Matsya Purana· Matsya Purāṇa
104
अध्याय 104 / 176

Adhyaya 104

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अध्याय १०४

श्लोक 1

मत्स्य-पुराण १०४ भगवञ्छ्रोतुमिच्छामि पुरा कल्पे यथास्थितम् ब्रह्मणा देवमुख्येन यथावत्कथितं मुने

matsya-purāṇa 104 bhagavañchrotumicchāmi purā kalpe yathāsthitam brahmaṇā devamukhyena yathāvatkathitaṃ mune

हिन्दी अर्थ

अनेनैव गृहेण त्वमपक्राम ब्रवीम्यहम्। शरतेजःपरीतानि पुराणि द्विजपुङ्गवाः। दुष्पुत्रदोषाद् दह्यन्ते कुलान्यूर्ध्वं यथा तथा

English

Dharmanotra.

अध्याय १०४

श्लोक 2

कथं प्रयागगमनं नराणां तत्र कीदृशम् मृतानां का गतिस्तत्र स्नातानां तत्र किं फलम्

kathaṃ prayāgagamanaṃ narāṇāṃ tatra kīdṛśam mṛtānāṃ kā gatistatra snātānāṃ tatra kiṃ phalam

हिन्दी अर्थ

सजलानि समाख्यानि सावलोकनकानि च बद्धध्वजपताकानि स्वर्णरौप्यमयानि च। वातायनगताश्चान्याश्चाकाशस्य तलेषु च

English

16 • Kunti.

अध्याय १०४

श्लोक 3

ये वसन्ति प्रयागे तु ब्रूहि तेषां च किं फलम् एतन्मे सर्वमाख्याहि परं कौतूहलं हि मे

ye vasanti prayāge tu brūhi teṣāṃ ca kiṃ phalam etanme sarvamākhyāhi paraṃ kautūhalaṃ hi me

हिन्दी अर्थ

काचित्तप्रियं परित्यज्य अशक्ता गन्तुमन्यतः। पुरः प्रियस्य पञ्चत्वं गताग्निवदने क्षयम् है, धिक्कार है, हाय! बड़े कष्टकी बात हो गयी!” यों कहते हुए चिल्ला उठे। इस प्रकार शंकरजीको व्याकुल देखकर गजराजको चालसे चलनेवाले नन्दीश्वर शूलपाणि महेश्वरके निकट पहुँचे और पूछने लगे--“कहिये, क्या

English

Samhata.

अध्याय १०४

श्लोक 4

कथयिष्यामि ते वत्स यच्छ्रेष्ठं तत्र यत्फलम् पुरा हि सर्वविप्राणां कथ्यमानं मया श्रुतम्

kathayiṣyāmi te vatsa yacchreṣṭhaṃ tatra yatphalam purā hi sarvaviprāṇāṃ kathyamānaṃ mayā śrutam

हिन्दी अर्थ

बात है?” तब चन्द्रशेखर जटाजूटधारी भगवान् शंकरने अत्यन्त दुःखी होकर नन्दीश्वरसे कहा--' आज मेरा वह भक्त मय भी नष्ट हो जायगा।' यह सुनकर मन और वायुके समान वेगशाली महाबली नन्दीश्वर तुरंत उस बाणके त्रिपुरमें पहुँचनेके पूर्व ही वहाँ जा पहुँचे। वहाँ स्वर्ण-सरीखे कान्तिमान् गणेश्वर नन्दीने मयके निकट जाकर कहा-'मय! इस त्रिपुरका अत्यन्त भयंकर विनाश आ पहुँचा है, इसलिये मैं तुम्हें बतला रहा हूँ। तुम अपने इस गृहके साथ इससे बाहर निकल जाओ।' तब महेश्वरके प्रति दृढ़ भक्ति रखनेवाला मय नन्दीश्वरके उस वचनको सुनकर अपने उस मुख्य गृहके साथ त्रिपुरसे निकलकर भाग गया। तदनन्तर वह बाण अग्नि,

English

Mahimat.

अध्याय १०४

श्लोक 5

आ प्रयागप्रतिष्ठानाद् आपुराद्वासुकेर्ह्रदात् कम्बलाश्वतरौ नागौ नागश्च बहुमूलकः एतत्प्रजापतेः क्षेत्रं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्

ā prayāgapratiṣṭhānād āpurādvāsukerhradāt kambalāśvatarau nāgau nāgaśca bahumūlakaḥ etatprajāpateḥ kṣetraṃ triṣu lokeṣu viśrutam

हिन्दी अर्थ

सोम और नारायणके रूपसे तीन भागोंमें विभक्त होकर उन तीनों नगरोंको पत्तेके दोनेकी तरह जलाकर भस्म कर दिया। द्विजवरो! वे तीनों पुर बाणके तेजसे उसी प्रकार जलकर नष्ट हो रहे थे, जैसे कुपुत्रके दोषसे आगेकी पीढ़ियाँ नष्ट हो जाती हैं ॥४५--५४॥

English

Rudrasronya.

अध्याय १०४

श्लोक 6

तत्र स्नात्वा दिवं यान्ति ये मृतास्ते ऽपुनर्भवाः ततो ब्रह्मादयो देवा रक्षां कुर्वन्ति संगताः

tatra snātvā divaṃ yānti ye mṛtāste 'punarbhavāḥ tato brahmādayo devā rakṣāṃ kurvanti saṃgatāḥ

हिन्दी अर्थ

उस त्रिपुरमें ऐसे गृह बने थे जो सुमेरु, कैलास और मन्दराचलके अग्रभागकी तरह दीख रहे थे। जिनमें बड़े-बड़े किंवाड़ और झरोखे लगे हुए थे तथा छज्जाओंकी विचित्र छटा दीख रही थी। जो सुन्दर महलों, उत्कृष्ट कूटागारों (ऊपरी छतके कमरों), जल रखनेकी वेदिकाओं और खिड़्कियोंसे सुशोभित थे। जिनके ऊपर सुवर्ण एवं चाँदीके बने हुए डंडोंमें बँधे हुए ध्वज और पताकाएँ फहरा रही थीं। ये सभी हजारोंकी संख्यामें दानवोंके उस उपद्रवके समय अग्निद्वारा जलाये जा रहे थे, जो आगकी तरह धधक रहे थे। दानवेन्द्रोंकी रित्रयाँ, जिनमें कुछ महलोंके रमणीय शिखरोंपर बैठी थीं, कुछ वनों

English

Dnrdama.

अध्याय १०४

श्लोक 7

अन्ये च बहवस्तीर्थाः सर्वपापहराः शुभाः न शक्याः कथितुं राजन् बहुवर्षशतैरपि संक्षेपेण प्रवक्ष्यामि प्रयागस्य तु कीर्तनम्

anye ca bahavastīrthāḥ sarvapāpaharāḥ śubhāḥ na śakyāḥ kathituṃ rājan bahuvarṣaśatairapi saṃkṣepeṇa pravakṣyāmi prayāgasya tu kīrtanam

हिन्दी अर्थ

और उपवनोंमें घूम रही थीं, कुछ झरोखोंमें बैठकर दृश्य देख रही थीं कुछ मैदानमें घूम रही थीं-ये सभी अग्निद्वारा जलायी जा रही थीं। कोई अपने पतिको छोड़कर अन्यत्र जानेमें असमर्थ थी, अतः पतिके सम्मुख ही अग्निकी लपटोंमें आकर दग्ध हो

English

Kritavirya. Erltlgni. Eritavarman. Erltaujas.

अध्याय १०४

श्लोक 8

षष्टिर्धनुःसहस्राणि यानि रक्षन्ति जाह्नवीम् यमुनां रक्षति सदा सविता सप्तवाहनः

ṣaṣṭirdhanuḥsahasrāṇi yāni rakṣanti jāhnavīm yamunāṃ rakṣati sadā savitā saptavāhanaḥ

हिन्दी अर्थ

धर्मसाक्षी त्रिलोकस्य न मां स्प्रष्टमिहा्हसि शायितं च मया देव शिवया च शिवप्रभ। शरेण प्रेहि मुक्त्वेदं गृहं च दयितं हि मे एका पुत्रमुपादाय बालकं दानवाङ्गना। हुताशनसमीपस्था इत्युवाच हुताशनम्

English

22* Arjuna.

अध्याय १०४

श्लोक 9

प्रयागं तु विशेषेण सदा रक्षति वासवः मण्डलं रक्षति हरिर् दैवतैः सह संगतः

prayāgaṃ tu viśeṣeṇa sadā rakṣati vāsavaḥ maṇḍalaṃ rakṣati harir daivataiḥ saha saṃgataḥ

हिन्दी अर्थ

काश्चित् प्रियान् परित्यज्य पीडिता दानवाङ्गनाः। निपतन्त्यर्णवजले शिञ्जमानविभूषणाः यथा दहति शैलाग्निः साम्बुजं जलजाकरम्। तथा स्त्रीवक्त्रपद्यानि चादहत् पुरेऽनलः

English

I 'T, I I --I I

अध्याय १०४

श्लोक 10

तं वटं रक्षति सदा शूलपाणिर्महेश्वरः स्थानं रक्षन्ति वै देवाः सर्वपापहरं शुभम्

taṃ vaṭaṃ rakṣati sadā śūlapāṇirmaheśvaraḥ sthānaṃ rakṣanti vai devāḥ sarvapāpaharaṃ śubham

हिन्दी अर्थ

तुषारराशिः कमलाकराणां यथा दहत्यम्बुजकानि शीते। तत्राङ्गनानामतिकोमलानाम् । बभूव काञ्जीगुणनूपुराणा- माक्रन्दितानां च रवोऽति मिश्रः दग्धार्धचन्द्राणि सवेदिकानि

English

> Sdrasoua. Bura. Eroftn. Jayadhvaja. Avanti and 05 olbers.

अध्याय १०४

श्लोक 11

अधर्मेणावृतो लोको नैव गच्छति तत्पदम् स्वल्पमल्पतरं पापं यदा ते स्यान्नराधिप प्रयागं स्मरमाणस्य सर्वमायाति संक्षयम्

adharmeṇāvṛto loko naiva gacchati tatpadam svalpamalpataraṃ pāpaṃ yadā te syānnarādhipa prayāgaṃ smaramāṇasya sarvamāyāti saṃkṣayam

हिन्दी अर्थ

गृहैः पतद्द्रिज्चलनावलीढै- गयी। कोई कमलनयनी नारी आँखोंमें आँसू भरे हुए हाथ जोड़कर कह रही थी--'हव्यवाहन ! मैं दूसरेकी पली हूँ। परतापन! आप त्रिलोकीके धर्मके साक्षी हैं, अतः यहाँ मेरा स्पर्श करना आपके लिये उचित नहीं है।' (कोई कह

English

APPENDIX 11. VriJiniTat. 24. Ttlajanghs.

अध्याय १०४

श्लोक 12

दर्शनात्तस्य तीर्थस्य नामसंकीर्तनादपि मृत्तिकालम्भनाद्वापि नरः पापात्प्रमुच्यते

darśanāttasya tīrthasya nāmasaṃkīrtanādapi mṛttikālambhanādvāpi naraḥ pāpātpramucyate

हिन्दी अर्थ

रही थी) 'शिवके समान कान्तिमान् अग्निदेव! मुझ पतित्रताने इस घरमें अपने पतिको सुला रखा है, अतः इसे छोड़कर आप दूसरी ओरसे चले जाइये; क्योंकि यह गृह मुझे परम प्रिय है।' एक दानवपत्नी अपने शिशु पुत्रको गोदमें लेकर अग्निके समीप गयी और अग्निसे कहने लगी--'स्वामीकार्तिकके प्रेमी पावक! मुझे यह शिशु पुत्र बड़े दु:खसे प्रात हुआ है, अतः इसे ले लेना आपके लिये उचित नहीं है। यह मुझे परम प्रिय है।' कुछ पीड़ित हुई दानव-पत्नियाँ अपने पतियोंको छोड़कर समुद्रके जलमें कूद रही थीं। उस समय उनके आभूषणोंसे शब्द हो रहा था। त्रिपुरमें आगकी लपरोंके भयसे काँपती हुई

English

I 25» STtha.

अध्याय १०४

श्लोक 13

पञ्च कुण्डानि राजेन्द्र तेषां मध्ये तु जाह्नवी प्रयागस्य प्रवेशे तु पापं नश्यति तत्क्षणात्

pañca kuṇḍāni rājendra teṣāṃ madhye tu jāhnavī prayāgasya praveśe tu pāpaṃ naśyati tatkṣaṇāt

हिन्दी अर्थ

कहकर विह्वलतापूर्वक करुण-क्रन्दन कर रही थीं। जैसे पर्वताग्नि (दावाग्नि) कमलोंसहित सरोवरको जला देती है उसी प्रकार अग्निदेव त्रिपुरमें स्त्रियोंक मुखरूपी कमलोंको जला रहे थे जिस प्रकार शीतकालमें तुषारराशि कमलोंसे भरे हुए सरोवरोंके कमलोंको नष्ट कर देती है उसी तरह अग्निदेव त्रिपुर-निवासिनी नारियोंके मुख और नेत्ररूप कमलोंको जला रहे थे। त्रिपुरमें बाणाग्निके गिरनेसे

English

Vttihotras. 25. Bhojas. 25. 26g Anarta.

अध्याय १०४

श्लोक 14

योजनानां सहस्रेषु गङ्गायाः स्मरणान्नरः अपि दुष्कृतकर्मा तु लभते परमां गतिम्

yojanānāṃ sahasreṣu gaṅgāyāḥ smaraṇānnaraḥ api duṣkṛtakarmā tu labhate paramāṃ gatim

हिन्दी अर्थ

भयभीत होकर भागती हुई अत्यन्त कोमलाङ्गी सुन्दरियोंकी करधनीको लड़ियों और पायजेबोंका शब्द आक्रन्दनके शब्दोसे मिलकर अत्यन्त भयंकर लग रहा था। जिनमें अर्धचन्द्रसे सुशोभित वेदिकाएँ जल गयी थीं तथा तोरणसहित अट्टालिकाएँ जलकर छिन्न-भिन्न हो गयी थीं । ऐसे गृह जलते-जलते समुद्रमें इस प्रकार गिर रहे थे मानो वे रक्षाके लिये उसमें कूद रहे हों। अग्निकी लपटोंसे झुलसे हुए गृहोंके समुद्रमें गिरनेसे उसका जल ऐसा संतप्त हो उठा था, जैसे सम्पत्तिशाली

English

* (Dorjeya) Amitra Karsana.

अध्याय १०४

श्लोक 15

कीर्तनान्मुच्यते पापाद् दृष्ट्वा भद्राणि पश्यति अवगाह्य च पीत्वा तु पुनात्यासप्तमं कुलम्

kīrtanānmucyate pāpād dṛṣṭvā bhadrāṇi paśyati avagāhya ca pītvā tu punātyāsaptamaṃ kulam

हिन्दी अर्थ

व्यक्तिका कुल कुपुत्रके दोषसे नष्ट-भ्रष्ट हो जाता है। प्राकारवर्यस्त्रिप्रे च सोऽथ।

English

Kandikerav Ufftngu.

अध्याय १०४

श्लोक 16

सत्यवादी जितक्रोधो ह्य् अहिंसायां व्यवस्थितः धर्मानुसारी तत्त्वज्ञो गोब्राह्मणहिते रतः

satyavādī jitakrodho hy ahiṃsāyāṃ vyavasthitaḥ dharmānusārī tattvajño gobrāhmaṇahite rataḥ

हिन्दी अर्थ

तद् देवेशो वचः श्रुत्वा इन्द्रो वज्रधरस्तदा। शशाप तद्गृहं चापि मयस्यादितिनन्दनः असेव्यमप्रतिष्ठं च भयेन च समावृतम्। भविष्यति मयगृहं नित्यमेव यथानलः देवद्विट् तु मयश्चातः स तदा खिन्नमानसः। ततश्च युतोऽन्यलोकेऽस्मिंस्त्राणार्थं स चकार सः

English

Chitraratha.

अध्याय १०४

श्लोक 17

गङ्गायमुनयोर्मध्ये स्नातो मुच्येत किल्बिषात् मनसा चिन्तयन्कामान् अवाप्नोति सुपुष्कलान्

gaṅgāyamunayormadhye snāto mucyeta kilbiṣāt manasā cintayankāmān avāpnoti supuṣkalān

हिन्दी अर्थ

तत्रापि देवताः सन्ति आस्तोर्यामाः सुरोत्तमाः। तत्राशक्तं ततो गन्तुं तं चैकं पुरमुत्तमम् उस समय समुद्रमें चारों ओर गिरते हुए गृहोंकी उष्णतासे खौलते हुए जलमें तूफान आ गया, जिससे

English

iaavinda. I i i i i TH"

अध्याय १०४

श्लोक 18

ततो गत्वा प्रयागं तु सर्वदेवाभिरक्षितम् ब्रह्मचारी वसेन्मासं पितॄन्देवांश्च तर्पयेत् ईप्सितांल्लभते कामान् यत्र यत्राभिजायते

tato gatvā prayāgaṃ tu sarvadevābhirakṣitam brahmacārī vasenmāsaṃ pitṝndevāṃśca tarpayet īpsitāṃllabhate kāmān yatra yatrābhijāyate

हिन्दी अर्थ

संतप्त होकर भयभीत हो उठे। उसी समय त्रिपुरमें लगा हुआ मन्दराचलके समान ऊँचा परकोटा फाटकसहित उन गिरते हुए भवनोंके साथ-ही-साथ महान् शब्द करता हुआ समुद्रमें जा गिरा। जो त्रिपुर थोड़ी देर पहले सहस्रों ऊँचे-ऊँचे भवनोंसे युक्त होनेके कारण सहस्र शिखरवाले पर्वतकी भाँति शोभा पा रहा था वही अग्निके आहार और बलिके रूपमें प्रयुक्त होकर नाममात्र अवशेष रह गया। जलते हुए उस त्रिपुरके तापसे पाताल और स्वर्गलोकसहित सारा जगत् संतप्त हो उठा। इस प्रकार महान् कष्ट झेलता हुआ वह त्रिपुर समुद्रके जलमें निमग्न हो गया। इसमें एकमात्र मयका

English

dravaa. yasas. man. Jaya. kirti. aud94otLoraa

अध्याय १०४

श्लोक 19

तपनस्य सुता देवी त्रिषु लोकेषु विश्रुता समागता महाभागा यमुना तत्र निम्नगा तत्र संनिहितो नित्यं साक्षाद्देवो महेश्वरः

tapanasya sutā devī triṣu lokeṣu viśrutā samāgatā mahābhāgā yamunā tatra nimnagā tatra saṃnihito nityaṃ sākṣāddevo maheśvaraḥ

हिन्दी अर्थ

देवराज इन्द्रने जब ऐसी बात सुनी तो मयके उस गृहको शाप देते हुए बोले-'मयका वह गृह किसीके सेवन करनेयोग्य नहीं होगा। उसकी संसारमें प्रतिष्ठा नहीं होगी। वह अग्रिकी तरह सदा भयसे युक्त बना रहेगा। जिस-जिस देशकी पराजय होनेवाली होगी उस-उस देशके विनाशोन्मुख निवासी इस त्रिपुर-खण्डका दर्शन करेंगे।' मयका वह गृह आज भी आपत्तियोसे रहित है

English

Snyajfia. tJsanas.

अध्याय १०४

श्लोक 20

दुष्प्राप्यं मानुषैः पुण्यं प्रयागं तु युधिष्ठिर देवदानवगन्धर्वा ऋषयः सिद्धचारणाः तदुपस्पृश्य राजेन्द्र स्वर्गलोकमुपासते

duṣprāpyaṃ mānuṣaiḥ puṇyaṃ prayāgaṃ tu yudhiṣṭhira devadānavagandharvā ṛṣayaḥ siddhacāraṇāḥ tadupaspṛśya rājendra svargalokamupāsate

हिन्दी अर्थ

ऋषियोंने पूछा-चमससे उत्पन्न होनेवाले ऐश्वर्यशाली सूतजी! वह मय जिस गृहको साथ लेकर भाग गया था, उस मयकी आगे चलकर क्या गति हुई? यह हमें बतलाइये सूतजी कहते हैं-ऋषियो! जहाँ ध्रुव दिखलायी पड़ते हैं वहीं मयका भी स्थान दीख पड़ता था, किंतु कुछ समयके बाद देवशत्रु मयका मन खिन्न हो गया, तब वह अपनी रक्षाके निमित्त बहाँसे हटकर अन्य लोकमें चला गया। वहाँ भी आप्तोर्याम नामक श्रेष्ठ देवता निवास करते थे, परंतु अब मयमें वहाँसे अन्यत्र जानेकी शक्ति नहीं रह गयी थी।

English

Titiksn.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_matsyapurANa1-176.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Matsya Purana — Chapter 104
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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