अध्याय ३६
श्लोक 1
इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे ऽलर्कानुशासने वर्ज्यावर्ज्यनामा पञ्चत्रिंशो ऽध्यायः षट्त्रिंशो ऽध्यायः जड उवाच स एवमनुशिष्टः सन् मात्रा संप्राप्य यौवनम् ।ऋतध्वजसुतश्चक्रे सम्यग्दारपरिग्रहम्
iti śrīmārkaṇḍeyapurāṇe 'larkānuśāsane varjyāvarjyanāmā pañcatriṃśo 'dhyāyaḥ ṣaṭtriṃśo 'dhyāyaḥ jaḍa uvāca sa evamanuśiṣṭaḥ san mātrā saṃprāpya yauvanam / ṛtadhvajasutaścakre samyagdāraparigraham
हिन्दी अर्थ
हैं। कल्पके अन्तमें जब सम्पूर्ण जगत् एकार्णवमें निमग्न हो रहा था और सबके प्रभु भगवान् विष्णु शेषनागकी शय्या बिछाकर योगनिद्राका आश्रय ले सो रहे थे, उस समय उनके कानोंकी मैलसे दो भयंकर असुर उत्पन्न हुए, जो मधु और कैटभके नामसे विख्यात थे। वे दोनों ब्रह्माजीका वध करनेको तैयार हो गये। भगवान् विष्णुके नाभिकमलमें
English
uith seven dvipas; and ho fashioned the four worlds, the Rhiir-loka and tho others, as before.