Kena Upanishad· Kenopaniṣad
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अध्याय 2 / 4

Khaṇḍa 2 — The Paradox of Knowing

द्वितीय खण्ड

5 श्लोकWhatsApp

पूर्ण अध्याय पाठ5 श्लोक

अध्याय २

श्लोक 1

यदि मन्यसे सुवेदेति दहरमेवापि नूनं त्वं वेत्थ ब्रह्मणो रूपम् ।यदस्य त्वं यदस्य देवेष्वथ नु मीमांस्यमेव ते मन्ये विदितम्

yadi manyase suvedeti daharamevāpi nūnaṃ tvaṃ vettha brahmaṇo rūpam | yadasya tvaṃ yadasya deveṣvatha nu mīmāṃsyameva te manye viditam

हिन्दी अर्थ

(आचार्य कहता है:) यदि तू सोचता है कि मैं ब्रह्म को अच्छी तरह जानता हूँ, तो वास्तव में तू उसके स्वरूप का अल्प भाग ही जानता है — चाहे अपने में, चाहे देवों में। अतः तुझे और विचार करना चाहिए। (शिष्य:) मैं समझता हूँ कि मैंने जान लिया।

English

(Teacher to student:) If you think you know Brahman well, in truth you know only a fragment of its form, whether of it in yourself or in the gods. Therefore Brahman is still to be inquired into by you. (Student:) I think I know it.

अध्याय २

श्लोक 2

नाहं मन्ये सुवेदेति नो न वेदेति वेद च ।यो नस्तद्वेद तद्वेद नो न वेदेति वेद च

nāhaṃ manye suvedeti no na vedeti veda ca | yo nastadveda tadveda no na vedeti veda ca

हिन्दी अर्थ

(शिष्य, परिपक्व होकर:) मैं यह नहीं मानता कि मैंने उसे अच्छी तरह जान लिया, न ही यह कि मैं नहीं जानता। हममें से जो उसे जानता है, वह उसे जानता है, और यह भी जानता है कि वह "नहीं जानता" — ऐसा भी नहीं है।

English

(The student, matured:) I do not think I know it well; nor do I think I do not know it. He among us who knows it, knows it — and knows that he does not "not-know" it.

अध्याय २

श्लोक 3

यस्यामतं तस्य मतं मतं यस्य न वेद सः ।अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम्

yasyāmataṃ tasya mataṃ mataṃ yasya na veda saḥ | avijñātaṃ vijānatāṃ vijñātamavijānatām

हिन्दी अर्थ

जिसे लगता है कि मैंने नहीं जाना, उसने जान लिया है। जिसे लगता है कि मैंने जान लिया, उसने नहीं जाना। ज्ञानियों के लिए वह अज्ञात है; अज्ञानियों के लिए वह ज्ञात है।

English

He who thinks he does not know — knows. He who thinks he knows — does not know. It is unknown to those who know, and known to those who do not know.

अध्याय २

श्लोक 4

प्रतिबोधविदितं मतममृतत्वं हि विन्दते ।आत्मना विन्दते वीर्यं विद्यया विन्दतेऽमृतम्

pratibodhaviditaṃ matamamṛtatvaṃ hi vindate | ātmanā vindate vīryaṃ vidyayā vindate'mṛtam

हिन्दी अर्थ

वह प्रतिबोध (हर बोध-क्षण) में जाना जाता है; वही ज्ञान अमरत्व देता है। आत्मा से ही बल मिलता है, विद्या से अमृत मिलता है।

English

It is known in every act of awareness — and that knowing is immortality. By the Self one finds strength; by knowledge one finds the immortal.

अध्याय २

श्लोक 5

इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति न चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः ।भूतेषु भूतेषु विचित्य धीराः प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति

iha cedavedīdatha satyamasti na cedihāvedīnmahatī vinaṣṭiḥ | bhūteṣu bhūteṣu vicitya dhīrāḥ pretyāsmāllokādamṛtā bhavanti

हिन्दी अर्थ

यदि इस लोक में जान लिया, तब सत्य है; यदि यहाँ न जान सका, तो बड़ी हानि है। धीर पुरुष प्रत्येक प्राणी में इसे देखकर, इस लोक से जाकर अमर हो जाते हैं।

English

If one has realized it here, there is truth; if one has not realized it here, great is the loss. The wise, seeing it in being after being, depart from this world and become immortal.

स्रोत: https://sanskritdocuments.org/doc_upanishhat/ · प्राप्त 2/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Kena Upanishad — Chapter 2
संस्कृत संस्करण:Samaveda Talavakara Brahmana Section

Pada Bhashya and Vakya Bhashya editions, Gita Press.

पुरालेखागार / स्रोत:SanskritDocuments / Muktabodha
गणना पद्धति:

4 Khandas (35 verses). Khandas 1–2 in verse; Khandas 3–4 in prose allegory (Yakshakhyana).