अध्याय ९२
श्लोक 1
इति श्रीकूर्मपुराणे षट्साहस्त्र्यां संहितायामुपरिविभागे चत्वारिंशो ऽध्यायः सूत उवाच इदं त्रैलोक्यविख्यातं तीर्थं नैमिशमुत्तमम् ।महादेवप्रियकरं महापातकनाशनम्
iti śrīkūrmapurāṇe ṣaṭsāhastryāṃ saṃhitāyāmuparivibhāge catvāriṃśo 'dhyāyaḥ sūta uvāca idaṃ trailokyavikhyātaṃ tīrthaṃ naimiśamuttamam / mahādevapriyakaraṃ mahāpātakanāśanam
हिन्दी अर्थ
पुन: उनमें मन लगाते हुए एक करोड़ जप किया। दो करोड़ जप पूरा होनेपर पुन: भूतगणोंसे आवृत वृषध्वज (शंकर)-ने आकर “मैं वर प्रदान करूँगा' ऐसा कहा। (तब नन्दीने कहा--) प्रभु शंकर! मैं पुनः तीसरी बार एक करोड़ जप करना चाहता हूँ। “ऐसा ही हो” कहकर विश्वात्मा देव पुनः अन्तर्धान हो गये। तीन करोड़ जप पूरा होनेपर भूतगणोंसे आवृत, अत्यन्त प्रसन्न-मन, देव (शंकर)-ने वहाँ आकर कहा--' मैं वर
English
Lord Mahesa then vanished. The over-lord of the Devas vanished alongwith the goddess. The dwellers of the forest propitiated again Rudra, the primordial lord.