Kurma Purana· Kūrma Purāṇa
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अध्याय 22 / 95

Book 1 - Adhyaya 22

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अध्याय २२

श्लोक 1

इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्त्र्यां संहितायां पूर्वविभागे एकविशो ऽध्यायः सूत उवाच जयध्वजस्य पुत्रो ऽभूत् तालाजङ्घ इति स्मृतः ।शतपुत्रास्तु तस्यासन् तालजङ्घाः प्रकीर्तिताः

iti śrīkūrmapurāṇe ṣaṭsāhastryāṃ saṃhitāyāṃ pūrvavibhāge ekaviśo 'dhyāyaḥ sūta uvāca jayadhvajasya putro 'bhūt tālājaṅgha iti smṛtaḥ / śataputrāstu tasyāsan tālajaṅghāḥ prakīrtitāḥ

हिन्दी अर्थ

ततो गच्छामि देवस्य वाराणसीं महापुरीम् अस्मिन् कलियुगे घोरे लोकाः पापानुवर्तिनः । भविष्यन्ति महापापा वर्णाश्रमविवर्जिताः

English

That Rudra, who is the Fire-god, the soul of all, who is infinite, who is self-born, and who has faces all round is wor¬ shipped by means of severe penance and not through other sacrifices.

अध्याय २२

श्लोक 2

तेषां ज्येष्ठो महावीर्यो वीतिहोत्रो ऽभवन्नृपः ।वृषप्रभृतयश्चान्ये यादवाः पुण्यकर्मिणः

teṣāṃ jyeṣṭho mahāvīryo vītihotro 'bhavannṛpaḥ / vṛṣaprabhṛtayaścānye yādavāḥ puṇyakarmiṇaḥ

हिन्दी अर्थ

सर्वपापप्रशमनं प्रायश्चित्तं कलौ युगे भविष्यन्ति महात्मानो धार्मिकाः सत्यवादिनः

English

That eternal Vasudeva, the lord who is worshipped by means of Tajnas and whose form is constituted of all deities, is the Supreme Lord; he should be worshipped.

अध्याय २२

श्लोक 3

वृषो वंशकरस्तेषां तस्य पुत्रो ऽभवन्मधुः ।मधोः पुत्रशतं त्वासीद् वृषणस्तस्य वंशभाक्

vṛṣo vaṃśakarasteṣāṃ tasya putro 'bhavanmadhuḥ / madhoḥ putraśataṃ tvāsīd vṛṣaṇastasya vaṃśabhāk

हिन्दी अर्थ

त्वं हि लोकेषु विख्यातो धृतिमाञ् जनवत्सलः । पालयाद्य परं धर्म स्वकीयं मुच्यसे भयात् पृष्टवान् प्रणिपत्यासौ युगधर्मान् द्विजोत्तमाः

English

That great Supreme Ruler from whom all this Universe is born and whose offspring is god Brahma (the progenitor of the world) is worshipped only by taking recourse to austere penance.

अध्याय २२

श्लोक 4

वीतिहोत्रसुतश्चापि विश्रुतो ऽनन्त इत्युत ।दुर्जयस्तस्य पुत्रो ऽबूत् सर्वशास्त्रविशारदः

vītihotrasutaścāpi viśruto 'nanta ityuta / durjayastasya putro 'būt sarvaśāstraviśāradaḥ

हिन्दी अर्थ

तस्मै प्रोवाच सकलं मुनिः सत्यवतीसुतः । प्रणम्य देवमीशानं युगधर्मान् सनातनान् ऋषियोंने कहा--सूतजी ! सत्य, त्रेता, द्वापर तथा कलि--ये चार युग हैं, अब (आप) इनके स्वभावका संक्षेपमें वर्णन कीजिये

English

That eternal Lord of gods, the lord from whom

अध्याय २२

श्लोक 5

तस्य भार्या रूपवती गुणैः सर्वैरलङ्कृता ।पतिव्रतासीत् पतिना स्वधर्मपरिपालिका

tasya bhāryā rūpavatī guṇaiḥ sarvairalaṅkṛtā / pativratāsīt patinā svadharmaparipālikā

हिन्दी अर्थ

सूतजी बोले--नारायण कृष्णके अपने परमधाम चले जानेपर शत्रुओंको पीडा पहुँचानेवाले परम धर्मात्मा पाण्डुपुत्र पार्थ (अर्जुन) और्ध्वहैहिक क्रिया करके महान् शोकसे आवृत हो गये। (उन्होंने) मार्गमें जाते हुए ब्रह्मवादी कृष्णद्वैपायन (व्यास) मुनिको शिष्यों, प्रशिष्योंसे चारों ओरसे घिरे हुए देखा। तब शोकका परित्यागकर अर्जुनने भूमिपर दण्डवत् गिरकर प्रणाम किया और परम प्रीतिसे कहा--महामुने ! प्रभो! आप कहाँसे आ रहे

English

The lord of thousand eye, Sambhu, the cosmic

अध्याय २२

श्लोक 6

स कदाचिन्महाभागः कालिन्दीतीरसंस्थिताम् ।अपश्यदुर्वशीं देवीं गायन्तीं मधुरस्वनाम्

sa kadācinmahābhāgaḥ kālindītīrasaṃsthitām / apaśyadurvaśīṃ devīṃ gāyantīṃ madhurasvanām

हिन्दी अर्थ

हैं और किस देशकी ओर इस समय शीप्रतापूर्वक जा रहे हैं? आपका दर्शन करनेसे ही मेरा महान् शोक दूर हो गया है। कमलपत्रके समान नेत्रवाले (व्यासजी महाराज)! इस समय मेरा जो कर्तव्य हो, उसे आप बतलायें। तब शिष्योंसे घिरे हुए महायोगी कृष्णद्वैपायन मुनिने नदीके किनारे बैठकर स्वयं कहा- ॥ २--७॥

English

To a person who has concluded Vedic study and per¬

अध्याय २२

श्लोक 7

ततः कामाहतमनास्तत्समीपमुपेत्य वै ।प्रोवाच सुचिरं कालं देवि रन्तुं मयार्ऽहसि

tataḥ kāmāhatamanāstatsamīpamupetya vai / provāca suciraṃ kālaṃ devi rantuṃ mayār'hasi

हिन्दी अर्थ

व्यासजी बोले--पाण्डुके पुत्र (अर्जुन) ! यह घोर कलियुग आ गया है। इसलिये मैं भगवान् शंकरकी महापुरी वाराणसी जा रहा हूँ। इस भयंकर कलियुगे लोग पापाचरण करनेवाले, वर्ण तथा आश्रमधर्मसे रहित महान् पापी होंगे। कलियुगमें सभी पापोंका शमन करनेके लिये वाराणसीपुरीके सेवनको छोड़कर अन्य दूसरा कोई प्रायश्चित्त मैं नहीं देखता

English

On hearing these statements that saintly king be¬ came highly delighted in his mind. He bowed to and worshipped them. After bidding farewell to them, he spoke to Tridhanvan.

अध्याय २२

श्लोक 8

सा देवी नृपतिं दृष्ट्वा रूपलावण्यसंयुतम् ।रेमे तेन चिरं कालं कामदेवमिवापरम्

sā devī nṛpatiṃ dṛṣṭvā rūpalāvaṇyasaṃyutam / reme tena ciraṃ kālaṃ kāmadevamivāparam

हिन्दी अर्थ

सत्य, त्रेता तथा द्वापर--इन सभी (युगों)-में मनुष्य महात्मा, धार्मिक तथा सत्यवादी होते हैं। आप संसारमें प्रजावत्सल तथा धृतिमान्के रूपमें विख्यात हैं, अतः अपने परम धर्मका पालन करें, इससे आप भयसे मुक्त हो जायंगे। द्विजोत्तमो! भगवान् (व्यास)-के द्वारा ऐसा कहनेपर शत्रुके पुरको जीतनेवाले पृथा (कुन्ती)-के पुत्र पार्थ (अर्जुन) -ने इन्हें प्रणामकर युगधर्मोको पूछा। सत्यवतीके पुत्र व्यासमुनिने भगवान् शंकरको प्रणामकर

English

"By means of penance I shall propitiate the Lord designated with the single syllable OM, the great Purusa, the vital spirit stationed in the middle of Aditya.

अध्याय २२

श्लोक 9

कालात् प्रबुद्धो राजा तामुर्वशीं प्राह शोभनाम् ।गमिष्यामि पुरीं रम्यां हसन्ती साब्रवीद् वचः

kālāt prabuddho rājā tāmurvaśīṃ prāha śobhanām / gamiṣyāmi purīṃ ramyāṃ hasantī sābravīd vacaḥ

हिन्दी अर्थ

सम्पूर्ण सनातन युगधर्मोको उन्हें बतलाया॥ ११--१४॥ वक्ष्यामि ते समासेन युगधर्मान् नरेश्वर। न शक्यते मया पार्थ विस्तरेणाभिभाषितुम्

English

But you should be devoted to Dharma forever. Eternally vigilant, protect the entire earthly realm consisting of the four castes of people."

अध्याय २२

श्लोक 10

न ह्यनेनोपभोगेन भवता राजसुन्दर ।प्रीतिः संजायते मह्यं स्थातव्यं वत्सरं पुनः

na hyanenopabhogena bhavatā rājasundara / prītiḥ saṃjāyate mahyaṃ sthātavyaṃ vatsaraṃ punaḥ

हिन्दी अर्थ

द्वापरे यज्ञमेवाहुर्दानमेव कलौ युगे ब्रह्मा कृतयुगे देवस्त्रेतायां भगवान् रविः। द्वापरे देवतं विष्णुः कलौ रूद्रो महेश्वरः

English

After saying so, the sinless king entrusted the king¬ dom to the care of his son. In order to perform the excellent penance, he went to the forest.

अध्याय २२

श्लोक 11

तामब्रवीत् स मतिमान् गत्वा शीघ्रतरं पुरीम् ।आगमिष्यामि भूयो ऽत्र तन्मे ऽनुज्ञातुमर्हसि

tāmabravīt sa matimān gatvā śīghrataraṃ purīm / āgamiṣyāmi bhūyo 'tra tanme 'nujñātumarhasi

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मा विष्णुस्तथा सूर्यः सर्व एव कलिष्वपि। पूज्यते भगवान् रुद्रश्चतुर्ष्वपि पिनाकधृक् आद्ये कृतयुगे धर्मश्चतुष्पादः सनातनः।

English

Resorting to the forest of Devadaru {Pinus Devadaru) trees on the beautiful peaks of the Himalaya, he worshipped gods with bulbous and other roots and fmits grown in the forest and subsisted on them.

अध्याय २२

श्लोक 12

तमब्रवीत् सा सुभगा तथा कुरु विशांपते ।नान्ययाप्सरसा तावद् रन्तव्यं भवत् पुनः

tamabravīt sā subhagā tathā kuru viśāṃpate / nānyayāpsarasā tāvad rantavyaṃ bhavat punaḥ

हिन्दी अर्थ

विशोकाः सत्त्वबहुला एकान्तबहुलास्तथा। ध्याननिष्ठास्तपोनिष्ठा महादेवपरायणाः ता वै निष्कामचारिण्यो नित्यं मुदितमानसाः । पर्वतोदधिवासिन्यो ह्यनिकेताः परंतप

English

Shaking off his sins by means of penance, he mentally repeated the Mantra of goddess Savitri, the mother of the Vedas, for a hundred years and more.

अध्याय २२

श्लोक 13

ओमित्युक्त्वा ययौ तूर्णं पुरीं परमशोभनाम् ।गत्वा पतिव्रतां पत्नीं दृष्ट्वा बीतो ऽभवन्नृपः

omityuktvā yayau tūrṇaṃ purīṃ paramaśobhanām / gatvā pativratāṃ patnīṃ dṛṣṭvā bīto 'bhavannṛpaḥ

हिन्दी अर्थ

रसोल्लासा कालयोगात् त्रेताख्ये नश्यते ततः । तस्यां सिद्धौ प्रणष्टायामन्या सिद्धिरवर्तत सकृदेव तया वृष्ट्या संयुक्ते पुथिवीतले। प्रादुरासंस्तदा तासां वृक्षा वै गृहसंज्ञिताः

English

While he was performing penance like this, the self- born lord, the great Isvara, Hiranyagarbha, the Atman of the Universe came to that spot himself

अध्याय २२

श्लोक 14

संप्रेक्ष्य सा गुणवती भार्या तस्य पतिव्रता ।भीतं प्रसन्नया प्राह वाचा पीनपयोधरा

saṃprekṣya sā guṇavatī bhāryā tasya pativratā / bhītaṃ prasannayā prāha vācā pīnapayodharā

हिन्दी अर्थ

व्यासजी बोले- -नरेश्वर ! पार्थ! संक्षेपमें युगधर्मोको तुम्हें बतलाता हूँ, मैं विस्तारसे वर्णन नहीं कर सकता हूँ। पार्थ! विद्वानोंद्ारा पहला कृतयुग कहा गया है, कलियुग कहा गया है। कृतयुगमें ध्यान, त्रेतामें ज्ञान, द्वापरमें यज्ञ तथा कलियुगमें एकमात्र दान ही श्रेष्ठ साधन बताया गया है। कृतयुगमें ब्रह्मा देवता होते हैं, इसी प्रकार त्रेतामें भगवान् सूर्य, द्वापरमें देवता विष्णु और

English

On seeing Lord Brahma with faces all round, coming there, the king bowed down his head at his feet and glorified his name.

अध्याय २२

श्लोक 15

स्वामिन् किमत्र भवतो भीतिरद्य प्रवर्तते ।तद् ब्रूहि मे यथा तत्त्वं न राज्ञां कीर्तये त्विदम्

svāmin kimatra bhavato bhītiradya pravartate / tad brūhi me yathā tattvaṃ na rājñāṃ kīrtaye tvidam

हिन्दी अर्थ

कलियुगमें महेश्वर रुद्र ही मुख्य देवता हैं। ब्रह्मा, विष्णु तथा सूर्यये सभी कलियुगमें पूजित होते हैं, किंतु पिनाकधारी भगवान् रुद्र चारों युगोंमें पूजे जाते हैं। सर्वप्रथम कृतयुगमें सनातनधर्म चार चरणोंवाला था, त्रेतामें तीन चरणोंवाला तथा द्वापरमें दो चरणोंसे स्थित हुआ, किंतु कलियुगमें तीन चरणोंसे रहित होकर केवल सत्तामात्रसे स्थित रहता है॥ १५--२० ॥

English

"Obeisance to you O Brahman, the supreme God, the Supreme Soul, the gold-complexioned creator with a thousand eyes.

अध्याय २२

श्लोक 16

स तस्या वाक्यमाकर्ण्य लज्जावनतचेतनः ।नोवाच किञ्चिन्नृपतिर्ज्ञानदृष्ट्या विवेद सा

sa tasyā vākyamākarṇya lajjāvanatacetanaḥ / novāca kiñcinnṛpatirjñānadṛṣṭyā viveda sā

हिन्दी अर्थ

कृतयुगमें स्त्री-पुरुषके संयोगसे उत्पत्ति होती थी और लोगोंको आजीविका साक्षात् (आनन्द) रससे आनन्दसे तृप्त और भोगसे सम्पन्न रहती थीं। पुरञ्जय! उन प्रजाओंमें उत्तम और अधमका भेद नहीं था, सभी निर्विशेष थे। उस कृतयुगमें प्रजाकी आयु, सुख और रूप समान था। सम्पूर्ण प्रजा शोकसे रहित, सत्त्वगुणके

English

Salutations to the creator and the dispenser of destiny. Hail to you the embodiment of all gods. Obeisance to you, the embodiment of spiritual knowledge, comprehensible through the knowledge and practice of Sarhkhya and Yoga.

अध्याय २२

श्लोक 17

न भेतव्यं त्वया स्वामिन् कार्यं पापविशोधनम् ।भीते त्वयि महाराज राष्ट्रं ते नाशमेष्यति

na bhetavyaṃ tvayā svāmin kāryaṃ pāpaviśodhanam / bhīte tvayi mahārāja rāṣṭraṃ te nāśameṣyati

हिन्दी अर्थ

बाहुल्यसे युक्त, एकान्तप्रेमी, ध्याननिष्ठ, तपोनिष्ठ तथा महादेव शंकरकी भक्त थी। परंतप! वे प्रजाएँ निष्कामकर्म करनेवाली, नित्य प्रसन्न मनवाली और पर्वतों एवं समुद्रके किनारे रहनेवाली थीं, उनका कोई घर नहीं तदनन्तर कालके प्रभावसे त्रेता नामक युगमें (सत्य- युगका) आनन्दोल्लास नष्ट हो जाता है, (कृतयुगकी) उस सिद्धिका लोप होनेपर अन्य सिद्धि प्रवर्तित होती है। मेघमें जलकी कमी होनेपर मेघ और विद्युत्से वृष्टि

English

Obeisance to you, the Trinity, the Creator, the Omniscient One. Hail to the ancient Purusa, the preceptor of the Yogins."

अध्याय २२

श्लोक 18

तदा स राजा द्युतिमान् निर्गत्य तु पुरात् ततः ।गत्वा कण्वाश्रमं पुण्यं दृष्ट्वा तत्र महामुनिम्

tadā sa rājā dyutimān nirgatya tu purāt tataḥ / gatvā kaṇvāśramaṃ puṇyaṃ dṛṣṭvā tatra mahāmunim

हिन्दी अर्थ

उत्पन्न हुई। पृथ्वीतलपर एक बार ही उस वृष्टिका संयोग होनेसे उन प्रजाओंके लिये गृहसंज्ञक वृक्षोंका प्रादुर्भाव हुआ। उन (वृक्षों)-से ही उनके सब कार्य सम्पन्न होने लगे। त्रेतायुगके प्रारम्भमें वह समस्त प्रजा उनसे ही (अपनी जीविकाका) निर्वाह करती थी

English

Then, lord Brahma, the creator of the Universe, be¬ came delighted and said,—"Welfare unto you. Choose the boon. I am the granter of boons."

अध्याय २२

श्लोक 19

निशम्य कण्ववदनात् प्रायश्चित्तविधिं शुभम् ।जगाम हिमवत्पृष्ठं समुद्दिश्य महाबलः

niśamya kaṇvavadanāt prāyaścittavidhiṃ śubham / jagāma himavatpṛṣṭhaṃ samuddiśya mahābalaḥ

हिन्दी अर्थ

सत्ययुगमें स्वयं मेघ जलमय होते थे। उनमें इतनी जलकी प्रचुरता होती थी कि किसी अन्यके सहयोगके बिना ही वे वृष्टि करते थे। पर त्रेतायुगमें मेघोंकी जलमयता प्रतिहत हो गयी। फलतः विद्युत्के सहयोगसे ही मेघ वृष्टि कर पाते थे। ततः कालेन महता तासामेव विपर्ययात्। रागलोभात्मको भावस्तदा ह्याकस्मिकोऽभवत्

English

"O lord of the lords of Devas, I wish to perform the Japa of Gayatri, the mother of the Vedas, once again. May

अध्याय २२

श्लोक 20

सो ऽपश्यत् पथि राजेन्द्रो गन्धर्ववरमुत्तमम् ।भ्राजमानं श्रिया व्योम्नि भूषितं दिव्यमालया

so 'paśyat pathi rājendro gandharvavaramuttamam / bhrājamānaṃ śriyā vyomni bhūṣitaṃ divyamālayā

हिन्दी अर्थ

विपर्ययेण तासां तु तेन तत्कालभाविना। अमाक्षिकं महावीर्य पुटके पुटके मधु

English

Glancing at the king, the Atman of the Universe (i.e. Brahma) said—"So be it". Stroking him gently with his hands, the delighted Lord vanished there itself.

अध्याय २२

श्लोक 21

वीक्ष्य मालाममित्रघ्नः सस्माराप्सरसां वराम् ।उर्वशीं तां मनश्चक्रे तस्या एवेयमर्हति

vīkṣya mālāmamitraghnaḥ sasmārāpsarasāṃ varām / urvaśīṃ tāṃ manaścakre tasyā eveyamarhati

हिन्दी अर्थ

ततः कालान्तरेणैव पुनर्लोभावृतास्तदा। वृक्षांस्तान् पर्यगृह्णन्त मधु चामाक्षिकं बलात् वार्तायाः साधिका हान्या वृष्ट्रिस्तासां निकामतः

English

The glorious king on securing the boon was much delighted, and he repeated the Japa. He was tranquil. He used to take his holy ablution thrice a day and he subsisted on fruits, roots and bulbous roots.

अध्याय २२

श्लोक 22

सो ऽतीव कामुको राजा गन्धर्वेणाथ तेन हि ।चकार सुमहद् युद्धं मालामादातुमुद्यतः

so 'tīva kāmuko rājā gandharveṇātha tena hi / cakāra sumahad yuddhaṃ mālāmādātumudyataḥ

हिन्दी अर्थ

तासां वृष्ट्यूदकानीह यानि निम्नेर्गतानि तु। अवहन् वृष्टिसंतत्या स्त्रोतः स्थानानि निम्नगाः ये पुनस्तदपां स्तोका आपन्नाः पृथिवीतले। अपां भूमेश्च संयोगादोषध्यस्तास्तदाभवन्

English

When hundred years were completed, the lord of fierce-rays (the Sun-god), the great Yogin, appeared in front of him from the middle of the Solar sphere.

अध्याय २२

श्लोक 23

विजित्य समरे मालां गृहीत्वा दुर्जयो द्विजाः ।जगाम तामप्सरसं कालिन्दीं द्रष्टुमादरात्

vijitya samare mālāṃ gṛhītvā durjayo dvijāḥ / jagāma tāmapsarasaṃ kālindīṃ draṣṭumādarāt

हिन्दी अर्थ

५ कर्तव्य-पालनमें प्रमाद होनेसे विपर्यय (करने योग्य कर्मका न करना, न करने योग्य कर्मका करना) होता है। यह विपर्यय तदनन्तर बहुत समय व्यतीत होनेपर उन प्रजाओंके ही विपर्ययसे उनमें अचानक ही राग और लोभका भाव उत्पन्न हो गया तदनन्तर उनके उलट-फेर (दिनचर्यामें व्यत्यय)-के कारण उस समयके प्रभाववश वे गृह-

English

On seeing the eternal Lord stationed in the solar sphere, the self-born lord Brahma, the embodiment of the Vedas, he was surprised.

अध्याय २२

श्लोक 24

अदृष्ट्वाप्सरसं तत्र कामबाणाभिपीडितः ।बभ्राम सकलां पृथ्वीं सप्तद्वीपसमन्विताम्

adṛṣṭvāpsarasaṃ tatra kāmabāṇābhipīḍitaḥ / babhrāma sakalāṃ pṛthvīṃ saptadvīpasamanvitām

हिन्दी अर्थ

तब उन (वृक्षों)-के नष्ट हो जानेपर मिथुनधर्मसे उत्पन्न सत्यका ध्यान करनेवाले वे सभी प्रजाजन विभ्रान्त होकर उस पूर्व वर्णित सिद्धिका ध्यान करने लगे। उस समय (सत्यका ध्यान करनेके कारण) उन प्रजाओंके (लुप्त) वे गृह-संज्ञक वृक्ष पुनः प्रादुर्भूत हो गये। वे वस्त्रो, आभूषणों तथा फलोंको उत्पन्न करने लगे। उन प्रजाओंके लिये उन वृक्षोंके प्रत्येक पत्रपुटोंमें गन्ध, वर्ण और रससे समन्वित, बिना मधु-मक्खियोंके

English

With his mind overwhelmed with great emotion and with extremely deep devotion, he bowed down his head and eulogised him with the Savitri Mantra.

अध्याय २२

श्लोक 25

आक्रम्य हिमवत्पार्श्वमुर्वशीदर्शनोत्सुकः ।जगाम शैलप्रवरं हेमकूटमिति श्रुतम्

ākramya himavatpārśvamurvaśīdarśanotsukaḥ / jagāma śailapravaraṃ hemakūṭamiti śrutam

हिन्दी अर्थ

बना हुआ महान् शक्तिशाली मधु उत्पन्न होता था। उसी (मधु)-से त्रेतायुगके आरम्भमें वे प्रजाएँ जीवन-निर्वाह करती थीं। उस सिद्धिके कारण वे सारी प्रजाएँ हृष्ट- पुष्ट तथा ज्वरसे रहित थीं। तदनन्तर कालान्तरमें वे सभी पुनः लोभके वशीभूत हो गये। अब वे उन वृक्षों तथा उनसे उत्पन्न अमाक्षिक (मक्षिकाद्वारा न बनाये हुए) मधुको बलपूर्वक ग्रहण करने लगे॥ ३१--३५॥

English

"Obeisance to you the blue-throated Lord, the brilliant Paramesthin. Salutations to Rudra of the form of the three Vedas {Trayi). Obeisance to the embodiment ofKala, the cause of all."

अध्याय २२

श्लोक 26

तत्र तत्राप्सरोवर्या दृष्ट्वा तं सिंहविक्रमम् ।कामं संदधिरे घोरं भूषितं चित्रमालया

tatra tatrāpsarovaryā dṛṣṭvā taṃ siṃhavikramam / kāmaṃ saṃdadhire ghoraṃ bhūṣitaṃ citramālayā

हिन्दी अर्थ

उनके इस प्रकार पुनः लोभ करनेके कारण उत्पन्न दुष्कर्मसे वे कल्पवृक्ष कहीं-कहीं मधुके साथ ही नष्ट हो गये। तब अत्यन्त शीत, वर्षा एवं धूपसे अत्यधिक दुःखी उन्होंने (शीत-उष्ण आदि) द्वन्द्वोंसे पीडित होते हुए आवरणोंकी रचना की। तब मधुसहित कल्पवृक्षोंके नष्ट हो जानेपर उन्होंने द्वन्द्रोके निराकरणका उपाय विचारकर जीविका-निर्वाहके साधनोंका चिन्तन किया। तदनन्तर त्रेतायुगमें उन प्रजाओंको जीविकाको सिद्ध

English

Then the great lord delighted in his mind, said to the

अध्याय २२

श्लोक 27

संस्मरन्नुर्वशीवाक्यं तस्यां संसक्तमानसः ।न पश्यति स्मताः सर्वागिरिशृङ्गाणिजग्मिवान्

saṃsmarannurvaśīvākyaṃ tasyāṃ saṃsaktamānasaḥ / na paśyati smatāḥ sarvāgiriśṛṅgāṇijagmivān

हिन्दी अर्थ

करनेवाली अन्य सिद्धि पुनः प्रादुर्भूत हुई और उनको इच्छाके अनुकूल वृष्टि हुई निरन्तर वर्षाके कारण जो जल नीचेकी ओर प्रवाहित हुआ, उससे उन (प्रजाओं)-के लिये अनेक स्रोतों तथा नदियोंकी उत्पत्ति हुई। जब पृथ्वीतलपर थोड़ा जल एकत्र हो गया तो भूमि और जलका संयोग होनेसे

English

They are sung about in all the Vedas. They subdue and suppress the worldly existence. O king, with purity make obeisance to me through these.

अध्याय २२

श्लोक 28

तत्राप्यप्सरसं दिव्यामदृष्ट्वा कामपीडितः ।देवलोकं महामेरुं ययौ देवपराक्रमः

tatrāpyapsarasaṃ divyāmadṛṣṭvā kāmapīḍitaḥ / devalokaṃ mahāmeruṃ yayau devaparākramaḥ

हिन्दी अर्थ

अनेक प्रकारकी औषधियाँ उत्पन्न हो गयीं ही परम्परया दुर्दृष्टका कारण होता है। यह दुर्दृष्ट ही राग, द्वेष तथा लोभकी भावना उत्पन्न करता है।

English

Recite the aiarudriya Mantra which is the quintes¬ sence of the Yajur Mantras. O king, perform Japa with your mind not dwelling on any one else but attached to me.

अध्याय २२

श्लोक 29

स तत्र मानसं नाम सरस्त्रैलोक्यविश्रुतम् ।भेजे शृङ्गाण्यतिक्रम्य स्वबाहुबलभावितः

sa tatra mānasaṃ nāma sarastrailokyaviśrutam / bheje śṛṅgāṇyatikramya svabāhubalabhāvitaḥ

हिन्दी अर्थ

वबसुदारधनाद्यांस्तु बलात् कालबलेन तु मर्यादायाः प्रतिष्ठार्थं ज्ञात्वैतद् भगवानजः। ससर्ज क्षत्रियान् ब्रह्मा ब्राह्मणानां हिताय च

English

Maintaining celibacy, observing fast, with concentra¬ tion of mind and attachment to Bhasma (holy ashes), one should perform the Japa of Rudra till the time of death. He then attains the great region."

अध्याय २२

श्लोक 30

स तस्य तीरे सुभगां चरन्तीमतिलालसाम् ।दृष्टवाननवद्याङ्गीं तस्यै मालां ददौ पुनः

sa tasya tīre subhagāṃ carantīmatilālasām / dṛṣṭavānanavadyāṅgīṃ tasyai mālāṃ dadau punaḥ

हिन्दी अर्थ

यज्ञप्रवर्तनं चैव पशुहिंसाविवर्जितम् एको वेदश्चतुष्पादस्त्रेतास्विह विधीयते। वेदव्यासैश्चतुर्धा तु व्यस्यते द्वापरादिषु

English

After saying this. Lord Rudra, with a desire of blessing his devotee, granted a further lease of life to the king for a hundred years.

अध्याय २२

श्लोक 31

स मालया तदा देवीं भूषितां प्रेक्ष्य मोहितः ।रेमे कृतार्थमात्मानं जानानः सुचिरं तया

sa mālayā tadā devīṃ bhūṣitāṃ prekṣya mohitaḥ / reme kṛtārthamātmānaṃ jānānaḥ suciraṃ tayā

हिन्दी अर्थ

ऋषिपुत्रैः पुनर्भेदाद् भिद्यन्ते दृष्टिविभ्रमैः । मन्त्रब्राह्मणविन्यासैः स्वरवर्णविपर्ययैः इतिहासपुराणानि धर्मशास्त्राणि सुव्रत ५३॥

English

After granting him the great perfect knowledge and detachment, Rudra, Paiamesvara, vanished instantaneously. That was very wonderful.

अध्याय २२

श्लोक 32

अथोर्वशी राजवर्यं रतान्ते वाक्यमब्रवीत् ।किं कृतं भवता पूर्वं पुरीं गत्वा वृथा नृप

athorvaśī rājavaryaṃ ratānte vākyamabravīt / kiṃ kṛtaṃ bhavatā pūrvaṃ purīṃ gatvā vṛthā nṛpa

हिन्दी अर्थ

वाङ्मनःकायजेर्दुः खैनिर्वेदो जायते नृणाम् निर्वेदाज्जायते तेषां दुःखमोक्षविचारणा । विचारणाच्च वैराग्यं वैराग्याद् दोषदर्शनम्

English

The king also performed the Japa of Rudra with a concentrated mind. He smeared ashes over his body, performed holy ablution three times (per day). He was tranquil and had full concentration of mind.

अध्याय २२

श्लोक 33

स तस्यै सर्वमाचष्ट पत्न्या यत् समुदीरितम् ।कण्वस्य दर्शनं चैव मालापहरणं तथा

sa tasyai sarvamācaṣṭa patnyā yat samudīritam / kaṇvasya darśanaṃ caiva mālāpaharaṇaṃ tathā

हिन्दी अर्थ

बिना जोते-बोये ही विभिन्न ऋतुओंमें होनेवाले पुष्प एवं फलोंसे युक्त चौदह प्रकारके ग्राम्य एवं जंगली वृक्ष और गुल्म उत्पन्न हो गये। तदनन्तर त्रेतायुगके प्रभावसे भवितव्यतावश उन प्रजाओंमें निश्चितरूपसे सब प्रकारसे अपनी शक्तिके अनुसार बलपूर्वक नदियों, क्षेत्रों, पर्वतों, वृक्षों, गुल्मों तथा औषधियोंपर अधिकार जमाना प्रारम्भ किया। उनके विपरीत आचरणके कारण वे सभी औषधियाँ पृथ्वीमें प्रविष्ट हो गयीं। तब महाराज पृथुने

English

Whoever reads or even listens to the excellent life- story of this king, is absolved of all sins and is worshipped in the region of Brahma.

अध्याय २२

श्लोक 34

श्रुत्वैतद् व्याहृतं तेन गच्छेत्याह हितैषिणी ।शापं दास्यति ते कण्वो ममापि भवतः प्रिया

śrutvaitad vyāhṛtaṃ tena gacchetyāha hitaiṣiṇī / śāpaṃ dāsyati te kaṇvo mamāpi bhavataḥ priyā

हिन्दी अर्थ

पितामहके आदेशसे पृथ्वीका दोहन किया ॥ ४२--४५ ॥ तदनन्तर कालके प्रभावसे वे सभी प्रजाएँ क्रोधाभिभूत होकर एक-दूसरेकी जमीन, धन, स्त्री आदिको बलपूर्वक ग्रहण करने लगे। ऐसी अव्यवस्था देखकर भगवान् ब्रह्माने मर्यादाको रक्षा करनेके लिये और ब्राह्मणोंके

English

VV. 48b-53a quoted in Dalapatiraja's Nrsijhha-prasada Tirtha-sdra (Varanasi 1936)

अध्याय २२

श्लोक 35

तयासकृन्महाराजः प्रोक्तो ऽपि मदमोहितः ।न तत्यजाथ तत्पार्श्वं तत्र संन्यस्तमानसः

tayāsakṛnmahārājaḥ prokto 'pi madamohitaḥ / na tatyajātha tatpārśvaṃ tatra saṃnyastamānasaḥ

हिन्दी अर्थ

कल्याणके लिये क्षत्रियोंकी सृष्टि की । प्रभुने त्रेतायुगमें वर्ण तथा आश्रमको व्यवस्था और पशुहिंसासे रहित यज्ञोंका प्रवर्तन किया। द्वापरमें लोगोंमें सदा मतभेद, राग, लोभ, युद्ध तथा तत्त्वोंके निश्चयका असामर्थ्य रहता है। एक ही वेद त्रेतामें चार पादोंमें विभक्त किया जाता है और द्वापर आदि युगोंमें वेदव्यासके द्वारा वही वेद चार भागोंमें बाँटा जाता है? ॥ ४६--५० ॥

English

A very powerful son named Satyavrata was born to him. His wife Satyadhana gave birth to Hariscandra.

अध्याय २२

श्लोक 36

ततोर्वशी कामरूपा राज्ञे स्वं रूपमुत्कटम् ।सुरोमशं पिङ्गलाक्षं दर्शयामास सर्वदा

tatorvaśī kāmarūpā rājñe svaṃ rūpamutkaṭam / suromaśaṃ piṅgalākṣaṃ darśayāmāsa sarvadā

हिन्दी अर्थ

ऋषिपुत्रोंने पुनः भ्रान्तदृष्ट्या मन्त्र और ब्राह्मणोंके विन्यास तथा स्वर एवं वर्णके व्यतिक्रमसे विभक्त वेदोंके पुनः विभाग किये। वैदिक ऋषियोंने कहीं-कहीं समानता, विशेषता और दृष्टि-भेदके आधारपर ऋक् , यजुः एवं साम-संज्ञक मन्त्रोंकी संहिताओंका संकलन किया। हे सुव्रत! (उन ऋषियोंने) ब्राह्मण, कल्पसूत्र, मन्त्रों, इतिहास- पुराण और धर्मशास्त्रोंका उपदेश किया है

English

A very powerful son named Satyavrata was born to him. His wife Satyadhana gave birth to Hariscandra.

अध्याय २२

श्लोक 37

तस्यां विरक्तचेतस्कः स्मृत्वा कण्वाभिभाषितम् ।धिङ्मामिति विनिश्चित्यतपः कर्तुं समारभत्

tasyāṃ viraktacetaskaḥ smṛtvā kaṇvābhibhāṣitam / dhiṅmāmiti viniścityatapaḥ kartuṃ samārabhat

हिन्दी अर्थ

वाणी तथा शरीर-सम्बन्धी दु:खोंके कारण मनुष्योंको निर्वेद उत्पन्न होता है। फिर निर्वेदके कारण उनमें दुःखसे मुक्ति पानेका विचार पैदा होता है और विचारसे वैराग्य उत्पन्न होता है तथा वैराग्यसे अपने दोष दिखलायी पड़ते हैं

English

A very powerful son named Satyavrata was born to him. His wife Satyadhana gave birth to Hariscandra.

अध्याय २२

श्लोक 38

संवत्सरद्वादशकं कन्दमूलफलाशनः ।भूय एव द्वादशकं वायुभक्षो ऽभवन्नृपः

saṃvatsaradvādaśakaṃ kandamūlaphalāśanaḥ / bhūya eva dvādaśakaṃ vāyubhakṣo 'bhavannṛpaḥ

हिन्दी अर्थ

१-सुख-सुविधाकी अधिकता भी राग आदिका कारण बनती है। २-सत्य एवं त्रेतायुगमें वेद एक ही होता है, उसके पाद चार होते हैं। द्वापर एवं कलियुगमें एक वेद चार वेदके रूपमें विभक्त हो जाता है। इन चार वेदोंकी ११३ शाखाएँ होती हैं। अध्येताओंके सामर्थ्यकी दृष्टिसे इसे व्यास कहते हैं। आद्ये कृते तु धर्मोऽस्ति स त्रेतायां प्रवर्तते । द्वापरे व्याकुलीभूत्वा प्रणश्यति कलौ युगे

English

A very powerful son named Satyavrata was born to him. His wife Satyadhana gave birth to Hariscandra.

अध्याय २२

श्लोक 39

गत्वा कण्वाश्रमं भीत्या तस्मै सर्वं न्यवेदयत् ।वासमप्सरसा भूयस्तपोयोगमनुत्तमम्

gatvā kaṇvāśramaṃ bhītyā tasmai sarvaṃ nyavedayat / vāsamapsarasā bhūyastapoyogamanuttamam

हिन्दी अर्थ

दोष-दर्शनके कारण द्वापरमें ज्ञान उत्पन्न होता है। द्वापरमें यह वृत्ति रजोगुण और तमोगुणसे युक्त कही गयी हैं। आद्य (सर्वप्रथम) कृतयुगमें धर्म प्रतिष्ठित था,

English

A very powerful son named Satyavrata was born to him. His wife Satyadhana gave birth to Hariscandra.

अध्याय २२

श्लोक 40

वीक्ष्य तं राजशार्दूलं प्रसन्नो भगवानृषिः ।कर्तुकामो हि निर्बोजं तस्याघमिदमब्रवीत्

vīkṣya taṃ rājaśārdūlaṃ prasanno bhagavānṛṣiḥ / kartukāmo hi nirbojaṃ tasyāghamidamabravīt

हिन्दी अर्थ

वह त्रेतामें भी रहता हे, द्वापरमें व्याकुल होकर वह धर्म कलियुगमें विलुप्त हो जाता है कलियुगके धर्मोका वर्णन, कलियुगमें शिव-पूजनको विशेष महिमाका ख्यापन, व्यासकृत शिवस्तुति, व्यासप्रेरित अर्जुनका शिवपुरीमें जाना और व्यासद्वारा शिवभक्त अर्जुनकी महिमा

English

A very powerful son named Satyavrata was born to him. His wife Satyadhana gave birth to Hariscandra.

अध्याय २२

श्लोक 41

गच्छ वाराणसीं दिव्यामीश्वराध्युषितां पुरीम् ।आस्ते मोचयितुं लोकं तत्र देवो महेश्वरः

gaccha vārāṇasīṃ divyāmīśvarādhyuṣitāṃ purīm / āste mocayituṃ lokaṃ tatra devo maheśvaraḥ

हिन्दी अर्थ

कलौ प्रमारको रोगः सततं क्षुद्भयं तथा। अनावृष्टिभयं घोरं देशानां च विपर्ययः अधार्मिका अनाचारा महाकोपाल्पचेतसः। अनृतं वदन्ति ते लुब्धास्तिष्ये जाताः सुदुः प्रजाः ३॥

English

A very powerful son named Satyavrata was born to him. His wife Satyadhana gave birth to Hariscandra.

अध्याय २२

श्लोक 42

स्नात्वा संतर्प्य विधिवद् गङ्गायान्देवताः पितॄन् ।दृष्ट्वा विश्वेश्वरं लिङ्गङ्किल्बिषान्मोक्ष्यसे ऽखिलात्

snātvā saṃtarpya vidhivad gaṅgāyāndevatāḥ pitṝn / dṛṣṭvā viśveśvaraṃ liṅgaṅkilbiṣānmokṣyase 'khilāt

हिन्दी अर्थ

विप्राणां कर्मदोषैश्व प्रजानां जायते भयम् राजानः शूद्रभूयिष्ठा ब्राह्मणान् बाधयन्ति च। भ्रूणहत्या वीरहत्या प्रजायेते नरेश्वर

English

A very powerful son named Satyavrata was born to him. His wife Satyadhana gave birth to Hariscandra.

अध्याय २२

श्लोक 43

प्रणम्य शिरसा कण्वमनुज्ञाप्य च दुर्जयः ।वाराणस्यां हरं दृष्ट्वा पापान्मुक्तो ऽभवत् ततः

praṇamya śirasā kaṇvamanujñāpya ca durjayaḥ / vārāṇasyāṃ haraṃ dṛṣṭvā pāpānmukto 'bhavat tataḥ

हिन्दी अर्थ

व्यासजीने कहा--कलियुगमें मनुष्य सदा तमोगुणसे आवृत रहते हैं, इसीलिये माया, असूया (गुणोंमें दोषदर्शन) तथा तपस्ियोंके वधमें ही लगे रहते हैं। कलियुगमें प्राणहन्ता रोग, निरन्तर भूखका कष्ट, अवर्षणका भयंकर भय तथा देशोंका उलट-फेर होता रहता है। कलियुगमें उत्पन्न हुए दुष्ट मनुष्य अधार्मिक, सदाचारसे रहित, अत्यन्त क्रोधी, दुर्बल चित्तवाले तथा लोभी होते हैं और झूठ बोलते हैं। ब्राह्मणोंके असत् उद्देश्य, असत्

English

A very powerful son named Satyavrata was born to him. His wife Satyadhana gave birth to Hariscandra.

अध्याय २२

श्लोक 44

जगाम स्वपुरीं शुभ्रां पालयामास मेदिनीम् ।याजयामास तं कण्वो याचितो घृणया मुनिः

jagāma svapurīṃ śubhrāṃ pālayāmāsa medinīm / yājayāmāsa taṃ kaṇvo yācito ghṛṇayā muniḥ

हिन्दी अर्थ

अध्ययन, दुराचार तथा दूषित शास्त्रोंके अभ्यास और बुरे कर्मके दोषसे प्रजामें भय उत्पन्न होता है। द्विजाति लोग कलियुगमें वेदोंका अध्ययन नहीं करते और न यज्ञ ही करते हैं। अल्प बुद्धिवाले (यज्ञ करनेकी योग्यतासे रहित) लोग यज्ञ करते हैं और अन्यायपूर्वक वेदोंको पढ़ते हैं॥ १--५॥

English

A very powerful son named Satyavrata was born to him. His wife Satyadhana gave birth to Hariscandra.

अध्याय २२

श्लोक 45

तस्य पुत्रो ऽथ मतिमान् सुप्रतीक इति श्रुतः ।बभूव जातमात्रं तं राजानमुपतस्थिरे

tasya putro 'tha matimān supratīka iti śrutaḥ / babhūva jātamātraṃ taṃ rājānamupatasthire

हिन्दी अर्थ

कलियुगमें शूद्रोंका ब्राह्मणोंके साथ मन्त्र, योनि, शयन, आसन और भोजनके द्वारा सम्बन्ध हो जायगा। नरेश्वर! अधिकांश राजा शूद्र होंगे, जो वस्तुतः राजा होनेके लिये अयोग्य होंगे; वे ब्राह्मणोंको पीडित करेंगे। ब्राह्मणोंके शूद्र छोटे भाई हैं। बड़े भाईका छोटे भाईके प्रति अतिशय स्नेह होता है, अतः ब्राह्मण शूद्रोंसे स्नेहपूर्ण व्यवहार करते

English

A very powerful son named Satyavrata was born to him. His wife Satyadhana gave birth to Hariscandra.

अध्याय २२

श्लोक 46

उर्वश्यां च महावीर्याः सप्त देवसुतोपमाः ।कन्या जगृहिरे सर्वा जन्धर्वदयिता द्विजाः

urvaśyāṃ ca mahāvīryāḥ sapta devasutopamāḥ / kanyā jagṛhire sarvā jandharvadayitā dvijāḥ

हिन्दी अर्थ

ही हैं और यही अन्य युगोंमें था, पर कलिमें सत्त्वगुणकी कमी होनेसे ऐसे व्यवहारका प्राय: अभाव हो जाता है तथा अधिकार, योग्यता एवं मर्यादाका अतिक्रमण कर लोभ या भयवश ब्राह्मण मन्त्रदीक्षा, योनि (बैवाहिक सम्बन्ध) आदि करने लगते हैं। यह यथार्थतः अनुचित है ही। स्तान॑ होमं जपं दानं देवतानां तथार्चनम्। अन्यानि चैव कर्माणि न कुर्वन्ति द्विजातयः

English

A very powerful son named Satyavrata was born to him. His wife Satyadhana gave birth to Hariscandra.

अध्याय २२

श्लोक 47

एष व कथितः सम्यक् सहस्त्रजित उत्तमः ।वंशः पापहरो नृणां क्रोष्टोरपि निबोधत

eṣa va kathitaḥ samyak sahastrajita uttamaḥ / vaṃśaḥ pāpaharo nṛṇāṃ kroṣṭorapi nibodhata

हिन्दी अर्थ

विनिन्दन्ति महादेवं ब्राह्मणान् पुरुषोत्तमम्। आम्नायधर्मशास्त्राणि पुराणानि कलौ युगे कुर्वन्त्यवेददृष्टानि कर्माणि विविधानि तु। स्वधर्मेऽभिरुचिर्नेव ब्राह्मणानां प्रजायते

English

A very powerful son named Satyavrata was born to him. His wife Satyadhana gave birth to Hariscandra.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_kUrmapurANa.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Kurma Purana — Chapter 22
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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