Markandeya Purana· Mārkaṇḍeya Purāṇa
53
अध्याय 53 / 90

Adhyaya 53

44 श्लोकWhatsApp

पूर्ण अध्याय पाठ44 श्लोक

श्लोक पर जाएं:

अध्याय ५३

श्लोक 1

इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे रुद्रसर्गाभिधानो नाम द्विपञ्चाशो ऽध्यायः त्रिपञ्चाशो ऽध्यायः- ५३ क्रौष्टुकिरुवाच स्वायम्भुवं त्वयाख्यातमेतन्मन्वन्तरञ्च यत् ।तदहं भगवन् ! सम्यक् श्रोतुमिच्छामि कथ्यताम्

iti śrīmārkaṇḍeyapurāṇe rudrasargābhidhāno nāma dvipañcāśo 'dhyāyaḥ tripañcāśo 'dhyāyaḥ- 53 krauṣṭukiruvāca svāyambhuvaṃ tvayākhyātametanmanvantarañca yat / tadahaṃ bhagavan ! samyak śrotumicchāmi kathyatām

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार श्रीमार्कण्डेयपुराणमें सावर्णिक मन्वन्तरकी कथाके अन्तर्गत

English

AiiuNis.-r, XXV. 1732 appears to have a different application; and a i>lac*e ohiry.i ia mentioned in Uumdy, Ayodh.-K., Ixxiii. 13, as situated between iho angea and Oo-matf. Vilvd-mitra had certain descendants called Lohitas tlui-V, xxvii. 14G5) or Lanbitas (id., xxxii. 1771) who may have been the iiildren of his grandson Lauhi (id., xxvii. 1474).

अध्याय ५३

श्लोक 2

मन्वन्तरप्रमाणञ्च देवा देवर्षयस्तथा ।ये च क्षितीशा भगवन् ! देवेन्द्रश्चैव यस्तथा

manvantarapramāṇañca devā devarṣayastathā / ye ca kṣitīśā bhagavan ! devendraścaiva yastathā

हिन्दी अर्थ

मार्कण्डेयजी कहते हैं--क्रौष्टकिजी! यह तुमसे सावर्णिक मन्वन्तरका भलीभाँति वर्णन किया गया। साथ ही महिषासुर-वध आदिके रूपमें भगवती दुर्गाकी महिमा भी बतलायी गयी। मुनिश्रेष्ठी अब दूसरे सावर्णिक मन्वन्तरकी कथा सुनो। दक्षके पुत्र सावर्णि नवें मनु होनेवाले हैं। उनके समयमें जो देवता, मुनि और राजा होंगे, उन सबके नाम सुनो।

English

the A^makaSjf the Vaidehakas,** and the Paj.

अध्याय ५३

श्लोक 3

मार्कण्डेय उवाच मन्वन्तराणां संख्याता साधिका ह्येकसप्ततिः ।मानुषेण प्रमाणेन शृणु मन्वन्तरञ्च मे

mārkaṇḍeya uvāca manvantarāṇāṃ saṃkhyātā sādhikā hyekasaptatiḥ / mānuṣeṇa pramāṇena śṛṇu manvantarañca me

हिन्दी अर्थ

पार, मरीचिगर्भ और सुधर्मा--ये तीन प्रकारके देवता होंगे। इनमेंसे प्रत्येक वर्गमें बारह- बारह देवता होंगे। इस समय जो छ: मुखोंवाले अग्निकुमार कार्तिकेय हैं, वे ही उस मन्वन्तरमें “अद्भुत' नामवाले इन्द्र होंगे। मेधातिथि, वसु, सत्य, ज्योतिष्मान्, द्युतिमान, सबल तथा हव्यवाहन--ये सप्तर्षि होंगे। धृष्टकेतु, बर्हकेतु, पञचहस्त, निरामय पृथुश्रवा,

English

the Paripatra mountains, J the Kapingalas,§ Kururvdhyas ||

अध्याय ५३

श्लोक 4

त्रिंशत्कोट्यस्तु संख्याताः सहस्राणि च विंशतिः ।सप्तषष्टिस्तथान्यानि नियुतानि च संख्यया

triṃśatkoṭyastu saṃkhyātāḥ sahasrāṇi ca viṃśatiḥ / saptaṣaṣṭistathānyāni niyutāni ca saṃkhyayā

हिन्दी अर्थ

अर्चिष्मानू भूरिद्युम्न तथा बृहद्धय--ये दक्षपुत्र सावर्णि मनुके राजकुमार होंगे।

English

This appears incorrect. Road Raud^{ (fern J, a name for

अध्याय ५३

श्लोक 5

मन्वन्तरप्रमाणञ्च इत्येतत् साधिकं विना ।अष्टौ शतसहस्राणि दिव्यया संख्यया स्मृतम्

manvantarapramāṇañca ityetat sādhikaṃ vinā / aṣṭau śatasahasrāṇi divyayā saṃkhyayā smṛtam

हिन्दी अर्थ

अब दसवें मनुके मन्वन्तरका वर्णन सुनो। दसवें मन्वन्तरमें ब्रह्माजीके पुत्र बुद्धिमान् सावर्णिका अधिकार होगा। ब्रह्मसावर्णि मन्वन्तरमें सुखासीन और निरुद्ध--ये दो प्रकारके

English

Kharmaka,tt and Karvata^ana; these hills, §§ people of Mifchila,|||| the S^abhra3,1[l and the Vadau^

अध्याय ५३

श्लोक 6

द्विपञ्चाशत्तथान्यानि सहस्राण्यधिकानि च ।स्वायम्भुवो मनुः पूर्वं मनुः स्वारोचिषस्तथा

dvipañcāśattathānyāni sahasrāṇyadhikāni ca / svāyambhuvo manuḥ pūrvaṃ manuḥ svārociṣastathā

हिन्दी अर्थ

उनके देवता भी सौ ही होंगे। उस मन्वन्तरमें इन्द्रके समस्त गुणोंसे युक्त शान्ति” नामक इन्द्र

English

and the Magadhas, § the Prag- jyotislias, || and the Lauhityas,l[ [lie cannibals who dwell on the sea-const;** the hills pdrnotkata,tt Bhadra-gaiira,I+ and Udaya-giri;§§ and the Ka^ayas,|||| tlie Meklialamushtas,1fir the Tama-

अध्याय ५३

श्लोक 7

औत्तमस्तामसश्चैव रैवतश्चाक्षुषस्तथा ।षडेते मनवो ऽतीतास्तथा वैवस्वतो ऽधुना

auttamastāmasaścaiva raivataścākṣuṣastathā / ṣaḍete manavo 'tītāstathā vaivasvato 'dhunā

हिन्दी अर्थ

सुक्षेत्र, उत्तमौजा, भूमिसेन, वीर्यवान्, शतानीक, वृषभ, अनमित्र, जयद्रथ, भूरिद्युम्न तथा सुपर्वा--ये मनुके पुत्र होंगे।

English

The three constellations Raudra,|| Punar-vasu, and Pusij,

अध्याय ५३

श्लोक 8

सावर्णिः पञ्च रौच्याश्च भौत्याश्चागामिनस्त्वमी ।एतेषां विस्तरं भूयो मन्वन्तरपरिग्रहे

sāvarṇiḥ pañca raucyāśca bhautyāścāgāminastvamī / eteṣāṃ vistaraṃ bhūyo manvantaraparigrahe

हिन्दी अर्थ

अब धर्मके पुत्र सावर्णिका मन्वन्तर सुनो। धर्मसावर्णि मन्वन्तरमें विहड़म, कामग तथा निर्माणरति--ये तीन प्रकारके देवता होंगे। इनमेंसे एक-एक तीस-तीस देवताओंका समुदाय है। मास, ऋतु और दिन--ये निर्माणरति कहलायेंगे। रात्रियोंकी संज्ञा विहड़म होगी और मुहूर्तसम्बन्धी गण कामग कहलायेंगे। विख्यात पराक्रमी “वृष'उनके इन्द्र होंगे। हविष्मान्,

English

the A^makaSjf the Vaidehakas,** and the Paj.

अध्याय ५३

श्लोक 9

वक्ष्ये देवानृषींश्चैव यक्षेन्द्राः पितरश्च ये ।उत्पत्तिं संग्रहं ब्रह्मन् ! श्रूयतामस्य सन्ततिः

vakṣye devānṛṣīṃścaiva yakṣendrāḥ pitaraśca ye / utpattiṃ saṃgrahaṃ brahman ! śrūyatāmasya santatiḥ

हिन्दी अर्थ

वरिष्ठ, अरुणनन्दन ऋष्टि, निश्चर, अनघ, महामुनि विष्टि तथा अग्निदेव--ये सात सप्तर्षि होंगे। सर्वत्रग, सुशर्मा, देवानीक, पुरूदवह, हेमधन्वा तथा दृढायु--ये भविष्यमें होनेवाले राजा धर्मसावर्णि मनुके पुत्र होंगे। बारहवाँ मन्वन्तर रुद्रपुत्र सावर्णि मनुका होगा। उसके आनेपर सुधर्मा, सुमना, हरित, रोहित और सुवर्ण--ये पाँच देवगण होंगे। इनमेंसे प्रत्येक

English

the Paripatra mountains, J the Kapingalas,§ Kururvdhyas ||

अध्याय ५३

श्लोक 10

यच्च तेषामभूत् क्षेत्रं तत्पुत्राणां महात्मनाम् ।मनोः स्वायम्भुवस्यासन् दश पुत्रास्तु तत्समाः

yacca teṣāmabhūt kṣetraṃ tatputrāṇāṃ mahātmanām / manoḥ svāyambhuvasyāsan daśa putrāstu tatsamāḥ

हिन्दी अर्थ

गण दस-दस देवताओंका होगा। महाबली ऋतधामा उनका इन्द्र होगा। द्युति, तपस्वी, सुतपा, तपोमूर्ति, तपोनिधि, तपोरति तथा तपोधृति--ये सात सप्तर्षि होंगे। देववान्, उपदेव, देवश्रेष्ठ, विदूरथ, मित्रवान् तथा मित्रविन्द--ये भावी मनुके वंशज राजा होंगे।

English

iho Tortoise* 8 right fore foot: listen while I mention tliei

अध्याय ५३

श्लोक 11

यैरियं पृथिवी सर्वा सप्तद्वीपा सपर्वता ।ससमुद्राकरवती प्रतिवर्षं निवेशिता

yairiyaṃ pṛthivī sarvā saptadvīpā saparvatā / sasamudrākaravatī prativarṣaṃ niveśitā

हिन्दी अर्थ

अब “रौच्य” नामक तेरहवें मनुके समयमें होनेवाले देवताओं, सप्तर्षियों तथा राजाओंका वर्णन सुनो। सुधर्मा, सुकर्मा और सुशर्मा--ये तीन उस समयके देवता होंगे। महाबली एवं महापराक्रमी 'दिवस्पति” उनके इन्द्र होंगे। धृतिमान, अव्यय, तत्त्वदर्शी,

English

This appears incorrect. Road Raud^{ (fern J, a name for

अध्याय ५३

श्लोक 12

ससमुद्राकरवती प्रतिवर्षं त्रेतायुगे तथा ।प्रियव्रतस्य पुत्रैस्तैः पौत्रैः स्वायम्भुवस्य च

sasamudrākaravatī prativarṣaṃ tretāyuge tathā / priyavratasya putraistaiḥ pautraiḥ svāyambhuvasya ca

हिन्दी अर्थ

निरुत्सुक, निर्मोह, सुतपा और निष्प्रकम्प--ये सात सप्तर्षि होंगे। चित्रसेन, विचित्र, नयति, निर्भय, दृढ, सुनेत्र, क्षत्रबुद्धि तथा सुव्रत--ये रौच्य मनुके पुत्र राजा होंगे।

English

Kharmaka,tt and Karvata^ana; these hills, §§ people of Mifchila,|||| the S^abhra3,1[l and the Vadau^

अध्याय ५३

श्लोक 13

प्रियव्रतात् प्रजावत्यां वीरात् कन्या व्यजायत ।कन्या सा तु महाभागा कर्दमस्य प्रजापते

priyavratāt prajāvatyāṃ vīrāt kanyā vyajāyata / kanyā sā tu mahābhāgā kardamasya prajāpate

हिन्दी अर्थ

रौच्य मनुकी उत्पत्ति-कथा

English

and the Magadhas, § the Prag- jyotislias, || and the Lauhityas,l[ [lie cannibals who dwell on the sea-const;** the hills pdrnotkata,tt Bhadra-gaiira,I+ and Udaya-giri;§§ and the Ka^ayas,|||| tlie Meklialamushtas,1fir the Tama-

अध्याय ५३

श्लोक 14

कन्ये द्वे दश पुत्रांश्च सम्राट्कुक्षी च ते उभे ।तयोर्वै भ्रातरः शूराः प्रजापतिसमा दश

kanye dve daśa putrāṃśca samrāṭkukṣī ca te ubhe / tayorvai bhrātaraḥ śūrāḥ prajāpatisamā daśa

हिन्दी अर्थ

मार्कण्डेयजी कहते हैं--ब्रह्मन! पूर्वकालकी बात है, प्रजापति रुचि ममता और अहड्कारसे रहित इस पृथ्वीपर विचरते थे। उन्हें किसीसे भय नहीं था। वे बहुत कम सोते थे। उन्होंने न तो अग्निकी स्थापना की थी और न अपने लिये घर ही बना रखा था। वे एक बार भोजन करते और बिना आश्रमके ही रहते थे।

English

iho Tortoise* 8 right fore foot: listen while I mention tliei

अध्याय ५३

श्लोक 15

आग्नीध्रो मेधातिथिश्च वपुष्मांश्च तथापरः ।ज्योतिष्मान्द्युतिमान् भव्यः सवनः सप्त एव ते

āgnīdhro medhātithiśca vapuṣmāṃśca tathāparaḥ / jyotiṣmāndyutimān bhavyaḥ savanaḥ sapta eva te

हिन्दी अर्थ

उन्हें सब प्रकारकी आसक्तियोंसे रहित एवं मुनिवृत्तिसे रहते देख उनके पितरोंने

English

The three constellations Raudra,|| Punar-vasu, and Pusij,

अध्याय ५३

श्लोक 16

प्रियव्रतो ऽभ्यषिञ्चत्तान् सप्त सप्तसु पार्थिवान् ।द्वीपेषु तेन धर्मेण द्वीपांश्चैव निबोध मे

priyavrato 'bhyaṣiñcattān sapta saptasu pārthivān / dvīpeṣu tena dharmeṇa dvīpāṃścaiva nibodha me

हिन्दी अर्थ

पितर बोले--बेटा! विवाह स्वर्ग और अपवर्गका हेतु- होनेके कारण एक पुण्यमय कार्य है; उसे तुमने क्‍यों नहीं किया? गृहस्थ पुरुष समस्त देवताओं, पितरों, ऋषियों और अतिथियोंकी पूजा करके पुण्यमय लोकोंको प्राप्त करता है। वह “स्वाहा” के उच्चारणसे देवताओंको, 'स्वधा” शब्दसे पितरोंको तथा

English

iho Tortoise* 8 right fore foot: listen while I mention tliei

अध्याय ५३

श्लोक 17

जम्बुद्वीपे तथाग्नीध्रं राजानं कृतवान् पिता ।प्लक्षद्वीपेश्वरश्चापि तेन मेधातिथिः कृतः

jambudvīpe tathāgnīdhraṃ rājānaṃ kṛtavān pitā / plakṣadvīpeśvaraścāpi tena medhātithiḥ kṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

अन्नदान (बलिवैश्वदेव) आदिसे भूत आदि प्राणियों एवं अतिथियोंको उनका भाग समर्पित करता है। बेटा! हम ऐसा मानते हैं कि गृहस्थ आश्रमको स्वीकार न करनेपर तुम्हें इस जीवनमें क्लेश-पर-क्लेश उठाना पड़ेगा तथा मृत्युके बाद और दूसरे जन्ममें भी क्लेश ही भोगने पड़ेंगे।

English

iho Tortoise* 8 right fore foot: listen while I mention tliei

अध्याय ५३

श्लोक 18

शाल्मलेस्तु वपुष्मन्तं ज्योतिष्मन्तं कुशाह्वये ।क्रौञ्चद्वीपे द्युतिमन्तं भव्यं शाकाह्वयेश्वरम्

śālmalestu vapuṣmantaṃ jyotiṣmantaṃ kuśāhvaye / krauñcadvīpe dyutimantaṃ bhavyaṃ śākāhvayeśvaram

हिन्दी अर्थ

रुचिने कहा--पितृगण! परिग्रहमात्र ही अत्यन्त दुःख एवं पापका कारण होता है तथा उससे मनुष्यकी अधोगति होती है, यही सोचकर मैंने पहले स्त्री- संग्रह नहीं किया। मन और इन्द्रियोंको नियन्त्रणमें रखकर जो यह आत्मसंयम किया जाता है, वह भी परिग्रह करनेपर मोक्षका साधक नहीं होता। ममतारूप

English

iho Tortoise* 8 right fore foot: listen while I mention tliei

अध्याय ५३

श्लोक 19

पुष्कराधिपतिञ्चापि सवनं कृतवान् सुतम् ।महावीतो धातकिश्च पुष्कराधिपतेः सुतौ

puṣkarādhipatiñcāpi savanaṃ kṛtavān sutam / mahāvīto dhātakiśca puṣkarādhipateḥ sutau

हिन्दी अर्थ

कीचड़में सना हुआ होनेपर भी यह आत्मा जो परिग्रहशून्य चित्तरूपी जलसे प्रतिदिन धोया जाता है, वह श्रेष्ठ प्रयत्न है। जितेन्द्रिय विद्वानोंकी चाहिए कि वे अनेक जन्मोंद्वारा सज्चित कर्मरूपी पड़कमें सने हुए आत्माका सद्वासनारूपी जलसे प्रक्षालन करें।

English

iho Tortoise* 8 right fore foot: listen while I mention tliei

अध्याय ५३

श्लोक 20

द्विधा कृत्वा तयोर्वर्षं पुष्करे संन्यवेशयत् ।भव्यस्य पुत्राः सप्तासन्नामतस्तान्निबोध मे

dvidhā kṛtvā tayorvarṣaṃ puṣkare saṃnyaveśayat / bhavyasya putrāḥ saptāsannāmatastānnibodha me

हिन्दी अर्थ

पितर बोले--बेटा! जितेन्द्रिय होकर आत्माका प्रक्षालल करना उचित ही है; किन्तु तुम जिसपर चल रहे हो, वह मोक्षका मार्ग है। किन्तु फलेच्छारहित दान और शुभाशुभके उपभोगसे भी पूर्वकृत अशुभ कर्म दूर होता है। इसी प्रकार दयाभावसे प्रेरित होकर जो कर्म किया जाता है, वह बन्धनकारक नहीं

English

iho Tortoise* 8 right fore foot: listen while I mention tliei

अध्याय ५३

श्लोक 21

जलदश्च कुमारश्च सुकुमारो मनीवकः ।कुशोत्तरो ऽथ मेधावी सप्तमस्तु महाद्रुमः

jaladaśca kumāraśca sukumāro manīvakaḥ / kuśottaro 'tha medhāvī saptamastu mahādrumaḥ

हिन्दी अर्थ

होता। फल-कामनासे रहित कर्म भी बन्धनमें नहीं डालता। पूर्वजन्ममें किया हुआ मानवोंका शुभाशुभ कर्म सुख-दुःखमय भोगोंके रूपमें प्रतिदिन भोगनेपर ही क्षीण होता है। इस प्रकार विद्वान् पुरुष आत्माका प्रक्षालन करते और

English

iho Tortoise* 8 right fore foot: listen while I mention tliei

अध्याय ५३

श्लोक 22

तन्नामकानि वर्षाणि शाकद्वीपे चकार सः ।तथा द्युतिमतः सप्त पुत्रास्तांश्च निबोध मे

tannāmakāni varṣāṇi śākadvīpe cakāra saḥ / tathā dyutimataḥ sapta putrāstāṃśca nibodha me

हिन्दी अर्थ

उसकी बन्धनोंसे रक्षा करते हैं। ऐसा करनेसे वह अविवेकके कारण पापरूपी कीचड़में नहीं फँसता।

English

iho Tortoise* 8 right fore foot: listen while I mention tliei

अध्याय ५३

श्लोक 23

कुशलो मनुगश्चोष्णः प्राकरश्चार्थकारकः ।मुनिश्च दुन्दुभिश्चैव सप्तमः परिकीर्तितः

kuśalo manugaścoṣṇaḥ prākaraścārthakārakaḥ / muniśca dundubhiścaiva saptamaḥ parikīrtitaḥ

हिन्दी अर्थ

रुचिने पूछा--पितामहो! वेदमें कर्ममार्गको अविद्या कहा गया है, फिर क्‍यों आपलोग मुझे उस मार्गमें लगाते हैं?

English

iho Tortoise* 8 right fore foot: listen while I mention tliei

अध्याय ५३

श्लोक 24

तेषां स्वनामधेयानि क्रौञ्चद्वीपे तथाभवन् ।ज्योतिष्मतः कुशद्वीपे पुत्रनामाङ्कितानि वै

teṣāṃ svanāmadheyāni krauñcadvīpe tathābhavan / jyotiṣmataḥ kuśadvīpe putranāmāṅkitāni vai

हिन्दी अर्थ

पितर बोले--यह सत्य है कि कर्मको अविद्या ही कहा गया है, इसमें तनिक भी मिथ्या नहीं है; फिर भी इतना तो निश्चित है कि उस विद्याकी प्राप्तिमें कर्म ही कारण है। विहित कर्मका पालन न करके जो अधम मनुष्य संयम करते हैं, वह संयम अन्तमें मोक्षकी प्राप्ति नहीं कराता; अपितु अधोगतिमें ले जानेवाला

English

iho Tortoise* 8 right fore foot: listen while I mention tliei

अध्याय ५३

श्लोक 25

तत्रापि सप्त वर्षापि तेषां नामानि मे शृणु ।उद्भिदं वैष्णवञ्चैव सुरथं लम्बनं तथा

tatrāpi sapta varṣāpi teṣāṃ nāmāni me śṛṇu / udbhidaṃ vaiṣṇavañcaiva surathaṃ lambanaṃ tathā

हिन्दी अर्थ

होता है। वत्स! तुम तो समझते हो कि मैं आत्माका प्रक्षालन करता हूँ; किन्तु वास्तवमें तुम शास्त्रविहित कर्मोंके न करनेके कारण पापोंसे दग्ध हो रहे हो! कर्म अविद्या होनेपर भी विधिके पालनद्वारा शोधे हुए विषकी भाँति मनुष्योंका उपकार करनेवाला ही होता है। इसके विपरीत वह विद्या भी विधिकी

English

iho Tortoise* 8 right fore foot: listen while I mention tliei

अध्याय ५३

श्लोक 26

धृतिमत् प्राकरञ्चैव कापिलं चापि सप्तमम् ।वपुष्मतः सुताः सप्त शाल्मलेशस्य चाभवन्

dhṛtimat prākarañcaiva kāpilaṃ cāpi saptamam / vapuṣmataḥ sutāḥ sapta śālmaleśasya cābhavan

हिन्दी अर्थ

अवहेलनासे निश्चय ही हमारे बन्धनका कारण बन जाती है। अतः वत्स! तुम विधिपूर्वक स्त्री-संग्रह करो। ऐसा न हो कि इस लोकका लाभ न मिलनेके कारण

English

iho Tortoise* 8 right fore foot: listen while I mention tliei

अध्याय ५३

श्लोक 27

श्वेतश्च हरितश्चैव जीमूतो रोहितस्तथा ।वैद्युतो मानसश्चैव केतुमान् सप्तमस्तथा

śvetaśca haritaścaiva jīmūto rohitastathā / vaidyuto mānasaścaiva ketumān saptamastathā

हिन्दी अर्थ

हा कर है ०+५- ७४ ह।॥

English

iho Tortoise* 8 right fore foot: listen while I mention tliei

अध्याय ५३

श्लोक 28

तथैव शाल्मलेस्तेषां समनामानि सप्त वै ।सप्त मेधातिथेः पुत्राः प्लक्षद्वीपेश्वरस्य वै

tathaiva śālmalesteṣāṃ samanāmāni sapta vai / sapta medhātitheḥ putrāḥ plakṣadvīpeśvarasya vai

हिन्दी अर्थ

रुचिने कहा--पितरो! अब तो मैं बूढ़ा हो गया; भला, मुझको कौन स्त्री देगा। इसके सिवा मुझ-जैसे दरिद्रके लिये स्त्रीको रखना बहुत कठिन कार्य है।

English

iho Tortoise* 8 right fore foot: listen while I mention tliei

अध्याय ५३

श्लोक 29

येषां नामाङ्गितैर्वर्षैः प्लक्षद्वीपस्तु सप्तधा ।पूर्वं शाकभवं वर्षं शिशिरन्तु सुखोदयम्

yeṣāṃ nāmāṅgitairvarṣaiḥ plakṣadvīpastu saptadhā / pūrvaṃ śākabhavaṃ varṣaṃ śiśirantu sukhodayam

हिन्दी अर्थ

पितर बोले--वत्स! यदि हमारी बात नहीं मानोगे तो हमलोगोंका पतन हो

English

iho Tortoise* 8 right fore foot: listen while I mention tliei

अध्याय ५३

श्लोक 30

आनन्दञ्च शिवञ्चैव क्षेमकञ्च ध्रुवन्तथा ।प्लक्षद्वीपादिभूतेषु शाकद्वीपान्तिमेषु वै

ānandañca śivañcaiva kṣemakañca dhruvantathā / plakṣadvīpādibhūteṣu śākadvīpāntimeṣu vai

हिन्दी अर्थ

मार्कण्डेयजी कहते हैं--मुनिश्रेष्ठ! यों कहकर पितर उनके देखते-देखते वायुके बुझाये हुए दीपककी भाँति सहसा अदृश्य हो गये। पितरोंकी बातसे रुचिका मन बहुत उद्विग्न हुआ। वे अपने विवाहके लिये कन्या प्राप्त करनेकी इच्छासे पृथ्वीपर विचरने लगे। वे पितरोंके वचनरूप अग्निसे दग्ध हो रहे थे।

English

iho Tortoise* 8 right fore foot: listen while I mention tliei

अध्याय ५३

श्लोक 31

ज्ञेयः पञ्चसु धर्मश्च वर्णाश्रमविभागजः ।नित्यः स्वाभाविकश्चैव अहिंसाविधिवर्धितः

jñeyaḥ pañcasu dharmaśca varṇāśramavibhāgajaḥ / nityaḥ svābhāvikaścaiva ahiṃsāvidhivardhitaḥ

हिन्दी अर्थ

कोई कन्या न मिलनेसे उन्हें बड़ी भारी चिन्ता हुई। उनका चित्त अत्यन्त व्याकुल हो उठा। इसी अवस्थामें उन्हें यह बुद्धि सूझी कि “मैं तपस्याके द्वारा श्रीब्रह्माजीकी आराधना करूँ।” ऐसा निश्चय करके उन्होंने कठोर नियमका आश्रय ले श्रीब्रह्माजीकी आराधनाके निमित्त सौ वर्षोतक भारी तपस्या की।

English

iho Tortoise* 8 right fore foot: listen while I mention tliei

अध्याय ५३

श्लोक 32

पञ्चस्वेतेषु वर्षेषु सर्वसाधारणः स्मृतः ।अग्नीध्राय पिता पूर्वं जम्बुद्वीपं ददौ द्विज

pañcasveteṣu varṣeṣu sarvasādhāraṇaḥ smṛtaḥ / agnīdhrāya pitā pūrvaṃ jambudvīpaṃ dadau dvija

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर लोकपितामह ब्रह्माजीने उन्हें दर्शन दिया और कहा---मैं प्रसन्न हूँ, तुम्हारी जो इच्छा हो, माँग लो।” तब रुचिने जगतके आधारभूत ब्रह्माजीको प्रणाम करके पितरोंके कथनानुसार अपना अभीष्ट निवेदन किया। रुचिकी

English

iho Tortoise* 8 right fore foot: listen while I mention tliei

अध्याय ५३

श्लोक 33

तस्य पुत्रा बभूवुर्हि प्रजापतिसमा नव ।ज्येष्ठो नाबिरिति ख्यातस्तस्य किंपुरुषो ऽनुजः

tasya putrā babhūvurhi prajāpatisamā nava / jyeṣṭho nābiriti khyātastasya kiṃpuruṣo 'nujaḥ

हिन्दी अर्थ

अभिलाषा सुनकर ब्रह्माजीने उनसे कहा--'विप्रवर! तुम प्रजापति होओगे। तुमसे प्रजाकी सृष्टि होगी। प्रजाकी सृष्टि तथा पुत्रोंकी उत्पत्ति करनेके साथ ही शुभ कर्मोका अनुष्ठान करके जब तुम अपने अधिकारका त्याग कर दोगे, तब तुम्हें सिद्धि प्राप्त होगी। अब तुम स्त्री-प्राप्तिकी अभिलाषा लेकर पितरोंका

English

iho Tortoise* 8 right fore foot: listen while I mention tliei

अध्याय ५३

श्लोक 34

हरिवर्षस्तृतीयस्तु चतुर्थो ऽभूदिलावृतः ।वश्यश्च पञ्चमः पुत्रो हिरण्यः षष्ठ उच्यते

harivarṣastṛtīyastu caturtho 'bhūdilāvṛtaḥ / vaśyaśca pañcamaḥ putro hiraṇyaḥ ṣaṣṭha ucyate

हिन्दी अर्थ

पूजन करो। वे ही प्रसन्न होनेपर तुम्हें मनोवाज्छित पत्नी और पुत्र प्रदान करेंगे। भला, पितर सन्तुष्ट हो जायेँ तो वे क्या नहीं दे सकते।

English

iho Tortoise* 8 right fore foot: listen while I mention tliei

अध्याय ५३

श्लोक 35

कुरुस्तु सप्तमस्तेषां भद्राश्वश्चाष्टमः स्मृतः ।नवमः केतुमालश्च तन्नाम्ना वर्षसंस्थितिः

kurustu saptamasteṣāṃ bhadrāśvaścāṣṭamaḥ smṛtaḥ / navamaḥ ketumālaśca tannāmnā varṣasaṃsthitiḥ

हिन्दी अर्थ

मार्कण्डेयजी कहते हैं--मुने! अव्यक्तजन्मा ब्रह्माजीके ये वचन सुनकर रुचिने नदीके एकान्त तटपर पितरोंका तर्पण किया और भक्तिसे मस्तक झुकाकर एकाग्र एवं संयत-चित्त हो नीचे लिखे स्त्रोत्रद्वारा आदरपूर्वक उनकी

English

iho Tortoise* 8 right fore foot: listen while I mention tliei

अध्याय ५३

श्लोक 36

यानि किपुरुषाद्यानि वर्जयित्वा हिमाह्वयम् ।तेषां स्वबावतः सिद्धिः सुखप्राया ह्यत्नतः

yāni kipuruṣādyāni varjayitvā himāhvayam / teṣāṃ svabāvataḥ siddhiḥ sukhaprāyā hyatnataḥ

हिन्दी अर्थ

रुचि बोले--जो श्राद्धमें अधिष्ठाता देवताके रूपमें निवास करते हैं तथा

English

iho Tortoise* 8 right fore foot: listen while I mention tliei

अध्याय ५३

श्लोक 37

विपर्ययो न तेष्वस्ति जरामृत्युभयं न च ।धर्माधर्मौ न तेष्वास्तां नोत्तमाधममध्यमाः

viparyayo na teṣvasti jarāmṛtyubhayaṃ na ca / dharmādharmau na teṣvāstāṃ nottamādhamamadhyamāḥ

हिन्दी अर्थ

प्रणाम करता हूँ। भक्ति और मुक्तिकी अभिलाषा रखनेवाले महर्षिगण स्वर्गमें भी मानसिक श्राद्धोंके द्वारा भक्तिपूर्वक जिन्हें तृप्त करते हैं, सिद्धगण दिव्य

English

iho Tortoise* 8 right fore foot: listen while I mention tliei

अध्याय ५३

श्लोक 38

न वै चतुर्युगावस्था नार्तवा ऋतवो न च ।आग्नीध्रसूनोर्नाभेस्तु ऋषभो ऽभूत् सुतो द्विज

na vai caturyugāvasthā nārtavā ṛtavo na ca / āgnīdhrasūnornābhestu ṛṣabho 'bhūt suto dvija

हिन्दी अर्थ

उपहारोंद्वारा श्राद्धमें जिनको सन्तुष्ट करते हैं, आत्यन्तिक समृद्धिकी इच्छा रखनेवाले गुह्मक भी तन्‍्मय होकर भक्तिभावसे जिनकी पूजा करते हैं, भूलोकमें मनुष्यगण जिनकी सदा आराधना करते हैं, जो श्राद्धोंमें श्रद्धापूर्वक पूजित होनेपर मनोवाञ्छित लोक प्रदान करते हैं, पृथ्वीपर ब्राह्मणलोग अभिलषित

English

iho Tortoise* 8 right fore foot: listen while I mention tliei

अध्याय ५३

श्लोक 39

ऋषभाद्भरतो जज्ञे वीरः पुत्रशताद्वरः ।सो ऽभिषिच्यर्षभः पुत्रं महाप्रव्राज्यमास्थितः

ṛṣabhādbharato jajñe vīraḥ putraśatādvaraḥ / so 'bhiṣicyarṣabhaḥ putraṃ mahāpravrājyamāsthitaḥ

हिन्दी अर्थ

वस्तुकी प्राप्तिके लिये जिनकी अर्चना करते हैं तथा जो आराधना करनेपर प्राजापत्य लोक प्रदान करते हैं, उन पितरोंको मैं प्रणाम करता हूँ। तपस्या करनेसे जिनके पाप धुल गये हैं तथा जो संयमपूर्वक आहार करनेवाले हैं, ऐसे वनवासी महात्मा वनके फल-मूलोंद्वारा श्राद्ध करके जिन्हें तृप्त करते हैं, उन

English

iho Tortoise* 8 right fore foot: listen while I mention tliei

अध्याय ५३

श्लोक 40

तपस्तेपे महाभागः पुलहाश्रमसंश्रयः ।हिमाह्विं दक्षिणं वर्षं भरताय पिता ददौ

tapastepe mahābhāgaḥ pulahāśramasaṃśrayaḥ / himāhviṃ dakṣiṇaṃ varṣaṃ bharatāya pitā dadau

हिन्दी अर्थ

पितरोंको मैं मस्तक झुकाता हूँ। नैछ्ठिक ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करनेवाले संयतात्मा ब्राह्मण समाधिके द्वारा जिन्हें सदा तृप्त करते हैं, क्षत्रिय सब प्रकारके श्राद्धोपयोगी पदार्थोंके द्वारा विधिवत् श्राद्ध करके जिनको सन्तुष्ट करते हैं, जो तीनों लोकोंको अभीष्ट फल देनेवाले हैं, स्वकर्मपरायण वैश्य पुष्प, धूप, अन्न

English

iho Tortoise* 8 right fore foot: listen while I mention tliei

अध्याय ५३

श्लोक 41

तस्मात् तु भारतं वर्षं तस्य नान्मा महात्मनः ।भतस्याप्यभूत् पुत्रः सुमतिर्नाम धार्मिकः

tasmāt tu bhārataṃ varṣaṃ tasya nānmā mahātmanaḥ / bhatasyāpyabhūt putraḥ sumatirnāma dhārmikaḥ

हिन्दी अर्थ

और जल आदिके द्वारा जिनकी पूजा करते हैं तथा शाूद्र भी श्राद्धोंद्वारा भक्तिपूर्वक जिनकी तृप्ति करते हैं और जो संसारमें सुकालीके नामसे विख्यात हैं, उन पितरोंको मैं प्रणाम करता हूँ। पातालमें बड़े-बड़े हैत्य भी दम्भ और मद त्यागकर श्राद्धोंद्रार जिन स्वधाभोजी पितरोंको सदा तृप्त करते हैं,

English

iho Tortoise* 8 right fore foot: listen while I mention tliei

अध्याय ५३

श्लोक 42

तस्मिन् राज्यं समावेश्य भरतो ऽपि वनं ययौ ।एतेषां पुत्रपौत्रैस्तु सप्तद्वीपा वसुन्धरा

tasmin rājyaṃ samāveśya bharato 'pi vanaṃ yayau / eteṣāṃ putrapautraistu saptadvīpā vasundharā

हिन्दी अर्थ

मनोवाञ्छित भोगोंको पानेकी इच्छा रखनेवाले नागगण रसातलनमें सम्पूर्ण भोगों एवं श्राद्धोंस जिनकी पूजा करते हैं तथा मन्त्र, भोग और सम्पत्तियोंसे युक्त सर्पगण भी रसातलमें ही विधिपूर्वक श्राद्ध करके जिन्हें सर्वदा तृप्त करते हैं, उन पितरोंको मैं नमस्कार करता हूँ। जो साक्षात् देवलोकमें, अन्तरिक्षमें और

English

iho Tortoise* 8 right fore foot: listen while I mention tliei

अध्याय ५३

श्लोक 43

प्रियव्रतस्य पुत्रैस्तु भुक्त्वा स्वायम्भुवे ऽन्तरे ।एष स्वायम्भुवः सर्गः कथितस्ते द्विजोत्तम

priyavratasya putraistu bhuktvā svāyambhuve 'ntare / eṣa svāyambhuvaḥ sargaḥ kathitaste dvijottama

हिन्दी अर्थ

भूतलपर निवास करते हैं, देवता आदि समस्त देहधारी जिनकी पूजा करते हैं, उन पितरोंको मैं नमस्कार करता हूँ। वे पितर मेरे द्वारा अर्पित किये हुए इस जलको ग्रहण करें। जो परमात्मस्वरूप पितर मूर्तिमान् होकर विमानोंमें निवास करते हैं, जो समस्त क्लेशोंसे छुटकारा दिलानेमें हेतु हैं तथा योगीश्वरगण निर्मल

English

iho Tortoise* 8 right fore foot: listen while I mention tliei

अध्याय ५३

श्लोक 44

पूर्वमन्वन्तरे सम्यक् किमन्यत् कथयामि ते

pūrvamanvantare samyak kimanyat kathayāmi te

हिन्दी अर्थ

हृदयसे जिनका यजन करते हैं, उन पितरोंको मैं प्रणाम करता हूँ। जो स्वधाभोजी पितर दिव्यलोकमें मूर्तिमान् होकर रहते हैं, काम्यफलकी इच्छा रखनेवाले पुरुषकी समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेमें समर्थ हैं और निष्काम पुरुषोंको मोक्ष प्रदान करनेवाले हैं, उनको मैं प्रणाम करता हूँ। वे समस्त पितर

English

iho Tortoise* 8 right fore foot: listen while I mention tliei

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_mArkaNDeyapurANa1-93.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Markandeya Purana — Chapter 53
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

Digitised text taken from the archive linked below. It has not been collated against a printed edition by this site.

पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

Numbering follows the imported source and may differ from other editions.