Markandeya Purana· Mārkaṇḍeya Purāṇa
27
अध्याय 27 / 90

Adhyaya 27

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पूर्ण अध्याय पाठ31 श्लोक

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अध्याय २७

श्लोक 1

इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे पुत्रानुशासनं नाम षड्विंशो ऽध्यायः सप्तविंशो ऽध्यायः जड उवाच एवमुल्लाप्यमानस्तु स तु मात्रा दिने दिने ।ववृधे वयसा बालो बुद्ध्या चालर्कसंज्ञितः

iti śrīmārkaṇḍeyapurāṇe putrānuśāsanaṃ nāma ṣaḍviṃśo 'dhyāyaḥ saptaviṃśo 'dhyāyaḥ jaḍa uvāca evamullāpyamānastu sa tu mātrā dine dine / vavṛdhe vayasā bālo buddhyā cālarkasaṃjñitaḥ

हिन्दी अर्थ

मुनिश्रेष्ठट! यह मैंने केतुमालवर्षके विषयमें कुछ बातें बतायी हैं, अब मुझसे उत्तरकुरुवर्षका वर्णन सुनो। वहाँकी भूमि मणिमयी और वायु सुगन्धित तथा सर्वदा सुख देनेवाली होती है। जो लोग देवलोकसे च्युत होते हैं, वे ही उस देशमें जन्म लेते हैं। उस देशमें गिरिराज चन्द्रकान्त और सूर्यकान्त--ये दो कुलपर्वत हैं। वहाँ भद्रसोमा नामवाली

English

Being thus instructed by his mother, Rita-dhvaja’s son t

अध्याय २७

श्लोक 2

स कौमारकमासाद्य ऋतध्वजसुतस्ततः ।कृतोपनयनः प्राज्ञः प्रणिपत्याह मातरम्

sa kaumārakamāsādya ṛtadhvajasutastataḥ / kṛtopanayanaḥ prājñaḥ praṇipatyāha mātaram

हिन्दी अर्थ

महानदी पवित्र एवं स्वच्छ जलकी धारा बहाती हुई निरन्तर बहती रहती है। इसके सिवा और भी हजारों नदियाँ बहती हैं। कुलपर्वतोंके अतिरिक्त और भी अनेक पर्वत हैं तथा सैकड़ों एवं सहस्रों वन हैं, जहाँ अमृतके समान स्वादिष्ट नाना प्रकारके फल उपलब्ध होते हैं। उत्तरकुख्वर्षमें भी भगवान् श्रीकृष्ण पूर्वकी ओर सिर करके मत्स्यरूपमें विराजमान

English

tained his youth and duly married a wife, and begat soi and as a lord offered sacrifices, and always closely obseryi

अध्याय २७

श्लोक 3

मया यदत्र कर्तव्यमैहिकामुष्मिकाय वै ।सुखाय वद तत् सर्वं प्रश्रयावनतस्य मे

mayā yadatra kartavyamaihikāmuṣmikāya vai / sukhāya vada tat sarvaṃ praśrayāvanatasya me

हिन्दी अर्थ

रहते हैं। उनके भिन्न-भिन्न नौ अवयवोंमें तीन-तीनके क्रमसे सभी नक्षत्र नौ भागोंमें विभक्त होकर स्थित हैं; इसी प्रकार वहाँके देश भी नौ भागोंमें विभक्त हैं। उस देशमें चन्द्रद्दीप और

English

his father’s commands. Then after a long time Rita-dhvaj on reaching extreme old age, anointed his son in the sovereigi

अध्याय २७

श्लोक 4

मदालसोवाच वत्स ! राज्ये ऽभिषिक्तेन प्रजारञ्जनमादितः ।कर्तव्यमविरोधेन स्वधर्मस्य महीभृता

madālasovāca vatsa ! rājye 'bhiṣiktena prajārañjanamāditaḥ / kartavyamavirodhena svadharmasya mahībhṛtā

हिन्दी अर्थ

भद्रद्वीप नामक दो द्वीप हैं, जो समुद्रके भीतर स्थित हैं। ब्रह्म! इस प्रकार मैंने उत्तरकुरुवर्षका वर्णन किया; अब किम्पुरुष आदिका वर्णन सुनो।

English

ty, and with righteous soul desirous to depart to the forest I practise austerities in company with his wife descended/™ his throne., a mighty protector, an illustrious king.

अध्याय २७

श्लोक 5

व्यसनानि परित्यज्य सप्त मूलहराणि वै ।आत्मा रिपुभ्यः संरक्ष्यो बहिर्मन्त्रविनिर्गमात्

vyasanāni parityajya sapta mūlaharāṇi vai / ātmā ripubhyaḥ saṃrakṣyo bahirmantravinirgamāt

हिन्दी अर्थ

वहाँके स्त्री-पुरुष रोग और शोकसे रहित होते हैं। उस वर्षमें प्लक्षवण्ड नामक एक मनोहर वन है, जो नन्दनवनके समान रमणीय जान पड़ता है। वहाँके पुरुष सदा उस वनके फलोंका रस पीते हैं। इससे उनकी जवानी सदा स्थिर रहती है और वहाँकी स्त्रियोंके शरीरसे कमलकी सुगन्ध आती है। किम्पुरुषवर्षके बाद अब हरिवर्षका परिचय दिया जाता

English

And Maddlasd. delivered this her last discourse to her so: in order that her son might abandon attachment to sensuj pleasures.

अध्याय २७

श्लोक 6

अष्टधा नाशमाप्नोति सुचक्रात् स्यन्दनाद्यथा ।तथा राजाप्यसन्दिग्धं बहिर्मन्त्रविनिर्गमात्

aṣṭadhā nāśamāpnoti sucakrāt syandanādyathā / tathā rājāpyasandigdhaṃ bahirmantravinirgamāt

हिन्दी अर्थ

है। वहाँके मनुष्य चाँदीके समान गौरवर्णके होते हैं। देवलोकसे च्युत होनेके कारण उन सबका स्वरूप देवताओंके ही समान होता है। हरिवर्षके सभी मनुष्य उत्तम इक्षुरसका पान करते हैं। वहाँ किसीको वृद्धावस्थाका कष्ट नहीं भोगना पड़ता है। वे सब-के-सब अजर होते हैं। जबतक जीते हैं, नीरोग रहते हैं। अब जम्बूद्वीपके बीचमें स्थित इलावृतवर्षका

English

" When intolerable pain, arising from separation from tk] dear kinsmen, or caused by the opposition of thy enemies, a springing from the destruction of thy wealth or from thy oiH

अध्याय २७

श्लोक 7

दुष्टादुष्टांश्च जानीयादमात्यानरिदोषतः ।चरैश्चरास्तथा शत्रोरन्वेष्टव्याः प्रयत्नतः

duṣṭāduṣṭāṃśca jānīyādamātyānaridoṣataḥ / caraiścarāstathā śatroranveṣṭavyāḥ prayatnataḥ

हिन्दी अर्थ

वर्णन सुनो--इसे मेरुवर्ष भी कहा गया है। वहाँ सूर्य नहीं तपता और मनुष्योंको वृद्धावस्था नहीं सताती। चन्द्रमा, सूर्य, नक्षत्र और ग्रहोंकी किरणें वहाँ प्रकाशमें नहीं आतीं, क्योंकि स्वयं मेरुपर्वतकी प्रभा उन सबकी अपेक्षा बढ़कर होती है। वहाँके मनुष्य जामुनके फलका रस पीते और कमलकी-सी कान्ति धारण करनेवाले, कमलके समान सुगन्धित एवं

English

self, may befall thee as thou rulest thy kingdom, observing tl laws of a householder — for the householder who depends (

अध्याय २७

श्लोक 8

विश्वासो न तु कर्तव्यो राज्ञा मित्राप्तबन्धुषु ।कार्ययोगादमित्रे ऽपि विश्वसीत नराधिपः

viśvāso na tu kartavyo rājñā mitrāptabandhuṣu / kāryayogādamitre 'pi viśvasīta narādhipaḥ

हिन्दी अर्थ

कमलदलके सदृश विशाल नेत्रोंवाले होते हैं। इलावृतवर्षके मध्यमें मेरुपर्वतकी स्थिति है। वह शराव (पुरवे)-के समान नीचे पतला और ऊपर चौड़ा होता गया है। उस वर्षमें महागिरि मेरु ही एक पर्वत है और उसीसे इलावृतवर्षकी प्रसिद्धि हुई है। इसके बाद रम्यकवर्षका वर्णन करता हूँ, सुनो। वहाँ हरे पत्तोंस सुशोभित एक ऊँचा बरगदका वृक्ष है। उसीके

English

selfishness makes unhappiness his abode — then, my son, dr» forth and read from this ring that I have given thee tl writing that is inlaid in delicate letters on the plate."

अध्याय २७

श्लोक 9

स्थानवृद्धिक्षयज्ञेन षाड्गुण्यगुणितात्माना ।भवितव्यं नरेन्द्रेण न कामवशवर्तिना

sthānavṛddhikṣayajñena ṣāḍguṇyaguṇitātmānā / bhavitavyaṃ narendreṇa na kāmavaśavartinā

हिन्दी अर्थ

फलका रस पीकर वहाँके निवासी जीवन निर्वाह करते हैं। वे जरा और दुर्गन्‍्धसे रहित तथा अत्यन्त निर्मल होते हैं। एक दूसरेके प्रति प्रगाढ़ प्रेम ही उनका प्रधान गुण है। उसके उत्तरमें हिरण्मय नामक वर्ष है, जहाँ प्रचुर कमल-वनोंसे सुशोभित हिरण्यवती नामकी नदी बहती है। वहाँके मनुष्य बहुत बड़े बलवान, तेजस्वी, यक्षके समान सुन्दर, महान पराक्रमी,

English

So saying, she gave him a golden ring, and the blessmj

अध्याय २७

श्लोक 10

प्रागात्मा मन्त्रिणश्चैव ततो भृत्या महीभृता ।जेयाश्चानन्तरं पौरा विरुध्येत ततो ऽरिभिः

prāgātmā mantriṇaścaiva tato bhṛtyā mahībhṛtā / jeyāścānantaraṃ paurā virudhyeta tato 'ribhiḥ

हिन्दी अर्थ

धनवान तथा नेत्रोंको प्रिय लगनेवाले होते हैं।

English

appropriate for a man who lives the family life. Kuvalayadva and his queen Maddlasd, bestowing on their

अध्याय २७

श्लोक 11

यस्त्वेतानविजित्यैव वैरिणो विजिगीषते ।सो ऽजितात्मा जितामात्यः शत्रुवर्गेण बाध्यते

yastvetānavijityaiva vairiṇo vijigīṣate / so 'jitātmā jitāmātyaḥ śatruvargeṇa bādhyate

हिन्दी अर्थ

नाउज्रज् सका नही कऋू---7

English

appropriate for a man who lives the family life. Kuvalayadva and his queen Maddlasd, bestowing on their

अध्याय २७

श्लोक 12

तस्मात् कामादयः पूर्वं जेयाः पुत्र ! महीभुजा ।तज्जये हि जयो ऽवश्यं राजा नश्यति तैर्जितः

tasmāt kāmādayaḥ pūrvaṃ jeyāḥ putra ! mahībhujā / tajjaye hi jayo 'vaśyaṃ rājā naśyati tairjitaḥ

हिन्दी अर्थ

स्वरोचिष् तथा स्वारोचिष मनुके जन्म एवं चरित्रका वर्णन

English

appropriate for a man who lives the family life. Kuvalayadva and his queen Maddlasd, bestowing on their

अध्याय २७

श्लोक 13

कामः क्रोधश्च लोभश्च मदो मानस्तथैव च ।हर्षश्च शत्रवो ह्येते विनाशाय महीभृताम्

kāmaḥ krodhaśca lobhaśca mado mānastathaiva ca / harṣaśca śatravo hyete vināśāya mahībhṛtām

हिन्दी अर्थ

क्रौष्टकि बोले--महामुने! आपने मेरे प्रश्नके अनुसार पृथ्वी, समुद्र आदिकी स्थिति तथा प्रमाण आदिका भलीभाँति वर्णन किया। अब मैं मन्वन्तरों, उनके स्वामियों, देवताओं, ऋषियों तथा मनृपुत्रोंका परिचय सुनना चाहता हूँ।

English

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अध्याय २७

श्लोक 14

कामप्रसक्तमात्मानं स्मृत्वा पाण्डुं निपातितम् ।निवर्तयेत्तथा क्रोधादनुह्रादं हतात्मजम्

kāmaprasaktamātmānaṃ smṛtvā pāṇḍuṃ nipātitam / nivartayettathā krodhādanuhrādaṃ hatātmajam

हिन्दी अर्थ

मार्कण्डेयजीने कहा--मुने! मैंने तुम्हें स्वायम्भुव मन्वन्तरकी बातें तो बता दीं अब स्वारोचिष नामक दूसरे मन्वन्तरका वर्णन सुनो। वरुणा नदीके तटपर अरुणास्पद नामक नगरमें एक श्रेष्ठ ब्राह्मण रहते थे। उनका रूप अश्विनीकुमारोंके समान मनोहर था। वे स्वभावसे मृदु, सदाचारी तथा वेद-वेदाड़ोंके पारगामी थे। अतिथियोंके प्रति उनका सदा ही

English

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अध्याय २७

श्लोक 15

हतमैलं तथा लोभान्मदाद्वेनं द्विजैर्हतम् ।मानादनायुषापुत्रं बलिं हर्षात् पुरञ्जयम्

hatamailaṃ tathā lobhānmadādvenaṃ dvijairhatam / mānādanāyuṣāputraṃ baliṃ harṣāt purañjayam

हिन्दी अर्थ

प्रेम बना रहता था। रातको घरपर आये हुए अभ्यागतोंको वे ठहरनेके लिये स्थान देते और उनके भोजन आदिकी भी व्यवस्था करते थे। उनके मनमें प्रायः यह विचार उठा करता था कि “मैं रमणीय वन, उद्यान तथा भाँति-भाँतिके नगरोंसे सुशोभित सम्पूर्ण भूमण्डलको घूम- घूमकर देखूँ।” एक दिन उनके घरपर कोई अतिथि पधारे, जो नाना प्रकारकी ओषधियोंके

English

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अध्याय २७

श्लोक 16

एभिर्जितैर्जितं सर्वं मरुत्तेन महात्मना ।स्मृत्वा विवर्जयेदेतान् दोषान् स्वीयान्महीपतिः

ebhirjitairjitaṃ sarvaṃ maruttena mahātmanā / smṛtvā vivarjayedetān doṣān svīyānmahīpatiḥ

हिन्दी अर्थ

प्रभावको जाननेवाले तथा मन्त्रविद्यामें प्रवीण थे। ब्राह्मणने श्रद्धापूर्ण हृदयसे अतिथिका स्वागत-सत्कार किया। बातचीतके प्रसड्में अभ्यागतने ब्राह्मणसे अनेकों देशों, रमणीय नगरों, वनों, नदियों, पर्वतों और पुण्यतीर्थोकी बातें बतायीं। यह सब सुनकर ब्राह्मणको बड़ा विस्मय हुआ। वे बोले--'विप्रवर! आपने अनेक देश देखनेके कारण बहुत परिश्रम

English

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अध्याय २७

श्लोक 17

काककोकिलभृङ्गाणां मृगव्यालशिखण्डिनाम् ।हंसकुक्कुटलोहानां शिक्षेत चरित नृपः

kākakokilabhṛṅgāṇāṃ mṛgavyālaśikhaṇḍinām / haṃsakukkuṭalohānāṃ śikṣeta carita nṛpaḥ

हिन्दी अर्थ

उठाया है तो भी न तो आप अत्यन्त बूढ़े हुए और न जवानीने ही आपका साथ छोड़ा। थोड़े ही समयमें आप सारी पृथ्वीपर कैसे भ्रमण कर लेते हैं?”

English

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अध्याय २७

श्लोक 18

कीटकस्य क्रियां कुर्यात् विपक्षे मनुजेश्वरः ।चेष्टां पिपीलिकानाञ्च काले भूपः प्रदर्शयेत्

kīṭakasya kriyāṃ kuryāt vipakṣe manujeśvaraḥ / ceṣṭāṃ pipīlikānāñca kāle bhūpaḥ pradarśayet

हिन्दी अर्थ

आगन्तुक ब्राह्मणने कहा--'ब्रह्मन! मन्त्र और ओषधियोंके प्रभावसे मेरी गति कहीं भी नहीं रुकती। मैं आधे दिनमें एक हजार योजन चलता हूँ।'

English

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अध्याय २७

श्लोक 19

ज्ञेयाग्निविस्फुलिङ्गानां बीजचेष्टा च शाल्मलेः ।चन्द्रसूर्यस्वरूपेण नीत्यर्थे पृथिवीक्षिता

jñeyāgnivisphuliṅgānāṃ bījaceṣṭā ca śālmaleḥ / candrasūryasvarūpeṇa nītyarthe pṛthivīkṣitā

हिन्दी अर्थ

किक पा तन ०००--प्महहकानकान हा (७) ॥॥ 0 7, है के, कह, जी, कही कह के। " किक ।/िती०॥क कीच .४

English

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अध्याय २७

श्लोक 20

बन्धकीपद्मशरभशूलिकागुर्विणीस्तनात् ।प्रज्ञा नृपेण चादेया तथा गोपालयोषितः

bandhakīpadmaśarabhaśūlikāgurviṇīstanāt / prajñā nṛpeṇa cādeyā tathā gopālayoṣitaḥ

हिन्दी अर्थ

आगन्तुक ब्राह्मण बड़े विद्वान् थे; अतः गृहस्थ ब्राह्मणको उनकी बातोंपर पूर्ण विश्वास हो गया और वे बड़े आदरके साथ बोले--“भगवन्! मुझपर भी कृपा कीजिये और अपने

English

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अध्याय २७

श्लोक 21

शक्रार्कयमसोमानां तद्वद्वायोर्महीपतिः ।रूपाणि पञ्च कुर्वोत महीपालनकर्मणि

śakrārkayamasomānāṃ tadvadvāyormahīpatiḥ / rūpāṇi pañca kurvota mahīpālanakarmaṇi

हिन्दी अर्थ

उदारचित आगन्तुक ब्राह्मणने उन्हें पैरमें लगानेके लिये एक लेप दिया और वे जिस दिशाको जाना चाहते थे, उसे अपने मन्त्रसे अभिमन्त्रित किया। वह लेप अपने पैरोंमें लगाकर ब्राह्मण देवता अनेकों झरनोंसे सुशोभित हिमालय पर्वतको देखनेके लिये गये। उन्होंने सोचा था कि “मैं आधे दिनमें एक हजार योजन दूर जाऊँगा और शेष आधे दिनमें

English

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अध्याय २७

श्लोक 22

यथेन्द्रश्चतुरो मासान् तोयोत्सर्गेण भूगतम् ।आप्याययेत्तथा लोकं परिहारैर्महीपतिः

yathendraścaturo māsān toyotsargeṇa bhūgatam / āpyāyayettathā lokaṃ parihārairmahīpatiḥ

हिन्दी अर्थ

पुनः घर लौट आऊँगा।” वे हिमालयके शिखरपर पहुँच गये; किन्तु शरीरमें अधिक थकावट नहीं हुई। उन्होंने वहाँकी पर्वतीय भूमिपर पैदल ही विचरना आरम्भ किया। बर्फपर चलनेके कारण उनके पैरोंमें लगा हुआ दिव्य ओषधिका लेप धुल गया। इससे उनकी तीव्र-गति कुण्ठित हो गयी। अब वे इधर-उधर घूमकर हिमालयके अत्यन्त मनोहर शिखरोंका

English

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अध्याय २७

श्लोक 23

मासानष्टौ यथा सूर्यस्तोयं हरति रश्मिभिः ।सूक्ष्मेणैवाभ्युपायेन तथा शुल्कादिकं नृपः

māsānaṣṭau yathā sūryastoyaṃ harati raśmibhiḥ / sūkṣmeṇaivābhyupāyena tathā śulkādikaṃ nṛpaḥ

हिन्दी अर्थ

अवलोकन करने लगे। वहाँ सिद्ध और गन्धर्व रहते थे। किन्नरगण विहार करते थे तथा इधर-उधर देवता आदिके क्रीडा-विहारसे वहाँ रमणीयता बहुत बढ़ गयी थी। सैकड़ों दिव्य

English

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अध्याय २७

श्लोक 24

यथा यमः प्रियद्वेष्ये प्राप्तकाले नियच्छति ।तथा प्रियाप्रिये राजा दुष्टादुष्टे समो भवेत्

yathā yamaḥ priyadveṣye prāptakāle niyacchati / tathā priyāpriye rājā duṣṭāduṣṭe samo bhavet

हिन्दी अर्थ

अप्सराओंसे भरे हुए वहाँके मनोहर शिखरोंका दर्शन करनेसे ब्राह्मणदेवताको तृप्ति नहीं हुई उनके शरीरमें रोमाउच हो आया।

English

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अध्याय २७

श्लोक 25

पूर्णेन्दुमालोक्य यथा प्रीतिमान् जायते नरः ।एवं यत्र प्रजाः सर्वा निर्वत्तास्तच्छशिव्रतम्

pūrṇendumālokya yathā prītimān jāyate naraḥ / evaṃ yatra prajāḥ sarvā nirvattāstacchaśivratam

हिन्दी अर्थ

फिर दूसरे दिन आनेका विचार करके जब वे घर जानेको उद्यत हुए तो उन्हें अपने पैरोंकी गति कुण्ठित जान पड़ी। वे सोचने लगे--“अहो! यहाँ बर्फके पानीसे मेरे पैरका लेप धुल गया। इधर यह पर्वत अत्यन्त दुर्गग है और अपने घरसे बहुत दूर चला आया हूँ। अब तो घरपर न पहुँच सकनेके कारण मेरे अग्निहोत्र आदि नित्यकर्मकी हानि होना चाहती है।

English

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अध्याय २७

श्लोक 26

मारुतः सर्वभूतेषु निगूढश्चरते यथा ।एवं नृपश्चरेच्चारैः पौरामात्यादिबन्धुषु

mārutaḥ sarvabhūteṣu nigūḍhaścarate yathā / evaṃ nṛpaścareccāraiḥ paurāmātyādibandhuṣu

हिन्दी अर्थ

यहाँ रहकर वह सब कैसे करूँगा। यह तो मेरे ऊपर बहुत बड़ा संकट आ रहा है। इस अवस्थामें यदि मुझे किन्हीं तपस्वी महात्माका दर्शन हो जाता तो घर पहुँचनेके लिये मुझे कोई उपाय बतलाते।'

English

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अध्याय २७

श्लोक 27

न लोभाद्वा न कामाद्वा नार्थाद्वा यस्य मानसम् ।यथान्यैः कृष्यते वत्स ! स राजा स्वर्गमृच्छति

na lobhādvā na kāmādvā nārthādvā yasya mānasam / yathānyaiḥ kṛṣyate vatsa ! sa rājā svargamṛcchati

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार विचार करते हुए ब्राह्मण देवता हिमालयपर विचरने लगे। चरणोंकी ओषधिजनित शक्ति नष्ट हो जानेके कारण उन्हें बड़ी चिन्ता हो रही थी। इस प्रकार वहाँ घूमते हुए ब्राह्मणपर एक श्रेष्ठ अप्सराकी दृष्टि पड़ी, जो अपने मनोहर रूपके कारण बड़ी शोभा पा रही थी। उसका नाम वरूथिनी था। उन्हें देखते ही वरूथिनी कामदेवके वशीभूत

English

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अध्याय २७

श्लोक 28

उत्पथग्राहिणो मूढान् स्वधर्माच्चलतो नरान् ।यः करोति निजे धर्मे स राजा स्वर्गमृच्छति

utpathagrāhiṇo mūḍhān svadharmāccalato narān / yaḥ karoti nije dharme sa rājā svargamṛcchati

हिन्दी अर्थ

हो गयी। उन श्रेष्ठ ब्राह्मणके प्रति तत्काल उसका प्रेम हो गया। वह सोचने लगी, “ये कौन हैं? इनका रूप तो बड़ा ही मनोहर है। यदि ये मुझे ठुकरा न दें तो मेरा जन्म सफल हो जाय। मैंने बहुत-से देवता, हैत्य, सिद्ध, गन्धर्व और नागोंको देखा है; किन्तु एक भी इन महात्माके समान रूपवान् नहीं है। जिस प्रकार इनमें मेरा अनुराग हो गया है, उसी प्रकार

English

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अध्याय २७

श्लोक 29

वर्णधर्मा न सीदन्ति यस्य राज्ये तथाश्रमाः ।वत्स ! तस्य सुखं प्रेत्य परत्रेह च शाश्वतम्

varṇadharmā na sīdanti yasya rājye tathāśramāḥ / vatsa ! tasya sukhaṃ pretya paratreha ca śāśvatam

हिन्दी अर्थ

यदि ये भी मुझमें अनुरक्त हो जायेँ तो मेरा काम बन जाय। फिर तो मैं यह समझूँगी कि मैंने बहुत बड़े पुण्यका उपार्जन किया है।'

English

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अध्याय २७

श्लोक 30

एतद्राज्ञः परं कृत्यं तथैतत् सिद्धिकारकम् ।स्वधर्मस्थापनं नृणां चाल्यन्ते ये कुबुद्धिभिः

etadrājñaḥ paraṃ kṛtyaṃ tathaitat siddhikārakam / svadharmasthāpanaṃ nṛṇāṃ cālyante ye kubuddhibhiḥ

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार चिन्ता करती हुई वह दिव्यलोककी सुन्दरी युवती कामदेवसे व्याकुल हो अत्यन्त मनोहर रूप धारण किये उनके सामने उपस्थित हुई। सुन्दर रूपवाली वरूथिनीको देखकर ब्राह्मणकुमार स्वागतपूर्वक उसके पास गये और इस प्रकार बोले--“नूतन कमलके समान कान्तिवाली सुन्दरी! तुम कौन हो? किसकी कन्या हो? और यहाँ क्या करती हो? मैं

English

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अध्याय २७

श्लोक 31

पालनेनैव भूतानां कृतकृत्यो महीपतिः ।सम्यक् पालयिता भागं धर्मस्याप्नोति यत्नतः

pālanenaiva bhūtānāṃ kṛtakṛtyo mahīpatiḥ / samyak pālayitā bhāgaṃ dharmasyāpnoti yatnataḥ

हिन्दी अर्थ

ब्राह्मण हूँ और अरुणास्पद नगरसे यहाँ आया हूँ। मेरे पैरोंमें दिव्य लेप लगा हुआ था, जो बर्फके जलसे धुल गया है। इसीलिये मैं दूर-गमनकी शक्तिसे रहित होनेके कारण यहाँ आ

English

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स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_mArkaNDeyapurANa1-93.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Markandeya Purana — Chapter 27
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