Markandeya Purana· Mārkaṇḍeya Purāṇa
54
अध्याय 54 / 90

Adhyaya 54

32 श्लोकWhatsApp

पूर्ण अध्याय पाठ32 श्लोक

श्लोक पर जाएं:

अध्याय ५४

श्लोक 1

इति श्रीमार्कण्डेयपुराणेठमन्वन्तरकथनंऽ नाम त्रिपञ्चाशो ऽध्यायः चतुःपञ्चाशो ऽध्यायः- ५४ क्रौष्टुकिरुवाच कतिद्वीपाः समुद्रा वा पर्वता वा कति द्विज ।कियन्ति चैव वर्षाणि तेषां नद्यश्च का मुने

iti śrīmārkaṇḍeyapurāṇeṭhamanvantarakathanaṃ' nāma tripañcāśo 'dhyāyaḥ catuḥpañcāśo 'dhyāyaḥ- 54 krauṣṭukiruvāca katidvīpāḥ samudrā vā parvatā vā kati dvija / kiyanti caiva varṣāṇi teṣāṃ nadyaśca kā mune

हिन्दी अर्थ

इस जलसे तृप्त हों, जो चाहनेवाले पुरुषोंको इच्छानुसार भोग प्रदान करते हैं, देवत्व, इन्द्रत्व तथा उससे ऊँचे पदकी प्राप्ति कराते हैं; इतना ही नहीं, जो पुत्र, पशु, धन, बल और गृह भी देते हैं। जो पितर चन्द्रमाकी किरणोंमें सूर्यके मण्डलमें तथा श्वेत विमानोंमें सदा निवास करते हैं, वे मेरे दिये हुए अन्न, जल

English

Thig

अध्याय ५४

श्लोक 2

महाभूतप्रमाणञ्च लोकालोकन्तथैव च ।पर्यासं परिमाणञ्च गतिञ्चन्द्रार्कयोरपि

mahābhūtapramāṇañca lokālokantathaiva ca / paryāsaṃ parimāṇañca gatiñcandrārkayorapi

हिन्दी अर्थ

और गन्ध आदिसे तृप्त एवं पुष्ट हों। अग्निमें हविष्पका हवन करनेसे जिनको

English

miles west of llasalipatam. It was founded bj king Samati of the Sata- a ‘juias or Aiidhras, and was their first capital (Arch. Surv. of S. India } b Sewell, L 55; and Report on Amaravati, p and 4),

अध्याय ५४

श्लोक 3

एतत् प्रब्रूहि मे सर्वं विस्तरेण महामुने

etat prabrūhi me sarvaṃ vistareṇa mahāmune

हिन्दी अर्थ

तृप्ति होती है, जो ब्राह्मणोंके शरीरमें स्थित होकर भोजन करते हैं तथा पिण्डदान करनेसे जिन्हें प्रसन्नता प्राप्त होती है, वे पितर यहाँ मेरे दिये हुए अन्न और जलसे तृप्त हों। जो देवताओंसे भी पूजित हैं तथा सब प्रकारसे श्राद्धोपयोगी पदार्थ जिन्हें अत्यन्त प्रिय हैं, वे पितर यहाँ पधारें। मेरे निवेदन

English

II These seem to be the same as the Kiskindhakas; see puge 312 noto§.

अध्याय ५४

श्लोक 4

मार्कण्डेय उवाच शतार्धकोटिविस्तारा पृथिवी कृत्स्त्रशो द्विज ।तस्या हि स्थानमखिलं कथयामि शृणुष्व तत्

mārkaṇḍeya uvāca śatārdhakoṭivistārā pṛthivī kṛtstraśo dvija / tasyā hi sthānamakhilaṃ kathayāmi śṛṇuṣva tat

हिन्दी अर्थ

किये हुए पुष्प, गन्ध, अन्न एवं भोज्य पदार्थोके निकट उनकी उपस्थिति हो। जो प्रतिदिन पूजा ग्रहण करते हैं, प्रत्येक मासके अन्तमें जिनकी पूजा करनी उचित है, जो अष्टकाओंमें, वर्षके अन्तमें तथा अभ्युदयकालमें भी पूजनीय हैं, वे मेरे पितर वहाँ तृप्ति लाभ करें। जो ब्राह्मणोंके यहाँ कुमुद और चन्द्रमाके समान

English

dwell on the Vindhya mountains,! the Vidarbhas, § a,

अध्याय ५४

श्लोक 5

ये ते द्वीपा मया प्रोक्ता जम्बुद्वीपादयो द्विज ।पुष्करान्ता महाभाग ! शृण्वेषां विस्तरं पुनः

ye te dvīpā mayā proktā jambudvīpādayo dvija / puṣkarāntā mahābhāga ! śṛṇveṣāṃ vistaraṃ punaḥ

हिन्दी अर्थ

शान्ति धारण करके आते हैं, क्षत्रियोंक लिये जिनका वर्ण नवोदित सूर्यके समान है, जो वैश्योंके यहाँ सुवर्णके समान उज्ज्वल कान्ति धारण करते हैं तथा शूद्रोंके लिये जो श्याम वर्णके हो जाते हैं, वे समस्त पितर मेरे दिये हुए पुष्प, गन्ध, धूप, अन्न और जल आदिसे तथा अन्निहोत्रसे सदा तृप्ति लाभ करें। मैं उन सबको

English

Traipuras,§§ the Kaiskiridhyas,|||| and the Hairaa-kutag^'

अध्याय ५४

श्लोक 6

द्वीपात् तु द्विगुणो द्वीपो जम्बुः प्लक्षो ऽथ शाल्मलः ।कुशः क्रौञ्चस्तथा शाकः पुष्करद्वीप एव च

dvīpāt tu dviguṇo dvīpo jambuḥ plakṣo 'tha śālmalaḥ / kuśaḥ krauñcastathā śākaḥ puṣkaradvīpa eva ca

हिन्दी अर्थ

प्रणाम करता हूँ। जो वैश्वदेवपूर्वक समर्पित किये हुए श्राद्धको पूर्ण तृप्तिके लिये भोजन करते हैं और तृप्त हो जानेपर ऐश्वर्यकी सृष्टि करते हैं, वे पितर यहाँ तृप्त हों। मैं उन सबको नमस्कार करता हूँ। जो राक्षसों, भूतों तथा भयानक असुरोंका नाश करते हैं, प्रजाजनोंका अमड्नल दूर करते हैं, जो देवताओंके भी पूर्ववर्ती

English

Traipuras,§§ the Kaiskiridhyas,|||| and the Hairaa-kutag^'

अध्याय ५४

श्लोक 7

लवणेक्षु-सुरा-सर्पिर्दधि-दुग्धःजलाब्धिभिः ।द्विगुणैर्द्विगुणैर्वृद्ध्या सर्वतः परिवेष्टिताः

lavaṇekṣu-surā-sarpirdadhi-dugdhaḥjalābdhibhiḥ / dviguṇairdviguṇairvṛddhyā sarvataḥ pariveṣṭitāḥ

हिन्दी अर्थ

तथा देवराज इन्द्रके भी पूज्य हैं, वे यहाँ तृप्त हों। मैं उन्हें प्रणाम करता हूँ। अग्निष्वात्त पितृगण मेरी पूर्व दिशाकी रक्षा करें, बर्हिषद् पितृगण दक्षिण दिशाकी रक्षा करें। आज्यप नामवाले पितर पश्चिम दिशाकी तथा सोमप संज्ञक पितर उत्तर दिशाकी रक्षा करें। उन सबके स्वामी यमराज राक्षसों, भूतों,

English

Traipuras,§§ the Kaiskiridhyas,|||| and the Hairaa-kutag^'

अध्याय ५४

श्लोक 8

जम्बुद्वीपस्य संस्थानं प्रवक्ष्ये ऽहं निबोध मे ।लक्षमेकं योजनानां वृत्तौ विस्तारदैर्घ्यतः

jambudvīpasya saṃsthānaṃ pravakṣye 'haṃ nibodha me / lakṣamekaṃ yojanānāṃ vṛttau vistāradairghyataḥ

हिन्दी अर्थ

पिशाचों तथा असुरोंके दोषसे सब ओरसे मेरी रक्षा करें। विश्व, विश्वभुक्, आराध्य, धर्म, धन्य, शुभानन, भूतिद, भूतिकृत् और भूति--ये पितरोंके नौ गण हैं। कल्याण, कल्यताकर्ता, कल्य, कल्यतराश्रय, कल्यता-हेतु तथा अनद्य--ये पितरोंके छः गण माने गये हैं। वर, वरेण्य, वरद, पुष्टिद, तुष्टिद, विश्वपाता तथा

English

Traipuras,§§ the Kaiskiridhyas,|||| and the Hairaa-kutag^'

अध्याय ५४

श्लोक 9

हिमवान् हेमकूटश्च ऋषभो मेरुरेव च ।नीलः श्वेतस्तथा शृङ्गी सप्तास्मिन् वर्षपर्वताः

himavān hemakūṭaśca ṛṣabho merureva ca / nīlaḥ śvetastathā śṛṅgī saptāsmin varṣaparvatāḥ

हिन्दी अर्थ

धाता-ये पितरोंके सात गण हैं। महान, महात्मा, महित, महिमावान् और महाबल--ये पितरोंके पापनाशक पाँच गण हैं। सुखद, धनद, धर्मद और भूतिद -ये पितरोंके चार गण कहे जाते हैं। इस प्रकार कुल इकतीस पितृगण हैं, जिन्होंने सम्पूर्ण जगत्को व्याप्त कर रखा है। वे सब पूर्ण तृप्त होकर मुझपर

English

miles west of llasalipatam. It was founded bj king Samati of the Sata- a ‘juias or Aiidhras, and was their first capital (Arch. Surv. of S. India } b Sewell, L 55; and Report on Amaravati, p and 4),

अध्याय ५४

श्लोक 10

द्वौ लक्षयोजनायामौ मध्ये तत्र महाचलौ ।तयोर्दक्षिणतो यौ तु यौ तथोत्तरतो गिरी

dvau lakṣayojanāyāmau madhye tatra mahācalau / tayordakṣiṇato yau tu yau tathottarato girī

हिन्दी अर्थ

सन्तुष्ट हों और सदा मेरा हित करें।

English

Traipuras,§§ the Kaiskiridhyas,|||| and the Hairaa-kutag^'

अध्याय ५४

श्लोक 11

दशभिर्दशभिर्न्यूनैः सहस्रैस्तैः परस्परम् ।द्विसाहस्त्रोच्छ्रयाः सर्वे तावद्विस्तारिणश्च ते

daśabhirdaśabhirnyūnaiḥ sahasraistaiḥ parasparam / dvisāhastrocchrayāḥ sarve tāvadvistāriṇaśca te

हिन्दी अर्थ

मार्कण्डेयजी कहते हैं--मुने! इस प्रकार स्तुति करते हुए रुचिके समक्ष सहसा एक बहुत ऊँचा तेज:पुज्ज प्रकट हुआ, जो सम्पूर्ण आकाशमें व्याप्त था। समस्त संसारको व्याप्त करके स्थित हुए उस महान् तेजको देखकर रुचिने पृथ्वीपर घुटने टेक दिये और इस स्तोत्रका गान किया--

English

II These seem to be the same as the Kiskindhakas; see puge 312 noto§.

अध्याय ५४

श्लोक 12

समुद्रान्तः प्रविष्टाश्च षडस्मिन् वर्षपर्वताः ।दक्षिणोत्तरतो निम्ना मध्ये तुङ्गायता क्षितिः

samudrāntaḥ praviṣṭāśca ṣaḍasmin varṣaparvatāḥ / dakṣiṇottarato nimnā madhye tuṅgāyatā kṣitiḥ

हिन्दी अर्थ

इन्द्रादीनां च नेतारो दक्षमारीचयोस्तथा । सप्तर्षीणां तथान्येषां तान् नमस्यामि कामदान् ।।

English

Traipuras,§§ the Kaiskiridhyas,|||| and the Hairaa-kutag^'

अध्याय ५४

श्लोक 13

वेद्यर्धे दक्षिमे त्रीणि त्रीणि वर्षाणि चोत्तरे ।इलावृतं तयोर्मध्ये चन्द्रार्धाकारवत् स्थितम्

vedyardhe dakṣime trīṇi trīṇi varṣāṇi cottare / ilāvṛtaṃ tayormadhye candrārdhākāravat sthitam

हिन्दी अर्थ

तान् नमस्याम्यहं सर्वान् पितृनप्सूदधावपि ।।

English

Traipuras,§§ the Kaiskiridhyas,|||| and the Hairaa-kutag^'

अध्याय ५४

श्लोक 14

ततः पूर्वेण भद्राश्वं केतुमालञ्च पश्चिमे ।इलावृतस्य मध्ये तु मेरुः कनकपर्वतः

tataḥ pūrveṇa bhadrāśvaṃ ketumālañca paścime / ilāvṛtasya madhye tu meruḥ kanakaparvataḥ

हिन्दी अर्थ

देवर्षीणां जनितृश्चव॒ सर्वलोकनमस्कृतान् ।

English

Traipuras,§§ the Kaiskiridhyas,|||| and the Hairaa-kutag^'

अध्याय ५४

श्लोक 15

चतुरशीतिसाहस्त्रस्तस्योच्छ्रायो महागिरेः ।प्रविष्टः षोडशाधस्ताद्विस्तीर्णः षोडशैव तु

caturaśītisāhastrastasyocchrāyo mahāgireḥ / praviṣṭaḥ ṣoḍaśādhastādvistīrṇaḥ ṣoḍaśaiva tu

हिन्दी अर्थ

नमो गणेभ्य: सप्तभ्यस्तथा लोकेषु सप्तसु ।

English

Traipuras,§§ the Kaiskiridhyas,|||| and the Hairaa-kutag^'

अध्याय ५४

श्लोक 16

शरावसंस्थितत्वाच्च द्वात्रिंशन्मूर्ध्नि विस्तृतः ।शुक्लः पीतो ऽसितो रक्तः प्राच्यादिषु यथाक्रमम्

śarāvasaṃsthitatvācca dvātriṃśanmūrdhni vistṛtaḥ / śuklaḥ pīto 'sito raktaḥ prācyādiṣu yathākramam

हिन्दी अर्थ

स्वयम्भुवे नमस्यामि ब्रह्मणे योगचक्षुषे ।।

English

Traipuras,§§ the Kaiskiridhyas,|||| and the Hairaa-kutag^'

अध्याय ५४

श्लोक 17

विप्रो वैश्यस्तथा शूद्रः क्षत्रियश्च स्ववर्णतः ।तस्योपरि तथैवाष्टौ पुर्यो दिक्षु यथाक्रमम्

vipro vaiśyastathā śūdraḥ kṣatriyaśca svavarṇataḥ / tasyopari tathaivāṣṭau puryo dikṣu yathākramam

हिन्दी अर्थ

जगत्स्वरूपिणश्रैव तथा ब्रह्मस्वरूपिण: ।

English

dwell on the Vindhya mountains,! the Vidarbhas, § a,

अध्याय ५४

श्लोक 18

इन्द्रादिलोकपालानां तन्मध्ये ब्रह्मणः सभा ।योजनानां सहस्राणि चतुर्दश समुच्छ्रिता

indrādilokapālānāṃ tanmadhye brahmaṇaḥ sabhā / yojanānāṃ sahasrāṇi caturdaśa samucchritā

हिन्दी अर्थ

रुचि बोले--जो सबके द्वारा पूजित, अमूर्त, अत्यन्त तेजस्वी, ध्यानी तथा दिव्यदृष्टिसम्पन्न हैं, उन पितरोंको मैं सदा नमस्कार करता हूँ। जो इन्द्र आदि

English

Traipuras,§§ the Kaiskiridhyas,|||| and the Hairaa-kutag^'

अध्याय ५४

श्लोक 19

अयुतोच्छ्रायास्तस्याधस्तथा विषकम्भवर्वताः ।प्राच्यादिषु क्रमेणैव मन्दरो गन्धमादनः

ayutocchrāyāstasyādhastathā viṣakambhavarvatāḥ / prācyādiṣu krameṇaiva mandaro gandhamādanaḥ

हिन्दी अर्थ

करनेवाले उन पितरोंको मैं प्रणाम करता हूँ। जो मनु आदि राजर्षियों, मुनीश्वरों तथा सूर्य और चन्द्रमाके भी नायक हैं, उन समस्त पितरोंको मैं जल और समुद्रमें भी नमस्कार करता हूँ। नक्षत्रों, ग्रहों, वायु, अग्नि, आकाश और द्युलोक तथा पृथ्वीके भी जो नेता हैं, उन पितरोंको मैं हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ।

English

Traipuras,§§ the Kaiskiridhyas,|||| and the Hairaa-kutag^'

अध्याय ५४

श्लोक 20

विपुलश्च सुपार्श्वश्च केतुपादपशोभिताः ।कदम्बो मन्दरे केतुर्जम्बुव गन्धमादने

vipulaśca supārśvaśca ketupādapaśobhitāḥ / kadambo mandare keturjambuva gandhamādane

हिन्दी अर्थ

जो देवर्षियोंके जन्मदाता, समस्त लोकोंद्वारा वन्दित तथा सदा अक्षय फलके दाता हैं, उन पितरोंको मैं हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ। प्रजापति, कश्यप, सोम, वरुण तथा योगेश्वरोंके रूपमें स्थित पितरोंको सदा हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ। सातों लोकोंमें स्थित सात पितृगणोंको नमस्कार है। मैं योगदृष्टिसम्पन्न

English

Traipuras,§§ the Kaiskiridhyas,|||| and the Hairaa-kutag^'

अध्याय ५४

श्लोक 21

विपुले च तथाश्वत्थः सुपार्श्वे च वटो महान् ।एकादशशतायामा योजनानामिमे नगाः

vipule ca tathāśvatthaḥ supārśve ca vaṭo mahān / ekādaśaśatāyāmā yojanānāmime nagāḥ

हिन्दी अर्थ

स्वयम्भू ब्रह्माजीको प्रणाम करता हूँ। चन्द्रमाके आधारपर प्रतिष्ठित तथा योगमूर्तिधारी पितृगणोंको मैं प्रणाम करता हूँ। साथ ही सम्पूर्ण जगत्के पिता सोमको नमस्कार करता हूँ तथा अग्निस्वरूप अन्य पितरोंको भी प्रणाम करता हूँ; क्योंकि यह सम्पूर्ण जगत् अग्नि और सोममय है। जो पितर तेजमें स्थित हैं,

English

Traipuras,§§ the Kaiskiridhyas,|||| and the Hairaa-kutag^'

अध्याय ५४

श्लोक 22

जठरो देवकूटश्च पूर्वस्यां दिशि पर्वतौ ।आनीलनिषधौ प्राप्तौ परस्परनिरन्तरौ

jaṭharo devakūṭaśca pūrvasyāṃ diśi parvatau / ānīlaniṣadhau prāptau parasparanirantarau

हिन्दी अर्थ

जो ये चन्द्रमा, सूर्य और अग्निके रूपमें दृष्टिगोचर होते हैं तथा जो जगत्स्वरूप एवं ब्रह्मस्वरूप हैं, उन सम्पूर्ण योगी पितरोंको मैं एकाग्रचित्त होकर प्रणाम करता हूँ। उन्हें बारंबार नमस्कार है। वे स्वधाभोजी पितर मुझपर प्रसन्न हों।

English

Traipuras,§§ the Kaiskiridhyas,|||| and the Hairaa-kutag^'

अध्याय ५४

श्लोक 23

निषधः पारियात्रश्च मेरोः पार्श्वे तु पश्चिमे ।यथा पूर्वौ तथा चैतावानीलनिषधायतौ

niṣadhaḥ pāriyātraśca meroḥ pārśve tu paścime / yathā pūrvau tathā caitāvānīlaniṣadhāyatau

हिन्दी अर्थ

मार्कण्डेयजी कहते हैं--मुनिश्रेष्ठ! रुचिके इस प्रकार स्तुति करनेपर वे पितर दसों दिशाओंको प्रकाशित करते हुए उस तेजसे बाहर निकले। रुचिने जो फूल, चन्दन और अड़राग आदि समर्पित किये थे, उन सबसे विभूषित होकर वे पितर सामने खड़े दिखायी दिये। तब रुचिने हाथ जोड़कर पुनः भक्तिपूर्वक उन्हें

English

Traipuras,§§ the Kaiskiridhyas,|||| and the Hairaa-kutag^'

अध्याय ५४

श्लोक 24

कैलासो हिमवांश्चैव दक्षिणेन महाचलौ ।पूर्वपश्चायतावेतावर्णवान्तर्व्यवस्थितौ

kailāso himavāṃścaiva dakṣiṇena mahācalau / pūrvapaścāyatāvetāvarṇavāntarvyavasthitau

हिन्दी अर्थ

प्रणाम किया और बड़े आदरके साथ सबसे पृथक्-पृथक् कहा--“आपको नमस्कार है, आपको नमस्कार है।” इससे प्रसन्न होकर पितरोंने मुनिश्रेष्ठ रुचिसे

English

Traipuras,§§ the Kaiskiridhyas,|||| and the Hairaa-kutag^'

अध्याय ५४

श्लोक 25

शृङ्गवान् जारुधिश्चैव तथैवोत्तरपर्वतौ ।यतैव दक्षिणे तद्वदर्णप्वान्तर्व्यवस्थितौ

śṛṅgavān jārudhiścaiva tathaivottaraparvatau / yataiva dakṣiṇe tadvadarṇapvāntarvyavasthitau

हिन्दी अर्थ

कहा--“वत्स! तुम कोई वर माँगो।' तब उन्होंने मस्तक झुकाकर कहा --'पितरो! इस समय ब्रह्माजीने मुझे सृष्टि करनेका आदेश दिया है; इसलिये मैं दिव्य गुणोंसे सम्पन्न उत्तम पत्नी चाहता हूँ, जिससे सन्‍्तानकी उत्पत्ति हो सके।'

English

Traipuras,§§ the Kaiskiridhyas,|||| and the Hairaa-kutag^'

अध्याय ५४

श्लोक 26

मर्यादापर्वता ह्येते कथ्यन्ते ऽष्टौ द्विजोत्तम ।हिमवद्धेमकूटादिपर्वतानां परस्परम्

maryādāparvatā hyete kathyante 'ṣṭau dvijottama / himavaddhemakūṭādiparvatānāṃ parasparam

हिन्दी अर्थ

पितरोंने कहा--वत्स! यहीं, इसी समय तुम्हें अत्यन्त मनोहर पत्नी प्राप्त होगी और उसके गर्भसे तुम्हें 'मनु” संज्ञक उत्तम पुत्रकी प्राप्ति होगी। वह बुद्धिमान् पुत्र मन्वन्तरका स्वामी होगा और तुम्हारे ही नामपर तीनों लोकोंमें 'रौच्य” के नामसे उसकी ख्याति होगी। उसके भी महाबलवान् और पराक्रमी

English

Traipuras,§§ the Kaiskiridhyas,|||| and the Hairaa-kutag^'

अध्याय ५४

श्लोक 27

नवयोजनसाहस्त्रं प्रागुदग्दक्षिणोत्तरम् ।मेरोरिलावृते तद्वदन्तरे वै चतुर्दिशम्

navayojanasāhastraṃ prāgudagdakṣiṇottaram / merorilāvṛte tadvadantare vai caturdiśam

हिन्दी अर्थ

बहुत-से महात्मा पुत्र होंगे, जो इस पृथ्वीका पालन करेंगे। धर्मज्ञ! तुम भी प्रजापति होकर चार प्रकारकी प्रजा उत्पन्न करोगे और फिर अपना अधिकार क्षीण होनेपर सिद्धिको प्राप्त होओगे। जो मनुष्य इस स्तोत्रसे भक्तिपूर्वक हमारी स्तुति करेगा, उसके ऊपर सन्तुष्ट होकर हमलोग उसे मनोवाञ्छित भोग तथा

English

Traipuras,§§ the Kaiskiridhyas,|||| and the Hairaa-kutag^'

अध्याय ५४

श्लोक 28

फलानि यानि वै जम्ब्वाः गन्धमादनपर्वते ।गजदेहप्रमाणानि पतन्ति गिरिमूर्धनि

phalāni yāni vai jambvāḥ gandhamādanaparvate / gajadehapramāṇāni patanti girimūrdhani

हिन्दी अर्थ

उत्तम आत्मज्ञान प्रदान करेंगे। जो नीरोग शरीर, धन और पुत्र-पौत्र आदिकी इच्छा करता हो, वह सदा इस स्तोत्रसे हमलोगोंकी स्तुति करे। यह स्तोत्र हमलोगोंकी प्रसन्नता बढ़ानेवाला है। जो श्राद्धमें भोजन करनेवाले श्रेष्ठ

English

Traipuras,§§ the Kaiskiridhyas,|||| and the Hairaa-kutag^'

अध्याय ५४

श्लोक 29

तेषां स्त्रावात् प्रभवति ख्याता जम्बूनदीति वै ।यत्र जाम्बूनदं नाम कनकं सम्प्रजायते

teṣāṃ strāvāt prabhavati khyātā jambūnadīti vai / yatra jāmbūnadaṃ nāma kanakaṃ samprajāyate

हिन्दी अर्थ

ब्राह्मणोंके सामने खड़ा हो भक्तिपूर्वक इस स्तोत्रका पाठ करेगा, उसके यहाँ स्तोत्रश्रवणके प्रेमसे हम निश्चय ही उपस्थित होंगे और हमारे लिये किया हुआ श्राद्ध भी निःसन्देह अक्षय होगा। चाहे श्रोत्रिय ब्राह्मणसे रहित श्राद्ध हो, चाहे वह किसी दोषसे दूषित हो गया हो अथवा अन्यायोपार्जित धनसे किया गया हो

English

Traipuras,§§ the Kaiskiridhyas,|||| and the Hairaa-kutag^'

अध्याय ५४

श्लोक 30

सा परिक्रम्य वै मेरुं जम्बूमूलं पुनर्नदी ।विशति द्विजशार्दूल ! पीयमाना जनैश्च तैः

sā parikramya vai meruṃ jambūmūlaṃ punarnadī / viśati dvijaśārdūla ! pīyamānā janaiśca taiḥ

हिन्दी अर्थ

अथवा श्राद्धके लिये अयोग्य दूषित सामग्रियोंसे उसका अनुष्ठान हुआ हो, अनुचित समय या अयोग्य देशमें हुआ हो या उसमें विधिका उल्लड्घन किया गया हो अथवा लोगोंने बिना श्रद्धाके या दिखावेके लिये किया हो तो भी वह श्राद्ध इस स्तोत्रके पाठसे हमारी तृप्ति करनेमें समर्थ होता है। हमें सुख देनेवाला

English

Traipuras,§§ the Kaiskiridhyas,|||| and the Hairaa-kutag^'

अध्याय ५४

श्लोक 31

भद्राश्वे ऽश्वशिरा विष्णुर्भारते कूर्मसंस्थितिः ।वराहः केतुमाले च मत्स्यरूपस्तथोत्तरे

bhadrāśve 'śvaśirā viṣṇurbhārate kūrmasaṃsthitiḥ / varāhaḥ ketumāle ca matsyarūpastathottare

हिन्दी अर्थ

यह स्तोत्र जहाँ श्राद्धमें पढ़ा जाता है, वहाँ हमलोगोंको बारह वर्षोतक बनी रहनेवाली तृप्ति प्राप्त होती है। यह स्तोत्र हेमन्त-ऋतुमें श्राद्धुकंं अवसरपर सुनानेसे हमें बारह वर्षोंके लिये तृप्ति प्रदान करता है। इसी प्रकार शिशिर-ऋतुमें यह कल्याणमय स्तोत्र हमें चौबीस वर्षोतक तृप्तिकारक होता है। वसनन्‍्त-ऋतुके

English

Traipuras,§§ the Kaiskiridhyas,|||| and the Hairaa-kutag^'

अध्याय ५४

श्लोक 32

तेषु नक्षत्रविन्यासाद्विषयाः समवस्थिताः ।चतुर्ष्वपि द्विजश्रेष्ठ ! ग्रहाभिभवपाठकाः

teṣu nakṣatravinyāsādviṣayāḥ samavasthitāḥ / caturṣvapi dvijaśreṣṭha ! grahābhibhavapāṭhakāḥ

हिन्दी अर्थ

श्राद्धमें सुनानेपर यह सोलह वर्षोतक तृप्तिकारक होता है तथा ग्रीष्म-ऋतुमें पढ़े जानेपर भी यह उतने ही वर्षोतक तृप्तिका साधक होता है। रुचे! वर्षा- ऋतुमें किया हुआ श्राद्ध यदि किसी अड़से विकल हो तो भी इस स्तोत्रके पाठसे पूर्ण होता है और उस श्राद्धसे हमें अक्षय तृप्ति होती है। शरत्कालमें भी श्राद्धके

English

Traipuras,§§ the Kaiskiridhyas,|||| and the Hairaa-kutag^'

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_mArkaNDeyapurANa1-93.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Markandeya Purana — Chapter 54
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

Digitised text taken from the archive linked below. It has not been collated against a printed edition by this site.

पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

Numbering follows the imported source and may differ from other editions.