Markandeya Purana· Mārkaṇḍeya Purāṇa
58
अध्याय 58 / 90

Adhyaya 58

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अध्याय ५८

श्लोक 1

इति श्रीमार्कण्डेयपुराणेठनद्यादिवर्णनऽ नाम सप्तपञ्चाशो ऽध्यायः अष्टपञ्चाशो ऽध्यायः- ५८ क्रौष्टुकिरुवाच भगवन् ! कथितं सम्यक् भवता भारतं मम ।सरितः पर्वता देशा ये च तत्र वसन्ति वै

iti śrīmārkaṇḍeyapurāṇeṭhanadyādivarṇana' nāma saptapañcāśo 'dhyāyaḥ aṣṭapañcāśo 'dhyāyaḥ- 58 krauṣṭukiruvāca bhagavan ! kathitaṃ samyak bhavatā bhārataṃ mama / saritaḥ parvatā deśā ye ca tatra vasanti vai

हिन्दी अर्थ

यह आकाशवाणी सुनकर देवताओंको बड़ा हर्ष हुआ और दानव बलहीन हो गये; तब इन्द्रने हैत्योंको युद्धके लिये ललकारा। दानव भी उनका सामना करनेके लिये आ पहुँचे।

English

srahddausthyena road grahddaui^thyena*

अध्याय ५८

श्लोक 2

किन्तु कूर्मस्त्वया पूर्वं भारते भगवान् हरिः ।कथितस्तस्य संस्थानं श्रोतुमिच्छाम्यशेषतः

kintu kūrmastvayā pūrvaṃ bhārate bhagavān hariḥ / kathitastasya saṃsthānaṃ śrotumicchāmyaśeṣataḥ

हिन्दी अर्थ

फिर तो देवताओंका असुरोंके साथ घोर संग्राम हुआ। उनके अस्त्र-शस्त्रोंकी चमकसे तीनों लोकोंमें प्रकाश छा गया। उस युद्धमें भगवान् सूर्यकी क्रूर दृष्टि पड़ने तथा उनके तेजसे दग्ध होनेके कारण सब असुर जलकर भस्म हो गये। अब तो देवताओंके हर्षकी सीमा न रही। उन्होंने तेजके उत्पत्तिस्थान भगवान् सूर्य और अदितिका स्तवन किया। उन्हें पूर्ववत् अपने

English

Earlier, in the account of Bharata, you described the blessed Hari as a tortoise. I now wish to hear fully about the form and extent of that tortoise.

अध्याय ५८

श्लोक 3

कथं स संस्थितो देवः कूर्मरूपी जनार्दनः ।शुभाशुभं मनुष्याणां व्यज्यते च ततः कथम् ।यथामुखं यथापादन्तस्य तद् ब्रूह्यशेषतः

kathaṃ sa saṃsthito devaḥ kūrmarūpī janārdanaḥ / śubhāśubhaṃ manuṣyāṇāṃ vyajyate ca tataḥ katham / yathāmukhaṃ yathāpādantasya tad brūhyaśeṣataḥ

हिन्दी अर्थ

अधिकार और यज्ञके भाग प्राप्त हो गये! भगवान् सूर्य भी अपने अधिकारका पालन करने लगे। वे नीचे और ऊपर फैली हुई किरणोंके कारण कदम्बपुष्पके समान सुशोभित हो रहे थे। उनका मण्डल गोलाकार अग्निपिण्डके समान है।

English

The P.iurava race was descended from Puru, one of Yaydti’s sons (M,-Bh,, Adi-P,, Ixxxv. 3533-4; and xcv. 3762-4) who is said to have got Madhya-doia (Hari-V., xxx. 1604 and 1619); and the Pauravag spread in various direc- tions. A Paurava kingdom is placed in the North ^gion, in the account of j Arjnna’s conquests there (Sabha-P., xxvi. 1022-6) and that may be the nation j intended here. There were also Panravas elsewhere {eg., Santi-P., xlu. ' 1790-2; and Adi-P., clxxxvi. 6995; but Sabha-P., xxx. 1164 is probably a mistake). |

अध्याय ५८

श्लोक 4

मार्कण्डेय उवाच प्राङ्मुखो भगवान् ! देवः कूर्मरूपी व्यवस्थितः ।आक्रम्य भारतं वर्षं नवभेदमिदं द्विज

mārkaṇḍeya uvāca prāṅmukho bhagavān ! devaḥ kūrmarūpī vyavasthitaḥ / ākramya bhārataṃ varṣaṃ navabhedamidaṃ dvija

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर भगवान् सूर्यको प्रसन्न करके प्रजापति विश्वकर्माने विनयपूर्वक अपनी संज्ञा नामकी कन्या उनको ब्याह दी। विवस्वानसे संज्ञाके गर्भसे वैवस्चत मनुका जन्म हुआ। वैवस्वत मनुकी विशेष कथा पहले ही बतलायी जा चुकी है।

English

Markandeya said: Facing east, the blessed Lord abides in the form of a tortoise, covering this ninefold region of Bharata, O twice-born one.

अध्याय ५८

श्लोक 5

नवधा संस्थितान्यस्य नक्षत्राणि समन्ततः ।विषयाश्च द्विजश्रेष्ठ ! ये सम्यक् तान्निबोध मे

navadhā saṃsthitānyasya nakṣatrāṇi samantataḥ / viṣayāśca dvijaśreṣṭha ! ye samyak tānnibodha me

हिन्दी अर्थ

सूर्यकी महिमाके प्रसड्में राजा राज्यवर्धनकी कथा

English

sinless never in a single place. Man experiences good or evil, which may arise from community of region, place and people, may arise peculiarly from himself, §§ or which may arise preservation is produced by the non-malignity |||1 of tho.pla-

अध्याय ५८

श्लोक 6

वेदमन्त्रा विमाण्डव्याः शाल्वनीपास्तथा शकाः ।उज्जिहानास्तथा वत्स ! घोषसंख्यास्तथा खसाः

vedamantrā vimāṇḍavyāḥ śālvanīpāstathā śakāḥ / ujjihānāstathā vatsa ! ghoṣasaṃkhyāstathā khasāḥ

हिन्दी अर्थ

क्रौष्टकि बोले--भगवन्! आपने आदिदेव भगवान् सूर्यके माहात्म्य और स्वरूपका विस्तारपूर्वक वर्णन किया। अब मैं उनकी महिमाका वर्णन सुनना चाहता हूँ। आप प्रसन्न होकर बतानेकी कृपा करें।

English

and the Gandharvas, T 0 brahman. These people are

अध्याय ५८

श्लोक 7

मध्ये सारस्वता मत्स्याः शूरसेनाः समाथुराः ।धर्मारण्या ज्योतिषिका गौरग्रीवा गुडाश्मकाः

madhye sārasvatā matsyāḥ śūrasenāḥ samāthurāḥ / dharmāraṇyā jyotiṣikā gauragrīvā guḍāśmakāḥ

हिन्दी अर्थ

मार्कण्डेयजीने कहा--ब्रह्मन! मैं तुम्हें आदिदेव सूर्यका माहात्म्य बताता हूँ, सुनो। पूर्वकालमें दमके पुत्र राज्यवर्धन बड़े विख्यात राजा हो गये हैं। वे अपने राज्यका धर्मपूर्वक पालन करते थे, इसीलिये वहाँके धन-जनकी दिनोदिन वृद्धि होने लगी। उस राजाके शासनकालमें समस्त राष्ट्र तथा नगरों और गाँवोंके लोग अत्यन्त स्वस्थ एवं प्रसन्न रहते थे।

English

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अध्याय ५८

श्लोक 8

कालकोटिसपाषण्डाः पारियात्रनिवासिनः ।कापिङ्गलाः कुरुर्बाह्यस्तथैवोडुम्बरा जनाः

kālakoṭisapāṣaṇḍāḥ pāriyātranivāsinaḥ / kāpiṅgalāḥ kururbāhyastathaivoḍumbarā janāḥ

हिन्दी अर्थ

वहाँ कभी कोई उत्पात नहीं होता था, रोग भी नहीं सताता था। साँपोंके काटनेका तथा अनावृष्टिका भय भी नहीं था। राजाने बड़े-बड़े यज्ञ किये। याचकोंको दान दिये और धर्मके अनुकूल रहकर विषयोंका उपभोग किया। इस प्रकार राज्य करते तथा प्रजाका भलीभाँति पालन करते हुए उस राजाके सात हजार वर्ष ऐसे बीत गये, मानो एक ही दिन व्यतीत हुआ

English

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अध्याय ५८

श्लोक 9

वैदेहकाः सपाञ्चालाः संकेताः कङ्कमारुताः ।गजाह्वयाश्च कूर्मस्य जलमध्यनिवासिनः

vaidehakāḥ sapāñcālāḥ saṃketāḥ kaṅkamārutāḥ / gajāhvayāśca kūrmasya jalamadhyanivāsinaḥ

हिन्दी अर्थ

हो। दक्षिण देशके राजा विदूरथकी पुत्री मानिनी राज्यवर्धनकी पत्नी थी। एक दिन वह सुन्दरी राजाके मस्तकमें तेल लगा रही थी। उस समय वह राजपरिवारके देखते-देखते आँसू बहाने लगी। रानीके आँसुओंकी बूँदें जब राजाके शरीरपर पड़ीं तो उसे मुखपर आँसू बहाती देख उन्होंने मानिनीसे पूछा--'देवि! यह क्या?” स्वामीके इस प्रकार पूछनेपर उस

English

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अध्याय ५८

श्लोक 10

कृत्तिका रोहिणी सौम्या एतेषां मध्यवासिनाम् ।नक्षत्रत्रितयं विप्र ! शुभाशुभविपाकदम्

kṛttikā rohiṇī saumyā eteṣāṃ madhyavāsinām / nakṣatratritayaṃ vipra ! śubhāśubhavipākadam

हिन्दी अर्थ

मनस्विनीने कहा--“कुछ नहीं।” जब राजाने बार-बार पूछा, तब उस सुन्दरीने राजाकी केशराशिमें एक पका बाल दिखाया और कहा--'राजन्! यह देखिये। क्या यह मुझ अभागिनीके लिये खेदका विषय नहीं है?” यह सुनकर राजा हँसने लगे। उन्होंने वहाँ एकत्रित हुए समस्त राजाओंके सामने अपनी पत्नीसे हँ कर कहा--'शुभे! शोककी क्या

English

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अध्याय ५८

श्लोक 11

वृषध्वजो ऽञ्जनश्चैव जम्ब्वाख्यो मानवाचलः ।शूर्पकर्णो व्याघ्रमुखः खर्मकः कर्वटाशनः

vṛṣadhvajo 'ñjanaścaiva jambvākhyo mānavācalaḥ / śūrpakarṇo vyāghramukhaḥ kharmakaḥ karvaṭāśanaḥ

हिन्दी अर्थ

बात है? तुम्हें रोना नहीं चाहिए। जन्म, वृद्धि और परिणाम आदि विकार सभी जीवधारियोंके होते हैं। मैंने तो समस्त वेदोंका अध्ययन किया, हजारों यज्ञ किये, ब्राह्मणोंको दान दिया और मेरे कई पुत्र भी हुए। अन्य मनुष्योंके लिये जो अत्यन्त दुर्लभ हैं, ऐसे उत्तम भोग भी मैंने तुम्हारे साथ भोग लिये। पृथ्वीका भलीभाँति पालन किया और युद्धमें

English

The P.iurava race was descended from Puru, one of Yaydti’s sons (M,-Bh,, Adi-P,, Ixxxv. 3533-4; and xcv. 3762-4) who is said to have got Madhya-doia (Hari-V., xxx. 1604 and 1619); and the Pauravag spread in various direc- tions. A Paurava kingdom is placed in the North ^gion, in the account of j Arjnna’s conquests there (Sabha-P., xxvi. 1022-6) and that may be the nation j intended here. There were also Panravas elsewhere {eg., Santi-P., xlu. ' 1790-2; and Adi-P., clxxxvi. 6995; but Sabha-P., xxx. 1164 is probably a mistake). |

अध्याय ५८

श्लोक 12

तथा चन्द्रेश्वराश्चैव खशाश्च मगधास्तथा ।गिरयो मैथिलाः शुभ्रास्तथा वदनदन्तुराः

tathā candreśvarāścaiva khaśāśca magadhāstathā / girayo maithilāḥ śubhrāstathā vadanadanturāḥ

हिन्दी अर्थ

भलीभाँति अपने धर्मको निभाया। भद्रे! और कौन-सा ऐसा शुभ कर्म है, जो मैंने नहीं किया। फिर इन पके बालोंसे तुम क्‍यों डरती हो। शुभे! मेरे बाल पक जाये, शरीरमें झुर्रियाँ पड़ जायेँ तथा यह देह भी शिथिल हो जाय, कोई चिन्ता नहीं है। मैं अपने कर्तव्यका पालन कर चुका हूँ। कल्याणी! तुमने मेरे मस्तकपर जो पका बाल दिखाया है, अब वनवास लेकर

English

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अध्याय ५८

श्लोक 13

प्राग्ज्योतिषाः सलौहित्याः सामुद्राः पुरुषादकाः ।पुर्णोत्कटो भद्रगौरस्तथोदयगिरिर्द्विज !

prāgjyotiṣāḥ salauhityāḥ sāmudrāḥ puruṣādakāḥ / purṇotkaṭo bhadragaurastathodayagirirdvija !

हिन्दी अर्थ

उसकी भी दवा करता हूँ। पहले बाल्यावस्था और कुमारावस्थामें तत्कालोचित कार्य किया जाता है, फिर युवावस्थामें यौवनोचित कार्य होते हैं तथा बुढ़ापेमें वनका आश्रय लेना उचित है। मेरे पूर्वजों तथा उनके भी पूर्वजोंने ऐसा ही किया है, अतः मैं तुम्हारे आँसू बहानेका कोई कारण नहीं देखता। पके बालका दिखायी देना तो मेरे लिये महान् अभ्युदयका कारण है।'

English

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अध्याय ५८

श्लोक 14

कशाया मेखलामुष्टास्ताम्रलिप्तैकपादपाः ।वर्धमाना कोशलाश्च मुखे कूर्मस्य संश्थिताः

kaśāyā mekhalāmuṣṭāstāmraliptaikapādapāḥ / vardhamānā kośalāśca mukhe kūrmasya saṃśthitāḥ

हिन्दी अर्थ

महाराजकी यह बात सुनकर वहाँ उपस्थित हुए अन्य राजा, पुरवासी तथा पार्श्चवर्ती मनुष्य उनसे शान्तिपूर्वक बोले--“राजन्! आपकी इन महारानीको रोनेकी आवश्यकता नहीं है। रोना तो हमलोगोंको अथवा समस्त प्राणियोंको चाहिए, क्योंकि आप हमें छोड़कर वनवास लेनेकी बात मुँहसे निकाल रहे हैं। महाराज! आपने हमारा लालन-पालन किया है।

English

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अध्याय ५८

श्लोक 15

रौद्रः पुनर्वसुः पुष्यो नक्षत्रत्रितयं मुखे ।पादे तु दक्षिणे देशाः क्रौष्टुके वदतः शृणु

raudraḥ punarvasuḥ puṣyo nakṣatratritayaṃ mukhe / pāde tu dakṣiṇe deśāḥ krauṣṭuke vadataḥ śṛṇu

हिन्दी अर्थ

आपके चले जानेकी बात सुनकर हमारे प्राण निकले जाते हैं। आपने सात हजार वर्षोतक इस पृथ्वीका पालन किया है। अब आप वनमें रहकर जो तपस्या करेंगे, वह इस पृथ्वी- पालनजनित पुण्यकी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं हो सकती।/

English

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अध्याय ५८

श्लोक 16

कलिङ्गवङ्गजठराः कोशला मूषिकास्तथा ।चेदयश्चोर्ध्वकर्णाश्च मत्स्याद्या विन्ध्यवासिनः

kaliṅgavaṅgajaṭharāḥ kośalā mūṣikāstathā / cedayaścordhvakarṇāśca matsyādyā vindhyavāsinaḥ

हिन्दी अर्थ

राजाने कहा--“मैंने सात हजार वर्षोतक इस पृथ्वीका पालन किया, अब मेरे लिये यह वनवासका समय आ गया। मेरे कई पुत्र हो गये। मेरी सन्‍्तानोंको देखकर थोड़े ही दिनोंमें यमराज मेरा यहाँ रहना नहीं सह सकेगा। नागरिको! मेरे मस्तकपर जो यह सफेद बाल दिखायी देता है, इसे अत्यन्त भयानक कर्म करनेवाली मृत्युका दूत समझो; अतः मैं

English

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अध्याय ५८

श्लोक 17

विदर्भा नारिकेलाश्च धर्मद्वीपास्तथैलिकाः ।व्याघ्रग्रीवा महाग्रीवास्त्रैपुराः श्मश्रुधारिणः

vidarbhā nārikelāśca dharmadvīpāstathailikāḥ / vyāghragrīvā mahāgrīvāstraipurāḥ śmaśrudhāriṇaḥ

हिन्दी अर्थ

राज्यपर अपने पुत्रका अभिषेक करके सब भोगोंको त्याग दूँगा और वनमें रहकर तपस्या करूँगा। जबतक यमराजके सैनिक नहीं आते, तभीतक यह सब कुछ मुझे कर लेना है।

English

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अध्याय ५८

श्लोक 18

कैष्किन्ध्या हैमकूटाश्च निषधाः कटकस्थलाः ।दशार्णाहारिका नग्ना निषादाः काकुलालकाः

kaiṣkindhyā haimakūṭāśca niṣadhāḥ kaṭakasthalāḥ / daśārṇāhārikā nagnā niṣādāḥ kākulālakāḥ

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर वनमें जानेकी इच्छासे महाराजने ज्योतिषियोंको बुलाया और पुत्रके राज्याभिषेकके लिये शुभ दिन एवं लग्न पूछे। राजाकी बात सुनकर वे शास्त्रदर्शी ज्योतिषी व्याकुल हो गये। उन्हें दिन, लग्न और होरा आदिका ठीक ज्ञान न हो सका। तदनन्तर अन्य नगरों, अधीनस्थ राज्यों तथा उस नगरसे भी बहुत-से श्रेष्ठ ब्राह्मण आये और वनमें जानेके

English

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अध्याय ५८

श्लोक 19

तथैव पर्णशबराः पादे वै पूर्वदक्षिणे ।आश्लेषर्क्षं तथा पैत्र्यं फाल्गुण्यः प्रथदमास्तथा

tathaiva parṇaśabarāḥ pāde vai pūrvadakṣiṇe / āśleṣarkṣaṃ tathā paitryaṃ phālguṇyaḥ prathadamāstathā

हिन्दी अर्थ

लिये उत्सुक राजा राज्यवर्धनसे मिले। उस समय उनका माथा काँप उठा। वे बोले --'राजन्! हमपर प्रसन्न होइये और पहलेकी भाँति अब भी हमारा पालन कीजिये। आपके वन चले जानेपर समस्त जगत् सड्बकटमें पड़ जायगा; अतः: आप ऐसा यत्न करें, जिससे जगत्को कष्ट न हो।'

English

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अध्याय ५८

श्लोक 20

नक्षत्रत्रितयं पादमाश्रितं पूर्वदक्षिणम् ।लङ्का कालाजिनाश्चैव शैलिका निकटास्तथा

nakṣatratritayaṃ pādamāśritaṃ pūrvadakṣiṇam / laṅkā kālājināścaiva śailikā nikaṭāstathā

हिन्दी अर्थ

इसके बाद मन्त्रियों, सेवकों, वृद्ध नागरिकों और ब्राह्मणोंने मिलकर सलाह की, “अब यहाँ क्या करना चाहिए?” राजा राज्यवर्धन अत्यन्त धार्मिक थे। उनके प्रति सब लोगोंका अनुराग था; इसलिये सलाह करनेवाले लोगोंमें यह निश्चय हुआ कि “हम सब लोग एकाग्रचित्त एवं भलीभाँति ध्यानपरायण होकर तपस्याद्वारा भगवान् सूर्यकी आराधना

English

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अध्याय ५८

श्लोक 21

महेन्द्रमलयाद्रौ च दुर्दुरे च वसन्ति ये ।कर्कोटकवने ये च भृगुकच्छाः सकोङ्कणा

mahendramalayādrau ca durdure ca vasanti ye / karkoṭakavane ye ca bhṛgukacchāḥ sakoṅkaṇā

हिन्दी अर्थ

करके इन महाराजके लिये आयुकी प्रार्थना करें।” इस प्रकार एक निश्चय करके कुछ लोग अपने घरोंपर विधिपूर्वक अर्घ्य, उपचार आदि उपहारोंसे भगवान् भास्करकी पूजा करने लगे। दूसरे लोग मौन रहकर ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदके जपसे सूर्यदेवको सन्तुष्ट करने लगे। अन्य लोग निराहार रहकर नदीके तटपर निवास करते हुए तपस्याके द्वारा भगवान्

English

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अध्याय ५८

श्लोक 22

सर्वाश्चैव तथाभीरा वेण्यास्तीरनिवासिनः ।अवन्तयो दासपुरास्तथैवाकणिनो जनाः

sarvāścaiva tathābhīrā veṇyāstīranivāsinaḥ / avantayo dāsapurāstathaivākaṇino janāḥ

हिन्दी अर्थ

सूर्यकी आराधनामें लग गये। कुछ लोग अग्निहोत्र करते, कुछ दिन-रात सूर्यसूक्तका पाठ करते और कुछ लोग सूर्यकी ओर दृष्टि लगाकर खड़े रहते थे।

English

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अध्याय ५८

श्लोक 23

महाराष्ट्राः सकर्णाटा गोनर्दाश्चित्रकूटकाः ।चोलाः कोलगिराश्चैव क्रौञ्चद्वीपजटाधराः

mahārāṣṭrāḥ sakarṇāṭā gonardāścitrakūṭakāḥ / colāḥ kolagirāścaiva krauñcadvīpajaṭādharāḥ

हिन्दी अर्थ

सूर्यकी आराधनाके लिये इस प्रकार यत्न करनेवाले उन लोगोंके समीप आकर सुदामा नामक गन्धर्वने कहा--'द्विजवरो! यदि आपलोगोंको सूर्यदेवकी आराधना अभीष्ट है तो

English

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अध्याय ५८

श्लोक 24

कावेरी ऋष्यमूकस्था नासिक्याश्चैव ये जनाः ।शङ्खशुक्त्यादिवैदूर्यशैलप्रान्तचराश्च ये

kāverī ṛṣyamūkasthā nāsikyāścaiva ye janāḥ / śaṅkhaśuktyādivaidūryaśailaprāntacarāśca ye

हिन्दी अर्थ

ऐसा कीजिये, जिससे भगवान् भास्कर प्रसन्न हो सकें। आपलोग यहाँसे शीघ्र ही कामरूप पर्वतपर जाइये। वहाँ गुरुविशाल नामक वन है, जिसमें सिद्ध पुरुष निवास करते हैं। वहाँपर एकाग्रचित्त होकर आपलोग सूर्यकी आराधना करें। वह परम हितकारी सिद्ध क्षेत्र है। वहाँ आपलोगोंकी सब कामनाएँ पूर्ण होंगी।'

English

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अध्याय ५८

श्लोक 25

तथा वारिचराः कोलाः चर्मपट्टनिवासिनः ।गणबाह्याः पराः कृष्णा द्वीपवासनिवासिनः

tathā vāricarāḥ kolāḥ carmapaṭṭanivāsinaḥ / gaṇabāhyāḥ parāḥ kṛṣṇā dvīpavāsanivāsinaḥ

हिन्दी अर्थ

सुदामाकी यह बात सुनकर वे समस्त द्विज गुरुविशाल वनमें गये। वहाँ उन्होंने सूर्यदेवका पवित्र एवं सुन्दर मन्दिर देखा। उस स्थानपर ब्राह्मण आदि तीनों वर्णोंके लोग मिताहारी एवं एकाग्रचित्त हो पुष्प, चन्दन, धूप, गन्ध, जप, होम, अन्न और दीप आदिके द्वारा भगवान् सूर्यकी पूजा एवं स्तुति करने लगे।

English

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अध्याय ५८

श्लोक 26

सूर्याद्रौ कुमुदाद्रौ च ते वसन्ति तथा जनाः ।औखावनाः सपिशिकास्तथा ये कर्मनायकाः

sūryādrau kumudādrau ca te vasanti tathā janāḥ / aukhāvanāḥ sapiśikāstathā ye karmanāyakāḥ

हिन्दी अर्थ

ब्राह्मण बोले--देवता, दानव, यक्ष, ग्रह और नक्षत्रोंमें भी जो सबसे अधिक तेजस्वी हैं, उन भगवान् सूर्यकी हम शरण लेते हैं। जो देवेश्वर भगवान् सूर्य आकाशमें स्थित होकर चारों ओर प्रकाश फैलाते तथा अपनी किरणोंसे पृथ्वी और आकाशको व्याप्त किये रहते हैं, उनकी हम शरण लेते हैं। आदित्य, भास्कर, भानु, सविता, दिवाकर, पूषा, अर्यमा, स्वर्भानु

English

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अध्याय ५८

श्लोक 27

तक्षिणाः कौरुषा ये च ऋषिकास्तापसाश्रमाः ।ऋषभाः सिहलाश्चैव तथा काञ्चीनिवासिनः

takṣiṇāḥ kauruṣā ye ca ṛṣikāstāpasāśramāḥ / ṛṣabhāḥ sihalāścaiva tathā kāñcīnivāsinaḥ

हिन्दी अर्थ

तथा दीप्त-दीधिति--ये जिनके नाम हैं, जो चारों युगोंका अन्त करनेवाले कालानिन हैं, जिनकी ओर देखना कठिन है, जिनकी प्रलयके अन्तमें भी गति है, जो योगीश्वर, अनन्त, रक्त, पीत, सित और असित हैं, ऋषियोंके अग्निहोत्रों तथा यज्ञके देवताओंमें जिनकी स्थिति है, जो अक्षर, परम गुह्य तथा मोक्षके उत्तम द्वार हैं, जिनके उदयास्तमनरूप रथरमें

English

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अध्याय ५८

श्लोक 28

तिलङ्गा कुञ्जारदरीकच्छवासाश्च ये जनाः ।ताम्रपर्णो तथा कुक्षिरिति कूर्मस्य दक्षिणः

tilaṅgā kuñjāradarīkacchavāsāśca ye janāḥ / tāmraparṇo tathā kukṣiriti kūrmasya dakṣiṇaḥ

हिन्दी अर्थ

आकाशमें विचरण करते हैं, अनृत और ऋत दोनों ही जिनके स्वरूप हैं, जो भिन्न-भिन्न पुण्य तीर्थोंके रूपमें विराजमान हैं, एकमात्र जिनपर इस विश्वकी रक्षा निर्भर है, जो कभी चिन्तनमें नहीं आ सकते, उन भगवान् भास्करकी हम शरण लेते हैं। जो ब्रह्मा, महादेव, विष्णु, प्रजापति, वायु, आकाश, जल, पृथ्वी, पर्वत, समुद्र, ग्रह, नक्षत्र और चन्द्रमा आदि हैं,

English

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अध्याय ५८

श्लोक 29

फाल्गुन्यश्चोत्तरा हस्ता चित्रा चर्क्षत्रयं द्विज ।कूर्मस्य दक्षिणे कुक्षौ बाह्यपादस्तथापरम्

phālgunyaścottarā hastā citrā carkṣatrayaṃ dvija / kūrmasya dakṣiṇe kukṣau bāhyapādastathāparam

हिन्दी अर्थ

वनस्पति, वृक्ष और ओषधियाँ जिनके स्वरूप हैं, जो व्यक्त और अव्यक्त प्राणियोंमें स्थित हैं, उन भगवान् सूर्यकी हम शरण लेते हैं। ब्रह्मा, शिव तथा विष्णुके जो रूप हैं, वे आपके ही हैं। जिनके तीन स्वरूप हैं, वे भगवान् भास्कर हमपर प्रसन्न हों। जिन अजन्मा जगदीश्वरके अड़में यह सम्पूर्ण जगत् स्थित है तथा जो जगत्के जीवन हैं, वे भगवान् सूर्य

English

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अध्याय ५८

श्लोक 30

काम्बोजाः पह्लवाश्चैव तथैव वहवामुखाः ।तथा च सिन्दुसौवीराः सानर्ता वनितामुखाः

kāmbojāḥ pahlavāścaiva tathaiva vahavāmukhāḥ / tathā ca sindusauvīrāḥ sānartā vanitāmukhāḥ

हिन्दी अर्थ

हमपर प्रसन्न हों। जिनका एक परम प्रकाशमान रूप ऐसा है, जिसकी ओर प्रभा-पुजजकी अधिकताके कारण देखना कठिन हो जाता है तथा जिनका दूसरा रूप चन्द्रमा है, जो अत्यन्त सौम्य है, वे भगवान् भास्कर हमपर प्रसन्न हों।

English

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अध्याय ५८

श्लोक 31

द्रावणाः मार्गिकाः शूद्रा कर्णप्राधेयवर्वराः ।किराताः पारदाः पाण्ड्यास्तथा पारशवाः कलाः

drāvaṇāḥ mārgikāḥ śūdrā karṇaprādheyavarvarāḥ / kirātāḥ pāradāḥ pāṇḍyāstathā pāraśavāḥ kalāḥ

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार भक्तिपूर्वक स्तवन और पूजन करनेवाले उन द्विजोंपर तीन महीनेमें भगवान् सूर्य प्रसन्न हुए और अपने मण्डलसे निकलकर उसीके समान कान्ति धारण किये वे नीचे उतरे और दुर्दर्श होते हुए भी उन सबके समक्ष प्रकट हो गये। तब उन लोगोंने अजन्मा सूर्यदेवके स्पष्ट रूपका दर्शन करके उन्हें भक्तिसे विनीत होकर प्रणाम किया। उस समय

English

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अध्याय ५८

श्लोक 32

धूर्तका हैमगिरिकाः सिन्धुकालकवैरताः ।सौराष्ट्रा दरदाश्चैव द्राविडाश्च महार्णवाः

dhūrtakā haimagirikāḥ sindhukālakavairatāḥ / saurāṣṭrā daradāścaiva drāviḍāśca mahārṇavāḥ

हिन्दी अर्थ

उनके शरीरमें रोमाउ्च और कम्प हो रहा था। वे बोले--'सहस्र किरणोंवाले सूर्यदेव!

English

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अध्याय ५८

श्लोक 33

एते जनपदाः पादे स्थिता वै दक्षिणे ऽपरे ।स्वात्यो विशाखा मैत्रञ्च नक्षत्रत्रयमेव च

ete janapadāḥ pāde sthitā vai dakṣiṇe 'pare / svātyo viśākhā maitrañca nakṣatratrayameva ca

हिन्दी अर्थ

आपको बारंबार नमस्कार है। आप सबके हेतु तथा सम्पूर्ण जगत्के विजयकेतु हैं; आप ही सबके रक्षक, सबके पूज्य, सम्पूर्ण यज्ञोंक आधार तथा योगवेत्ताओंके ध्येय हैं; आप हमपर

English

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अध्याय ५८

श्लोक 34

मणिमेघः क्षुराद्रिश्च खञ्जनो ऽस्तगिरिस्तथा ।अपरान्तिका हैहयाश्च शान्तिका विप्रशस्तकाः

maṇimeghaḥ kṣurādriśca khañjano 'stagiristathā / aparāntikā haihayāśca śāntikā vipraśastakāḥ

हिन्दी अर्थ

मार्कण्डेयजी कहते हैं--तब भगवान् सूर्यने प्रसन्न होकर सब लोगोंसे कहा --द्विजणगण! आपको जिस वस्तुकी इच्छा हो, वह मुझसे माँगें।! यह सुनकर ब्राह्मण आदि वर्णोंके लोगोंने उन्हें प्रणाम करके कहा--“अन्धकारका नाश करनेवाले भगवान् सूर्यदेव! यदि आप हमारी भक्तिसे प्रसन्न हैं तो हमारे राजा राज्यवर्द्धन नीरोग, शत्रुविजयी, सुन्दर

English

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अध्याय ५८

श्लोक 35

कौङ्कणाः पञ्चनदका वामना ह्यवरास्तथा ।तारक्षुरा ह्यङ्गतकाः कर्कराः शाल्मवेश्मकाः

kauṅkaṇāḥ pañcanadakā vāmanā hyavarāstathā / tārakṣurā hyaṅgatakāḥ karkarāḥ śālmaveśmakāḥ

हिन्दी अर्थ

केशोंसे युक्त तथा स्थिर यौवनवाले होकर दस हजार वर्षोतक जीवित रहें।'

English

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अध्याय ५८

श्लोक 36

गुरुस्विराः फल्गुणका वेणुमत्याञ्च ये जनाः ।तथा फल्गुलुका घोरा गुरुहाश्च कलास्तथा

gurusvirāḥ phalguṇakā veṇumatyāñca ye janāḥ / tathā phalgulukā ghorā guruhāśca kalāstathā

हिन्दी अर्थ

'तथास्तु” कहकर भगवान् सूर्य अन्तर्धान हो गये। वे सब लोग भी मनोवाञ्छित वर पाकर प्रसन्नतापूर्वक महाराजके पास लौट आये। वहाँ उन्होंने सूर्यसे वर पाने आदिकी सब बातें यथावत् कह सुनायीं। यह सुनकर रानी मानिनीको बड़ा हर्ष हुआ, परन्तु राजा बहुत

English

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अध्याय ५८

श्लोक 37

एकेक्षणा वाजिकेशा दीर्घग्रीवाः सचूलिकाः ।अश्वकेशास्तथा पुच्छे जनाः कूर्मस्य संस्थिताः

ekekṣaṇā vājikeśā dīrghagrīvāḥ sacūlikāḥ / aśvakeśāstathā pucche janāḥ kūrmasya saṃsthitāḥ

हिन्दी अर्थ

देरतक चिन्तामें पड़े रहे। वे उन लोगोंसे कुछ न बोले। मानिनीका हृदय हर्षसे भरा हुआ था। वह बोली--“महाराज! बड़े भाग्यसे आयुकी वृद्धि हुई है। आपका अभ्युदय हो। राजन! इतने बड़े अभ्युदयके समय आपको प्रसन्नता क्‍यों नहीं होती? दस हजार वर्षोतक आप नीरोग रहेंगे, आपकी जवानी स्थिर रहेगी; फिर भी आपको खुशी क्‍यों नहीं होती?”

English

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अध्याय ५८

श्लोक 38

ऐन्द्रं मूलन्तथाषाग नक्षत्रत्रयमेव च ।माण्डव्याश्चण्डखाराश्च अश्वकालनतास्तथा

aindraṃ mūlantathāṣāga nakṣatratrayameva ca / māṇḍavyāścaṇḍakhārāśca aśvakālanatāstathā

हिन्दी अर्थ

राजा बोले--कल्याणी! मेरा अभ्युदय कैसे हुआ। तुम मेरा अभिनन्दन क्यों करती हो? जब हजार-हजार दु:ख प्राप्त हो रहे हैं, उस समय किसीको बधाई देना क्या उचित माना जाता है? मैं अकेला ही तो दस हजार वर्षोतक जीवित रहूँगा। मेरे साथ तुम तो नहीं रहोगी। क्या तुम्हारे मरनेपर मुझे दुःख नहीं होगा? पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र, इष्ट बन्धु-बान्धव,

English

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अध्याय ५८

श्लोक 39

कुन्यतालडहाश्चैव स्त्रीबाह्या बालिक्रास्तथा ।नृसिंहा वेणुमत्याञ्च बलावस्थास्तथापरे

kunyatālaḍahāścaiva strībāhyā bālikrāstathā / nṛsiṃhā veṇumatyāñca balāvasthāstathāpare

हिन्दी अर्थ

भक्त, सेवक तथा मित्रवर्ग--वे सब मेरी आँखोंके सामने मरेंगे। उस समय मुझे अपार दुःखका सामना करना पड़ेगा। जिन लोगोंने अत्यन्त दुर्बल होकर शरीरकी नाड़ियाँ सुखा- सुखाकर मेरे लिये तपस्या की, वे सब तो मरेंगे और मैं भोग भोगते हुए जीवित रहूँगा। ऐसी दशामें क्‍या मैं धिककार देनेयोग्य नहीं हूँ? सुन्दरी! इस प्रकार मुझपर यह आपत्ति आ गयी।

English

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अध्याय ५८

श्लोक 40

धर्मबद्धास्तथालूका उरुकर्मस्थिता जनाः ।वामपादे जनाः पार्श्वे स्थिताः कूर्मस्य भागुरे

dharmabaddhāstathālūkā urukarmasthitā janāḥ / vāmapāde janāḥ pārśve sthitāḥ kūrmasya bhāgure

हिन्दी अर्थ

मेरा अभ्युदय नहीं हुआ है। क्या तुम इस बातको नहीं समझती? फिर क्यों मेरा अभिनन्दन

English

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अध्याय ५८

श्लोक 41

आषाढाश्रवणे चैव धनिष्ठा यत्र संस्थिता ।कैलासो हिमवांश्चैव धनुष्मान् वसुमांस्तथा

āṣāḍhāśravaṇe caiva dhaniṣṭhā yatra saṃsthitā / kailāso himavāṃścaiva dhanuṣmān vasumāṃstathā

हिन्दी अर्थ

मानिनी बोली--महाराज! आप जो कहते हैं, वह सब ठीक है। मैंने तथा पुरवासियोंने आपके प्रेमवश इस दोषकी ओर नहीं देखा है। नरनाथ! ऐसी अवस्थामें क्या करना चाहिए, यह आप ही सोचें, क्योंकि भगवान् सूर्यने प्रसन्न होकर जो कुछ कहा है, वह अन्यथा नहीं

English

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अध्याय ५८

श्लोक 42

क्रौञ्चाः कुरुवकाश्चैव क्षुद्रवीणाश्च ये जनाः ।रसालया सकैकेया भोगप्रस्थाः सयामुनाः

krauñcāḥ kuruvakāścaiva kṣudravīṇāśca ye janāḥ / rasālayā sakaikeyā bhogaprasthāḥ sayāmunāḥ

हिन्दी अर्थ

राजाने कहा--देवि! पुरवासियों और सेवकोंने प्रेमवश मेरे साथ जो उपकार किया है, उसका बदला चुकाये बिना मैं किस प्रकार भोग भोगूँगा। यदि भगवान् सूर्यकी ऐसी कृपा हो कि समस्त प्रजा, भृत्यवर्ग, तुम, अपने पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र और मित्र भी जीवित रह सकें तो मैं राज्यसिंहासनपर बैठकर प्रसन्नतापूर्वक भोगोंका उपभोग कर सकूँगा। यदि वे ऐसी कृपा

English

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अध्याय ५८

श्लोक 43

अन्तर्द्वोपास्त्रिगर्ताश्च अग्नीज्याः सार्दना जनाः ।तथैवाश्वमुखाः प्राप्ताश्चिविडाः केशधारिणः

antardvopāstrigartāśca agnījyāḥ sārdanā janāḥ / tathaivāśvamukhāḥ prāptāściviḍāḥ keśadhāriṇaḥ

हिन्दी अर्थ

नहीं करेंगे तो मैं उसी कामरूप पर्वतपर निराहार रहकर तबतक तपस्या करूँगा, जबतक कि इस जीवनका अन्त न हो जाय।

English

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अध्याय ५८

श्लोक 44

दासेरका वाटधानाः शवधानास्तथैव च ।पुष्कलाधमकैरातास्तथा तक्षशिलाश्रयाः

dāserakā vāṭadhānāḥ śavadhānāstathaiva ca / puṣkalādhamakairātāstathā takṣaśilāśrayāḥ

हिन्दी अर्थ

राजाके यों कहनेपर रानी मानिनीने कहा--'ऐसा ही हो।' फिर वह भी महाराजके साथ कामरूप पर्वतपर चली गयी। वहाँ पहुँचकर राजाने पत्नीके साथ सूर्यमन्दिरमें जाकर सेवापरायण हो भगवान् भानुकी आराधना आरम्भ की। दोनों दम्पति उपवास करते-करते दुर्बल हो गये। सर्दी, गर्मी और वायुका कष्ट सहन करते हुए दोनोंने घोर तपस्या की। सूर्यकी

English

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अध्याय ५८

श्लोक 45

अम्बाला मालवा मद्रा वेणुकाः सवदन्तिकाः ।पिङ्गला मानकलहा हूणाः कोहलकास्तथा

ambālā mālavā madrā veṇukāḥ savadantikāḥ / piṅgalā mānakalahā hūṇāḥ kohalakāstathā

हिन्दी अर्थ

पूजा और भारी तपस्या करते-करते जब एक वर्षसे अधिक समय व्यतीत हो गया, तब भगवान् भास्कर प्रसन्न हुए। उन्होंने राजाको समस्त सेवकों, पुरवासियों और पुत्रों आदिके लिये इच्छानुसार वरदान दिया। वर पाकर राजा अपने नगरको लौट आये और धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करते हुए बड़ी प्रसन्नताके साथ राज्य करने लगे। धर्मज्ञ राजाने बहुत-से यज्ञ

English

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अध्याय ५८

श्लोक 46

माण्डव्या भूतियुवकाः शातका हेमतारकाः ।यशोमत्याः सगान्धाराः खरसागरराशयः

māṇḍavyā bhūtiyuvakāḥ śātakā hematārakāḥ / yaśomatyāḥ sagāndhārāḥ kharasāgararāśayaḥ

हिन्दी अर्थ

किये और दिन-रात खुले हाथ दान किया। वे अपने पुत्र, पौत्र और भृत्य आदिके साथ यौवनको स्थिर रखते हुए दस हजार वर्षोतक जीवित रहे। उनका यह चरित्र देखकर भृगुवंशी प्रमतिने विस्मित होकर यह गाथा गायी--“अहो! भगवान् सूर्यके भजनकी कैसी शक्ति है, जिससे राजा राज्यवर्द्धन अपने तथा स्वजनोंके लिये आयुवर्द्धन बन गये।'

English

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अध्याय ५८

श्लोक 47

यौधेया दासमेयाश्च राजन्याः श्यामकास्तथा ।क्षेमधूर्ताश्च कूर्मस्य वामकुक्षिमुपाश्रिताः

yaudheyā dāsameyāśca rājanyāḥ śyāmakāstathā / kṣemadhūrtāśca kūrmasya vāmakukṣimupāśritāḥ

हिन्दी अर्थ

जो मनुष्य ब्राह्मणोंके मुखसे भगवान् सूर्यके इस उत्तम माहात्म्यका श्रवण तथा पाठ करता है, वह सात रातके किये हुए पापोंसे मुक्त हो जाता है। मुनिश्रेष्ठ! इस प्रसड्में सूर्यदेवके जो मन्त्र आये हैं, उनमेंसे एक-एकका भी यदि तीनों सन्ध्याओंके समय जप किया जाय तो वह समस्त पातकोंका नाश करनेवाला होता है। सूर्यके जिस मन्दिरमें इस

English

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अध्याय ५८

श्लोक 48

वारुणञ्चात्र नक्षत्रं तत्र प्रौष्ठपदाद्वयम् ।येन किन्नरराज्यञ्च पुशुपालं सकीचकम्

vāruṇañcātra nakṣatraṃ tatra prauṣṭhapadādvayam / yena kinnararājyañca puśupālaṃ sakīcakam

हिन्दी अर्थ

समूचे माहात्म्यका पाठ किया जाता है, वहाँ भगवान् सूर्य अपना सान्निध्य नहीं छोड़ते। अतः ब्रह्मन! यदि तुम्हें महान् पुण्यकी प्राप्ति अभीष्ट हो तो सूर्यके इस उत्तम माहात्म्यको मन-ही-मन धारण एवं जप करते रहो। द्विजश्रेष्ठ। जो सोनेके सींग और अत्यन्त सुन्दर शरीरवाली दुधारू गाय दान करता है तथा जो अपने मनको संयममें रखकर तीन दिनोंतक

English

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अध्याय ५८

श्लोक 49

काश्मीरकं तथा राष्ट्रमभिसारजनस्तथा ।दवदास्त्वङ्गनाश्चैव कुलटा वनराष्ट्रकाः

kāśmīrakaṃ tathā rāṣṭramabhisārajanastathā / davadāstvaṅganāścaiva kulaṭā vanarāṣṭrakāḥ

हिन्दी अर्थ

इस माहात्म्यका श्रवण करता है, उन दोनोंको समान ही पुण्यफलकी प्राप्ति होती है।

English

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अध्याय ५८

श्लोक 50

सैरिष्ठा ब्रह्मपुरकास्तथैव वनवाह्यकाः ।किरातकौशिका नन्दा जनाः पह्णवलोलनाः

sairiṣṭhā brahmapurakāstathaiva vanavāhyakāḥ / kirātakauśikā nandā janāḥ pahṇavalolanāḥ

हिन्दी अर्थ

दिष्टपुत्र नाभागका चरित्र

English

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अध्याय ५८

श्लोक 51

दार्वादा मरकाश्चैव कुरटाश्चान्नदारकाः ।एकपादा खशा घोषाः स्वर्गभौमानवद्यकाः

dārvādā marakāścaiva kuraṭāścānnadārakāḥ / ekapādā khaśā ghoṣāḥ svargabhaumānavadyakāḥ

हिन्दी अर्थ

मार्कण्डेयजी कहते हैं--इक्ष्वाकु, नाभग, रिष्ट, नरिष्यन्त, नाभाग, पृषध्र और धृष्ट-- ये वैवस्वत मनुके पुत्र थे, जो पृथक्-पृथक् राज्यके पालक हुए। इन सबकी कीर्ति बहुत दूरतक फैली हुई थी और वे सभी शास्त्रविद्या तथा शस्त्रविद्यामें भी पारड़त थे। विद्वानोंमें श्रेष्ठ मनुने एक श्रेष्ठ पुत्र प्राप्त करनेकी इच्छासे मित्रावरुण नामक यज्ञ किया। उसमें होताके

English

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अध्याय ५८

श्लोक 52

तथा सयवना हिङ्गाश्चीरप्रावरणाश्च ये ।त्रिनेत्राः पौरवाश्चैव गन्धर्वाश्च द्विजात्तम

tathā sayavanā hiṅgāścīraprāvaraṇāśca ye / trinetrāḥ pauravāścaiva gandharvāśca dvijāttama

हिन्दी अर्थ

दोषसे विपरीत आहुति पड़नेके कारण पुत्र न होकर इला नामकी सुन्दरी कन्या उत्पन्न हुई। कन्या उत्पन्न हुई देख मनुने मित्र और वरुणका स्तवन किया तथा इस प्रकार कहा --देववरो! मैंने इस उद्देश्यसे यज्ञ किया था कि आप दोनोंकी कृपासे मुझे एक विशिष्ट पुत्रकी प्राप्ति हो; किन्तु यज्ञ सम्पन्न होनेपर कन्याका जन्म हुआ। यदि आप दोनों प्रसन्न हैं

English

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अध्याय ५८

श्लोक 53

पूर्वोत्तरन्तु कूर्मस्य पदामेते समाश्रिताः ।रेवत्यश्चाश्विदैवत्यं याम्यञ्चर्क्षमिति त्रयम्

pūrvottarantu kūrmasya padāmete samāśritāḥ / revatyaścāśvidaivatyaṃ yāmyañcarkṣamiti trayam

हिन्दी अर्थ

और मुझे वर देना चाहते हैं तो मेरी यह कन्या ही आप दोनोंके प्रसादसे अत्यन्त गुणवान् पुत्र हो जाय।' उन दोनों देवताओंने “तथास्तु” कहा। जिससे वही कन्या इला तत्काल ही सुद्युम्न नामक पुत्रके रूपमें परिवर्तित हो गयी। मनुकुमार सुद्युम्ण एक दिन वनमें शिकार खेल रहे थे। वहाँ महादेवजीके कोपसे उन्हें पुनः स्त्रीरूपमें हो जाना पड़ा। उस समय

English

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अध्याय ५८

श्लोक 54

तत्र पादे समाख्यातं पाकाय मुनिसत्तम ।देशेष्वेतेषु चैतानि नक्षत्राण्यपि वै द्विज

tatra pāde samākhyātaṃ pākāya munisattama / deśeṣveteṣu caitāni nakṣatrāṇyapi vai dvija

हिन्दी अर्थ

चन्द्रमाके पुत्र बुधने इलाके गर्भसे पुरूरवा नामक चक्रवर्ती पुत्र उत्पन्न किया। पुत्र हो जानेके बाद राजा सुद्युम्नने अश्वमेध नामक महान् यज्ञ करके पुनः पुरुष-रूप प्राप्त कर लिया। सुद्युम्नके तीन पुत्र हुए, जो उत्कल, विनय और गयके नामसे प्रसिद्ध थे। उन्होंने धर्ममें मन लगाकर इस पृथ्वीका पालन किया। राजा सुद्युम्न जब स्त्रीके रूपमें थे, तब उनके

English

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अध्याय ५८

श्लोक 55

एतत्पीडा अमी देशाः पीड्यन्ते ये क्रमोदिताः ।यान्ति चाभ्युदयं विप्र ! ग्रहैः सम्यगवस्थितैः

etatpīḍā amī deśāḥ pīḍyante ye kramoditāḥ / yānti cābhyudayaṃ vipra ! grahaiḥ samyagavasthitaiḥ

हिन्दी अर्थ

गर्भसे पुरूरवाका जन्म हुआ। पुरूरवा बुथके पुत्र थे, इसलिये उन्हें सुद्युम्नके राज्यका भाग नहीं मिला। तदनन्तर वसिष्ठजीके कहनेसे पुरूरवाको प्रतिष्ठान नामक उत्तम नगर दे दिया

English

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अध्याय ५८

श्लोक 56

यस्यर्क्षस्य पतिर्यो वै ग्रहस्तद्भावितो भयम् ।तद्देशस्य मुनिश्रेष्ठ ! तदुत्कर्षे शुभागमः

yasyarkṣasya patiryo vai grahastadbhāvito bhayam / taddeśasya muniśreṣṭha ! tadutkarṣe śubhāgamaḥ

हिन्दी अर्थ

दिष्ट नामके एक राजा थे, जिनके पुत्रका नाम नाभाग5 था। यौवनके आरम्भमें ही उसकी दृष्टि एक वैश्य-कन्यापर पड़ी, जो बहुत ही सुन्दरी थी। उसको देखते ही नाभागका मन कामके अधीन हो गया। उसने उसके पिताके पास जाकर वह कन्या माँगी। वैश्यने देखा, राजकुमारका मन अपने वशमें नहीं है, वे कामके अधीन हो चुके हैं। तब उसने हाथ

English

the planets which are favourably situated. Of whichever con- stellation whichever planet is lord, both the constellation and ancyf good fortune accrues to that country, 0 best of munis- )7 Singly all countries are alike; fear or prosperity** comes to people according as either arises out of the particular,8 constellation and planet, 0 brahman. The thought, that man- kind are in a common predicament with their own particular constellations when these are unfavourable, inspires fear. Along with the particular planets there arises from thdr occultations an unfavourable injiuenc-e which discourages exer- )9 tion. Likewise the development of the conditions may be favourable; and so when the planets are badly situated it tends to produce slight benefit to men and to themselves with the W wise who are learned in geography.tt When the particular planet is badly situated, J { men even of sacred merit have fear for their goods w cattle-pen, their dependants, frienda or v/l children or wife, ^ow men of little merit feel fear in their souls, very sinful men feel it everywhere indeed, but the

अध्याय ५८

श्लोक 57

प्रत्येकं देशसामान्यं नक्षत्रग्रहसम्भवम् ।भयं लोकस्य भवति शोभनं वा द्विजोत्तम

pratyekaṃ deśasāmānyaṃ nakṣatragrahasambhavam / bhayaṃ lokasya bhavati śobhanaṃ vā dvijottama

हिन्दी अर्थ

जोड़कर उनसे कहा--'राजकुमार! आपलोग राजा हैं और हमलोग कर देनेवाले भृत्य। मैं आपके बराबर नहीं हूँ, फिर हमारे साथ आप वैवाहिक सम्बन्ध कैसे करना चाहते हैं।

English

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अध्याय ५८

श्लोक 58

स्वर्क्षैरशोभनैर्जन्तोः सामान्यमिति भीतिदम् ।ग्रहैर्भवति पीडोत्थमल्पायासमशोभनम्

svarkṣairaśobhanairjantoḥ sāmānyamiti bhītidam / grahairbhavati pīḍotthamalpāyāsamaśobhanam

हिन्दी अर्थ

राजकुमारने कहा--काम और मोह आदिने मानव-शरीरकी समानता सिद्ध कर दी है। मुझे तुम्हारी कन्या पसंद है, अतः उसे मुझे दे दो; अन्यथा मेरा यह शरीर जीवित नहीं

English

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अध्याय ५८

श्लोक 59

तथैव शोभनः पाको दुः स्थितैश्च तथा ग्रहैः ।अल्पोपकाराय नृणां देशज्ञैश्चात्मनो बुधैः

tathaiva śobhanaḥ pāko duḥ sthitaiśca tathā grahaiḥ / alpopakārāya nṛṇāṃ deśajñaiścātmano budhaiḥ

हिन्दी अर्थ

वैश्य बोला--हम और आप दोनों ही राजाके अधीन हैं। पहले आप अपने पिताजीसे आज्ञा ले लीजिये; फिर मैं कन्या दूँगा और आप ग्रहण कर लीजियेगा।

English

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अध्याय ५८

श्लोक 60

द्रव्ये गोष्ठे ऽथ भृत्येषु सुहृत्सु तनयेषु वा ।भार्यायाञ्च ग्रहे दुस्थे भयं पुण्यवतां नृणाम्

dravye goṣṭhe 'tha bhṛtyeṣu suhṛtsu tanayeṣu vā / bhāryāyāñca grahe dusthe bhayaṃ puṇyavatāṃ nṛṇām

हिन्दी अर्थ

राजकुमारने कहा--गुरुजनोंके अधीन रहनेवाले पुत्रोंको उचित है कि वे अन्य सभी कार्योमें गुरुजनोंसे पूछें, किन्तु ऐसे कार्योमें पूछना ठीक नहीं। ऐसी बातें तो उनके सामने मुखसे निकालना भी कठिन है। कहाँ कामचर्चा और कहाँ गुरुजनोंको सुनाना; ये दोनों परस्पर-विरुद्ध हैं। हाँ, अन्य कार्योंके लिये उनसे पूछनेमें कोई हर्ज नहीं।

English

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अध्याय ५८

श्लोक 61

आत्मन्यथाल्पपुण्यानां सर्वत्रैवातिपापिनाम् ।नैकत्रापि ह्यपापानां भयमस्ति कदाचन

ātmanyathālpapuṇyānāṃ sarvatraivātipāpinām / naikatrāpi hyapāpānāṃ bhayamasti kadācana

हिन्दी अर्थ

वैश्य बोला--ठीक है, आप अपने पिताजीसे पूछें तो आपके लिये यह कामचर्चा हो सकती है; किन्तु मेरे लिये यह कामचर्चा नहीं है, अतः मैं ही पूछूँगा।

English

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अध्याय ५८

श्लोक 62

दिग्देशजनसामान्यं नृपसामान्यमात्मजम् ।नक्षत्रग्रहसामान्यं नरो भुङ्क्ते शुभाशुभम्

digdeśajanasāmānyaṃ nṛpasāmānyamātmajam / nakṣatragrahasāmānyaṃ naro bhuṅkte śubhāśubham

हिन्दी अर्थ

वैश्यके यों कहनेपर राजकुमार चुप हो गये। तब उसने राजकुमारका जो विचार था, वह सब उसके पितासे कह सुनाया। तब राजकुमारके पिताने ऋचीक आदि श्रेष्ठ ब्राह्मणों तथा राजकुमारको भी महलमें बुलाकर मुनियोंसे सब वृत्तान्त निवेदन किया और कहा --“इस विषयमें जो कर्तव्य हो, उसके लिये आपलोग आज्ञा दें।'

English

sinless never in a single place. Man experiences good or evil, which may arise from community of region, place and people, may arise peculiarly from himself, §§ or which may arise preservation is produced by the non-malignity |||1 of tho.pla-

अध्याय ५८

श्लोक 63

परस्पराभिरक्षा च ग्रहादौस्थ्येन जायते ।एतेभ्य एव विप्रेन्द्र ! शुभहानिस्तथाशुभैः

parasparābhirakṣā ca grahādausthyena jāyate / etebhya eva viprendra ! śubhahānistathāśubhaiḥ

हिन्दी अर्थ

ऋषि बोले--राजकुमार! पहले तुम्हारा विवाह किसी मूरद्धाभिषिक्त राजाकी कन्यासे होना चाहिए। उसके बाद यह वैश्य-कन्या भी तुम्हारी स्त्री हो सकती है। ऐसा करनेसे दोष न होगा। अन्यथा पहले ही वैश्य-कन्याका अपहरण करनेपर तुम्हारी उत्कृष्ट जाति चली

English

and the Gandharvas, T 0 brahman. These people are

अध्याय ५८

श्लोक 64

यदेतत् कूर्मसंस्थानं नक्षत्रेषु मयोदितम् ।एतत् तु देशसामान्यमशुभं शुभमेव च

yadetat kūrmasaṃsthānaṃ nakṣatreṣu mayoditam / etat tu deśasāmānyamaśubhaṃ śubhameva ca

हिन्दी अर्थ

मार्कण्डेयजी कहते हैं--यह सुनकर नाभागने उन महात्माओंके वचनकी अवहेलना कर दी और घरसे निकलकर तलवार हाथमें ले वह बोला--'मैंने राक्षस-विवाहके अनुसार इस वैश्य-कन्याका अपहरण किया है। जिसकी सामर्थ्य हो, वह इसे मेरे हाथसे छुड़ा ले।' वैश्यने उस कन्याको राजकुमारके चंगुलमें पड़ी देख “त्राहि, त्राहि'कहते हुए उसके पिताकी

English

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अध्याय ५८

श्लोक 65

तस्माद्विज्ञाय देशर्क्षं ग्रहपीडान्तथात्मनः ।कुर्वोत शान्तिं मेधावी लोकवादांश्च सत्तम

tasmādvijñāya deśarkṣaṃ grahapīḍāntathātmanaḥ / kurvota śāntiṃ medhāvī lokavādāṃśca sattama

हिन्दी अर्थ

शरण ली। तब राजकुमारके पिताने कुपित होकर बहुत बड़ी सेनाको आज्ञा दी, “दुष्ट नाभाग धर्मको कलड़्कित कर रहा है, अतः उसे मार डालो, मार डालो।” राजाकी आज्ञा पाकर सेनाने राजकुमारके साथ युद्ध आरम्भ कर दिया। नाभाग अस्त्रोंका ज्ञाता था, उसने अपने अस्त्र-शस्त्रोंसे अधिकांश सैनिकोंको मार गिराया। राजकुमारके द्वारा सेनाके मारे जानेका

English

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अध्याय ५८

श्लोक 66

आकाशाद्देवतानाञ्च दैत्यादीनाञ्च दौर्हृदाः ।पृथ्व्यां पतन्ति ते लोके लोकवादा इति श्रुताः

ākāśāddevatānāñca daityādīnāñca daurhṛdāḥ / pṛthvyāṃ patanti te loke lokavādā iti śrutāḥ

हिन्दी अर्थ

समाचार सुनकर राजा अपने सैनिकोंको साथ ले स्वयं ही युद्धके लिये गये। फिर तो उनका अपने पुत्रके साथ संग्राम छिड़ गया। उसमें अस्त्र-शस्त्रोंके प्रयोगमें राजकुमारकी अपेक्षा उसके पिता ही बढ़े-चढ़े सिद्ध हुए। इसी समय सहसा आकाशसे परिव्राट् मुनि उतर पड़े और राजासे बोले--“महाभाग! अपने पुत्रके साथ युद्ध बंद कीजिये, वह अपने धर्मसे भ्रष्ट

English

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अध्याय ५८

श्लोक 67

तां तथैव बुधः कुर्यात् लोकवादान्न हापयेत् ।तेषान्तत्करणान्नॄणां युक्तो दुष्टागमक्षयः

tāṃ tathaiva budhaḥ kuryāt lokavādānna hāpayet / teṣāntatkaraṇānnṝṇāṃ yukto duṣṭāgamakṣayaḥ

हिन्दी अर्थ

हो चुका है। पुरुष अपने वर्णकी कन्याके साथ विवाह न करके जिस-जिस हीन जातिकी कन्याका पाणिग्रहण करता है, उसी-उसीके वर्णका वह भी हो जाता है। अत: आपका यह मन्दबुद्धि पुत्र अब वैश्य हो गया है, इसका क्षत्रियके साथ युद्ध करनेका अधिकार नहीं है। इसलिये अब आप युद्धसे निवृत्त हो जाइये।” तब राजा अपने पुत्रके साथ युद्ध करनेसे रुक

English

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अध्याय ५८

श्लोक 68

शुभोदयं प्रहानिञ्च पापानां द्विजसत्तम ।प्रज्ञाहानिं प्रकुर्युस्ते द्रव्यादीनाञ्च कुर्वते

śubhodayaṃ prahāniñca pāpānāṃ dvijasattama / prajñāhāniṃ prakuryuste dravyādīnāñca kurvate

हिन्दी अर्थ

गये। उसने भी उस वैश्य-कन्याके साथ विवाह कर लिया। वैश्यत्वको प्राप्त होनेपर उसने राजाके पास जाकर पूछा--“'भूपाल! अब मेरा जो कर्तव्य हो, उसके लिये आज्ञा दीजिये।'

English

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अध्याय ५८

श्लोक 69

तस्माच्छान्तिपरः प्राज्ञो लोकवादरतस्तथा ।लोकवादांश्च शान्तीश्च ग्रहपीडासु कारयेत्

tasmācchāntiparaḥ prājño lokavādaratastathā / lokavādāṃśca śāntīśca grahapīḍāsu kārayet

हिन्दी अर्थ

राजाने कहा--बाभ्रव्य आदि तपस्वी धार्मिक न्यायके लिये नियुक्त हैं, वे तुम्हारे लिये जो कर्म धर्मानुकूल बतावें, उसीका अनुष्ठान करो।

English

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अध्याय ५८

श्लोक 70

अद्रोहानुपवासांश्च शस्तं चैत्यादिवन्दनम् ।जपं होमं तथा दानं स्त्रानं क्रोधादिवर्जनम्

adrohānupavāsāṃśca śastaṃ caityādivandanam / japaṃ homaṃ tathā dānaṃ strānaṃ krodhādivarjanam

हिन्दी अर्थ

तब राजसभामें रहनेवाले बा भ्रव्य आदि मुनियोंने नाभागके लिये पशुपालन, कृषि तथा वाणिज्य--ये ही उत्तम धर्म बतलाये। राजाकी आज्ञाके अनुसार उसने भी वैसा ही किया। नाभागके उस वैश्य-कन्यासे एक पुत्र हुआ, जिसका नाम भनन्दन था।

English

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अध्याय ५८

श्लोक 71

अद्रोहः सर्वभूतेषु मैत्रीं कुर्याच्च पण्डितः ।वर्जयेदसतीं वाचमतिवादांस्तथैव च

adrohaḥ sarvabhūteṣu maitrīṃ kuryācca paṇḍitaḥ / varjayedasatīṃ vācamativādāṃstathaiva ca

हिन्दी अर्थ

३. ये “नाभाग” मनु-पुत्र नाभागसे भिन्न हैं।

English

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अध्याय ५८

श्लोक 72

ग्रहपूजाञ्च कुर्वोत सर्वपीडासु मानवः ।एवं शाम्यन्त्यशेषाणि घोराणि द्विजसत्तम

grahapūjāñca kurvota sarvapīḍāsu mānavaḥ / evaṃ śāmyantyaśeṣāṇi ghorāṇi dvijasattama

हिन्दी अर्थ

वत्सप्रीके द्वारा कुजूम्भका वध तथा उसका मुदावतीके

English

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अध्याय ५८

श्लोक 73

प्रयतानां मनुष्याणां ग्रहर्क्षोत्थान्यशेषतः ।एष कूर्मो मया ख्यातो भारते भगवान् विभुः

prayatānāṃ manuṣyāṇāṃ graharkṣotthānyaśeṣataḥ / eṣa kūrmo mayā khyāto bhārate bhagavān vibhuḥ

हिन्दी अर्थ

मार्कण्डेयजी कहते हैं--इस पृथ्वीपर विदूरथ नामके एक राजा हो चुके हैं। उनकी कीर्ति बहुत दूरतक फैली हुई थी। उनके दो पुत्र थे--सुनीति और सुमति। एक दिन राजा विदूरथ शिकार खेलनेके लिये वनमें गये। वहाँ उन्हें एक विशाल गढ़ा दिखायी दिया, जो पृथ्वीका मुख-सा प्रतीत होता था। उसे देखकर राजाने सोचा, यह भयंकर गर्त क्या है?

English

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अध्याय ५८

श्लोक 74

नारायणो ह्यचिन्त्यात्मा यत्र सर्वं प्रतिष्ठितम् ।तत्र देवाः स्थिताः सर्वे प्रतिनक्षत्रसंश्रयाः

nārāyaṇo hyacintyātmā yatra sarvaṃ pratiṣṭhitam / tatra devāḥ sthitāḥ sarve pratinakṣatrasaṃśrayāḥ

हिन्दी अर्थ

मालूम होता है पातालतक जानेवाली गुफा है, पृथ्वीका साधारण गर्त नहीं; देखनेमें भी पुराना नहीं जान पड़ता। उस निर्जन वनमें इस प्रकार सोचते-विचारते हुए राजाने वहाँ सुव्रत नामके तपस्वी ब्राह्मणको आते देखा और निकट आनेपर उनसे पूछा--“'यह क्या है? यह गर्त बहुत ही गहरा है, इसमें पृथ्वीका भीतरी भाग दिखायी दे रहा है।'

English

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अध्याय ५८

श्लोक 75

तथा मध्ये हुतवहः पृथ्वी सोमश्च वै द्विज ।मेषादयस्त्रयो मध्ये मुखे द्वौ मिथुनादिकौ

tathā madhye hutavahaḥ pṛthvī somaśca vai dvija / meṣādayastrayo madhye mukhe dvau mithunādikau

हिन्दी अर्थ

ऋषिने कहा--राजन्! क्या आप इसे नहीं जानते? इस पृथ्वीपर जो कुछ भी है, वह सब राजाको जानना चाहिए। रसातलमें एक महापराक्रमी भयंकर दानव निवास करता है; वह पृथ्वीको जृम्भित (छिद्रयुक्त) कर देता है, इसलिये उसे कुजुम्भ कहते हैं। नरेश्वर! वह पृथ्वीपर अथवा स्वर्गमें जो कुछ करता है, उसकी जानकारी आप क्‍यों नहीं रखते।

English

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अध्याय ५८

श्लोक 76

प्राग्दक्षिणे तथा पादे कर्कसिंहौ व्यवस्थितौ ।सिंहकन्यातुलाश्चैव कुक्षौ राशैत्रयं स्थितम्

prāgdakṣiṇe tathā pāde karkasiṃhau vyavasthitau / siṃhakanyātulāścaiva kukṣau rāśaitrayaṃ sthitam

हिन्दी अर्थ

पूर्वकालमें विश्वकर्माने जिसका निर्माण किया था, वह सुनन्द नामका मूसल उस दुष्टात्माने हड़प लिया। उसीसे युद्धमें वह शत्रुओंका संहार करता है। पातालके अंदर रहकर उस मूसलसे ही वह इस पृथ्वीको विदीर्ण कर देता है और इस प्रकार समस्त असुरोंके आने- जानेके लिये द्वार बना लेता है। जब आप पातालके भीतर रहनेवाले इस शत्रुका नाश करेंगे,

English

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अध्याय ५८

श्लोक 77

तुलाथ वृश्चिकाश्चोभौ पादे दक्षिणपश्चिमे ।पृष्ठे च वृश्चिकेनैव सह धन्वी व्यवस्थितः

tulātha vṛścikāścobhau pāde dakṣiṇapaścime / pṛṣṭhe ca vṛścikenaiva saha dhanvī vyavasthitaḥ

हिन्दी अर्थ

तभी वास्तवमें सम्पूर्ण पृथ्वीके स्वामी हो सकेंगे। राजन! उस मूसलके बलाबलके विषयमें विद्वान् पुरुष ऐसा कहते हैं कि यदि कोई स्त्री वह मूसल छू दे तो वह उस दिन निर्बल हो जाता है, किन्तु दूसरे दिन फिर पूर्ववत् प्रबल हो जाता है। युवतीकी अँगुलियोंके स्पर्शसे उसकी शक्तिके नष्ट हो जानेका जो दोष या प्रभाव है, उसे वह दुराचारी हैत्य भी नहीं

English

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अध्याय ५८

श्लोक 78

वायव्ये चास्य वै पादे धनुर्ग्राहादिकं त्रयम् ।कुम्भमीनौ तथैवास्य उत्तरां कुक्षिमाश्रितौ

vāyavye cāsya vai pāde dhanurgrāhādikaṃ trayam / kumbhamīnau tathaivāsya uttarāṃ kukṣimāśritau

हिन्दी अर्थ

जानता। भूपाल! आपके नगरके समीप ही उसने यह पृथ्वीमें छेद किया है, फिर भी आप निश्िन्त क्‍यों हैं।

English

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अध्याय ५८

श्लोक 79

मीनमेषौ द्विजश्रेष्ठ ! पादे पूर्वोत्तरे स्थितौ ।कूर्मे देशास्तथर्क्षाणि देशेष्वेतेषु वै द्विज

mīnameṣau dvijaśreṣṭha ! pāde pūrvottare sthitau / kūrme deśāstatharkṣāṇi deśeṣveteṣu vai dvija

हिन्दी अर्थ

इतना कहकर ब्रह्मर्षि सुब्रत चले गये। राजाने भी अपने नगरमें जाकर मन्त्रवेत्ता

English

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अध्याय ५८

श्लोक 80

राशयश्च तथर्क्षेषु ग्रहराशिष्ववस्थिताः ।तस्माद् ग्रहर्क्षपीडासु देशपीडां विनिर्दिशेत्

rāśayaśca tatharkṣeṣu graharāśiṣvavasthitāḥ / tasmād graharkṣapīḍāsu deśapīḍāṃ vinirdiśet

हिन्दी अर्थ

उन्होंने मूसलका वह प्रभाव भी, कि स्त्रीके स्पर्शसे उसकी शक्तिका हास हो जाता था,

English

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अध्याय ५८

श्लोक 81

तत्र स्त्रात्वा प्रकुर्वोत दानहोमादिकं विधिम् ।स एष वैष्णवः पादो ब्रह्मा मध्ये ग्रहस्य यः ।नारायणाख्यो ऽचिन्त्यात्मा कारणं जगतः प्रभुः

tatra strātvā prakurvota dānahomādikaṃ vidhim / sa eṣa vaiṣṇavaḥ pādo brahmā madhye grahasya yaḥ / nārāyaṇākhyo 'cintyātmā kāraṇaṃ jagataḥ prabhuḥ

हिन्दी अर्थ

कन्या मुदावती भी पास ही बैठी सब कुछ सुन रही थी। तदनन्तर कुछ दिनोंके बाद कुजुम्भने सखियोंसे घिरी हुई उस राजकन्याको उपवनसे हर लिया। यह बात सुनकर राजाके नेत्र क्रोधभे चज्चल हो उठे और उन्होंने अपने दोनों पुत्रोंसे, जो वनके मार्ग भलीभाँति जानते थे, कहा--“तुमलोग शीघ्र जाओ। उस दानवने निर्विन्ध्याके तटपर गढ़ा

English

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स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_mArkaNDeyapurANa1-93.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Markandeya Purana — Chapter 58
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

Digitised text taken from the archive linked below. It has not been collated against a printed edition by this site.

पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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