Harivamsha Purana· Harivaṁśa Purāṇa
42
अध्याय 42 / 119

Adhyaya 42

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अध्याय ४२

श्लोक 1

एतावद् उक्त्वा राजेन्द्र ब्रह्मा लोकपितामहः ।पृथिव्या सह विश्वात्मा विरराम महाद्युतिः ।बाढम् इत्य् एव सह तैर् दुर्दिनाम्भोदनिस्वनः प्रतस्थे दुर्दिनाकारः सदुर्दिन इवाचलः

etāvad uktvā rājendra brahmā lokapitāmahaḥ | pṛthivyā saha viśvātmā virarāma mahādyutiḥ | bāḍham ity eva saha tair durdināmbhodanisvanaḥ pratasthe durdinākāraḥ sadurdina ivācalaḥ

हिन्दी अर्थ

चेरतुस्तत्र कान्तेषु वनेषु रतिलालसौ अथ संकर्षण: श्रीमान् विना कृष्णेन वीर्यवान्। चचार तस्य शिखरे नगस्य नगसंनिभः वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय ! परशुरामजीके चले जानेपर यादवकुलका भार वहन करनेवाले वे श्रीकृष्ण और बलराम इच्छानुसार रूप धारण करके गोमन्तपर्वतके रमणीय शिखरपर विचरने लगे॥ १॥ उन दोनोंके वक्ष:स्थलोंमें वनमाला शोभा पा रही थी। दोनों क्रमश: नीले-पीले वस्त्र धारण करके अपने गौर-श्याम शरीरसे आकाशमें स्थित हुए दो मेघोंके समान शोभा पा रहे थे॥ २॥ पर्वतीय धातुओंसे अपने अड्ेंका श्रद्भार

English

There arose a great tumult of the Gopas accompanied by the mutterings of clouds outside and the noise of the cows. And arranged in rows by the milk-men the kine entered into the huge cave of that best of mountains (58–59). And standing at the foot of that mountain like a rising pillar of stone Krishna held that hill with one hand like a beloved guest (60).

अध्याय ४२

श्लोक 2

समुक्तामणिविद्योतं सचन्द्राम्भोदवर्चसम् स जतामण्डलं कृष्णं बिभ्रत् कृष्णवपुर् हरिः

samuktāmaṇividyotaṃ sacandrāmbhodavarcasam sa jatāmaṇḍalaṃ kṛṣṇaṃ bibhrat kṛṣṇavapur hariḥ

हिन्दी अर्थ

करके उस पर्वतके शिखरपर खड़े हुए दोनों नवयुवक वीर क्रीड़ाकी लालसा लिये कमनीय वनोंमें विचरण करने लगे॥ ३॥ वे उस पर्वतपर ज्योतिर्मय नक्षत्रोंमें श्रेष्ठ चन्द्रमाके उदयकी शोभा देखते और ग्रहोंके उदय-अस्त देखा करते थे॥४॥ एक दिन परम पराक्रमी श्रीमान् संकर्षण श्रीकृष्णके बिना ही उस पर्वतके शिखरपर विचर रहे थे। वे स्वयं भी पर्वतके समान प्रतीत होते थे॥ ५॥ घूमते-धूमते एक खिले हुए कदम्बकी मनोहर छायामें बैठ गये। उस समय कदम्बकी मधुर मन्द गन्धसे वासित वायु उन्हें सुखपूर्वक व्यजन डुलाने लगी तस्य तेनानिलौघेन सेव्यमानस्य तत्र वै। मद्यसंस्पर्शजो गन्ध: संस्पृशन्घ्राणमागत: तत्कोटरस्थं मदिरा संजायत मनोहरा

English

Thereupon taking with them their carts and vessels the inhabitants of Vraja, afraid of rain, entered into that rocky house (61). Beholding this superhuman feat of Krishna and finding his words falsified the powerful Satakratu asked the clouds to desist (62). And surrounded by clouds which deprived the earth of all festivities for seven nights he returned again to the celestial region (63). Thus after seven nights when the king of gods desisted and the sky was freed of clouds and become clear the sun rose in its full effulgence (64). The cows and the milk-men returned to their respective quarters by the same road by which they had entered (the cave) (63). For the well-being of all the worlds the Lord Krishna, the giver of boons and identical with all the elements, established, with a delighted heart, that best of mountains²³⁵

अध्याय ४२

श्लोक 3

स चास्योरसि विस्तीर्णे रोमाञ्चोद्गतराजिमान् श्रीवत्सो राजते श्रीमान् स्तनद्वयमुखाञ्चितः

sa cāsyorasi vistīrṇe romāñcodgatarājimān śrīvatso rājate śrīmān stanadvayamukhāñcitaḥ

हिन्दी अर्थ

मोहाच्च चलिताकार: समजायत स प्रभु: घूर्णिताकारमभवच्छरत्कालेन्दुसप्र भम् कदम्बकोटरे जाता नाम्ना कादम्बरीति सा। रूपिणी वारुणी तत्र देवानाममृतारणी कादम्बरीमदकलं विदित्वा कृष्णपूर्वजम् तिसरत्रस्त्रिदशनार्यस्तमुपतस्थु: प्रियंवदा:

English

²³² Literally the word means one who protects kine from _go_, kine and the root _pa_, to protect.

अध्याय ४२

श्लोक 4

पीते वसानो वसने लोकानां गुरुर् अव्ययः हरिः सो ऽभवद् आलक्ष्यः ससंध्याभ्र इवाचलः

pīte vasāno vasane lokānāṃ gurur avyayaḥ hariḥ so 'bhavad ālakṣyaḥ sasaṃdhyābhra ivācalaḥ

हिन्दी अर्थ

मदिरा रूपिणी भूत्वा कान्तिश्च शशिन: प्रिया। श्रीश्च देवी वरिष्टा स्त्री स्वयमेवाम्बुजध्वजा साझलिप्रग्रहा देवी रौहिणेयमुपस्थिता। वारुण्या सहितं वाक्यमुवाच मदविक्लवम् बल॑ जयस्व हैत्यानां बलदेव दिवीश्वर। अहं ते दयिता कान्‍्ता वारुणी समुपस्थिता वह मन्द-मन्द वायु बहकर जब बलरामजीकी सेवा कर रही थी, उस समय उनकी प्राणेन्द्रियमें मधुका स्पर्श करके आये हुए सुगन्धित समीरने प्रवेश किया उस समय उनके भीतर वारुणी (मधु या अमृत)-को तृष्णाका आवेश हुआ। फिर तो दूसरे दिन मतवाले पुरुषकी भाँति उनका मुँह सूखने लगा॥ ८ ॥ उन्हें पूर्वकालमें किये गये अमृतपानका स्मरण हो आया। वे तृषित होकर

English

²³³ A root of acquatic animal resembling a crocodile.

अध्याय ४२

श्लोक 5

तं व्रजन्तं सुपर्णेन पद्मयोनिगतानुगम् अनुजग्मुः सुराः सर्वे तद्गतासक्तचक्षुषः

taṃ vrajantaṃ suparṇena padmayonigatānugam anujagmuḥ surāḥ sarve tadgatāsaktacakṣuṣaḥ

हिन्दी अर्थ

उस अमृतकी खोज करने लगे। तब उन्होंने उस वृक्षकी ओर देखा॥ ९ ॥ वर्षाकालमें उस खिले हुए कदम्बपर जो मेघोंका बरसाया हुआ जल गिरा था, वह उसके कोटरमें मनोहर सुधाके रूपमें प्रकट हो गया॥ १० ॥ बलरामजीका हृदय प्याससे घबरा उठा था। वे पिपासापीडित पुरुषकी भाँति उस अमृतको बार-बार पीने लगे। उसको अधिक पी लेनेके कारण उनपर मोह (नशा-) सा छा गया, जिससे उन प्रभावशालीका शरीर कुछ लड़खड़ाने-सा लगा॥ ११॥ मधुसे मत्त हुए बलरामका मुख कुछ झूमता-सा प्रतीत हुआ, नेत्र किंचित् चञ्नल हो उठे। उस मुखकी प्रभा शरत्कालके चन्द्रमाकी भाँति सुशोभित होने लगी॥ १२॥ वह मधुमयी सुधा कदम्बके कोटरमें उत्पन्न हुई थी, इसलिये कादम्बरी नामसे विख्यात हुई। वहाँ मूर्तिमती वारुणी प्रकट हुई थी, जो देवताओंके लिये अमृत पैदा करनेवाली है॥ १३॥ श्रीकृष्णके बड़े भाईको कादम्बरी (मधु या अमृत)-के नशेसे स्पष्ट बात बोलनेमें

English

²³⁴ The Danava chief who was defeated by Rudra or Siva in the war between the gods and demons.

अध्याय ४२

श्लोक 6

नातिदीर्घेण कालेन ते गता रत्नपर्वतम् ददृशुर् देवतास् तत्र स्वां सभां कामरूपिणीम्

nātidīrgheṇa kālena te gatā ratnaparvatam dadṛśur devatās tatra svāṃ sabhāṃ kāmarūpiṇīm

हिन्दी अर्थ

असमर्थ जान तीन प्रियवादिनी देवाड़नाएँ उनकी सेवामें उपस्थित हुईं॥ १४॥ एक तो मादक मधु या अमृतकी अधिष्ठात्री देवी (जिन्हें वारुणी कहते हैं) मूर्तिमती होकर प्रकट हुईं। दूसरी चन्द्रमाकी प्रिय कान्ति (की अधिष्ठात्री देवी) थीं और तीसरी श्री देवी थीं, जो सर्वश्रेष्ठ स्त्री मानी जाती हैं, उनके ध्वजमें कमलका चिह्न है, वे देवी स्वयं ही हाथ जोड़े हुए रोहिणीनन्दन बलरामकी सेवामें उपस्थित हुई थीं। वारुणीके साथ उन्होंने मदविह्ल बलरामजीसे इस प्रकार कहा--॥ १५-१६॥ “पहले वारुणी बोली 'देवलोकेश्वर बलदेव ! आप हैत्योंकी सेनापर विजय प्राप्त करें। मैं आपकी प्राणवल्लभा वारुणी सेवामें उपस्थित हुई हूँ॥ १७॥ निर्मल मुखवाले देव! मैं आपको बड़वानलके समीप पातालमें शेषरूपसे नित्य विराजमान जानती थी, किंतु इस समय भूतलमें अवतार लेनेके कारण वहाँसे अदृश्य हो गये हैं, ऐसा सुनकर मैं पुण्यहीना नारी-सी आपकी खोजमें सारी पृथ्वीपर भटक रही थी पुष्पचक्रानुलिप्तेषन. केसरेषूषितं मया। अतिमुक्तेषु चाक्षोभ्य पुष्पस्तबकवत्सु च

English

²³⁵ This miracle of Krishna's holding up of the mountain Govardhana on one of his fingers has been described in almost all the Puranas and even in the Sabha Parva of the Mahabharata. This incident, no doubt, on the face of it, appears highly incredible for, it is not possible for a man, nay for a boy of ten years of age to raise up a huge mountain like Govardhana. It is undoubtedly an allegory signifying the wonderful power of Krishna displayed by him for protecting the Gopas. The following explanation may be safely vouchsafed of the allegory. When he suppressed the worship of Indra and all his followers attacked the Gopas, Krishna placed them all, with their cattle and goods, on that hill and himself fought with the followers of Indra. It is mentioned in the latter portion of this Chapter that the Gopas entered into the hollow of the mountain, their 'hilly house' and so forth. This probably may suggest an explanation that they took shelter in one of the huge caves of the mountain and Krishna guarded them against the attack of the worshippers of Indra. Whatever may be the explanation it is undoubtedly true that he displayed a superhuman feat on this

अध्याय ४२

श्लोक 7

मेरोः शिखरविन्यस्तां संसक्तां सूर्यवर्चसा काञ्चनस्तम्भचरणां वज्रसंघाततोरणाम्

meroḥ śikharavinyastāṃ saṃsaktāṃ sūryavarcasā kāñcanastambhacaraṇāṃ vajrasaṃghātatoraṇām

हिन्दी अर्थ

अहं कदम्बमालीना मेघकाले मुखप्रिया। तृषितं मार्गमाणा त्वां स्वेन रूपेण छादिता नाहं त्वया विना लोकानुत्सहे देव सेवितुम् आदिपदं च पद्दाडुं दिव्यं श्रवणभूषणम्। कौशेयानिच नीलानि समुद्रार्हणि बिभ्रती मदिरानन्तरं कान्तिः संकर्षणमुपस्थिता। मदेनागलितश्रोणी किंचिदाघूर्णितेक्षणा

English

Vaishampayana said:—Beholding the mount Govardhana thus held up and the kine saved Purandara, the king of the celestials, was filled with great surprise and felt a desire for seeing Krishna (1). And seated on his elephant Airavata with temporal juice trickling down and resembling a cloud without water he came down on earth (2). Purandara saw Krishna, of unwearied actions, seated at the foot of the Govardhana hill (3). He saw there the immortal Vishnu, assuming the guise of a milk-man and shining in his great effulgence and attained to great delight (4). Sakra, having many eyes, saw, with all his eyes, Krishna bearing the mystic mark of Srivatsa and resembling a dark-blue lotus in hue (5). Beholding him seated happily at the foot of the hill who was gifted with beauty and was like an immortal in the land of mortals Sakra was ashamed (6). Disappearing from view, that foremost of birds (Garuda), feeding on serpents, was protecting him, seated at ease, against the rays of the sun with his wings (7). Leaving behind his elephant, Indra, the slayer of Bala, approached Krishna who was playing in the forest being engaged in human actions (8). His face was embellished with a crown effulgent like the sun that gives lustre to lightning, and with a pair of celestial ear-rings. His breast was adorned with a neck-lace of five layers of Padmakānta jewel constituting the ornament of the body. Beholding Vāsudeva with his thousand eyes the powerful Vasava, the wielder of thunder-bolt, approached Upendra and looked more beautiful with his celestial garlands and pastes (9–11). Then with his sweet voice, deep as the muttering of clouds that always issues commands to the deities, he said (12):—

अध्याय ४२

श्लोक 8

मनोनिर्माणचित्राढ्यां विमानाकुलमालिनीम् रत्नजालान्तरवतीं कामगां रत्नभूषिताम्

manonirmāṇacitrāḍhyāṃ vimānākulamālinīm ratnajālāntaravatīṃ kāmagāṃ ratnabhūṣitām

हिन्दी अर्थ

प्रोवाच प्रणयात् कान्तिर्बद्धाज्ललिपुटा सती। जयपूर्वेण योगेन सस्मितं वाक्यमर्थवत् श्रीक्ष पद्मालया देवी निधेया वैष्णवोरसि। रौहिणेयोरसि शुभा मालेवामलतां गता पद्मास्था पद्महस्ता वै संकर्षणमथाब्रवीतू कान्त्या मया च देवेश संगतश्चन्द्रमा यथा अजेय वीर! मैंने पुष्पसमूहोंसे अनुलिप्त हुए केसरोंमें निवास किया है, फूलोंके गुच्छोंसे सुशोभित वासन्ती लताओंमें वास किया है॥१९॥ मेरे लिये प्यासे हुए आपकी खोज करती हुई मैं अपने रूपको छिपाकर

English

"O Krishna, O thou of large arms, O thou the enhancer of the delight of thy kinsmen, what, thou hast accomplished on thy being pleased with thy kine, is beyond the power of the gods (13). I have been highly pleased with thy saving the kine from the clouds created by me which bring about the dissolution of the world (14). Whose mind is not filled with surprise on seeing thee hold up this best of mountains by thy own-begotten Yoga power like a house in the sky(15)? O Krishna, I was enraged on account of the suppression of my sacrifice. And therefore I sent down this excessive rain extending over seven nights and destructive of the kine which even the Devas and Dānavas cannot withstand. But thou hast, by thy own power, put down this terrible shower in my very presence (16–17). I am highly pleased, O Krishna, for thy, in anger, settling the entire Vaishnava energy in thy human form (18). On account of thy being endued with thy own energy although in a human form, the work of the gods appears to have been well accomplished (19). O hero, while thou art at the head of all the works of the gods and their guide, forsooth, every thing will be accomplished and nothing will remain undone (20). Thou art alone eternal amongst the gods and in all other worlds. I do not see a second capable of carrying the weight thou hast held (21). As the best of wheels is placed before a pole so dost thou engage in relieving the distress of the gods sunk in an ocean of misery, O thou having a bird for thy carrier (22). O Krishna, as gold is among the metals, so this universe, created by the Grand-father (Brahmā) exists, in thy body (23). As a cripple cannot follow one who runs fast so even the Lord, Self-sprung (Brahma) cannot follow thee in intelligence or age (24). As the Himalaya is amongst the mountains, as the great ocean is amongst the watery expanses, as Garuda is amongst the birds so thou art the foremost of the celestials (25). O Krishna, underneath all is the region of water; above it are afloat the pillars of the earth; above them is the region of man; above it is the etherial region; above it is the effulgent region of the sun constituting the gate of heaven; above it is the great region of the gods forming the abode of the celestials; here I occupy the position of the king of gods; above it is the Brahmaloka where the Brahmarshis live and where move about the high-souled Soma (moon) and other luminous bodies. Above it is the Goloka stationed in the great etherial region. O Krishna, Golaka is the foremost of all regions and is protected by the Sādhyas. There dost thou live carrying on _Tapas_ which we cannot learn even when accosting the Grand-Father about it (26–31). This earth is the region of actions for those who engage in them. Underneath it is the dreadful region of the iniquitous (32). The etherial region is the refuge of moving objects like the air and heaven is the excellent refuge of the pious endued with the qualities of self-control and forbearance (33). Those, who worship Brahmā, live in the Brahmaloka. Goloka is attainable only by the kine; even by hard austerities no one else can obtain it (34). O intelligent and heroic Krishna, in order to protect these kine, thou didst hold up the mount Govardhana and suppress the calamities sent down by me (35). Therefore at the request of the Grand Father and the cows and out of respect for thee I have come here (36).

अध्याय ४२

श्लोक 9

कॢप्तरत्नसमाकीर्णां सर्वर्तुकुसुमोत्कटाम् मणिप्रवालसोपानां वैदूर्यमणिशोभिताम् ।मुक्ताजालसमाकीर्णां किंकिणीशतशोभिताम् ।देवमायाधरां दिव्यां निर्मितां विश्वकर्मणा

kḷptaratnasamākīrṇāṃ sarvartukusumotkaṭām maṇipravālasopānāṃ vaidūryamaṇiśobhitām | muktājālasamākīrṇāṃ kiṃkiṇīśataśobhitām | devamāyādharāṃ divyāṃ nirmitāṃ viśvakarmaṇā

हिन्दी अर्थ

वर्षाकालमें कदम्ब वृक्षेके भीतर लुक-छिपकर रहती आयी हूँ। मुझे आपके मुखका निवास ही विशेष प्रिय है॥ २०॥ निष्पाप बलराम! जैसे पूर्वकालमें अमृत- मन्थनके समय पूर्णयोगसे युक्त होनेपर मेरे पिता वरुणने मुझे आपके समीप भेजा था, जैसे समुद्रमें और पातालमें मैं आपके पास रही हूँ, उसी प्रकार इस समय भी आपकी सेवामें उपस्थित हुई हूँ और चाहती हूँ कि आपके द्वारा मेरा उपभोग हो; क्योंकि मेरे हृदयने आपहीको अपना स्वामी माना है॥ २१-२२॥ अनघ ! आप मुझे डाँट बतायें तो भी मैं आप अनन्तका परित्याग नहीं करूँगी । देव ! मैं समुद्रमें रहनेवालीके योग्य नीले रंगकी रेशमी साड़ी पहनकर आदिपद्य तथा पद्मचिह्ित दिव्य कर्णभृूषण धारण कर आपकी सेवामें आयी हूँ। आपके बिना मैं दूसरे किन्हीं लोकोंका सेवन करना नहीं चाहती ॥ २३-२४ ॥ वारुणीके बाद कान्तिदेवी संकर्षणकी सेवामें उपस्थित हुई। उसका कटियप्रदेश मदसे कुछ कम्पित हो रहा था। आँखें भी कुछ

English

"O Krishna, I am the lord of Bhutas²³⁶ and of the gods and I am Purandara. Being born of Aditi I am thy elder brother (37). Do thou forgive me for displaying my own energy in the shape of clouds which is but the outcome of thy power (38). O Krishna of the gait of an elephant, be thou delighted now by thy own gentle energy and listen to the words given vent to by Brahmā and the cows (39). Pleased with thy heavenly deeds, hymning of their glories and with the work of protection the Lord Brahmā and the cows of the sky have communicated this unto thee (40). Thyself protecting the great Goloka region and all the cows, our race, through the help of the bulls, will multiply itself (41). We all, coursing at our will, shall propitiate the cultivators with bulls, their beasts of burden, the celestials with the oblation of Havi and Sri with the profusely increasing corns (42). O lord, O thou of great strength, thou art our preceptor and saviour. Becoming our king and lord do thou sprinkle thy self to-day with this golden jar full of heavenly water brought by me with my own hands (43–44). I am the king of the celestials and thou hast, although eternal, become now the king of the cows. Therefore the people of this world will hymn thee as Govinda (45). As the dignity of Indra has been bestowed on me so thou art the king of cows. O Krishna, the gods will celebrate thy name as Upendra (46). Of the four months of my rainy season, I confer the latter half constituting the autumn on thee (47). From to-day people will recognize the first two months as mine. After the termination of the rains they will take down my flag and thou shalt receive adoration. Shorn of excitement and emitting notes occasionally the peacocks will give up their pride begotten by my clouds. And all other creatures, ranging in my season and emitting notes at the view of clouds, will be silent (48–49). Agastya, the regent of the star Canopus, will range like a bird in the southern quarter and the sun, of thousand rays, will distress all with his own effulgence (50). Thus with the beginning of autumn the peacocks will become silent, the birds will hanker after water, the frogs will desist from leaping, the brinks of the rivers will be filled with swans and Sārasas, the Krounchas will emit their notes, the bulls will become excited, the cows will be pleased and yield profuse milk, the clouds will disappear after filling the earth with water, the cranes will range in the dark sky, the picturesque lakes, pools and rivers will be adorned with clean water and new grown lotuses, the dark-blue fields will be full of corns, the rivers will have waters flowing in their middle²³⁷ the hermitages of the ascetics will also be filled with beautiful corns, the earth, abounding in many provinces, will grow charming after the rains, the roads will look beautiful, the trees will be covered with fruits, the country will be full of sugarcane and Vajapeya and other sacrifices will be undertaken. And thus the sacred autumn will set in. Thou shalt then get up from thy bed. Men in this world and the immortals in the celestial region will worship me as Mahendra and thee as Upendra in the flag-staffs on the earth (51-59). The man, who reciting the great and eternal theme of our conduct as Mahendra and Upendra, will bow unto us, will not be visited by any

अध्याय ४२

श्लोक 10

तां हृष्टमनसः सर्वे यथास्थानं यथावयः यथानिदेशं त्रिदशा विविशुस् ते सभां शुभाम्

tāṃ hṛṣṭamanasaḥ sarve yathāsthānaṃ yathāvayaḥ yathānideśaṃ tridaśā viviśus te sabhāṃ śubhām

हिन्दी अर्थ

घूम रही थीं। उसने दोनों हाथ जोड़कर कहा--“जय हो बलरामजीकी ।' फिर प्रेमसे मुसकराती हुई वह प्रयोजनयुक्त वचन बोली-- ॥ २५-२६ ॥ प्रभो! आपके सहस्रों मस्तक हैं। आप जगत्के स्वामी हैं। मेरी दृष्टिमें आपका गौरव चन्द्रमासे भी अधिक है। मैं भी वारुणीकी भाँति आपके निजी गुणोंसे आकृष्ट हो आपमें अनुरक्त हो गयी हूँ (इसीलिये आपकी सेवामें उपस्थित हूँ। आप मुझे अड्रीकार करें) '॥ २७॥ जो भगवान् विष्णुके वक्ष:स्थलमें नित्य निवास करनेयोग्य हैं, वे कमलवनमें वास करनेवाली देवी श्री' (शोभा) रोहिणीनन्दन बलरामके वक्ष:स्थलमें सुन्दर मालाकी भाँति प्रतिष्ठित हो निर्मल भावको प्राप्त हुईं। उनका मुख कमलके समान सुशोभित था, उनके हाथमें भी कमल-पुष्प शोभा दे रहा था; वस्त्राभूषणोंसे सुसज्जित हुई वे मूर्तिमती शोभा देवी बलरामके वक्षमें स्थित हो एक निर्मल माला हाथमें लेकर संकर्षणसे बोलीं-- ॥ २८-२९ ॥ 'देवेश्वर राम! बलराम! आप बड़े ही अभिराम (सुन्दर) हैं।वारुणी (सुधा) -से, चन्द्रमाकी- सी कान्तिसे तथा मुझसे (कमलालयाकी-सी शोभासे) सम्पन्न होकर चन्द्रमाके समान प्रकाशित हो रहे हैं

English

Thereupon taking those jars full of heavenly water the king of gods, conversant with Yoga, sprinkled²³⁸ Govinda (61). Beholding the eternal Krishna thus annointed, the cows, stationed in the celestial region, along with the bulls, sprinkled him also with a downpour of their milk through clouds (62). The clear clouds in the sky sprinkled him with nectarine showers. From trees fell down moon-like drops of water. And from the sky the gods set up a leonine sound, made a downpour of flowers and blew the bugles (63–64). The Maharshis, who always follow _mantras_, chanted his glories with becoming verses and the body of the earth was separated from one all-extending ocean (65). The seas grew delightful and the winds began to blow for bringing about the well-being of the world. And the sun and the moon accompanied by stars stood in their respective roads (66). The kings were freed of their enemies and the calamity of excessive rain was pacified. And the trees were embellished with leaves and flowers of various colours. The deer grew delighted in the forest and the elephants began to yield temporal juice and the mountains shone with trees grown on them and with metals (67–68). And the land of mortals was satisfied with ambrosia-like juice like unto the celestial region. Thus when the ceremony of the royal unction, of the Lord Krishna, accompanied by the nectarine showers coming down from the celestial region, was over the king of gods Purandara said to the eternal Govinda, wearing celestial garlands and installed in the sovereignty of the cows (69–70).

अध्याय ४२

श्लोक 11

ते निषेदुर् यथोक्तेषु विमानेष्व् आसनेषु च भद्रासनेषु पीठेषु कुथास्व् आस्तरणेषु च

te niṣedur yathokteṣu vimāneṣv āsaneṣu ca bhadrāsaneṣu pīṭheṣu kuthāsv āstaraṇeṣu ca

हिन्दी अर्थ

१. यहाँ श्रीका अर्थ शोभाकी अधिष्ठात्री देवी है। साक्षात् भगवती लक्ष्मी तो भगवान् विष्णुकी अनन्यानुरागिणी पतिक्रता पत्नी हैं। यहाँ मधु, कान्ति और शोभा--इन तीन लोकसामान्य वस्तुओंकी अधिष्ठात्री देवियोंका ही उल्लेख किया है--ऐसा समझना चाहिए। आदिपदं च पद्माक्ष॑ं दिव्यश्रवणभूषणम् देवेमां प्रतिगृह्लीष्व पौराणीं भूषणक्रियाम् । समयस्ते महाबाहो भूषणानामलंक्रिया संगृह्य तमलंकारं ताश्व तिस्त्र: सुरस्त्रिय: । शुशुभे बलदेवो हि शारदेन्दुसमप्रभ:

English

"O Krishna, the first work, of installing thee as the king of cows, is now over. Listen now to the next object of my coming here (71). Slaying speedily Kansa, the wretch of a horse Keshi, and Aristha, always committing mischief do thou engage in governing thy own kingdom (72). From thy father's sister, a portion of my energy is born as a son by name Arjuna. Contracting friendship with him do thou always protect him (73). Thou shalt favour him and he, too, acting on thy advice and following thee, will acquire great fame (74). He will be the foremost of bowmen among the descendants of Bharata and will take after thee. And without thy help he alone will never be pleased with his work (75). This future war of Bharata²³⁹ depends on him and thee the foremost of men. When you both will be united all the kings will be slain (76). O Krishna, I have spoken to the gods and Rishis, that the son, begotten by me on Kunti, will be an adept in the use of weapons, the foremost of archers and the greatest of the Kurus. All the warrior-kings will speak of his learning (77-78). Ever abiding by the duties of a Kshatrya he alone will be able to kill one Akshouhini of kings skilled in fighting (79). Save thee there is none among the kings or gods who will be able to weaken the power of his bow or follow the path of his weapons, O lord (80). O Govinda, he will be thy friend and help in battle. Therefore at my request, do thou instruct him in spiritual knowledge (81). Thou dost know well Arjuna and all the worlds. So thou shouldst always regard and take care of him as thou dost me (82). If thou dost protect him in the great battle Death will not be able to extend its influence over him (83). O Krishna, know Arjuna as me and me as identical with thy own self. As I am at one with thee, so is Arjuna (84). I am thy elder brother and therefore thou didst, in the days of yore, acquiring the three worlds from Bali with thy three footsteps, install me in the sovereignty over the gods (85). I know thee as fond of truth, as having truth for thy prowess and as identical with truth. And because thou art bound to the gods by a promise they have engaged thee in this work of the destruction of their enemies (86). O Krishna, Arjuna, the son of thy father's sister, is my son. As he did become thy companion in the days of yore²⁴⁰ and so now he will contract friendship with thee (87). O Mādhava, as a bull carries a burden, so thou shalt always take care of him when either living in his house, your house or while fighting with the enemies in the battle-field (88). When Kansa will be slain by thee, ever observant of the real purpose of things there will take place a great war of the kings (89). Arjuna will vanquish those heroic men of superhuman deeds and thou shalt adorn him with glory (90). O Keshava, if truth, myself and the celestials are thy favourites thou shouldst carry out whatever I have said" (91).

अध्याय ४२

श्लोक 12

ततः प्रभञ्जनो वायुर् ब्रह्मणा साधु चोदितः मा शब्द इति सर्वत्र प्रचक्राम सभां शुभाम्

tataḥ prabhañjano vāyur brahmaṇā sādhu coditaḥ mā śabda iti sarvatra pracakrāma sabhāṃ śubhām

हिन्दी अर्थ

स समागम्य कृष्णेन जलजाम्भोदवर्चसा। मुदं परमिकां लेभे ग्रहयुक्त: शशी यथा संग्राममुक्तस्तेजस्वी हैत्यप्रहरणाड्वितः। देवतानां जयश्लाघी दिव्यस्त्रगनुलेपन: विष्णो: किरीटं हैत्येन हतं वैरोचनेन वै किरीटार्थ समुद्रस्थ मध्ये हैत्यगणैः सह। मोक्षयित्वा किरीटं तु वैष्णवं पततां वरः। व्यत्यक्रमत वेगेन गगन देवतालयम्

English

Hearing the words of Sakra, Krishna, who had become a cow-keeper, with a delighted mind replied (92). "O lord of Sachi, I am happy to see you. Nothing, of whatever you have said, will be left off (93). O Sakra, I know your heart. It is not unknown to me that my father's sister has been given away to the high-souled Pandu and that she has given birth to Arjuna (94). I know also the prince Yudhisthira begotten by Dharma. I know Bhimasena, the multiplier of Vāyu's (wind-god's) race. I know also Nakula and Sahadeva begotten on Mādri by the two Aswinis²⁴¹ (95-96). I know also Karna, now known as a charioteer's son, begotten on my father's sister in her maidenhood by the Sun²⁴² (97). That Pandu is dead on account of the thunder-like imprecation²⁴³ and that the sons of Dhiitarashtra are desirous of fighting are all known to me (98), O king of gods, returning now to the city of the celestials increase their delight. No enemy will be able to trouble Arjuna when he will be before me (99). When the great war of Bhārata will come to its close, I shall, on account of Arjuna, consign unscathed unto Kunti all the sons of Pandu (100). O king of gods, I am bound by affection and therefore I shall accomplish like a servant what your son Arjuna will command me (101)." Hearing these words of truthful Krishna, the king of gods returned to the city of the celestials (102).

अध्याय ४२

श्लोक 13

निःशब्दे स्तिमिते तस्मिन् समाजे त्रिदिवौकसाम् बभाषे धरणी वाक्यं स्वेदात् करुणभाषिणी

niḥśabde stimite tasmin samāje tridivaukasām babhāṣe dharaṇī vākyaṃ svedāt karuṇabhāṣiṇī

हिन्दी अर्थ

स ददर्श गुरुं शैले विष्णु कार्यान्‍्तरागतम्। तेन क्रीडावलम्बेन किरीटेन विराजता “आप सहस्न सिरवाले अनन्तदेवके मस्तकपर जो सूर्यके समान उद्धासित होता था, वह मुकुट समुद्रसे निकालकर मैं यहाँ ले आयी हूँ। यही है वह मुकुट इसके सिवा वज्रमणि (हीरे)-से विभूषित एक सुवर्णमय कुण्डल भी लेती आयी हूँ, जो आपके एक कानका दिव्य भूषण है। यह आदिपद्य और ययद्याक्ष कहलाता है॥३२॥ जो समुद्रमें ही मिल सकते हैं, ऐसे कितने ही नीले रंगके रेशमी वस्त्र (अथवा आपकी इच्छाके अनुरूप नील कौशेय वस्त्र) तथा यह पीन तरल हार, जो समुद्रमें ही विद्यमान था, मैं आपके लिये लायी हूँ। आप इसे सादर ग्रहण करें॥ ३३॥ देव! यह सब

English

²³⁶ A demi-god of a particular class.

अध्याय ४२

श्लोक 14

त्वया धार्या त्व् अहं देव त्वया वै धार्यते जगत् ।त्वं धारयसि भूतानि भुवनं त्वं बिभर्षि च ॥ यत् त्वया धार्यते किंचित् तेजसा च बलेन च ।ततस् तव प्रसादेन मया पश्चात् तु धार्यते ॥ त्वया धृतं धारयामि नाधृतं धारयाम्य् अहम् ।न हि तद् विद्यते भूतं यत् त्वया नानुधार्यते ॥ त्वम् एव कुरुषे देव नारायण युगे युगे ।महाभारावतरणं जगतो हितकाम्यया ॥ तवैव तेजसा क्रान्तां रसातलतलं गताम् ।त्रायस्व मां सुरश्रेष्ठ तवैव शरणं गताम् ॥ दानवैः पीड्यमानाहं राक्षसैश् च दुरात्मभिः ।त्वाम् एव शरणं नित्यम् उपयास्ये सनातनम् ॥ तावन् मे ऽस्ति भयं भूयो यावन् न त्वां ककुद्मिनम् ।शरणं यामि मनसा शतशो ह्य् उपलक्षये ।अहम् आदौ पुरानेन संक्षिप्ता पद्मयोनिना मां च बध्वा कृतौ पूर्वं मृङ्मयौ द्वौ महासुरौ

tvayā dhāryā tv ahaṃ deva tvayā vai dhāryate jagat | tvaṃ dhārayasi bhūtāni bhuvanaṃ tvaṃ bibharṣi ca || yat tvayā dhāryate kiṃcit tejasā ca balena ca | tatas tava prasādena mayā paścāt tu dhāryate || tvayā dhṛtaṃ dhārayāmi nādhṛtaṃ dhārayāmy aham | na hi tad vidyate bhūtaṃ yat tvayā nānudhāryate || tvam eva kuruṣe deva nārāyaṇa yuge yuge | mahābhārāvataraṇaṃ jagato hitakāmyayā || tavaiva tejasā krāntāṃ rasātalatalaṃ gatām | trāyasva māṃ suraśreṣṭha tavaiva śaraṇaṃ gatām || dānavaiḥ pīḍyamānāhaṃ rākṣasaiś ca durātmabhiḥ | tvām eva śaraṇaṃ nityam upayāsye sanātanam || tāvan me 'sti bhayaṃ bhūyo yāvan na tvāṃ kakudminam | śaraṇaṃ yāmi manasā śataśo hy upalakṣaye | aham ādau purānena saṃkṣiptā padmayoninā māṃ ca badhvā kṛtau pūrvaṃ mṛṅmayau dvau mahāsurau

हिन्दी अर्थ

आपकी पुरातन भूषण-सामग्री है। इसे ग्रहण कीजिये। महाबाहों! यह आपके भूषण ग्रहण करनेका समय है। आपसे ही इन भूषणोंकी शोभा है, इनसे आपकी नहीं'॥ ३४॥ वह अलड्डगर तथा उन तीनों देवाड़नाओंको ग्रहण करके बलदेवजी शरत्कालके चन्द्रमाकी भाँति मेघके समान श्याम कान्तिवाले श्रीकृष्णफेके साथ मिलकर ग्रहयुक्त चन्द्रमाके समान सुशोभित होने लगे। उस समय उनको बड़ी प्रसन्नता प्राप्त हुई॥ ३६॥ वे दोनों भाई जैसे घरमें बैठे हों, उस प्रकार बातचीत करने लगे। इसी समय विनतानन्दन गरुड़ बड़े वेगसे विशाल मार्ग तै करके वहाँ आये॥ ३७॥ तेजस्वी गरुड़ उस समय एक संग्रामसे छूटकर आये थे। हैत्योंके प्रहारोंके चिह्न उस समय भी उनके अड्ोंमें अद्धित थे। वे और दिव्य चन्दन धारण करनेवाले थे॥ ३८॥ वरुणके निवासभूत क्षीरसमुद्रमें जब भगवान् विष्णु दिव्य शय्यापर सो रहे थे, उस समय विरोचनके पुत्र एक हैत्यने उनका किरीट चुरा लिया॥ ३९ ॥ अपने गुरुरूप भगवान्के

English

²³⁷ _i.e._ the waters will not overflood their banks as in the rainy

अध्याय ४२

श्लोक 15

कर्णस्रोतोद्भवौ तौ हि विष्णोर् अस्य महात्मनः महार्णवे प्रस्वपतः काष्ठकुड्यसमौ स्थितौ

karṇasrotodbhavau tau hi viṣṇor asya mahātmanaḥ mahārṇave prasvapataḥ kāṣṭhakuḍyasamau sthitau

हिन्दी अर्थ

लिये उस किरीटको वापस लानेके उद्देश्यसे गरुड़ने बीच समुद्रमें हैत्योंके साथ बलपूर्वक संग्राम किया भगवान् विष्णुके उस किरीटको हैत्योंके हाथसे छुड़ाकर पक्षियोंमें श्रेष्ठ गरुड़ बड़े वेगसे देवताओंके निवासभूत आकाशमें उड़ चले॥ ४१॥ उन्होंने देखा, मेरे स्वामी विष्णु दूसरे कार्यसे इस पर्वतपर पधारे हैं। वे उस समय उस प्रकाशमान किरीटको क्रीडापूर्वक अपनी चोंचमें लटकाये चल रहे थे स दृष्ठा मानुषं विष्णुं शैलराजशिरोगतम्। प्रकाशचेष्टानिर्मुक्ते विमौलिमिव मानुषम्

English

²³⁷ _i.e._ the waters will not overflood their banks as in the rainy

अध्याय ४२

श्लोक 16

तौ विवेश स्वयं वायुर् ब्रह्मणा साधु चोदितः तौ दिवं छादयन्तौ तु ववृधाते महासुरौ

tau viveśa svayaṃ vāyur brahmaṇā sādhu coditaḥ tau divaṃ chādayantau tu vavṛdhāte mahāsurau

हिन्दी अर्थ

शिरसः स्थाननिर्युक्ता कृष्णं चैवान्वशोभयत्। यथेव मेरुशिखरे भानुर्मध्यंदिनि यथा कृष्ण: प्रहष्टवदनो रामं॑ वचनमत्रवीतू त्वरते खलु कार्यार्थों देवतानां न संशय: । यथेयमावयो: शैले संग्रामरचना कृता प्रभा भास्करभामि श्रा चरन्तीव दिशो दश काले खलु नृपः प्राप्तो जरासंधो महीपतिः । आवयोर्युद्धनिकषः प्रथम: समरातिथि:

English

²³⁷ _i.e._ the waters will not overflood their banks as in the rainy

अध्याय ४२

श्लोक 17

वायुप्राणौ तु तौ गृह्य ब्रह्मा परिमृश्यञ् शनैः एकं मृदुतरं मेने कठिनं वेद चापरम्

vāyuprāṇau tu tau gṛhya brahmā parimṛśyañ śanaiḥ ekaṃ mṛdutaraṃ mene kaṭhinaṃ veda cāparam

हिन्दी अर्थ

गिरिराज गोमन्तके शिखरपर विराजमान मानवरूपधारी विष्णुको प्रकाश और चेष्टाओंसे रहित तथा मुकुटहीन देख उनके मानसिक भावोंको समझनेवाले पक्षियोंमें श्रेष्ठ गरुड़ने आकाशमें स्थित होकर बड़े हर्षके साथ उन श्रीविष्णुके सिरपर वह मुकुट डाल दिया ॥ ४३-४४॥ वह मुकुट श्रीकृष्णके मस्तकपर गिरा और इस प्रकार बैठ गया मानो किसीने पहना दिया हो। मस्तकके स्थानपर निश्चितररूपसे आबद्ध होकर उस मुकुटने भगवान् श्रीकृष्णकी शोभा बढ़ा दी। जैसे दोपहरके समय मेरुके शिखरपर सूर्यदेव प्रकाशित होते हैं, उसी प्रकार वह मुकुट भी देदीप्यमान हो रहा था॥ ४५ ॥ गरुड़के प्रयोगसे मुकुटको मस्तकपर आया हुआ जान श्रीकृष्णका मुख प्रसन्नतासे खिल उठा और वे बलरामजीसे इस प्रकार बोले-- ॥ ४६॥ “भैया! इस पर्वतपर हम दोनोंके लिये जिस प्रकार युद्धोपयोगी वेष-भूषाकी रचना कर दी गयी है, इससे यही अनुमान होता है कि देवताओंका कार्य

English

²³⁷ _i.e._ the waters will not overflood their banks as in the rainy

अध्याय ४२

श्लोक 18

नामनी तु तयोश् चक्रे स विभुः सलिलोद्भवः मृदुस् त्व् अयं मधुर् नाम कठिनः कैटभो ऽभवत्

nāmanī tu tayoś cakre sa vibhuḥ salilodbhavaḥ mṛdus tv ayaṃ madhur nāma kaṭhinaḥ kaiṭabho 'bhavat

हिन्दी अर्थ

एवं प्रयोजन शीघ्र ही सिद्ध होना चाहता है, इसमें संशय नहीं है ॥ ४७ ॥ जब मैं महासागरमें सो रहा था, उस समय विरोचनका पुत्र इन्द्रका-सा रूप धारण करके वहाँ चला गया और जब मैं शेष-शय्यासे उठकर यहाँ आ गया, तब वह ग्राहरूप धारण करके वहाँसे मेरा मुकुट उठा लाया। वही मुकुट गरुड़ उससे छीन लाये हैं और उन्होंने इसे मेरे मस्तकपर रख दिया है॥ ४८-४९ ॥ निश्चय ही राजा जरासंध अब बहुत निकट आ गया है; क्योंकि वायुके समान वेगवाले रथोंकी ध्वजाओंके अग्रभाग दिखायी दे रहे हैं॥५०॥ आर्य! विजयकी अभिलाषा रखनेवाले राजाओंके ये चन्द्रमा-जैसे श्रेत कान्तिवाले सुसज्जित छत्र प्रकाशित हो रहे हैं; इनकी संख्या परिमित ही है अहो ! राजाओंके रथोंपर विराजमान जो ये श्वेत वर्णवाली ऊँची छत्र-पड़्क्तियाँ हमलोगोंकी ओर बढ़ी आ रही हें, ये आकाशमें उज्ज्वल हंसपड्क्तियोंक समान सुशोभित होती हैं॥५२॥ अहो! इन निर्मल प्रभावाले शस्त्रोंकी चमकसे आकाशका मुख भी उज्वल एवं प्रकाशित हो उठा है। शस्त्रोंकी ये दीप्तियाँ सूर्यदेवकी किरणोंसे मिलकर दसों दिशाओंमें विचरती-सी प्रतीत होती हैं ॥ ५३ ॥ निश्चय ही समराद्गणमें भूमिपालोंद्वार मुझपर चलाये गये ये

English

²³⁷ _i.e._ the waters will not overflood their banks as in the rainy

अध्याय ४२

श्लोक 19

तौ दैत्यौ कृतनामानौ चेरतुर् बलदर्पितौ सर्वम् एकार्णवं लोकं योद्धुकामौ सुनिर्भयौ

tau daityau kṛtanāmānau ceratur baladarpitau sarvam ekārṇavaṃ lokaṃ yoddhukāmau sunirbhayau

हिन्दी अर्थ

समस्त अस्त्र-शस्त्र नष्ट हो जायँगे॥ ५४॥ राजा जरासंध ठीक समयपर आया है। यह हमलोगोंके युद्ध-कौशलकी कसौटी है तथा समराड्भगणका पहला अतिथि है एवमुक्त्वा तत: कृष्ण: स्वस्थ: संग्रामलालस: । जरासंधवधं प्रेप्सुश्बषकार बलदर्शनम् ये विनाशं गमिष्यन्ति शास्त्रदृष्टन कर्मणा स्वर्गगामीनि चाप्येषां वपूंषि प्रचकाशिरे

English

²³⁷ _i.e._ the waters will not overflood their banks as in the rainy

अध्याय ४२

श्लोक 20

ताव् आगतौ समालोक्य ब्रह्मा लोकपितामहः एकार्णवाम्बुनिचये तत्रैवानतरधीयत

tāv āgatau samālokya brahmā lokapitāmahaḥ ekārṇavāmbunicaye tatraivānataradhīyata

हिन्दी अर्थ

अल्पेन खलु कालेन विविक्तं पृथिवीतलम् आर्य ! हम दोनों साथ रहें। राजा जरासंधके आनेसे पहले अभी हमें युद्ध आरम्भ नहीं करना चाहिए। जबतक वह नहीं आता है, तबतक हम उसके बलका विचार कर लें॥ ५६ ॥ ऐसा कहकर श्रीकृष्ण स्वस्थभावसे संग्रामकी इच्छा रखकर जरासंधका वध चाहते हुए उसके सैनिक-बलका निरीक्षण करने लगे॥ ५७॥ उन सब राजाओंका निरीक्षण करते हुए अविनाशी यदुकुलतिलक भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं ही अपने-आपसे कहने लगे-- 'अहो! दिव्यलोकमें देवताओंके साथ बैठकर जो गुप्त राजोचित्त मार्गपर स्थित हैं। ये शास्त्रोक्त विधिसे संग्राममें विनाशको प्राप्त होंगे ॥ ५८-५९ ॥॥ मैं तो समझता हूँ कि मृत्युने रणयज्ञमें आहुति देनेके लिये इन श्रेष्ठ राजाओंका प्रोक्षण कर लिया है। इनके स्वर्गगामी शरीर अभीसे

English

²³⁷ _i.e._ the waters will not overflood their banks as in the rainy

अध्याय ४२

श्लोक 21

स पद्मे पद्मनाभस्य नाभिमध्याद् समुत्थिते रोचयाम् आस वसतिं गुह्यां ब्रह्मा चतुर्मुखः

sa padme padmanābhasya nābhimadhyād samutthite rocayām āsa vasatiṃ guhyāṃ brahmā caturmukhaḥ

हिन्दी अर्थ

प्रकाशित हो रहे हैं ॥६०॥ यह पृथ्वी इन राजसिंहोंके सैन्यसमूहोंसे पीड़ित हो इनके भारसे थककर जो देवलोकमें गयी थी, वह इसका जाना उचित ही था॥६१॥ अब थोड़े ही समयमें यह भूमण्डल इन राजसमूहोंसे खाली भविष्यति नरेन्‍्द्रौधैराकीर्ण च नभस्तलम्॥ ६२ हो जायगा और आकाश भर जायगा' इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि जरासंधाभिगमनं नामैकचत्वारिंशो5ध्याय: इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभाग हरिवंशके अन्तर्गत विष्युपर्वमें जगसंधका अभियानविषयक इकतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

English

²³⁷ _i.e._ the waters will not overflood their banks as in the rainy

अध्याय ४२

श्लोक 22

ताव् उभौ जलगर्भस्थौ नारायणपितामहौ बहून् वर्षगणान् अप्सु शयानौ न चकम्पतुः

tāv ubhau jalagarbhasthau nārāyaṇapitāmahau bahūn varṣagaṇān apsu śayānau na cakampatuḥ

हिन्दी अर्थ

जरासंधकी सेनाका वर्णन, उसका सेनाको पर्वतपर आक्रमण करनेकी आज्ञा देना, दमघोषकी सम्मतिसे गोमन्तपर्वतमें आग लगाया जाना,पर्वतका जलना तथा बलराम और श्रीकृष्णका पर्वतसे कूदकर राजाओंकी सेनामें आ पहुँचना वैजशञम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय ! तदनन्तर समस्त राजाओंका राजा महातेजस्वी जरासंध वहाँ आ पहुँचा। उसके पीछे अपनी-अपनी सेनाओंके साथ दूसरे भी बहुत-से नरेश थे॥१॥ कहीं अस्त्र- शस्त्रके ज्ञाता पुरुषोंद्रारा भलीभाँति सिखाये गये विशाल एवं प्रचण्ड बलशाली अश्रोंसे युक्त रथ युद्धोपयोगी सामग्रियोंसे सम्पन्न होकर आगे बढ़ रहे थे। उन रथोंकी गति कहीं भी अवरुद्ध नहीं होती थी वाजिभिर्वायुसंकाशै: प्लवद्धिरिव पत्रिभि: ४ स राजा सागराकारः ससैन्य: प्रत्यदृश्यत

English

²³⁷ _i.e._ the waters will not overflood their banks as in the rainy

अध्याय ४२

श्लोक 23

अथ दीर्घस्य कालस्य ताव् उभौ मधुकैटभौ आजग्मतुस् तम् उद्देशं यत्र ब्रह्मा व्यवस्थितः

atha dīrghasya kālasya tāv ubhau madhukaiṭabhau ājagmatus tam uddeśaṃ yatra brahmā vyavasthitaḥ

हिन्दी अर्थ

बीतरात्रे ततः काले नृपास्ते कृतकौतुका: । आरोहणार्थ शैलस्य समेता युद्धलालसा: कहीं बहुसंख्यक हाथी चल रहे थे, जिन्हें सोनेकी जंजीरोंसे कसा गया था। उनके दोनों पार्श्वमें बड़े-बड़े घंटे लटक रहे थे। वे सभी हाथी मेघोंकी घटाके समान जान पड़ते थे। उनके ऊपर अच्छे महावत बैठे थे तथा था॥ ३॥ कहीं घुड़सवार योद्धा घोड़ोंपर अच्छी तरहसे सवार थे। उनके वे घोड़े वायुके समान वेगशाली थे और उछलते-कूदते हुए आगे बढ़ते समय आकाशमें उड़ते हुए पश्षियोंके समान प्रतीत होते थे॥ ४ ॥ बलवानोंमें धारण करके आगे बढ़ते थे। वे हजार-हजारकी टोलियोंमें एक साथ चलते और केंचुलसे छूटे हुए सर्पोके समान उछलते थे॥५॥ इस प्रकार मँडराते हुए बादलोंके समान चतुरड्धिणी सेनाएँ साथ लेकर वीर-ब्रतको धारण

English

²³⁷ _i.e._ the waters will not overflood their banks as in the rainy

अध्याय ४२

श्लोक 24

दृष्ट्वा ताव् असुरौ घोरौ महान्तौ युद्धदुर्मदौ ब्रह्मणा ताडितो विष्णुः पद्मनालेन वै पुरा ।उत्पपाताशु शयनात् पद्मनाभो महाद्युतिः

dṛṣṭvā tāv asurau ghorau mahāntau yuddhadurmadau brahmaṇā tāḍito viṣṇuḥ padmanālena vai purā | utpapātāśu śayanāt padmanābho mahādyutiḥ

हिन्दी अर्थ

करनेवाला बलवान राजा जरासंध युद्धके लिये आगे बढ़ रहा था॥ ६॥ वह राजा पहियोंके घर्घर घोषसे युक्त रथों, (चिम्घाड़ते हुए) मतवाले हाथियों, हिनहिनाते हुए घोड़ों तथा गर्जते हुए पैदल सैनिकोंद्वारा सम्पूर्ण दिशाओं एवं समस्त पर्वतीय कन्दराओंको प्रतिध्वनित करता हुआ सेनाके साथ समुद्रके समान दिखायी देता था भूमिपालोंकी वह सेना हृष्ट-पुष्ट योद्धाओंसे परिपूर्ण थी। गर्जन और ताल ठोंकनेकी गम्भीर ध्वनिसे गर्जती हुई मेघोंकी घटाके समान प्रतीत होती थी॥९॥ वायुके समान तीब्र गतिसे चलनेवाले रथों, काले मेघोंके समान प्रतीत होनेवाले हाथियों, श्वेत बादलोंके समान घोड़ों तथा कवच आदिसे सुसज्जित पैदल योद्धाओंसे मिश्रित हुई वह सेना सब ओरसे सुशोभित हो रही थी। मतवाले हाथियोंसे व्याप्त हुई वह विशाल वाहिनी वर्षा-ऋतुमें समुद्रके भीतर लक्षित होनेवाले मेघोंके समूहकी शोभा धारण करती थी॥१०-११॥ जरासंध आदि समस्त भूपाल अपनी सेनाके साथ उस पर्वतको चारों ओरसे घेरकर छावनी डालनेकी तैयारी करने लगे॥ १२॥ वहाँ

English

²³⁷ _i.e._ the waters will not overflood their banks as in the rainy

अध्याय ४२

श्लोक 25

तद् युद्धम् अभवद् घोरं तयोस् तस्य च वै तदा एकार्णवे तदा लोके त्रैलोक्ये जलतां गते

tad yuddham abhavad ghoraṃ tayos tasya ca vai tadā ekārṇave tadā loke trailokye jalatāṃ gate

हिन्दी अर्थ

डेरा डाले हुए जरासंधके सैनिकशिविरकी शोभा वैसी ही प्रतीत होती थी, जैसा कि शुक्लपक्षकी पूर्णिमाको अपनी उत्ताल तरंगोंसे परिपूर्ण हुए महासागरका रूप देखनेमें आता है॥१३॥ तदनन्तर रात बीतनेपर सब राजा उठे और मड्नलाचारसे सम्पन्न हो युद्धकी लालसासे मोमन्तपर्वतपर चढ़नेके लिये एकत्र होने लगे निविष्टाः मन्त्रयामासुर्युद्धकालकुतूहला: तेषां सकझञ्जलुकोष्णीषा: स्थविरा वेत्रपाणय: । चेरुर्मा शब्द इत्येवं ब्रुवन्तो राजशासनात्

English

²³⁷ _i.e._ the waters will not overflood their banks as in the rainy

अध्याय ४२

श्लोक 26

तद् अभूत् तुमुलं युद्धं वर्षसंख्याः सहस्रशः न च ताव् असुरौ युद्धे तदा श्रमम् अवापतुः

tad abhūt tumulaṃ yuddhaṃ varṣasaṃkhyāḥ sahasraśaḥ na ca tāv asurau yuddhe tadā śramam avāpatuḥ

हिन्दी अर्थ

अद्यप्रभृति सैन्यैमें गिरिरोध: प्रवर्त्यताम्। यावदेताौ पातयामो वसुदेवसुतावुभौ आकाशमपि बाणोघेर्निःसम्पातं विधीयताम् तेषु तेष्ववकाशेषु शीघ्रमारुहमतां गिरि: पर्वतके शिखरोंपर एकत्र हो वे सभी राजा बैठे और युद्धके शुभ अवसरके लिये उत्सुक हो आपसमें तुमुल ध्वनि प्रलयकालमें मर्यादाको तोड़कर बहनेवाले समुद्रोंकी भयंकर गर्जनाके समान सुनायी देती थी

English

²³⁷ _i.e._ the waters will not overflood their banks as in the rainy

अध्याय ४२

श्लोक 27

अथ दीर्घस्य कालस्य तौ दैत्यौ युद्धदुर्मदौ ऊचतुः प्रीतमनसौ देवं नारायणं हरिं

atha dīrghasya kālasya tau daityau yuddhadurmadau ūcatuḥ prītamanasau devaṃ nārāyaṇaṃ hariṃ

हिन्दी अर्थ

उन राजाओंके छड़ीदार बूढ़े सिपाही चोगा और पगड़ी धारण किये तथा हाथमें बेंत लिये राजाज्ञासे यह कहते हुए विचरने लगे कि सब लोग मौन रहें। कोई एक हुए उस सैन्यसमूहका रूप उस शब्दहीन प्रशान्त महासागरके समान प्रतीत होता था, जिसके मत्स्य और भुजड़ जलके भीतर विलीन हो गये हों॥ १८॥ वह सैन्यसागर मानो योगबलसे जब सहसा नीरव तथा निश्चल हो गया, तब बृहस्पतिके समान नीतिज्ञ जरासंधने यह महत्त्वपूर्ण बात कही-- ॥ १९॥ 'राजाओंकी सेनाएँ शीघ्र ही आक्रमण करें और सब ओरसे सैनिकसमूह इस पर्वतको घेर लें॥ २०॥ पत्थरोंके गोले बरसानेवाले ऊपर कर लिये जायूँ॥ २१॥ शत्रुओंके शस्त्रप्रहारको नष्ट करनेमें समर्थ सुदृढ़ और हलके गोलोंको ऊपर फेंकनेके लिये हमारे शिल्पी शीघ्र तैयार करें

English

²³⁷ _i.e._ the waters will not overflood their banks as in the rainy

अध्याय ४२

श्लोक 28

प्रीतौ स्वस् तव युद्धेन श्लाघ्यस् त्वं मृत्युर् आहवे आवां जहि न यत्रोर्वी जलेन समभिप्लुता

prītau svas tava yuddhena ślāghyas tvaṃ mṛtyur āhave āvāṃ jahi na yatrorvī jalena samabhiplutā

हिन्दी अर्थ

परस्पर प्रमत्त होकर युद्ध करनेवाले शूरवीरोंके लिये जैसा राजा दमघोष कहें, शीघ्र वैसा ही प्रबन्ध किया जाय॥ २३ ॥ उस उत्तम पर्वतको टंकसमूहों और खनित्रोंसे खोदकर विदीर्ण कर डाला जाय। युद्धकी प्रणालीके जानकार नरेशोंको इसके समीप ही यथास्थान खड़ा किया जाय॥ २४॥ आजसे मेरे सैनिक इस पर्वतपर घेरा डाल दें और इसे तबतक चालू रखें, जबतक कि हम इन दोनों वसुदेवपुत्रोंकी मार न डालें शिलाओंसे ही उत्पन्न हुआ (अथवा शिलाओंका उत्पादक) यह पर्वत स्वयं तो अचल है ही, इसपर रहनेवाले पक्षियोंकों भी सायकोंद्वार अचल (हिलने-डुलने या उड़नेमें असमर्थ) कर दिया जाय। आकाशको भी बाणसमूहोंसे इस तरह रूँध दिया जाय कि उसमें पक्षी भी उड़ न सकें॥ २६॥ मेरी आज्ञा मानकर समस्त भूपाल पर्वतीय स्थानोंमें खड़े रहें और जहाँ-जहाँ अवकाश मिल जाय, वहाँ-वहाँसे शीघ्र ही पर्वतपर काश्मीरराजो गोनर्द: करूषाधिपतिस्तथा

English

²³⁷ _i.e._ the waters will not overflood their banks as in the rainy

अध्याय ४२

श्लोक 29

हतौ च तव पुत्रत्वं प्राप्नुयावः सुरोत्तम सो ह्य् आवां युधि निर्जेता तस्यावां विहितौ सुतौ

hatau ca tava putratvaṃ prāpnuyāvaḥ surottama so hy āvāṃ yudhi nirjetā tasyāvāṃ vihitau sutau

हिन्दी अर्थ

एकलव्यो दूृढाश्वश्च क्षत्रधर्मा जयद्रथ: बैदिशो वामदेवश्व सुकेतुश्चापि वीर्यवान् विदारयन्तो धावन्तो वाता इव बलाहकान्ू कार्यो भूमिसम: सर्वो भवद्धिर्वसुधाधिपै:

English

²³⁷ _i.e._ the waters will not overflood their banks as in the rainy

अध्याय ४२

श्लोक 30

स हि गृह्य मृधे दैत्यौ दोर्भ्यां तौ समपीडयत् जन्मतुर् निधनं चापि ताव् उभौ मधुकैटभौ

sa hi gṛhya mṛdhe daityau dorbhyāṃ tau samapīḍayat janmatur nidhanaṃ cāpi tāv ubhau madhukaiṭabhau

हिन्दी अर्थ

उवाच राजा चेदीनां देवानां मघवानिव। किं ते युद्धेन दुर्गेस्मिन् गोमन्ते च नगोत्तमे बाहिक, काश्मीरराज गोनर्द, करूषराज दन्तवक्त्र, किन्नरराज द्रुम तथा पर्वतीय प्रदेशके योद्धा-ये सब लोग इस पर्वतके पश्चिम भागपर शीघ्र ही चढ़ाई कर भोजोंके अधिपति रुक्‍मी, मालवाके राजा सूर्यक्ष, पाञ्चालदेशके अधिपति राजा द्रुपद, अवन्तिके दोनों छागलि, पुरुमित्र, राजा विराट, कौशाम्बीनरेश मालव, ये दुर्गयुद्धधा वेग सह सकनेवाले नरेश शत्रुओंको कुचलते हुए इस पर्वतके उत्तरभागपर चढ़ाई करें, इनका गौरव वज्रके तुल्य है॥३०--३३॥ शकुनिपुत्र उलूक, अंशुमान्के पुत्र बीर, एकलव्य, दृढ़ाश्व, क्षत्रधर्मा, जयद्रथ,

English

²³⁷ _i.e._ the waters will not overflood their banks as in the rainy

अध्याय ४२

श्लोक 31

ताव् उभाव् आप्लुतौ तोये वपुर्भ्याम् एकतां गतौ मेदो मुमुचतुर् दैत्यौ मथ्यमानौ जलोर्मिभिः

tāv ubhāv āplutau toye vapurbhyām ekatāṃ gatau medo mumucatur daityau mathyamānau jalormibhiḥ

हिन्दी अर्थ

उत्तमौजा, शाल्व, केरलराज कैशिक, विदिशाके राजा वामदेव और पराक्रमी सुकेतु-इन सबके अधीन इस पर्वतका पूर्वभाग सौंप दिया जाय। ये लोग जैसे वायु बादलोंको छिनन-भिन्न कर देती है, उसी प्रकार शत्रुओंको विदीर्ण करते हुए उनपर धावा बोल दें मैं, दरद तथा पराक्रमी चेदिराज दमघोष कवच आदिसे सुसज्जित होकर इस पर्वतके दक्षिणभागको विदीर्ण कर डालेंगे॥ ३७॥ इस प्रकार हमारी सेनाओंद्वारा चारों ओरसे घिरा हुआ यह पर्वत शीघ्र ही, मानो इसपर वज्रका आघात हो रहा हो, इस तरह घोर भय प्राप्त करे॥ ३८ ॥ गदाधारी वीर गदाओंसे, परिघ चलानेवाले परिघोंसे तथा अन्य वीर नाना प्रकारके दूसरे अस्त्र- शस्त्रोंसे इस श्रेष्ठ पर्वतके टुकड़े-टुकड़े कर डालें

English

²³⁷ _i.e._ the waters will not overflood their banks as in the rainy

अध्याय ४२

श्लोक 32

मेदसा तज्जलं व्याप्तं ताभ्यां अन्तर्दधे तदा नारायणश् च भगवान् असृजत् स पुनः प्रजाः

medasā tajjalaṃ vyāptaṃ tābhyāṃ antardadhe tadā nārāyaṇaś ca bhagavān asṛjat sa punaḥ prajāḥ

हिन्दी अर्थ

विषम एवं ऊँची शिलाओंसे युक्त इस भूधरको आप सभी भूपाल मिलकर आज ही भूमिके समान समतल कर डालें॥४०॥ जरासंधकी बात सुनकर समस्त राजाओंने मगधराजकी आज्ञासे गोमन्तपर्वतको चारों ओरसे घेर लिया, ठीक उसी तरह जैसे समुद्र पृथ्वीको घेरे हुए है॥४१॥ उस समय देवताओंके राजा इन्द्रके समान चेदिवासियोंके अधिपति राजा दमघोषने जरासंधसे कहा--राजन्! यह पर्वतोंमें श्रेष्ठ गोमन्त दुर्गम पर्वत है। इसपर युद्ध करनेसे आपको क्‍या लाभ होगा दुरारोहश्न शिखरे प्रांशुपादपकण्टके। काष्ट्रैस्तृणैश्व बहुभिः परिवार्य समन्ततः अद्यैव दीप्यतां क्षिप्रमलमन्येन कर्मणा। क्षत्रिया: सुकुमारा हि रणे सायकयोधिन:

English

²³⁷ _i.e._ the waters will not overflood their banks as in the rainy

अध्याय ४२

श्लोक 33

दैत्ययोर् मेदसा छन्ना मेदिनीति ततः स्मृता प्रभावात् पद्मनाभस्य शाश्वती च नृणां कृता

daityayor medasā channā medinīti tataḥ smṛtā prabhāvāt padmanābhasya śāśvatī ca nṛṇāṃ kṛtā

हिन्दी अर्थ

ननाम प्रतिबन्धेन न चावस्कन्दकर्मणा शकक्‍्य एघ गिरिस्तात देवैरप्यवर्मर्दितुम्। दुर्गयुद्धे क्रम: श्रेयान् रोधयुद्धेन पार्थिवा: भक्तोदकेन्धने: क्षीणा: पात्यन्ते गिरिसंश्रिता: । वयं बहव इत्येवं नाप्येष निपुणो नयः अविज्ञातबलावेतौ श्रूयेत्र देवसम्मितौ

English

²³⁷ _i.e._ the waters will not overflood their banks as in the rainy

अध्याय ४२

श्लोक 34

वराहेण पुनर् भूत्वा मार्कण्डेयस्य पश्यतः विषाणेनाहम् एकेन तोयमध्यात् समुद्धृता

varāheṇa punar bhūtvā mārkaṇḍeyasya paśyataḥ viṣāṇenāham ekena toyamadhyāt samuddhṛtā

हिन्दी अर्थ

कर्मभिस्त्वमरौ विद्यो बालावतिबलान्वितौ। दुष्कराणीह कर्माणि कृतवन्तौ यूदत्तमौ यदि चेन्रिष्क्रमिष्येते दहामानावितो5न्तिके । समेत्य पातयिष्यामस्त्यक्ष्यतो जीवितं तत: “इसके शिखरपर ऊँचे-ऊँचे वृक्ष और काँटेरे हैं; अत: इसपर चढ़ना बहुत कठिन काम है। मेरी तो राय है, बहुत-से काठ और घास-फूस जुटकर इस पर्वतको चारों ओरसे घेर दिया जाय और अभी इसमें आग लगा दी जाय। इसी कार्यमें शीघ्रता करनी चाहिए। दूसरे किसी प्रयत्रसे कुछ होने-जानेवाला नहीं है। क्योंकि क्षत्रिय लोग सुकुमार होते हैं। ये रणभूमिमें बाणोंद्वारा ही युद्ध कर सकते हैं। (पर्वतपर चढ़ना इनके लिये अत्यन्त कठिन है।) इस समय इन्हें दुर्गम पर्वतपर चढ़कर वहाँके पैदल योद्धाओंके साथ युद्ध करनेके कामपर नियुक्त किया गया है (जो इनके लिये दुष्कर है)। तात! केवल घेरा डालनेसे या ऊपर

English

²³⁷ _i.e._ the waters will not overflood their banks as in the rainy

अध्याय ४२

श्लोक 35

हृताहं क्रमता भूयस् तदा युष्माकम् अग्रतः बलेः सकाशाद् दैत्यस्य विष्णुना प्रभविष्णुना

hṛtāhaṃ kramatā bhūyas tadā yuṣmākam agrataḥ baleḥ sakāśād daityasya viṣṇunā prabhaviṣṇunā

हिन्दी अर्थ

चढ़ जानेसे देवता भी इस पर्वतका मर्दन नहीं कर सकते। राजाओ। दुर्गयुद्धमें रोधयुद्ध (घेरा डालने)- के द्वारा जो लड़ाईका क्रम चालू किया जाता है, वह श्रेयस्कर होता है (क्योंकि दुर्गकी खाद्यसामग्री समाप्त होनेपर वहाँके निवासियोंका पतन अवश्यम्भावी है; परन्तु यहाँ पर्वतनिवासियोंके लिये खाने-पीनेकी सामग्री सदा सुलभ है)। अन्न, जल और लकड़ीकी कमी हो जाय तभी पर्वतवासी योद्धाओंको धराशायी किया जा सकता है। हमारी संख्या बहुत है और विपक्षियोंकी कम--ऐसा सोचना भी निपुण नीतिका परिचायक नहीं है॥४३--४७॥ ये दोनों यदुवंशी भी युद्धेके लिये तैयार खड़े हैं; अतः इनकी अवहेलना नहीं करनी चाहिए। इनके पूरे-पूरे बलका ज्ञान किसीको नहीं है। ये दोनों देवताओंके समान तेजस्वी सुने जाते हैं॥४८॥ अपने कमंसे तो ये अमर जान पढ़ते हैं; क्योंकि बाल्यावस्थामें ही ये अत्यन्त बलशाली हैं।

English

²³⁷ _i.e._ the waters will not overflood their banks as in the rainy

अध्याय ४२

श्लोक 36

सांप्रतं खिद्यमानाहम् एनम् एव गदाधरम् अनाथा जगतो नाथं शरण्यं शरणं गता

sāṃprataṃ khidyamānāham enam eva gadādharam anāthā jagato nāthaṃ śaraṇyaṃ śaraṇaṃ gatā

हिन्दी अर्थ

यदुकुलके इन श्रेष्ठ पुरुषोंने इस जगत्में बड़े-बड़े दुष्कर कर्म किये हैं॥४९॥ अतः सूखे काठों और तिनकोंसे आवेष्टित करके इस उत्तम पर्वतमें हम सब ओरसे आग लगा देंगे। इससे अचेत होकर वे दोनों भस्म हो जायँगे॥५०॥ यदि आगसे जलते हुए वे दोनों हमारे पाससे निकलेंगे तो हम सब लोग मिलकर उन्हें मार गिरायँगे। इस तरह उन दोनोंको अपने जीवनसे हाथ धोना पड़ेगा'॥५१॥ राजाओंके हितकी बात बतानेवाले चेदिराजने जो बात वहाँ कही, वह सेना- सहित समस्त राजाओंको अच्छी लगी ततः काष्ठैस्तृणर्वशै: शुष्कशाख श्व पादपै: । उपादीप्यत शैलेन्द्र: सूर्यपाहैरिवाम्बुदः स वायुदीपितो वह्विरुत्पपात समन्ततः। सधूमज्वालमालाभिर्भाभि: खमिव शोभयन्

English

²³⁷ _i.e._ the waters will not overflood their banks as in the rainy

अध्याय ४२

श्लोक 37

अग्निः सुवर्णस्य गुरुर् गवां सूर्यो गुरुः स्मृतः अक्षत्राणां गुरुः सोमो मम नारायणो गुरुः

agniḥ suvarṇasya gurur gavāṃ sūryo guruḥ smṛtaḥ akṣatrāṇāṃ guruḥ somo mama nārāyaṇo guruḥ

हिन्दी अर्थ

सो5नलः पवनायस्त: काष्ठसंचयमूलवान्। ददाह शैलं श्रीमन्तं गोमन्तं कान्तपादपम् शतशः शतधा भूत्वा महोल्काकारदर्शना: प्रत॒प्तो दह्ममानस्तु स शैल: कृष्णवर्त्मना। रीतीर्निर्वर्तवगामास काझ्जनाउनराजती: वह्निना चापि दीप्ताड़ो गिरिनातिविराजते। धूमान्धकारोर्ध्व॑तनुर्मजमान इवाम्बुद:

English

²³⁷ _i.e._ the waters will not overflood their banks as in the rainy

अध्याय ४२

श्लोक 38

यद् अहं धारयाम्य् एका जगत्स्थावरजंगमम् मया धृतं धारयते सर्वम् एतद् गदाधरः

yad ahaṃ dhārayāmy ekā jagatsthāvarajaṃgamam mayā dhṛtaṃ dhārayate sarvam etad gadādharaḥ

हिन्दी अर्थ

विश्लिषप्टोपलसंघात: कर्कशाडुगरवर्षण:। गिरिर्भात्यनलोद्गारैरुल्कावृष्टिरिवाम्बुद: श्वसन्तः पृथुमूर्धानो निश्चेरुशिवेक्षणा: तदनन्तर उन्होंने काठ-कबाड़, घास-फूस और सूखी डालवाले वृक्ष लाकर उनके द्वारा उस गिरिराज गोमन्तमें आग लगा दी। उस समय आगकी ज्वालाओंसे घिरा हुआ वह पर्वत सूर्यकी किरणोंसे आवृत मेघके समान प्रतीत होता था॥५३॥ इसके बाद शीधघ्रतापूर्वक पैर बढ़ाते हुए राजाओंने जहाँ जैसा हवाका रुख था, उसके अनुसार तुरंत ही पर्वतके चारों ओर वह आग फैला दी॥५४॥ वायुसे प्रज्बलित हुई आग वहाँ सब ओरसे ऊपरको उठने लगी और धूमयुक्त ज्वालामालाओंकी प्रभासे आकाशकौ शोभा-सी बढ़ाने लगी॥ ५५॥ सूखे काठोंके ढेर ही जिसकी जड़ थे, वह आग वायुके सहारेसे बढ़कर कमनीय वृक्षोंवाले शोभा-सम्पन्न गोमन्तपर्वतको

English

²³⁷ _i.e._ the waters will not overflood their banks as in the rainy

अध्याय ४२

श्लोक 39

जामदग्न्येन रामेण भारावतरणेप्सया रोषात् त्रिःसप्तकृत्वो ऽहं क्षत्रियैर् विप्रयोजिता

jāmadagnyena rāmeṇa bhārāvataraṇepsayā roṣāt triḥsaptakṛtvo 'haṃ kṣatriyair viprayojitā

हिन्दी अर्थ

चारों ओरसे दग्ध करने लगी॥ ५६॥ उस आगसे दग्ध होता हुआ गिरिराज गोमन्त बड़ी-बड़ी शिलाएँ छोड़ने लगा (अग्निके तापसे चटककर प्रस्तरखण्ड टूट-टूटकर गिरने लगे), वे सैकड़ों शिलाएँ सौ-सौ टूक होकर गिरते समय बड़ी-बड़ी उल्काओंके समान दिखायी देती थीं लपटोंसे ऊपरको उठती हुई वह आग उस पर्वतराजको सब ओरससे प्रभाओंद्वारा विधिपूर्वक लीपती-सी प्रतीत होती थी, ठीक उसी तरह जैसे सूर्यदेव अपनी किरणोंद्वारा मेघोंको अनुलिप्त कर देते हैं ॥ ५८ ॥ पकती हुई धातुओं, जलते हुए वृक्षों तथा घबड़ाये हुए हिंसक जन्तुओंसे युक्त वह पर्वतराज ऐसा जान पड़ता था, मानो व्यथासे पीड़ित होकर रो रहा हो॥ ५९॥ आगसे दग्ध होकर तपा हुआ वह पर्वत सोने, चाँदी तथा काले रंगकी धातुओंके पिघले

English

²³⁷ _i.e._ the waters will not overflood their banks as in the rainy

अध्याय ४२

श्लोक 40

सास्मि वेद्याम् समारोप्य तर्पिता नृपशोणितैः भार्गवेण पितुः श्राद्धे कश्यपाय निवेदिता

sāsmi vedyām samāropya tarpitā nṛpaśoṇitaiḥ bhārgaveṇa pituḥ śrāddhe kaśyapāya niveditā

हिन्दी अर्थ

हुए रसोंकी धारा बहाने लगा॥६०॥ यद्यपि अग्निसे उसका सारा अड़ उद्धासित हो उठा था तो भी उसके ऊपरी भागमें धुएँका अन्धकार छा रहा था, इसलिये उस पर्वतकी अधिक शोभा नहीं हो रही थी। वह समुद्रमें डूबते हुए मेघके समान जान पड़ता था॥६१॥ उसके प्रस्तरसमूह अलग हो-होकर गिर रहे थे। उससे कड़े अक्लरोंकी वर्षा हो रही थी। उस समय आग उगलनेके कारण वह पर्वत उल्काओंकी वर्षा करनेवाले मेघके समान प्रतीत होता था॥६२॥ उसके झरनोंके स्रोत सूख गये, मध्यभागमें धुआँ फैल गया। उस अबस्थामें वह पर्वत प्रलयाग्निसे दग्ध होकर भस्म हुआ-सा जान पड़ता था॥ ६३ ॥ उसके पार्श्रभागोंसे घबराये हुए सर्प निकलने लगे। उनके आधे शरीर जल गये थे। उनकी आँखोंसे क्रूरता टपक रही थी तथा वे अपने फैले हुए मस्तकों (फनों)-से फुल्ढटार मार रहे थे व्यज्यमानो महासानुर्विहगैः श्वापहैरपि। गिरिवैकल्यमायाति प्रागल्भ्यात्कृष्णवर्त्मन:

English

²³⁷ _i.e._ the waters will not overflood their banks as in the rainy

अध्याय ४२

श्लोक 41

मांसमेदोस्थिदुर्गन्धा दिग्धा क्षत्रियशोणितैः रजस्वलेव युवतिः कश्यपं समुपस्थिता

māṃsamedosthidurgandhā digdhā kṣatriyaśoṇitaiḥ rajasvaleva yuvatiḥ kaśyapaṃ samupasthitā

हिन्दी अर्थ

अर्धक्रोशमपक्रान्ता:पावकेनाभितापिता: सरोष॑ं हि तदा रामो वचन केशिसूदनम्। बभाषे पद्मापत्राक्षं स साक्षान्मधुसूदनम् आवयो:ः कृष्ण वैरेण बलिभिर्वसुधाधिपै: पश्य कृष्णानलौष्णानां सधूमानां समन्ततः। बनाना विरसन्तीव नगाभ्याशे द्विपोत्तमा:

English

²³⁷ _i.e._ the waters will not overflood their banks as in the rainy

अध्याय ४२

श्लोक 42

स मां ब्रह्मर्षिर् अप्य् आह किम् उर्वि त्वम् अवाङ्मुखी वीरपत्नीव्रतम् इदं वीरपत्नि निषेवसे

sa māṃ brahmarṣir apy āha kim urvi tvam avāṅmukhī vīrapatnīvratam idaṃ vīrapatni niṣevase

हिन्दी अर्थ

अयशस्यमिदं लोके कौलीनं च भविष्यति तदस्यानृण्यहेतोहिं, नगस्यथ नगसंनिभ। क्षत्रियात्रिहनिष्यामो दोर्भ्यामेव युधां वर आगसे झुलसे हुए सिंह और व्याप्र भयसे उद्विग्न हो बार-बार उछलकर आकाशसे नीचे मुँह किये गिरते और आर्तनाद करते थे॥ ६५॥ वहाँके वृक्ष दग्ध होनेके कारण अपने भीतरके रसको पानीके रूपमें बहाने लगे॥ ६६ ॥ ऊपरको उठनेवाली वायु भस्म और अड्जारोंसे अत्यन्त पिंगलवर्णकी होकर बहने लगी और आकाशमें धूमकी छाया घुमड़कर घिरी हुई मेघोंकी घटाके समान उसे छोड़कर भाग रहे थे। वह महान् शिखरवाला पर्वत अधिक आग बढ़ जानेके कारण व्याकुल-सा हो उठा था॥ ६८॥ बड़ी-बड़ी चञ्जलल शिलाओंके ढेरसे युक्त वह पर्वत आगसे तपकर अपनी शिलाओंको इस प्रकार

English

²³⁷ _i.e._ the waters will not overflood their banks as in the rainy

अध्याय ४२

श्लोक 43

साहं विज्ञापितवती कश्यपं लोकभावनम् पतयो मे हता ब्रह्मन् भार्गवेण महात्मना

sāhaṃ vijñāpitavatī kaśyapaṃ lokabhāvanam patayo me hatā brahman bhārgaveṇa mahātmanā

हिन्दी अर्थ

छोड़ रहा था, मानो इन्द्रके वज़से विदीर्ण होकर बिखरा जा रहा हो॥ ६९॥ उस पर्वतराजमें आग लगाकर व्यूहके आकारमें सुसज्जित होकर खड़े हुए क्षत्रिय उस प्रचण्ड पावकसे सनन्‍्तप्त हो आधा कोस पीछे हट गये वह पर्वतोंमें श्रेष्ठ गोमन्त नष्ट होते हुए महान् वृक्षोंके साथ जब इस प्रकार दग्ध होने लगा, धूमभारसे उसकी ओर देखना असम्भव हो गया और उसका मूलभाग शिथिल होने लगा, तब बलरामजीने केशी और मधुनामक हैत्योंका संहार करनेवाले साक्षात् विष्णुस्वरूप कमलनयन श्रीकृष्णसे रोषपूर्वक कहा-- ॥ ७१-७२ ॥ 'तात! श्रीकृष्ण ! हमलोगोंसे वैर हो जानेके कारण इन बलवान भूपतियोंद्वारा छोटे-बड़े शिखरों और वृक्षोंसहित यह पर्वत जलाया जा रहा है॥७३॥ श्रीकृष्ण! देखो, चारों ओर आगसे तपे और धुएँसे भरे इन जंगलोंके वृक्षोंके निकट ये उत्तम हाथी करुण-क्रन्दन-सा कर रहे हैं॥ ७४॥ तात ! यदि हम दोनोंके लिये गोमन्त जला दिया जायगा तो

English

²³⁷ _i.e._ the waters will not overflood their banks as in the rainy

अध्याय ४२

श्लोक 44

साहं विहीना विक्रान्तैः क्षत्रियैः शस्त्रवृत्तिभिः विधवा शून्यनगरा न धारयितुम् उत्सहे

sāhaṃ vihīnā vikrāntaiḥ kṣatriyaiḥ śastravṛttibhiḥ vidhavā śūnyanagarā na dhārayitum utsahe

हिन्दी अर्थ

यह संसारमें हमारे लिये महान् अपयश और कलड्ढकी बात होगी॥७५॥ अतः योढ्ठाओंमें श्रेष्ठ तथा युद्धमें पर्वतके समान अविचल रहनेवाले श्रीकृष्ण! इस गोमन्त- पर्वतसे उऋण होनेके लिये हमलोग अपनी भुजाओंसे ही इन क्षत्रियोंको मार डालेंगे॥७६॥ तात! ये सारे क्षत्रिय इस पर्वतको जलाकर कवच आदिसे सुसज्जित हो रथपर बैठकर यथास्थान युद्ध करनेके लिये उत्सुक दिखायी देते हैं॥ ७७ ॥ ऐसा कहकर मेरुपर्वतके शिखरसे नीचे उतरनेवाले चन्द्रमाके समान कान्तिमान् वनमालाधारी नवयुवक बलराम गोमन्तपर्वतकी चोटीसे कूद पड़े कादम्बरीमदक्षीबो नीलवासा: सितानन:। स शारदेन्दुसंकाशो वनमालाझ्जचितोदरः कान्तैककुण्डलधरश्रारुमौलिरवाडमुख: । निपपात नरेन्‍्द्राणां मध्ये केशवपूर्वज:

English

²³⁷ _i.e._ the waters will not overflood their banks as in the rainy

अध्याय ४२

श्लोक 45

तन् मह्यं दीयतां भर्ता भगवंस् त्वत्समो नृपः रक्षेत् सग्रामनगरां यो मां सागरमालिनीम्

tan mahyaṃ dīyatāṃ bhartā bhagavaṃs tvatsamo nṛpaḥ rakṣet sagrāmanagarāṃ yo māṃ sāgaramālinīm

हिन्दी अर्थ

अवलसप्लुते ततो रामे कृष्ण: कृष्णाम्बुदोपम: । सतेन वारिणा वहिस्तत्क्षणात् प्रशमं ययौ कल्पान्ते वारिधाराभिमेंघजालैरिवांशुमान् । सिंहारसितनिर्घोष: पीतवासा घनाकृतिः रामादनन्तरं कृष्ण: प्लुतो वै वीर्यवांस्ततः । ताभ्यामेव प्लुताभ्यां च चरणैः पीडितो गिरि:

English

²³⁷ _i.e._ the waters will not overflood their banks as in the rainy

अध्याय ४२

श्लोक 46

स श्रुत्वा भगवान् वाक्यं बाढम् इत्य् अब्रवीत् प्रभुः ततो मां मानवेन्द्राय मनवे संप्रयच्छत

sa śrutvā bhagavān vākyaṃ bāḍham ity abravīt prabhuḥ tato māṃ mānavendrāya manave saṃprayacchata

हिन्दी अर्थ

उस समय वे कादम्बरी (सुधा या मधु)-के मदसे कुछ मत्त-से हो रहे थे। उनके शरीरपर नील वस्त्र शोभा पाता था। उनका मुख गौरवर्णका था। वे शरत्कालके चन्द्रमाकी भाँति उज्वल प्रभासे उद्धासित हो रहे थे। उनका उदरभाग वनमालासे अलंकृत था॥ ७९॥ उन्होंने एक कानमें कमनीय कुण्डल धारण कर रखा था तथा उनके मस्तकपर मनोहर मुकुट शोभा दे रहा था। श्रीकृष्णके बड़े भाई बलराम नीचे मुँह किये राजाओंके बीचमें ही कूद पड़े ॥ ८० ॥ बलरामजीके कूदनेके पश्चात् काले मेघके समान श्याम कान्तिमान् और अमित पराक्रमी श्रीमान् कृष्ण भी गोमन्तशिखरसे कूद पड़े ॥ ८१॥ कूदते समय श्रीहरिने उस श्रेष्ठ पर्वतको अपने दोनों पैरोंसे दबाया। उनके द्वारा दबाव पड़नेपर वह पर्वत चारों ओरसे जलमग्न-सा हो गया। उसका एक-एक पत्थर जलसे नहा उठा और मदकी बूँदे टपकानेवाले हाथीके समान जलका स्रोत बहाने लगा। उस जलसे वहाँकी सारी आग तत्काल बुझ गयी। मानो प्रलयकालमें मेघसमूहोंद्वारा बरसायी हुई वारिधाराओंसे अंशुमाली

English

²³⁷ _i.e._ the waters will not overflood their banks as in the rainy

अध्याय ४२

श्लोक 47

सा मनुप्रभवं पुण्यं प्राप्येक्ष्वाकुकुलं महत् विपुलेनास्मि कालेन पार्थिवात् पार्थिवं गता

sā manuprabhavaṃ puṇyaṃ prāpyekṣvākukulaṃ mahat vipulenāsmi kālena pārthivāt pārthivaṃ gatā

हिन्दी अर्थ

विग्रह कमलनयन श्रीकृष्ण सिंहके समान दहाड़ रहे थे। उनके मस्तकपर दिव्य किरीट शोभा पा रहा था और मुख बड़ा ही सौम्य दिखायी देता था। उनके वक्ष:स्थलपर श्रीवत्सका चिह्न सुशोभित था। मुख बहुत ही सुन्दर था और अड्ोंकी कान्ति देवराज इन्द्रके समान प्रकाशित हो रही थी। बलरामजीके बाद पराक्रमी श्रीकृष्ण भी वहीं (राजाओंके बीचमें ही) कूद पड़े थे। उन दोनों भाइयोंके कूदनेसे उनके चरणोंका दबाव पाकर वह पर्वत जलके स्रोत बहाने लगा था, जो उस भयानक अग्निको बुझानेमें सहायक हुआ। पर्वतसे जलके स्रोत निकलते देखकर राजाओंके मनमें भय समा गया॥ ८२--८७॥ इति श्रीमहाभारते खिलभागे हरिवंशे विष्णुपर्वणि गोमन्तदाहे द्विचत्वारिंशो5ध्याय:

English

²³⁷ _i.e._ the waters will not overflood their banks as in the rainy

अध्याय ४२

श्लोक 48

एवं दत्तास्मि मनवे मानवेन्द्राय धीमते भुक्ता राजकुलैश् चापि महर्षिकुलसंमितैः

evaṃ dattāsmi manave mānavendrāya dhīmate bhuktā rājakulaiś cāpi maharṣikulasaṃmitaiḥ

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार श्रीमहाभारतके खिलभागय हरिवंशके अन्तर्गत विष्णुपर्वमें ग्रेमन्‍्त-पर्वतका दाहविषयक बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ श्रीकृष्ठ और बलरामका जरासंध और उसकी सेनाओंके साथ युद्ध, राजा दरदकी मृत्यु, जगसंधका पराजित होकर पलायन तथा चेदिराज दमघोषके साथ श्रीकृष्ण और बलरामका करवीरपुरमें जाना तौ नगादाप्लुतौ दृष्ठा वसुदेवसुतावुभौ। क्षुब्धं नरवरानीकं सर्व सम्मूढवाहनम् मकराविव संरब्धौ समुद्रक्षोभगावुभौ

English

²³⁷ _i.e._ the waters will not overflood their banks as in the rainy

अध्याय ४२

श्लोक 49

बहवः क्षत्रियाः शूरा मां जित्वा दिवम् आश्रिताः ते स्म कालवशं प्राप्य मय्य् एव प्रलयं गताः

bahavaḥ kṣatriyāḥ śūrā māṃ jitvā divam āśritāḥ te sma kālavaśaṃ prāpya mayy eva pralayaṃ gatāḥ

हिन्दी अर्थ

आयुधानां पुराणानामादानकृतलक्षणा मध्ये राजसहस्त्रस्य समर प्रतिकाड्तक्षिणो: क्रव्याहैरनुयातानि मूर्तिमन्ति बृहन्ति च। चक्र सुदर्शन नाम गदां कौमोदकीं तथा

English

²³⁷ _i.e._ the waters will not overflood their banks as in the rainy

अध्याय ४२

श्लोक 50

मत्कृते विग्रहा लोके वृत्ते वर्तन्त एव च क्षत्रियाणां बलवतां संग्रामेष्व् अनिवर्तिनाम्

matkṛte vigrahā loke vṛtte vartanta eva ca kṣatriyāṇāṃ balavatāṃ saṃgrāmeṣv anivartinām

हिन्दी अर्थ

चत्वार्येतानि तेजांसि विष्णुप्रहरणानि वै। ताभ्यां समवतीर्णानि यादवाभ्यां महामृथे सौनन्दं नाम बलवान् निरानन्दकर द्विषाम् वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय ! वसुदेवके उन दोनों पुत्रोंको पर्वतसे कूदकर आया देख उन नरेशोंकी सारी सेनामें हलचल मच गयी। उसके वाहनोंपर मोह छा गया॥ १॥ रोषमें भरे हुए वे दोनों यदुवंशी वीर अपनी भुजाओंसे ही आयुधका काम लेते हुए उस विशाल सेनामें विचरने लगे, जैसे दो महान् मगर समुद्रको विक्षुब्ध करते हुए उसके भीतर घूम रहे हों समराज्गणमें प्रविष्ट होनेपर उन दोनों यादवोंके मनमें अपने पुराने आयुधोंको ग्रहण करनेका विचार हुआ

English

²³⁷ _i.e._ the waters will not overflood their banks as in the rainy

अध्याय ४२

श्लोक 51

एतद् युष्मत्प्रवृत्तेन दैवेन परिणामिता जगद्धितार्थं कुरुत राज्ञां हेतुं रणक्षये

etad yuṣmatpravṛttena daivena pariṇāmitā jagaddhitārthaṃ kuruta rājñāṃ hetuṃ raṇakṣaye

हिन्दी अर्थ

फिर तो सहस््रों राजाओंके बीचमें युद्धकी आकाड्क्षा रखने तथा समरमें शोभा पानेवाले उन दोनों महात्माओंके हाथमें आकाशसे वे ही अस्त्र-शस्त्र आ गये, जो मथुराके युद्धमें उन दोनोंको प्राप्त हुए थे। उस युद्धसम्बन्धी विप्लवके समय वे ही प्रज्वलित अग्निके तुल्य तेजस्वी, दीप्तिमान् तथा शत्रुओंको चाट जानेवाले दिव्यास्त्र आकाशसे आ पड़े। जिन्हें वे यादव-वीर मथुरामें ही (आकाशमें) फेंककर चले गये थे, उन यदुवंशी वीरोंको पुनः उन दिव्यास्त्रोंकी प्राप्ति हो गयी ॥ ४--६ ॥ उन अस्त्रोंके पीछे अस्त्र मूर्तिमानू होकर उस युद्धमें समस्त राजाओंके रक्त-मांसका उपभोग करनेके लिये मानो भूखे-प्यासे थे॥७॥ उन सबने दिव्य पुष्पोंकी मालाएँ धारण की थीं। वे अपनी प्रभासे प्रकाशित होकर दसों दिशाओंको

English

²³⁷ _i.e._ the waters will not overflood their banks as in the rainy

अध्याय ४२

श्लोक 52

यद्य् अस्ति मयि कारुण्यं भारशैथिल्यकारणात् एकश् चक्रधरः श्रीमान् अभयं मे प्रयच्छतु

yady asti mayi kāruṇyaṃ bhāraśaithilyakāraṇāt ekaś cakradharaḥ śrīmān abhayaṃ me prayacchatu

हिन्दी अर्थ

सुशोभित करते थे और आकाशबचारी प्राणियोंको भी भयभीत कर देते थे॥ ८ ॥ सांवर्तक हल, सौनन्द मूसल, सुदर्शन चक्र और कौमोदकी गदा-भगवान् विष्णुके ये चार तेजस्वी अस्त्र-शस्त्र उस महासमरमें उन दोनों यादव-वीरोंके लिये उतरे थे॥ ९-१० ॥ पहले बलरामजीने रणभूमिमें सुन्दर आकृतिवाले सर्पराजके समान सर्पणशील तथा दिव्यमालाओंसे अलंकृत हलको अपने दायें हाथमें वीरने बायें हाथसे सौनन्द नामक उत्तम मूसलको ग्रहण किया, जो शत्रुओंको आनन्दशून्य कर देनेवाला था दर्शनीयं च लोकेषु चक्रमादित्यवर्चसम् । नाप्ना सुदर्शन नाम प्रीतो जग्राह केशवः दर्शनीयं च लोकेषु धनुर्जलदनिःस्वनम्। नाम्ना शार्ड्रमिति ख्यातं प्रीतो जग्राह वीर्यवान्॥

English

²³⁷ _i.e._ the waters will not overflood their banks as in the rainy

अध्याय ४२

श्लोक 53

यम् अहं भारसंतप्ता संप्राप्ता शरणैषिणी भारो यद्य् अवरोप्तव्यो विष्णुर् एष ब्रवीतु माम्

yam ahaṃ bhārasaṃtaptā saṃprāptā śaraṇaiṣiṇī bhāro yady avaroptavyo viṣṇur eṣa bravītu mām

हिन्दी अर्थ

देवैर्निंगदितार्थस्य गदा तस्यापरे करे। निषक्ता कुमुदाक्षस्य नाम्ना कौोमोदकीति सा तौ सप्रहरणौ बीरौ साक्षाद्विष्णुतनूपमौ। समेरे रामगोविन्दौ रिपूंस्तान् प्रत्ययुद्धयताम् समरे5प्रतिरूपौ तौ विष्णुरेको द्विधा कृतः। द्विषत्सु प्रतिकुर्वाणौ पराक्रान्तौ यथेश्वरौ हलमुद्यम्य रामस्तु सर्पेन्द्रमिव कोपनम्। चचार समरे वीरो द्विषतामन्तकोपमः

English

²³⁷ _i.e._ the waters will not overflood their banks as in the rainy

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_harivaMza.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Harivamsha Purana — Chapter 42
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

Numbering follows the imported source and may differ from other editions.