अध्याय ७६
श्लोक 1
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्त्र्यां संहितायामुपरिविभागे चतुर्विशो ऽध्यायः इन् रेए निछ्त् ज़ुल्äस्सिगे ज़ेइछेन्: व्यास उवाच एष वो ऽभिहितः कृत्स्नो गृहस्थाश्रमवासिनः ।द्विजातेः परमो धर्मो वर्तनानि निबोधत
iti śrīkūrmapurāṇe ṣaṭsāhastryāṃ saṃhitāyāmuparivibhāge caturviśo 'dhyāyaḥ in ree nicht zulässige zeichen: vyāsa uvāca eṣa vo 'bhihitaḥ kṛtsno gṛhasthāśramavāsinaḥ / dvijāteḥ paramo dharmo vartanāni nibodhata
हिन्दी अर्थ
तो) बिना लोभके जीवन-निर्वाहमात्र करनेवाले यतिको अथवान्यदुपादाय पात्रे भुञ्जीत नित्यशः । प्रतिदिन नवीन पात्र लाकर उसमें भिक्षा ग्रहण करनी भुक्त्वा तत् संत्यजेत् पात्रं यात्रामात्रमलोलुपः॥ ४॥ चाहिए और भिक्षा ग्रहण करनेके बाद उसका परित्याग कर देना चाहिए। गृहस्थका घर धूएँसे रहित हो जानेपर, मूसलका शब्द बंद हो जानेपर, आगके न रहनेपर, सभी लोगोंके भोजन कर चुकनेपर, कसोरे विधूमे सन्नमुसले व्यङ्गारे ह हक एवं पत्रादिका ढेर लग जानेपर यतिको (गृहस्थके वृत्ते शरावसम्पाते भिक्षां नित्यं यतिश्चरेत्॥ ५॥ घर) नित्य भिक्षा माँगनी चाहिए॥ ३--५॥
English
He who places gold, honey and ghee, gingelly seeds on the hide of a black antelope and gives it to a Brahmana, surmounts all evils.