अध्याय १०७
श्लोक 1
मत्स्य-पुराण १०७ शृणु राजन्प्रयागस्य माहात्म्यं पुनरेव तु यच्छ्रुत्वा सर्वपापेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः
matsya-purāṇa 107 śṛṇu rājanprayāgasya māhātmyaṃ punareva tu yacchrutvā sarvapāpebhyo mucyate nātra saṃśayaḥ
हिन्दी अर्थ
भी उपस्थित हुए। इस प्रकार ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अधर्ववेद-सम्बन्धी जो मन्त्र हैं, वे सपर्षियोंद्वार कहे गये हैं। स्मार्तधर्मका वर्णन तो मनुने किया है। त्रेतायुगके आदिमें ये सभी वेद धर्मके सेतु-स्वरूप थे, किंतु द्वापरयुगमें आयुके न्यून हो जानेके कारण उनका विभाग कर दिया गया है। ऋषि अपने धर्मसे परिपूर्ण हैं। वे तपमें निरत हो रात-दिन वेदाध्ययन करते थे। ब्रह्माने सर्वप्रथम प्रत्येक युगमें युगधर्मानुसार इनका
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iiJunAga 40. d. 742 B. C.