Markandeya Purana· Mārkaṇḍeya Purāṇa
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अध्याय 57 / 90

Adhyaya 57

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अध्याय ५७

श्लोक 1

इति श्रीमार्कण्डेयपुराणे गङ्गावतारो नाम षट्पञ्चाशो ऽध्यायः सप्तपञ्चाशो ऽध्यायः- ५७ क्रौष्टुकिरुवाच भगवन् ! कथितन्त्वेतज्जम्बूद्वीपं समासतः ।यदेतद्भवता प्रोक्तं कर्म नान्यत्र पुण्यदम्

iti śrīmārkaṇḍeyapurāṇe gaṅgāvatāro nāma ṣaṭpañcāśo 'dhyāyaḥ saptapañcāśo 'dhyāyaḥ- 57 krauṣṭukiruvāca bhagavan ! kathitantvetajjambūdvīpaṃ samāsataḥ / yadetadbhavatā proktaṃ karma nānyatra puṇyadam

हिन्दी अर्थ

द्वारा मेरी स्तुति करेगा, उसकी समस्त अभिलाषाएँ पूर्ण होंगी तथा उसे पुण्यकी भी प्राप्ति होगी। यज्ञोंमें, पर्वके समय, तीर्थोमें और होमकर्ममें जो धर्मके लिये मेरे इस स्तोत्रका पाठ करेगा, उसके लिये यह अत्यन्त पुष्टिकारक होगा। होम न करने तथा अयोग्य समयमें होम करने आदिके जो दोष हैं और अयोग्य पुरुषोंद्वारा हवन करनेसे जो दोष उत्पन्न होते हैं, उन

English

have nob met with these elsewhere. The Ohosha-aankhyas are men- in vorso 6 above.

अध्याय ५७

श्लोक 2

पापाय वा महाभाग ! वर्जयित्वा तु भारतम् ।इतः स्वर्गश्च मोक्षश्च मध्यञ्चान्तञ्च गम्यते

pāpāya vā mahābhāga ! varjayitvā tu bhāratam / itaḥ svargaśca mokṣaśca madhyañcāntañca gamyate

हिन्दी अर्थ

सबको यह स्तोत्र सुननेमात्रसे शान्त कर देता है। पूर्णिमा, अमावास्या तथा अन्य पर्वोपर मनुष्योंद्वारा सुना हुआ मेरा यह स्तोत्र उनके पापोंका नाश करनेवाला होता है।' मार्कण्डेयजी कहते हैं--मुने! यों कहकर भगवान् अग्नि उनके देखते-देखते बुझे हुए दीपककी भाँति तत्काल अदृश्य हो गये। अग्निदेवके चले जानेपर शान्तिका चित्त बहुत

English

Gandharas,** the Kliai^.8a^.ira.ra^ia,tt the Yaudheyag +! and the Dasameyas,§§ the Rajaiiyas,|||| and the S'^yamfikas,^!

अध्याय ५७

श्लोक 3

न खल्वन्यत्र मर्त्यानां भूमौ कर्म विधीयते ।तस्माद्विस्तरशो ब्रह्मन् ! ममैतद्भारतं वद

na khalvanyatra martyānāṃ bhūmau karma vidhīyate / tasmādvistaraśo brahman ! mamaitadbhārataṃ vada

हिन्दी अर्थ

सन्तुष्ट था। उनके शरीरमें हर्षके कारण रोमाज्च हो आया था। इसी अवस्थामें उन्होंने गुरुके आश्रममें प्रवेश किया और वहाँ अग्निदेवको पहलेकी ही भाँति प्रज्वलित देखा। इससे उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई। इसी बीचमें उनके गुरु भी छोटे भाईके यज्ञसे अपने आश्रमको लौटे। शिष्य शान्तिने गुरुके सामने जाकर उनके चरणोंमें प्रणाम किया। उनके दिये हुए आसन

English

and the country of Ka^mira,* and the people of Abr Bara,t the DavadaB,^ and the Tvahganas,§ the Kula^g |

अध्याय ५७

श्लोक 4

ये चास्य भेदा यावन्तो यथावत् स्थितिरेव च ।वर्षो ऽयं द्विजशार्दूल ! ये चास्मिन् देशपर्वताः

ye cāsya bhedā yāvanto yathāvat sthitireva ca / varṣo 'yaṃ dvijaśārdūla ! ye cāsmin deśaparvatāḥ

हिन्दी अर्थ

और पूजाको स्वीकार करके गुरुने उनसे कहा--“वत्स! तुमपर तथा अन्य जीवोंपर भी मेरा स्नेह बहुत बढ़ गया है। मैं नहीं जानता, यह क्या बात है। यदि तुम्हें कुछ पता हो तो बताओ।' तब शान्तिने अपने आचार्यसे अग्निके बुझने आदिकी सब बातें यथार्थरूपसे कह सुनायीं। यह सुनकर गुरुके नेत्र स्नेहके कारण सजल हो आये। उन्होंने शान्तिको हृदयसे

English

pics, the Darvadas.tt and the Marakas.JJ and the Kuru{a8,§§

अध्याय ५७

श्लोक 5

मार्कण्डेय उवाच भारतस्यास्य वर्षस्य नव भेदान्निबोध मे ।समुद्रान्तरिता ज्ञेयास्ते त्वगम्याः परस्परम्

mārkaṇḍeya uvāca bhāratasyāsya varṣasya nava bhedānnibodha me / samudrāntaritā jñeyāste tvagamyāḥ parasparam

हिन्दी अर्थ

लगा लिया और उन्हें अड़-उपाड्रोंसहित सम्पूर्ण वेदोंका ज्ञान कराया। तदनन्तर भूति मुनिके 'भौत्य” नामक पुत्र हुआ, जो भविष्यमें मनु होगा। उस मन्वन्तरमें चाक्षुष, कनिष्ठ, पवित्र, भ्राजिर तथा धारावृक-ये पाँच देवगण माने गये हैं; इन सबके इन्द्र होंगे शुचि, जो महाबली, महापराक्रमी तथा इन्द्रके समस्त गुणोंसे युक्त होंगे। आग्नीध्र, अग्निबाहु, शुचि,

English

the Vana-rashtrakas,! the Sairishthas,** the Bi-ahma.

अध्याय ५७

श्लोक 6

इन्द्रद्वीपः कशेरुमांस्ताम्रवर्णो गभस्तिमान् ।नागद्वीपस्तथा सौम्यो गान्धर्वो वारुणस्तथा

indradvīpaḥ kaśerumāṃstāmravarṇo gabhastimān / nāgadvīpastathā saumyo gāndharvo vāruṇastathā

हिन्दी अर्थ

मुक्त, माधव, शुक्र और अजित--ये सात उस समयके सप्तर्षि होंगे। गुरु, गभीर, ब्रध्न, भरत, अनुग्रह, स्त्रीमानी, प्रतीर, विष्णु, संक्रन्दन, तेजस्वी तथा सुबल--से मनुके पुत्र होंगे। क्रौष्टकिजी! इस प्रकार मैंने तुमसे चौदह मन्वन्तरोंका वर्णन किया। उन सबका क्रमशः: श्रवण करके मनुष्य पुण्यका भागी होता है तथा उसकी सन्तान कभी क्षीण नहीं होती।

English

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अध्याय ५७

श्लोक 7

अयन्तु नवमस्तेषां द्वीपः सागरसंवृतः ।योजनानां हसस्त्रं वै द्वीपो ऽयं दक्षिणोत्तरात्

ayantu navamasteṣāṃ dvīpaḥ sāgarasaṃvṛtaḥ / yojanānāṃ hasastraṃ vai dvīpo 'yaṃ dakṣiṇottarāt

हिन्दी अर्थ

प्रथम मन्वन्तरका वर्णन सुनकर मनुष्य धर्मका भागी होता है। स्वारोचिष मन्वन्तरकी कथा सुननेसे उसे सब कामनाओंकी प्राप्ति होती है। औत्तम मन्वन्तरके श्रवणसे धन, तामसके श्रवणसे ज्ञान तथा रैवत मन्वन्तरके श्रवणसे बुद्धि एवं सुन्दरी स्त्रीकी प्राप्ति होती है। चाक्षुष मन्वन्तरके श्रवणसे आरोग्य, वैवस्वतके श्रवणसे बल तथा सूर्यसावर्णिक मन्वन्तरके

English

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अध्याय ५७

श्लोक 8

पूर्वे किराता यस्यान्ते पश्चिमे यवनास्तथा ।ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राश्चान्तः स्थिता द्विज

pūrve kirātā yasyānte paścime yavanāstathā / brāhmaṇāḥ kṣatriyā vaiśyāḥ śūdrāścāntaḥ sthitā dvija

हिन्दी अर्थ

श्रवणसे गुणवान् पुत्र-पौत्रोंकी प्राप्ति होती है। ब्रह्मसावर्णिक मन्वन्तरके श्रवणसे महिमा बढ़ती है। धर्मसावर्णिकके श्रवणसे कल्याणमयी बुद्धि प्राप्त होती है और रुद्रसावर्णिकके श्रवणसे मनुष्य विजयी होता है। दक्षसावर्णिकके श्रवणसे मनुष्य अपने कुलमें श्रेष्ठ तथा उत्तम गुणोंसे युक्त होता है तथा रौच्य मन्वन्तरकी कथा सुननेसे वह शत्रुओंकी सेनाका

English

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अध्याय ५७

श्लोक 9

इज्याध्यायवणिज्याद्यैः कर्मभिः कृतपावनाः ।तेषां संव्यवहारश्च एभिः कर्मभिरिष्यते

ijyādhyāyavaṇijyādyaiḥ karmabhiḥ kṛtapāvanāḥ / teṣāṃ saṃvyavahāraśca ebhiḥ karmabhiriṣyate

हिन्दी अर्थ

संहार कर डालता है। भौत्य मन्वन्तरकी कथा श्रवण करनेपर मनुष्य देवताकी कृपा प्राप्त

English

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अध्याय ५७

श्लोक 10

स्वर्गापवर्गप्राप्तिश्च पुण्यं पापञ्च वै तदा ।महेन्द्रो मलयः सह्यः शुक्तिमानृक्षपर्वतः

svargāpavargaprāptiśca puṇyaṃ pāpañca vai tadā / mahendro malayaḥ sahyaḥ śuktimānṛkṣaparvataḥ

हिन्दी अर्थ

करता है; इतना ही नहीं, उसे अग्निहोत्रके पुण्य तथा गुणवान् पुत्रोंकी प्राप्ति होती है। मन्वन्तरोंके देवता, ऋषि, इन्द्र, मनु, मनुके पुत्र तथा राजवंशोंका वर्णन सुनकर मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। देवता, ऋषि, इन्द्र, राजा तथा मन्वन्तरोंके स्वामी--ये प्रसन्न होकर कल्याणमयी बुद्धि प्रदान करते हैं। वैसी बुद्धि पाकर मनुष्य शुभ कर्म करता है,

English

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अध्याय ५७

श्लोक 11

विन्ध्यश्च पारियात्रश्च सप्तैवात्र कुलाचलाः ।तेषां सहस्रशश्चान्ये भूधरा ये समीपगाः

vindhyaśca pāriyātraśca saptaivātra kulācalāḥ / teṣāṃ sahasraśaścānye bhūdharā ye samīpagāḥ

हिन्दी अर्थ

जिससे वह चौदह इन्द्रोंकी आयुपर्यन्त उत्तम गतिका उपभोग करता है।

English

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अध्याय ५७

श्लोक 12

विस्तारोच्छ्रयिणो रम्या विपुलाश्चात्र सानवः ।कोलाहलः सवैभ्राजो मन्दरो दर्दुराचलः

vistārocchrayiṇo ramyā vipulāścātra sānavaḥ / kolāhalaḥ savaibhrājo mandaro dardurācalaḥ

हिन्दी अर्थ

सूर्यका तत्त्व, वेदोंका प्राकट्य, ब्रह्माजीद्वारा सूर्यदेवकी स्तुति और सृष्टि-रचनाका आरम्भ

English

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अध्याय ५७

श्लोक 13

वातस्वनो वैद्युतश्च मैनाकः स्वरसस्तथा ।तुङ्गप्रस्थो नागगिरी रोचनः पाण्डराचलः

vātasvano vaidyutaśca mainākaḥ svarasastathā / tuṅgaprastho nāgagirī rocanaḥ pāṇḍarācalaḥ

हिन्दी अर्थ

क्रौष्टकि बोले--द्विजश्रेष्ठ आपने मन्वन्तरोंकी स्थितिका भलीभाँति वर्णन किया और मैंने क्रमश: विस्तारपूर्वक उसे सुना। अब राजाओंका सम्पूर्ण वंश, जिसके आदि ब्रह्माजी हैं, मैं सुनना चाहता हूँ; आप उसका यथावत् वर्णन कीजिये।

English

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अध्याय ५७

श्लोक 14

पुष्पो गिरिर्दुर्जयन्तो रैवतोर्ऽबुद एव च ।ऋष्यमूकः सगोमन्तः कूटशैलः कृतस्मरः

puṣpo girirdurjayanto raivator'buda eva ca / ṛṣyamūkaḥ sagomantaḥ kūṭaśailaḥ kṛtasmaraḥ

हिन्दी अर्थ

मार्कण्डेयजीने कहा--वत्स! प्रजापति ब्रह्माजीको आदि बनाकर जिसकी प्रवृत्ति हुई है तथा जो सम्पूर्ण जगत्का मूल कारण है, उस राजवंशका तथा उसमें प्रकट हुए राजाओंके चरित्रोंका वर्णन सुनो--जिस वंशमें मनु, इक्ष्वाकु, अनरण्य, भगीरथ तथा अन्य सैकड़ों राजा, जिन्होंने पृथ्वीका पालन किया था, उत्पन्न हुए थे। वे सभी धर्मज्ञ, यज्ञकर्ता,

English

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अध्याय ५७

श्लोक 15

श्रीपर्वतश्चकोरश्च शतशो ऽन्ये च पर्वताः ।तैर्विमिश्रा जनपदा म्लेच्छाश्चार्याश्च भागशः

śrīparvataścakoraśca śataśo 'nye ca parvatāḥ / tairvimiśrā janapadā mlecchāścāryāśca bhāgaśaḥ

हिन्दी अर्थ

शूरवीर तथा परम तत्त्वके ज्ञाता थे। ऐसे वंशका वर्णन सुनकर मनुष्य समस्त पापोंसे छूट जाता है। पूर्वकालमें प्रजापति ब्रह्माने नाना प्रकारकी प्रजाको उत्पन्न करनेकी इच्छा लेकर दाहिने अँगूठेसे दक्षको उत्पन्न किया और बाँये अँगूठेसे उनकी पत्नीको प्रकट किया। दक्षके अदिति नामकी एक सुन्दरी कन्या उत्पन्न हुई, जिसके गर्भसे कश्यपने भगवान् सूर्यको जन्म

English

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अध्याय ५७

श्लोक 16

तैः पीयन्ते सरित्श्रेष्ठा यास्ताः सम्यङ्निबोध मे ।गङ्गा सरस्वती सिन्धुश्चन्द्रभागा तथापरा

taiḥ pīyante saritśreṣṭhā yāstāḥ samyaṅnibodha me / gaṅgā sarasvatī sindhuścandrabhāgā tathāparā

हिन्दी अर्थ

क्रौष्टकिने पूछा--भगवन्! मैं भगवान् सूर्यके यथार्थ स्वरूपका वर्णन सुनना चाहता हूँ। वे किस प्रकार कश्यपजीके पुत्र हुए? कश्यप और अदितिने कैसे उनकी आराधना की? उनके यहाँ अवतीर्ण हुए भगवान् सूर्यका कैसा प्रभाव है? ये सब बातें यथार्थरूपसे बताइये।

English

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अध्याय ५७

श्लोक 17

यमुना च शतद्रुश्च वितस्तेरावती कुहुः ।गोमती धूतपापा च बाहुदा सदृशद्वती

yamunā ca śatadruśca vitasterāvatī kuhuḥ / gomatī dhūtapāpā ca bāhudā sadṛśadvatī

हिन्दी अर्थ

मार्कण्डेयजी बोले--ब्रह्मन! पहले यह सम्पूर्ण लोक प्रभा और प्रकाशसे रहित था। चारों ओर घोर अन्धकार घेरा डाले हुए था। उस समय परम कारणस्वरूप एक अविनाशी एवं बृहत् अण्ड प्रकट हुआ। उसके भीतर सबके प्रपितामह, जगत्के स्वामी, लोकस्रष्टा, कमलयोनि साक्षात् ब्रह्माजी विराजमान थे। उन्होंने उस अण्डका भेदन किया। महामुने!

English

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अध्याय ५७

श्लोक 18

विपाशा देविका रङ्क्षुर्निश्चीरा गण्डकी तथा ।कौशिकी चापगा विप्र ! हिमवत्पादनिः सृताः

vipāśā devikā raṅkṣurniścīrā gaṇḍakī tathā / kauśikī cāpagā vipra ! himavatpādaniḥ sṛtāḥ

हिन्दी अर्थ

उन ब्रह्माजीके मुखसे “55” यह महान् शब्द प्रकट हुआ। उससे पहले भू:, फिर भुव:, तदनन्तर स्वः--ये तीन व्याह्ृतियाँ उत्पन्न हुईं, जो भगवान् सूर्यका स्वरूप हैं। “35” इस स्वरूपसे सूर्यदेवका अत्यन्त सूक्ष्म रूप प्रकट हुआ। उससे “महः” यह स्थूल रूप हुआ, फिर उससे “जन” यह स्थूलतर रूप उत्पन्न हुआ। उससे “तप” और तपसे “सत्य” प्रकट हुआ।

English

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अध्याय ५७

श्लोक 19

वेदस्मृतिर्वेदवती वृत्रघ्री सिन्धुरेव च ।वेण्वा सानन्दनी चैव सदानीरा मही तथा

vedasmṛtirvedavatī vṛtraghrī sindhureva ca / veṇvā sānandanī caiva sadānīrā mahī tathā

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार ये सूर्यके सात स्वरूप स्थित हैं, जो कभी प्रकाशित होते हैं और कभी अप्रकाशित रहते हैं। ब्रह्म! मैंने “ओम्” यह रूप बताया है; वह सृष्टिका आदि-अन्त, अत्यन्त सूक्ष्म एवं निराकार है; वही परब्रह्म तथा वही ब्रह्मका स्वरूप है।

English

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अध्याय ५७

श्लोक 20

पारा चर्मण्वती नूपी विदिशा वेत्रवत्यपि ।शिप्रा ह्यवर्णो च तथा पारियात्राश्रयाः स्मृताः

pārā carmaṇvatī nūpī vidiśā vetravatyapi / śiprā hyavarṇo ca tathā pāriyātrāśrayāḥ smṛtāḥ

हिन्दी अर्थ

उक्त अण्डका भेदन होनेपर अव्यक्तजन्मा ब्रह्माजीके प्रथम मुखसे ऋचाएँ प्रकट हुईं। उनका वर्ण जपाकुसुमके समान था। वे सब तेजोमयी, एक-दूसरीसे पृथक् तथा रजोमय रूप धारण करनेवाली थीं। तत्पश्चात् ब्रह्माजीके दक्षिण मुखसे यजुर्वेदके मन्त्र अबाधरूपसे

English

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अध्याय ५७

श्लोक 21

शोणो महानदश्चैव नर्मदा सुरथाद्रिजा ।मन्दाकिनी दशार्णा च चित्रकूटा तथापरा

śoṇo mahānadaścaiva narmadā surathādrijā / mandākinī daśārṇā ca citrakūṭā tathāparā

हिन्दी अर्थ

प्रकट हुए। जैसा सुवर्णका रंग होता है, वैसा ही उनका भी था। वे भी एक-दूसरेसे पृथक्- पृथक् थे। फिर परमेष्ठी ब्रह्माके पश्चिम मुखसे सामवेदके छन्द प्रकट हुए। सम्पूर्ण अथर्ववेद, जिसका रंग भ्रमर और कज्जलराशिके समान काला है तथा जिसमें अभिचार एवं शान्तिकर्मके प्रयोग हैं, ब्रह्माजीके उत्तरमुखसे प्रकट हुआ। उसमें सुखमय सत्त्वगुण तथा

English

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अध्याय ५७

श्लोक 22

चित्रोत्पला सतमसा करमोदा पिशाचिका ।तथान्या पिप्पलिश्रोणिर्विपाशा वञ्जुला नदी

citrotpalā satamasā karamodā piśācikā / tathānyā pippaliśroṇirvipāśā vañjulā nadī

हिन्दी अर्थ

तमोगुणकी प्रधानता है। वह घोर और सौम्यरूप है। ऋग्वेदमें रजोगुणकी, यजुर्वेदमें सत्त्वगुणकी, सामवेदमें तमोगुणकी तथा अथर्ववेदमें तमोगुण एवं सत्त्वगुणकी प्रधानता है। ये चारों वेद अनृपम तेजसे देदीप्यमान होकर पहलेकी ही भाँति पृथक्-पृथक् स्थित हुए। तत्पश्चात् वह प्रथम तेज, जो “' के नामसे पुकारा जाता है, अपने स्वभावसे प्रकट हुए

English

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अध्याय ५७

श्लोक 23

सुमेरुजा शुक्तिमती शकुली त्रिदिवाक्रमुः ।(विन्ध्य) (स्कन्ध) पादप्रसूता वै तथान्या वेगवाहिनी

sumerujā śuktimatī śakulī tridivākramuḥ / (vindhya) (skandha) pādaprasūtā vai tathānyā vegavāhinī

हिन्दी अर्थ

ऋग्वेदमय तेजको व्याप्त करके स्थित हुआ। महामुने! इसी प्रकार उस प्रणवरूप तेजने यजुर्वेद एवं सामवेदमय तेजको भी आवृत किया। इस प्रकार उस अधिष्ठानस्वरूप परम तेज ३“कारमें चारों वेदमय तेज एकत्वको प्राप्त हुए। ब्रह्म! तदनन्तर वह पुञ्जीभूत उत्तम वैदिक तेज परम तेज प्रणवके साथ मिलकर जब एकत्वको प्राप्त होता है, तब सबके

English

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अध्याय ५७

श्लोक 24

शिप्रा पयोष्णी निर्विन्ध्या तापी सनिषधावती ।वेण्या वैतरणी चैव सिनीवाली कुमुद्वती

śiprā payoṣṇī nirvindhyā tāpī saniṣadhāvatī / veṇyā vaitaraṇī caiva sinīvālī kumudvatī

हिन्दी अर्थ

आदिमें प्रकट होनेके कारण उसका नाम आदित्य होता है। महाभाग! वह आदित्य ही इस विश्वका अविनाशी कारण है। प्रातःकाल, मध्याह्न तथा अपराह्नकालमें आदित्यकी अड्जभूत वेदत्रयी ही, जिसे क्रमश: ऋक्, यजु, और साम कहते हैं, तपती है। पूर्वाह्नमें ऋग्वेद, मध्याह्ममें यजुर्वेद तथा अपराह्नलमें सामवेद तपता है। इसीलिये ऋग्वेदोक्त शान्तिकर्म

English

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अध्याय ५७

श्लोक 25

करतोया महागौरी दुर्गा चान्तः शिरा तथा ।(ऋक्ष) (विन्ध्य) पादप्रसूतास्ता नद्यः पुण्यजलाः शुभाः

karatoyā mahāgaurī durgā cāntaḥ śirā tathā / (ṛkṣa) (vindhya) pādaprasūtāstā nadyaḥ puṇyajalāḥ śubhāḥ

हिन्दी अर्थ

पूर्वाह्निमें, यजुर्वेदोक्त पौष्टिककर्म मध्याह्ममें तथा सामवेदोक्त आभिचारिक कर्म अपराह्लकालमें निश्चित किया गया है। आभिचारिक कर्म मध्याह्न और अपराह्न दोनों कालोंमें किया जा सकता है, किन्तु पितरोंके श्राद्ध आदि कार्य अपराह्नकालमें ही सामवेदके मन्त्रोंसे करने चाहिए। सृष्टिकालमें ब्रह्मा ऋग्वेदमय, पालनकालमें विष्णु

English

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अध्याय ५७

श्लोक 26

गोदावरी भीमरथा कृष्णा वेण्या तथापरा ।तुङ्गभद्रा सुप्रयोगा वाह्या कावेर्यथापगा

godāvarī bhīmarathā kṛṣṇā veṇyā tathāparā / tuṅgabhadrā suprayogā vāhyā kāveryathāpagā

हिन्दी अर्थ

यजुर्वेदमय तथा संहारकालमें रुद्र सामवेदमय कहे गये हैं। अतएव सामवेदकी ध्वनि अपवित्र मानी गयी है। इस प्रकार भगवान् सूर्य वेदात्मा, वेदमें स्थित, वेदविद्यास्वरूप तथा परम पुरुष कहलाते हैं। वे सनातन देवता सूर्य ही रजोगुण और सत्त्गगुण आदिका आश्रय लेकर क्रमश: सृष्टि, पालन और संहारके हेतु बनते हैं और इन कर्मोके अनुसार ब्रह्मा, विष्णु

English

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अध्याय ५७

श्लोक 27

(सह्य) (विन्ध्य) पादविनिष्क्रान्ता इत्येताः सरिदुत्तमाः ।कृतमाला ताम्रपर्णो पुष्पजा सूत्पलावती

(sahya) (vindhya) pādaviniṣkrāntā ityetāḥ sariduttamāḥ / kṛtamālā tāmraparṇo puṣpajā sūtpalāvatī

हिन्दी अर्थ

आदि नाम धारण करते हैं। वे देवताओंद्वारा सदा स्तवन करने योग्य हैं, वेदस्वरूप हैं। उनका कोई पृथक् रूप नहीं है। वे सबके आदि हैं। सम्पूर्ण मनुष्य उन्हींके स्वरूप हैं। विश्वकी आधारभूता ज्योति वे ही हैं। उनके धर्म अथवा तत्त्वका ठीक-ठीक ज्ञान नहीं होता। वे वेदान्तगम्य ब्रह्म एवं परसे भी पर हैं।

English

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अध्याय ५७

श्लोक 28

मलयाद्रिसमुद्भूता नद्यः शीतजलास्त्विमाः ।पितृसोमर्षिकुल्या च इक्षुका त्रिदिवा च या

malayādrisamudbhūtā nadyaḥ śītajalāstvimāḥ / pitṛsomarṣikulyā ca ikṣukā tridivā ca yā

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर भगवान् सूर्यके तेजसे नीचे तथा ऊपरके सभी लोक सन्तप्त होने लगे। यह देख सृष्टिकी इच्छा रखनेवाले कमलयोनि ब्रह्माजीने सोचा--सृष्टि, पालन और संहारके कारणभूत भगवान् सूर्यके सब ओर फैले हुए तेजसे मेरी रची हुई सृष्टि भी नाशको प्राप्त हो जायगी। जल ही समस्त प्राणियोंका जीवन है, वह जल सूर्यके तेजसे सूखा जा रहा है।

English

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अध्याय ५७

श्लोक 29

लाङ्गूलिनी वंशकरा महेन्द्रप्रभवाः स्मृताः ।ऋषिकुल्या कुमारी च मन्दगा मन्दवाहिनी

lāṅgūlinī vaṃśakarā mahendraprabhavāḥ smṛtāḥ / ṛṣikulyā kumārī ca mandagā mandavāhinī

हिन्दी अर्थ

जलके बिना इस विश्वकी सृष्टि हो ही नहीं सकती--ऐसा विचारकर लोकपितामह भगवान् ब्रह्माने एकाग्रचित्त होकर भगवान् सूर्यकी स्तुति आरम्भ की।

English

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अध्याय ५७

श्लोक 30

कृपा पलाशिनी चैव शुक्तिमत्प्रभवाः स्मृताः ।सर्वाः पुण्याः सरस्वत्यः सर्वा गङ्गाः समुद्रगाः

kṛpā palāśinī caiva śuktimatprabhavāḥ smṛtāḥ / sarvāḥ puṇyāḥ sarasvatyaḥ sarvā gaṅgāḥ samudragāḥ

हिन्दी अर्थ

ब्रह्माजी बोले--यह सब कुछ जिनका स्वरूप है, जो सर्वमय हैं, सम्पूर्ण विश्व जिनका शरीर है, जो परम ज्योतिःस्वरूप हैं तथा योगीजन जिनका ध्यान करते हैं, उन भगवान् सूर्यको मैं नमस्कार करता हूँ। जो ऋग्वेदमय हैं, यजुर्वेदके अधिष्ठान हैं, सामवेदकी योनि हैं, जिनकी शक्तिका चिन्तन नहीं हो सकता, जो स्थूलरूपमें तीन वेदमय हैं और सूक्ष्मरूपमें

English

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अध्याय ५७

श्लोक 32

३१ ॥ प्रावृट्कालवहाः सन्ति सदाकालवहाश्च याः ।मत्स्याश्वकूटाः कुल्याश्च कुन्तलाः काशिकोशलाः

31 // prāvṛṭkālavahāḥ santi sadākālavahāśca yāḥ / matsyāśvakūṭāḥ kulyāśca kuntalāḥ kāśikośalāḥ

हिन्दी अर्थ

प्रणवकी अर्धमात्रा हैं तथा जो गुणोंसे परे एवं परब्रह्मस्वरूप हैं, उन भगवान् सूर्यको मेरा नमस्कार है। भगवन! आप सबके कारण, परम ज्ञेय, आदिपुरुष, परम ज्योति, ज्ञानातीतस्वरूप, देवतारूपसे स्थूल तथा परसे भी परे हैं। सबके आदि एवं प्रभाका विस्तार करनेवाले हैं, मैं आपको नमस्कार करता हूँ। आपकी जो आद्याशक्ति है, उसीकी प्रेरणासे मैं

English

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अध्याय ५७

श्लोक 33

अथर्वाश्चार्कलिङ्गाश्च मलकाश्च वृकैः सह ।मध्यदेश्या जनपदाः प्रायशो ऽमी प्रकीर्तिताः

atharvāścārkaliṅgāśca malakāśca vṛkaiḥ saha / madhyadeśyā janapadāḥ prāyaśo 'mī prakīrtitāḥ

हिन्दी अर्थ

पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, उनके देवता तथा प्रणव आदिसे युक्त समस्त सृष्टिकी रचना करता

English

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अध्याय ५७

श्लोक 34

सह्यस्य चोत्तरे या तु यत्र गोदावरी नदी ।पृथिव्यामपि कृतस्त्रायां स प्रदेशो मनोरमः

sahyasya cottare yā tu yatra godāvarī nadī / pṛthivyāmapi kṛtastrāyāṃ sa pradeśo manoramaḥ

हिन्दी अर्थ

हूँ। इसी प्रकार पालन और संहार भी मैं उस आद्याशक्तिकी प्रेरणासे ही करता हूँ, अपनी इच्छासे नहीं। भगवन्! आप ही अग्निस्वरूप हैं। आप जब जल सोख लेते हैं, तब मैं पृथ्वी तथा जगत्की सृष्टि करता हूँ। आप ही सर्वव्यापी एवं आकाशस्वरूप हैं तथा आप ही इस पाज्वभौतिक जगतका पूर्णरूपसे पालन करते हैं। सूर्यदेव! परमात्मतत्त्वके ज्ञाता विद्वान्

English

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अध्याय ५७

श्लोक 35

गोवर्धनं पुरं रम्यं भार्गवस्य महात्मनः ।वाह्लीका वाटधानाश्च आभीराः कालतोयकाः

govardhanaṃ puraṃ ramyaṃ bhārgavasya mahātmanaḥ / vāhlīkā vāṭadhānāśca ābhīrāḥ kālatoyakāḥ

हिन्दी अर्थ

पुरुष सर्वयज्ञमय विष्णुस्वरूप आपका ही यज्ञोंद्वारा यजन करते हैं तथा अपनी मुक्तिकी इच्छा रखनेवाले जितेन्द्रिय यति आप सर्वेश्वर परमात्माका ही ध्यान करते हैं। देवस्वरूप आपको नमस्कार है। यज्ञरूप आपको प्रणाम है। योगियोंके ध्येय परब्रह्मयस्वरूप आपको नमस्कार है। प्रभो! मैं सृष्टि करनेके लिये उद्यत हूँ और आपका यह तेज:पुज्ज सृष्टिका

English

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अध्याय ५७

श्लोक 36

अपरान्ताश्च शूद्राश्च पल्लवाश्चर्मखण्डिकाः ।गान्धारा गबलाश्चैव सिन्धुसौवीरमद्रकाः

aparāntāśca śūdrāśca pallavāścarmakhaṇḍikāḥ / gāndhārā gabalāścaiva sindhusauvīramadrakāḥ

हिन्दी अर्थ

विनाशक हो रहा है; अत: अपने इस तेजको समेट लीजिये।

English

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अध्याय ५७

श्लोक 37

शतद्रुजाः कलिङ्गाश्च पारदा हालमूषिकाः ।माठरा बहुभद्राश्च कैकेया दशमालिकाः

śatadrujāḥ kaliṅgāśca pāradā hālamūṣikāḥ / māṭharā bahubhadrāśca kaikeyā daśamālikāḥ

हिन्दी अर्थ

मार्कण्डेयजी कहते हैं--सृष्टिकर्ता ब्रह्माजीके इस प्रकार स्तुति करनेपर भगवान् सूर्यने अपने महान् तेजको समेटकर स्वल्प तेजको ही धारण किया, तब ब्रह्माजीने पूर्वकल्पान्तरोंके अनुसार जगत्की सृष्टि आरम्भ की। महामुने! ब्रह्माजीने पहलेकी ही भाँति

English

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अध्याय ५७

श्लोक 38

क्षत्रियोपनिवेशाश्च वैश्यशूद्रकुलानि च ।काम्बोजा दरदाश्चैव वर्वरा हर्षवर्धनाः

kṣatriyopaniveśāśca vaiśyaśūdrakulāni ca / kāmbojā daradāścaiva varvarā harṣavardhanāḥ

हिन्दी अर्थ

अदितिके गर्भसे भगवान् सूर्यका अवतार

English

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अध्याय ५७

श्लोक 39

चीनाश्चैव तुखाराश्च बहुला बाह्यतोनराः ।आत्रेयाश्च भरद्वाजाः पुष्कलाश्च कशेरुकाः

cīnāścaiva tukhārāśca bahulā bāhyatonarāḥ / ātreyāśca bharadvājāḥ puṣkalāśca kaśerukāḥ

हिन्दी अर्थ

मार्कण्डेयजी कहते हैं--मुने! इस जगत्की सृष्टि करके ब्रह्माजीने पूर्वकल्पोंके अनुसार वर्ण, आश्रम, समुद्र, पर्वत और द्वीपोंका विभाग किया। देवता, हैत्य तथा सर्प आदिके रूप और स्थान भी पहलेकी ही भाँति बनाये। ब्रह्माजीके मरीचि नामसे विख्यात जो पुत्र थे, उनके पुत्र कश्यप हुए। उनकी तेरह पत्नियाँ हुईं, वे सब-की-सब प्रजापति

English

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अध्याय ५७

श्लोक 40

लम्पाकाः शूलकाराश्च चूलिका जागुडैः सह ।औषधाश्चानिमद्राश्च किरातानाञ्च जातयः

lampākāḥ śūlakārāśca cūlikā jāguḍaiḥ saha / auṣadhāścānimadrāśca kirātānāñca jātayaḥ

हिन्दी अर्थ

दक्षकी कन्याएँ थीं। उनसे देवता, हैत्य और नाग आदि बहुत-से पुत्र उत्पन्न हुए। अदितिने त्रिभुवनके स्वामी देवताओंको जन्म दिया। दितिने हैत्योंको तथा दनुने महापराक्रमी एवं भयानक दानवोंको उत्पन्न किया। विनतासे गरुड और अरुण--दो पुत्र हुए। खसाके पुत्र यक्ष और राक्षस हुए। कद्रूने नागोंको और मुनिने गन्धर्वोको जन्म दिया। क्रोधासे कुल्याएँ

English

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अध्याय ५७

श्लोक 41

तामसा हंसमार्गाश्च काश्मीरास्तुङ्गनास्तथा ।शूलिकाः कुहकाश्चैव ऊर्णा दर्वास्तथैव च

tāmasā haṃsamārgāśca kāśmīrāstuṅganāstathā / śūlikāḥ kuhakāścaiva ūrṇā darvāstathaiva ca

हिन्दी अर्थ

तथा अरिष्टासे अप्सराएँ उत्पन्न हुईं। इराने ऐरावत आदि हाथियोंको उत्पन्न किया। ताम्राके गर्भसे श्येनी आदि कन्याएँ पैदा हुईं। उन्हींके पुत्र श्येन (बाज), भास और शुक आदि पक्षी हुए। इलासे वृक्ष तथा प्रधासे जलजन्तु उत्पन्न हुए। कश्यप मुनिके अदितिके गर्भसे जो सन्तानें हुईं, उनके पुत्र-पौत्र, दौहित्र तथा उनके भी पुत्रों आदिसे यह सारा संसार व्याप्त है।

English

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अध्याय ५७

श्लोक 42

एते देशा ह्युदीच्यास्तु प्राच्यान्देशान्निबोध मे ।अध्रारका मुदकरा अन्तर्गिर्या बहिर्गिराः

ete deśā hyudīcyāstu prācyāndeśānnibodha me / adhrārakā mudakarā antargiryā bahirgirāḥ

हिन्दी अर्थ

कश्यपके पुत्रोंमें देवता प्रधान हैं। इनमें कुछ तो सात्त्विक हैं, कुछ राजस हैं और कुछ तामस हैं। ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ परमेष्ठी प्रजापति ब्रह्माजीने देवताओंको यज्ञभागका भोक्ता तथा त्रिभुवनका स्वामी बनाया; परन्तु उनके सौतेले भाई हैत्यों, दानवों और राक्षसोंने एक साथ मिलकर उन्हें कष्ट पहुँचाना आरम्भ कर दिया। इस कारण एक हजार दिव्य वर्षोतक उनमें

English

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अध्याय ५७

श्लोक 43

यथा प्रवङ्गा रङ्गेया मानदा मानवर्तिकाः ।ब्राह्मोत्तराः प्रविजया भार्गवा ज्ञेयमल्लकाः

yathā pravaṅgā raṅgeyā mānadā mānavartikāḥ / brāhmottarāḥ pravijayā bhārgavā jñeyamallakāḥ

हिन्दी अर्थ

बड़ा भयड्कर युद्ध हुआ। अन्तमें देवता पराजित हुए और बलवान हैत्यों तथा दानवोंको विजय प्राप्त हुई। अपने पुत्रोंको हैत्यों और दानवोंके द्वारा पराजित एवं त्रिभुवनके राज्याधिकारसे वज्चित तथा उनका यज्ञभाग छिन गया देख माता अदिति अत्यन्त शोकसे पीड़ित हो गयीं। उन्होंने भगवान् सूर्यकी आराधनाके लिये महान् यत्न आरम्भ किया। वे

English

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अध्याय ५७

श्लोक 44

प्राग्ज्योतिषाश्च मद्राश्च विदेहास्ताम्रलिप्तकाः ।मल्ला मगधगोमन्ताः प्राच्या जनपदाः स्मृताः

prāgjyotiṣāśca madrāśca videhāstāmraliptakāḥ / mallā magadhagomantāḥ prācyā janapadāḥ smṛtāḥ

हिन्दी अर्थ

नियमित आहार करती हुई कठोर नियमोंका पालन और आकाशमें स्थित तेजोराशि भगवान् सूर्यका स्तवन करने लगीं।

English

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अध्याय ५७

श्लोक 45

अथापरे जनपदा दक्षिणापथवासिनः ।पुण्ड्राश्च केवलाश्चैव गोलाङ्गूलास्तथैव च

athāpare janapadā dakṣiṇāpathavāsinaḥ / puṇḍrāśca kevalāścaiva golāṅgūlāstathaiva ca

हिन्दी अर्थ

अदिति बोलीं--भगवन्! आप अत्यन्त सूक्ष्म सुनहरी आभासे युक्त दिव्य शरीर धारण करते हैं, आपको नमस्कार है। आप तेजःस्वरूप, तेजस्वियोंके ईश्वर, तेजके आधार एवं सनातन पुरुष हैं; आपको प्रणाम है। गोपते! आप जगत्का उपकार करनेके लिये जब अपनी किरणोंसे पृथ्वीका जल ग्रहण करते हैं, उस समय आपका जो तीच्र रूप प्रकट होता

English

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अध्याय ५७

श्लोक 46

शैलूषा मूषिकाश्चैव कुसुमा नामवासकाः ।महाराष्ट्रा माहिषका कलिङ्गाश्चैव सर्वशः

śailūṣā mūṣikāścaiva kusumā nāmavāsakāḥ / mahārāṣṭrā māhiṣakā kaliṅgāścaiva sarvaśaḥ

हिन्दी अर्थ

है, उसे मैं नमस्कार करती हूँ। आठ महीनोंतक सोममय रसको ग्रहण करनेके लिये आप जो अत्यन्त तीव्र-रूप धारण करते हैं, उसे मैं प्रणाम करती हूँ। भास्कर! उसी सम्पूर्ण रसको बरसानेके लिये जब आप छोड़नेको उद्यत होते हैं, उस समय आपका जो तृप्तिकारक मेघरूप प्रकट होता है, उसको मेरा नमस्कार है। इस प्रकार जलकी वर्षसे उत्पन्न हुए सब

English

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अध्याय ५७

श्लोक 47

आभीराः सह वैशिक्या आढक्याः शबराश्च ये ।पुलिन्दा विन्ध्यमौलेया वैदर्भा दण्डकैः सह

ābhīrāḥ saha vaiśikyā āḍhakyāḥ śabarāśca ye / pulindā vindhyamauleyā vaidarbhā daṇḍakaiḥ saha

हिन्दी अर्थ

प्रकारके अन्नोंको पकानेके लिये आप जो भास्कर-रूप धारण करते हैं, उसे मैं प्रणाम करती

English

Gandharas,** the Kliai^.8a^.ira.ra^ia,tt the Yaudheyag +! and the Dasameyas,§§ the Rajaiiyas,|||| and the S'^yamfikas,^!

अध्याय ५७

श्लोक 48

पौरिका मौलिकाश्चैव अश्मका भोगवर्धनाः ।नैषिकाः कुन्तला अन्धा उदिभदा वनदारकाः

paurikā maulikāścaiva aśmakā bhogavardhanāḥ / naiṣikāḥ kuntalā andhā udibhadā vanadārakāḥ

हिन्दी अर्थ

हूँ। तरणे! जड़हन धानकी वृद्धिके लिये जो आप पाला गिराने आदिके कारण अत्यन्त शीतल रूप धारण करते हैं, उसको मेरा नमस्कार है। सूर्यदेव! वसन्‍्त ऋतुमें जो आपका सौम्य-रूप प्रकट होता है, जिसमें न अधिक गर्मी होती है न अधिक सर्दी, उसे मेरा बारंबार नमस्कार है। जो सम्पूर्ण देवताओं तथा पितरोंको तृप्त करनेवाला और अनाजको

English

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अध्याय ५७

श्लोक 49

दाक्षिणात्यास्त्वमी देशा अपरान्तान् निबोध मे ।सूर्पारकाः कालिबला दुर्गाश्चानीकटैः सह

dākṣiṇātyāstvamī deśā aparāntān nibodha me / sūrpārakāḥ kālibalā durgāścānīkaṭaiḥ saha

हिन्दी अर्थ

पकानेवाला है, आपके उस रूपको नमस्कार है। जो रूप लताओं और वृक्षोंका एकमात्र जीवनदाता तथा अमृतमय है, जिसे देवता और पितर पान करते हैं, आपके उस सोम- रूपको नमस्कार है। आपका यह विश्वमय स्वरूप ताप एवं तृप्ति प्रदान करनेवाले अग्नि और सोमके द्वारा व्याप्त है, आपको नमस्कार है। विभावसो! आपका जो रूप ऋक्, यजु

English

and the country of Ka^mira,* and the people of Abr Bara,t the DavadaB,^ and the Tvahganas,§ the Kula^g |

अध्याय ५७

श्लोक 50

पुलिन्दाश्च सुमीनाश्च रूपपाः स्वापदैः सह ।तथा कुरुमिनश्चैव सर्वे चैव कठाक्षराः

pulindāśca sumīnāśca rūpapāḥ svāpadaiḥ saha / tathā kuruminaścaiva sarve caiva kaṭhākṣarāḥ

हिन्दी अर्थ

और साममय तेजोंकी एकतासे इस विश्वको तपाता है तथा जो वेदत्रयीस्वरूप है, उसको मेरा नमस्कार है। तथा जो उससे भी उत्कृष्ट रूप है, जिसे '३४” कहकर पुकारा जाता है, जो अस्थूल, अनन्त और निर्मल है, उस सदात्माको नमस्कार है।

English

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अध्याय ५७

श्लोक 51

नासिक्यावाश्च ये चान्ये ये चैवोत्तरनर्मदाः ।भीरुकच्छाः समाहेयाः सह सारस्वतैरपि

nāsikyāvāśca ye cānye ye caivottaranarmadāḥ / bhīrukacchāḥ samāheyāḥ saha sārasvatairapi

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार देवी अदिति नियमपूर्वक रहकर दिन-रात सूर्यदेवकी स्तुति करने लगीं। उनकी आराधनाकी इच्छासे वे प्रतिदिन निराहार ही रहती थीं। तदनन्तर बहुत समय व्यतीत होनेपर भगवान् सूर्यने दक्षकन्या अदितिको आकाशें प्रत्यक्ष दर्शन दिया। अदितिने देखा, आकाशसे पृथ्वीतक तेजका एक महान् पुज्ज स्थित है। उद्दीप्त ज्वालाओंके कारण उसकी

English

pics, the Darvadas.tt and the Marakas.JJ and the Kuru{a8,§§

अध्याय ५७

श्लोक 52

काश्मीराश्च सुराष्ट्राश्च अवन्त्याश्चार्बुदैः सह ।इत्येते ह्यपरान्ताश्च शृणु विन्ध्यनिवासिनः

kāśmīrāśca surāṣṭrāśca avantyāścārbudaiḥ saha / ityete hyaparāntāśca śṛṇu vindhyanivāsinaḥ

हिन्दी अर्थ

ओर देखना कठिन हो रहा है। उन्हें देखकर देवी अदितिको बड़ा भय हुआ। वे बोलीं-- गोपते! आप मुझपर प्रसन्न हों। मैं पहले आकाशमें आपको जिस प्रकार देखती थी, वैसे आज नहीं देख पाती। इस समय यहाँ भूतलपर मुझे केवल तेजका समुदाय दिखायी दे रहा है। दिवाकर! मुझपर कृपा कीजिये, जिससे आपके रूपका दर्शन कर सकूँ। भक्तवत्सल

English

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अध्याय ५७

श्लोक 53

सरजाश्च करूषाश्च केरलाश्चोत्कलैः सह ।उत्तमर्णा दशार्णाश्च भोज्याः किष्किन्धकैः सह

sarajāśca karūṣāśca keralāścotkalaiḥ saha / uttamarṇā daśārṇāśca bhojyāḥ kiṣkindhakaiḥ saha

हिन्दी अर्थ

प्रभो! मैं आपकी भक्त हूँ, आप मेरे पुत्रोंकी रक्षा कीजिये। आप ही ब्रह्मा होकर इस विश्वकी सृष्टि करते हैं, आप ही पालन करनेके लिये उद्यत होकर इसकी रक्षा करते हैं तथा अन्तमें यह सब कुछ आपमें ही लीन होता है। सम्पूर्ण लोकमें आपके सिवा दूसरी कोई गति नहीं है। आप ही ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र, कुबेर, यम, वरुण, वायु, चन्द्रमा, अग्नि, आकाश,

English

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अध्याय ५७

श्लोक 54

तोशलाः कोशलाश्चैव त्रैपुरा वैदिशास्तथा ।तुम्बुरास्तुम्बुलाश्चैव पटवो नैषधेः सह

tośalāḥ kośalāścaiva traipurā vaidiśāstathā / tumburāstumbulāścaiva paṭavo naiṣadheḥ saha

हिन्दी अर्थ

पर्वत और समुद्र हैं। आपका तेज सबका आत्मा है। आपकी क्‍या स्तुति की जाय। यज्ञेश्वर! प्रतिदिन अपने कर्ममें लगे हुए ब्राह्मण भाँति-भाँतिके पदोंसे आपकी स्तुति करते हुए यजन करते हैं। जिन्होंने अपने चित्तको वशमें कर लिया है, वे योगनिष्ठ पुरुष योगमार्गसे आपका ही ध्यान करते हुए परमपदको प्राप्त होते हैं। आप विश्वको ताप देते, उसे पकाते, उसकी

English

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अध्याय ५७

श्लोक 55

अन्नजास्तुष्टिकाराश्च वीरहोत्रा ह्यवन्तयः ।एते जनपदाः सर्वे विन्ध्यपृष्ठनिवासिनः

annajāstuṣṭikārāśca vīrahotrā hyavantayaḥ / ete janapadāḥ sarve vindhyapṛṣṭhanivāsinaḥ

हिन्दी अर्थ

रक्षा करते और उसे भस्म कर डालते हैं; फिर आप ही जलगर्भित शीतल किरणोंद्वारा इस विश्वको प्रकट करते और आनन्द देते हैं। कमलयोनि ब्रह्माके रूपमें आप ही सृष्टि करते हैं। अच्युत (विष्णु) नामसे आप ही पालन करते हैं तथा कल्पान्तमें रुद्र-रूप धारण करके आप ही सम्पूर्ण जगत्का संहार करते हैं।

English

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अध्याय ५७

श्लोक 56

अतो देशान् प्रवक्ष्यामि पर्वताश्रयिणश्च ये ।नीहारा हंसमार्गाश्च कुरवो गुर्गणाः खसाः

ato deśān pravakṣyāmi parvatāśrayiṇaśca ye / nīhārā haṃsamārgāśca kuravo gurgaṇāḥ khasāḥ

हिन्दी अर्थ

मार्कण्डेयजी कहते हैं--तदनन्तर भगवान् सूर्य अपने उस तेजसे प्रकट हुए। उस समय वे तपाये हुए ताँबेके समान कान्तिमान् दिखायी देते थे। देवी अदिति उनका दर्शन

English

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अध्याय ५७

श्लोक 57

कुन्तप्रावरणाश्चैव ऊर्णा दार्वाः सकृत्रकाः ।त्रिगर्ता गालवाश्चैव किरातास्तामसैः सह

kuntaprāvaraṇāścaiva ūrṇā dārvāḥ sakṛtrakāḥ / trigartā gālavāścaiva kirātāstāmasaiḥ saha

हिन्दी अर्थ

करके चरणोंमें गिर पड़ीं। तब भगवान् सूर्यने कहा--'देवि! तुम्हारी जो इच्छा हो, वह वर मुझसे माँग लो।” तब देवी अदिति घुटनेके बलसे पृथ्वीपर बैठ गयीं और मस्तक नवाकर प्रणाम करके वरदायक भगवान् सूर्यसे बोलीं--“देव! आप प्रसन्न हों। अधिक बलवान हैत्यों और दानवोंने मेरे पुत्रोंके हाथसे त्रिभुवनका राज्य और यज्ञभाग छीन लिये हैं। गोपते! उन्हें

English

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अध्याय ५७

श्लोक 58

कृतत्रेतादिकश्चात्र चतुर्युगकृतो विधिः ।एतत्तु भारतं वर्षं चतुः संस्थानसंस्थितम्

kṛtatretādikaścātra caturyugakṛto vidhiḥ / etattu bhārataṃ varṣaṃ catuḥ saṃsthānasaṃsthitam

हिन्दी अर्थ

प्राप्त करानेके निमित्त आप मुझपर कृपा करें। आप अपने अंशसे देवताओंके बन्धु होकर उनके शत्रुओंका नाश करें। प्रभो! आप ऐसी कृपा करें, जिससे मेरे पुत्र पुनः: यज्ञभागके भोक्ता तथा त्रिभुवनके स्वामी हो जायाँ।'

English

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अध्याय ५७

श्लोक 59

दक्षिणापरतो ह्यस्य पूर्वेण च महोदधिः ।हिमवानुत्तरेणास्य कार्मुकस्य यथा गुणः

dakṣiṇāparato hyasya pūrveṇa ca mahodadhiḥ / himavānuttareṇāsya kārmukasya yathā guṇaḥ

हिन्दी अर्थ

तब भगवान् सूर्यने अदितिसे प्रसन्न होकर कहा--'देवि! मैं अपने सहस्न अंशोंसहित तुम्हारे गर्भसे अवतीर्ण होकर तुम्हारे पुत्रके शत्रुओंका नाश करूँगा।' इतना कहकर भगवान् सूर्य अन्तर्धान हो गये और अदिति भी सम्पूर्ण मनोरथ सिद्ध हो जानेके कारण तपस्यासे निवृत्त हो गयीं। तदनन्तर सूर्यकी सुषुम्णा नामवाली किरण, जो सहस्र किरणोंका समुदाय

English

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अध्याय ५७

श्लोक 60

तदेतद् भारतं वर्षं सर्वबीजं द्विजोत्तम ।ब्रह्मत्वममरेशत्वं देवत्वं मरुतस्तथा

tadetad bhārataṃ varṣaṃ sarvabījaṃ dvijottama / brahmatvamamareśatvaṃ devatvaṃ marutastathā

हिन्दी अर्थ

थी, देवमाता अदितिके गर्भमें अवतीर्ण हुई। देवमाता अदिति एकाग्रचित्त हो कृच्छु और चान्द्रायण आदि व्रतोंका पालन करने लगीं और अत्यन्त पवित्रतापूर्वक उस गर्भको धारण किये रहीं, यह देख महर्षि कश्यपने कुछ कुपित होकर कहा--“तुम नित्य उपवास करके अपने गर्भके बच्चेको क्‍यों मारे डालती हो?” यह सुनकर उसने कहा--'देखिये, यह रहा

English

the Vana-rashtrakas,! the Sairishthas,** the Bi-ahma.

अध्याय ५७

श्लोक 61

मृगपश्वप्सरोयोनिस्तद्वत् सर्वे सरीसृपाः ।स्थावराणाञ्च सर्वेषामितो ब्रह्मन् ! शुभाशुभैः

mṛgapaśvapsaroyonistadvat sarve sarīsṛpāḥ / sthāvarāṇāñca sarveṣāmito brahman ! śubhāśubhaiḥ

हिन्दी अर्थ

गर्भका बच्चा; मैंने इसे मारा नहीं है, यह स्वयं ही अपने शत्रुओंको मारनेवाला होगा।'

English

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अध्याय ५७

श्लोक 62

प्रयाति कर्मभूर्ब्रह्मन् ! नान्या लोकेषु विद्यते ।देवानामपि विप्रर्षे ! सदा एष मनोरथः

prayāti karmabhūrbrahman ! nānyā lokeṣu vidyate / devānāmapi viprarṣe ! sadā eṣa manorathaḥ

हिन्दी अर्थ

यों कहकर देवी अदितिने उस गर्भको उदरसे बाहर कर दिया। वह अपने तेजसे प्रज्वलित हो रहा था। उदयकालीन सूर्यके समान तेजस्वी उस गर्भको देखकर कश्यपने प्रणाम किया और आदि ऋचाओंके द्वारा आदरपूर्वक उसकी स्तुति की। उनके स्तुति करनेपर शिशुरूपधारी सूर्य उस अण्डाकार गर्भसे प्रकट हो गये। उनके शरीरकी कान्ति

English

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अध्याय ५७

श्लोक 63

अपि मानुष्यमाप्स्यामो देवत्वात् प्रच्युताः क्षितौ ।मनुष्यः कुरुते तत्तु यन्न शक्यं सुरासुरैः

api mānuṣyamāpsyāmo devatvāt pracyutāḥ kṣitau / manuṣyaḥ kurute tattu yanna śakyaṃ surāsuraiḥ

हिन्दी अर्थ

कमलपत्रके समान श्याम थी। वे अपने तेजसे सम्पूर्ण दिशाओंका मुख उज्ज्वल कर रहे थे। तदनन्तर मुनिश्रेष्ठ कश्यपको सम्बोधित करके मेघके समान गम्भीर वाणीमें आकाशवाणी हुई--“मुने! तुमने अदितिसे कहा था कि इस अण्डेको क्यों मार रही है--उस समय तुमने मारितम्-अण्डम्” का उच्चारण किया था, इसलिये तुम्हारा यह पुत्र 'मार्तण्ड" के नामसे

English

! Rdjanya means a ‘‘kshattriya " or " noble," but here it seems to both* name of a people. 1 have not found it as such elsewhere. «

अध्याय ५७

श्लोक 64

तत्कर्मनिगडग्रस्तैः स्वकर्मख्यापनोत्सुकः ।न किञ्चित् क्रियते कर्म सुखलेशोपबृंहितैः

tatkarmanigaḍagrastaiḥ svakarmakhyāpanotsukaḥ / na kiñcit kriyate karma sukhaleśopabṛṃhitaiḥ

हिन्दी अर्थ

विख्यात होगा और शक्तिशाली होकर सूर्यके अधिकारका पालन करेगा; इतना ही नहीं, यह यज्ञभागका अपहरण करनेवाले देवशत्रु असुरोंका संहार भी करेगा।”

English

! Rdjanya means a ‘‘kshattriya " or " noble," but here it seems to both* name of a people. 1 have not found it as such elsewhere. «

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_mArkaNDeyapurANa1-93.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Markandeya Purana — Chapter 57
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

Numbering follows the imported source and may differ from other editions.