Markandeya Purana· Mārkaṇḍeya Purāṇa
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अध्याय 30 / 90

Adhyaya 30

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अध्याय ३०

श्लोक 1

इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे मदालसोपदेशो नामोनत्रिंशो ऽध्यायः त्रिंशो ऽध्यायः मदालसोवाच नित्यं नैमित्तकञ्चैव नित्यनैमित्तिकं तथा ।गृहस्थस्य तु यत् कर्म तन्निशामय पुत्रक !

iti śrīmārkaṇḍeyapurāṇe madālasopadeśo nāmonatriṃśo 'dhyāyaḥ triṃśo 'dhyāyaḥ madālasovāca nityaṃ naimittakañcaiva nityanaimittikaṃ tathā / gṛhasthasya tu yat karma tanniśāmaya putraka !

हिन्दी अर्थ

त्याग नहीं करती। मकर नामकी तीसरी निधि तमोगुणी होती है। उसकी दृष्टि पड़नेपर सुशील मनुष्य भी प्रायः तमोगुणी बन जाता है। वह बाण, खड्ग, ऋष्टि, धनुष, ढाल तथा दंशन करनेवाली वस्तुओंका संग्रह करता, राजाओंके साथ मैत्री जोड़ता, शौर्यसे जीविका चलानेवाले क्षत्रियों तथा उनके प्रेमियोंको धन देता है। अस्त्र-शस्त्रोंके सिवा और किसी

English

^oi'lalpe read lampe j so a MS. in the Sanskrit College.

अध्याय ३०

श्लोक 2

पञ्चयज्ञाश्रितं नित्यं यदेतत् कथितं तव ।नैमित्तिकं तथैवान्यत् पुत्रजन्मक्रियादिकम्

pañcayajñāśritaṃ nityaṃ yadetat kathitaṃ tava / naimittikaṃ tathaivānyat putrajanmakriyādikam

हिन्दी अर्थ

वस्तुके क्रय-विक्रयमें उसका मन नहीं लगता। यह निधि एक ही मनुष्यतक सीमित रहती है। उसके पुत्रोंका साथ नहीं देती। वह मनुष्य धनके कारण लुटेरोंके हाथसे अथवा संग्राममें मारा जाता है। कच्छप नामकी जो निधि है, उसकी दृष्टि पड़नेपर भी मनुष्यमें तमोगुणकी प्रधानता होती है। क्योंकि वह भी तामसी निधि है। वह मनुष्य सब व्यवहार पुण्यात्माओंके

English

faults tend to his hindrance. Hearken to mo in this. Deafness, stupidity, failure of memory, dumbness, blindness and fever —

अध्याय ३०

श्लोक 3

नित्यनैमित्तिकं ज्ञेयं पर्वश्राद्धादि पण्डितैः ।तत्र नैमित्तिकं वक्ष्ये श्राद्धमभ्युदयं तव

nityanaimittikaṃ jñeyaṃ parvaśrāddhādi paṇḍitaiḥ / tatra naimittikaṃ vakṣye śrāddhamabhyudayaṃ tava

हिन्दी अर्थ

साथ ही करता है। किन्तु किसीपर विश्वास नहीं करता। जैसे कछुआ अपने सब अड़ोंको समेट लेता है, उसी प्रकार वह सब ओरसे रत्नोंका संग्रह करके उनकी रक्षाके लिये व्याकुल रहता है। धनके नष्ट हो जानेके भयसे न तो वह दान करता है और न उसे अपने उपभोगमें ही लाता है। अपितु उसे पृथ्वीमें गाड़कर रखता है। वह निधि भी एक ही पीढ़ीतक रहती है।

English

tliose several evils straightway befall him who practises yoga in ignorance.

अध्याय ३०

श्लोक 4

पुत्रजन्मनि यत्कार्यं जातकर्मसमं नरैः ।विवाहादौ च कर्तव्यं सर्वं सम्यक् क्रिमोदितम्

putrajanmani yatkāryaṃ jātakarmasamaṃ naraiḥ / vivāhādau ca kartavyaṃ sarvaṃ samyak krimoditam

हिन्दी अर्थ

मुकुन्द नामकी जो पाँचवीं निधि है, वह रजोगुणमयी है। उसकी दृष्टि पड़नेपर मनुष्य रजोगुणी होता है और वीणा, वेणु एवं मृदड़ आदि वाद्योंका संग्रह करता है। वह गाने और नाचनेवालोंको ही धन देता तथा सूत, वन्दी, धूर्त एवं नट आदिको प्रतिदिन भोगकी वस्तुएँ अर्पित करता है। यह निधि भी एक ही मनुष्यतक रह जाती है। इससे भिन्न जो नन्‍्द नामकी

English

abstraction, is called twelve pr^nayamas. Two kinds of dliarana are known in religious devotion by devotees who are conversant with the truth. Moreover when a religioag

अध्याय ३०

श्लोक 5

पितरश्चात्र सम्पूज्याः ख्याता नान्दीमुखास्तु ये ।पिण्डांश्च दधिसंमिश्रान् दद्याद् यवसमन्वितान्

pitaraścātra sampūjyāḥ khyātā nāndīmukhāstu ye / piṇḍāṃśca dadhisaṃmiśrān dadyād yavasamanvitān

हिन्दी अर्थ

महानिधि है, वह रजोगुण और तमोगुण दोनोंसे संयुक्त है। उसकी दृष्टि पड़नेपर मनुष्य अधिक जड़ताको प्राप्त होता है। वह समस्त धातुओं, रत्नों और पवित्र धान्‍न्य आदिका संग्रह तथा क्रय-विक्रय करता है। महामुने! वह मनुष्य स्वजनों तथा घरपर आये हुए अतिथियोंका आधार होता है, परन्तु अपमानकी थोड़ी-सी भी बात नहीं सहन करता। जब

English

devotee is steeped in devotion and controls his soul, all hig faults perish, and he becomes whole; and he sees supreme

अध्याय ३०

श्लोक 6

उदङ्मुखः प्राङ्मुखो वा यजमानः समाहितः ।वैश्वदेवविहीनं तत् केचिदिच्छन्ति मानवाः

udaṅmukhaḥ prāṅmukho vā yajamānaḥ samāhitaḥ / vaiśvadevavihīnaṃ tat kecidicchanti mānavāḥ

हिन्दी अर्थ

कोई उसकी स्तुति करता है, तब वह बहुत प्रसन्न होता है। स्तुति करनेवाला याचक जिस- जिस वस्तुकी इच्छा करता है, वह सब उसे देता है। उसका स्वभाव कोमल बन जाता है। उसके बहुत-सी स्त्रियाँ होती हैं, जो संतानवती और अत्यन्त सुन्दरी होती हैं। नन्दनामक निधि आठ भागसे बढ़ते-बढ़ते सात पीढ़ीतक मनुष्यका साथ देती है। वह सब पुरुषोंको

English

Brahma and the qualities of Nature separately, the sky and

अध्याय ३०

श्लोक 7

युग्माश्चात्र द्विजाः कार्यास्ते च पूज्याः प्रदक्षिणम् ।एतन्नैमित्तिकं वृद्धौ तथान्यच्चौर्ध्वदेहिकम्

yugmāścātra dvijāḥ kāryāste ca pūjyāḥ pradakṣiṇam / etannaimittikaṃ vṛddhau tathānyaccaurdhvadehikam

हिन्दी अर्थ

दीर्घायु बनाती और दूरसे आये हुए बन्धु-बान्धवोंका भरण-पोषण करती है। परलोकके प्रति उसके हृदयमें आदर नहीं होता। इस निधिको पाया हुआ पुरुष सहवासियोंपर स्नेह नहीं रखता। पहलेके मित्रोंसे उदासीन हो जाता और दूसरोंसे प्रेम करता है। इसी प्रकार जो महानिधि सत्त्वगुण और रजोगुण दोनोंको साथ-साथ धारण करती है, उसका नाम नील है।

English

intent on' restraining his breath, should occupy ground, which has been thoroughly and gradually reclaimed, as it were his house. Unreclaimed ground when it is taken possession of

अध्याय ३०

श्लोक 8

मृताहनि च कर्तव्यमेकोद्दिष्टं शृणुष्व तत् ।दैवहीनं तथा कार्यं तथैवैकपवित्रकम्

mṛtāhani ca kartavyamekoddiṣṭaṃ śṛṇuṣva tat / daivahīnaṃ tathā kāryaṃ tathaivaikapavitrakam

हिन्दी अर्थ

उसके सम्पर्कमें आनेवाला पुरुष भी सत्त्वगुण एवं रजोगुणसे युक्त होता है। वह वस्त्र, कपास, धान्य, फल, फूल, मोती, मूँगा, शड्ख, सीपी, काष्ठ तथा जलसे पैदा होनेवाली अन्यान्य वस्तुओंका संग्रह एवं क्रय-विक्रय करता है। वह मनुष्य तालाब और बावली बनवाता, बगीचे लगाता, नदियोंपर पुल बँधवाता तथा अच्छे-अच्छे वृक्षोंको रोपता है।

English

increases faults, diseases and foolishness, therefore he should not occupy unreclaimed ground.

अध्याय ३०

श्लोक 9

आवाहनं न कर्तव्यमग्नौकरणवर्जितम् ।प्रेतस्य पिण्डमेकञ्च दद्यादुच्छिष्टसन्निधौ

āvāhanaṃ na kartavyamagnaukaraṇavarjitam / pretasya piṇḍamekañca dadyāducchiṣṭasannidhau

हिन्दी अर्थ

चन्दन और फूल आदि भोगोंका उपभोग करके ख्याति लाभ करता है। यह नीलनिधि तीन पीढ़ियोंतक चलती है। शडूख नामकी जो आठवीं निधि है, वह रजोगुण और तमोगुणसे युक्त होती है तथा अपने स्वामीको भी ऐसे ही गुणोंसे युक्त बना देती है। ब्रह्मन्! यह निधि एक ही पुरुषतक सीमित रहती है, दूसरेको नहीं मिलती। क्रौष्टके! जिसके पास शड़ख

English

restriction* placed on the breath; and this is called ‘ dharana’

अध्याय ३०

श्लोक 10

तिलोदकं चापसव्यं तन्नामस्मरणान्वितम् ।अक्षय्यममुकस्येति स्थाने विप्रविसर्जने

tilodakaṃ cāpasavyaṃ tannāmasmaraṇānvitam / akṣayyamamukasyeti sthāne vipravisarjane

हिन्दी अर्थ

नामक निधि होती है, उसके स्वरूपका वर्णन सुनो। वह अपने कमाये हुए अन्न और वस्त्रका अकेला ही उपभोग करता है। उसके कुटुम्बी लोग खराब अन्न खाते हैं। उन्हें पहननेको अच्छे वस्त्र नहीं मिलते। शड्खनिधिसे युक्त मनुष्य सदा अपना ही पेट पालनेमें लगा रहता है। मित्र, भार्या, भ्राता, पुत्र तथा वधू आदिको कुछ भी नहीं देता। इस प्रकार ये निधियाँ

English

the organs, which are occupied with words and other aedm^ are restrained by religious devotees by means of devotion, that is called ‘ pratyahara,’ or restraining the senses.

अध्याय ३०

श्लोक 11

अभिरण्यतामिति ब्रूयाद् ब्रूयुस्ते ऽभिरताः स्म ह ।प्रतिमासं भवेदेतत् कार्यमा वत्सरं नरैः

abhiraṇyatāmiti brūyād brūyuste 'bhiratāḥ sma ha / pratimāsaṃ bhavedetat kāryamā vatsaraṃ naraiḥ

हिन्दी अर्थ

मनुष्योंके अर्थकी अधिष्ठात्री देवी कहलाती हैं। जिस निधिका जैसा स्वभाव बतलाया गया है, उसकी दृष्टि पड़नेपर मनुष्य वैसे ही स्वभावका हो जाता है। पद्मिनी नामकी विद्या इन सब निधियोंकी स्वामिनी है। यह साक्षात् लक्ष्मीजीका स्वरूप है।

English

wore religious devotees, so that diseases and other faults may not spring up in a religious devotee. Just as the thirsty may

अध्याय ३०

श्लोक 12

अथ संवत्सरे पूर्णे यदा वा क्रियते नरैः ।सपिण्डीकरणं कार्यं तस्यापि विधिरुच्यते

atha saṃvatsare pūrṇe yadā vā kriyate naraiḥ / sapiṇḍīkaraṇaṃ kāryaṃ tasyāpi vidhirucyate

हिन्दी अर्थ

राजा उत्तमका चरित्र तथा औत्तम मन्वन्तरका वर्णन

English

drink water gradually by vessels, pipes and other mans, bo a religious devotee who has overcome his distress may drink air. First in the navel, and next in the heart, and thirdly in the

अध्याय ३०

श्लोक 13

तच्चापि दैवरहितमेकार्घ्यैकपवित्रकम् ।नैवाग्नौकरणं तत्र तच्चावाहनवर्जितम्

taccāpi daivarahitamekārghyaikapavitrakam / naivāgnaukaraṇaṃ tatra taccāvāhanavarjitam

हिन्दी अर्थ

क्रौ्टकि बोले-ब्रह्मम! आपने स्वारोचिष मन्वन्तरका वृत्तान्त मुझे विस्तारके साथ सुनाया, साथ ही मेरे प्रश्नके अनुसार आठ निधियोंका भी वर्णन किया। स्वायम्भुव मन्वन्तरका वर्णन तो पहले ही हो चुका है। अब उत्तम नामक तीसरे मन्वन्तरकी कथा सुनाइये।

English

breast, then in the neck, the mouth, the tip of the noso, in the eye, eye-brows, and the middle of the head, and in what is

अध्याय ३०

श्लोक 14

अपसव्यञ्च तत्रापि भोजयेदयुजो द्विजान् ।विशेषस्तत्र चान्यो ऽस्ति प्रतिमासं क्रियाधिकः

apasavyañca tatrāpi bhojayedayujo dvijān / viśeṣastatra cānyo 'sti pratimāsaṃ kriyādhikaḥ

हिन्दी अर्थ

मार्कण्डेयजीने कहा--राजा उत्तानपादके सुरुचिके गर्भसे एक उत्तम नामक पुत्र उत्पन्न हुआ था, जो महान् बलवान् और पराक्रमी था। शत्रु और मित्रमें तथा पुत्र और पराये मनुष्यमें उसका समान भाव था। वह धर्मका ज्ञाता था और दुष्टोंक लिये यमराजके समान भयड्कर एवं साधु-पुरुषोंके लिये

English

there-beyond, is known the highest mental abstraction. By attaining to these ten mental abstractions he reaches equality with the imperishable. Not puffed up, nor hungry, uor

अध्याय ३०

श्लोक 15

तं कथ्यमानमेकाग्रो वदन्त्या मे निशामय ।तिलगन्धोदकैर्युक्तं तत्र पात्रचतुष्टयम्

taṃ kathyamānamekāgro vadantyā me niśāmaya / tilagandhodakairyuktaṃ tatra pātracatuṣṭayam

हिन्दी अर्थ

चन्द्रमाके समान आनन्ददायी था। राजकुमार उत्तमने बभ्रुकुमारी बहुलाके साथ विवाह किया था। वे सदा उसीमें आसक्त रहते थे। उनका मन और किसी काममें नहीं लगता था, स्वप्रमें भी उनका चित्त बहुलामें ही लगा रहता था। वे सदा रानीकी इच्छाके अनुसार ही चलते थे तो भी वह कभी उनके अनुकूल नहीं

English

wearied, and undisturbed in mind, the yogi should practice his yoga respectfully in order to attain final occupation, B king!

अध्याय ३०

श्लोक 16

कुर्यात् पितॄणां त्रितयमेकं प्रेतस्य पुत्रक ।पात्रत्रये प्रेतपात्रमर्घ्यञ्चैव प्रसेचयेत्

kuryāt pitṝṇāṃ tritayamekaṃ pretasya putraka / pātratraye pretapātramarghyañcaiva prasecayet

हिन्दी अर्थ

होती थी। एक समय दूसरे-दूसरे राजाओंके समक्ष ही रानीने राजाकी आज्ञा माननेसे इन्कार कर दिया। इससे उन्हें बड़ा क्रोध हुआ। वे कुपित सर्पकी भाँति फुफकारते हुए द्वारपालसे बोले--“दरबान! तू इस दुष्टह्ृदया स्त्रीको निर्जन वनमें ले जाकर छोड़ दे। यह मेरी आज्ञा है, अतः तुझे इसपर कुछ सोच-विचार

English

wearied, and undisturbed in mind, the yogi should practice his yoga respectfully in order to attain final occupation, B king!

अध्याय ३०

श्लोक 17

ये समाना इति जपन् पूर्ववच्छेषमाचरेत् ।स्त्रीणामप्येवमेवैतदेकीद्दिष्टमुदाहृतम्

ye samānā iti japan pūrvavaccheṣamācaret / strīṇāmapyevamevaitadekīddiṣṭamudāhṛtam

हिन्दी अर्थ

करनेकी आवश्यकता नहीं है।'

English

wearied, and undisturbed in mind, the yogi should practice his yoga respectfully in order to attain final occupation, B king!

अध्याय ३०

श्लोक 18

सपिण्डीकरणं तासां पुत्राभावे न विद्यते ।प्रतिसंवत्सरं कार्यमेकोद्दिष्टं नरैः स्त्रियाः

sapiṇḍīkaraṇaṃ tāsāṃ putrābhāve na vidyate / pratisaṃvatsaraṃ kāryamekoddiṣṭaṃ naraiḥ striyāḥ

हिन्दी अर्थ

तब राजाकी आज्ञाको अविचारणीय मानकर द्वारपाल रानीको रथपर बिठा वनमें छोड़ आया। राजाके द्वारा इस प्रकार निर्जन वनमें त्यागी जानेपर बहुलाने उनकी दृष्टिसे दूर होनेके कारण अपने ऊपर राजाका बहुत बड़ा अनुग्रह माना। उधर राजा अपने औरस पुत्रोंकी भाँति प्रजाका पालन करते हुए समय व्यतीत

English

wearied, and undisturbed in mind, the yogi should practice his yoga respectfully in order to attain final occupation, B king!

अध्याय ३०

श्लोक 19

मृताहनि यथान्यायं नृणां यद्वदिहोदितम् ।पुत्राभावे सपिण्डास्तु तदभावे सहोदकाः

mṛtāhani yathānyāyaṃ nṛṇāṃ yadvadihoditam / putrābhāve sapiṇḍāstu tadabhāve sahodakāḥ

हिन्दी अर्थ

करने लगे। एक दिनकी बात है, कोई ब्राह्मण उनके दरबारमें आया और अत्यन्त दुःखितचित्त होकर इस प्रकार कहने लगा।

English

wearied, and undisturbed in mind, the yogi should practice his yoga respectfully in order to attain final occupation, B king!

अध्याय ३०

श्लोक 20

मातुः सपिण्डा ये च स्युर्ये च मातुः सहोदकाः ।कुर्युरेनं विधिं सम्यगपुत्रस्य सुतासुतः

mātuḥ sapiṇḍā ye ca syurye ca mātuḥ sahodakāḥ / kuryurenaṃ vidhiṃ samyagaputrasya sutāsutaḥ

हिन्दी अर्थ

ब्राह्मण बोला--महाराज! मैं बहुत दुःखी हूँ, मेरी बात सुनिये; क्योंकि राजाके सिवा और किसीसे मनुष्योंकी संकटसे रक्षा नहीं हो सकती। रातको सोते समय मेरे घरका दरवाजा खोले बिना ही कोई मेरी स्त्रीको चुरा ले गया है। आप उसे पता लगाकर ला देनेकी कृपा करें। राजन! हमारी आय और धर्मका

English

wearied, and undisturbed in mind, the yogi should practice his yoga respectfully in order to attain final occupation, B king!

अध्याय ३०

श्लोक 21

कुर्युर्मातामहायैवं पुत्रिकास्तनयास्तथा ।द्व्यामुष्यायणसंज्ञास्तु मातामहपितामहान्

kuryurmātāmahāyaivaṃ putrikāstanayāstathā / dvyāmuṣyāyaṇasaṃjñāstu mātāmahapitāmahān

हिन्दी अर्थ

रक्षक हैं। आपसे रक्षित होनेके कारण ही मनुष्य रात्रिमें निश्चिन्त होकर सोते हैं।

English

wearied, and undisturbed in mind, the yogi should practice his yoga respectfully in order to attain final occupation, B king!

अध्याय ३०

श्लोक 22

पूजयेयुर्यथान्यायं श्राद्धैर्नैमित्तिकैरपि ।सर्वाभावे स्त्रियः कुर्युः स्वभर्तॄणाममन्त्रकम्

pūjayeyuryathānyāyaṃ śrāddhairnaimittikairapi / sarvābhāve striyaḥ kuryuḥ svabhartṝṇāmamantrakam

हिन्दी अर्थ

राजाने पूछा--ब्रह्मन! आपकी स्त्री शरीरसे कैसी है, यह मैंने कभी नहीं देखा है। उसकी अवस्था क्‍या है, यह भी आपको ही बतलाना होगा। साथ ही

English

wearied, and undisturbed in mind, the yogi should practice his yoga respectfully in order to attain final occupation, B king!

अध्याय ३०

श्लोक 23

तदभावे च नृपतिः कारयेत् स्वकुटुम्बिना ।तज्जातीयैर्नरैः सम्याग् दाहाद्याः सकलाः क्रियाः

tadabhāve ca nṛpatiḥ kārayet svakuṭumbinā / tajjātīyairnaraiḥ samyāg dāhādyāḥ sakalāḥ kriyāḥ

हिन्दी अर्थ

तो बहुत ऊँची है, किन्तु बाँहें छोटी, मुँह दुबला-पतला और शरीर कुरूप है। यह मैं उसकी निन्दा नहीं करता, ठीक-ठीक हुलिया बतलाता हूँ। उसकी बातें बड़ी कड़वी होती हैं तथा स्वभावसे भी वह कोमल नहीं है। उसकी पहली अवस्था कुछ-कुछ बीत चुकी है।

English

wearied, and undisturbed in mind, the yogi should practice his yoga respectfully in order to attain final occupation, B king!

अध्याय ३०

श्लोक 24

सर्वेषामेव वर्णानां बान्धवो नृपतिर्यतः ।एतास्ते कथिता वत्स ! नित्यनैमित्तकास्तथा

sarveṣāmeva varṇānāṃ bāndhavo nṛpatiryataḥ / etāste kathitā vatsa ! nityanaimittakāstathā

हिन्दी अर्थ

राजाने कहा--ब्राह्मण! ऐसी स्त्री लेकर कया करोगे। मैं तुम्हें दूसरी भार्या देता हूँ। अच्छे स्वभावकी स्त्री ही कल्याणमयी एवं सुख देनेवाली होती है। वैसी स्त्री तो केवल दुःखका ही कारण है। रूप और शील दोनोंसे हीन होनेके कारण वह स्त्री त्याग देनेयोग्य है।

English

wearied, and undisturbed in mind, the yogi should practice his yoga respectfully in order to attain final occupation, B king!

अध्याय ३०

श्लोक 25

क्रियां श्राद्धाश्रयामन्यां नित्यनैमित्तिकीं शृणु ।दर्शस्तत्र निमित्तं वै कालश्चन्द्रक्षयात्मकः ।नित्यातां नियतः कालस्तस्याः संसूचयत्यथ

kriyāṃ śrāddhāśrayāmanyāṃ nityanaimittikīṃ śṛṇu / darśastatra nimittaṃ vai kālaścandrakṣayātmakaḥ / nityātāṃ niyataḥ kālastasyāḥ saṃsūcayatyatha

हिन्दी अर्थ

ब्राह्मण बोला--राजन्! अपनी पत्नीकी रक्षा करनी चाहिए--यह श्रुतिका उत्तम आदेश है। उसकी रक्षा न करनेपर उससे वर्णसंकरकी उत्पत्ति होती है। वर्णसंकर अपने पितरोंको स्वर्गसे नीचे गिरा देता है। पत्नी न होनेके कारण मेरे

English

wearied, and undisturbed in mind, the yogi should practice his yoga respectfully in order to attain final occupation, B king!

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_mArkaNDeyapurANa1-93.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Markandeya Purana — Chapter 30
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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