Harivamsha Purana· Harivaṁśa Purāṇa
39
अध्याय 39 / 119

Adhyaya 39

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अध्याय ३९

श्लोक 1

ब्रह्मणा देवदेवेन सार्धं सलिलयोनिना ब्रह्मलोकं गतो ब्रह्मन् वैकुण्ठः किं चकार ह

brahmaṇā devadevena sārdhaṃ salilayoninā brahmalokaṃ gato brahman vaikuṇṭhaḥ kiṃ cakāra ha

हिन्दी अर्थ

वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय ! तदनन्तर जरासंधके महावतों और अनुगामी नरेशोंके साथ वृष्णिवंशियोंके कई बड़े-बड़े युद्ध हुए॥ १॥ भरतग्रेष्ठ ! रुक्मीके साथ वासुदेव श्रीकृष्णका, भीष्मकके साथ आहुक (उग्रसेन)-का, क्रथके साथ वसुदेवका, बश्रु (अक्रूर)-के साथ कैशिकका, गदके साथ चेदिराज शिशुपालका, शंकुके साथ दन्तवक्त्रका तथा अन्य सैनिकोंके साथ वृष्णिकुलके महामना वीर नरेशोंका, सारांश यह कि उभय पक्षके सैनिकोंका प्रतिद्वन्द्दी सैनिकोंके चलता रहा॥ २--४॥ नरेश्वर! हाथियोंसे हाथी, घोड़ोंसे घोड़े, पैदलोंसे पैदल और रथोंसे रथ मिश्रित हो गये और इस प्रकार घोल-मेल कर सभी योद्धा विपक्षियोंके साथ युद्ध करने लगे ॥ ५॥ राजा जरासंधका बलरामजीके

English

²¹⁶ Literally means one having no end. The God has no beginning or

अध्याय ३९

श्लोक 2

किमर्थं चादिदेवेन नीतः सलिलयोनिना विष्णुर् दैत्यवधे वृत्ते देवैर् अकृतसत्क्रियः

kimarthaṃ cādidevena nītaḥ salilayoninā viṣṇur daityavadhe vṛtte devair akṛtasatkriyaḥ

हिन्दी अर्थ

साथ उसी प्रकार दारुण एवं रोमाझ्जकारी संघर्ष हुआ, जैसा वृत्रासुरकके साथ देवराज इन्द्रका हुआ था रुक्मिणीके साथ भविष्यमें होनेवाले सम्बन्धको दृष्टिमें रखकर श्रीकृष्णने रुक्मीको नहीं मारा, उसकी ओरसे आनेवाले अग्नि और सूर्यकी किरणोंके समान तेजस्वी तथा विषधर सर्पोके समान विषैले बाणोंका उन्होंने अपनी शिक्षाके बलसे निवारण कर दिया। राजन्! इस प्रकार दोनों सेनाओंके सैनिकसमूहोंका महान् विनाश हुआ। वहाँ रक्त और माँसकी कीच जम गयी। योद्धाओंके उस महान् संहारमें चारों ओरसे बहुत-से कबन्ध उठने लगे, जिनकी गणना नहीं की जा सकती थी। रथारूढ़ वीर बलरामने विषधर सर्पोंके समान भयंकर बाणोंद्वार जरासंधको आच्छादित करते हुए शीघ्रगामी रथद्वारा बड़े वेगसे उनका सामना करनेके लिये पहुँचा ॥ ७--११॥ वे दोनों नाना प्रकारके अस्त्रोंद्वारा एक-दूसरेको घायल करके जोर-जोरसे गरजते थे। दोनोंके अस्त्र-शस्त्र क्षीण हो गये, दोनों ही रथहीन

English

²¹⁷ According to the Hindu mythology the world is bounded by the four oceans on the four sides. This figuratively refers to the universal form of the God.

अध्याय ३९

श्लोक 3

ब्रह्मलोके च किं स्थानं कं वा योगम् उपास्त सः कं वा दधार नियमं स विभुर् भूतभावनः

brahmaloke ca kiṃ sthānaṃ kaṃ vā yogam upāsta saḥ kaṃ vā dadhāra niyamaṃ sa vibhur bhūtabhāvanaḥ

हिन्दी अर्थ

हो गये तथा दोनोंके ही घोड़े और सारथि मारे गये। उभौ तौ परमाचार्यों लोके ख्यातौ महाबलौ। मत्ताविव गजौ युद्धे तावन्योन्यमयुध्यताम् ततो देवा: सगन्धर्वा: सिद्धाश्च समहर्षय: । समन्ततश्वाप्ससस: समाजग्मु: सहस्त्रशः तद् देवयक्षगन्धर्वमहर्षिभिरलंकृतम्। शशुभे5भ्यधिकं राजन् दिवं ज्योतिर्गणैरिव

English

²¹⁸ There are four principal _Varnas_ or castes, the _Brāhmanas_, _Kshatriyas_, _Vaisyas_ and _Sudras_. The Brāhmanas are said to have sprung from the mouth of Brahma and belong to the sacerdotal class. The Kshatriyas, or the military caste, are said to have arisen from His arms. The Vaisyas or the trading class are said to have sprung from His thighs and the Sudra or the servile class from His feet. The earliest reference to the origin of caste is seen in a hymn of the Rig-Veda called _Purusha Sukta_. There are various other accounts seen in the various Puranas.

अध्याय ३९

श्लोक 4

कथं तत्रासतस् तस्य विश्वं जगद् इदं महत् श्रियम् आप्नोति विपुलां सुरासुरनरार्चिताम्

kathaṃ tatrāsatas tasya viśvaṃ jagad idaṃ mahat śriyam āpnoti vipulāṃ surāsuranarārcitām

हिन्दी अर्थ

सव्यं मण्डलमाश्रित्य बलदेवस्तु दक्षिणम् न सम कम्पयते रामं॑ जरासंधकरच्युता। गदा गदाभूतां श्रेष्ठ विन्ध्यं गिरिमिवानिल: सेहे धैर्येण महता शिक्षया च व्यपोहयत्ू व्यायच्छन्ती चिरं काल॑ परिश्रान्ती च तस्थतुः । समाश्चस्य मुहूर्त तु पुनरन्योन्यमाहताम् उस दशामें वे दोनों पराक्रमी योद्धा गदा हाथमें लेकर एक-दूसरेपर टूट पड़े। हाथमें गदा उठाये वे दोनों महामनस्वी वीर पृथ्वीको कम्पित करते हुए वहाँ एक-एक शिखरवाले दो पर्वतोंके समान दिखायी देते थे। उन दोनों महाबाहु

English

²¹⁹ _Yuga_ is an age of the world of which there are four namely, Satya, Treta, Dwapara and Kali.

अध्याय ३९

श्लोक 5

कथं स्वपिति घर्मान्ते बुध्यते चाम्बुदक्षये कथं च ब्रह्मलोकस्थो धुरं वहति लौकिकीम्

kathaṃ svapiti gharmānte budhyate cāmbudakṣaye kathaṃ ca brahmalokastho dhuraṃ vahati laukikīm

हिन्दी अर्थ

वीरोंको युद्धके लिये उद्यत देख दूसरे योद्धाओंके युद्ध बंद हो गये। उन दोनोंकी गदायुद्धमें ख्याति थी। वे दोनों बड़े रोषमें भरकर एक-दूसरेपर धावा करते थे॥ १२-- १४॥ वे दोनों महाबली वीर संसारमें गदायुद्धके उत्तम आचार्यके रूपमें विख्यात थे तथा जैसे दो मतवाले हाथी लड़ते हैं, उसी प्रकार रणभूमिमें वे एक-दूसरेके साथ जूझ रहे थे॥ १५॥ उस समय गन्धर्वोंसहित देवता, सिद्ध, महर्षि तथा सहस्रों अप्सराएँ सब ओरसे उस युद्धको देखनेके लिये आ पहुँचीं॥ १६॥ राजन्! देवताओं, यक्षों, गन्धवों और महर्षियोंसे अलंकृत हुआ आकाशका वह भाग नक्षत्रसमूहोंसे विभूषित हुआ-सा अधिक शोभा पाने लगा। महाबली जरासंध बायेंसे पैंतरा देकर बलरामजीकी ओर दौड़ा और बलरामजीने दाहिनेसे उसपर आक्रमण किया॥ १७-१८ ॥ गदायुद्धमें कुशल वे दोनों बीर दसों दिशाओंको निनादित करते हुए एक-दूसरेपर उसी प्रकार प्रहार करने लगे, जैसे दो मतवाले हाथी परस्पर दाँतोंसे

English

²²⁰ An article intended as fit for offering with fire. Burnt offering, oblation with fire.

अध्याय ३९

श्लोक 6

चरितं तस्य विप्रेन्द्र दिव्यं भगवतो दिवि विस्तरेण यथातत्त्वं सर्वम् इच्छामि वेदितुम्

caritaṃ tasya viprendra divyaṃ bhagavato divi vistareṇa yathātattvaṃ sarvam icchāmi veditum

हिन्दी अर्थ

आघात करते हों। बलरामजी जब गदाका आघात करते, तब वज्रपातके समान भयानक शब्द सुनायी पड़ता था तथा रणभूमिमें जरासंधके गदाघातसे ऐसी आवाज होती थी, मानो कोई पर्वत फट पड़ा हो॥ १९-२०॥ जैसे प्रचण्ड वायु विन्ध्यपर्वतको नहीं हिला सकती, उसी प्रकार जरासंधके हाथसे छूटी हुई गदा गदाधारियोंमें श्रेष्ठ बलरामजीको कम्पित नहीं कर पाती थी। बलरामजीकी गदाके वेगको मगधराज जरासंध अपने बलकी अधिकताके कारण महान् धैर्यके साथ सह लेता था तथा अपनी शिक्षाके द्वारा उनके प्रहारको व्यर्थ कर देता था॥ २१-२२॥ इस प्रकार शत्रुओंका दमन करनेवाले वे दोनों महाबली योद्धा उस संग्राममें विचित्र पैंतरे दिखाते हुए विचर रहे थे॥ २३॥ देरतक परिश्रम करके थक जानेपर दोनों खड़े हो जाते थे; फिर दो घड़ीतक सुस्ताकर एक-दूसरेपर प्रहार करने लगते थे॥ २४॥ इस प्रकार वे दोनों प्रमुख योद्धा समानभावसे देरतक लड़ते रहे। वे दोनों ही युद्धसे विमुख नहीं हुए॥ २५॥ तदनन्तर पराक्रमी बलरामजीने जब गदा-युद्धमें जरासंधकी विशेषता देखी, तब उन्होंने कुपित हो गदा त्यागकर उत्तम मूसल हाथमें लिया

English

²²¹ A name of Balaveda. It is also the name of the serpent-king, the thousand-headed snake who was the couch and canopy of Vishnu.

अध्याय ३९

श्लोक 7

शृणु नारायणस्यादौ विस्तरेण प्रवृत्तयः ब्रह्मलोकं यथारूढो ब्रह्मणा सह मोदते

śṛṇu nārāyaṇasyādau vistareṇa pravṛttayaḥ brahmalokaṃ yathārūḍho brahmaṇā saha modate

हिन्दी अर्थ

अमोघं बलदेवेन क्रुद्धेन तु महारणे ततोडन्तरिक्षे वागासीत् सुस्वरा लोकसाक्षिणी । उबाच बलदेवं तं॑ समुद्यतहलायुधम् अचिरेणैव कालेन प्राणांस्त्यक्ष्यति मागध: दीर्घकाल॑ महाराज निधघ्नतामितरेतरम् पराजिते त्वपक्रान्ते जरासंधे महीपतौ

English

Vaishampayana said:—Thus ranging and sporting in the forest Krishna and Baladeva spent the two²²² months of the rainy season (1). Thereupon returning to Vraja those two heroic brothers heard that arrangements were being made for performing a _Yajna_ in honor of Indra and that the milkmen were busily engaged in merriments (2). Seeing this, Krishna, filled with curiosity, asked "What is that Sakra sacrifice for which you are all filled with delight?" (3) Amongst them an elderly milk-man replied:—"Hear, why Indra's flag is worshipped (4). O subduer of thy enemies, Indra, the king of the celestials and the lord of the world, is the master of clouds. For this reason from time immemorial and coming down from one family to another, this festival is being celebrated (5). Commanded by him and embellished by his bow the clouds produce corns with new showers of rain (6). Pleased with witnessing this festival the Lord Purandara, the giver of clouds and water, and the partaker of many sacrifices, brings about the gratification of the entire world (7). We and other men live by the corns produced by him and the celestials are also gratified thereby (8). Corns grow up when the king of gods sends down showers. And when the earth is gratified with oblations the whole universe appears as if full of ambrosia (9). Fed by the grass produced by him the kine, with the bulls and calves, have attained to nourishment and easiness (10). Wherever the cloud, pouring down water, is seen, there is observed neither a piece of ground shorn of grass and corns nor an hungry animal (11). The nectarine rays, of the sun that are milched by the Lord Sakra, are discharged by the clouds in the form of ambrosia-like showers of rain (12). The mighty leonine roar, announced by the air, which he emits with force from the clouds, is designated by the people as the muttering of clouds (13). The terrible sound, that he sends forth when carried by clouds accompanied by the wind, is heard like the clap of a thunder-bolt that shatters the mountains (14). O my child, as the great Lord Siva is encircled by the goblins, so Indra, surrounded by clouds coursing at will, and stationed in the sky, sends down showers accompanied by the clap of a thunder-bolt (15). Sometimes resembling an unfair day, sometimes resembling scattered gold, sometimes resembling collyrium and sometimes pouring water in drops the clouds paint the sky. Thus extracting water from the earth through the rays of the sun, Indra, the giver of water, sends it down again on earth for the behoof of all creatures (16–18).²²³ For these reasons O Krishna, this rainy season has been fixed upon as the time for worshipping Indra. The kings and others men with delight worship Indra in the rainy season. We

अध्याय ३९

श्लोक 8

कामं तस्य गतिः सूक्ष्मा देवैर् अपि दुरानुगा यत् तु शक्ष्याम्य् अहं वक्तुं तन् मे निगदतः शृणु

kāmaṃ tasya gatiḥ sūkṣmā devair api durānugā yat tu śakṣyāmy ahaṃ vaktuṃ tan me nigadataḥ śṛṇu

हिन्दी अर्थ

अस्तं याते दिनकरे नानुसस्त्रुस्तदा निशि। समानीय स्वकं सैन्यं लब्धलक्ष्या महाबला: पुरी प्रविविशुईष्टा: केशवेनाभिपालिता: । खाच्च्युतान्यायुधान्येवं तान्येवान्तर्दधुस्तदा राजानश्चानुगा ये5स्य स्वराष्ट्राण्येव ते ययु: वृष्णय: कुरुशार्दूल राजा ह्ातिबलः स वै उस महासमरमें कुपित हुए बलदेवजीके द्वारा उस भयानक तथा अमोघ मूसलको उठाया जाता देख आकाशमें सब लोगोंके सामने स्पष्ट शब्दोंमें देववाणी सुनायी दी। उसने हल-मूसल उठाये हुए बलदेवजीसे

English

²²² In India the year is divided into six seasons of two months each.

अध्याय ३९

श्लोक 9

एष लोकमयो देवो लोकाश् चैतन् मयास्त्रयः एष देवमयश् चैव देवाश् चैतन् मया दिवि

eṣa lokamayo devo lokāś caitan mayāstrayaḥ eṣa devamayaś caiva devāś caitan mayā divi

हिन्दी अर्थ

कहा-- ॥ २७-२८ ॥ 'दूसरोंको मान देनेवाले बलरामजी ! जरासंधका वध आपके हाथसे होनेवाला नहीं है; अतः खेद करनेकी आवश्यकता नहीं है। इसकी मृत्युका हेतु मुझे विदित हो गया है; अत: आप इसे मारनेकी चेष्टासे निवृत्त हो जाइये। मगधराज जरासंध थोड़े ही समयमें अपने प्राणोंका परित्याग करेगा'॥ २९॥ यह सुनकर जरासंधका मन उदास हो गया और बलरामजीने फिर उसपर प्रहार नहीं किया॥ ३० ॥ अब वे दोनों युद्धसे विरत हो गये; फिर तो वृष्णिवंशी योद्धा तथा दूसरे राजाओंने भी युद्ध बंद कर दिया। महाराज! इस प्रकार दीर्घकालतक एक-दूसरेपर प्रहार करते हुए उन योद्धाओंका जो अत्यन्त भयंकर युद्ध अविराम गतिसे चलता आ रहा था, वह शान्त हो गया। राजा जरासंध जब परास्त होकर युद्धसे हट गया और सूर्यदेव अस्त हो गये, तब रातके समय यादवोंने फिर उसका पीछा नहीं किया। भगवान् श्रीकृष्णद्वारा सुरक्षित महाबली यादव अपने लक्ष्यमें सफल हो चुके

English

²²² In India the year is divided into six seasons of two months each.

अध्याय ३९

श्लोक 10

देवेन वर्धते यद् धि सर्वं तद् धि जनार्दनात् यत् प्रवृत्तं च देवेभ्यस् तद् विद्धि मधुसूदनात्

devena vardhate yad dhi sarvaṃ tad dhi janārdanāt yat pravṛttaṃ ca devebhyas tad viddhi madhusūdanāt

हिन्दी अर्थ

थे, अतः वे अपनी सेना साथ लेकर बड़ी प्रसन्‍नताके साथ मथुरापुरीमें लौट आये। इसी तरह आकाश या दिव्य लोकसे जो आयुध आये थे, वे भी तत्काल अन्तर्धान हो गये। इधर राजा जरासंध भी उदास होकर अपनी पुरीको लौट गया। उसके साथ जो राजा लोग आये थे, वे भी अपने-अपने राष्ट्रोंकोी ही लौट गये ॥ ३१--३५ ॥ कुरुश्रेष्ठ ! वृष्णिवंशी वीर जरासंधको जीतकर भी उसे हारा हुआ नहीं मानते थे; क्योंकि उस राजाके पास बहुत बड़ी सेना थी तथा वह स्वयं भी अत्यन्त बलशाली था महाबली यादवोंने जरासंधको अठारह बार युद्धका अवसर प्रदान किया; किंतु वे किसी भी समरमें उसे मार न सके॥ ३७॥ महामते! राजा जरासंधके पास बीस अक्षौहिणी सेनाएँ थीं, जो उसके लिये लड़नेको आयी थीं॥ ३८॥ भरतश्रेष्ठ ! राजेन्द्र ! वृष्णिवंशी वीर संख्यामें बहुत कम थे, इसलिये वे राजाओंसहित जरासंधसे अभिभूत हो जाते थे॥ ३९॥ मगधके राजा पृथ्वीपति जरासंधको इस प्रकार युद्धमें जीतकर वृष्णिवंशके सिंह-जैसे पराक्रमी

English

²²² In India the year is divided into six seasons of two months each.

अध्याय ३९

श्लोक 11

अग्नीषोममयं लोकं यं विदुर् विदुषो जनाः तं सोमम् अग्निं लोकं च वेद विष्णुं पितामहः

agnīṣomamayaṃ lokaṃ yaṃ vidur viduṣo janāḥ taṃ somam agniṃ lokaṃ ca veda viṣṇuṃ pitāmahaḥ

हिन्दी अर्थ

महारथी सुखपूर्वक वहाँ विहार करने लगे इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि जरासंधापयान नाम षट््त्रिंशो ध्याय: इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्युपर्वमें जरासंधका पलायनविष्यक छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ जरासंधके पुनः आक्रमणसे शट्धित यादवोंकी सभामें विकद्रुका भाषण--राजा हर्यश्बका चरित्र तथा उनसे यदु एवं यादवोंकी उत्पत्तिका वर्णन

English

²²² In India the year is divided into six seasons of two months each.

अध्याय ३९

श्लोक 12

क्षीराद् यथा दधि भवेद् दध्नः सर्पिर् यथा भवेत् मथ्यमानेषु भूतेषु तथा लोको जनार्दनात्

kṣīrād yathā dadhi bhaved dadhnaḥ sarpir yathā bhavet mathyamāneṣu bhūteṣu tathā loko janārdanāt

हिन्दी अर्थ

स कृष्णस्तत्र बलवान रौहिणेयेन संगत: । मथुरां यादवाकीर्णा पुरी तां सुखमावसत् चचार मथुरां प्रीतः सवनाकरभूषणाम् कस्यचित् त्वथ कालस्य राजा राजगहे श्वर: । ससस्‍्मार निहतं कंसं जरासंध: प्रतापवान् भूयो5प्यष्टादशं कर्तु संग्रामं स समारभत् वैलक्ष्यात् पुनरेवासौ राजा राजगूहे श्र: । जरासंधो बली श्रीमान् पाकशासनविक्रम:

English

²²² In India the year is divided into six seasons of two months each.

अध्याय ३९

श्लोक 13

यथेन्द्रियैश् च भूतैश् च परमात्मा विधीयते तथा वेदैश् च देवैश् च लोकैश् च विदितो हरिः

yathendriyaiś ca bhūtaiś ca paramātmā vidhīyate tathā vedaiś ca devaiś ca lokaiś ca vidito hariḥ

हिन्दी अर्थ

कृष्णस्य वधमन्विच्छन् भूयो वै संन्यवर्तत ततः प्राह महातेजा विकद्गुर्नयकोविदः। कृष्णं कमलपत्राक्षमुग्रसेनस्यथ श्रृण्वतः श्रूयतामभिधास्यामि प्राप्तकालमहं ततः। युक्त चेन्मन्यसे साधो करिष्यसि वचो मम यथा मे कथित: पूर्व व्यासेन विदितात्मना

English

²²² In India the year is divided into six seasons of two months each.

अध्याय ३९

श्लोक 14

यथा भूतेन्द्रियावाप्तिर् विहिता भुवि देहिनाम् तथा प्राणेश्वरावाप्तिर् देवानां दिवि वैष्णवी

yathā bhūtendriyāvāptir vihitā bhuvi dehinām tathā prāṇeśvarāvāptir devānāṃ divi vaiṣṇavī

हिन्दी अर्थ

आसीद् राजा मनोर्वशे श्रीमानिक्ष्वाकुसम्भव: । हर्यश्व इति विख्यातो महेन्द्रसमविक्रम: वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! महाबली भगवान् श्रीकृष्ण रोहिणीकुमार बलदेवजीके साथ मिलकर यादवोंसे भरी हुई उस मथुरापुरीमें सुखपूर्वक रहने लगे॥ १॥ उनके श्रीअज्ेंमें यौवनावस्थाका प्रवेश हुआ था। वे भगवान् राजोचित शोभासे सम्पन्न हो वनप्रान्तसे विभूषित मथुरामें प्रसन्नतापूर्वक्त विचरते थे॥२॥ कुछ कालके अनन्तर राजगृहके स्वामी प्रतापी राजा जरासंधने कंसके मारे जानेकी घटनाको फिरसे स्मरण किया उसकी दोनों कन्याओंने पुनः उसे युद्धके लिये उत्साहित किया। यादवोंने जरासंधको क्रमश: सत्रह बार युद्धका अवसर दिया; परंतु वे महारथी यादव समरभूमिमें उसे मार न सके ॥ ४॥ तदनन्तर श्रीमान् मगधराजने चतुरड्धिणी सेनाको साथ लेकर फिर अठारहवीं बार यादवोंके साथ युद्ध करनेका आयोजन किया॥ ५॥ राजगृहका स्वामी बलवान राजा श्रीमान् जरासंध इन्द्रके समान पराक्रमी था। उसने पहलेकी पराजयसे लज्जाका अनुभव करनेके

English

²²² In India the year is divided into six seasons of two months each.

अध्याय ३९

श्लोक 15

सत्रिणां सत्रफलदः पवित्रं परमात्मवान् लोकतन्त्रधरो ह्य् एव मन्त्रैर् मन्त्र इवार्च्यते

satriṇāṃ satraphaladaḥ pavitraṃ paramātmavān lokatantradharo hy eva mantrair mantra ivārcyate

हिन्दी अर्थ

कारण पुनः युद्धकी तैयारी की॥६॥ बृहद्रथका वह बलवान पुत्र महान् साधनसे सम्पन्न हो श्रीकृष्णका वध चाहता हुआ फिर मथुरापुरीकी ओर लौटा॥ ७ ॥ मगधराजको पुनः लौटा हुआ सुनकर जरासंधके भयसे पीड़ित हुए सब यादव एक साथ बैठकर मन्त्रणा करने लगे उस समय नीतिकुशल महातेजस्वी विकद्गुने उग्रसेनके सुनते हुए कमलनयन श्रीकृष्णसे कहा-- ॥ ९॥ “तात! गोविन्द! इस कुलकी उत्पत्तिका प्रसंग सुनो। इसके लिये उपयुक्त अवसर आया है, इसलिये बता रहा हूँ; ध्यान देकर श्रवण करो। साधो इसे सुनकर यदि उचित समझो तो मेरे कथनानुसार कार्य करना॥ १० ॥ यादववंशकी

English

²²² In India the year is divided into six seasons of two months each.

अध्याय ३९

श्लोक 16

अस्य पारं न पश्यन्ति बहवः पारतन्त्रिणः एष पारं परं चैव लोकानां वेद माधवः

asya pāraṃ na paśyanti bahavaḥ pāratantriṇaḥ eṣa pāraṃ paraṃ caiva lokānāṃ veda mādhavaḥ

हिन्दी अर्थ

इस उत्पत्तिका सार प्रसंग आत्मज्ञानी व्यासजीने पूर्वकालमें बैवस्वत मनुके वंशमें इक्ष्वाकुके पुत्र हर्यश्व नामसे विख्यात एक श्रीसम्पन्न राजा हो गये हैं, जो महेन्द्रके तुल्य पराक्रमी थे देवी मधुमती नाम यथेन्द्रस्य श्री तथा मनोरथकरी राज्ञः प्राणेभ्योडपि गरीयसी दानवेन्द्रकुले जाता सुओरणी कामरूपिणी। एकपतल्लीब्रतधरा खेचरा रोहिणी यथा

English

²²² In India the year is divided into six seasons of two months each.

अध्याय ३९

श्लोक 17

अस्य देवान् धकारस्य मार्गितव्यस्य दैवतैः शृणु वै यत् तदा वृत्तं ब्रह्मलोके पुरातनम्

asya devān dhakārasya mārgitavyasya daivataiḥ śṛṇu vai yat tadā vṛttaṃ brahmaloke purātanam

हिन्दी अर्थ

सा तमिष्ष्वाकुशार्दूलं कामयामास कामिनी । स कदाचित्नरश्रेष्ठो भ्रात्रा ज्येष्ठन माधव रेमे समेत्य कालज्ञः प्रियया कमलेक्षण:। भ्रात्रा विनिष्कृतं राज्यात् प्रोवाच कमलेक्षणा रम्यं मधुवनं नाम कामपुष्पफलद्गुमम्। सहितौ तत्र रंस्थावो यथा दिवि गतौ तथा पितुर्में दयितस्त्वं हि मातुर्मम च पार्थिव। मत्प्रियार्थ प्रियतरो भ्रातुश्न॒ लवणस्य वै

English

²²² In India the year is divided into six seasons of two months each.

अध्याय ३९

श्लोक 18

स गत्वा ब्रह्मणो लोकं दृष्ट्वा पैतामहं पदम् ववन्दे तान् ऋषीन् सर्वान् विष्णुर् आर्षेण कर्मणा

sa gatvā brahmaṇo lokaṃ dṛṣṭvā paitāmahaṃ padam vavande tān ṛṣīn sarvān viṣṇur ārṣeṇa karmaṇā

हिन्दी अर्थ

र॑स्थावस्तत्र सहितो राज्यस्थाविव कामगौ। भद्गं ते विहरिष्यावो यथा देवपुरे तथा मधु नामक हैत्यकी पुत्री मधुमती देवी उनकी प्राणप्यारी भार्या थी। जैसे इन्द्रको शची प्रिय हैं, उसी प्रकार हर्यश्वको मधुमती प्रिय थी॥ १३॥ वह यौवनके गुणोंसे सम्पन्न थी। इस पृथ्वीपर उसके रूप-सौन्दर्यकी कहीं तुलना नहीं थी। वह राजा हर्यश्रके मनोरथको सिद्ध करनेवाली होनेके कारण उन्हें प्राणोंसे भी अधिक माननीया थी॥ १४॥ दानवराज मधुके कुलमें उत्पन्न हुई वह सुन्दर कटिप्रदेशवाली कामरूपिणी देवी रोहिणीके समान एकपत्नीब्रतका पालन करनेवाली तथा आकाशमें विचरनेवाली थी॥ १५॥ वह कामिनी होकर इक्ष्वाकुवंशके श्रेष्ठ वीर हर्यश्वको सम्पूर्ण हृदयसे चाहती थी। माधव! एक दिन बड़े भाईने उनके

English

²²² In India the year is divided into six seasons of two months each.

अध्याय ३९

श्लोक 19

सो ऽग्निं प्राक् सवने दृष्ट्वा हूयमानं महर्षिभिः अवन्दत महातेजाः कृत्वा पौर्वाह्णिकं विधिम्

so 'gniṃ prāk savane dṛṣṭvā hūyamānaṃ maharṣibhiḥ avandata mahātejāḥ kṛtvā paurvāhṇikaṃ vidhim

हिन्दी अर्थ

विश्वासपर रहनेवाले नरश्रेष्ठ हर्यश्वको राज्यसे निकाल दिया, तब उन्होंने अयोध्या छोड़ दी और थोड़े-से परिवारके साथ अपनी प्रिया मधुमतीसहित वे बनमें रहने लगे॥ १६-१७॥ कालकी महिमाको जाननेवाले कमलनयन हर्यश्व अपनी प्यारी पत्नीके साथ मिलकर वहाँ बड़े आनन्दसे समय बिताने लगे।' एक दिन कमलनयनी मधुमतीने भाईद्वारा राज्यसे निकाले गये 'पतिसे कहा-- ॥ १८ ॥ 'नरश्रेष्ठ वीर अयोध्याके राज्यकी दोनों मेरे पिता मधुके घरपर चलें॥ १९॥ सुरम्य मधुवन नामक वन ही मेरे पिताका निवासस्थान है। वहाँके वृक्ष इच्छानुसार फूल और फल देनेवाले हैं। वहाँ हम दोनों साथ रहकर स्वर्गवासियोंके समान मौज करेंगे॥ २०॥ पृथ्वीनाथ! मेरे पिता और माता दोनोंको ही तुम बहुत प्रिय हो तथा मेरा प्रिय करनेके लिये मेरा भाई लवणासुर भी तुम्हें अत्यन्त प्रिय मानेगा

English

²²² In India the year is divided into six seasons of two months each.

अध्याय ३९

श्लोक 20

स ददर्श मखेष्व् आज्यैर् इज्यमानं महर्षिभिः भागं यज्ञियम् अश्नानं स्वदेहम् अपरं स्थितम्

sa dadarśa makheṣv ājyair ijyamānaṃ maharṣibhiḥ bhāgaṃ yajñiyam aśnānaṃ svadeham aparaṃ sthitam

हिन्दी अर्थ

नरश्रेष्ठ! वहाँ जाकर हम दोनों साथ-साथ रहकर राज्यपर बैठे हुए दम्पतियोंकी भाँति इच्छानुरूप वस्तुओंका उपभोग करते हुए रमण करेंगे। जैसे देवपुरीके नन्‍्दनवनमें देवाड़ना और देवता विहार करते हैं, उसी प्रकार वहाँ हम दोनों विहार करेंगे। आपका भला हो महाराज! आपका भाई राज्यके मदसे सदा उन्मत्त रहकर अभिमानमें भरा रहता है और हम दोनोंसे द्वेष रखता है; अत: हम दोनों उसे त्याग दें॥२३॥ दासकी भाँति दूसरेके आश्रित होकर रहना अच्छा नहीं है; अतः इस निन्दित निवासको धिक्कार है। वीर! चलो, हम दोनों मेरे पिताके घरके पास चलें' कामार्तस्यनरेन्द्रस्य पत्यास्तद्रुरकुचे वच:

English

²²² In India the year is divided into six seasons of two months each.

अध्याय ३९

श्लोक 21

अभिवाद्याभिवाद्यानाम् ऋषीणां ब्रह्मवर्चसाम् परिचक्राम सो ऽचिन्त्यो ब्रह्मलोकं सनातनम्

abhivādyābhivādyānām ṛṣīṇāṃ brahmavarcasām paricakrāma so 'cintyo brahmalokaṃ sanātanam

हिन्दी अर्थ

ततो मधुपुरं राजा हर्यश्व: स जगाम च। भार्यया सह कामिन्या कामी पुरुषपुड्रव: अमित्रनिग्रहे चैव कर्णधारत्वमेष्यति तद् भविष्यमहं मन्‍्ये कालयोगेन पार्थिव। अध्यास्यतां यथाकाल पार्थिव वृत्तमुत्तमम् दत्त्वा यास्यामि तपसे सागरं लवणालयम्

English

²²² In India the year is divided into six seasons of two months each.

अध्याय ३९

श्लोक 22

स ददर्शोच्छ्रितान् यूपांश् चषालाग्रविभूषितान् मखेषु च ब्रह्मर्षिभिः शतशः कृतलक्षणान्

sa dadarśocchritān yūpāṃś caṣālāgravibhūṣitān makheṣu ca brahmarṣibhiḥ śataśaḥ kṛtalakṣaṇān

हिन्दी अर्थ

स च हैत्यस्तपोवासं जगाम वरुणालयम् अचिरेणैव कालेन समृद्ध प्रत्यपद्यत ' श्रीकृष्ण! यद्यपि हर्यश्वका अपने बड़े भाईके प्रति अच्छा बर्ताव था (वह उनसे कोई प्रतिशोध नहीं लेना चाहता था) तो भी कामसे पीड़ित होनेके कारण उस नरेशको पत्नीकी बात पसंद आ गयी॥ २५॥ तब कामी पुरुषप्रवर राजा हर्यश्व अपनी कामवती पत्नीके साथ मधुपुरको चला गया'॥ २६॥ वहाँ दानवराज मधुने उससे सान्त्वनापूर्वक कहा--' बेटा हर्यश्व ! तुम्हारा स्वागत है। में तुम्हारे दर्शसे (अथवा तुमसे मिलकर) बहुत प्रसन्न हूँ॥ २७॥ राजेन्द्र यह जो मेरा सारा राज्य है, उसे मैं केवल मधुवनको छोड़कर तुम्हें सौंप रहा हूँ। तुम यहाँ निवास करो ॥ २८ ॥ इस बनमें यह मेरा पुत्र लवण भी तुम्हारा सहायक होगा तथा शत्रुओंका निग्रह करनेमें

English

²²² In India the year is divided into six seasons of two months each.

अध्याय ३९

श्लोक 23

आज्यधूमं समाघ्राय शृण्वन् वेदान् द्विजेरितान् यज्ञैर् इज्यन्तम् आत्मानम् पश्यंस् तत्र चचार ह

ājyadhūmaṃ samāghrāya śṛṇvan vedān dvijeritān yajñair ijyantam ātmānam paśyaṃs tatra cacāra ha

हिन्दी अर्थ

यह तुम्हारे लिये कर्णधारका काम देगा॥ २९॥ तुम समुद्रके जलप्राय प्रदेशसे विभूषित इस शुभ राष्ट्रका पालन करो। यह गौओंसे समृद्ध और लक्ष्मीसे सेवित है तथा इसमें अधिकतर आभीर जातिके लोगोंका निवास है॥ ३०॥ तात! यहाँ रहनेपर महान् एवं दुर्गम गिरिपुर (गिरिनार या रैवतक पर्वतसे मिला हुआ नगर) तुम्हारी राजधानीके रूपमें प्रतिष्ठित होगा । यह महान सुराष्ट्र राज्य समुद्रके निकट और जलप्राय प्रदेशसे युक्त है। यहाँ किसी प्रकारका रोग नहीं होता। तुम्हारा विशाल एवं विस्तृत राज्य आनर्त नामसे विख्यात होगा। पृथ्वीनाथ! मेरा विश्वास है कि कालयोगसे वह अवश्यम्भावी है। तुम समयानुसार उत्तम राजोचित बर्तावका आश्रय लेकर यहाँ रहो॥ ३१--३३॥ तुम्हारा यह वंश ययाति एवं यदुके वंशमें मिल जायगा। चन्द्रवंशके भीतर तुम्हारा वंश चलेगा (सूर्यवंशसे उसका कोई सम्बन्ध नहीं रह जायगा) ॥ ३४॥ तात यही मेरा विभव है। मैं तुम्हें यह

English

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अध्याय ३९

श्लोक 24

तम् ऊचुर् ऋषयो देवाः सदस्याः सदसि स्थिताः अर्घ्योद्यतभुजाः सर्वे पवित्रान् तरिताननाः

tam ūcur ṛṣayo devāḥ sadasyāḥ sadasi sthitāḥ arghyodyatabhujāḥ sarve pavitrān taritānanāḥ

हिन्दी अर्थ

उत्तम राज्य देकर तपस्याके लिये लवणसमुद्रकों चला जाऊँगा॥ ३५॥ “'तात! तुम लवणके साथ रहकर अपने वंशकी वृद्धिके लिये इस समस्त उत्तम राज्यका पालन करो'॥ ३६॥ तब “बहुत अच्छा' कहकर हर्यश्वने उस पुरको ग्रहण किया; फिर वह हैत्य तपस्याके लिये समुद्रको चला गया॥ ३७ ॥ 'अमरोंके समान महातेजस्वी हर्यश्वने दिव्य एवं श्रेष्ठ गिरिवर (रैवतक)-के समीप अपने रहनेके लिये एक नगर बसाया॥ ३८॥ आनर्त नामसे प्रसिद्ध वह गोधनसम्पन्न राष्ट्र सुराष्ट कहलाया और थोड़े ही समयमें समृद्धिशाली हो गया' विचित्र क्षेत्रसस्याढ्य प्राकारग्रामसंकुलम् राजधर्मेण यशसा प्रजानां नन्दिवर्द्धन:

English

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अध्याय ३९

श्लोक 25

स्वागतं ते सुरश्रेष्ठ पद्मनाभ महाद्युते नमो ऽस्तु ते हृषीकेश मधुकैटभसूदन ।दामोदर नमस् ते ऽस्तु पद्मपत्रायतेक्षण ॥ प्रभुस् त्वं सर्वदेवानां लोकानां प्रभुर् अव्ययः ।त्वं यज्ञस् त्वं वषट्कारस् त्वयि सर्वं प्रतिष्ठितम् ।इदं यज्ञियम् आतिथ्यं मन्त्रतः प्रतिगृह्यताम्

svāgataṃ te suraśreṣṭha padmanābha mahādyute namo 'stu te hṛṣīkeśa madhukaiṭabhasūdana | dāmodara namas te 'stu padmapatrāyatekṣaṇa || prabhus tvaṃ sarvadevānāṃ lokānāṃ prabhur avyayaḥ | tvaṃ yajñas tvaṃ vaṣaṭkāras tvayi sarvaṃ pratiṣṭhitam | idaṃ yajñiyam ātithyaṃ mantrataḥ pratigṛhyatām

हिन्दी अर्थ

स हि राजा स्थितो राज्ये राजवृत्तेन शोभित: । प्राप्त: कुलोचितां लक्ष्मी वृत्तेन च नयेन च तस्यैव चर सुवृत्तस्य पुत्र॒कामस्य धीमतः यथास्य पूर्वजो राजा पूरु: स सुमहायशा: जगाम त्रिदिवं राजा धर्मेणाप्रतिमो भुवि

English

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अध्याय ३९

श्लोक 26

त्वम् अस्य यज्ञपूतस्य पात्रं पाद्यस्य पावनः अतिथिस् त्वं हि मन्त्रोक्तः स दृष्टः सततं मतः

tvam asya yajñapūtasya pātraṃ pādyasya pāvanaḥ atithis tvaṃ hi mantroktaḥ sa dṛṣṭaḥ satataṃ mataḥ

हिन्दी अर्थ

शशास चेमां वसुधां प्रशान्तरभयतस्कराम्। यदुरिन्द्रप्रतिकाशो नृपो येनास्म यादवा: “जलप्राय देशमें समुद्रतटवर्ती वनोंसे विभूषित, विचित्र खेतों और हरी-भरी खेतीसे सुशोभित, परकोटों और गाँवोंसे युक्त तथा धनधान्यसे सम्पन्न उस राष्ट्रपर राष्ट्रकी वृद्धि करनेवाले राजा हर्यश्व शासन करने लगे और राजधर्म एवं यशसे प्रजाका आनन्द बढ़ाने लगे॥ ४०-४१॥ महामना हर्यश्वके उत्तम आचार- व्यवहारके कारण वह अक्षोभ्य राष्ट्र उत्तम राष्ट्रके गुणोंसे सम्पन्न हो निरन्तर उन्‍नति करने लगा॥ ४२॥ राज्यपर स्थित होकर राजोचित बर्तावसे सुशोभित होनेवाले उन राजा हर्यश्वने सदाचार और उत्तम नीतिसे अपने कुलके लिये उचित लक्ष्मी प्राप्त कर ली॥४३॥ पुत्रकी इच्छा रखनेवाले उन्हीं सदाचारी एवं बुद्धिमान् हर्यश्वके मधु- मतीके गर्भसे महायशस्वी यदुका जन्म हुआ

English

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अध्याय ३९

श्लोक 27

त्वयि योद्धु गते विष्णो न प्रावर्तन्त नः क्रियाः अवैष्णवस्य यज्ञस्य न हि कर्म विधीयते

tvayi yoddhu gate viṣṇo na prāvartanta naḥ kriyāḥ avaiṣṇavasya yajñasya na hi karma vidhīyate

हिन्दी अर्थ

महातेजस्वी यदुका स्वर दुन्दुभिनिनादके समान गम्भीर था। वे राजोचित लक्षणोंसे सम्पन्न होकर दिनोंदिन बढ़ने लगे। शत्रुओंके लिये वे सर्वथा दुर्जय थे हर्यश्वका वह पुत्र यदु नामसे ही विख्यात हुआ। यदु राजोचित लक्षणोंसे सम्मानित थे, ठीक उसी तरह जैसे उनके पूर्वज राजा महायशस्वी पूरु सम्मानित होते थे॥ ४६॥ महामना हर्यश्वके एक ही पुत्र यदु हुए। वे परम सुन्दर, बलवान् और पृथ्वीका भरण-पोषण करनेमें समर्थ थे॥ ४७॥ राजा हर्यश्व दस हजार वर्षोतक अक्षय राज्यका उपभोग करके स्वर्गलोकमें चले गये। वे भूमण्डलके अनृपम धर्मात्मा थे॥ ४८ ॥ पिताके मर जानेपर प्रजाओंने उदारचेता श्रीमान् यदुको उनके राज्यपर अभिषिक्त कर दिया। वे क्रमशः: एक सूर्यके बाद दूसरे सूर्यके समान उदित हो प्रकाशित होने लगे॥४९॥ वे इन्द्रतुल्य तेजस्वी यदु, जिनके कारण हमलोग यादव कहलाते

English

²²² In India the year is divided into six seasons of two months each.

अध्याय ३९

श्लोक 28

सदक्षिणस्य यज्ञस्य त्वत्प्रसूतं फलं भवेत् सदक्षिणमहायज्ञास् त्वत्प्रसूतिर् जनार्दन ।यद्य् आत्मानम् इहास्माभिर् इज्यमानं निरीक्षसे

sadakṣiṇasya yajñasya tvatprasūtaṃ phalaṃ bhavet sadakṣiṇamahāyajñās tvatprasūtir janārdana | yady ātmānam ihāsmābhir ijyamānaṃ nirīkṣase

हिन्दी अर्थ

हैं, जब इस पृथ्वीका शासन करने लगे, तब यहाँका गये'॥ ५० ॥ एक समयकी बात है, राजा यदु अपनी उदार गुणवाली पत्नियोंक साथ ताराओंसहित चन्द्रमाके समान महासागरमें जलक्रीडा कर रहे थे॥५१॥ वे पराक्रमी राजा यदु जलको पार करके निकलना ही चाहते थे कि सहसा किसीने उन्हें समुद्रके गहरे जलमें डाल दिया। बात यह हुई कि सर्पोके राजा धूम्रवर्णने कहते हैं, जैसे ब्रह्माजीके मानसपुत्र वसिष्ठ किसी कारणवश मित्रावरुणके अंशसे नूतन शरीर धारण करके प्रकट हुए; फिर भी वसिष्ठ ही बने रहे, उसी प्रकार ययातिपुत्र महाराज यदु ही योगबलसे हर्यश्वके पुत्ररूपमें प्रकट हुए थे और उसी पूर्व नामसे प्रख्यात हुए।

English

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अध्याय ३९

श्लोक 29

एवम् अस्त्व् इति तान् विप्रान् भगवान् प्रत्यपूजयत् मुमुदे ब्रह्मलोकस्थो ब्रह्मैव हि पितामहः

evam astv iti tān viprān bhagavān pratyapūjayat mumude brahmalokastho brahmaiva hi pitāmahaḥ

हिन्दी अर्थ

कीर्ण शट्डुकुलै: शुभ्र रलराशिविभूषितम् । प्रवालाडुरपत्राढ्यै: पादपैरुपशोभितम् कीर्ण पनन्‍नगनायोंघै: समुद्रोदरवासिभि:। स्वर्णवर्णेन भास्वन्तं स्वस्तिकेनेन्दुवर्चसा अगाध॑ तोयदाकारं पूर्ण सर्पवधूगणै: पित्रा ते मड्रलार्थाय स्थापित: पार्थिवाकर:

English

²²² In India the year is divided into six seasons of two months each.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_harivaMza.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Harivamsha Purana — Chapter 39
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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