अध्याय ६४
श्लोक 1
इती श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्त्र्यां संहितायामुपरिविभागे द्वादशो ऽध्यायः व्यास उवाच भुक्त्वा पीत्वा च सुप्त्वा च स्नात्वा रथ्योपसर्पणे ।ओष्ठावलमोकौ स्पृष्ट्वा वासो विपरिधाय च
itī śrīkūrmapurāṇe ṣaṭsāhastryāṃ saṃhitāyāmuparivibhāge dvādaśo 'dhyāyaḥ vyāsa uvāca bhuktvā pītvā ca suptvā ca snātvā rathyopasarpaṇe / oṣṭhāvalamokau spṛṣṭvā vāso viparidhāya ca
हिन्दी अर्थ
आद्द्विकः कुलमित्रश्व स्वगोपालश्च नापितः । आद्धिक (जो शूद्र द्विजातिके घर हल जोतकर एते शूद्रेषु भोज्यान्ना यश्चात्मानं निवेदयेत्॥ १६॥ उसके पारिश्रमिक-रूपमें अन्न प्राप्त करता है), कुलमित्र (पिता-पितामहकी परम्परासे जो द्विजातिके घर रहता आया है तथा अभिन्न सहयोगी है), जो अपने गौओंका पालन करनेवाला है, नापित तथा जिस शूद्रने मन, वाणी और कर्मसे सर्वथा स्वयंको 'मैं आपका ही हूँ'- इस रूपमें समर्पित कर दिया है--ऐसे शूद्रका अन्न ग्रहण किया जा सकता है। बुद्धिमान् व्यक्तिको शूद्रोमे
English
The Vedas constitute the eternal 'Eye' of all living beings. (The Brahmana should recite the Vedas everyday. Otherwise he slips and falls off from Brahminhood.