अध्याय २७
श्लोक 1
इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे पुत्रानुशासनं नाम षड्विंशो ऽध्यायः सप्तविंशो ऽध्यायः जड उवाच एवमुल्लाप्यमानस्तु स तु मात्रा दिने दिने ।ववृधे वयसा बालो बुद्ध्या चालर्कसंज्ञितः
iti śrīmārkaṇḍeyapurāṇe putrānuśāsanaṃ nāma ṣaḍviṃśo 'dhyāyaḥ saptaviṃśo 'dhyāyaḥ jaḍa uvāca evamullāpyamānastu sa tu mātrā dine dine / vavṛdhe vayasā bālo buddhyā cālarkasaṃjñitaḥ
हिन्दी अर्थ
मुनिश्रेष्ठट! यह मैंने केतुमालवर्षके विषयमें कुछ बातें बतायी हैं, अब मुझसे उत्तरकुरुवर्षका वर्णन सुनो। वहाँकी भूमि मणिमयी और वायु सुगन्धित तथा सर्वदा सुख देनेवाली होती है। जो लोग देवलोकसे च्युत होते हैं, वे ही उस देशमें जन्म लेते हैं। उस देशमें गिरिराज चन्द्रकान्त और सूर्यकान्त--ये दो कुलपर्वत हैं। वहाँ भद्रसोमा नामवाली
English
Being thus instructed by his mother, Rita-dhvaja’s son t