Linga Purana· Liṅga Purāṇa
35
अध्याय 35 / 108

Book 1 - Adhyaya 35

31 श्लोकWhatsApp

पूर्ण अध्याय पाठ31 श्लोक

श्लोक पर जाएं:

अध्याय ३५

श्लोक 1

इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे योगिप्रशंसा नाम चतुस्त्रिंशो ऽध्यायः कथं जघान राजानं क्षुपं पादेन सुव्रत दधीचः समरे जित्वा देवदेवं जनार्दनम्

iti śrīliṅgamahāpurāṇe pūrvabhāge yogipraśaṃsā nāma catustriṃśo 'dhyāyaḥ kathaṃ jaghāna rājānaṃ kṣupaṃ pādena suvrata dadhīcaḥ samare jitvā devadevaṃ janārdanam

हिन्दी अर्थ

फषफाभीफाफफाफप्ीफाफपफाफाफपाफफफाफफाफफफफपापापाफफफफ आमसभा “मम अ जज फफक अफ्रफमफ्रफ्फफ्कफ कफ फफ फफफ कफम का मामी क फफ

English

O sage of holy rites, how did Dadhica strike king Ksupa with his foot after conquering Vipu, the lord of Dcvas in battle? How did that skge of great penance attain adaman* tine bones from lord Siva? O Nandin, please recount how Death was conquered by you.

अध्याय ३५

श्लोक 2

वज्रास्थित्वं कथं लेभे महादेवान्महातपाः वक्तुमर्हसि शैलादे जितो मृत्युस्त्वया यथा

vajrāsthitvaṃ kathaṃ lebhe mahādevānmahātapāḥ vaktumarhasi śailāde jito mṛtyustvayā yathā

हिन्दी अर्थ

वार्ता कृषिं समायाता वर्तुकामाः प्रयलतः। औषधियाँ उत्पन्न होने लगीं वार्तावृत्तिः समाख्याता कृषिकामप्रयत्नतः ॥ इस तरह अब जीनेकी इच्छा रखनेवाली प्रज प्रयत्नपूर्वक कृषि कार्य करने लग गयीं। कृषि

English

There was a king of great splendour known as K$upa. He was the son of Brahma. He, the lord of the people, was the friend of Dadhica, a leading sage.

अध्याय ३५

श्लोक 3

ब्रह्मपुत्रो महातेजा राजा क्षुप इति स्मृतः अभून्मित्रो दधीचस्य मुनीन्द्रस्य जनेश्वरः

brahmaputro mahātejā rājā kṣupa iti smṛtaḥ abhūnmitro dadhīcasya munīndrasya janeśvaraḥ

हिन्दी अर्थ

प्रयत्नपूर्वक इच्छा रखनेके कारण इसे 'वार्तावृत्ति' कह गया त्रेतायुगके उस अन्तिम कालमें इस कृषिको छोड़कर आजीविकाका कोई अन्य उपाय नहीं था। उस समय खनित्र आदिके उपयोग बिना ही हाथसे ही खोदकर पर्याप्त जल प्राप्त हो जाता था

English

In course of time, incidentally a dispute arose between Ksupa and 'Dadhica as to who was the better — a Katriya or a Brahmin.

अध्याय ३५

श्लोक 4

चिरात्तयोः प्रसंगाद्वै वादः क्षुपदधीचयोः अभवत् क्षत्रियश्रेष्ठो विप्र एवेति विश्रुतः

cirāttayoḥ prasaṃgādvai vādaḥ kṣupadadhīcayoḥ abhavat kṣatriyaśreṣṭho vipra eveti viśrutaḥ

हिन्दी अर्थ

उस समय सभी लोग युग-प्रभावके कारण क्रोधके वशीभूत होकर बलपूर्वक एक-दूसरेके पुत्र, स्त्री, धन आदिका हरण कर लेते थे वह सम्पूर्ण स्थिति देखकर मर्यादाकी प्रतिष्ठा करनेके लिये तथा दुःखसे रक्षा करनेके लिये भगवान् कमलयोनिने क्षत्रियोंकी उत्पत्ति की

English

(K§upa said) The king holds the physical body of the eight guardians of the quarters.*® Hence I am Indra, Agni, Yama, Nirfti, Varuna, Vayu, Soma (Moon), and Dhanada (Kubera, the lord of wealth). I am Ivara (overlord). I should not be dishonoured.

अध्याय ३५

श्लोक 5

अष्टानां लोकपालानां वपुर्धारयते नृपः तस्मादिन्द्रो ह्ययं वह्निर् यमश् च निरृतिस् तथा

aṣṭānāṃ lokapālānāṃ vapurdhārayate nṛpaḥ tasmādindro hyayaṃ vahnir yamaś ca nirṛtis tathā

हिन्दी अर्थ

विश्वात्मा भगवानूने अपने तेजसे वर्णाश्रम-व्यवस्था स्थापित की तथा उन्होंने स्वधर्मानुसार जीविकाद्वारा जीवनका निर्माण (परिपालन) स्वयं किया इसी प्रकार त्रेतायुगमें क्रमसे यज्ञ-अनुष्ठान आदि आरम्भ हुआ। सभीको व्रतोंमें निष्ठा थी तथा कोई भी मनुष्य पशु-यज्ञ नहीं करते थे

English

O sage of holy rites, that deity (i. e. the king) is

अध्याय ३५

श्लोक 6

वरुणश्चैव वायुश् च सोमो धनद एव च ईश्वरो ऽहं न संदेहो नावमन्तव्य एव च

varuṇaścaiva vāyuś ca somo dhanada eva ca īśvaro 'haṃ na saṃdeho nāvamantavya eva ca

हिन्दी अर्थ

उस समय व्यापक दृष्टिवाले भगवान् विष्णुने अपने सामर्थ्यसे क्रमपूर्वक यज्ञ सम्पन्न किये। है मुने! उस समय द्विज लोग हिंसा न करनेवालेकी प्रशंसा करते थे द्वापरमें भी लोगोंमें मन-वचन-कर्मसे बुद्धि भेद उत्पन्न होते हैं। कष्टपूर्वक कृषिकार्यं भी सम्मत होते हैं

English

The king embodies the essence of eight lokap&las — the guardian deities presiding over the quarters, via. (i) Indra, cast; (2) Agni, south- east; (3) Yama, south; (4) SUrya — south-west; (5) Varupa, west; (6) "Vayu, north-west; (7) Kuvera, north; (8) Soma, north-east. As such, he is a divine being. He is authorized to maintain the system of four varpas and A dramas. But none of the sacred texts — irutis and smrtiempowers him to rule over the Br&hmana varna. Cf. G. Dh. S. rajS sarvasyete brSh- maa-varjam.

अध्याय ३५

श्लोक 7

महती देवता या सा महतश्चापि सुव्रत तस्मात्त्वया महाभाग च्यावनेय सदा ह्यहम्

mahatī devatā yā sā mahataścāpi suvrata tasmāttvayā mahābhāga cyāvaneya sadā hyaham

हिन्दी अर्थ

उस समय शारीरिक क्लेशवश सभी लोगोंमें लोभ, भृति, वाणिज्य कर्मोमें विवाद तथा चित्त- कालुष्यके कारण यथार्थ वस्तुओंके प्रति सन्देह उत्पन्न होने लगता है उस समय शाखाओंके रूपमें वेदोंका विभाग होता है तथा धर्मोके संकर अर्थात् अन्य धर्मकी प्रवृर्ति होने लगती है। उस द्वापरमें ब्राह्मण आदि वर्णो एव

English

Formerly, he was bom in the world of Brahma when Brahma sneezed. He was urged by the thunderbolt- wielding Indra to perform a task. He obtained the thunderbolt as a reward for his task. Out of his own will, he became a human, being and afterwards a king. The powerful king then conquered the leading brahmin like the powerful Indra himself, full of tamas qualities. When struck by the thunderbolt the leading brahmin fell on ihe ground.

अध्याय ३५

श्लोक 8

नावमन्तव्य एवेह पूजनीयश् च सर्वथा श्रुत्वा तथा मतं तस्य क्षुपस्य मुनिसत्तमः

nāvamantavya eveha pūjanīyaś ca sarvathā śrutvā tathā mataṃ tasya kṣupasya munisattamaḥ

हिन्दी अर्थ

वर्णाश्रमप्रतिष्ठां च चकार स्वेन तेजसा। वृत्तेन वृत्तिना वृत्तं विश्वात्मा निर्ममे स्वयम् यज्ञप्रवर्त॑ चैव त्रेतायामभवत्क्रमात्। पशुयज्ञं न सेवन्ते केचित्तत्रापि सुव्रताः

English

Out of sorrow he remembered sage Bhfirgava. Bhargava, the best among the embodied beings, came there and by his yogic power he stitched the body of Dadhica who had been struck by the thunderbolt. After stitching the severed body Bhargava said:

अध्याय ३५

श्लोक 9

दधीचश् च्यावनिश् चोग्रो गौरवादात्मनो द्विजः अताडयत्क्षुपं मूर्ध्नि दधीचो वाममुष्टिना चिछेद वज्रेण च तं दधीचं बलवान् क्षुपः

dadhīcaś cyāvaniś cogro gauravādātmano dvijaḥ atāḍayatkṣupaṃ mūrdhni dadhīco vāmamuṣṭinā cicheda vajreṇa ca taṃ dadhīcaṃ balavān kṣupaḥ

हिन्दी अर्थ

बलाद्विष्णुस्तदा यज्ञमकरोत्सर्वदूक् क्रमात्। द्विजास्तदा प्रशंसन्ति ततस्त्वाहिंसकं मुने मनसा कर्मणा वाचा कृच्छाद्वार्ता प्रसिध्यति

English

O highly blessed Dadhica, worship Siva, the un- sullied lord of Devas, worthy of worship by Brahma and others* O brahmin sage! by the grace of the threc-cyed lord, you become immortal. O brahmin, this power of resuscitating one to life has been obtained from him by me.

अध्याय ३५

श्लोक 10

ब्रह्मलोके पुरासौ हि ब्रह्मणः क्षुतसंभवः लब्धं वज्रं च कार्यार्थं वज्रिणा चोदितः प्रभुः

brahmaloke purāsau hi brahmaṇaḥ kṣutasaṃbhavaḥ labdhaṃ vajraṃ ca kāryārthaṃ vajriṇā coditaḥ prabhuḥ

हिन्दी अर्थ

तदा तु सर्वभूतानां कायक्लेशवशात्क्रमात्। लोभो भृतिर्वणिगयुद्धं तत्त्वानामविनिश्चयः वेदशाखाप्रणयनं धर्माणां सङ्करस्तथा। वर्णाश्रमपरिध्वंसः कामद्वेषौ तथैव च

English

There is no fear, anywhere, from death for the devo- tees of Siva. I shall now tell you Siva's Mantra that revivoi one to life.

अध्याय ३५

श्लोक 11

स्वेच्छयैव नरो भूत्वा नरपालो बभूव सः तस्माद्राजा स विप्रेन्द्रम् अजयद्वै महाबलः

svecchayaiva naro bhūtvā narapālo babhūva saḥ tasmādrājā sa viprendram ajayadvai mahābalaḥ

हिन्दी अर्थ

अध्याय ३९ सत्ययुग, त्रेतायुग तथा द्वापरयुगका वर्णन “विविध पुराणोंके अनुक्रमका वर्णन १७५ द्वापरे तु प्रवर्तन्ते रागो लोभो मदस्तथा। आदि आश्रमोंका लगभग विनाश हो जाता है। वेदो व्यासैश्चतुर्धा तु व्यस्यते द्वापरादिषु ॥ ५६ लोगोंमें वासना, द्वेष, राग, लोभ तथा मद प्रवृत्त हो जाते हैं। द्वापर आदि कालोंमें व्यासोंके द्वारा एक वेद चार भागोंमें विभक्त किया जाता है। ऋकू आदि चार

English

Gf. Manu: 1 78.

अध्याय ३५

श्लोक 12

यथा वज्रधरः श्रीमान् बलवांस्तमसान्वितः पपात भूमौ निहतो वज्रेण द्विजपुङ्गवः

yathā vajradharaḥ śrīmān balavāṃstamasānvitaḥ papāta bhūmau nihato vajreṇa dvijapuṅgavaḥ

हिन्दी अर्थ

पादोंसे युक्त एक बेद-संहिताका इस भूलोकमें त्रेता आदि कालोंमें अध्ययन किया जाता है; वही वेद द्वापर आदि कालोंमें आयुसंक्षमके कारण विभाजित कर दिया जाता है॥ ५५--५७॥ इसके आगे ऋषिपुत्रोंके द्वारा अपनी दृष्टिसे विभाजन पुनः किया जाता है। दृष्टिविश्रम (अलग- अलग विचार रखनेवाले) मनीषियोंने समानरूपसे विभाजित की गयी ऋक्, यजुः तथा साम नामक संहिताओंको

English

By repeating this Mantra, by doing sacrifice with this, by drinking water inspired by this mantra, by meditating on this Mantra in the presence of the Linga, O brahmin, one shall not have any fear of death.

अध्याय ३५

श्लोक 13

सस्मार च तदा तत्र दुःखाद्वै भार्गवं मुनिम् शुक्रो ऽपि संधयामास ताडितं कुलिशेन तम्

sasmāra ca tadā tatra duḥkhādvai bhārgavaṃ munim śukro 'pi saṃdhayāmāsa tāḍitaṃ kuliśena tam

हिन्दी अर्थ

स्वर-वर्णोके भेदसे मन्त्र और ब्राह्मणभागके स्वरूपमें पुनः अलग-अलग विभाजित किया इस प्रकार मनीषियोंने ब्राह्मणभाग, कल्पसूत्र तथा मीमांसा-न्यायके सूत्रोंकी रचना की। कुछ मनीषी इतने विभाजनको पर्याप्त मानकर इसीपर स्थिरमति हो गये, किंतु अन्य मनीषी इस विभाजनको न्यून मानकर इसके

English

After hearing his words Dadhica propitiated Siva by means of penance and attained adamantine bones, indestructi- bility and absence of affliction.

अध्याय ३५

श्लोक 14

योगादेत्य दधीचस्य देहं देहभृतांवरः संधाय पूर्ववद्देहं दधीचस्याह भार्गवः

yogādetya dadhīcasya dehaṃ dehabhṛtāṃvaraḥ saṃdhāya pūrvavaddehaṃ dadhīcasyāha bhārgavaḥ

हिन्दी अर्थ

विस्तारमें प्रवृत्त हुए अनेक कल्योंके भेदसे इतिहास, पुराण आदिके भी विशिष्ट भेद होते हैं। ब्रह्मपुराण, पद्मपुराण, विष्णुपुराण, शिवपुराण, भागवतपुराण, भविष्यपुराण, नारदपुराण, मार्कण्डेयपुराण, अग्निपुराण, ब्रह्मवैवर्तपुराण, लिङ्गपुराण,

English

Having obtained indestructibility and adamantine bones Dadhica hit the king severely on the head with the tip of his foot. King Ksupa, in return, hit Dadhica in his chest with his thunderbolt. But by the grace of lord Siva the thun- derbolt was rendered ineffective. It could not injure Dadhica the great soul of adamantine body.

अध्याय ३५

श्लोक 15

भो दधीच महाभाग देवदेवमुमापतिम् सम्पूज्य पूज्यं ब्रह्माद्यैर् देवदेवं निरञ्जनम्

bho dadhīca mahābhāga devadevamumāpatim sampūjya pūjyaṃ brahmādyair devadevaṃ nirañjanam

हिन्दी अर्थ

वाराहपुराण, वामनपुराण, कूर्मपुराण, मत्स्यपुराण, गरुडपुराण, स्कन्दपुराण तथा ब्रह्माण्डपुराण-ये उन पुराणोंके भेद कहे जाते हैं । इनमें ग्यारहवाँ पवित्र लिङ्गपुराण द्वापरमें विभक्त किया गया है॥ ६१-६३ /२॥ मनु, अत्रि, विष्णु, हारीत, याज्ञवल्क्य, उशना, अंगिरा, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति,

English

ry. i.9.6.2.Gf. I

अध्याय ३५

श्लोक 16

अवध्यो भव विप्रर्षे प्रसादात्त्र्यम्बकस्य तु मृतसंजीवनं तस्माल् लब्धमेतन्मया द्विज

avadhyo bhava viprarṣe prasādāttryambakasya tu mṛtasaṃjīvanaṃ tasmāl labdhametanmayā dvija

हिन्दी अर्थ

वसिष्ठ आदि बहुत-से मुनि धर्मशास्त्रोंका विस्तार करनेवाले हैं ॥ ६४-६५ /२॥ अवृष्टि, अकालमरण, रोग, विघ्न एवं मन- वचन-कर्मजनित दुःखोंसे निर्वेद उत्पन्न होता है। निर्वेदसे उन प्रजाओंके मनमें दुःखोंसे छूटनेका विचार

English

ry. i.9.6.2.Gf. I

अध्याय ३५

श्लोक 17

नास्ति मृत्युभयं शंभोर् भक्तानामिह सर्वतः मृतसंजीवनं चापि शैवमद्य वदामि ते

nāsti mṛtyubhayaṃ śaṃbhor bhaktānāmiha sarvataḥ mṛtasaṃjīvanaṃ cāpi śaivamadya vadāmi te

हिन्दी अर्थ

एको वेदश्चतुष्पादस्त्रेतास्विह विधीयते। सङ्क्षयादायुषश्चैव व्यस्यते द्वापरेषु सः ऋषिपुत्रैः पुनर्भेदा भिद्यन्ते दृष्टिविभ्रमैः । मन्त्रब्राह्मणविन्यासैः स्वरवर्णविपर्ययैः

English

ry. i.9.6.2.Gf. I

अध्याय ३५

श्लोक 18

त्रियंबकं यजामहे त्रैलोक्यपितरं प्रभुम् त्रिमण्डलस्य पितरं त्रिगुणस्य महेश्वरम्

triyaṃbakaṃ yajāmahe trailokyapitaraṃ prabhum trimaṇḍalasya pitaraṃ triguṇasya maheśvaram

हिन्दी अर्थ

अन्ये तु प्रस्थितास्तान् वै केचित्तान् प्रत्यवस्थिताः इतिहासपुराणानि भिद्यन्ते कालगौरवात्। ब्राह्मा पादं वैष्णवं च शैवं भागवतं तथा

English

ry. i.9.6.2.Gf. I

अध्याय ३५

श्लोक 19

त्रितत्त्वस्य त्रिवह्नेश् च त्रिधाभूतस्य सर्वतः त्रिवेदस्य महादेवं सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्

tritattvasya trivahneś ca tridhābhūtasya sarvataḥ trivedasya mahādevaṃ sugandhiṃ puṣṭivardhanam

हिन्दी अर्थ

आग्नेयं ब्रह्मवैवर्त लैङ्गं वाराहमेव च स्कान्दं तथा च ब्रह्माण्डं तेषां भेदः प्रकथ्यते ६३

English

ry. i.9.6.2.Gf. I

अध्याय ३५

श्लोक 20

सर्वभूतेषु सर्वत्र त्रिगुणे प्रकृतौ तथा इन्द्रियेषु तथान्येषु देवेषु च गणेषु च

sarvabhūteṣu sarvatra triguṇe prakṛtau tathā indriyeṣu tathānyeṣu deveṣu ca gaṇeṣu ca

हिन्दी अर्थ

लैङ्गमेकादशविधं प्रभिन्नं द्वापरे शुभम् मन्वत्रिविष्णुहारीतयाज्ञवल्क्योशनोऽङ्गिराः यमापस्तम्बसंवर्ताः कात्यायनबृहस्पती । पराशरव्यासशङ्खलिखिता दक्षगौतमौ

English

ry. i.9.6.2.Gf. I

अध्याय ३५

श्लोक 21

पुष्पेषु गन्धवत्सूक्ष्मः सुगन्धिः परमेश्वरः पुष्टिश् च प्रकृतिर्यस्मात् पुरुषस्य द्विजोत्तम

puṣpeṣu gandhavatsūkṣmaḥ sugandhiḥ parameśvaraḥ puṣṭiś ca prakṛtiryasmāt puruṣasya dvijottama

हिन्दी अर्थ

वाड्मनःकर्मजेर्दुःखैर्निर्वेदो जायते ततः । निर्वेदाज्जायते तेषां दुःखमोक्षविचारणा श्रीलिड्रमहापुराण

English

ry. i.9.6.2.Gf. I

अध्याय ३५

श्लोक 22

महदादिविशेषान्तविकल्पस्यापि सुव्रत विष्णोः पितामहस्यापि मुनीनां च महामुने

mahadādiviśeṣāntavikalpasyāpi suvrata viṣṇoḥ pitāmahasyāpi munīnāṃ ca mahāmune

हिन्दी अर्थ

आद्ये कृते तु धर्मोउस्ति स त्रेतायां प्रवर्तते पापापाफापाफफ फ फ फ फ क़ फ़ फक फ़ फ़ फ फ़ फ़ फ फ़ फ़ फ क फ़ फ फ फ फक क फ फ फ फी क मी फी फ मी फी जी जी मी की मी जी मी मी £ फफफफ हा

English

ry. i.9.6.2.Gf. I

अध्याय ३५

श्लोक 23

इन्द्रस्यापि च देवानां तस्माद्वै पुष्टिवर्धनः तं देवममृतं रुद्रं कर्मणा तपसा तथा

indrasyāpi ca devānāṃ tasmādvai puṣṭivardhanaḥ taṃ devamamṛtaṃ rudraṃ karmaṇā tapasā tathā

हिन्दी अर्थ

पैदा होता है। उस विचारसे वैराग्य तथा सांसारिक क्रियाकलापोंमें दोष दिखायी देने लगते ह और उन दोषोंके दर्शनसे द्वापरमें ज्ञान उत्पन्न हो अम है द्वापरमें रजोगुण तथा तमोगुणसे युक्त इस प्रकारकी

English

ry. i.9.6.2.Gf. I

अध्याय ३५

श्लोक 24

स्वाध्यायेन च योगेन ध्यानेन च यजामहे सत्येनानेन मुक्षीयान् मृत्युपाशाद् भवः स्वयम्

svādhyāyena ca yogena dhyānena ca yajāmahe satyenānena mukṣīyān mṛtyupāśād bhavaḥ svayam

हिन्दी अर्थ

वृत्ति कही गयी है। आदि सत्ययुगमें एकमात्र धर्म ही सर्वत्र रहता है, वह त्रेतामें प्रेरणासे प्रवृत्त होता है वह धर्म द्वापरमें व्याकुल होकर स्थित रहता है तथा फिर

English

ry. i.9.6.2.Gf. I

अध्याय ३५

श्लोक 25

बन्धमोक्षकरो यस्माद् उर्वारुकमिव प्रभुः मृतसंजीवनो मन्त्रो मया लब्धस्तु शङ्करात्

bandhamokṣakaro yasmād urvārukamiva prabhuḥ mṛtasaṃjīvano mantro mayā labdhastu śaṅkarāt

हिन्दी अर्थ

द्वापरे व्याकुलीभूत्वा प्रणश्यति कलौ युगे॥ ७० कलियुगमें नष्ट हो जाता है कलियुगके धर्मोंका वर्णन, कलियुगमें धर्म आदिका हास तथा स्वल्प भी धर्माचरणका महत्फल एवं कलियुगके अन्तमें पुनः सत्ययुगकी प्रवृत्ति

English

ry. i.9.6.2.Gf. I

अध्याय ३५

श्लोक 26

जप्त्वा हुत्वाभिमन्त्र्यैवं जलं पीत्वा दिवानिशम् लिङ्गस्य संनिधौ ध्यात्वा नास्ति मृत्युभयं द्विज

japtvā hutvābhimantryaivaṃ jalaṃ pītvā divāniśam liṅgasya saṃnidhau dhyātvā nāsti mṛtyubhayaṃ dvija

हिन्दी अर्थ

कलौ प्रमादको रोगः सततं क्षुद्भयानि च। अनावृष्टिभयं घोरं देशानां च विपर्ययः न प्रामाण्यं श्रुतेरस्ति नृणां चाधर्मसेवनम्। अधार्मिकास्त्वनाचारा महाकोपाल्पचेतसः

English

ry. i.9.6.2.Gf. I

अध्याय ३५

श्लोक 27

तस्य तद्वचनं श्रुत्वा तपसाराध्य शङ्करम् वज्रास्थित्वम् अवध्यत्वम् अदीनत्वं च लब्धवान्

tasya tadvacanaṃ śrutvā tapasārādhya śaṅkaram vajrāsthitvam avadhyatvam adīnatvaṃ ca labdhavān

हिन्दी अर्थ

अनृतं ब्रुवते लुब्धास्तिष्ये जाताश्च दुष्प्रजाः। दुरिष्टर्दुरधीतैश्च दुराचारेदुरागमै: विप्राणां कर्मदोषेण प्रजानां जायते भयम्। नाधीयन्ते तदा वेदान्न यजन्ति द्विजातय:

English

ry. i.9.6.2.Gf. I

अध्याय ३५

श्लोक 28

एवमाराध्य देवेशं दधीचो मुनिसत्तमः प्राप्यावध्यत्वमन्यैश् च वज्रास्थित्वं प्रयत्नतः

evamārādhya deveśaṃ dadhīco munisattamaḥ prāpyāvadhyatvamanyaiś ca vajrāsthitvaṃ prayatnataḥ

हिन्दी अर्थ

राजानः शूद्रभूयिष्ठा ब्राह्मणान् बाधयन्ति ते इन्द्र बोले-हे शिलाद! कलियुगमें तमोगुणसे व्याकुल इन्द्रियोंवाले मनुष्य माया रचेंगे, दूसरोंका दोष देखेंगे तथा तपस्वियोंका वध करेंगे

English

ry. i.9.6.2.Gf. I

अध्याय ३५

श्लोक 29

अताडयच्च राजेन्द्रं पादमूलेन मूर्धनि क्षुपो दधीचं वज्रेण जघानोरसि च प्रभुः

atāḍayacca rājendraṃ pādamūlena mūrdhani kṣupo dadhīcaṃ vajreṇa jaghānorasi ca prabhuḥ

हिन्दी अर्थ

कलियुगमें प्रमाद, रोग, निरन्तर क्षुधाका भय, अनावृष्टिरूप घोर भय तथा देशोंका विपर्यय (विनाश) ये सब होंगे लोग वेदोंकी प्रामाणिकता स्वीकार नहीं करेंगे तथा अधर्मका आचरण करेंगे। मनुष्य धर्मच्युत होकर अनाचारमें रत रहेंगे और महान् क्रोधी तथा मन्द बुद्धिवाले होंगे

English

ry. i.9.6.2.Gf. I

अध्याय ३५

श्लोक 30

नाभून्नाशाय तद्वज्रं दधीचस्य महात्मनः प्रभावात्परमेशस्य वज्रबद्धशरीरिणः

nābhūnnāśāya tadvajraṃ dadhīcasya mahātmanaḥ prabhāvātparameśasya vajrabaddhaśarīriṇaḥ

हिन्दी अर्थ

कलियुगमें प्रजाएँ मिथ्या भाषण करेंगी, लोभ- ब्राह्मणोंके दूषित यज्ञ, दूषित पठन, दूषित आचार एवं दूषित शास्त्रोके सेवनरूपी कर्मदोषसे प्रजाओंमें भय उत्पन्न होगा। द्विजातिगण न तो वेदोंका अध्ययन करेंगे और न तो यज्ञ-अनुष्ठान करेंगे

English

ry. i.9.6.2.Gf. I

अध्याय ३५

श्लोक 31

दृष्ट्वाप्यवध्यत्वमदीनतां च क्षुपो दधीचस्य तदा प्रभावम् आराधयामास हरिं मुकुन्दम् इन्द्रानुजं प्रेक्ष्य तदांबुजाक्षम्

dṛṣṭvāpyavadhyatvamadīnatāṃ ca kṣupo dadhīcasya tadā prabhāvam ārādhayāmāsa hariṃ mukundam indrānujaṃ prekṣya tadāṃbujākṣam

हिन्दी अर्थ

जायँगे। कलियुगमें ब्राह्मण लोग शूद्रोको मन्त्रोपदेश देंगे तथा उनके साथ शयन, आसन, भोजन आदिका व्यवहार अध्याय ४० कलियुगके धर्मोका वर्णन, कलियुगमें धर्म आदिका हास--पुन: सत्ययुगकी प्रवृत्ति

English

ry. i.9.6.2.Gf. I

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_liGgapurANa1-108.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Linga Purana — Chapter 35
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

Digitised text taken from the archive linked below. It has not been collated against a printed edition by this site.

पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

Numbering follows the imported source and may differ from other editions.