Markandeya Purana· Mārkaṇḍeya Purāṇa
34
अध्याय 34 / 90

Adhyaya 34

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अध्याय ३४

श्लोक 1

इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे काम्यश्राद्धफलकथनं नाम त्रयस्त्रिंशो ऽध्यायः चतुस्त्रिंशो ऽध्यायः मदालसोवाच एवं पुत्र ! गृहस्थेन देवताः पितरस्तथा ।संपूज्या हव्यकव्याभ्यामन्नेनातिथिबान्धवाः

iti śrīmārkaṇḍeyapurāṇe kāmyaśrāddhaphalakathanaṃ nāma trayastriṃśo 'dhyāyaḥ catustriṃśo 'dhyāyaḥ madālasovāca evaṃ putra ! gṛhasthena devatāḥ pitarastathā / saṃpūjyā havyakavyābhyāmannenātithibāndhavāḥ

हिन्दी अर्थ

गर्गने कहा--मुनिश्रेष्ठ! तुम्हारा यह पुत्र रेवती नक्षत्रके अन्तिम चरणमें उत्पन्न हुआ है, अतः दूषित समयमें जन्म ग्रहण करनेके कारण यह तुम्हारे लिये दुःखदायी हो गया है।

English

roll, thereforo I have attained the prosperity that is bound; up with thy patronage."

अध्याय ३४

श्लोक 2

भूतानि भृत्याः सकलाः पशुपक्षिपिपीलिकाः ।भिक्षवो याचमानाश्च ये चान्ये वसता गृहे

bhūtāni bhṛtyāḥ sakalāḥ paśupakṣipipīlikāḥ / bhikṣavo yācamānāśca ye cānye vasatā gṛhe

हिन्दी अर्थ

ऋतवाक् बोले--मेरे एक ही पुत्र था तो भी रेवती नक्षत्रके अन्तिम भागमें उत्पन्न होके कारण इसमें ऐसी दुष्टता आ गयी; इसलिये रेवतीका शीघ्र ही पतन हो जाय।

English

grandfather and is dominated by Alarka/ Thereupon attacked the kingdom of this thy younger brother, n brought this army for thee. Therefore enjoy it as befits t race."*

अध्याय ३४

श्लोक 3

सदाचारवता तात ! साधुना गृहमेधिना ।पापं भुङ्क्ते समुल्लङ्घ्य नित्यनैमित्तिकीः क्रियाः

sadācāravatā tāta ! sādhunā gṛhamedhinā / pāpaṃ bhuṅkte samullaṅghya nityanaimittikīḥ kriyāḥ

हिन्दी अर्थ

मुनिके इस प्रकार शाप देते ही रेवती नक्षत्र आकाशसे गिरा। सारा संसार चकितचित्त होकर यह दृश्य देख रहा था। वह नक्षत्र कुमुदगिरिके चारों ओर गिर पड़ा। वहाँके वन, गुफाएँ तथा झरने आदि सहसा उद्भासित हो उठे। रेवती नक्षत्रके गिरनेसे कुमुदगिरिका नाम रैवतक पर्वत हो गया। उस नक्षत्रकी जो कान्ति थी, वह कमलमण्डित सरोवरके रूपमें

English

stirred thee up. Sir, to an unwonted endeavour. Thisi brother, who understands truth is addictedf to uurefin

अध्याय ३४

श्लोक 4

अलर्क उवाच कथितं मे त्वया मातर्नित्य नैमित्तिकञ्च यत् ।नित्यनैमित्तिकञ्चैव त्रिविधं कर्म पौरुषम्

alarka uvāca kathitaṃ me tvayā mātarnitya naimittikañca yat / nityanaimittikañcaiva trividhaṃ karma pauruṣam

हिन्दी अर्थ

प्रकट हुई। उस समय उस सरोवरसे एक अत्यन्त सुन्दरी कन्याका प्रादुर्भाव हुआ। वह रेवतीकी कान्तिसे प्रकट हुई थी, इसलिये प्रमुच मुनिने उसे देखकर उसका नाम रेवती रख दिया। वह उनके आश्रमके पास ही प्रकट हुई थी, इसलिये वे ही पिताकी भाँति उसका पालन-पोषण करने लगे। जब कन्या यौवनावस्थामें पदार्पण कर चुकी, तब प्रमुच मुनि

English

grandfather and is dominated by Alarka/ Thereupon attacked the kingdom of this thy younger brother, n brought this army for thee. Therefore enjoy it as befits t race."*

अध्याय ३४

श्लोक 5

सदाचारमहं श्रोतुमिच्छामि कुलनन्दिनि ।यत् कुर्वन् सुखमाप्रोति परत्रेह च मानवः

sadācāramahaṃ śrotumicchāmi kulanandini / yat kurvan sukhamāproti paratreha ca mānavaḥ

हिन्दी अर्थ

उसके लिये योग्य वर पूछनेके विचारसे अग्निशालामें गये। उनके प्रश्न करनेपर अग्निदेवने उत्तर दिया--'इस कन्याके स्वामी राजा दुर्गम होंगे, जो महाबली महापराक्रमी, प्रियवक्ता और धर्मवत्सल हैं।'

English

mouths and mine during our infancy, 0 king. Our motl taught those subjects, that men consider should be kno? to both of them and to me, but not to him, Alai

अध्याय ३४

श्लोक 6

मदालसोवाच गृहस्थेन सदा कार्यमाचारपरिपालनम् ।न ह्याचारविहीनस्य सुखमत्र परत्र वा

madālasovāca gṛhasthena sadā kāryamācāraparipālanam / na hyācāravihīnasya sukhamatra paratra vā

हिन्दी अर्थ

इसी बीचमें मृगयाके प्रसड़से राजा दुर्गग मुनिके आश्रमपर आ पहुँचे। वे प्रियव्रतके वंशमें उत्पन्न अत्यन्त बलवान् और पराक्रमी थे। उनके पिताका नाम विक्रमशील था और वे कालिन्दीके गर्भसे उत्पन्न हुए थे। आश्रममें पहुँचनेपर जब उन्हें ऋषि नहीं दिखायी दिये, तब उन्होंने रेवतीको 'प्रियेश कहकर सम्बोधित किया और पूछा--'सुन्दरी! बताओ तो सही,

English

stirred thee up. Sir, to an unwonted endeavour. Thisi brother, who understands truth is addictedf to uurefin

अध्याय ३४

श्लोक 7

यज्ञदानतपांसीह पुरुषस्य च भूतये ।भवन्ति यः सदाचारं समुल्लङ्घ्य प्रवर्तते

yajñadānatapāṃsīha puruṣasya ca bhūtaye / bhavanti yaḥ sadācāraṃ samullaṅghya pravartate

हिन्दी अर्थ

मुनिश्रेष्ठ प्रमुच इस आश्रमसे कहाँ गये हैं? मैं उन्हें प्रणाम करना चाहता हूँ।'

English

should not he denied them. Through association with thee,

अध्याय ३४

श्लोक 8

दुराचारो हि पुरुषो नेहायुर्विन्दते महत् ।कार्यो यत्नः सदाचारे आचारो हन्त्यलक्षणम्

durācāro hi puruṣo nehāyurvindate mahat / kāryo yatnaḥ sadācāre ācāro hantyalakṣaṇam

हिन्दी अर्थ

मुनि अग्निशालामें बैठे हुए थे, वहाँसे राजाका वार्तालाप और 'प्रिये” सम्बोधन सुनकर वे तुरंत ही बाहर निकले। उन्होंने देखा, राजोचित चिह्लोंसे युक्त महात्मा राजा दुर्गण विनीत भावसे सामने खड़े हैं। उन्हें देखकर मुनिने गौतम नामक शिष्यसे कहा--'गौतम! इन महाराजके लिये अर्घ्य लाओ।' राजा अर्घ्य स्वीकार करके जब आसनपर विराजमान हुए,

English

mouths and mine during our infancy, 0 king. Our motl taught those subjects, that men consider should be kno? to both of them and to me, but not to him, Alai

अध्याय ३४

श्लोक 9

तस्य स्वरूपं वक्ष्यामि सदाचारस्य पुत्रक ।तन्ममैकमनाः श्रुत्वा तथैव परिपालय

tasya svarūpaṃ vakṣyāmi sadācārasya putraka / tanmamaikamanāḥ śrutvā tathaiva paripālaya

हिन्दी अर्थ

तब महामुनि प्रमुचने स्वागतपूर्वक पूछा--'“राजन्! आपके घर, सेना, खजाना, मित्र, भृत्य,

English

who wished to be illustrious, 0 king. As merchants, who f travelling for gain, feel a common grief, if one of tbi

अध्याय ३४

श्लोक 10

त्रिवर्गसाधने यत्नः कर्तव्यो गृहमेधिना ।तत्संसिद्धो गृहस्थस्य सिद्धिरत्र परत्र च

trivargasādhane yatnaḥ kartavyo gṛhamedhinā / tatsaṃsiddho gṛhasthasya siddhiratra paratra ca

हिन्दी अर्थ

राजाने कहा--सुव्रत! आपकी कृपासे मेरे यहाँ सब कुशलसे हैं, कहीं भी कुशलका अभाव नहीं है।

English

perishes, so is it with us, 0 king. Since he, Alarka, \ caught the infatuation of domestic life, and is perishing king; since he is related to this my body, and bears tho ic

अध्याय ३४

श्लोक 11

पादेनार्थस्य पारत्र्यं कुर्यात् सञ्चयमात्मवान् ।अर्धेन चात्मभरणन्नित्यनैमित्तिकान्वितम्

pādenārthasya pāratryaṃ kuryāt sañcayamātmavān / ardhena cātmabharaṇannityanaimittikānvitam

हिन्दी अर्थ

ऋषि बोले--राजन्! मेरे यहाँ एक कन्या है। इसके लिये वर ढूँढ़नेकी इच्छासे मैंने अग्निदेवसे पूछा था--“इसका पति कौन होगा?” अग्निदेवने कहा--'राजा दुर्गम ही इसके स्वामी होंगे।। इसलिये अब आप मेरी दी हुई इस कन्याको ग्रहण करें। आपने भी (प्रिये' कहकर इसको सम्बोधित किया है, अतः अब क्‍यों विचार करते हैं।

English

men say'"'' ^ these are //e- (^onneeh'd with the iji-

अध्याय ३४

श्लोक 12

पादञ्चात्मार्थमायस्य मूलभूतं विवर्धयेत् ।एवमाचरतः पुत्र ! अर्थः साफल्यमर्हति

pādañcātmārthamāyasya mūlabhūtaṃ vivardhayet / evamācarataḥ putra ! arthaḥ sāphalyamarhati

हिन्दी अर्थ

मुनिकी बात सुनकर राजा दुर्गम मौन रह गये। तब महर्षि प्रमुच अपनी कन्याका वैवाहिक कार्य सम्पन्न करनेको उद्यत हुए। अपने विवाहके लिये पिताको उद्यत देख कन्याने विनयसे मस्तक झुकाकर कहा--'पिताजी! यदि आपका मुझपर प्रेम है तो कृपा करके मेरा विवाह रेवती नक्षत्रमें ही कीजिये।'

English

Sir, to carry out the undertaking. Therefore he has b brought through distress to passionlessness through instr tion, 0 king j the work has been accomplished; maycsttl

अध्याय ३४

श्लोक 13

तद्वत् पापनिषेधार्थं धर्मः कार्यो विपश्चिता ।परत्रार्थं तथैवान्यः काम्यो ऽत्रैव फलप्रदः

tadvat pāpaniṣedhārthaṃ dharmaḥ kāryo vipaścitā / paratrārthaṃ tathaivānyaḥ kāmyo 'traiva phalapradaḥ

हिन्दी अर्थ

ऋषि बोले--भद्रे! ऋतवाक् नामसे विख्यात तपस्वी मुनिने रेवती नक्षत्रपर क्रोध करके उसे नक्षत्रमण्डलसे नीचे गिरा दिया है।

English

farewell. Idepart. ‘ Having dwelt in Madalasa’s womb, ^

अध्याय ३४

श्लोक 14

प्रत्यवायभयात् काम्यस्तथान्यश्चाविरोधवान् ।द्विधा कामो ऽपि गदितस्त्रिवर्गस्याविरोधतः

pratyavāyabhayāt kāmyastathānyaścāvirodhavān / dvidhā kāmo 'pi gaditastrivargasyāvirodhataḥ

हिन्दी अर्थ

कनन्‍्याने कहा--पिताजी! क्या ऋतवाक् मुनिने ही ऐसी तपस्या की है, आपने नहीं? यदि आप भी तपस्वी हैं तो रेवती नक्षत्रको पुन: आकाशमें स्थापित कीजिये। आप उसी

English

is travelled by the sons of other women, 0 king! ^ deliberated and I did it all by resorting to thee; and it been accomplished. I will again depart to seek final bei

अध्याय ३४

श्लोक 15

परम्परानुबन्धांश्च धर्मादींस्तान् शृणुष्व मे

paramparānubandhāṃśca dharmādīṃstān śṛṇuṣva me

हिन्दी अर्थ

ऋषि बोले--भट्रे! तेरा कल्याण हो, अब तू प्रसन्न हो जा। मैं तेरे लिये रेवती नक्षत्रको पुनः चन्द्रमाके मार्गमें स्थापित करता हूँ।

English

Unparalleled is this load of questions which tho«

अध्याय ३४

श्लोक 16

धर्मो धर्मानुबन्धार्थो धर्मो नात्मार्थबाधकः ।उभाभ्याञ्च द्विधा कामस्तेन तौ च द्विधा पुनः

dharmo dharmānubandhārtho dharmo nātmārthabādhakaḥ / ubhābhyāñca dvidhā kāmastena tau ca dvidhā punaḥ

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर महामुनि प्रमुचने अपनी तपस्याके प्रभावसे रेवती नक्षत्रको पुनः: पहलेकी ही भाँति चन्द्रमण्डलसे संयुक्त कर दिया। फिर उसी नक्षत्रमें वैदिक मन्त्रोंका उच्चारण करते हुए कन्याका विधिपूर्वक विवाह किया और प्रसन्न होकर अपने जामातासे कहा--'राजन्!

English

five streams of life, governed by the soul, existent as if j, petual and temporary — listen thei'cto with sublime eoiapo.^u illustrious Sir!

अध्याय ३४

श्लोक 17

बाह्मे मुहूर्ते बुध्येत धर्मार्थौ चापि चिन्तयेत् ।समुत्थाय तथाचम्य प्राङ्मुखो नियतः शुचिः

bāhme muhūrte budhyeta dharmārthau cāpi cintayet / samutthāya tathācamya prāṅmukho niyataḥ śuciḥ

हिन्दी अर्थ

बताइये, मैं इस विवाहमें दहेजके रूपमें आपको क्‍या दूँ? मेरी तपस्या अप्रतिहत है। मैं आपको दुर्लभ वस्तु भी दे सकता हूँ।'

English

Pradliana is the cause, which is designated tho Tmporccptili and which the groat rishis call the subtle, permanent Pmlq’j

अध्याय ३४

श्लोक 18

पूर्वां सन्ध्यां सनक्षत्रां पश्चिमां सदिवाकराम् ।उपासीत यथान्यायं नैनां जह्यादनापदि

pūrvāṃ sandhyāṃ sanakṣatrāṃ paścimāṃ sadivākarām / upāsīta yathānyāyaṃ naināṃ jahyādanāpadi

हिन्दी अर्थ

राजाने कहा--मुने! मेरा जन्म स्वायम्भुव मनुके वंशमें हुआ है। अतः मैं आपकी कृपासे ऐसा पुत्र चाहता हूँ, जो मन्वन्तरका स्वामी हो।

English

ignorance Then from it Avas evolved Aliaukara,|| vlddi three-fold, the Modifying,*^ tlu' Energizing,** and tlic

अध्याय ३४

श्लोक 19

असत्प्रलापमनृतं वाक्पारुष्यञ्च वर्जयेत् ।असच्छास्त्रमसद्वादमसत्सेवाञ्च पुत्रक !

asatpralāpamanṛtaṃ vākpāruṣyañca varjayet / asacchāstramasadvādamasatsevāñca putraka !

हिन्दी अर्थ

ऋषि बोले--राजन्! तुम्हारी यह कामना पूर्ण होगी। तुम्हारा पुत्र मनु होकर सम्पूर्ण पृथ्वीका उपभोग करेगा और धर्मका ज्ञाता होगा।

English

unknowable. Subsequent to the dissolution, all this (onhi Avas pervaded by him complofcly.

अध्याय ३४

श्लोक 20

सायं प्रापतस्तथा होमं कुर्वोत नियतात्मवान् ।नोदयास्तमने बिम्बमुदीक्षेत विवस्वतः

sāyaṃ prāpatastathā homaṃ kurvota niyatātmavān / nodayāstamane bimbamudīkṣeta vivasvataḥ

हिन्दी अर्थ

तब राजा उस स्त्रीको साथ ले अपने नगरको चले गये। उनसे रेवतीके गर्भसे रैवतका जन्म हुआ, जो सब धर्मोसे सम्पन्न और मनुष्योंसे अजेय थे। वे सब शास्त्रोंके ज्ञाता और वेदविद्याके विशारद थे। उनके मन्वन्तरमें सुमेधा, भूपति, वैकुण्ठ और अमिताभ--ये चार देवगण थे। इनमेंसे प्रत्येक गणमें चौदह-चौदह देवता थे। इन चारों देवगणोंके स्वामी विभु

English

]ndnciplo Pradluina came into existence. It envidop Mahat;§ as the seed is enveloped by its rind, even so Mali was enveloped by tlie Inqu'recptible. It is three-fold, tli characterized by goodness, that fiy passion, and tlnd I

अध्याय ३४

श्लोक 21

केशप्रसाधनादर्शदर्शनं दन्तधावनम् ।पूर्वाह्न एव कार्याणि देवतानाञ्च तर्पणम्

keśaprasādhanādarśadarśanaṃ dantadhāvanam / pūrvāhna eva kāryāṇi devatānāñca tarpaṇam

हिन्दी अर्थ

नामक इन्द्र थे, जिन्होंने सौ यज्ञोंका अनुष्ठान करके इस पदको प्राप्त किया था। हिरण्यरोमा, वेदश्री, ऊर्ध्वबाहु, वेदबाहु, सुधामा, पर्जन्य, महामुनि तथा वेद-वेदान्तोंके पारगामी महाभाग वसिष्ठ--ये सात रैवत मन्वन्तरके सप्तर्षि थे। बलबन्धु, महावीर्य, सुयष्टव्य तथा सत्यक आदि रैवत मनुके पुत्र थे।

English

vingft which is eharaetiUTzed by darkness. And it was c velopod by Mahat, just as Maliat was by the Imporccpld>l^’'

अध्याय ३४

श्लोक 22

ग्रामावसथतीर्थानां क्षेत्राणाञ्चैव वर्त्मनि ।विण्मूत्रं नानुतिष्ठेत न कृष्टे न च गोव्रजे

grāmāvasathatīrthānāṃ kṣetrāṇāñcaiva vartmani / viṇmūtraṃ nānutiṣṭheta na kṛṣṭe na ca govraje

हिन्दी अर्थ

चाक्षुष मनुकी उत्पत्ति और उनके मन्वन्तरका वर्णन

English

subtle element];]; of sound§§ next. Krom the suhih; elciuc

अध्याय ३४

श्लोक 23

नग्नां परस्त्रियं नेक्षेन्न पश्येदात्मनः सकृत् ।उदक्या दर्शनां स्पर्शो वर्ज्यं सम्भाषणन्तथा

nagnāṃ parastriyaṃ nekṣenna paśyedātmanaḥ sakṛt / udakyā darśanāṃ sparśo varjyaṃ sambhāṣaṇantathā

हिन्दी अर्थ

मार्कण्डेयजी कहते हैं--मुने! यह मैंने तुम्हें पाँचवें मन्वन्तरकी कथा सुनायी है। अब चाक्षुष मनुके छठे मन्वन्तरका वृत्तान्त सुनो। ब्रह्मन! वे पूर्वजन्ममें ब्रह्माजीके चक्षुसे उत्पन्न हुए थे, इसलिये इस जन्ममें भी उनका नाम चाक्षुष ही हुआ। राजर्षि महात्मा अनमित्रकी पत्नी भद्राने एक पुत्रको जन्म दिया, जो बहुत ही विद्वान, पवित्र, पूर्वजन्मकी बातोंको

English

subtle element];]; of sound§§ next. Krom the suhih; elciuc

अध्याय ३४

श्लोक 24

नाप्सु मूत्रं पुरीषं वा मैथुनं वा समाचरेत् ।नाधितिष्ठेच्छकृन्मूत्रकेशभस्मकपालिकाः

nāpsu mūtraṃ purīṣaṃ vā maithunaṃ vā samācaret / nādhitiṣṭhecchakṛnmūtrakeśabhasmakapālikāḥ

हिन्दी अर्थ

स्मरण रखनेवाला और समर्थ था। उस पुत्रको गोदमें लेकर माता बारंबार पुचकारती, प्यारसे बुलाती और स्नेहवश छातीसे चिपका लेती थी; किन्तु वह तो पूर्वजन्मकी बातोंको स्मरण रखनेवाला था, अतः माताकी गोदमें पड़ा-पड़ा हँसने लगा। इसपर माता बोली --बेटा! यह क्या? मैं तो डर गयी हूँ; तुम्हारे मुखयर यह हास्य कैसा? क्या तुम्हें असमयमें

English

subtle element];]; of sound§§ next. Krom the suhih; elciuc

अध्याय ३४

श्लोक 25

तुषाङ्गारास्थिशीर्णानि रज्जुवस्त्रादिकानि च ।नाधितिष्ठेत्तथा प्राज्ञः पथि चैवन्तथा भुवि

tuṣāṅgārāsthiśīrṇāni rajjuvastrādikāni ca / nādhitiṣṭhettathā prājñaḥ pathi caivantathā bhuvi

हिन्दी अर्थ

ही बोध हो गया? क्या तुम कोई शुभ देख रहे हो?'

English

subtle element];]; of sound§§ next. Krom the suhih; elciuc

अध्याय ३४

श्लोक 26

पितृदेवमनुष्याणां भूतानाञ्च तथार्च्चनम् ।कृत्वा विभवतः पश्चाद् गृहस्थो भोक्तुमर्हति

pitṛdevamanuṣyāṇāṃ bhūtānāñca tathārccanam / kṛtvā vibhavataḥ paścād gṛhastho bhoktumarhati

हिन्दी अर्थ

पुत्र बोला--माँ! क्या तुम नहीं देखती, सामने जो यह बिल्ली खड़ी है मुझे खा जाना चाहती है। दूसरी ओर जातहारिणी मुझे हड़प लेनेको तैयार है। यह अदृश्यभावसे खड़ी है। इधर तुम पुत्र-प्रेमके कारण अत्यन्त स्नेहवश मेरी ओर देखती, बारंबार मुझे बुलाती और छातीसे लगाती हो। तुम्हारे शरीरमें रोमाउच हो आता है। वात्सल्य-स्नेहके कारण तुम्हारे नेत्र

English

subtle element];]; of sound§§ next. Krom the suhih; elciuc

अध्याय ३४

श्लोक 27

प्राङ्मुखोदङ्मुखो वापि स्वाचान्तो वाग्यतः शुचिः ।भुञ्जीतान्नञ्च तच्चित्तो ह्यन्तर्जानुः सदा नरः

prāṅmukhodaṅmukho vāpi svācānto vāgyataḥ śuciḥ / bhuñjītānnañca taccitto hyantarjānuḥ sadā naraḥ

हिन्दी अर्थ

आँसुओंसे भीग रहे हैं। यही सब देखकर मुझे हँसी आ गयी। जैसे ये दोनों स्वार्थवश स्निग्ध हृदयसे मेरी ओर देखती हैं, उसी प्रकार तुम भी स्वार्थको लेकर ही मुझसे स्नेह करती जान पड़ती हो। अन्तर इतना ही है कि बिल्ली और जातहारिणी तो मुझे अभी खा जाना चाहती हैं और तुम धीरे-धीरे मुझसे प्राप्त होनेवाले उपभोगयोग्य फलकी कामना रखती हो।

English

subtle element];]; of sound§§ next. Krom the suhih; elciuc

अध्याय ३४

श्लोक 28

उपगातादृते दोषं नान्यस्योदीरयेद् बुधः ।प्रत्यक्षलवणं वर्ज्यमन्नमत्युष्णमेव च

upagātādṛte doṣaṃ nānyasyodīrayed budhaḥ / pratyakṣalavaṇaṃ varjyamannamatyuṣṇameva ca

हिन्दी अर्थ

माताने कहा--बेटा! मैं उपकारके लिये नहीं, प्रेमके कारण ही तुम्हें छातीसे लगाती हूँ। यदि इससे तुम्हें प्रसन्नता नहीं होती तो इसका अर्थ यह है कि तुमने मुझे त्याग दिया। लो, तुमसे प्राप्त होनेवाले स्वार्थका मैंने परित्याग कर दिया।

English

Alarka, also, enthroned his eldest son as king, and ahandoi. ing every tie resorted to tho forest, for his own perfection

अध्याय ३४

श्लोक 29

न गच्छन्न च तिष्ठन् वै विण्मूत्रोत्सर्गमात्मवान् ।कुर्वोत नैव चाचामन् यत् किञ्चिदपि भक्षयेत्

na gacchanna ca tiṣṭhan vai viṇmūtrotsargamātmavān / kurvota naiva cācāman yat kiñcidapi bhakṣayet

हिन्दी अर्थ

यों कहकर वह बालकको वहीं छोड़ सूतिका-गृहसे बाहर निकल गयी। उसी समय जातहारिणीने उस शुद्धात्मा बालकको हड़प लिया और उसे ले जाकर राजा विक्रान्तकी पत्नीके शयन-गृहमें सुला दिया। फिर रानीके नवजात पुत्रको ले जाकर दूसरेके घरमें रख दिया और उसके बालकको ले जाकर अपना ग्रास बना लिया। इस प्रकार नवजात

English

ostablisliud — bavin" paid adoration to liim, Hiranya-jrailj tho framework of the world, the wise, I will duly tell of i

अध्याय ३४

श्लोक 30

उच्छिष्टो नालपेत् किञ्चित् स्वाध्यायञ्च विवर्जयेत् ।गां ब्राह्मणं तथा चाग्निं स्वमूर्धानञ्च न स्पृशेत्

ucchiṣṭo nālapet kiñcit svādhyāyañca vivarjayet / gāṃ brāhmaṇaṃ tathā cāgniṃ svamūrdhānañca na spṛśet

हिन्दी अर्थ

शिशुओंको चुरानेवाली वह क्रूर राक्षसी तीसरे घरके बालकको खा लिया करती थी। बालकोंके चुराने और बदलनेका काम वह प्रतिदिन करती थी। राजा विक्रान्तने अपने घरमें आये हुए बालकका क्षत्रियोचित संस्कार कराया और बड़ी प्रसन्नताके साथ नामकरण- संस्कारकी विधि पूरी करके उसका नाम आनन्द रखा। जब बालक कुछ बड़ा हुआ, तब

English

and next from the coming into existence of the qualili which wore being created, at tho time of creation tlio tii

अध्याय ३४

श्लोक 31

न च पश्येद्रविं नेन्दुं न नक्षत्राणि कामतः ।भिन्नासनं तथा शय्यां भाजनञ्च विवर्जयेत्

na ca paśyedraviṃ nenduṃ na nakṣatrāṇi kāmataḥ / bhinnāsanaṃ tathā śayyāṃ bhājanañca vivarjayet

हिन्दी अर्थ

उसका उपनयन-संस्कार करते समय आचार्यने कहा--“वत्स! पहले अपनी माँके पास जाकर उन्हें प्रणाम करो।' गुरुकी बात सुनकर बालक हँस पड़ा और बोला--'गुरुदेव! मैं किस माताको प्रणाम करूँ--जन्म देनेवाली अथवा पालन करनेवालीको? मैं राजा

English

five streams of life, governed by the soul, existent as if j, petual and temporary — listen thei'cto with sublime eoiapo.^u illustrious Sir!

अध्याय ३४

श्लोक 32

गुरूणामासनं देयमभ्युत्थानादिसत्कृतम् ।अनुकूलं तथालापमभिवादनपूर्वकम्

gurūṇāmāsanaṃ deyamabhyutthānādisatkṛtam / anukūlaṃ tathālāpamabhivādanapūrvakam

हिन्दी अर्थ

अनमित्रके घरमें उनकी धर्मपत्नी गिरिभद्रा देवीके गर्भसे उत्पन्न हुआ; किन्तु जातहारिणी मुझे उठा ले आयी और यहाँ हैमिनीके पास छोड़कर इसके पुत्रको स्वयं उठा ले गयी। फिर उसे भी विप्रवर बोधके गृहमें ले जाकर उसने रख दिया और उनके पुत्रको हड़पकर भक्षण कर लिया। रानी हैमिनीका पुत्र वहाँ ब्राह्मणोचित संस्कारोंके साथ पालित हो रहा है और

English

Pradliana is the cause, which is designated tho Tmporccptili and which the groat rishis call the subtle, permanent Pmlq’j

अध्याय ३४

श्लोक 33

तथानुगमनं कुर्यात् प्रतिकूलं न संजयेत् ।नैकवस्त्रश्च भुञ्जीत न कुर्याद्देवतार्चनम्

tathānugamanaṃ kuryāt pratikūlaṃ na saṃjayet / naikavastraśca bhuñjīta na kuryāddevatārcanam

हिन्दी अर्थ

मेरा यहाँ आप संस्कार करा रहे हैं। मुझे आपकी आज्ञाका पालन करना है; अतः बताइये, किस माताके पास प्रणाम करनेके लिये जाऊँ?'

English

ignorance Then from it Avas evolved Aliaukara,|| vlddi three-fold, the Modifying,*^ tlu' Energizing,** and tlic

अध्याय ३४

श्लोक 34

न वाहयेद् द्विजान्नाग्नौ मेहं कुर्वोत् बुद्धिमान् ।स्नायीत न नरो नग्नो न शयीत कदाचन

na vāhayed dvijānnāgnau mehaṃ kurvot buddhimān / snāyīta na naro nagno na śayīta kadācana

हिन्दी अर्थ

गुरु बोले--बेटा! यह बड़ा गहन संकट उपस्थित हुआ। मेरी समझमें तो कुछ भी नहीं आता। मोहसे मेरी बुद्धि भ्रान्त हो रही है।

English

subtle element];]; of sound§§ next. Krom the suhih; elciuc

अध्याय ३४

श्लोक 35

न पाणिभ्यामुभाभ्याञ्च कण्डूयेत शिरस्तथा ।न चाभीक्ष्णं शिरः स्त्रानं कार्यं निष्कारणं नरैः

na pāṇibhyāmubhābhyāñca kaṇḍūyeta śirastathā / na cābhīkṣṇaṃ śiraḥ strānaṃ kāryaṃ niṣkāraṇaṃ naraiḥ

हिन्दी अर्थ

आनन्दने कहा--ब्रद्मर्षी संसारकी ऐसी ही व्यवस्था है। इसमें मोहके लिये कहाँ अवसर है। सोचिये तो कौन किसका पुत्र है और कौन किसका बन्धु। जीव जन्म लेनेके बादसे ही मनुष्योंका सम्बन्धी होता है, किन्तु मरते ही उसके सभी सम्बन्धी छूट जाते हैं। यहाँ भी जिसका जन्म हुआ है और जन्मके साथ ही बन्धु-बान्धवोंसे सम्बन्ध जुड़ गया है,

English

unknowable. Subsequent to the dissolution, all this (onhi Avas pervaded by him complofcly.

अध्याय ३४

श्लोक 36

शिरः स्त्रातश्च तैलेन नाङ्गं किञ्चिदपि स्पृशेत् ।अनध्यायेषु सर्वेषु स्वाध्यायञ्च विवर्जयेत्

śiraḥ strātaśca tailena nāṅgaṃ kiñcidapi spṛśet / anadhyāyeṣu sarveṣu svādhyāyañca vivarjayet

हिन्दी अर्थ

उस देहका अन्त होते ही सारा सम्बन्ध टूट जाता है। इसीलिये मैं कहता हूँ, संसारमें रहनेवाले जीवका कोई भी बन्धु-बान्धव नहीं है। भला, कौन किसीके साथ सदा ही बन्धुत्व निभाता है। मैंने तो इसी जन्ममें दो माताएँ और दो पिता प्राप्त किये। फिर यदि दूसरी देह धारण करनेपर ये सम्बन्ध बढ़ें तो इसमें आश्चर्य ही क्या है। अतः अब मैं तपस्या करूँगा।

English

subtle element];]; of sound§§ next. Krom the suhih; elciuc

अध्याय ३४

श्लोक 37

ब्राह्मणानिलगोसूर्यान् न मेहेत कदाचन ।उदङ्मुखो दिवा रात्रावुत्सर्गं दक्षिणामुखः

brāhmaṇānilagosūryān na meheta kadācana / udaṅmukho divā rātrāvutsargaṃ dakṣiṇāmukhaḥ

हिन्दी अर्थ

आप विशाल नामक ग्रामसे, इस राजाके पुत्रको, जो चैत्र नामसे विख्यात है, यहाँ बुला

English

]ndnciplo Pradluina came into existence. It envidop Mahat;§ as the seed is enveloped by its rind, even so Mali was enveloped by tlie Inqu'recptible. It is three-fold, tli characterized by goodness, that fiy passion, and tlnd I

अध्याय ३४

श्लोक 38

आबाधाषु यथाकामं कुर्यान्मूत्रपुरीषयोः ।दुष्कृतं न गुरोर्ब्रूयात् क्रुद्धं चैनं प्रसादयेत्

ābādhāṣu yathākāmaṃ kuryānmūtrapurīṣayoḥ / duṣkṛtaṃ na gurorbrūyāt kruddhaṃ cainaṃ prasādayet

हिन्दी अर्थ

आनन्दकी बात सुनकर राजा अपनी स्त्री और वन्धु-बान्धवोंके साथ बड़े विस्मयमें पड़े और उसकी ओरसे ममता हटाकर उन्होंने उसे वन जानेकी अनुमति दे दी। फिर अपने पुत्र चैत्रको बुलाकर उसे राज्य करनेके योग्य बनाया और जिसने पुत्र-बुद्धिसे उसका पालन किया था, उस ब्राह्णका भी भलीभाँति सम्मान किया। आनन्द तपस्यामें लगे थे। उन्हें

English

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अध्याय ३४

श्लोक 39

परिवादं न शृणुयादन्येषामपि कुर्वताम् ।पन्था देयो ब्राह्मणानां राज्ञो दुः खातुरस्य च

parivādaṃ na śṛṇuyādanyeṣāmapi kurvatām / panthā deyo brāhmaṇānāṃ rājño duḥ khāturasya ca

हिन्दी अर्थ

तपस्या करते देख ब्रह्माजीने पूछा--“वत्स! बताओ तो सही, किसलिये इतना कठोर तप

English

vingft which is eharaetiUTzed by darkness. And it was c velopod by Mahat, just as Maliat was by the Imporccpld>l^’'

अध्याय ३४

श्लोक 40

विद्याधिकस्य गुर्विण्या भारार्तस्य यवीयसः ।मूकान्धबधिराणाञ्च मत्तस्योन्मत्तकस्य च

vidyādhikasya gurviṇyā bhārārtasya yavīyasaḥ / mūkāndhabadhirāṇāñca mattasyonmattakasya ca

हिन्दी अर्थ

आनन्दने कहा--भगवन! मैं आत्मशुद्धिके लिये तपस्या कर रहा हूँ। बन्धनके हेतुभूत जो मेरे कर्म हैं, उनका नाश हो जाय--यही इस तपस्याका उद्देश्य है।

English

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अध्याय ३४

श्लोक 41

पुंश्चल्याः कृतवैरस्य बालस्य पतितस्य च ।देवालकं चैत्यतरुं तथैव च चतुष्पथम्

puṃścalyāḥ kṛtavairasya bālasya patitasya ca / devālakaṃ caityataruṃ tathaiva ca catuṣpatham

हिन्दी अर्थ

ब्रह्माजी बोले--जिसके कर्म-भोगका अधिकार क्षीण हो जाता है, वही मुक्तिके योग्य होता है। जिसके पास कर्मोंका संचय है, वह नहीं। तुम तो सत्त्वाधिकारी हो, मुक्ति कैसे पा

English

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अध्याय ३४

श्लोक 42

विद्याधिकं गुरुं देवं बुधः कुर्यात् प्रदक्षिणम् ।उपानद्वस्त्रमाल्यादि धृतमन्यैर्न धारयेत्

vidyādhikaṃ guruṃ devaṃ budhaḥ kuryāt pradakṣiṇam / upānadvastramālyādi dhṛtamanyairna dhārayet

हिन्दी अर्थ

तपस्याकी आवश्यकता नहीं है। मनुकी मर्यादाका पालन करके तुम मुक्त हो जाओगे।

English

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अध्याय ३४

श्लोक 43

उपवीतमलङ्कारं करकञ्चैव वर्जयेत् ।चतुर्दश्यान्तथाष्टम्यां पञ्चदश्याञ्च पर्वसु

upavītamalaṅkāraṃ karakañcaiva varjayet / caturdaśyāntathāṣṭamyāṃ pañcadaśyāñca parvasu

हिन्दी अर्थ

ब्रह्माजीके यों कहनेपर परम बुद्धिमान् आनन्दने “तथास्तु”/ कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार की और तपस्यासे विरत होकर मनुका कार्य पूर्ण करनेके लिये वहाँसे चल दिये। ब्रह्माजीने उन्हें तपस्यासे हटाते समय चाक्षुष नामसे सम्बोधित किया था, इसलिये वे उसी नामसे प्रसिद्ध हुए। उन्होंने राजा उग्रकी कन्या विदग्धासे विवाह किया और उसके गर्भसे

English

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अध्याय ३४

श्लोक 44

तैलाभ्यङ्गं तथा भोगं योषितश्च विवर्जयेत् ।न क्षिप्तपादजङ्घश्च प्राज्ञस्तिष्ठेत् कदाचन

tailābhyaṅgaṃ tathā bhogaṃ yoṣitaśca vivarjayet / na kṣiptapādajaṅghaśca prājñastiṣṭhet kadācana

हिन्दी अर्थ

विख्यात पराक्रमी--अनेक पुत्र उत्पन्न किये। चाक्षुष मन्वन्तरमें आर्ग्य, प्रसूत, भव्य, यूथग और लेख--ये पाँच देवगण थे। इन सभी गणोंमें आठ-आठ देवताओंका संनिवेश था। सब

English

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अध्याय ३४

श्लोक 45

न चापि विक्षिपेत् पादौ पादं पादेन नाक्रमेत् ।मर्माभिघातमाक्रोशं पैशुन्यञ्च विवर्जयेत्

na cāpi vikṣipet pādau pādaṃ pādena nākramet / marmābhighātamākrośaṃ paiśunyañca vivarjayet

हिन्दी अर्थ

यज्ञोंका अनुष्ठान करके देवताओंका आधिपत्य प्राप्त किया था। उस समय सुमेधा, विरजा,

English

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अध्याय ३४

श्लोक 46

दम्भाभिमानतीक्ष्णानि न कुर्वोत विचक्षणः ।मूर्खोन्मत्तव्यसनिनो विरूपान्मायिनस्तथा

dambhābhimānatīkṣṇāni na kurvota vicakṣaṇaḥ / mūrkhonmattavyasanino virūpānmāyinastathā

हिन्दी अर्थ

शत्द्युम्न आदि महाबली नरेश चाक्षुष मनुके पुत्र थे, जिन्होंने इस पृथ्वीका राज्य किया। इस समय वैवस्वत नामके सातवें मनु राज्य करते हैं। उनके मन्वन्तरमें जो देवता आदि हुए हैं, उनका वर्णन सुनो।

English

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अध्याय ३४

श्लोक 47

न्यूनाङ्गांश्चाधिकाङ्गांश्च नोपहासैर्विदूषयेत् ।परस्य दण्डं नोद्यच्छेच्छिक्षार्थं पुत्रशिष्ययोः

nyūnāṅgāṃścādhikāṅgāṃśca nopahāsairvidūṣayet / parasya daṇḍaṃ nodyacchecchikṣārthaṃ putraśiṣyayoḥ

हिन्दी अर्थ

वैवस्वत मन्वन्तरकी कथा तथा सावर्णिक मन्वन्तरका

English

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अध्याय ३४

श्लोक 48

तद्वन्नोपविशेत् प्राज्ञः पादेनाक्रम्य चासनम् ।संयावं कृषरं मांसं नात्मार्थमुपसाधयेत्

tadvannopaviśet prājñaḥ pādenākramya cāsanam / saṃyāvaṃ kṛṣaraṃ māṃsaṃ nātmārthamupasādhayet

हिन्दी अर्थ

मार्कण्डेयजी कहते हैं--विश्वकर्माकी पुत्री संज्ञा भगवान् सूर्यकी पत्नी हैं। उनके गर्भसे वैवस्चवत मनुका जन्म हुआ, जो विख्यात यशस्वी और अनेक विषयोंके ज्ञानमें पारड्त थे। विवस्वानके पुत्र होनेके कारण ही वे वैवस्वत कहलाये। जब भगवान् सूर्य संज्ञाकी ओर देखते तो वे अपनी आँखें बंद कर लेती थीं। इससे रुष्ट होकर सूर्यने संज्ञासे

English

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अध्याय ३४

श्लोक 49

सायं प्रातश्च भोक्तव्यं कृत्वा चातिथिपूजनम् ।प्राङ्मुखोदङ्मुको वापि वाग्यतो दन्तधावनम्

sāyaṃ prātaśca bhoktavyaṃ kṛtvā cātithipūjanam / prāṅmukhodaṅmuko vāpi vāgyato dantadhāvanam

हिन्दी अर्थ

यह निठुर वचन कहा--'ओ मूर्खे! तू मुझे देखकर सदा नेत्रोंका संयम करती (आँखें मूँद लेती) है। इसलिये तेरे गर्भसे प्रजाजनोंको संयम (शासन)-में रखनेवाला यम उत्पन्न होगा।'

English

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अध्याय ३४

श्लोक 50

कुर्वोत सततं वत्स ! वर्जयेद्वर्ज्यवीरुधः ।नोदक्शिराः स्वपेज्जातु न चप्रत्यक्शिरा नरः

kurvota satataṃ vatsa ! varjayedvarjyavīrudhaḥ / nodakśirāḥ svapejjātu na capratyakśirā naraḥ

हिन्दी अर्थ

यह सुनकर संज्ञादेवी भयसे व्याकुल हो उठीं। उनकी दृष्टि चज्चल हो गयी। यह देख सूर्यने फिर कहा--'तूने इस समय मुझे देखकर अपनी दृष्टि चज्चल की है, इसलिये चञचल लहरोंसे युक्त नदी तेरी कन्याके रूपमें उत्पन्न होगी। तदनन्तर पतिके शापसे संज्ञाने एक पुत्र और पुत्रीको जन्म दिया। पुत्रका नाम यम हुआ और पुत्री यमुना नामसे विख्यात महानदी

English

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अध्याय ३४

श्लोक 51

शिरस्यगस्त्यमास्थाय शयीताथ पुरन्दरम् ।न तु गन्धवतीष्वप्सु स्नायीत न तथा निशि

śirasyagastyamāsthāya śayītātha purandaram / na tu gandhavatīṣvapsu snāyīta na tathā niśi

हिन्दी अर्थ

हुई। संज्ञा सूर्यके तेजको बड़े कष्टसे सहन करती थी। वह उसके लिये असहा था। उसने सोचा--“क्या करूँ, कहाँ जाऊँ, कहाँ जानेसे मुझे शान्ति मिलेगी और मेरे स्वामी मुझपर कुपित भी नहीं होंगे?” इस तरह अनेक प्रकारसे विचार करके प्रजापतिकुमारी संज्ञान पिताके घरका आश्रय लेना ही ठीक समझा। वहाँ जानेके लिये उद्यत होकर उसने अपनी

English

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अध्याय ३४

श्लोक 52

उपरागे परं स्नानमृते दिनमुदाहृतम् ।अपमृज्यान्न चास्नातो गात्राण्यम्बरपाणिभिः

uparāge paraṃ snānamṛte dinamudāhṛtam / apamṛjyānna cāsnāto gātrāṇyambarapāṇibhiḥ

हिन्दी अर्थ

छायाको ही सूर्यदेवकी पत्नी बनाया और उससे कहा--'तू इस घरमें रह और मेरी ही तरह सब संतानों तथा भगवान् सूर्यके प्रति भी उत्तम बर्ताव करना।'

English

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अध्याय ३४

श्लोक 53

न चापि धूनयेत् केशान् वाससी न च धूनयेत् ।नानुलेपनमादद्यादस्नातः कर्हिचिद् बुधः

na cāpi dhūnayet keśān vāsasī na ca dhūnayet / nānulepanamādadyādasnātaḥ karhicid budhaḥ

हिन्दी अर्थ

यों कहकर संज्ञादेवी अपने पिताके घर चली गयीं। वहाँ उन्होंने त्वष्टा प्रजापतिका दर्शन किया, उन्होंने भी बड़े आदरके साथ पुत्रीका स्वागत-सत्कार किया। वे कुछ कालतक वहाँ रहीं। इसके बाद पिताने उन्हें प्रेमपूर्वक समझाते हुए कहा--“बेटी! तुम तीनों लोकके स्वामी भगवान् सूर्यकी पत्नी हो। अतः तुम्हें अधिक समयतक पिताके घरमें नहीं ठहरना

English

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अध्याय ३४

श्लोक 54

न चापि रक्तवासाः स्याच्चित्रासितधरो ऽपि वा ।न च कुर्याद्विपर्यासं वाससोर्नापि भूषणे

na cāpi raktavāsāḥ syāccitrāsitadharo 'pi vā / na ca kuryādviparyāsaṃ vāsasornāpi bhūṣaṇe

हिन्दी अर्थ

चाहिए। अब तुम स्वामीके घर जाओ। मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ।'

English

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अध्याय ३४

श्लोक 55

वर्ज्यञ्च विदशं वस्त्रमत्यन्तोपहतञ्च यत् ।केशकीटावपन्नञ्च क्षुण्णं श्वभिरवेक्षितम्

varjyañca vidaśaṃ vastramatyantopahatañca yat / keśakīṭāvapannañca kṣuṇṇaṃ śvabhiravekṣitam

हिन्दी अर्थ

पिताके यों कहनेपर संज्ञाने 'बहुत अच्छा” कहकर उनकी आज्ञा स्वीकार की और उन्हें प्रणाम करके वहाँसे चली गयीं। वे सूर्यके तेजसे बहुत डरती थीं और उनके तापका सामना करना नहीं चाहती थीं; इसलिये उत्तरकुरुमें जाकर घोड़ीके रूपमें रहने और तपस्या करने लगीं। उधर छायासंज्ञाको ही संज्ञा समझकर भगवान् सूर्यने उससे दो पुत्र और एक मनोहर

English

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अध्याय ३४

श्लोक 56

अवलीढावपन्नञ्च सारोद्धरणदूषितम् ।पृष्ठमांसं वृथामांसं वर्ज्यमांसञ्च पुत्रक !

avalīḍhāvapannañca sāroddharaṇadūṣitam / pṛṣṭhamāṃsaṃ vṛthāmāṃsaṃ varjyamāṃsañca putraka !

हिन्दी अर्थ

कन्या उत्पन्न की। छायासंज्ञा अपनी संतानोंको जितना प्यार करती थी, उतना संज्ञाके पुत्र- पुत्रीको नहीं। मनु तो उसके इस बर्तावको सह लेते थे, किन्तु यमसे सहन नहीं हुआ। उन्होंने क्रोधमें आकर उसे मारनेके लिये लात उठायी, किन्तु फिर क्षमा-भावका आश्रय ले उसके शरीरपर लात नहीं लगायी। तब छायासंज्ञासे कुपित हो यमको शाप दिया---मैं तुम्हारे

English

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अध्याय ३४

श्लोक 57

न भक्षयीत सततं प्रत्यक्षलवणानि च ।वर्ज्यं चिरोषितं पुत्र ! भक्तं पर्युषितञ्च यत्

na bhakṣayīta satataṃ pratyakṣalavaṇāni ca / varjyaṃ ciroṣitaṃ putra ! bhaktaṃ paryuṣitañca yat

हिन्दी अर्थ

पिताकी पत्नी हूँ, किन्तु तुम मर्यादाका उललड्घन करके मुझे मारनेके लिये लात उठा रहे हो; इसलिये तुम्हारा यह पैर आज ही पृथ्वीपर गिर पड़ेगा।'

English

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अध्याय ३४

श्लोक 58

पिष्टशाकेक्षुपयसां विकारान्नृपनन्दन! ।तथा मांसविकारांश्च ते च वर्ज्याश्चिरोषिताः

piṣṭaśākekṣupayasāṃ vikārānnṛpanandana! / tathā māṃsavikārāṃśca te ca varjyāściroṣitāḥ

हिन्दी अर्थ

माताका दिया हुआ शाप सुनकर यम भयसे व्याकुल हो उठे और अपने पिताके पास जा उन्हें प्रणाम करके बोले--'पिताजी! यह तो बड़े आश्चर्यकी बात है; ऐसा तो कभी किसीने भी नहीं देखा होगा कि माता वात्सल्य छोड़कर अपने पुत्रको शाप दे डाले। दुर्गुणी पुत्रोंके प्रति भी माताका दुर्भाव नहीं होता।।! यमराजकी यह बात सुनकर भगवान् सूर्यने

English

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अध्याय ३४

श्लोक 59

उदयास्तमने भानोः शयनञ्च विवर्जयेत् ।नास्नातो नैव संविष्टो न चैवान्यमना नरः

udayāstamane bhānoḥ śayanañca vivarjayet / nāsnāto naiva saṃviṣṭo na caivānyamanā naraḥ

हिन्दी अर्थ

छायासंज्ञाको बुलाकर पूछा--'संज्ञा कहाँ गयी?” वह बोली--“नाथ! मैं ही तो त्वष्टा प्रजापतिकी कन्या और आपकी पत्नी संज्ञा हूँ। आपने मुझसे ही ये संतान उत्पन्न किये हैं।' सूर्यने कई बार घुमा-फिराकर पूछा, किन्तु उसने सच्ची बात नहीं बतायीं। तब सूर्यदेव उसे शाप देनेको उद्यत हुए, यह देख उसने सब बातें ठीक-ठीक बता दीं। असली बातका पता

English

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अध्याय ३४

श्लोक 60

न चैव शयने नोर्व्यामुपविष्टो न शब्दवत् ।न चैकवस्त्रो न वदन् प्रेक्षतामप्रदाय च

na caiva śayane norvyāmupaviṣṭo na śabdavat / na caikavastro na vadan prekṣatāmapradāya ca

हिन्दी अर्थ

लगनेपर भगवान् सूर्य विश्वकर्माके घर गये। विश्वकर्माने अपने घर पधारे हुए त्रिलोकपूजित सूर्यदेवका बड़ी भक्तिके साथ पूजन किया। फिर संज्ञाका पता पूछनेपर उन्होंने कहा --'भगवन्! वह मेरे घरपर आयी अवश्य थी, किन्तु मैंने पुन: उसे आपके ही घर भेज दिया।” तब सूर्यने समाधिस्थ होकर देखा, वह घोड़ीका रूप धारणकर उत्तरकुरु देशमें

English

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अध्याय ३४

श्लोक 61

भुञ्जीत पुरुषः स्नातः सायं प्रातर्यथाविधि ।परदारा न गन्तव्याः पुरुषेण विपश्चिता

bhuñjīta puruṣaḥ snātaḥ sāyaṃ prātaryathāvidhi / paradārā na gantavyāḥ puruṣeṇa vipaścitā

हिन्दी अर्थ

तपस्या कर रही है। उसकी तपस्याका एक ही उद्देश्य है, मेरे स्‍्वामीकी आकृति सौम्य एवं शुभ हो जाय।' सूर्यको उसकी तपस्याका उद्देश्य ज्ञात हो गया; अतः उन्होंने विश्वकर्मासे कहा--'आप मेरे तेजको छाँट दीजिये।” तब उन्होंने संवत्सररूप चक्रवाले सूर्यके तेजको छाँट दिया, उस समय देवताओंने उनकी बड़ी प्रशंसा की। तदनन्तर देवताओं और ऋषियों ने

English

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अध्याय ३४

श्लोक 62

इष्टापूर्तायुषां हन्त्री परदारगतिर्नृणाम् ।न हीदृशमनायुष्यं लोके किञ्चन विद्यते

iṣṭāpūrtāyuṣāṃ hantrī paradāragatirnṛṇām / na hīdṛśamanāyuṣyaṃ loke kiñcana vidyate

हिन्दी अर्थ

सम्पूर्ण त्रिभुवनके पूजनीय भगवान् सूर्यका स्तवन आरम्भ किया--

English

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अध्याय ३४

श्लोक 63

यादृशं पुरुषस्येह परदाराभिमर्षणम् ।देवार्चनाग्निकार्याण तथा गुर्वभिवादनम्

yādṛśaṃ puruṣasyeha paradārābhimarṣaṇam / devārcanāgnikāryāṇa tathā gurvabhivādanam

हिन्दी अर्थ

ज्ञानैकधामभूताय निर्धूततमसे नमः ।

English

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अध्याय ३४

श्लोक 64

कुर्वोत सम्यगाचम्य तद्वदन्नभुजिक्रियाम् ।अफेनाभिरगन्धाभिरद्भरच्छाभिरादरात्

kurvota samyagācamya tadvadannabhujikriyām / aphenābhiragandhābhiradbharacchābhirādarāt

हिन्दी अर्थ

सर्वकारणभूताय निष्ठाय ज्ञानचेतसाम्

English

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अध्याय ३४

श्लोक 65

आचामेत् पुत्र ! पुण्याभिः प्राङ्मुखोदङ्मुखो ऽपि वा ।अन्तर्जलादावसथाद्वल्मीकान्मूषिकस्थलात्

ācāmet putra ! puṇyābhiḥ prāṅmukhodaṅmukho 'pi vā / antarjalādāvasathādvalmīkānmūṣikasthalāt

हिन्दी अर्थ

नम: सूर्यस्वरूपाय प्रकाशात्मस्वरूपिणे ॥।

English

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अध्याय ३४

श्लोक 66

कृतशौचावशिष्टाश्च वर्जयेत् पञ्च वै मृदः ।प्रक्षाल्य हस्तौ पादौ च समभ्युक्ष्य समाहितः

kṛtaśaucāvaśiṣṭāśca varjayet pañca vai mṛdaḥ / prakṣālya hastau pādau ca samabhyukṣya samāhitaḥ

हिन्दी अर्थ

भास्कराय नमस्तुभ्यं तथा दिनकृते नम: ।

English

subtle element];]; of sound§§ next. Krom the suhih; elciuc

अध्याय ३४

श्लोक 67

अन्तर्जानुस्तथाऽचामेत् त्रिश्चतुर्वा पिबेदपः ।परिमृज्य द्विरास्यान्तं खानि मूर्धानमेव च

antarjānustathā'cāmet triścaturvā pibedapaḥ / parimṛjya dvirāsyāntaṃ khāni mūrdhānameva ca

हिन्दी अर्थ

प्रणाम है। यजुर्वेदस्वरूप आपको नमस्कार है। आप ही समस्त सामोंके अधिष्ठान हैं, आपको प्रणाम है। आप ज्ञानके एकमात्र आधार एवं अन्धकारका नाश करनेवाले हैं,

English

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अध्याय ३४

श्लोक 68

सम्यगाचम्य तोयेन क्रियां कुर्वोत वै शुचिः ।देवतानामृषीणाञ्च पितॄणाञ्चैव यत्नतः

samyagācamya toyena kriyāṃ kurvota vai śuciḥ / devatānāmṛṣīṇāñca pitṝṇāñcaiva yatnataḥ

हिन्दी अर्थ

आपको नमस्कार है। आपका स्वरूप शुद्ध ज्योतिर्मय है। आप स्वभावसे ही परम शुद्ध एवं निर्मलात्मा हैं, आपको प्रणाम है। आप सबसे महान, सर्वश्रेष्ठ, सबसे परे और साक्षात् परमात्मा हैं। आपका स्वरूप सम्पूर्ण जगत्में व्यापक है। आप सबके आत्मरूप हैं, आपको नमस्कार है। आप सबकी उत्पत्तिके कारण, ज्ञानका चिन्तन करनेवाले पुरुषोंके प्राप्तव्य

English

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अध्याय ३४

श्लोक 69

समाहितमना भूत्वा कुर्वोत सततं नरः ।क्षुत्त्वा निष्ठीव्य वासश्च परिधायाचमेद् बुधः

samāhitamanā bhūtvā kurvota satataṃ naraḥ / kṣuttvā niṣṭhīvya vāsaśca paridhāyācamed budhaḥ

हिन्दी अर्थ

स्थान, सूर्यस्वरूप तथा प्रकाशात्मरूप हैं। आपको नमस्कार है। प्रभाका विस्तार करनेवाले आपको नमस्कार है। दिनकी सृष्टि करनेवाले आपको प्रणाम है। रात्रिके हेतु भी आप ही हैं तथा संध्या और चाँदनीकी सृष्टि भी आप ही करते हैं; आपको नमस्कार है।

English

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अध्याय ३४

श्लोक 70

क्षुते ऽवलीढे वान्ते च तथा निष्ठीवनादिषु ।कुर्यादाचमनं स्पर्शं गोपृष्ठस्यार्कदर्शनम्

kṣute 'valīḍhe vānte ca tathā niṣṭhīvanādiṣu / kuryādācamanaṃ sparśaṃ gopṛṣṭhasyārkadarśanam

हिन्दी अर्थ

भ्रमत्याविद्धमखिल ब्रह्माण्डं सचराचरम् ।।

English

subtle element];]; of sound§§ next. Krom the suhih; elciuc

अध्याय ३४

श्लोक 71

कुर्वोतालम्बनं चापि दक्षिणश्रवणस्य वै ।यथाविभवतो ह्येतत् पूर्वाभावे ततः परम्

kurvotālambanaṃ cāpi dakṣiṇaśravaṇasya vai / yathāvibhavato hyetat pūrvābhāve tataḥ param

हिन्दी अर्थ

क्रियते त्वत्करै: स्पर्शाज्जलादीनां पवित्रता ।।

English

subtle element];]; of sound§§ next. Krom the suhih; elciuc

अध्याय ३४

श्लोक 72

अविद्यमाने पूर्वोक्ते उत्तरप्राप्तिरिष्यते ।न कुर्याद् दन्तसङ्घर्षं नात्मनो देहताडनम्

avidyamāne pūrvokte uttaraprāptiriṣyate / na kuryād dantasaṅgharṣaṃ nātmano dehatāḍanam

हिन्दी अर्थ

होमदानादिको धर्मो नोपकाराय जायते ।

English

subtle element];]; of sound§§ next. Krom the suhih; elciuc

अध्याय ३४

श्लोक 73

स्वप्नाध्ययनभोज्यानि सन्ध्ययोश्च विवर्जयेत् ।सन्ध्यायां मैथुनञ्चापि तथा प्रस्थानमेव च

svapnādhyayanabhojyāni sandhyayośca vivarjayet / sandhyāyāṃ maithunañcāpi tathā prasthānameva ca

हिन्दी अर्थ

भगवन्! आप ही यह सम्पूर्ण जगत् हैं। आपमें ही चराचर प्राणियोंसहित समस्त ब्रह्माण्ड ओतप्रोत है; अतएव ऊर्ध्वलोकमें जब आप भ्रमण करते हैं तो आपके साथ यह ब्रह्माण्ड भी घूमता है। आपकी किरणोंका स्पर्श पाकर ही सम्पूर्ण वस्तुएँ पवित्र होती हैं। आपकी किरणें ही अपने स्पर्शसे जल आदिको पवित्र करती हैं। जबतक इस जगतमें

English

subtle element];]; of sound§§ next. Krom the suhih; elciuc

अध्याय ३४

श्लोक 74

पूर्वाह्ने तात ! देवानां मनुष्याणाञ्च मध्यमे ।भक्त्या तथापराह्ने च कुर्वोत पितृपूजनम्

pūrvāhne tāta ! devānāṃ manuṣyāṇāñca madhyame / bhaktyā tathāparāhne ca kurvota pitṛpūjanam

हिन्दी अर्थ

आपकी दिव्य रश्मियोंका संयोग नहीं होता, तबतक होम-दान आदि धर्म सफल नहीं हो

English

subtle element];]; of sound§§ next. Krom the suhih; elciuc

अध्याय ३४

श्लोक 75

शिरः स्नातश्च कुर्वोत दैवं पैत्र्यमथापि वा ।प्राङ्मुखोदङ्मुखो वापि श्मश्रुकर्म च कारयेत्

śiraḥ snātaśca kurvota daivaṃ paitryamathāpi vā / prāṅmukhodaṅmukho vāpi śmaśrukarma ca kārayet

हिन्दी अर्थ

ऋचस्ते सकला होता यजुंष्येतानि चान्यत: ।

English

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अध्याय ३४

श्लोक 76

व्यङ्गिनीं वर्जयेत् कन्यां कुलजामपि रोगिणीम् ।विकृतां पिङ्गलाञ्चैव वाचाटां सर्वदूषिताम्

vyaṅginīṃ varjayet kanyāṃ kulajāmapi rogiṇīm / vikṛtāṃ piṅgalāñcaiva vācāṭāṃ sarvadūṣitām

हिन्दी अर्थ

त्वमेव ब्रह्मणो रूप॑ परं चापरमेव च ।

English

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अध्याय ३४

श्लोक 77

अव्यङ्गीं सौम्यनासाञ्च स्रवलक्षणलक्षिताम् ।तादृशीमुद्वहेत् कन्यां श्रेयः कामो नरः सदा

avyaṅgīṃ saumyanāsāñca sravalakṣaṇalakṣitām / tādṛśīmudvahet kanyāṃ śreyaḥ kāmo naraḥ sadā

हिन्दी अर्थ

निमेषकाष्ठादिमय: कालरूप: क्षयात्मक: ।

English

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अध्याय ३४

श्लोक 78

उद्वहेत् पितृमात्रोश्च सप्तमीं पञ्चमीन्तथा ।रक्षेद्दारान् त्यजेदीर्ष्यां दिवा च स्वप्नमैथुने

udvahet pitṛmātrośca saptamīṃ pañcamīntathā / rakṣeddārān tyajedīrṣyāṃ divā ca svapnamaithune

हिन्दी अर्थ

ऋग्वेदकी ये सम्पूर्ण ऋचाएँ, दूसरी ओर यजुर्वेदके ये सब मन्त्र तथा सामवेदकी सम्पूर्ण श्रुतियाँ आपके ही अड़ोंसे प्रकट होती हैं। जगन्नाथ! आप ऋग्वेदमय हैं, आप ही यजुर्वेदमय हैं तथा आप ही सामवेदमय हैं। नाथ! इस प्रकार आप त्रयीमय हैं--तीनों वेद आपके ही स्वरूप हैं। आप ही ब्रह्मके पर और अपर रूप हैं। मूर्त्त, अमूर्त्त, स्थूल और सूक्ष्म

English

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अध्याय ३४

श्लोक 79

परोपतापकं कर्म जन्तुपीडाञ्च वर्जयेत् ।उदक्या सर्ववर्णानां वर्ज्या रात्रिचतुष्टयम्

paropatāpakaṃ karma jantupīḍāñca varjayet / udakyā sarvavarṇānāṃ varjyā rātricatuṣṭayam

हिन्दी अर्थ

सभी रूपोंमें आपकी ही स्थिति है। निमेष, काष्ठा आदि जो कालके छोटे-छोटे विभाग हैं, वे

English

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अध्याय ३४

श्लोक 80

स्त्रीजन्मपरिहारार्थं पञ्चमीमपि वर्जयेत् ।ततः षष्ठ्यां व्रजेद्रात्र्यां श्रेष्ठा युगमासु पुत्रक

strījanmaparihārārthaṃ pañcamīmapi varjayet / tataḥ ṣaṣṭhyāṃ vrajedrātryāṃ śreṣṭhā yugamāsu putraka

हिन्दी अर्थ

सब आपके ही स्वरूप हैं। आप ही क्षयात्मक (प्रतिक्षण बीतनेवाला) कालरूप हैं। भगवन्! आप प्रसन्न होइये और अपनी इच्छासे ही अपने प्रचण्ड तेजको शान्त कीजिये।

English

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अध्याय ३४

श्लोक 81

युग्मासु पुत्रा जायन्ते स्त्रियो ऽयुग्मासु रात्रिषु ।तस्माद्युग्मासु पुत्रार्थो संविशेत सदा नरः

yugmāsu putrā jāyante striyo 'yugmāsu rātriṣu / tasmādyugmāsu putrārtho saṃviśeta sadā naraḥ

हिन्दी अर्थ

मार्कण्डेयजी कहते हैं--देवताओं और देवर्षियोंके इस प्रकार स्तुति करनेपर तेजोराशि अविनाशी भगवान् सूर्यने विश्वकर्माके द्वारा अपने तेजको कम कर दिया। उनका जो ऋग्वेदमय तेज था, उससे पृथ्वीका निर्माण हुआ। यजुर्वेदमय तेजसे द्युलोककी रचना हुई और सामवेदमय तेज ही स्वर्गलोकके रूपमें प्रतिष्ठित हुआ। विश्वकर्माने सूर्यके तेजके

English

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अध्याय ३४

श्लोक 82

विधर्मिणो ऽह्नि पूर्वाख्ये सन्ध्याकाले च षण्डकाः ।क्षुरकर्मणि वान्ते च स्त्रीसम्भोगे च पुत्रक

vidharmiṇo 'hni pūrvākhye sandhyākāle ca ṣaṇḍakāḥ / kṣurakarmaṇi vānte ca strīsambhoge ca putraka

हिन्दी अर्थ

सोलह भागोंमेंसे पंद्रह भाग छाँट दिये और उनके द्वारा शंकरजीका त्रिशूल, भगवान् विष्णुका चक्र, वसुगणोंके भयंकर शड़कु अग्निकी शक्ति, कुबेरकी शिबिका तथा अन्यान्य

English

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अध्याय ३४

श्लोक 83

स्नायीत चेलवान् प्राज्ञः कटभूमिमुपेत्य च ।देववेदद्विजातीनां साधुसत्यमहात्मनाम्

snāyīta celavān prājñaḥ kaṭabhūmimupetya ca / devavedadvijātīnāṃ sādhusatyamahātmanām

हिन्दी अर्थ

तेजके सोलहवें भागको धारण करते हैं। तेज कम होनेके बाद वे अश्वका रूप धारण करके उत्तरकुरु नामक देशमें गये और वहाँ उन्होंने घोड़ीके रूपमें संज्ञाको देखा। उन्हें आते देख संज्ञाको पराये पुरुषकी आशडका हुई, इसलिये वह अपने पृष्ठभागकी रक्षा करती हुई सामनेकी ओरसे उनके सम्मुख गयी; फिर वहाँ उनके मिलनेपर पहले दोनोंकी नासिकाका

English

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अध्याय ३४

श्लोक 84

गुरोः पतिव्रतानाञ्च तया यज्वितपस्विनाम् ।परिवादं न कुर्वोत परिहासञ्च पुत्रक

guroḥ pativratānāñca tayā yajvitapasvinām / parivādaṃ na kurvota parihāsañca putraka

हिन्दी अर्थ

संयोग हुआ। इससे अश्वरूपधारिणी संज्ञाके मुखसे दो पुत्र प्रकट हुए, जो नासत्य और दस्र नामसे प्रसिद्ध हुए। फिर वीर्यपातके अनन्तर रेवन्त नामक एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो ढाल, तलवार और कवच धारण किये, बाण और तरकससे सुसज्जित हो घोड़ेपर चढ़ा हुआ ही प्रकट हुआ था।

English

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अध्याय ३४

श्लोक 85

कुर्वतामविनीतानां न श्रोतव्यं कथञ्चन ।नोत्कृष्टशय्यासनयोर्नापकृष्टस्य चारुहेत्

kurvatāmavinītānāṃ na śrotavyaṃ kathañcana / notkṛṣṭaśayyāsanayornāpakṛṣṭasya cāruhet

हिन्दी अर्थ

तत्पश्चात् भगवान् सूर्यने संज्ञाको अपने अनृपम स्वरूपका दर्शन कराया। उनके इस रूपको देखकर संज्ञाको बड़ी प्रसन्नता हुई। फिर उसने भी अपना रूप धारण कर लिया। तब सूर्यदेव अपनी प्रीतिमती पत्नी संज्ञाको साथ ले अपने निवास-स्थानपर आये। भगवान् सूर्यके जो प्रथम पुत्र थे, उनकी वैवस्वत नामसे प्रसिद्धि हुई। दूसरे पुत्रका नाम यम था। ये

English

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अध्याय ३४

श्लोक 86

न चामङ्गल्यवेशः स्यान्न चामङ्गल्यवाग्भवेत् ।धवलाम्भरसंवीतः सितपुष्पविभूषितः

na cāmaṅgalyaveśaḥ syānna cāmaṅgalyavāgbhavet / dhavalāmbharasaṃvītaḥ sitapuṣpavibhūṣitaḥ

हिन्दी अर्थ

माताके शापसे ग्रस्त थे। पिताने इनके शापका अन्त इस प्रकार किया था--'कीड़े यमके पैरका मांस लेकर पृथ्वीपर गिर पड़ेंगे। फिर इनका पैर ठीक हो जायगा।” यम धर्मपर दृष्टि रखते थे और मित्र तथा शत्रुके प्रति उनका समान भाव था। अतः सूर्यने प्रजाओंके धर्माधर्मका फल देनेके लिये उन्हें यमराजके पदपर प्रतिष्ठित किया। यमुना कलिन्दपर्वतके

English

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अध्याय ३४

श्लोक 87

नोद्धूतोन्मत्तमूढैश्च नाविनीतैश्च पण्डितः ।गच्छेन्मैत्रीं न चाशीलैर्न च चौर्यादिदूषितैः

noddhūtonmattamūḍhaiśca nāvinītaiśca paṇḍitaḥ / gacchenmaitrīṃ na cāśīlairna ca cauryādidūṣitaiḥ

हिन्दी अर्थ

बीचसे बहनेवाली नदी हो गयी। दोनों अश्विनीकुमार देवताओंके वैद्य नियुक्त किये गये। रेवन्तको भी गुह्म॒कोंका स्वामी बनाया गया। अब छायासंज्ञाके पुत्रोंकी जहाँ नियुक्ति हुई, उसका हाल सुनो। छायासंज्ञाके ज्येष्ठ पुत्रका वर्ण (रूप-रंग) वैवस्वत मनुके ही समान था, अतः वे सावर्णिक नामसे प्रसिद्ध हुए। वे ही आठवें मनु होंगे। उस समय राजा बलि इन्द्रके

English

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अध्याय ३४

श्लोक 88

न चातिव्ययशीलैश्च न लुब्धैर्नापि वैरिभिः ।न बन्धकीभिर्न न्यूनैर्बन्धकीपतिभिस्तथा

na cātivyayaśīlaiśca na lubdhairnāpi vairibhiḥ / na bandhakībhirna nyūnairbandhakīpatibhistathā

हिन्दी अर्थ

पदपर प्रतिष्ठित रहेंगे। छायाके दूसरे पुत्र शनैश्वरको पिताने ग्रहोंके मध्यमें नियुक्त किया। तीसरी संतान तपती नामकी कन्या थी। उसने राजा संवरणको अपना स्वामी बनाया और उनसे कुरु नामक पुत्रको जन्म दिया। ये कुरु एक प्रसिद्ध राजा हुए।

English

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अध्याय ३४

श्लोक 89

सार्धं न बलिभिः कुर्यान्न च न्यूनैर्न निन्दितैः ।न सर्वशङ्किभिर्नित्यं न च दैवपरैर्नरैः

sārdhaṃ na balibhiḥ kuryānna ca nyūnairna ninditaiḥ / na sarvaśaṅkibhirnityaṃ na ca daivaparairnaraiḥ

हिन्दी अर्थ

वैवस्वत मन्वन्तरमें आठ देवगण माने गये हैं। उनके नाम इस प्रकार हैं--आदित्य, वसु, रुद्र, साध्य, विश्वेदेव, मरुत, भूगु तथा अड्जिरा। इनमें आदित्यगण, मरुद्वण तथा रुद्रगण कश्यपजीके पुत्र हैं। साध्यगण, वसुगण और विश्वेदेवगण--ये धर्मके पुत्र हैं। भूगुगण भृगुके और आड्रिरसगण महर्षि अड्डिराके पुत्र हैं। ब्रह्मन! यह सब मारीच सर्ग है। मरीचिनन्दन

English

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अध्याय ३४

श्लोक 90

कुर्वोत साधुभिर्मैत्रीं सदाचारावलम्बिभिः ।प्राज्ञैरपिशुनैः शक्तैः कर्मण्युद्योगभागिभिः

kurvota sādhubhirmaitrīṃ sadācārāvalambibhiḥ / prājñairapiśunaiḥ śaktaiḥ karmaṇyudyogabhāgibhiḥ

हिन्दी अर्थ

कश्यपकी संतान होनेके कारण इन्हें मारीच कहते हैं। इस मन्वन्तरमें जो इन्द्र हैं, उनका नाम ऊर्जस्वी है। ये महात्मा यज्ञभागके भोक्ता हैं। भूत, भविष्य और वर्तमानमें जो इन्द्र होते हैं, उन सबका लक्षण एक-सा ही समझना चाहिए।

English

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अध्याय ३४

श्लोक 91

सुहृद्दीक्षितभूपालस्नातकश्वशुरैः सह ।ऋत्विगादीन् षडर्घार्हानर्चयेच्च गृहागतान्

suhṛddīkṣitabhūpālasnātakaśvaśuraiḥ saha / ṛtvigādīn ṣaḍarghārhānarcayecca gṛhāgatān

हिन्दी अर्थ

अब वर्तमान त्रिलोकीका वर्णन सुनो। भूलोक तो यह पृथ्वी है। अन्तरिक्षको झ्युलोक या भुवर्लोक माना गया है और दिव्यलोकको स्वर्लोक कहते हैं। अत्रि, वसिष्ठ, कश्यप, गौतम, भरद्वाज, विश्वामित्र तथा जमदग्नि--ये ही इस मन्वन्तरके सप्तर्षि हैं। इश्वाकु, नृग, धृष्ट, शर्याति, नरिष्यन्त, नाभाग, अरिष्ट, करूष और पृषध्र--ये नौ वैवस्वत मनुके पुत्र कहे गये

English

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अध्याय ३४

श्लोक 92

यथाविभवतः पुत्र ! द्विजान् संवत्सरोषितान् ।अर्चयेन्मधुपर्केण यथाकालमतन्द्रितः

yathāvibhavataḥ putra ! dvijān saṃvatsaroṣitān / arcayenmadhuparkeṇa yathākālamatandritaḥ

हिन्दी अर्थ

हैं। इस प्रकार मैंने तुमसे यह वैवस्वत मन्वन्तरका वर्णन किया है। इसका श्रवण और पाठ करनेसे मनुष्य सब पापोंसे छूट जाता और महान् पुण्यका भागी होता है।

English

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अध्याय ३४

श्लोक 93

तिष्ठेच्च शासने तेषां श्रेयस्कामो द्विजोत्तमः ।न च तान् विवदेद्वीमानाक्रुष्टश्चापि तैः सदा

tiṣṭhecca śāsane teṣāṃ śreyaskāmo dvijottamaḥ / na ca tān vivadedvīmānākruṣṭaścāpi taiḥ sadā

हिन्दी अर्थ

क्रौष्टकि बोले--महामुने! आपने स्वायम्भुव आदि सात मनुओंका वर्णन किया तथा उनके मन्वन्तरोंमें जो देवता, राजा और मुनि हुए थे, उनको भी बतलाया। इस कल्पमें जो दूसरे सात मनु होंगे, उनका परिचय दीजिये तथा उनके मन्वन्तरोंमें जो देवता आदि होनेवाले हैं, उनका भी वर्णन कीजिये।

English

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अध्याय ३४

श्लोक 94

सम्यग्गृहार्चनं कृत्वा यथास्थानमनुक्रमात् ।संपूजयेत्ततो वह्निं दद्याच्चैवाहुतीः क्रमात्

samyaggṛhārcanaṃ kṛtvā yathāsthānamanukramāt / saṃpūjayettato vahniṃ dadyāccaivāhutīḥ kramāt

हिन्दी अर्थ

मार्कण्डेयजीने कहा--ब्रह्मन्! छायासंज्ञाके पुत्र सावर्णिका नाम मैं तुम्हें बतला चुका हूँ। वे सब बातोंमें अपने बड़े भाई वैवस्वत मनुके ही समान हैं। वे ही आठवें मनु होंगे।

English

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अध्याय ३४

श्लोक 95

प्रथमां ब्रह्मणे दद्यात् प्रजानांपतये ततः ।तृतीयाञ्चैव गुह्येभ्यः कश्यपाय तथापराम्

prathamāṃ brahmaṇe dadyāt prajānāṃpataye tataḥ / tṛtīyāñcaiva guhyebhyaḥ kaśyapāya tathāparām

हिन्दी अर्थ

मन्वन्तरमें सप्तर्षि होंगे। सुतपा, अमिताभ और मुख्य--ये तीन देवगण होंगे। इनमेंसे प्रत्येक गण पृथक्--पृथक् बीस-बीस देवताओंका समुदाय होगा। तपस्तप, शक्र, द्युति, ज्योति, प्रभाकर, प्रभास, दयित, धर्म, तेज, रश्मि तथा वक्रतु आदि देवता सुतपागणके बीस

English

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अध्याय ३४

श्लोक 96

ततो ऽनुमतये दत्त्वा दद्याद् गृहबलिन्ततः ।पूर्वाख्यातं मया यत्ते नित्यकर्मक्रियाविधौ

tato 'numataye dattvā dadyād gṛhabalintataḥ / pūrvākhyātaṃ mayā yatte nityakarmakriyāvidhau

हिन्दी अर्थ

गणके बीस देवताओंके अन्तर्गत हैं। तीसरे गणके जो बीस देवता हैं, उनमें दम, दान्त, रित, सोम और विन्त आदि प्रधान हैं। ये मुख्यगणके देवता कहे गये हैं। ये सभी मन्वन्तरके स्वामी होंगे। ये मरीचिनन्दन प्रजापति कश्यपके ही पुत्र हैं। विरोचनके पुत्र बलि इनके इन्द्र होंगे। वे बलि आज भी अपनी प्रतिज्ञाके बन्धनसे बँधकर पाताललोकमें विराजमान हैं।

English

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अध्याय ३४

श्लोक 97

वैश्वदेवन्ततः कुर्याद्धलयस्तत्र मे शृणु ।यथास्थानविभागन्तु देवानुद्दिश्य वै पृथके

vaiśvadevantataḥ kuryāddhalayastatra me śṛṇu / yathāsthānavibhāgantu devānuddiśya vai pṛthake

हिन्दी अर्थ

विरजा, अर्ववीर, निर्मोह, सत्यवाक्, कृति तथा विष्णु आदि सावर्णि मनुके पुत्र होंगे।

English

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अध्याय ३४

श्लोक 98

पर्जन्याय धरित्रीणां दद्याच्च माणके त्रयम् ।वायवे च प्रतिदिशं दिग्भ्यः प्राच्यादितः क्रमात्

parjanyāya dharitrīṇāṃ dadyācca māṇake trayam / vāyave ca pratidiśaṃ digbhyaḥ prācyāditaḥ kramāt

हिन्दी अर्थ

सावर्णि मनुकी उत्पत्तिके प्रसड़में देवी-

English

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अध्याय ३४

श्लोक 99

ब्रह्मणे चान्तरीक्षाय सूर्याय च यथाक्रमम ।विश्वेभ्यश्चैव देवेभ्यो विश्वबूतभ्य एव च

brahmaṇe cāntarīkṣāya sūryāya ca yathākramama / viśvebhyaścaiva devebhyo viśvabūtabhya eva ca

हिन्दी अर्थ

मेधा ऋषिका राजा सुरथ और समाधिको भगवतीकी महिमा बताते हुए मधु-कैटभ-वधका प्रसड्र सुनाना

English

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अध्याय ३४

श्लोक 100

उषसे भूतपतये दद्याच्चोत्तरतस्ततः ।स्वधा नम इतीत्युक्त्वा पितृभ्यश्चापि दक्षिणे

uṣase bhūtapataye dadyāccottaratastataḥ / svadhā nama itītyuktvā pitṛbhyaścāpi dakṣiṇe

हिन्दी अर्थ

प्रथमचरित्रस्य ब्रह्मा ऋषि:, महाकाली देवता, गायत्री छन्‍्दः, नन्दा शक्ति:, रक्तदन्तिका बीजम्, अग्निस्तत्त्वमू, ऋग्वेद: स्वरूपम्, श्रीमहाकालीप्रीत्यर्थे

English

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अध्याय ३४

श्लोक 101

कृत्वापसव्यं वायव्यां यक्ष्मैतत्तेति भाजनात् ।अन्नावशेषमिच्छन् वै तोयं दद्याद्यथाविधि

kṛtvāpasavyaṃ vāyavyāṃ yakṣmaitatteti bhājanāt / annāvaśeṣamicchan vai toyaṃ dadyādyathāvidhi

हिन्दी अर्थ

प्रथम चरित्रके ब्रह्मा ऋषि, महाकाली देवता, गायत्री छनन्‍्द, नन्दा शक्ति, रक्तदन्तिका बीज, अग्नि तत्त्व ऋग्वेद स्वरूप है। श्रीमहाकाली देवताकी प्रसन्नताके लिये प्रथम चरित्रके जपमें विनियोग किया जाता है।

English

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अध्याय ३४

श्लोक 102

ततो ऽन्नाग्रं समुद्धृत्य हन्तकारोपकल्पनम् ।यथाविधि यथान्यायं ब्राह्मणायोपपादयेत्

tato 'nnāgraṃ samuddhṛtya hantakāropakalpanam / yathāvidhi yathānyāyaṃ brāhmaṇāyopapādayet

हिन्दी अर्थ

शड्खं संदधतीं करैस्त्रिनयनां सर्वाज्रभूषावृताम्

English

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अध्याय ३४

श्लोक 103

कुर्यात् कर्माणि तीर्थेन स्वेन स्वेन यथाविधि ।देवादीनान्तथा कुर्याद् ब्राह्मेणाचमनक्रियाम्

kuryāt karmāṇi tīrthena svena svena yathāvidhi / devādīnāntathā kuryād brāhmeṇācamanakriyām

हिन्दी अर्थ

नीलाश्मद्युतिमास्यपाददशकां सेवे कहाकालिकां

English

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अध्याय ३४

श्लोक 104

अङ्गुष्ठोत्तरतो रेखा पाणेर्या दक्षिणस्य तु ।एतद् ब्राह्ममिति ख्यातं तीर्थमाचमनाय वै

aṅguṣṭhottarato rekhā pāṇeryā dakṣiṇasya tu / etad brāhmamiti khyātaṃ tīrthamācamanāya vai

हिन्दी अर्थ

भगवान् विष्णुके सो जानेपर मधु और कैटभको मारनेके लिये कमलजन्मा ब्रह्माजीने जिनका स्तवन किया था, उन महाकाली देवीका मैं सेवन करता हूँ। वे अपने दस हाथोंमें खड्ग, चक्र, गदा, बाण, धनुष, परिघ, शूल, भुशुण्डि, मस्तक और शड्ख धारण करती हैं। उनके तीन नेत्र हैं। वे समस्त अड्ोंमें दिव्य आभूषणोंसे विभूषित हैं। उनके शरीरकी कान्ति

English

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अध्याय ३४

श्लोक 105

तर्जन्यङ्गुष्ठयोरन्तः पैत्र्यं तीर्थमुदाहृतम् ।पितॄणां तेन तोयादि दद्यान्नान्दीमुखादृते

tarjanyaṅguṣṭhayorantaḥ paitryaṃ tīrthamudāhṛtam / pitṝṇāṃ tena toyādi dadyānnāndīmukhādṛte

हिन्दी अर्थ

नीलमणिके समान है तथा वे दस मुख और दस पैरोंसे युक्त हैं।

English

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अध्याय ३४

श्लोक 106

अङ्गुल्यग्रे तथा दैवं तेन दिव्यक्रियाविधिः ।तीर्थ कनिष्ठिकामूले कायं तेन प्रजापतेः

aṅgulyagre tathā daivaṃ tena divyakriyāvidhiḥ / tīrtha kaniṣṭhikāmūle kāyaṃ tena prajāpateḥ

हिन्दी अर्थ

३5 नमश्नण्डिकाये ॥ “३8 ऐं” मार्कण्डेय उवाच ।

English

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अध्याय ३४

श्लोक 107

एवमेभिः सदा तीर्थैर्देवानां पितृभिः सह ।सदा कार्याणि कुर्वोत नान्यतीर्थेन कर्हिचित्

evamebhiḥ sadā tīrthairdevānāṃ pitṛbhiḥ saha / sadā kāryāṇi kurvota nānyatīrthena karhicit

हिन्दी अर्थ

सुरथो नाम राजाभूत्समस्ते क्षितिमण्डले ।। ४ ।।

English

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अध्याय ३४

श्लोक 108

ब्राह्मेणाचमनं शस्तं पित्र्यं पैत्र्येण सर्वदा ।देवतीर्थेन देवानां प्राजापत्यं निजेन च

brāhmeṇācamanaṃ śastaṃ pitryaṃ paitryeṇa sarvadā / devatīrthena devānāṃ prājāpatyaṃ nijena ca

हिन्दी अर्थ

बभूवु: शत्रवो भूपा: कोलाविध्वंसिनस्तदा ।। ५ ।।

English

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अध्याय ३४

श्लोक 109

नान्दीमुखानां कुर्वोत प्राज्ञः पिण्डोदकक्रियाम् ।प्राजापत्येन तीर्थेन यच्च किञ्चित् प्रजापतेः

nāndīmukhānāṃ kurvota prājñaḥ piṇḍodakakriyām / prājāpatyena tīrthena yacca kiñcit prajāpateḥ

हिन्दी अर्थ

न्यूनैरपि स तैर्युद्धे कोलाविध्वंसिभिर्जित: ।। ६ ।।

English

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अध्याय ३४

श्लोक 110

युगपज्जलमग्निञ्च बिभृयान्न विचक्षणः ।गुरुदेवान् प्रति तथा न च पादौ प्रसारयेत्

yugapajjalamagniñca bibhṛyānna vicakṣaṇaḥ / gurudevān prati tathā na ca pādau prasārayet

हिन्दी अर्थ

मार्कण्डेयजी बोले-- ।। १ ॥। सूर्यके पुत्र सावर्णि जो आठवें मनु कहे जाते हैं, उनकी उत्पत्तिकी कथा विस्तारपूर्वक कहता हूँ, सुनो ।। २ ।। सूर्यकुमार महाभाग सावर्णि भगवती महामायाके अनुग्रहसे जिस प्रकार मन्वन्तरके स्वामी हुए, वही प्रसड़ सुनाता हूँ ।। ३ ।। पूर्वकालकी बात है, स्वारोचिष मन्वन्तरमें सुरथ नामके एक राजा थे, जो चैत्रवंशमें उत्पन्न

English

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अध्याय ३४

श्लोक 111

नाचक्षीत धयन्तीं गां जलं नाञ्जलिना पिबेत् ।शौचकालेषु सर्वेषु गुरुष्वल्पेषु वा पुनः

nācakṣīta dhayantīṃ gāṃ jalaṃ nāñjalinā pibet / śaucakāleṣu sarveṣu guruṣvalpeṣu vā punaḥ

हिन्दी अर्थ

हुए थे। उनका समस्त भूमण्डलपर अधिकार था ।। ४ ॥। वे प्रजाका अपने औरस पुत्रोंकी

English

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अध्याय ३४

श्लोक 112

न विलम्बेत शौचार्थं न मुखेनानलं धमेत् ।तत्र पुत्र ! न वस्तव्यं यत्र नास्ति चतुष्टयम्

na vilambeta śaucārthaṃ na mukhenānalaṃ dhamet / tatra putra ! na vastavyaṃ yatra nāsti catuṣṭayam

हिन्दी अर्थ

भाँति धर्मपूर्वक पालन करते थे; फिर भी उस समय कोलाविध्वंसीः नामके क्षत्रिय उनके शत्रु हो गये ।। ५ ।। राजा सुरथकी दण्डनीति बड़ी प्रबल थी। उनका शत्रुओंके साथ संग्राम हुआ। यद्यपि कोलाविध्वंसी संख्यामें कम थे तो भी राजा सुरथ युद्धमें उनसे परास्त हो गये ।। ६ ।। तब वे युद्धभूमिसे अपने नगरको लौट आये और केवल अपने देशके राजा

English

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अध्याय ३४

श्लोक 113

ऋणप्रदाता वैद्यश्च श्रोत्रियः सजला नदी ।जितामित्रो नृपो यत्र बलवान् धर्मतत्परः

ṛṇapradātā vaidyaśca śrotriyaḥ sajalā nadī / jitāmitro nṛpo yatra balavān dharmatatparaḥ

हिन्दी अर्थ

होकर रहने लगे (समूची पृथ्वीसे अब उनका अधिकार जाता रहा) किंतु वहाँ भी उन प्रबल शत्रुओंने उस समय महाभाग राजा सुरथपर आक्रमण कर दिया ७ ।

English

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अध्याय ३४

श्लोक 114

तत्र नित्यं वसेत् प्राज्ञः कुतः कुनृपतौ सुखम् ।यत्राप्रधृष्यो नृपतिर्यत्र शस्यवती मही

tatra nityaṃ vaset prājñaḥ kutaḥ kunṛpatau sukham / yatrāpradhṛṣyo nṛpatiryatra śasyavatī mahī

हिन्दी अर्थ

कोशो बलं चापद्नतं तत्रापि स्वपुरे तत: ॥। ८ ।॥।

English

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अध्याय ३४

श्लोक 115

पौराः सुसंयता यत्र सततं न्यायवर्तिनः ।यत्रामत्सरिणो लोकास्तत्र वासः सुखोदयः

paurāḥ susaṃyatā yatra satataṃ nyāyavartinaḥ / yatrāmatsariṇo lokāstatra vāsaḥ sukhodayaḥ

हिन्दी अर्थ

एकाकी हयमारुह्मु जगाम गहनं वनम् ।

English

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अध्याय ३४

श्लोक 116

यस्मिन् कृषीबला राष्ट्रे प्रायशो नातिभोगिनः ।यत्रौषधन्यशेषाणि वसेत्तत्र विचक्षणः

yasmin kṛṣībalā rāṣṭre prāyaśo nātibhoginaḥ / yatrauṣadhanyaśeṣāṇi vasettatra vicakṣaṇaḥ

हिन्दी अर्थ

प्रशान्तश्चापदाकीर्ण मुनिशिष्योपशोभितम् ।। १० ।।

English

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अध्याय ३४

श्लोक 117

तत्र पुत्र न ! वस्तव्यं यत्रैतत् त्रितयं सदा ।जिगीषुः पूर्ववैरश्च जनश्च सततोत्सवः

tatra putra na ! vastavyaṃ yatraitat tritayaṃ sadā / jigīṣuḥ pūrvavairaśca janaśca satatotsavaḥ

हिन्दी अर्थ

तस्थौ कंचित्स काल॑ च मुनिना तेन सत्कृत: ।

English

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अध्याय ३४

श्लोक 118

वसेन्नित्यं सुशीलेषु सहवासिषु पण्डितः ।इत्येतत् कथितं पुत्र ! मया ते हितकाम्यया

vasennityaṃ suśīleṣu sahavāsiṣu paṇḍitaḥ / ityetat kathitaṃ putra ! mayā te hitakāmyayā

हिन्दी अर्थ

इतश्रैतश्न विचरंस्तस्मिन्मुनिवराश्रमे ११ ।।

English

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स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_mArkaNDeyapurANa1-93.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Markandeya Purana — Chapter 34
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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