Matsya Purana· Matsya Purāṇa
108
अध्याय 108 / 176

Adhyaya 108

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अध्याय १०८

श्लोक 1

मत्स्य-पुराण १०८ एतच्छ्रुत्वा प्रयागस्य यत्त्वया परिकीर्तितम् विशुद्धं मे ऽद्य हृदयं प्रयागस्य तु कीर्तनात्

matsya-purāṇa 108 etacchrutvā prayāgasya yattvayā parikīrtitam viśuddhaṃ me 'dya hṛdayaṃ prayāgasya tu kīrtanāt

हिन्दी अर्थ

आहूतेषु च देवेषु यज्ञभुक्षु ततस्तदा य इन्द्रियात्मका देवा यज्ञभागभुजस्तु ते। तान् यजन्ति तदा देवाः कल्पादिषु भवन्ति ये अध्वर्यवः प्रैषकाले व्युत्थिता ऋषयस्तथा।

English

KuiiSla (or Daiiaratha Vs. Suyaas; 8.

अध्याय १०८

श्लोक 2

अनाशकफलं ब्रूहि भगवंस्तत्र कीदृशम् यं च लोकमवाप्नोति विशुद्धः सर्वकिल्बिषैः

anāśakaphalaṃ brūhi bhagavaṃstatra kīdṛśam yaṃ ca lokamavāpnoti viśuddhaḥ sarvakilbiṣaiḥ

हिन्दी अर्थ

विश्वभुजं ते त्वपृच्छन् कथं यज्ञविधिस्तव अधर्मो बलवानेष हिंसा धर्मेप्सया तव। नव पशुविधिस्त्विष्टस्तव यज्ञे सुरोत्तम

English

Bandbnp&lita (or Sangata) 8 (Va. B. d. 10).

अध्याय १०८

श्लोक 3

शृणु राजन्प्रयागे तु अनाशकफलं विभो प्राप्नोति पुरुषो धीमाञ् श्रद्दधानो जितेन्द्रियः

śṛṇu rājanprayāge tu anāśakaphalaṃ vibho prāpnoti puruṣo dhīmāñ śraddadhāno jitendriyaḥ

हिन्दी अर्थ

अधर्मो धर्मघाताय प्रारब्धः पशुभिस्त्वया। नायं धर्मो ह्यधर्मोऽयं न हिंसा धर्म उच्यते। आगमेन भवान् धर्म प्रकरोतु यदीच्छति विधिदृष्टेन यज्ञेन धर्मेणाव्यसनेन तु। यज्ञबीजैः सुरश्रेष्ठ त्रिवर्गपरिमोषितैः हुई थी? जब कुतयुगके साथ उसकी संध्या (तथा संध्यांश) दोनों अन्तर्हित हो गये, तब कालक्रमानुसार त्रेतायुगकी संधि प्राप्त हुई। उस समय वृष्टि होनेपर ओषधियाँ उत्पन्न हुई तथा ग्रामों एवं नगरोंमें वार्ता-

English

Dana7(10).

अध्याय १०८

श्लोक 4

अहीनाङ्गो ऽप्यरोगश्च पञ्चेन्द्रियसमन्वितः अश्वमेधफलं तस्य गच्छतस्तु पदे पदे

ahīnāṅgo 'pyarogaśca pañcendriyasamanvitaḥ aśvamedhaphalaṃ tasya gacchatastu pade pade

हिन्दी अर्थ

वृत्तिकी स्थापना हो गयी। उसके बाद वर्णाश्रमको स्थापना करके परम्परागत आये हुए मन्त्रोंद्वारा पुनः संहिताओंको एकत्रकर यज्ञकी प्रथा किस प्रकार प्रचलित हुई? हमलोगोंके प्रति इसका यथार्थरूपसे वर्णन कोजिये। यह सुनकर सूतजीने कहा- ' आपलोगोंके प्रश्‍नानुसार कह रहा हूँ, सुनिये'

English

Dadaratba 8.

अध्याय १०८

श्लोक 5

कुलानि तारयेद्राजन् दश पूर्वान्दशापरान् मुच्यते सर्वपापेभ्यो गच्छेत्तु परमं पदम्

kulāni tārayedrājan daśa pūrvāndaśāparān mucyate sarvapāpebhyo gacchettu paramaṃ padam

हिन्दी अर्थ

सूतजी कहते हैं- ऋषियो ! विश्वभोक्ता सामर्थ्यशाली इन्द्रने ऐहलौकिक तथा पारलौकिक कर्मोमें मन्त्रोंको प्रयुक्तकर देवताओंके साथ सम्पूर्ण साधनोंसे सम्पन्न हो यज्ञ प्रारम्भ किया। उनके उस अश्वमेध-यज्ञके आरम्भ होनेपर उसमें महर्षिगण उपस्थित हुए। उस यज्ञकर्ममें ऋत्विग्गण यज्ञक्रियाको आगे बढ़ा रहे थे। उस समय सर्वप्रथम अग्निमें अनेकों प्रकारके हवनीय पदार्थ डाले जा रहे थे, सामगान करनेवाले देवगण विश्वासपूर्वक ऊँचे स्वरसे सामगान कर रहे थे, अध्वर्युगण धीमे स्वरसे

English

Samprati 9.

अध्याय १०८

श्लोक 6

महाभाग्यं हि धर्मस्य यत्त्वं वदसि मे प्रभो अल्पेनैव प्रयत्नेन बहून्धर्मानवाप्नुते

mahābhāgyaṃ hi dharmasya yattvaṃ vadasi me prabho alpenaiva prayatnena bahūndharmānavāpnute

हिन्दी अर्थ

मध्यभागमें लाया जा रहा था, यज्ञभोक्ता देवोंका आवाहन हो चुका था। जो इन्द्रियात्मक देवता तथा जो यज्ञभागके भोक्ता थे और जो प्रत्येक कल्पके आदिमें उत्पन्न होनेवाले अजानदेव थे, देवगण उनका यजन कर रहे थे। इसी बीच जब यजुर्वेदके अध्येता एवं हवनकर्ता ऋषिगण पशु-बलिका उपक्रम करने लगे, तब यूथ-के- यूथ ऋषि तथा महर्षि उन दीन पशुओंको देखकर उठ खड़े हुए और वे विश्वभुग् नामके विश्वभोक्ता इन्द्रसे

English

lllika 13.

अध्याय १०८

श्लोक 7

अश्वमेधैस्तु बहुभिः प्राप्यते सुव्रतैरिह इमं मे संशयं छिन्द्धि परं कौतूहलं हि मे

aśvamedhaistu bahubhiḥ prāpyate suvratairiha imaṃ me saṃśayaṃ chinddhi paraṃ kautūhalaṃ hi me

हिन्दी अर्थ

पूछने लगे--' देवराज! आपके यज्ञकी यह कैसी विधि है? आप धर्म-प्रापिकी अभिलाषासे जो जीव-हिंसा करनेके लिये उद्यत हैं, यह महान् अधर्म है। सुरश्रेष्ठ! आपके यज्ञमें पशु-हिंसाकी यह नवीन विधि दीख रही है। ऐसा प्रतीत होता है कि आप पशु-हिंसाके व्याजसे धर्मका विनाश करनेके लिये अधर्म करनेपर तुले हुए हैं। यह धर्म नहीं है। यह सरासर अधर्म है। जीव-हिंसा धर्म नहीं कही जाती। इसलिये यदि आप धर्म करना चाहते हैं तो वेदविहित धर्मका अनुष्ठान कोजिये। सुरश्रेष्ठ! वेदविहित विधिके अनुसार किये हुए यज्ञ और दुर्व्यसनरहित धर्मके पालनसे यज्ञके बीजभूत त्रिवर्ग (नित्य धर्म, अर्थ, काम)-की प्राप्ति होती है।

English

Devadbarman 7.

अध्याय १०८

श्लोक 8

शृणु राजन्महावीर यदुक्तं ब्रह्मयोनिना ऋषीणां संनिधौ पूर्वं कथ्यमानं मया श्रुतम्

śṛṇu rājanmahāvīra yaduktaṃ brahmayoninā ṛṣīṇāṃ saṃnidhau pūrvaṃ kathyamānaṃ mayā śrutam

हिन्दी अर्थ

एष यज्ञो महानिन्द्र स्वयम्भुविहितः पुरा। एवं विश्वभुगिन्द्रस्तु ऋषिभिस्तत्त्वदर्शिभिः। उक्तो न प्रतिजग्राह मानमोहसमन्वितः जङ्गमैः स्थावरैः केन यष्टव्यमिति चोच्यते

English

Satadbanvaii or •'e Va. Satamdhanus) Mt. 6, 8.

अध्याय १०८

श्लोक 9

पञ्चयोजनविस्तीर्णं प्रयागस्य तु मण्डलम् प्रविष्टमात्रे तद्भूमाव् अश्वमेधः पदे पदे

pañcayojanavistīrṇaṃ prayāgasya tu maṇḍalam praviṣṭamātre tadbhūmāv aśvamedhaḥ pade pade

हिन्दी अर्थ

महाप्राज्ञ त्वया दृष्टः कथं यज्ञविधिर्नृप। वेदशास्त्रमनुस्मृत्य यज्ञतत्त्वमुवाच ह हिंसा स्वभावो यज्ञस्य इति मे दर्शनागमः। तथैते भाविता मन्त्रा हिंसालिङ्गा महर्षिभिः

English

Bribadratha e Va. 87 70. (B. d. 7).

अध्याय १०८

श्लोक 10

व्यतीतान्पुरुषान्सप्त भविष्यांश्च चतुर्दश नरस्तारयते सर्वान् यस्तु प्राणान्परित्यजेत्

vyatītānpuruṣānsapta bhaviṣyāṃśca caturdaśa narastārayate sarvān yastu prāṇānparityajet

हिन्दी अर्थ

दीर्घेण तपसा युक्तैस्तारकादिनिदर्शनैः। तत्प्रमाणं मया चोक्तं तस्माच्छमितुमहथ तदा प्रवर्ततां यज्ञो ह्यन्यथा मानृतं वचः

English

together are 100.

अध्याय १०८

श्लोक 11

एवं ज्ञात्वा तु राजेन्द्र सदा सेवापरो भवेत् अश्रद्दधानाः पुरुषाः पापोपहतचेतसः न प्राप्नुवन्ति तत्स्थानं प्रयागं देवरक्षितम्

evaṃ jñātvā tu rājendra sadā sevāparo bhavet aśraddadhānāḥ puruṣāḥ pāpopahatacetasaḥ na prāpnuvanti tatsthānaṃ prayāgaṃ devarakṣitam

हिन्दी अर्थ

धर्माणां संशयच्छेत्ता राजा वसुरधोगतः तस्मान्न वाच्यो होकेन बहुज्ञेनापि संशयः। बहुद्वारस्य धर्मस्य सूक्ष्मा दुरनुगा गतिः इन्द्र ! पूर्वकालमें ब्रह्माने इसीको महान् यज्ञ बतलाया है।' तत्त्वदर्शी ऋषियोंद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर भी बिश्वभोक्ता इन्द्रने उनकी बातोंको अङ्गीकार नहीं किया; क्योंकि उस समय वे मान और मोहसे भरे हुए थे। फिर तो इन्द्र और

English

The Maupya Dynasty.

अध्याय १०८

श्लोक 12

स्नेहाद्वा द्रव्यलोभाद्वा ये तु कामवशं गताः कथं तीर्थफलं तेषां कथं पुण्यफलं भवेत्

snehādvā dravyalobhādvā ye tu kāmavaśaṃ gatāḥ kathaṃ tīrthaphalaṃ teṣāṃ kathaṃ puṇyaphalaṃ bhavet

हिन्दी अर्थ

उन महर्षियोके बीच 'स्थावरों या जड्गमोंमेंसे किससे यज्ञानुष्ठान करना चाहिए '--इस बातको लेकर वह अत्यन्त महान् विवाद उठ खड़ा हुआ। यद्यपि वे महर्षि शक्तिसम्पन्न थे, तथापि उन्होंने उस विवादसे खिन्न होकर इन्द्रके साथ संधि करके (उसके निर्णयार्थ) उपरिचर (आकाशचारी राजर्षि) वसुसे प्रश्‍न किया॥ ५--१७॥

English

atadbanvan, 6.

अध्याय १०८

श्लोक 13

विक्रयः सर्वभाण्डानां कार्याकार्यमजानतः प्रयागे का गतिस्तस्य तन्मे ब्रूहि पितामह

vikrayaḥ sarvabhāṇḍānāṃ kāryākāryamajānataḥ prayāge kā gatistasya tanme brūhi pitāmaha

हिन्दी अर्थ

ऋषियोंने पूछा--उत्तानपाद-नन्दन नरेश! आप प्रकारको यज्ञ-विधि देखी है, उसे बतलाइये और हम लोगोंका संशय दूर कीजिये सूतजी कहते हैं-ऋषियो! उन ऋषियोंका प्रश्न सुनकर महाराज वसु उचित-अनुचितका कुछ भी विचार न कर वेद-शास्त्रोंका अनुस्मरण कर यज्ञतत्त्वका वर्णन करे लगे। उन्होंने कहा--' शक्ति एवं समयानुसार प्राप्त हुए पदार्थासे

English

Bribadratba, 7.

अध्याय १०८

श्लोक 14

शृणु राजन्महागुह्यं सर्वपापप्रणाशनम् मासमेकं तु यः स्नायात् प्रयागे नियतेन्द्रियः मुच्यते सर्वपापेभ्यः स गच्छेत्परमं पदम्

śṛṇu rājanmahāguhyaṃ sarvapāpapraṇāśanam māsamekaṃ tu yaḥ snāyāt prayāge niyatendriyaḥ mucyate sarvapāpebhyaḥ sa gacchetparamaṃ padam

हिन्दी अर्थ

यज्ञ करना चाहिए। पवित्र पशुओं और मूल-फलोंसे भी यज्ञ किया जा सकता है। मेरे देखनेमें तो ऐसा लगता है कि हिंसा यज्ञका स्वभाव ही है। इसी प्रकार तारक आदि मन्त्रोंके ज्ञाता उग्रतपस्वी महर्षियोंने हिंसासूचक मन्त्रोंको उत्पन्न किया है। उसीको प्रमाण मानकर मैंने ऐसी बात कही है, अतः आपलोग मुझे क्षमा कीजियेगा। द्विजवरो! यदि आप लोगोंको वेदोंके

English

Aoka, 36.

अध्याय १०८

श्लोक 15

विश्रम्भघातकानां तु प्रयागे शृणु यत्फलम् त्रिकालमेव स्नायीत आहारं भैक्ष्यमाचरेत् त्रिभिर्मासैः स मुच्येत प्रयागे तु न संशयः

viśrambhaghātakānāṃ tu prayāge śṛṇu yatphalam trikālameva snāyīta āhāraṃ bhaikṣyamācaret tribhirmāsaiḥ sa mucyeta prayāge tu na saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

यदि आप वेद-वचनको झूठा मानते हों तो मत कीजिये।' वसुद्ठार ऐसा उत्तर पाकर महर्षियोंने अपनी बुद्धिसे विचार किया और अवश्यम्भावी विषयको जानकर राजा वसुको विमानसे नीचे गिर जानेका तथा पातालमें प्रविष्ट होनेका शाप दे दिया। ऋषियोंके ऐसा कहते ही राजा वसु रसातलमें चले गये। इस प्रकार जो राजा वसु एक दिन आकाशचारी थे, वे रसातलगामी हो गये। ऋषियोंके शापसे उन्हें पातालचारी होना पड़ा। धर्मविषयक संशयोंका निवारण करनेवाले राजा वसु इस प्रकार अधोगतिको प्राप्त हुए

English

His grandson, 70.

अध्याय १०८

श्लोक 16

अज्ञानेन तु यस्येह तीर्थयात्रादिकं भवेत् सर्वकामसमृद्धस्तु स्वर्गलोके महीयते स्थानं च लभते नित्यं धनधान्यसमाकुलम्

ajñānena tu yasyeha tīrthayātrādikaṃ bhavet sarvakāmasamṛddhastu svargaloke mahīyate sthānaṃ ca labhate nityaṃ dhanadhānyasamākulam

हिन्दी अर्थ

इसलिये बहुज्ञ (अत्यन्त विद्वान्) होते हुए भी अकेले किसी धार्मिक संशयका निर्णय नहीं करना चाहिए; क्योंकि अनेक द्वार (मार्ग-) वाले धर्मकी गति अत्यन्त सूक्ष्म देवानृषीनृपादाय स्वायम्भुवमृते मनुम्

English

Dadaratlia, 8.

अध्याय १०८

श्लोक 17

एवं ज्ञानेन सम्पूर्णः सदा भवति भोगवान् तारिताः पितरस्तेन नरकात्प्रपितामहाः

evaṃ jñānena sampūrṇaḥ sadā bhavati bhogavān tāritāḥ pitarastena narakātprapitāmahāḥ

हिन्दी अर्थ

तस्मान्न हिंसा यज्ञे स्याद् यदुक्तमृषिभिः पुरा। ऋषिकोटिसहस्त्राणि स्वैस्तपोभिर्दिवं गताः तस्मान्न हिंसायज्ञं च प्रशंसन्ति महर्षयः। उञ्छो मूलं फलं शाकमुदपात्रं तपोधनाः एतद् दत्त्वा विभवतः स्वर्गलोके प्रतिष्ठिताः । अद्रोहश्चाप्यलोभश्च दमो भूतदया शमः

English

Samprati or Saptati, 9. •

अध्याय १०८

श्लोक 18

धर्मानुसारि तत्त्वज्ञ पृच्छतस्ते पुनः पुनः त्वत्प्रियार्थं समाख्यातं गुह्यमेतत्सनातनम्

dharmānusāri tattvajña pṛcchataste punaḥ punaḥ tvatpriyārthaṃ samākhyātaṃ guhyametatsanātanam

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मचर्यं तपः शौचमनुक्रोशं क्षमा धृतिः। सनातनस्य धर्मस्य मूलमेतहुरासदम् द्रव्यमन्त्रात्मको यज्ञस्तपश्च समतात्मकम्। यज्ञैश्च देवानाप्नोति वैराजं तपसा पुनः

English

Then it adds: " These ten Mauryas will enjoy the earth for 137 years." It names only 6 kings, and the total of tbeir reigns comes to only 136.

अध्याय १०८

श्लोक 19

अद्य मे सफलं जन्म अद्य मे तारितं कुलम् प्रीतो ऽस्म्यनुगृहीतो ऽस्मि दर्शनादेव ते मुने

adya me saphalaṃ janma adya me tāritaṃ kulam prīto 'smyanugṛhīto 'smi darśanādeva te mune

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मणः कर्मसंन्यासाद्वैराग्यात् प्रकृतेर्लयम्। ज्ञानात्त्राप्रोति कैवल्यं पञ्चैता गतयः स्मृताः एवं विवादः सुमहान् यज्ञस्यासीत् प्रवर्तने। ऋषीणां देवतानां च पूर्वे स्वायम्भुवेऽन्तरे ततस्ते ऋषयो दृष्टा हतं धर्म बलेन तु। वसोर्वाक्यमनादूत्य जग्मुस्ते वै यथागतम्

English

(2) The Vftyu, Bibliotheca Indica Edition, gives, however, the following list in Ch. 37, v. 425 et seq: — Cbandragupts, 24 years.

अध्याय १०८

श्लोक 20

त्वद्दर्शनात्तु धर्मात्मन् मुक्तो ऽहं चाद्य किल्बिषात् इदानीं वेद्मि चात्मानं भगवन्गतकल्मषम्

tvaddarśanāttu dharmātman mukto 'haṃ cādya kilbiṣāt idānīṃ vedmi cātmānaṃ bhagavangatakalmaṣam

हिन्दी अर्थ

गतेषु ऋषिसङ्घेषु देवा यज्ञमवाप्नुयुः। श्रूयन्ते हि तपःसिद्धा ब्रह्मक्षत्रादयो नृपाः राजर्षयो महात्मानो येषां कीर्तिः प्रतिष्ठिता। तस्माद्विशिष्यते यज्ञात्तपः सर्वैस्तु कारणैः

English

Bbadrasura, 25 years.

अध्याय १०८

श्लोक 21

दिष्ट्या ते सफलं जन्म दिष्ट्या ते तारितं कुलम् कीर्तनाद्वर्धते पुण्यं श्रुतात्पापप्रणाशनम्

diṣṭyā te saphalaṃ janma diṣṭyā te tāritaṃ kulam kīrtanādvardhate puṇyaṃ śrutātpāpapraṇāśanam

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मणा तपसा सूष्टं जगद्विश्वमिदं पुरा। तस्मान्नाप्नोति तद् यज्ञात्तपोमूलमिदं स्मृतम् और दुर्गम है। अत: देवताओं और ऋषियोंके साथ-साथ स्वायम्भुव मनुके अतिरिक्त अन्य कोई भी अकेला व्यक्ति धर्मके विषयमें निश्चयपूर्वक निर्णय नहीं दे सकता इसलिये पूर्वकालमें जैसा ऋषियोंने कहा है, उसके अनुसार यज्ञमें जीव-हिंसा नहीं होनी चाहिए। हजारों करोड़ ऋषि अपने तपोबलसे स्वर्गलोकको गये हैं। इसी कारण महर्षिगण हिंसात्मक यज्ञको प्रशंसा नहीं करते। वे तपस्वी अपनी सम्पत्तिके अनुसार उञ्छवृत्तिसे प्राप्त हुए अन्न, मूल, फल,

English

Asoka, 26 years. Kuudla, 8 years.

अध्याय १०८

श्लोक 22

यमुनायां तु किं पुण्यं किं फलं तु महामुने एतन्मे सर्वमाख्याहि यथादृष्टं यथाश्रुतम्

yamunāyāṃ tu kiṃ puṇyaṃ kiṃ phalaṃ tu mahāmune etanme sarvamākhyāhi yathādṛṣṭaṃ yathāśrutam

हिन्दी अर्थ

शाक और कमण्डलु आदिका दान कर स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित हुए हैं। इर्ष्याहीनता, निर्लोभता, इन्द्रियनिग्रह, जीवोंपर दयाभाव, मानसिक स्थिरता, ब्रह्मचर्य, तप, पवित्रता, करुणा, क्षमा और धैर्य-ये सनातन धर्मके मूल ही हैं, जो बड़ी कठिनतासे प्राप्त किये जा सकते हैं । यज्ञ द्रव्य और

English

Bandhupdlita, 8 years.

अध्याय १०८

श्लोक 23

तपनस्य सुता देवी त्रिषु लोकेषु विश्रुता समाख्याता महाभागा यमुना तत्र निम्नगा

tapanasya sutā devī triṣu lokeṣu viśrutā samākhyātā mahābhāgā yamunā tatra nimnagā

हिन्दी अर्थ

समता है । यज्ञोंसे देवताओंकी तथा तपस्यासे विराट् ब्रह्मकी प्राप्ति होती है। कर्म (फल)-का त्याग कर देनेसे ब्रह्म- पदकी प्राप्ति होती है, वैराग्यसे प्रकृतिमें लय होता है और ज्ञानसे कैवल्य (मोक्ष) सुलभ हो जाता है। इस प्रकार ये पाँच गतियाँ बतलायी गयी हैं पूर्वकालमें स्वायम्भुव-मन्वन्तरमें यज्ञको प्रथा प्रचलित

English

IndrapMita, 10 years. Devavarm&, 7 years.

अध्याय १०८

श्लोक 24

येनैव निःसृता गङ्गा तेनैव यमुना गता योजनानां सहस्रेषु कीर्तनात्पापनाशिनी

yenaiva niḥsṛtā gaṅgā tenaiva yamunā gatā yojanānāṃ sahasreṣu kīrtanātpāpanāśinī

हिन्दी अर्थ

होनेके अवसरपर देवताओं और ऋषियोंके बीच इस प्रकारका महान् विवाद हुआ था। तदनन्तर जब ऋषियोंने

English

atadhara, 8 years.

अध्याय १०८

श्लोक 25

तत्र स्नात्वा च पीत्वा च यमुनायां युधिष्ठिर कीर्तनाल्लभते पुण्यं दृष्ट्वा भद्राणि पश्यति

tatra snātvā ca pītvā ca yamunāyāṃ yudhiṣṭhira kīrtanāllabhate puṇyaṃ dṛṣṭvā bhadrāṇi paśyati

हिन्दी अर्थ

यह देखा कि यहाँ तो बलपूर्वक धर्मका विनाश किया जा रहा है, तब वसुके कथनकी उपेक्षा कर वे जैसे आये थे, वैसे ही चले गये। उन ऋषियोंके चले जानेपर

English

Brihadarfva, 7 years. Then it adds " these nine kings should enjoy the earth for full 137 years," but the total comes to 123.

अध्याय १०८

श्लोक 26

अवगाह्य च पीत्वा च पुनात्यासप्तमं कुलम् प्राणांस्त्यजति यस्तत्र स याति परमां गतिम्

avagāhya ca pītvā ca punātyāsaptamaṃ kulam prāṇāṃstyajati yastatra sa yāti paramāṃ gatim

हिन्दी अर्थ

अतिरिक्त इस विषयमें ऐसा भी सुना जाता है कि बहुतेरे ब्राह्मण तथा क्षत्रियनरेश तपस्याके प्रभावसे ही सिद्धि प्राप्त की थी। प्रियत्रत, उत्तानपाद, भ्रुव, मेधातिथि, वसु,

English

APPENDIX VI.

अध्याय १०८

श्लोक 27

अग्नितीर्थमिति ख्यातं यमुनादक्षिणे तटे पश्चिमे धर्मराजस्य तीर्थं तु नरकं स्मृतम्

agnitīrthamiti khyātaṃ yamunādakṣiṇe taṭe paścime dharmarājasya tīrthaṃ tu narakaṃ smṛtam

हिन्दी अर्थ

और हविर्धान आदि नृपतिगण तथा इनके अतिरिक्त अन्य भी बहुत-से नरेश तपोबलसे स्वर्गलोकको प्राप्त हुए हैं, जिन महात्मा राजर्षियोंकी कीर्ति अबतक विद्यमान है। अतः तपस्या सभी कारणोंसे सभी प्रकार यज्ञसे बढ़कर है। पूर्वकालमें ब्रह्माने तपस्याके प्रभावसे ही इस सारे जगत्की सृष्टि की थी, अतः यज्ञद्वारा वह बल नहीं प्राप्त हो सकता। उसकी प्रातिका मूल कारण तप ५२४ मत्स्यपुराण

English

Mr. Vincent Smith, in his chronological table of the Maiirya 4y nasty, gives the same list, and then adds, The names ol the successors of Asloka are taken from the Visu Parana, omitting Suyasias, for the reasons given in the text. Other names are given in Jain books and the Buddhist Asokavad&na. The Vayu, which is one of the oldest of the Purfinas, gives only nine names for the dynasty, as in brackets, and also states the duration of each reign. The approximate dates given are assigned accordingly, on the assumption that the reign of Arfoka lasted for about forty or forty-one years. Its duration, according to the Vayu Parana, was thirty-six, and, according to the Mahavamsa, thirty-seven, years, both of which periods probably should be reckoned from the coronation. The PurAnas agree in assigning 137 years to tlio Alaiirya dynasty, but tbe total of the lengths of reigns according to the Vayu Punino, is only The difference of four years may be accounted for by the interval between the accession and coronation of Aoka. For further details see Pargiter, " Dynasties of the Kali Age." The variant readings are numerous."

अध्याय १०८

श्लोक 28

तत्र स्नात्वा दिवं यान्ति ये मृतास्ते ऽपुनर्भवाः एवं तीर्थसहस्राणि यमुनादक्षिणे तटे

tatra snātvā divaṃ yānti ye mṛtāste 'punarbhavāḥ evaṃ tīrthasahasrāṇi yamunādakṣiṇe taṭe

हिन्दी अर्थ

तदाप्रभृति यज्ञोऽयं युगैः सह व्यवर्तत ही कहा गया है। इस प्रकार स्वायम्भुव-मन्वन्तरमें यज्ञको प्रथा प्रारम्भ हुई थी। तबसे यह यज्ञ सभी युगोंके साथ प्रवर्तित हुआ

English

The Matsya Parana, however, is incomplete and, moreover, it has « misplaced verse 23, wliich ought to conic after verse 21 and not before it. Therefore the Matsya list should stand thus: —

अध्याय १०८

श्लोक 29

उत्तरेण प्रवक्ष्यामि आदित्यस्य महात्मनः तीर्थं निरञ्जनं नाम यत्र देवाः सवासवाः

uttareṇa pravakṣyāmi ādityasya mahātmanaḥ tīrthaṃ nirañjanaṃ nāma yatra devāḥ savāsavāḥ

हिन्दी अर्थ

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे मन्वन्तरानुकल्पे देवर्षिसंवादो नाम त्रिचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके मन्वन्तरानुकल्पमें देवर्षिसंवाद नामक एक सौ तैंतालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ द्वापर और कलियुगकी प्रवृत्ति तथा उनके स्वभावका वर्णन, राजा प्रमतिका वृत्तान्त तथा पुनः कृतयुगके प्रारम्भका वर्णन

English

His grandson. Dasaratha,

अध्याय १०८

श्लोक 30

उपासते स्म संध्यां ये त्रिकालं हि युधिष्ठिर देवाः सेवन्ति तत्तीर्थं ये चान्ये विबुधा जनाः

upāsate sma saṃdhyāṃ ye trikālaṃ hi yudhiṣṭhira devāḥ sevanti tattīrthaṃ ye cānye vibudhā janāḥ

हिन्दी अर्थ

प्रध्वंसश्चैव वर्णानां कर्मणां तु विपर्ययः। आद्ये कृते तु धर्मोऽस्ति स त्रेतायां प्रपद्यते॥

English

Samprati.

अध्याय १०८

श्लोक 31

श्रद्दधानपरो भूत्वा कुरु तीर्थाभिषेचनम् अन्ये च बहवस्तीर्थाः सर्वपापहराः स्मृताः तेषु स्नात्वा दिवं यान्ति ये मृतास्ते ऽपुनर्भवाः

śraddadhānaparo bhūtvā kuru tīrthābhiṣecanam anye ca bahavastīrthāḥ sarvapāpaharāḥ smṛtāḥ teṣu snātvā divaṃ yānti ye mṛtāste 'punarbhavāḥ

हिन्दी अर्थ

वर्णानां द्वापरे धर्माः संकीर्यन्ते तथाऽऽश्रमाः ॥ अनिश्चयावगमनाद् धर्मतत्त्वं न विद्यते। धर्मतत्त्वे ह्यविज्ञातो मतिभेदस्तु जायते॥ अयं धर्मौ ह्ययं नेति निश्चयो नाधिगम्यते॥

English

Satadhaiiva. Brihadratha.

अध्याय १०८

श्लोक 32

गङ्गा च यमुना चैव उभे तुल्यफले स्मृते केवलं ज्येष्ठभावेन गङ्गा सर्वत्र पूज्यते

gaṅgā ca yamunā caiva ubhe tulyaphale smṛte kevalaṃ jyeṣṭhabhāvena gaṅgā sarvatra pūjyate

हिन्दी अर्थ

एको वेदश्चतुष्पादः त्रेताष्विह विधीयते। सूतजी कहते हैं-ऋषियो! इसके बाद अब मैं द्वापरयुगकी विधिका वर्णन कर रहा हूँ। त्रेतायुगके क्षीण हो जानेपर द्वापरयुगकी प्रवृत्ति होती है। द्वापरयुगके प्रारम्भ-कालमें प्रजाओंको त्रेतायुगकी भाँति ही सिद्धि

English

The names in the Visnu PurAna are —

अध्याय १०८

श्लोक 33

एवं कुरुष्व कौन्तेय सर्वतीर्थाभिषेचनम् यावज्जीवकृतं पापं तत्क्षणादेव नश्यति

evaṃ kuruṣva kaunteya sarvatīrthābhiṣecanam yāvajjīvakṛtaṃ pāpaṃ tatkṣaṇādeva naśyati

हिन्दी अर्थ

प्राप्त होती है, किंतु जब द्वापरयुगका प्रभाव पूर्णरूपसे व्याप्त हो जाता है, तब वह सिद्धि नष्ट हो जाती है। उस समय प्रजाओंमें लोभ, धैर्यहीनता, वाणिज्य, युद्ध, सिद्धान्तोंकी अनिश्चितता, वर्णोका विनाश, कर्मोका उलट-फेर, याच्ञा असहिष्णुता, बल तथा रजोगुण एवं तमोगुण बढ़ जाते हैं। सर्वप्रथम कृतयुगमें तो अधर्मका लेशमात्र भी नहीं रहता, किंतु त्रेतायुगमें उसकी कुछ-कुछ प्रवृत्ति होती है। पुनः द्वापरयुगमें वह विशेषरूपसे व्याप्त होकर कलियुगमें युग- समासिके समय विनष्ट हो जाता है। द्वापरयुगमें चारों वर्णो तथा आश्रमोंके धर्म परस्पर घुल-मिल जाते हैं । इस युगमें श्रुतियों और स्मृतियोंमें भेद उत्पन्न हो जाता है । इस प्रकार श्रुति और स्मृतिकी मान्यतामें भेद पड़नेके कारण किसी

English

Chandragupta 24 years. Vindusara 2»o.,,

अध्याय १०८

श्लोक 34

यस्त्विमं कल्य उत्थाय पठते च शृणोति च मुच्यते सर्वपापेभ्यः स्वर्गलोकं स गच्छति

yastvimaṃ kalya utthāya paṭhate ca śṛṇoti ca mucyate sarvapāpebhyaḥ svargalokaṃ sa gacchati

हिन्दी अर्थ

कारण धर्मका तत्त्व लुप्त हो जाता है। धर्मतत्त्वका ज्ञान न होनेपर बुद्धिमें भेद उत्पन्न हो जाता है। बुद्धिमें भेद पड्नेके कारण उनके विचार भी भ्रान्त हो जाते हैं और फिर धर्म क्या है और अधर्म क्या है, यह निश्चय नहीं हो पहले त्रेताके प्रारम्भमें आयुके संक्षिप्त हो जानेके कारण एक ही वेद ऋक्, यजुः, अथर्वण, साम-चार

English

AjJokavardhana 26 „

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_matsyapurANa1-176.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Matsya Purana — Chapter 108
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

Numbering follows the imported source and may differ from other editions.