसे डरे हुए ब्रजके गोप अपने बर्तन- भाँड़े और जुते हुए छकड़े लेकर उस पर्वतनिर्मित गृहमें प्रविष्ट हो गये॥ ६१ ॥ श्रीकृष्णके उस कर्मको, जो देवताओंके लिये भी असम्भव है, देखकर वज्रधारी इन्द्रने उन

English

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अध्याय ३१

श्लोक 130

पर्यदेवन् न विधवा नानर्थश् चाभवत् तदा सर्वम् आसीज् जगद्दान्तं रामे राज्यं प्रशासति

paryadevan na vidhavā nānarthaś cābhavat tadā sarvam āsīj jagaddāntaṃ rāme rājyaṃ praśāsati

हिन्दी अर्थ

मेघोंको रोक दिया। ब्रजको नष्ट कर देनेकी उनकी प्रतिज्ञा झूठी हो गयी ॥ ६२ ॥ सात राततक पृथ्वीपर वर्षा करनेके पश्चात् मेघोंसे घिरे हुए वृत्रनाशक इन्द्र उत्सवहीन (आनन्दशून्य) हो (अथवा ब्रजमें मनाये जानेवाले अपने उत्सवसे वद्चित हो) उत्तम स्वर्गलोकको लौट गये सात रात बीत जानेपर जब इन्द्रका सारा प्रयत्न निष्फल हो गया, बादल नष्ट हो गये, आकाश निर्मल हो गया और दिनमें सूर्यदेव देदीप्यमान हो उठे, उस समय सारी गौएँ फिर उसी मार्गसे जैसे आयी थीं, उसी तरह लौट गयीं। सारा ब्रज पुनः अपने निवासस्थानको चला गया॥ ६४-६५ ॥ स्थिरभावसे खड़े हुए वरदायक भगवान् श्रीकृष्णने भी प्रसन्न होकर फिर जगत्के कल्याणके लिये

English

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अध्याय ३१

श्लोक 131

न प्राणिनां भयं चासीज् जलानलविघातजम् न च स्म वृद्धा बालानां प्रेतकार्याणि कुर्वते

na prāṇināṃ bhayaṃ cāsīj jalānalavighātajam na ca sma vṛddhā bālānāṃ pretakāryāṇi kurvate

हिन्दी अर्थ

प्रीतो निवेशयामास शिवाय वरदो विभु: ॥ ६६ उस श्रेष्ठ पर्वतको अपने स्थानपर स्थापित कर दिया इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि गोवर्धनधारणेउष्टादशो5ध्याय: इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें श्रीकृष्णका योवर्धनधारणविषयक अठारहवाँ अध्याय पूरा हुआ एकोनविंशो5ध्याय:

English

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अध्याय ३१

श्लोक 132

ब्रह्म पर्यच्चरत् क्षत्रं विशः क्षत्रम् अनुव्रताः शूद्राश् चैव हि वर्णांस् त्रीञ् शुश्रूषन्त्य् अनहंकृताः

brahma paryaccarat kṣatraṃ viśaḥ kṣatram anuvratāḥ śūdrāś caiva hi varṇāṃs trīñ śuśrūṣanty anahaṃkṛtāḥ

हिन्दी अर्थ

देवराज इद्धका आगमन, श्रीकृष्णका गोविन्दपदपर अभिषेक तथा इद्धका श्रीकृष्णको भावी कार्य बताकर अर्जुनकी देखभालके लिये कहना और श्रीकृष्णका उसे स्वीकार करना कृष्णस्य दर्शन शक्रो रोचयामास विस्मित: स निर्जलाम्बुदाकारं मत्तं मदजलोक्षितम्। आरुहौरावतं नागमाजगाम महीतलमू कृष्णमक्लिष्टकर्माणं पुरुहूतः पुरंदर:

English

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अध्याय ३१

श्लोक 133

नार्यो नात्यचरन् भर्तॄन् भार्यां नात्यचरत् पतिः सर्वम् आसीज् जगद्दान्तं निर्दस्युर् अभवन् मही राम एको ऽभवद् भर्ता रामः पालयिताभवत्

nāryo nātyacaran bhartṝn bhāryāṃ nātyacarat patiḥ sarvam āsīj jagaddāntaṃ nirdasyur abhavan mahī rāma eko 'bhavad bhartā rāmaḥ pālayitābhavat

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय ! जब इबद्धने देखा कि श्रीकृष्णने गोवर्धन धारण करके गोकुलकी रक्षा कर ली, तब वे बड़े विस्मयमें पड़े। अब उन्हें श्रीकृष्णका दर्शन करनेकी इच्छा हुई ॥ १॥ वे जलहीन बादलके समान श्रवेतवर्णाले और मदके जलसे भीगे हुए ऐरावत नामक मदमत्त हाथीपर चढ़कर भूतलपर आये॥ २॥ अनेक नामोंसे पुकारे जानेवाले पुरंदर इन्द्रने वहाँ आकर देखा, अनायास ही महान् कर्म करनेवाले श्रीकृष्ण गोवर्धन पर्वतकी एक शिलापर बैठे हुए हैं महान् तेजसे उद्धासित होनेवाले गोपवेषधारी विष्णुस्वरूप उन अविनाशी बालकृष्णको देखकर देवराज इन्द्रको

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अध्याय ३१

श्लोक 134

आसन् वर्षसहस्राणि तथा पुत्रसहस्रिणः अरोगाः प्राणिनश् चासन् रामे राज्यं प्रशासति

āsan varṣasahasrāṇi tathā putrasahasriṇaḥ arogāḥ prāṇinaś cāsan rāme rājyaṃ praśāsati

हिन्दी अर्थ

गोपवेषधरं विष्णुं प्रीतिं लेभे पुरंदरः ॥ ४ बड़ी प्रसन्नता हुई तं सो5म्बुजदलश्यामं कृष्णं श्रीवत्सलक्षणम्। पर्यापनयनः शक्रः सर्वर्नेत्रेरहैक्षत दृष्ठा चैन॑ थ्रिया जुष्ट मर्त्मलोके 5मरोपमम् । सूपविष्ट शिलापृष्ठे शक्र: सत्रीडितो5भवत् अन्तर्द्धानं गतश्छायां चकारोरगभोजन:

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अध्याय ३१

श्लोक 135

देवतानाम् ऋषीणां च मनुष्याणां च सर्वशः पृथिव्यां सहवासो ऽभूद् रामे राज्यं प्रशासति

devatānām ṛṣīṇāṃ ca manuṣyāṇāṃ ca sarvaśaḥ pṛthivyāṃ sahavāso 'bhūd rāme rājyaṃ praśāsati

हिन्दी अर्थ

त॑ विविक्ते बनगतं लोकतवृत्तान्ततत्परम्। उपतस्थे गजं हित्वा कृष्णं बलनिषूदन: रराज देवराजो वै वज़पूर्णकरः प्रभुः किरीटेनार्कतुल्येन विद्युदुद्योतकारिणा। कुण्डलाभ्यां स दिव्याभ्यां सततं शोभितानन: सहस्त्रपत्रकान्तेन देहभूषणकारिणा। ईक्षमाण: सहस्त्रेण नेत्राणां कामरूपिणाम्

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अध्याय ३१

श्लोक 136

रामो रामो राम इति प्रजानाम् अभवत् कथाः ।रामारामं जगद्भूतं रामे राज्यं प्रशासति ।गाथा अप्य् अत्र गायन्ति ये पुराणविदो जनाः रामे निबद्धास् तत्त्वार्था माहात्म्यं तस्य धीमतः

rāmo rāmo rāma iti prajānām abhavat kathāḥ | rāmārāmaṃ jagadbhūtaṃ rāme rājyaṃ praśāsati | gāthā apy atra gāyanti ye purāṇavido janāḥ rāme nibaddhās tattvārthā māhātmyaṃ tasya dhīmataḥ

हिन्दी अर्थ

त्रिदशाज्ञापनार्थीन मेघनिर्धोषकारिणा। अथ दिव्येन मधुरं व्याजहार स्वरेण तम् कृष्ण कृष्ण महाबाहो ज्ञातीनां नन्दिवर्द्धन। अतिदिव्य॑ कृतं कर्म त्वया प्रीतिमता गवाम् मयोत्सृष्टपु. मेघेषु युगान्तावर्तकारिषु। यत्त्वया रक्षिता गावस्तेनास्मि परितोषित: धृतो वेश्मवदाकाशे को होतेन न विस्मयेत्

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अध्याय ३१

श्लोक 137

श्यामो युवा लोहिताक्षो दीप्तास्यो मितभाषिता आजानबाहुः सुमुखः सिंहस्कन्धो महाभुजः

śyāmo yuvā lohitākṣo dīptāsyo mitabhāṣitā ājānabāhuḥ sumukhaḥ siṃhaskandho mahābhujaḥ

हिन्दी अर्थ

अतिदवृष्टि: कृता कृष्ण गवां बै साप्तरात्रिकी १. स्वायम्भुव योग कहते हैं हैरण्यगर्भी (ब्रह्मसम्बन्धिनी) एकोनविंशो5ध्याय: € नीलकमलदलके समान श्यामसुन्दर एवं श्रीवत्स- चिह्वविभूषित उन श्रीकृष्णको देखकर इन्द्रको अपने नेत्रोंका फल प्राप्त हो गया। उन्होंने अपने सम्पूर्ण नेत्रोंसे जी-भरकर उन्हें देखा॥५॥ मर्त्यलोकमें रहकर भी

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अध्याय ३१

श्लोक 138

दश वर्षसहस्राणि दश वर्षशतानि च अयोध्याधिपतिर् भूत्वा रामो राज्यम् अकारयत्

daśa varṣasahasrāṇi daśa varṣaśatāni ca ayodhyādhipatir bhūtvā rāmo rājyam akārayat

हिन्दी अर्थ

देवोपम शोभासे सम्पन्न श्रीकृष्णको शिलापृष्ठपर सुखपूर्वक बैठा देख इन्द्रको बड़ी लज्जा हुई॥६॥ वहाँ बैठे हुए श्रीहरिके मुखपर सर्पभोजी पक्षिराज गरुड़ अदृश्य रहकर अपने दोनों पंखोंसे छाया किये हुए थे॥७॥ बलसूदन इन्द्र हाथी छोड़कर उतर पड़े और एकान्तमें वनके भीतर रहकर लोक-व्यवहारमें तत्पर हुए श्रीकृष्णकी सेवामें उपस्थित हुए॥ ८॥ श्रीकृष्फेक समीप जाकर दिव्य पुष्पोंके हार और अनुलेपन धारण करनेवाले प्रभावशाली देवराज इन्द्र बड़ी शोभा पा रहे थे। उनका हाथ वज्नसे परिपूर्ण था॥९॥ विद्युतंके समान प्रकाश फैलानेवाले सूर्यतुल्य तेजस्वी किरीट तथा दो दिव्य कुण्डलोंसे उनके श्रीमुखकी सदा ही बड़ी शोभा होती थी वे अपने वक्षःस्थलपर एक ऐसे हारसे विभूषित थे, जिसमें फूलोंके पाँच गुच्छे लटक रहे थे। खिले हुए सहस्नर कमलदलके समान कान्तिमानू, सम्पूर्ण शरीरको विभूषित करनेवाले तथा इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले

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अध्याय ३१

श्लोक 139

ऋक्सामयजुषां घोषो ज्याघोषश् च महात्मनः अव्युच्छिन्नो ऽभवद् राष्ट्रे दीयतां भुज्यताम् इति

ṛksāmayajuṣāṃ ghoṣo jyāghoṣaś ca mahātmanaḥ avyucchinno 'bhavad rāṣṭre dīyatāṃ bhujyatām iti

हिन्दी अर्थ

एक सहस्र नेत्रोंसे वे भगवान् श्रीकृष्णफी ओर देख रहे थे॥ ११॥ उन्होंने देवताओंको आज्ञा देनेके लिये अभ्यस्त और मेघ-गर्जनाके समान गम्भीर घोष करनेवाले दिव्य स्वरसे मधुर वाणीमें भगवान्से इस प्रकार कहा इन्द्र बोले--कृष्ण! कृष्ण!! महाबाहो !!! आप सजातीय बन्धुओंके आनन्दकी वृद्धि करनेवाले हैं। गौओंके प्रति प्रीति रखकर आपने जो कर्म किया है, वह अति दिव्य है॥ १३॥ मेरे द्वारा छोड़े गये प्रलयकी पुनरावृत्ति करनेवाले मेघोंके वर्षा करनेपर भी आपने जो गौओंकी रक्षा की है, उससे मैं बहुत संतुष्ट हूँ॥ १४॥ यह जो उत्तम पर्वत है, इसे आपने स्वायम्भुव योगसे आकाशमें घरकी भाँति धारण कर लिया था। आपके इस अलौकिक कर्मसे किसको आश्चर्य नहीं होगा॥ १५॥ श्रीकृष्ण! जब मेरा प्रचलित उत्सव रोक दिया गया, तब मैंने रोषमें भरकर गौओंपर अपना क्रोध उतारनेके लिये सात राततक अतिवृष्टि की

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अध्याय ३१

श्लोक 140

सत्त्ववान् गुणसंपन्नो दीप्यमानः स्वतेजसा अति सूर्यं च चन्द्रं च रामो दाशरथिर् बभौ

sattvavān guṇasaṃpanno dīpyamānaḥ svatejasā ati sūryaṃ ca candraṃ ca rāmo dāśarathir babhau

हिन्दी अर्थ

धारणाको, उसके करनेसे भारी-से-भारी वस्तु भी हलकी हो जाती है। जैसे श्रीकृष्णके उठाते समय गोवर्धन पर्वत हलका हो गया था, इसी तरह उस योग या धारणाका आश्रय लेनेसे बड़ी-से-बड़ी वस्तु भी बहुत छोटी या अल्प हो जाती है। जैसे अगस्त्यके समुद्रपान करते समय उनके लिये सारा समुद्र तीन ही आचमनमें सीमित होकर आ गया था। उस दुर्जय मेघवृष्टिका आपने निवारण कर दिया। देवै: सदानवगणीर्टूर्निवार्या मयि स्थिते॥ १७ मेरे रहते दानवोंसहित सम्पूर्ण देवताओंके लिये भी उस

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अध्याय ३१

श्लोक 141

ईजे क्रतुशतैः पुण्यैः समाप्तवरदाक्षिणैः हित्वायोध्यां दिवं यातो राघवो ऽसौमहाबलः

īje kratuśataiḥ puṇyaiḥ samāptavaradākṣiṇaiḥ hitvāyodhyāṃ divaṃ yāto rāghavo 'saumahābalaḥ

हिन्दी अर्थ

अहो मे सुप्रियं कृष्ण यत् त्वं मानुषदेहवान्। समग्र वैष्णवं॑ तेजो विनिगृहसि रोषितः साधितं देवतानां हि मन्ये5हं कार्यमव्ययम्। त्वयि मानुष्यमापन्ने युक्ते चैव स्वतेजसा सेत्स्यते सर्वकार्यार्थों न किंचित् परिहास्यते। देवानां यद् भवान् नेता सर्वकार्यपुरोगम: एकस्त्वमसि देवानां लोकानां च सनातन: । द्वितीयं नात्र पश्यामि यस्तेषां च धुरं वहेत्

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अध्याय ३१

श्लोक 142

एवम् एष महाबाहूर् इक्ष्वाकुकुलनन्दनः रावणं सगणं हत्वा दिवम् आचक्रमे प्रभुः

evam eṣa mahābāhūr ikṣvākukulanandanaḥ rāvaṇaṃ sagaṇaṃ hatvā divam ācakrame prabhuḥ

हिन्दी अर्थ

एवं त्वमसि देवानां मग्नानां द्विजवाहनः त्वच्छरीरगतं कृष्ण जगत्प्रकरणं त्विदम्। ब्रह्मणा साधु निर्दिष्ट धातुभ्य इव काझ्जनम् गरुत्मान् पक्षिणां श्रेष्टो देवानां च भवान् वर: अपामधस्ताल्‍लोको बै तस्योपरि महीधरा: । नागानामुपरिष्टाद् भू: पृथिव्युपरि मानुषा:

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अध्याय ३१

श्लोक 143

अपरः केशवस्यायं प्रादुर्भावो महात्मनः विख्यातो माथुरे कल्पे सर्वलोकहिताय वै

aparaḥ keśavasyāyaṃ prādurbhāvo mahātmanaḥ vikhyāto māthure kalpe sarvalokahitāya vai

हिन्दी अर्थ

मनुष्यलोकादूर्ध्व तु खगानां गतिरुच्यते। आकाशस्योपरि रविद्वरि स्वर्गस्थ भानुमान् देवलोक: परस्तस्माद् विमानगमनो महान्। यत्राहं कृष्ण देवानामैन्द्रे विनिहितः पदे वर्षाको रोकना बहुत ही कठिन था॥ १७॥ श्रीकृष्ण। यह एक आश्चर्यमयी घटना हुई है। मेरे लिये यह बहुत ही प्रिय है कि आप मनुष्य-शरीर धारण करके भी अपने भीतर सम्पूर्ण वैष्णव तेजको छिपाये रखते हैं और रोष दिलाये जानेपर उसे प्रकट कर सकते हैं

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अध्याय ३१

श्लोक 144

यत्र साल्वं च कंसं च मैन्दं द्विविदम् एव च अरिष्टं वृषभं केशिं पूतनां दैत्यदारिकाम्

yatra sālvaṃ ca kaṃsaṃ ca maindaṃ dvividam eva ca ariṣṭaṃ vṛṣabhaṃ keśiṃ pūtanāṃ daityadārikām

हिन्दी अर्थ

आप मानव-शरीरको प्राप्त होकर भी अपने वैष्णव तेजसे सम्पन्न हैं, इसलिये मैं देवताओंके कार्यको सिद्ध हुआ ही मानता हूँ। अब हमारा कोई कार्य बिगड़ नहीं सकता॥ १९॥ जब आप देवताओंके नेता हैं और सभी कार्योमें अग्रगामी रहते हैं, तब हमारा सब कार्य, समस्त प्रयोजन सिद्ध हो जायगा, कुछ भी बिगड़ने नहीं पायेगा॥ २०॥ प्रभो! एकमात्र आप ही सम्पूर्ण देवता तथा लोकोंके सनातन रक्षक हैं। मैं आपके सिवा दूसरे किसीको यहाँ ऐसा नहीं देखता, जो उन लोकों और श्रेष्ठ बैल भार ढोनेके लिये सबसे आगे जोता जाता है, उसी प्रकार आप संकटमें डूबे हुए देवताओंका उद्धार करनेके लिये सबसे आगे रहते हैं। पक्षिराज गरुड़ आपके वाहन हैं॥ २२॥ श्रीकृष्ण। यह जो संसारकी

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अध्याय ३१

श्लोक 145

नागं कुवलयापीडं चाणूरं मुष्टिकं तथा दैत्यान् मानुषदेहस्थान् सूदयाम् आस वीर्यवान्

nāgaṃ kuvalayāpīḍaṃ cāṇūraṃ muṣṭikaṃ tathā daityān mānuṣadehasthān sūdayām āsa vīryavān

हिन्दी अर्थ

सृष्टि है, वह सब आपके शरीरके भीतर ही है। ब्रह्माजीने तो उसका भलीभाँति निर्देशमात्र किया है। जैसे सब धातुओंमें सुवर्ण श्रेष्ठ है, उसी प्रकार समस्त देवताओंमें आप हैं ॥ २३॥ साक्षात् स्वयम्भू भगवान् ब्रह्मा भी अपनी बुद्धि अथवा अवस्थाके द्वारा आपका अनुसरण नहीं कर सकते--आपके साथ-साथ नहीं चल सकते। ठीक उसी तरह, जैसे पड्जु मनुष्य शीघ्रगामी पुरुषका पीछा नहीं कर सकता--उसके साथ नहीं जा सकता समस्त पर्वतोंमें हिमवान् श्रेष्ठ है। सरोवरोंमें समुद्र उत्तम है। पक्षियोंमें गरुड़ तथा देवताओंमें आप श्रेष्ठ हैं सबसे नीचे जललोक है, उसके ऊपर पर्वत हैं। यह पृथ्वी नागोंक ऊपर स्थित है और पृथ्वीपर मनुष्य निवास करते हैं॥ २६॥ मनुष्यलोकसे ऊपर आकाशमें पक्षियोंकी गति बतायी जाती है। आकाशसे ऊपर अंशुमाली

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अध्याय ३१

श्लोक 146

छिन्नं बाहुसहस्रं च बाणस्याद्भुतकर्मणः नरकश् च हतः संख्ये यवनश् च महाबलः

chinnaṃ bāhusahasraṃ ca bāṇasyādbhutakarmaṇaḥ narakaś ca hataḥ saṃkhye yavanaś ca mahābalaḥ

हिन्दी अर्थ

सूर्य हैं, जो स्वर्गलोकके द्वार कहे गये हैं॥ २७॥ सूर्यलोकसे ऊपर देवताओंका महान् लोक है, जहाँ विमानसे यात्रा की जाती है। श्रीकृष्ण! वहीं मुझे देवेन्द्रपदपर स्थापित किया गया है एकोनविंशो5ध्याय: स्वर्गादूर्ध्व ब्रह्मलोको ब्रह्मर्षिगणसेवित: । तत्र सोमगतिश्विव ज्योतिषां च महात्मनाम् तस्योपरि गवां लोकः साध्यास्तं पालयन्ति हि। स हि सर्वगत: कृष्ण महाकाशगतो महान्

English

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अध्याय ३१

श्लोक 147

हृतानि च महीपानां सर्वरत्नानि तेजसा दुराचाराश् च निहताः पार्थिवा ये महीतले

hṛtāni ca mahīpānāṃ sarvaratnāni tejasā durācārāś ca nihatāḥ pārthivā ye mahītale

हिन्दी अर्थ

लोक स्त्वधो दुष्कृतिनां नागलोकस्तु दारुण: । पृथिवी कर्मशीलानां क्षेत्रं सर्वस्य कर्मण: गतिः शमदमाह्यानां स्वर्ग: सुकृतकर्मणाम् ब्राहो तपसि युक्तानां ब्रह्यलोक:ः परा गति: । गवामेव तु गोलोको दुरारोहा हि सा गति: स तु लोकस्त्वया कृष्ण सीदमान: कृतात्मना। धृतो धृतिमता वीर निष्नतोपद्रवान् गवाम्

English

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अध्याय ३१

श्लोक 148

नवमे द्वापरे विष्णुर् अष्टाविंशे पुराभवत् ।वेदव्यासस् तदा जज्ञे जातूकर्ण्यपुरःसरः ।एको वेदश् चतुर्धा तु कृतस् तेन महात्मना ।जनितो भारतो वंशः सत्यवत्याः सुतेन च ।एते लोकहितार्थाय प्रादुर्भावा महात्मनः अतीताः कथिता राजन् कथ्यन्ते चाप्य् अनागताः ।कल्की विष्णुयशा नाम भूयश् चोत्पत्स्यते प्रभुः

navame dvāpare viṣṇur aṣṭāviṃśe purābhavat | vedavyāsas tadā jajñe jātūkarṇyapuraḥsaraḥ | eko vedaś caturdhā tu kṛtas tena mahātmanā | janito bhārato vaṃśaḥ satyavatyāḥ sutena ca | ete lokahitārthāya prādurbhāvā mahātmanaḥ atītāḥ kathitā rājan kathyante cāpy anāgatāḥ | kalkī viṣṇuyaśā nāma bhūyaś cotpatsyate prabhuḥ

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मणश्व॒ महाभाग गौरवात् तव चागतः अहं भूतपतिः कृष्ण देवराज: पुरंदरः। अदितेगर्भपर्याये पूर्वजस्ते पुराकृतः देवरूपेण तत् सर्व क्षन्तुमहसि मे विभो एवं क्षान्तमना: कृष्ण स्वेन सौम्येन तेजसा। ब्रह्मण: श्रुणु मे वाक्यं गवां च गजविक्रम

English

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अध्याय ३१

श्लोक 149

॥।संभलग्रामको द्विजः ।सर्वलोकहितार्थाय ॥।।दशमो भाव्यसंपन्नो याज्ञवल्क्यपुरःसरः ।क्षपयित्वा च तान् सर्वान् भाविनार्थेन चोदितान् ।गङ्गायमुनयोर् मध्ये निष्ठां प्राप्स्यति सानुगः ।ततः काले व्यतीते तु सामात्ये सहसैनिके ।नृपेष्व् अथ प्रनष्तेषु तदा त्व् अप्रग्रहाः प्रजाः ॥ क्षणेन निर्वृते चैव हत्वा चान्योन्यम् आहवे ।परस्परहृतस्वाश् च निराक्रन्दाः सुदुःखिताः ।एवं कष्टम् अनुप्राप्ताः कलिसंध्यांशके तदा ।प्रजाः क्षयं प्रयास्यन्ति सार्धं कलियुगेन ह ।क्षीणे कलियुगे तस्मिंस् ततः कृतयुगं पुनः ।प्रपत्स्यते यथान्यायं स्वभावाद् एव नान्यथा ।अनुकर्षन् स वै सेनां हस्त्यश्वरथसंकुलाम् ।प्रगृहीतायुधैर् विप्रैर् वृतः शतसहस्रशः ।निःशेषाञ् शुद्धराजांस् तांस् तदा स तु करिष्यति ।पाषण्डान् म्लेच्छजातींश् च दस्यूंश् चैव सहस्रशः ।नात्यर्थं धार्मिका ये च ये च धर्मद्विषः क्वचित् ।उदीच्या मध्यदेशस्थाः पार्वतीयास् तथैव च ।प्राच्यान् प्रतीच्यांश् च तथा विन्ध्यपृष्ठपरानुगान् ।तथैव दाक्षिणात्यांश् च द्रविडान् सिंहलैः सह ।गान्धारान् पारदांश् चैव पह्लवान् यवनाञ् शकान् ।तुखारान् बर्बरांश् चैव श्वानिकान् दरदान् खशान् ।लम्बकांश् च मरुंधांश् च किरातांश् चैव स प्रभुः ।प्रवृत्तचक्रो बलवान् दस्यून् आमन्तको बली ।अधृष्यः सर्वभूतानां पृथिवीं विचरिष्यति ।मानुषः स तु संजज्ञे देवस्याग्रस्य धीमतः ।पूर्वजन्मनि विष्णुः स प्रमतिर् नाम वीर्यवान् ।गात्रेण वै चन्द्रमसः पूर्णे कलियुगे ऽभवत् ।इत्य् एता वासुदेवस्य दश संभूतयः स्मृताः ।तं तं कालं च कार्यं च तं तथोद्देशकारिणम् ।अंशेन त्रिषु लोकेषु तांस् तान् योनीन् विशत्य् अपि ।पञ्चविंशोत्थितः कल्की पञ्चाशच्छरदां समाः ।विनिघ्नन् सर्वभूतानि मानुषांश् चैव सर्वशः ।कृत्वा बीजावशेषां तु महीं क्रूरेण कर्मणा ।संयोधयित्वा च खलान् प्रायस् तान् अप्य् अधार्मिकान् ।तद् एष वै तदा कल्की चरितार्थः ससैनिकः ।प्रजानां साधयित्वा च संसिद्धार्थः पुनः स्वयम् ।वृथान्योन्यं प्रकुपितान् संहरिष्यति मोहितान् ।पुराणि हत्वा ग्रामांश् च तदा दुष्प्रग्रहाः प्रजाः ।प्रनष्टश्रुतिधर्माश् च नष्टवर्णाश्रमास् तथा ।ह्वस्वा अल्पायुषश् चैव भविष्यन्ति कलौ युगे ।सरित्पर्वतसेविन्यः पत्रमूलफलाशनाः ।चीरपत्राजिनधरा गह्वरं घोरम् आश्रिताः ।अल्पायुषो नष्टवार्ता बहुबाधाः सुदुःखिताः ।एते चान्ये च बहवो दिव्या देवगुणैर् युताः प्रादुर्भावाः पुराणेषु गीयन्ते ब्रह्मवादिभिः

... saṃbhalagrāmako dvijaḥ | sarvalokahitārthāya ... | daśamo bhāvyasaṃpanno yājñavalkyapuraḥsaraḥ | kṣapayitvā ca tān sarvān bhāvinārthena coditān | gaṅgāyamunayor madhye niṣṭhāṃ prāpsyati sānugaḥ | tataḥ kāle vyatīte tu sāmātye sahasainike | nṛpeṣv atha pranaṣteṣu tadā tv apragrahāḥ prajāḥ || kṣaṇena nirvṛte caiva hatvā cānyonyam āhave | parasparahṛtasvāś ca nirākrandāḥ suduḥkhitāḥ | evaṃ kaṣṭam anuprāptāḥ kalisaṃdhyāṃśake tadā | prajāḥ kṣayaṃ prayāsyanti sārdhaṃ kaliyugena ha | kṣīṇe kaliyuge tasmiṃs tataḥ kṛtayugaṃ punaḥ | prapatsyate yathānyāyaṃ svabhāvād eva nānyathā | anukarṣan sa vai senāṃ hastyaśvarathasaṃkulām | pragṛhītāyudhair viprair vṛtaḥ śatasahasraśaḥ | niḥśeṣāñ śuddharājāṃs tāṃs tadā sa tu kariṣyati | pāṣaṇḍān mlecchajātīṃś ca dasyūṃś caiva sahasraśaḥ | nātyarthaṃ dhārmikā ye ca ye ca dharmadviṣaḥ kvacit | udīcyā madhyadeśasthāḥ pārvatīyās tathaiva ca | prācyān pratīcyāṃś ca tathā vindhyapṛṣṭhaparānugān | tathaiva dākṣiṇātyāṃś ca draviḍān siṃhalaiḥ saha | gāndhārān pāradāṃś caiva pahlavān yavanāñ śakān | tukhārān barbarāṃś caiva śvānikān daradān khaśān | lambakāṃś ca maruṃdhāṃś ca kirātāṃś caiva sa prabhuḥ | pravṛttacakro balavān dasyūn āmantako balī | adhṛṣyaḥ sarvabhūtānāṃ pṛthivīṃ vicariṣyati | mānuṣaḥ sa tu saṃjajñe devasyāgrasya dhīmataḥ | pūrvajanmani viṣṇuḥ sa pramatir nāma vīryavān | gātreṇa vai candramasaḥ pūrṇe kaliyuge 'bhavat | ity etā vāsudevasya daśa saṃbhūtayaḥ smṛtāḥ | taṃ taṃ kālaṃ ca kāryaṃ ca taṃ tathoddeśakāriṇam | aṃśena triṣu lokeṣu tāṃs tān yonīn viśaty api | pañcaviṃśotthitaḥ kalkī pañcāśaccharadāṃ samāḥ | vinighnan sarvabhūtāni mānuṣāṃś caiva sarvaśaḥ | kṛtvā bījāvaśeṣāṃ tu mahīṃ krūreṇa karmaṇā | saṃyodhayitvā ca khalān prāyas tān apy adhārmikān | tad eṣa vai tadā kalkī caritārthaḥ sasainikaḥ | prajānāṃ sādhayitvā ca saṃsiddhārthaḥ punaḥ svayam | vṛthānyonyaṃ prakupitān saṃhariṣyati mohitān | purāṇi hatvā grāmāṃś ca tadā duṣpragrahāḥ prajāḥ | pranaṣṭaśrutidharmāś ca naṣṭavarṇāśramās tathā | hvasvā alpāyuṣaś caiva bhaviṣyanti kalau yuge | saritparvatasevinyaḥ patramūlaphalāśanāḥ | cīrapatrājinadharā gahvaraṃ ghoram āśritāḥ | alpāyuṣo naṣṭavārtā bahubādhāḥ suduḥkhitāḥ | ete cānye ca bahavo divyā devaguṇair yutāḥ prādurbhāvāḥ purāṇeṣu gīyante brahmavādibhiḥ

हिन्दी अर्थ

आह त्वां भगवान् ब्रह्मा गावश्चाकाशगा दिवि। कर्मभिस्तोषिता दिव्यैस्तव संरक्षणादिभि: भवता रक्षिता गावो गोलोकश्न महानयम् । यद् वयं पुड्ढवैः सार्द्ध वर्द्धाम: प्रसवैस्तथा स्वर्गसे ऊपर ब्रह्मलोक है, जो ब्रह्मर्षिगणोंसे सेवित है। वहाँतक चन्द्रमाकी तथा महात्मा ग्रह-नक्षत्रोंकी गति है॥ २९ ॥ ब्रह्मलोकसे ऊपर गोलोक है, जिसका साध्यगण पालन करते हैं। श्रीकृष्ण! वह महान् लोक सर्वव्यापी है। महाकाशमें व्यापकरूपसे स्थित है॥ ३० ॥ उसमें भी आपकी तपोमयी गति सर्वोपरि है। हम पितामहसे पूछते रहनेपर भी अबतक आपकी उस गतिको नहीं जान सके हैं॥३१॥ भयंकर नागलोक सबसे नीचे है। वह

English

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अध्याय ३१

श्लोक 150

यत्र देवा विमुह्यन्ति प्रादुर्भावानुकीर्तने पुराणं वर्तते यत्र वेदश्रुतिसमाहितम्

yatra devā vimuhyanti prādurbhāvānukīrtane purāṇaṃ vartate yatra vedaśrutisamāhitam

हिन्दी अर्थ

पापाचारियोंको प्राप्त होनेवाला लोक या स्थान है। जो स्वभावसे ही कर्मठ हैं, उनके लिये यह भूलोक है। यह समस्त कर्मका क्षेत्र है॥ ३२॥ जो अस्थिर हैं, जिनकी वृत्ति वायुके समान है, उनका आश्रय आकाश या अन्तरिक्षलोक है। जो शम-दमसे सम्पन्न हो पुण्य-कर्ममें लगे रहते हैं, उन मनुष्योंकी गति स्वर्गलोक है जो ब्राह्म-तपमें संलग्न रहनेवाले लोग हैं, उनकी परम गति ब्रह्मलोक है। गोलोक तो गौओंको ही सुलभ होनेवाला लोक है। वह गति दूसरोंके लिये दुरारोह (दुर्लभ) है॥ ३४॥ वीर श्रीकृष्ण! इस समय (मेरे द्वारा वषके कारण) वही गौओंका लोक संकटमें पड़ गया था, जिसे आप-जैसे धेर्यशाली पुण्यात्मा पुरुषने उन गौओंपर आये हुए उपद्रवोंका नाश करके बचाया है

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अध्याय ३१

श्लोक 151

एतदुद्देशमात्रेण प्रादुर्भावानुकीर्तनम् कीर्तितं कीर्तनीयस्य सर्वलोकगुरोः प्रभोः

etaduddeśamātreṇa prādurbhāvānukīrtanam kīrtitaṃ kīrtanīyasya sarvalokaguroḥ prabhoḥ

हिन्दी अर्थ

अतः महाभाग! मैं (दिव्य कामधेनु आदि) गौओंके तथा ब्रह्माजीके वचनोंसे प्रेरित होकर यहाँ आया हूँ। आपके प्रति मेरे मनमें जो गौरव है; उससे भी मुझे यहाँ आनेमें प्रेरणा मिली है॥ ३६॥ श्रीकृष्ण ! मैं वही समस्त भूतोंका अधिपति देवराज इन्द्र हूँ, जिसे आपने पूर्वकालमें माता अदितिके गर्भमें आकर अपना बड़ा भाई बनाया था प्रभो! मैंने जो देवरूपसे उपस्थित होकर तेजसे अपना तेज प्रकट करके आपको दिखाया है, मेरे उस सारे अपराधको आप क्षमा कर दें॥३८॥ हाथीके समान पराक्रमी श्रीकृष्ण! इस प्रकार आप अपने सौम्य तेजसे मनमें क्षमाभाव लाकर ब्रह्माजी तथा गौओंके कहे हुए इस वचनको मेरे मुखसे सुनिये-- ॥ ३९॥ भगवान् ब्रह्मा तथा च्युलोकमें स्थित हुई आकाशगामिनी गमौओंने आपको यह संदेश दिया है कि “हम आपके गोसंरक्षण आदि

English

¹⁸³ The art of music. This was the special gift of the Gandharvas.

अध्याय ३१

श्लोक 152

प्रीयन्ते पितरस् तस्य प्रादुर्भावानुकीर्तनात् विष्णोर् अमितवीर्यस्य यः शृणोति कृताञ्जलिः

prīyante pitaras tasya prādurbhāvānukīrtanāt viṣṇor amitavīryasya yaḥ śṛṇoti kṛtāñjaliḥ

हिन्दी अर्थ

दिव्य कर्मोंसे बहुत संतुष्ट हैं॥ ४० ॥ आपने जो गौओंकी रक्षा की है, उससे इस महान् गोलोकका संरक्षण हुआ है; क्योंकि अब हम अपने साँड़ों और संतानोंके साथ दिनोंदिन बढ़ रही हैं' कर्षकान् पुड्वैर्वाह्ममेंध्येन हविषा सुरान्। भश्रियं शकृत्प्रवृत्तेन तर्पयिष्याम कामदा: अद्यप्रभृति नो राजा त्वमिन्द्रो वै भव प्रभो तस्मात् त्वं काञ्जने: पूर्णर्दिव्यस्थ पयसो घटेः । एभिरद्याभिषिज्ञस्व मया हस्तावनामितैः

English

¹⁸³ The art of music. This was the special gift of the Gandharvas.

अध्याय ३१

श्लोक 153

सर्वपापविनिर्मुक्तो धनपुत्रपशूंल् लभेत् ।नाशुभं विद्यते तस्य पुत्रवान् द्युतिमान् भवेत् ।एतास् तु योगेश्वरयोगमायाः श्रुत्वा नरो मुच्यति सर्वपापैः ऋद्धिं समृद्धिं विपुलांश् च भोगान् प्राप्नोति शीघ्रं भगवत्प्रसादात्

sarvapāpavinirmukto dhanaputrapaśūṃl labhet | nāśubhaṃ vidyate tasya putravān dyutimān bhavet | etās tu yogeśvarayogamāyāḥ śrutvā naro mucyati sarvapāpaiḥ ṛddhiṃ samṛddhiṃ vipulāṃś ca bhogān prāpnoti śīghraṃ bhagavatprasādāt

हिन्दी अर्थ

अहं किलेन्द्रो देवानां त्वं गवामिन्द्रतां गतः । गोविन्द इति लोकास्त्वां स्तोष्यन्ति भुवि शाश्वतम् उपेन्द्र इति कृष्ण त्वां गास्यन्ति दिवि देवता: ये चेमे वार्षिका मासाश्चत्वारो विहिता मम। एषामर्द्ध प्रयच्छामि शरत्कालं तु पश्चिमम् शान्ति सर्वे गमिष्यन्ति मम कालविचारिण:

English

¹⁸³ The art of music. This was the special gift of the Gandharvas.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_harivaMza.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Harivamsha Purana — Chapter 31
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

Numbering follows the imported source and may differ from other editions.