अध्याय ३९
श्लोक 1
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्त्र्यां संहितायां पूर्वविभागे अष्टात्रिंशो ऽध्यायः सूत उवाच अतः परं प्रवक्ष्यामि संक्षेपेण द्विजोत्तमाः ।त्रैलोक्यस्यास्य मानं वो न शक्यं विस्तरेण तु
iti śrīkūrmapurāṇe ṣaṭsāhastryāṃ saṃhitāyāṃ pūrvavibhāge aṣṭātriṃśo 'dhyāyaḥ sūta uvāca ataḥ paraṃ pravakṣyāmi saṃkṣepeṇa dvijottamāḥ / trailokyasyāsya mānaṃ vo na śakyaṃ vistareṇa tu
हिन्दी अर्थ
इसीलिये इन्हें अनन्त कहा जाता है। इन्हें ही अव्यक्त समझना चाहिए। ये ही ब्रह्म परम पद (अन्तिम प्राप्तव्य) हैं ॥ १७--२० ॥ ये अनन्त सर्वत्र सभी स्थानोंमें हैं, ऐसा कहा गया हे। इनका जो अव्यय माहात्म्य है, मैंने भी पूर्वमें उसका वर्णन किया है। वही ये (परमात्मा) ही भूमि, रसातल, आकाश, वायु, अग्नि, सभी समुद्रों तथा स्वर्ग-- सर्वत्र, सभी स्थानोंमें विद्यमान हैं, इसमें कोई संदेह नहीं। ये
English
By its mere remembrance the fruit of a horse sacrifice accrues to one. He is honoured in heaven as long as the moon and the sun shine.