अध्याय २७
श्लोक 1
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्त्र्यां संहितायां पूर्वविभागे षड्विंशो ऽध्यायः ऋषय ऊचुः कृतं त्रेता द्वापरं च कलिश्चेति चतुर्युगम् ।एषां स्वभावं सूताद्य कथयस्व समासतः
iti śrīkūrmapurāṇe ṣaṭsāhastryāṃ saṃhitāyāṃ pūrvavibhāge ṣaḍviṃśo 'dhyāyaḥ ṛṣaya ūcuḥ kṛtaṃ tretā dvāparaṃ ca kaliśceti caturyugam / eṣāṃ svabhāvaṃ sūtādya kathayasva samāsataḥ
हिन्दी अर्थ
सांनिध्य है। योगयुक्त सत्त्वगुणी मनीषीकी जो गति होती है, वही गति गङ्गा-यमुनाके संगमपर प्राण त्याग करनेवालेकी होती है। है युधिष्ठिर! तीनों लोकोंमें विख्यात प्रयागमें जो नहीं पहुंचते, जहाँ-कहीं भी निवास करनेवाले वे लोग इस संसारमें जीवित रहते हुए भी मृतकके तुल्य हैं
English
Unable to see Govinda there, he bowed down his head to the sage Upamanyu and came back to Dvaravati again.