Matsya Purana· Matsya Purāṇa
107
अध्याय 107 / 176

Adhyaya 107

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अध्याय १०७

श्लोक 1

मत्स्य-पुराण १०७ शृणु राजन्प्रयागस्य माहात्म्यं पुनरेव तु यच्छ्रुत्वा सर्वपापेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः

matsya-purāṇa 107 śṛṇu rājanprayāgasya māhātmyaṃ punareva tu yacchrutvā sarvapāpebhyo mucyate nātra saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

भी उपस्थित हुए। इस प्रकार ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अधर्ववेद-सम्बन्धी जो मन्त्र हैं, वे सपर्षियोंद्वार कहे गये हैं। स्मार्तधर्मका वर्णन तो मनुने किया है। त्रेतायुगके आदिमें ये सभी वेद धर्मके सेतु-स्वरूप थे, किंतु द्वापरयुगमें आयुके न्यून हो जानेके कारण उनका विभाग कर दिया गया है। ऋषि अपने धर्मसे परिपूर्ण हैं। वे तपमें निरत हो रात-दिन वेदाध्ययन करते थे। ब्रह्माने सर्वप्रथम प्रत्येक युगमें युगधर्मानुसार इनका

English

iiJunAga 40. d. 742 B. C.

अध्याय १०७

श्लोक 2

मानसं नाम तत्तीर्थं गङ्गाया उत्तरे तटे त्रिरात्रोपोषितो भूत्वा सर्वकामानवाप्नुयात्

mānasaṃ nāma tattīrthaṃ gaṅgāyā uttare taṭe trirātropoṣito bhūtvā sarvakāmānavāpnuyāt

हिन्दी अर्थ

साङ्गोपाङ्ग वर्णन किया है। वे योगानुकूल वेदवादसे स्खलित होकर अपने धर्मसे विकृत हो जाते हैं । त्रेतायुगमें ब्राह्मणोंका धर्म जपयज्ञ, क्षत्रियोंका यज्ञारम्भ, वैश्योंका हविर्यज्ञ और शूद्रोंका सेवायज्ञ कहा जाता था। उस समय सभी वर्णके लोग उन्नत, धर्मात्मा, क्रियानिष्ठ, ब्राह्मण क्षत्रियोंके लिये और क्षत्रिय वैश्योंके लिये सब प्रकारका विधान करते थे तथा शूद्र वैश्योंका अनुवर्तन करते थे। उनके स्वभाव सुन्दर थे तथा उनके धर्म वर्ण एवं आश्रमके अनुकूल होते थे

English

Kakavarna or V. Sakavarna 30 d. 700 R. C

अध्याय १०७

श्लोक 3

गोभूहिरण्यदानेन यत्फलं प्राप्नुयान्नरः स तत्फलमवाप्नोति तत्तीर्थं स्मरते पुनः

gobhūhiraṇyadānena yatphalaṃ prāpnuyānnaraḥ sa tatphalamavāpnoti tattīrthaṃ smarate punaḥ

हिन्दी अर्थ

समूचे त्रेतायुगके कार्यकालमें मानसिक संकल्प, वचन और हाथसे प्रारम्भ किये गये कर्म सिद्ध होते थे। त्रेतायुगमें आयु, रूप, बल, बुद्धि, नीरोगता और धर्मपरायणता- ये सभी गुण सर्वसाधारण लोगोंमें भी विद्यमान थे। वर्णाश्रमव्यवस्थानामेषां ब्रह्मा तथाकरोत्। संहिताश्च तथा मन्त्रा आरोग्यं धर्मशीलता

English

Ksetnadliarman 30 d. 070 B. C.

अध्याय १०७

श्लोक 4

अकामो वा सकामो वा गङ्गायां यो ऽभिपद्यते मृतस्तु लभते स्वर्गं नरकं च न पश्यति

akāmo vā sakāmo vā gaṅgāyāṃ yo 'bhipadyate mṛtastu labhate svargaṃ narakaṃ ca na paśyati

हिन्दी अर्थ

संहिताश्च तथा मन्त्रा ऋषिभिर्ब्रह्मणः सुतैः। यज्ञः प्रवर्तितश्चैव तदा होव तु हैवतैः विश्वसृडभिस्तथा सार्ध देवेन्द्रेण महौजसा। स्वायम्भुवेऽन्तरे देवैस्ते यज्ञाः प्राक् प्रवर्तिताः सत्यं जपस्तपो दानं पूर्वधर्मो य उच्यते। यदा धर्मस्य हसते शारत्राधर्मस्य वर्धते

English

K§atraujas (or Bh. Ksetrajna. Mt. Ksoinajit) 40: d. 030

अध्याय १०७

श्लोक 5

अप्सरोगणसंगीतैः सुप्तो ऽसौ प्रतिबुध्यते हंससारसयुक्तेन विमानेन स गच्छति बहुवर्षसहस्राणि स्वर्गं राजेन्द्र भुञ्जति

apsarogaṇasaṃgītaiḥ supto 'sau pratibudhyate haṃsasārasayuktena vimānena sa gacchati bahuvarṣasahasrāṇi svargaṃ rājendra bhuñjati

हिन्दी अर्थ

न्यस्तदण्डा महायोगा यज्वानो ब्रह्मवादिनः सिंहोरस्का महासत्त्वा मत्तमातङ्गगामिनः

English

Vimbisara: Bd. 38. d. 3'32 Jk C.

अध्याय १०७

श्लोक 6

ततः स्वर्गात्परिभ्रष्टः क्षीणकर्मा दिवश्च्युतः सुवर्णमणिमुक्ताढ्ये जायते विपुले कुले

tataḥ svargātparibhraṣṭaḥ kṣīṇakarmā divaścyutaḥ suvarṇamaṇimuktāḍhye jāyate vipule kule

हिन्दी अर्थ

केतुर्निधिश्च पञ्चैते प्राणहीनाः प्रकीर्तिताः अत्यद्भुतानि चत्वारि बलं धर्म सुखं धनम् ब्रह्माने स्वयं इनके लिये वर्णाश्रमकी व्यवस्था की थी तथा ब्रह्माके मानसिक पुत्र ऋषियोंद्वारा संहिताओं, मन्त्रो, नीरोगता और धर्मपरायणताका विधान किया गया था। उसी समय देवताओंने यज्ञकी भी प्रथा प्रचलित की थी।

English

Ajataiiatru: Mt» 27. d. 505 B. C.

अध्याय १०७

श्लोक 7

षष्टितीर्थसहस्राणि षष्टिकोट्यस्तथापगाः माघमासे गमिष्यन्ति गङ्गायमुनसंगमम्

ṣaṣṭitīrthasahasrāṇi ṣaṣṭikoṭyastathāpagāḥ māghamāse gamiṣyanti gaṅgāyamunasaṃgamam

हिन्दी अर्थ

स्वायम्भुव मन्वन्तरमें सम्पूर्ण यज्ञिय साधनोंसहित याम, शुक्ल, जय, विश्वसृज् तथा महान् तेजस्वी देवराज इन्द्रके साथ देवताओंने सर्वप्रथम इन यज्ञोंका प्रचार किया था। धर्म कहलाते थे। जब इन धर्मोका हास प्रारम्भ होता था और अधर्मकी शाखाएँ बढ़ने लगती थीं, तब त्रेतायुगमें ऐसे शूरवीर चक्रवर्ती सम्राट् उत्पन्न होते थे, जो

English

Dariiaka (or Bd, Vs, Bh Jhirbhaka, or VaihiJaka). 25. d. 540

अध्याय १०७

श्लोक 8

गवां शतसहस्रस्य सम्यग्दत्तस्य यत्फलम् प्रयागे माघमासे तु त्र्यहस्नानात्तु तत्फलम्

gavāṃ śatasahasrasya samyagdattasya yatphalam prayāge māghamāse tu tryahasnānāttu tatphalam

हिन्दी अर्थ

यज्ञपरायण और ब्रह्मनिष्ठ थे, जिनके नेत्र कमलदलके सुसंगठित थे, जिनकी छाती सिंहके समान चौड़ी थी, जो महान् पराक्रमी और मतवाले गजराजकी भाँति चलनेवाले और महान् धनुर्धर थे, वे सभी राजलक्षणोंसे यहाँ दोनों बाहुओंको ही न्यग्रोध कहा जाता है तथा व्योममें फैलायी हुई बाहुओंका मध्यभाग भी न्यग्रोध कहलाता है। उस व्योमकी ऊँचाई और विस्तारवाला 'न्यग्रोधपरिमण्डल' कहलाता है, अतः जिस प्राणीका

English

Udayin (or W fJdaya.'iva, Or Mt, Udiisin. Or Bh. Ajaya) 33. Founder of Kusumpura: d. 5o7 R. C.

अध्याय १०७

श्लोक 9

गङ्गायमुनयोर्मध्ये कर्षाग्निं यस्तु साधयेत् अहीनाङ्गो ह्यरोगश्च पञ्चेन्द्रियसमन्वितः

gaṅgāyamunayormadhye karṣāgniṃ yastu sādhayet ahīnāṅgo hyarogaśca pañcendriyasamanvitaḥ

हिन्दी अर्थ

शरीर व्योमके बराबर ऊँचा और विस्तृत हो, उसे न्यग्रोधपरिमण्डल कहा जाता है। पूर्वकालके स्वायम्भुव मन्वन्तरमें चक्र (शासन, अज्ञाद भी), रथ, मणि, भार्या, हैं। दूसरा चक्र (अचल) रथ, मणि, खड्ग, धनुष, रत्न, झंडा और खजाना-ये स्थिर (अचल) सप्तरत्न हैं। (सब मिलकर ये ही राजाओंके चौदह रत्न हैं।) बीते हुए एवं आनेवाले सभी मन्वन्तरोंमें भूतलपर चक्रवर्ती

English

Nandivardhaiia Va, 12 d. 4(»r) B. (:.

अध्याय १०७

श्लोक 10

यावन्ति रोमकूपाणि तस्य गात्रेषु देहिनः तावद्वर्षसहस्राणि स्वर्गलोके महीयते

yāvanti romakūpāṇi tasya gātreṣu dehinaḥ tāvadvarṣasahasrāṇi svargaloke mahīyate

हिन्दी अर्थ

सम्राट् विष्णुके अंशसे उत्पन्न होते हैं इस प्रकार भूत, भविष्य और वर्तमानमें जितने त्रेतायुग हुए होंगे और हैं, उन सभीमें चक्रवर्ती सम्राट् उत्पन्न होते हैं। उन भूपालोंके बल, धर्म, सुख और होते हैं। उन राजाओंको अर्थ, धर्म, काम, यश और विजय

English

Mahanandin fBd. Sahanandi) Hi. cl. 122 B. (j.

अध्याय १०७

श्लोक 11

ततः स्वर्गात्परिभ्रष्टो जम्बूद्वीपपतिर्भवेत् स भुक्त्वा विपुलान्भोगांस् तत्तीर्थं स्मरते पुनः

tataḥ svargātparibhraṣṭo jambūdvīpapatirbhavet sa bhuktvā vipulānbhogāṃs tattīrthaṃ smarate punaḥ

हिन्दी अर्थ

अर्थो धर्मश्च कामश्च यशो विजय एव च॥ ६८ ये सभी समानरूपसे परस्पर अविरोध भावसे प्राप्त होते हैं। वाल्मीकीय रामायण ३। ३५ तथा भट्टिकाव्य ५ में सीताजीको 'न्यग्रोधपरिमण्डला' कहा गया है।

English

ended in 422 (i, C., when Mahapadma Nanda killed xMalulnandin tiint year.

अध्याय १०७

श्लोक 12

जलप्रवेशं यः कुर्यात् संगमे लोकविश्रुते राहुग्रस्ते तथा सोमे विमुक्तः सर्वकिल्बिषैः

jalapraveśaṃ yaḥ kuryāt saṃgame lokaviśrute rāhugraste tathā some vimuktaḥ sarvakilbiṣaiḥ

हिन्दी अर्थ

बलेनाभिभवन्त्येते देवदानवमानवान्। लक्षणैश्चैव जायन्ते शरीरस्थैरमानुषैः केशाः स्थिता ललाटोर्णा जिह्वा चास्य प्रमार्जनी। ताम्रप्रभाश्चतुर्दष्ट्राः सुवंशाश्चोर्ध्वरेतसः पादयोश्चक्रमत्स्यौ तु शङ्खपदो च हस्तयोः। पञ्चाशीतिसहस्त्राणि जीवन्ति ह्यजरामयाः

English

B&rhadrathas ... 1,000

अध्याय १०७

श्लोक 13

सोमलोकमवाप्नोति सोमेन सह मोदते षष्टिवर्षसहस्राणि स्वर्गलोके महीयते

somalokamavāpnoti somena saha modate ṣaṣṭivarṣasahasrāṇi svargaloke mahīyate

हिन्दी अर्थ

इज्या दानं तपः सत्यं त्रेताधर्मास्तु वै स्मृताः। तदा प्रवर्तते धर्मो वर्णाश्रमविभागशः। मर्यादास्थापनार्थं च दण्डनीतिः प्रवर्तते एको वेदश्चतुष्पादस्त्रेतायां तु विधिः स्मृतः। त्रीणि वर्षसहस्त्राणि जीवन्ते तत्र ताः प्रजा:

English

Pradyotas

अध्याय १०७

श्लोक 14

स्वर्गे च शक्रलोके ऽस्मिन् नृषिगन्धर्वसेविते परिभ्रष्टस्तु राजेन्द्र समृद्धे जायते कुले

svarge ca śakraloke 'smin nṛṣigandharvasevite paribhraṣṭastu rājendra samṛddhe jāyate kule

हिन्दी अर्थ

पुत्रपौत्रसमीकीर्णा प्रियन्ते च क्रमेण ताः। एष त्रेतायुगे भावस्त्रेतासंध्यां निबोधत प्रभुशक्ति और बलसे सम्पन्न वे नृपतिगण ऐश्वर्य, अणिमा आदि सिद्धि, शार्त्रज्ञान और तपस्यामें ऋषियोंसे भी बढ़-चढ़कर होते हैं। इसलिये वे सम्पूर्ण देव-दानवों और मानवोंको बलपूर्वक पराजित कर देते हैं। उनके शरीरमें स्थित सभी लक्षण दिये होते हैं। उनके सिरके बाल ललाटतक फैले रहते हैं। उनकी जीभ बड़ी स्वच्छ और स्निग्ध होती है। उनकी अङ्गकान्ति लाल होती है। उनके चार दाढ़ें होते हैं वे उत्तम वंशमें उत्पन्न, ऊर्ध्वरेता,

English

Bisimagas The grand total... 1,498

अध्याय १०७

श्लोक 15

अधःशिरास्तु यो ज्वालाम् ऊर्ध्वपादः पिबेन्नरः शतवर्षसहस्राणि स्वर्गलोके महीयते

adhaḥśirāstu yo jvālām ūrdhvapādaḥ pibennaraḥ śatavarṣasahasrāṇi svargaloke mahīyate

हिन्दी अर्थ

आजानुबाहु, जालहस्त हाथोंमें जालचिह् तथा बैल आदि श्रेष्ठ चिह्ययुक्त परिणाहमात्र लम्बे होते हैं। उनके कंधे सिंहके समान मांसल और वे यज्ञपरायण होते हैं। उनके पैरॉमें चक्र और मत्स्यके तथा हाथोंमें शङ्ख और पद्मके चिह्न होते हैं। वे बुढापा और व्याधिसे रहित होकर पचासी हजार वर्षोतक जीवित रहते हैं। वे चक्रवर्ती सम्राट्

English

Nanda'a abhi§eka or inauguration took place in 1,498 or roughly 1,500 years after the bii tb of Parikijit.

अध्याय १०७

श्लोक 16

परिभ्रष्टस्तु राजेन्द्र सो ऽग्निहोत्री भवेन्नरः भुक्त्वा तु विपुलान्भोगांस् तत्तीर्थं भजते पुनः

paribhraṣṭastu rājendra so 'gnihotrī bhavennaraḥ bhuktvā tu vipulānbhogāṃs tattīrthaṃ bhajate punaḥ

हिन्दी अर्थ

एकाकी एवं स्वच्छन्दरूपसे विचरण करते हैं। यज्ञ, दान, तप और सत्यभाषण--ये त्रेतायुगके प्रधान धर्म कहे गये हैं। ये धर्म वर्ण एवं आश्रमके विभागपूर्वक प्रवृत्त होते हैं। इनमें मर्यादाकी स्थापनाके निमित्त दण्डनीतिका प्रयोग किया जाता है । त्रेतायुगमें एक वेद चार भागोंमें विभक्त होकर विधान करता है। उस होते हैं। वे प्रजाएँ तीन हजार वर्षोतक जीवित रहती हैं और पुत्र-पौत्रसे युक्त होकर क्रमशः मृत्युको प्राप्त होती हैं। यही त्रेतायुगका स्वभाव है। अब उसकी संध्याके

English

Post-NANDA Magadha Dynasties. L Nanda Dynasty cfunmenccMl in 422 B. 0.

अध्याय १०७

श्लोक 17

यः स्वदेहं तु कर्तित्वा शकुनिभ्यः प्रयच्छति विहगैरुपभुक्तस्य शृणु तस्यापि यत्फलम्

yaḥ svadehaṃ tu kartitvā śakunibhyaḥ prayacchati vihagairupabhuktasya śṛṇu tasyāpi yatphalam

हिन्दी अर्थ

चरण रह जाता है। उसी प्रकार संध्यांशमें संध्याका चतुर्थांश शेष रहता है अर्थात् उत्तरोत्तर परिवर्तन होता जाता है॥ ६६--७८ ॥ इति श्रीमत्स्ये महापुराणे मन्वन्तरानुकल्पो नाम द्विचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः

English

Mahapadina Nanda 88 (28, d. 334 B. C.

अध्याय १०७

श्लोक 18

शतं वर्षसहस्राणां सोमलोके महीयते तस्मादपि परिभ्रष्टो राजा भवति धार्मिकः

śataṃ varṣasahasrāṇāṃ somaloke mahīyate tasmādapi paribhraṣṭo rājā bhavati dhārmikaḥ

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें मन्वन्तरानुकल्प नामक एक सौ बयालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ यज्ञकी प्रवृत्ति तथा विधिका वर्णन ऋषियोंने पूछा-सूतजी! पूर्वकालमें स्वायम्भुवमनुके कार्य- कथं त्रेतायुगमुखे यज्ञस्यासीत् प्रवर्तनम्। पूर्वे स्वायम्भुवे सगे यथावत् प्रब्रवीहि नः॥ १ कालमें त्रेतायुगके प्रारम्भमें किस प्रकार यज्ञकी प्रवृत्ति

English

Sukalpa /vSaludya or, Vs. Sumatya, or, RIi. Smnalya and 7 otherfi) 12, d. 322 R. 0. TABLE No. V.

अध्याय १०७

श्लोक 19

गुणवान् रूपसम्पन्नो विद्वांश्च प्रियवाचकः भुक्त्वा तु विपुलान्भोगांस् तत्तीर्थं भजते पुनः

guṇavān rūpasampanno vidvāṃśca priyavācakaḥ bhuktvā tu vipulānbhogāṃs tattīrthaṃ bhajate punaḥ

हिन्दी अर्थ

कालाख्यायां प्रवृत्तायां प्रासे त्रेतायुगे तदा ओषधीषु च जातासु प्रवृत्ते वृष्टिसर्जने। प्रतिष्ठितायां वार्तायां ग्रामेषु च पुरेषु च

English

(1) Haupya Dynasty (according to Vfiyu).

अध्याय १०७

श्लोक 20

यामुने चोत्तरे कूले प्रयागस्य तु दक्षिणे ऋणप्रमोचनं नाम तत्तीर्थं परमं स्मृतम्

yāmune cottare kūle prayāgasya tu dakṣiṇe ṛṇapramocanaṃ nāma tattīrthaṃ paramaṃ smṛtam

हिन्दी अर्थ

संहितास्तु सुसंहृत्य कथं यज्ञः प्रवर्तितः। एतच्छूत्वाब्रवीत् सूतः श्रूयतां तत्प्रचोदितम् तथा विश्वभुगिन्द्रस्तु यज्ञं प्रावर्तयत् प्रभुः हैवतैः सह संहत्य सर्वसाधनसंवृतः। तस्याश्वमेधे वितते समाजम्मुर्महर्षयः

English

Chundragupta 24. Ascended 322 B. C. d. 298 B. C. VinduB&ra 25. asc. 298 B. C. died 273 B. C.

अध्याय १०७

श्लोक 21

एकरात्रोषितः स्नात्वा ऋणैः सर्वैः प्रमुच्यते स्वर्गलोकमवाप्नोति अनृणश्च सदा भवेत्

ekarātroṣitaḥ snātvā ṛṇaiḥ sarvaiḥ pramucyate svargalokamavāpnoti anṛṇaśca sadā bhavet

हिन्दी अर्थ

यज्ञकर्मण्यवर्तन्त कर्मण्यग्रे तथर्त्विज:। हृयमाने देवहोत्रे अग्नौ बहुविधं हविः सम्प्रतीतेषु देवेषु सामगेषु च सुस्वरम्। परिक्रान्तेषु लघुषु अध्वर्युपुरुषेषु च

English

Aifoka 36 (26). asc. 273 B. C. died 247 B. C.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_matsyapurANa1-176.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Matsya Purana — Chapter 107
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
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