Markandeya Purana· Mārkaṇḍeya Purāṇa
56
अध्याय 56 / 90

Adhyaya 56

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अध्याय ५६

श्लोक 1

इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे भुवनकोशे पञ्चपञ्चाशो ऽध्यायः षट्पञ्चाशो ऽध्यायः- ५६ मार्कण्डेय उवाच धराधरां जगद्योनेः पदं नारायणस्य च ।ततः प्रवृत्ता या देवी गङ्गा त्रिपथगामिनी

iti śrīmārkaṇḍeyapurāṇe bhuvanakośe pañcapañcāśo 'dhyāyaḥ ṣaṭpañcāśo 'dhyāyaḥ- 56 mārkaṇḍeya uvāca dharādharāṃ jagadyoneḥ padaṃ nārāyaṇasya ca / tataḥ pravṛttā yā devī gaṅgā tripathagāminī

हिन्दी अर्थ

करता है। तुम्हीं समस्त देवताओंके प्राण हो। तुममें हवन किया हुआ हविष्य अत्यन्त पवित्र होता है, फिर वही मेघ बनकर जलरूपमें परिणत हो जाता है। फिर उस जलसे सब प्रकारके अन्न आदि उत्पन्न होते हैं। अनिलसारथे! फिर उन समस्त अन्न आदिसे सब जीव सुखपूर्वक जीवन धारण करते हैं। अग्निदेव! तुम्हारे द्वारा उत्पन्न की हुई ओषधियोंसे मनुष्य

English

( 101, 1018), but tho references to the earliest movements of the Haihayas are lianlly consistent. Jfahish-mat, who was fourth in descent from Hal- 1, is said to have founded tho city Mahish-mati on the Narmada (see page:U|note +; and i(?., xxxiii. 1840-7), and his son Bhadra-i^rcnya is said tq li.ivo rcii^ried in Ka^i or Benares, which the Vitahavya braftch of tho Hai- liieiis li:i(l previously conquered fioni its king Harya^va, but Ilaryasva’s pr.iiid'^mi Divodtlsa defeated them and regained his capital (M.-Hh., Anusas.- U)UM)2; Ilari-V., xxix. 1641-6; and xxxii 1730-40). Tho great kinir Ariana Kartavirya, who was ninth in descent (Hari-V., xxxiii 1860-90 • nul Maisui P, xHii. 13-45), reigned in Anupa and on the Narmada and had tlip?rpat conHict with Rama Jamadagnya, which ended in the overthrow of tiio llaihayas (M.-Bh,, Vana-P., cxvi. 10189— cxvii. 10204; and S'anti-P., 1750 - 70; and pages 338 note and 344 note *). The Haihayas and l’'*lajaafrhaa in alliance with S'akas, Yavanas, Kdmbojas and Pahlavas are 'f'l have driven Bahii king of Ayodhya out of his realm, but his son drove Llieni out and recovered the kingdom (Vana-P,, cvi. 8831-2 •

अध्याय ५६

श्लोक 2

सा प्रविश्य सुधायोनिं सोममाधारमम्भसाम् ।ततः सम्बध्यमानार्करश्मिसङ्गतिपावनी

sā praviśya sudhāyoniṃ somamādhāramambhasām / tataḥ sambadhyamānārkaraśmisaṅgatipāvanī

हिन्दी अर्थ

यज्ञ करते हैं। यज्ञोंसे देवता, हैत्य तथा राक्षस तृप्त होते हैं। हुताशन! उन यज्ञोंके आधार तुम्हीं हो, अतः अग्ने! तुम्हीं सबके आदिकारण और सर्वस्वरूप हो। देवता, दानव, यक्ष, हैत्य, गन्धर्व, राक्षस, मनुष्य, पशु, वृक्ष, मृग, पक्षी तथा सर्प--ये सभी तुमसे ही तृप्त होते और तुम्हींसे वृद्धिको प्राप्त होते हैं। तुम्हींसे इनकी उत्पत्ति है और तुम्हींमें इनका लय होता

English

yho inhabited the Yamuna hills. The Pandavas in returning from 'isit beyond the Himalayas camovto the Yimuna hills, and then to

अध्याय ५६

श्लोक 3

पपात मेरुपृष्ठे च सा चतुर्धा ततो ययौ ।मेरुकूटतटान्तेभ्यो निपतन्ती ववर्तिता

papāta merupṛṣṭhe ca sā caturdhā tato yayau / merukūṭataṭāntebhyo nipatantī vavartitā

हिन्दी अर्थ

है। देव! तुम्हीं जलकी सृष्टि करते और तुम्हीं उसको पुनः सोख लेते हो। तुम्हारे पकानेसे ही जल प्राणियोंकी पुष्टि करता है। तुम देवताओंमें तेज, सिद्धोंमें कान्ति, नागोंमें विष और पक्षियोंमें वायुरूपसे स्थित हो। मनुष्योंमें क्रोध, पक्षी और मृग आदिमें मोह, वृक्षोंमें स्थिरता, पृथ्वीमें कठोरता, जलमें द्रवत्व तथा वायुमें जलरूपसे तुम्हारी स्थिति है। अग्ने! व्यापक

English

And next is the outer foot.* The Kambojas,t and pj] lava^, X and the Badava-mukhas, § and the Sindhus || andSai

अध्याय ५६

श्लोक 4

विकीर्यमाणसलिला निरालम्बा पपात सा ।मन्दराद्येषु पादेषु प्रविभक्तोदका समम्

vikīryamāṇasalilā nirālambā papāta sā / mandarādyeṣu pādeṣu pravibhaktodakā samam

हिन्दी अर्थ

होनेके कारण तुम आकाशमें आत्मारूपसे स्थित हो। अग्निदेव! तुम सम्पूर्ण भूतोंके अन्तःकरणमें विचरते तथा सबका पालन करते हो। विद्वान् पुरुष तुमको एक कहते हैं, तथा फिर वे ही तुम्हें तीन प्रकारका बतलाते हैं। तुम्हें आठ रूपोंमें कल्पित करके ऋषियोंने आदियज्ञका अनुष्ठान किया था। महर्षिगण इस विश्वको तुम्हारी सृष्टि बतलाते हैं। हुताशन!

English

viras, % the Anartas, ***the Yanita-mukhas, ft the Dravanas ^

अध्याय ५६

श्लोक 5

चतुर्ष्वपि पपाताम्बुविभिन्नाङ्घ्रिशिलोच्चया ।पूर्वा सीते ऽति विख्याता ययौ चैत्ररथं वनम्

caturṣvapi papātāmbuvibhinnāṅghriśiloccayā / pūrvā sīte 'ti vikhyātā yayau caitrarathaṃ vanam

हिन्दी अर्थ

तुम्हारे बिना यह सम्पूर्ण जगत् तत्काल नष्ट हो जायगा। ब्राह्मण हव्य-कव्य आदिके द्वारा 'स्वाहा'और 'स्वधा”का उच्चारण करते हुए तुम्हारी पूजा करके अपने कर्मोके अनुसार विहित उत्तम गतिको प्राप्त होते हैं। देवपूजित अग्निदेव! प्राणियोंके परिणाम, आत्मा और वीर्यस्वरूप तुम्हारी ज्वालाएँ तुमसे ही निकलकर सब भूतोंका दाह करती हैं। परम

English

„„,1 the KuiijataMahas, » the Stri-vahyas, f and the Ra- likas,I and the Nri.siriihas§ who dwell on the Venn-

अध्याय ५६

श्लोक 6

तत् प्लावयित्वा च ययौ वरुणोदं सरोवनम् ।शीतान्तञ्च गिरिं तस्मात्ततश्चान्यान् गिरीन् क्रमात्

tat plāvayitvā ca yayau varuṇodaṃ sarovanam / śītāntañca giriṃ tasmāttataścānyān girīn kramāt

हिन्दी अर्थ

कान्तिमान् अग्निदेव! संसारकी यह सृष्टि तुमने ही की है। तुम्हारा ही यज्ञरूप वैदिक कर्म सर्वभूतमय जगत है। पीले नेत्रोंवाले अग्निदेव! तुम्हें नमस्कार है। हुताशन! तुम्हें नमस्कार है। पावक! आज तुम्हें नमस्कार है। हव्यवाहन! तुम्हें नमस्कार है। तुम ही खाये-पीये हुए पदार्थोंकोी पचानेके कारण विश्वके पालक हो। तुम्हीं खेतीको पकानेवाले और जगत्के

English

yho inhabited the Yamuna hills. The Pandavas in returning from 'isit beyond the Himalayas camovto the Yimuna hills, and then to

अध्याय ५६

श्लोक 7

गत्वा भुवं समासाद्य भद्राश्वाज्जलधिं गता ।तथैवालकनन्दाख्या दक्षिणे गन्धमादने

gatvā bhuvaṃ samāsādya bhadrāśvājjaladhiṃ gatā / tathaivālakanandākhyā dakṣiṇe gandhamādane

हिन्दी अर्थ

पोषक हो। तुम्हीं मेघ हो, तुम्हीं वायु हो और तुम्हीं समस्त प्राणियोंका पोषण करनेके लिये खेतीके हेतुभूत बीज हो। भूत, भविष्य और वर्तमान--सब तुम्हीं हो। तुम्हीं सब जीवोंके भीतर प्रकाश हो। तुम्हीं सूर्य और तुम्हीं अग्नि हो। अग्ने! दिन-रात तथा दोनों सन्ध्याएँ तुम्हीं

English

the Gnra.sva.-aa,§ the Phalg,,.,ak«.s || and the people who

अध्याय ५६

श्लोक 8

मेरुपादवनं गत्वा नन्दनं देवनन्दनम् ।मानसञ्च महावेगात् प्लापयित्वा सरोवरम्

merupādavanaṃ gatvā nandanaṃ devanandanam / mānasañca mahāvegāt plāpayitvā sarovaram

हिन्दी अर्थ

हो। सुवर्ण तुम्हारा वीर्य है। तुम सुवर्णकी उत्पत्तिके कारण हो। तुम्हारे गर्भमें सुवर्णकी स्थिति है। सुवर्णके समान तुम्हारी कान्ति है। मुहूर्त, क्षण, त्रुटि और लव--सब तुम्हीं हो। जगत्प्रभो! कला, काष्ठा और निमेष आदि तुम्हारे ही रूप हैं। यह सम्पूर्ण दृश्य तुम्हीं हो। परिवर्तनशील काल भी तुम्हारा ही स्वरूप है। प्रभो! तुम्हारी जो काली नामकी जिद्ला है,

English

the S'^ntlkas, ^ Viprai^astakas, f the Kokanka^ap, J daka8,§ the Vamana8,|| and tlie Avaras,!" the T^rakshuras

अध्याय ५६

श्लोक 9

आसाद्य शैलराजानं रम्यं हि शिखरन्तथा ।तस्माच्च पर्वतान् सर्वान् दक्षिणोपक्रमोदितान्

āsādya śailarājānaṃ ramyaṃ hi śikharantathā / tasmācca parvatān sarvān dakṣiṇopakramoditān

हिन्दी अर्थ

वह कालको आश्रय देनेवाली है। उसके द्वारा तुम पापोंके भयसे हमें बचाओ तथा इस लोकके महान् भयसे हमारी रक्षा करो। तुम्हारी जो कराली नामकी जिह्ठा है, वह महाप्रलयकी कारणरूपा है। उसके द्वारा हमें पापों तथा इहलोकके महान् भयसे बचाओ। तुम्हारी जो मनोजवा नामकी जिह्ला है, वह लघिमा नामक गुणस्वरूपा है। उसके द्वारा तुम

English

grivas, § and the C'ulikas, || and the Asva-kesas, ^ tlon^ peoples are situated in the Tortoise’s tail.

अध्याय ५६

श्लोक 10

तान् प्लावयित्वा संप्राप्ता हिमवन्तं महागिरिम् ।दधार तत्र तां शम्भुर्न मुमोच वृषध्वजः

tān plāvayitvā saṃprāptā himavantaṃ mahāgirim / dadhāra tatra tāṃ śambhurna mumoca vṛṣadhvajaḥ

हिन्दी अर्थ

पापों तथा इस लोकके महान् भयसे हमारी रक्षा करो। तुम्हारी जो सुलोहिता नामकी जिद्ठा है, वह सम्पूर्ण भूतोंकी कामनाएँ पूर्ण करती है। उसके द्वारा तुम पापों तथा इस लोकके महान् भयसे हमारी रक्षा करो। तुम्हारी जो सुधूम्रवर्णा नामकी जिह्ना है, वह प्राणियोंके रोगोंका दाह करनेवाली है। उसके द्वारा तुम पापों तथा इस लोकके महान् भयसे हमारी

English

And so situated also are the three constellations Aindra ♦♦ Mula, and Purva Ashadlia.

अध्याय ५६

श्लोक 11

भघीरथेनोपवासैः स्तुत्या चाराधितो विभुः ।तत्र मुक्ता च शर्वेण सप्तधा दक्षिणोदधिम्

bhaghīrathenopavāsaiḥ stutyā cārādhito vibhuḥ / tatra muktā ca śarveṇa saptadhā dakṣiṇodadhim

हिन्दी अर्थ

रक्षा करो। तुम्हारी जो स्फुलिड्रिनी नामक जिह्ला है जिससे सम्पूर्ण जीवोंके शरीर उत्पन्न हुए हैं, उसके द्वारा तुम पापों तथा इस लोकके महान् भयसे हमारी रक्षा करो। तुम्हारी जो विश्वा नामकी जिह्नला है, वह समस्त प्राणियोंका कल्याण करनेवाली है। उसके द्वारा तुम पापों तथा इस लोकके महान् भयसे हमारी रक्षा करो। हुताशन! तुम्हारे नेत्र पीले, ग्रीवा

English

nmtill, and the other joeoide who dwell in Valava% and the I)l,anna-baddhas,*» the Alukas,t+ the people who occupy

अध्याय ५६

श्लोक 12

प्रविवेश त्रिधा प्राच्यां प्लावयन्ती महानदी ।भगीरथरथस्यानु स्त्रोतसैकेन दक्षिणाम्

praviveśa tridhā prācyāṃ plāvayantī mahānadī / bhagīratharathasyānu strotasaikena dakṣiṇām

हिन्दी अर्थ

लाल और रंग साँवला है। तुम सब दोषोंसे हमारी रक्षा करो और संसारसे हमारा उद्धार कर दो। वह्नि, सप्तार्चि, कृशानु, हव्यवाहन, अग्नि, पावक, शुक्र तथा हुताशन--इन आठ नामोंसे पुकारे जानेवाले अग्निदेव! तुम प्रसन्न हो जाओ। तुम अक्षय, अचिन्त्य समृद्धिमान्, दुःसह एवं अत्यन्त तीव्र वह्नि हो। तुम मूर्तरूपमें प्रकट होकर अविनाशी कहे जानेवाले

English

Where also A'sliadlia and SViivnna and Dhanishtha are

अध्याय ५६

श्लोक 14

तथैव पश्चिमे पादे विपुले सा महानदी ।सुचक्षुरिति विख्याता वैभ्राजं साचलं ययौ ।५६।१३।शीतोदञ्च सरस्तस्मात् प्लावयन्ती महानदी ।सुचक्षुः पर्वतं प्राप्ता ततश्च त्रिशिखं गता

tathaiva paścime pāde vipule sā mahānadī / sucakṣuriti vikhyātā vaibhrājaṃ sācalaṃ yayau / 56.13/ śītodañca sarastasmāt plāvayantī mahānadī / sucakṣuḥ parvataṃ prāptā tataśca triśikhaṃ gatā

हिन्दी अर्थ

सम्पूर्ण भयंकर लोकोंको भस्म कर डालते हो अथवा तुम अत्यन्त पराक्रमी हो--तुम्हारे पराक्रमकी कहीं सीमा नहीं है। हुताशन! तुम सम्पूर्ण जीवोंके हृदय-कमलमें स्थित उत्तम, अनन्त एवं स्तवन करने योग्य सत्त्व हो। तुमने इस सम्पूर्ण चराचर विश्वको व्याप्त कर रखा है। तुम एक होकर भी यहाँ अनेक रूपोंमें प्रकट हुए हो। पावक! तुम अक्षय हो, तुम्हीं

English

Vnsu-mat,^ the Krauncas,** and the Kurus ft and Vakas JJ

अध्याय ५६

श्लोक 15

तस्मात् क्रमेण चाद्रीणां शिखरेषु निपत्य सा ।केतुमालं समासाद्य प्रविष्टा लवणोदधिम्

tasmāt krameṇa cādrīṇāṃ śikhareṣu nipatya sā / ketumālaṃ samāsādya praviṣṭā lavaṇodadhim

हिन्दी अर्थ

पर्वतों और वनोंसहित सम्पूर्ण पृथ्वी, आकाश, चन्द्रमा, सूर्य तथा दिन-रात हो। महासागरके उदरमें बड़वानलके रूपमें तुम्हीं हो तथा तुम्हीं अपनी परा विभूतिके साथ सूर्यकी किरणोंमें स्थित हो। भगवन्! तुम हवन किये हुए हविष्यका साक्षात् भोजन करते हो, इसलिये बड़े- बड़े यज्ञोंमें नियमपरायण महर्षिगण सदा तुम्हारी पूजा करते हैं। तुम यज्ञमें स्तुत होकर

English

the Antar-dvipa49,* and the TrigartaSjf the Agnijyaa,| the Sardana peoples, § the A^va-mukhas || also, the PrApt^s^

अध्याय ५६

श्लोक 16

सुपार्श्वन्तु तथैवाद्रिं मेरुपादं हि सा गता ।(भद्रसोमेति) तत्र सोमेति विख्याता सा ययौ सवितुर्वनम्

supārśvantu tathaivādriṃ merupādaṃ hi sā gatā / (bhadrasometi) tatra someti vikhyātā sā yayau saviturvanam

हिन्दी अर्थ

सोमपान करते हो तथा वषट्का उच्चारण करके इन्द्रके उद्देश्यसे दिये हुए हविष्यको भी तुम्हीं भोग लगाते हो और इस प्रकार पूजित होकर तुम सम्पूर्ण विश्वका कल्याण करते हो। विप्रगण अभीष्ट फलकी प्राप्तिके लिये सदा तुम्हारा ही यजन करते हैं। सम्पूर्ण वेदाड़ोंमें तुम्हारी महिमाका गान किया जाता है। यज्ञपरायण श्रेष्ठ ब्राह्मण तुम्हारी ही प्रसन्नताके लिये

English

the long-haired C'ividas,** the DasorakaSjtf tlie Vata. dhfinas,tt and the S'ava-dhdnas, §§ the Puahkalas, ||||

अध्याय ५६

श्लोक 17

तत्पावयन्ती संप्राप्ता महाभद्रं सरोवरम् ।ततश्च शङ्खकूटं सा प्रयाता वै महानदी

tatpāvayantī saṃprāptā mahābhadraṃ sarovaram / tataśca śaṅkhakūṭaṃ sā prayātā vai mahānadī

हिन्दी अर्थ

सर्वदा अड्ञोंसहित वेदोंका पठन-पाठन करते रहते हैं। तुम्हीं यज्ञपरायण ब्रह्मा, सब भूतोंके

English

in Taksha-6il6,t the Amb^laa,! the Malava8,§ the Madras, II the Vepukas,! and the Vndantikas,** the

अध्याय ५६

श्लोक 18

तस्माच्च वृषभादीन् सा क्रमात् प्राप्य शिलोच्चयान् ।महार्णवमनुप्राप्ता प्लावयित्वोत्तरान् कुरून्

tasmācca vṛṣabhādīn sā kramāt prāpya śiloccayān / mahārṇavamanuprāptā plāvayitvottarān kurūn

हिन्दी अर्थ

स्वामी भगवान् विष्णु, देवराज इन्द्र, अर्यमा, जलके स्वामी वरुण, सूर्य तथा चन्द्रमा हो। सम्पूर्ण देवता और असुर भी तुम्हींको हविष्योंद्वारा संतुष्ट करके मनोवाञ्छित फल प्राप्त करते हैं। कितने ही महान् दोषसे दूषित वस्तु क्‍यों न हो, वह सब तुम्हारी ज्वालाओंके स्पर्शसे शुद्ध हो जाती है। सब स्नानोंमें तुम्हारे भस्मसे किया हुआ स्नान ही सबसे बढ़कर है,

English

Pingalas,tt the Mana-kalahas,tJ the HtinaB,§§ and the

अध्याय ५६

श्लोक 19

एवमेषा मया गङ्गां कथिता ते द्विजर्षभ ।जम्बुद्वीपनिवेशश्च वर्षाणि च यथातथम्

evameṣā mayā gaṅgāṃ kathitā te dvijarṣabha / jambudvīpaniveśaśca varṣāṇi ca yathātatham

हिन्दी अर्थ

इसीलिये मुनिगण सन्ध्याकालमें उसका विशेष रूपसे सेवन करते हैं। शुचि नामवाले अग्निदेव! मुझपर प्रसन्न होओ। वायुरूप! मुझपर प्रसन्न होओ। अत्यन्त निर्मल कान्तिवाले पावक! मुझपर प्रसन्न होओ।विद्युन्मय! आज मुझपर प्रसन्न होओ। हविष्यभोजी अग्निदेव! तुम मेरी रक्षा करो। वह्ले! तुम्हारा जो कल्याणमय स्वरूप है, देव! तुम्हारी जो सात

English

Pingalas,tt the Mana-kalahas,tJ the HtinaB,§§ and the

अध्याय ५६

श्लोक 20

वसन्ति तेषु सर्वेषु प्रजाः किंपुरुषादिषु ।सुखप्राया निरातङ्का न्यूनतोत्कर्षवर्जिताः

vasanti teṣu sarveṣu prajāḥ kiṃpuruṣādiṣu / sukhaprāyā nirātaṅkā nyūnatotkarṣavarjitāḥ

हिन्दी अर्थ

ज्वालामयी जिदह्लाएँ हैं, उन सबके द्वारा तुम मेरी रक्षा करो--ठीक उसी तरह, जैसे पिता अपने पुत्रकी रक्षा करता है। मैंने तुम्हारी स्तुति की है।

English

Pingalas,tt the Mana-kalahas,tJ the HtinaB,§§ and the

अध्याय ५६

श्लोक 21

नवस्वपि च वर्षेषु सप्त सप्त कुलाचलाः ।एकैकस्मिंस्तथा देशे नद्यश्चाद्रिविनिः सृताः

navasvapi ca varṣeṣu sapta sapta kulācalāḥ / ekaikasmiṃstathā deśe nadyaścādriviniḥ sṛtāḥ

हिन्दी अर्थ

मार्कण्डेयजी कहते हैं--मुने! शान्तिके इस प्रकार स्तुति करनेपर भगवान् अग्निदेव ज्वालाओंसे घिरे हुए उनके समक्ष प्रकट हुए। ब्रह्मन्! अग्निदेव उस स्तोत्रसे बहुत संतुष्ट थे। शान्ति उनके चरणोंमें पड़ गये; फिर उन्होंने मेघके समान गम्भीर वाणीमें शान्तिसे कहा --'विप्रवर! तुमने जो भक्तिपूर्वक मेरा स्तवन किया है, उससे मैं सन्तुष्ट हूँ और तुम्हें वर

English

Pingalas,tt the Mana-kalahas,tJ the HtinaB,§§ and the

अध्याय ५६

श्लोक 22

यानि किंपुरुषाद्यानि वर्षाण्यष्टौ द्विजोत्तम ।तेषूद्भिज्जानि तोयानि मेघवार्यत्र भारते

yāni kiṃpuruṣādyāni varṣāṇyaṣṭau dvijottama / teṣūdbhijjāni toyāni meghavāryatra bhārate

हिन्दी अर्थ

र हा का ः री बे न े हनी “ नस ' सडक पट को जन

English

Pingalas,tt the Mana-kalahas,tJ the HtinaB,§§ and the

अध्याय ५६

श्लोक 23

वार्क्षो स्वाभाविकी देश्या तोयोत्था मानसी तथा ।कर्मजा च नृणां सिद्धर्वर्षेष्वेतेषु चाष्टसु

vārkṣo svābhāvikī deśyā toyotthā mānasī tathā / karmajā ca nṛṇāṃ siddharvarṣeṣveteṣu cāṣṭasu

हिन्दी अर्थ

शान्तिने कहा--भगवन! मैं तो कृतार्थ हो गया, क्योंकि आज आपके दिव्य स्वरूपका प्रत्यक्ष दर्शन कर रहा हूँ। तथापि मैं भक्तिसे विनीत होकर जो कुछ आपसे कहता हूँ, उसे आप सुनें। देव! मेरे आचार्य अपने आश्रमसे भाईके यज्ञमें गये हैं। वे जब लौटकर आयें तो इस स्थानको आपसे सनाथ देखें। साथ ही यदि आपकी मुझपर कृपा हो तो यह दूसरा वर

English

Pingalas,tt the Mana-kalahas,tJ the HtinaB,§§ and the

अध्याय ५६

श्लोक 24

कामप्रदेभ्यो वृक्षेभ्यो वार्क्षो सिद्धिः स्वभावजा ।स्वाभाविकी समाख्याता तृप्तिर्देश्या च दैशिकी

kāmapradebhyo vṛkṣebhyo vārkṣo siddhiḥ svabhāvajā / svābhāvikī samākhyātā tṛptirdeśyā ca daiśikī

हिन्दी अर्थ

भी दीजिये। मेरे गुरुदेवके कोई पुत्र नहीं है, उन्हें कोई सुयोग्य पुत्र प्राप्त हो; फिर उस पुत्रमें वे जितना स्नेह करें, उतना ही सम्पूर्ण भूतोंके प्रति भी उनका स्नेह हो। उनका हृदय सबके प्रति कोमल बन जाय।

English

Pingalas,tt the Mana-kalahas,tJ the HtinaB,§§ and the

अध्याय ५६

श्लोक 25

अपां शौक्ष्म्याच्च तोयोत्था ध्यानोपेता च मानसी ।उपासनादिकार्यात्तु धर्मजा साप्युदाहृता

apāṃ śaukṣmyācca toyotthā dhyānopetā ca mānasī / upāsanādikāryāttu dharmajā sāpyudāhṛtā

हिन्दी अर्थ

शान्तिकी यह बात सुनकर अग्निदेवने कहा--“महामुने! तुमने गुरुके लिये वर दो माँगे हैं, अपने लिये नहीं। इससे तुमपर मेरी प्रसन्नता और भी बढ़ गयी है। तुमने गुरुके लिये जो कुछ माँगा है, वह सब प्राप्त होगा। उनके पुत्र होगा और सम्पूर्ण भूतोंके प्रति उनकी मैत्री भी बढ़ जायगी। उनका पुत्र 'भौत्य” नामसे प्रसिद्ध एवं मन्वन्तरोंका स्वामी होगा; साथ ही

English

Pingalas,tt the Mana-kalahas,tJ the HtinaB,§§ and the

अध्याय ५६

श्लोक 26

न चैतेषु युगावस्था नाध्यो व्याधयो न च ।पुण्यापुण्यसमारम्भो नैव तेषु द्विजोत्तम

na caiteṣu yugāvasthā nādhyo vyādhayo na ca / puṇyāpuṇyasamārambho naiva teṣu dvijottama

हिन्दी अर्थ

वह महाबली, महापराक्रमी और परम बुद्धिमान् होगा। जो एकाग्रचित्त होकर इस स्तोत्रके

English

Pingalas,tt the Mana-kalahas,tJ the HtinaB,§§ and the

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_mArkaNDeyapurANa1-93.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Markandeya Purana — Chapter 56
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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