Matsya Purana· Matsya Purāṇa
112
अध्याय 112 / 176

Adhyaya 112

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अध्याय ११२

श्लोक 1

मत्स्य-पुराण ११२ भ्रातृभिः सहितः सर्वैर् द्रौपद्या सह भार्यया ब्राह्मणेभ्यो नमस्कृत्य गुरून्देवानतर्पयत्

matsya-purāṇa 112 bhrātṛbhiḥ sahitaḥ sarvair draupadyā saha bhāryayā brāhmaṇebhyo namaskṛtya gurūndevānatarpayat

हिन्दी अर्थ

से-अधिक ऊँचाई एक हजार बानबे अंगुलकी होती है। मनुष्यके शरीरका जैसा आकार-प्रकार होता है, तल्लक्षणं तु देवानां दृश्यतेऽन्वयदर्शनात्। बुद्ध्यातिशयसंयुक्तो देवानां काय उच्यते

English

Andhiaka (Antaka), or Bd., Bh., Bhadraka or Vs. Ardraka) 2 years (132 BC.-130 B.C.)

अध्याय ११२

श्लोक 2

वासुदेवो ऽपि तत्रैव क्षणेनाभ्यागतस्तदा पाण्डवैः सहितैः सर्वैः पूज्यमानस्तु माधवः

vāsudevo 'pi tatraiva kṣaṇenābhyāgatastadā pāṇḍavaiḥ sahitaiḥ sarvaiḥ pūjyamānastu mādhavaḥ

हिन्दी अर्थ

तथा नातिशयश्चैव मानुषः काय उच्यते। उपयुक्ताः क्रियास्वेते यज्ञियास्त्विह सर्वशः । यथाक्रमोपभोगाश्च देवानां पशुमूर्तयः ब्राह्मणाः श्रुतिशब्दाश्च देवानां व्यक्तमूर्तयः। सम्पूज्या ब्रह्मणा ह्योेतास्तेन सन्तः प्रचक्षते

English

Pulindaka 3 years ( 127 B.C.-124 B.C.)

अध्याय ११२

श्लोक 3

कृष्णेन सहितैः सर्वैः पुनरेव महात्मभिः अभिषिक्तः स्वराज्ये च धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः

kṛṣṇena sahitaiḥ sarvaiḥ punareva mahātmabhiḥ abhiṣiktaḥ svarājye ca dharmaputro yudhiṣṭhiraḥ

हिन्दी अर्थ

सामान्येषु च धर्मेषु तथा वैशेषिकेषु च। ब्रह्मक्षत्रविशो युक्ताः श्रौतस्मार्तेन कर्मणा श्रौतस्मार्तो हि यो धर्मो ज्ञानधर्मः स उच्यते

English

Ghopa (or Glioaavasu, or Mt. crp Yomegha) 3 years.

अध्याय ११२

श्लोक 4

एतस्मिन्नन्तरे चैव मार्कण्डेयो महामुनिः ततः स्वस्तीति चोक्त्वा तु क्षणादाश्रममागमत्

etasminnantare caiva mārkaṇḍeyo mahāmuniḥ tataḥ svastīti coktvā tu kṣaṇādāśramamāgamat

हिन्दी अर्थ

दिव्यानां साधनात् साधुर्ब्रह्मचारी गुरोर्हितः। कारणात् साधनाच्चैव गृहस्थः साधुरुच्यते धर्मो धर्मगतिः प्रोक्तः शब्दो ह्येष क्रियात्मकः । कुशलाकुशलौ चैव धर्माधर्मौ ब्रवीत् प्रभुः अथ देवाश्च पितरः ऋषयश्चैव मानुषाः। अयं धर्मो ह्ययं नेति ब्रुवते मौनमूर्तिना

English

Vajramitra 9 years (Bd., 7 years) 124 B.C.-ll.*! B.C.)

अध्याय ११२

श्लोक 5

युधिष्ठिरो ऽपि धर्मात्मा भ्रातृभिः सहितो ऽवसत् महादानं ततो दत्त्वा धर्मपुत्रो महामनाः

yudhiṣṭhiro 'pi dharmātmā bhrātṛbhiḥ sahito 'vasat mahādānaṃ tato dattvā dharmaputro mahāmanāḥ

हिन्दी अर्थ

धर्मेति धारणे धातुर्महत्त्वे चैव उच्यते। अधारणेऽमहत्त्वे वाधर्मः स तु निरुच्यते तत्रेष्प्रापको धर्म आचार्यैरुपदिश्यते। अधर्मश्चानिष्टफलं

English

Samabhnga or Bh.dgavata Mt. 32 years (115 B.C.-83 B.C.)

अध्याय ११२

श्लोक 6

यस्त्विदं कल्य उत्थाय माहात्म्यं पठते नरः प्रयागं स्मरते नित्यं स याति परमं पदम् मुच्यते सर्वपापेभ्यो रुद्रलोकं स गच्छति

yastvidaṃ kalya utthāya māhātmyaṃ paṭhate naraḥ prayāgaṃ smarate nityaṃ sa yāti paramaṃ padam mucyate sarvapāpebhyo rudralokaṃ sa gacchati

हिन्दी अर्थ

वही लक्षण वंशपरम्परावश देवताओंमें भी देखा जाता है। देवताओंका शरीर केवल बुद्धिकी अतिशयतासे युक्त बतलाया जाता है। मानव-शरीरमें बुद्धिकी उतनी अधिकता नहीं रहती इस प्रकार देवताओं और मानवोंके शरीरोंमें उत्पन्न हुए जो भाव हैं, वे पशुओं, पक्षियों और स्थावर प्राणियोंके शरीरोंमें भी पाये जाते हैं। गौ, बकरा, घोड़ा, हाथी, पक्षी और मृग-इनका सर्वत्र यज्ञीय कर्मोमें उपयोग होता है तथा ये पशुमूर्तियाँ क्रमशः अचर प्राणियोंकी मूर्तियाँ होती हैं । वे उन मनोज्ञ भोगोंका उपभोग करके सुखका अनुभव करते हैं

English

Devabhfimi (or Va KmabhOmi) 10 years (83 B.C.-73 B.C.)

अध्याय ११२

श्लोक 7

मम वाक्यं च कर्तव्यं महाराज ब्रवीम्यहम् नित्यं जपस्व जुह्वस्व प्रयागे विगतज्वरः

mama vākyaṃ ca kartavyaṃ mahārāja bravīmyaham nityaṃ japasva juhvasva prayāge vigatajvaraḥ

हिन्दी अर्थ

अब मैं संतों तथा साधुओंका वर्णन कर रहा हूँ। ब्राह्मण ग्रन्थ और श्रुतियोंके शब्द-ये भी देवताओंकी निर्देशिका-मूर्तियाँ हैं। अन्तःकरणमें इनके तथा ब्रह्मका संयोग बना रहता है, इसलिये ये संत कहलाते हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य सामान्य एवं विशेष धर्मोमें सर्वत्र श्रौत एवं स्मार्त विधिके अनुसार कर्मका आचरण करते हें । वर्णाश्रम-धर्मोके पालनमें तत्पर तथा स्वर्ग- प्राप्तिमें सुख माननेवाले लोगोंद्वारा आचरित जो श्रुति एवं

English

Not«.olO Sangas foe US years. Ended in 7t U.C. ■»

अध्याय ११२

श्लोक 8

प्रयागं स्मर वै नित्यं सहास्माभिर्युधिष्ठिर स्वयं प्राप्स्यसि राजेन्द्र स्वर्गलोकं न संशयः

prayāgaṃ smara vai nityaṃ sahāsmābhiryudhiṣṭhira svayaṃ prāpsyasi rājendra svargalokaṃ na saṃśayaḥ

हिन्दी अर्थ

स्मृतिसम्बन्धी धर्म है, उसे ज्ञानधर्म कहा जाता है। दिव्य सिद्धियोंकी साधनामें संलग्न तथा गुरुका हितैषी होनेके कारण ब्रह्मचारीको साधु कहते हैं। (अन्य आश्रमोंकी जीविकाका) निमित्त तथा स्वयं साधनामें निरत होनेके कारण गृहस्थ भी साधु कहलाता है। वनमें तपस्या करनेवाला साधु वैखानस नामसे अभिहित होता है। योगको साधनामें प्रयत्नशील संन्यासीको भी साधु कहते हैं। ' धर्म” शब्द क्रियात्मक है और यह धर्माचरणमें ही प्रयुक्त होनेवाला कहा गया है। सामर्थ्यशाली भगवानूने धर्मको कल्याणकारक और अधर्मको अनिष्टकारक बतलाया है तथा देवता, पितर, ऋषि और मानव “यह धर्म है और यह धर्म नहीं है' ऐसा कहकर मौन धारण

English

TABLE No. V.

अध्याय ११२

श्लोक 9

प्रयागमनुगच्छेद्वा वसते वापि यो नरः सर्वपापविशुद्धात्मा रुद्रलोकं स गच्छति

prayāgamanugacchedvā vasate vāpi yo naraḥ sarvapāpaviśuddhātmā rudralokaṃ sa gacchati

हिन्दी अर्थ

कर लेते हैं। ' धृ' धातु धारण करने तथा महत्त्वके अर्थमें प्रयुक्त होती है। अधारण एवं अधर्म शब्दका अर्थ इसके विपरीत है। आचार्यलोग इष्टकी प्राप्ति करानेवाले धर्मका ही उपदेश करते हैं। अधर्म अनिष्ट-फलदायक होता आचायैर्नोपदिश्यते॥ २८ है, इसलिये आचार्यगण उसका उपदेश नहीँ करते।

English

Kanvayana (Sungrabhpitya) Dynasty.

अध्याय ११२

श्लोक 10

प्रतिग्रहादुपावृत्तः संतुष्टो नियतः शुचिः अहंकारनिवृत्तश्च स तीर्थफलमश्नुते

pratigrahādupāvṛttaḥ saṃtuṣṭo niyataḥ śuciḥ ahaṃkāranivṛttaśca sa tīrthaphalamaśnute

हिन्दी अर्थ

वृद्धाश्चालोलुपाश्चैव आत्मवन्तो हादाम्भिका: । सम्यग्विनीता मृदवस्तानाचार्यान् प्रचक्षते धर्मज्ञैर्विहितो धर्मः श्रौतस्मार्तो द्विजातिभिः। दाराग्निहोत्रसम्बन्धमिज्या श्रौतस्य लक्षणम् ऋचो यजूंषि सामानि ब्रह्मणोऽङ्गानि वै श्रुतिः । मन्वन्तरस्यातीतस्य स्मृत्वा तन्मनुरब्रवीत्

English

Vasudeva 9 years (Bd. 5) (73 B.C.-64 B.C.)

अध्याय ११२

श्लोक 11

अकोपनश्च सत्यश्च सत्यवादी दृढव्रतः आत्मोपमश्च भूतेषु स तीर्थफलमश्नुते

akopanaśca satyaśca satyavādī dṛḍhavrataḥ ātmopamaśca bhūteṣu sa tīrthaphalamaśnute

हिन्दी अर्थ

तस्मात्स्मार्तः स्मृतो धर्मो वर्णाश्रमविभागशः । एवं वै द्विविधो धर्मः शिष्टाचारः स उच्यते मन्वन्तरेषु ये शिष्टा इह तिष्ठन्ति धार्मिकाः

English

Bhumimitra 14 years (Va., Bd., 5 years) (64 B.C.-50 B.C.)

अध्याय ११२

श्लोक 12

ऋषिभिः क्रतवः प्रोक्ता देवैश्चापि यथाक्रमम् न हि शक्या दरिद्रेण यज्ञाः प्राप्तुं महीपते

ṛṣibhiḥ kratavaḥ proktā devaiścāpi yathākramam na hi śakyā daridreṇa yajñāḥ prāptuṃ mahīpate

हिन्दी अर्थ

मनुः सपर्षयश्चैव लोकसन्तानकारिणः। तिष्ठन्तीह च धर्मार्थ ताञ्छिष्टान् सम्प्रचक्षते तैः शिष्ट्रश्नलितो धर्मः स्थाप्यते वै युगे युगे। त्रयी वार्ता दण्डनीतिः प्रजावर्णाश्रमेप्सया शिष्ट्रराचर्यते यस्मात्पुनश्चैव मनुक्षये।

English

NSrityaa 12 years B.C.-38 B.C.)

अध्याय ११२

श्लोक 13

बहूपकरणा यज्ञा नानासम्भारविस्तराः प्राप्यन्ते पार्थिवैरेतैः समृद्धैर्वै नरैः क्वचित्

bahūpakaraṇā yajñā nānāsambhāravistarāḥ prāpyante pārthivairetaiḥ samṛddhairvai naraiḥ kvacit

हिन्दी अर्थ

शिष्टा यस्माच्चरन्त्येनं मनुः सप्तर्षयश्च ह। मन्वन्तरेषु सर्वेषु शिष्टाचारस्ततः स्मृतः विज्ञेयः श्रवणाच्छौतः स्मरणात् स्मार्त उच्यते।

English

Su4arman 10 years (Bd., 5 years) (38 B.C.-28 B.C.) Kote.-i Kings for 46 yean, from 78 B.C. to 28 B.C.

अध्याय ११२

श्लोक 14

यो दरिद्रैरपि विधिः शक्यः प्राप्तुं नरेश्वर तुल्यो यज्ञफलैः पुण्यैस् तन्निबोध युधिष्ठिर

yo daridrairapi vidhiḥ śakyaḥ prāptuṃ nareśvara tulyo yajñaphalaiḥ puṇyais tannibodha yudhiṣṭhira

हिन्दी अर्थ

प्रत्यङ्गानि प्रवक्ष्यामि धर्मस्येह तु लक्षणम् मृदुल स्वभाववाले होते हैं, उन्हें आचार्य कहा जाता है । धर्मके ज्ञाता द्विजातियोंद्वारा श्रौत एवं स्मार्त-धर्मका विधान किया गया है। इनमें दारसम्बन्ध (विवाह), अग्निहोत्र और यज्ञ-ये श्रौत-धर्मके लक्षण हैं तथा यम और नियमोंसे युक्त वर्णाश्रमका आचरण स्मार्त-धर्म कहलाता है

English

Andhpas.

अध्याय ११२

श्लोक 15

ऋषीणां परमं गुह्यम् इदं भरतसत्तम तीर्थानुगमनं पुण्यं यज्ञेभ्यो ऽपि विशिष्यते

ṛṣīṇāṃ paramaṃ guhyam idaṃ bharatasattama tīrthānugamanaṃ puṇyaṃ yajñebhyo 'pi viśiṣyate

हिन्दी अर्थ

सप्तर्षियोंने पूर्ववर्ती ऋषियोंसे श्रौत-धर्मका ज्ञान प्राप्त करके पुनः उसका उपदेश किया था। ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद-ये ब्रह्माके अङ्ग हैं। व्यतीत हुए मन्वन्तरके धर्मोका स्मरण करके मनुने उनका उपदेश किया है। इसलिये वर्णाश्रमके विभागानुसार प्रयुक्त हुआ धर्म स्मार्त कहलाता है इस प्रकार श्रौत एवं स्मार्तरूप द्विविध धर्मको शिष्टाचार कहते हैं। “शिष्” धातुसे निष्ठासंज्ञक 'क्त' प्रत्ययका संयोग होनेसे 'शिष्ट' शब्द

English

Si jnka, or Simuka, (Va, Bd Sindlmka Vs Sipraka), 23. Krina, 10 (Mt, 18).

अध्याय ११२

श्लोक 16

दश तीर्थसहस्राणि तिस्रः कोट्यस्तथापगाः माघमासे गमिष्यन्ति गङ्गायां भरतर्षभ

daśa tīrthasahasrāṇi tisraḥ koṭyastathāpagāḥ māghamāse gamiṣyanti gaṅgāyāṃ bharatarṣabha

हिन्दी अर्थ

निष्पन्न होता है। प्रत्येक मन्वन्तरमें इस भूतलपर जो धार्मिकलोग वर्तमान रहते हैं, उन्हें शिष्ट कहा जाता है। इस प्रकार लोकको वृद्धि करनेवाले सप्तर्षि और मनु इस भूतलपर धर्मका प्रचार करनेके लिये स्थित रहते हैं, अतः वे शिष्ट शब्दसे अभिहित होते हैं। वे शिष्टगण प्रत्येक युगमें मार्ग-भ्रष्ट हुए धर्मकी पुन: स्थापना करते हैं। इसीलिये शिष्टगण दूसरे मन्वन्तरमें प्रजाओंके वर्णाश्रम- धर्मको सिद्धिके लिये पुनः वेदत्रयी (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद), वार्ता (कृषिव्यापार) और दण्डनीतिका आचरण करते हैं। इस प्रकार पूर्वके युगोंमें उपस्थित पूर्वजोंद्वारा अभिमत होनेके कारण यह शिष्टाचार सनातन होता है। दान, सत्य, तपस्या, निर्लोभता, विद्या, यज्ञानुष्ठान, पूजन

English

FQrnotsanga, 18.

अध्याय ११२

श्लोक 17

स्वस्थो भव महाराज भुङ्क्ष्व राज्यमकण्टकम् पुनर्द्रक्ष्यसि राजेन्द्र यजमानो विशेषतः

svastho bhava mahārāja bhuṅkṣva rājyamakaṇṭakam punardrakṣyasi rājendra yajamāno viśeṣataḥ

हिन्दी अर्थ

और इन्द्रियनिग्रह-ये आठ आचरण शिष्टाचारके लक्षण हैं । चूँकि मनु और सप्तर्षि आदि शिष्टगण सभी मन्वन्तरोंमें इस लक्षणके अनुसार आचरण करते हैं, इसलिये इसे शिष्टाचार कहा जाता है। इस प्रकार पूर्वानुक्रमसे श्रवण किये जानेके कारण श्रुतिसम्बन्धी धर्मको श्रौत जानना चाहिए और स्मरण होनेके कारण स्मृति-प्रतिपादित धर्मको स्मार्त कहा जाता है। श्रौतधर्म यज्ञ और वेदस्वरूप है तथा स्मार्तधर्म वर्णाश्रमधर्म-नियामक है

English

Skandliastambhi, 18. atakariii, 56.

अध्याय ११२

श्लोक 18

इत्युक्त्वा स महाभागो मार्कण्डेयो महातपाः युधिष्ठिरस्य नृपतेस् तत्रैवान्तरधीयत

ityuktvā sa mahābhāgo mārkaṇḍeyo mahātapāḥ yudhiṣṭhirasya nṛpates tatraivāntaradhīyata

हिन्दी अर्थ

अब मैं धर्मके प्रत्येक अङ्गका लक्षण बतला रहा हूँ। देखे तथा अनुभव किये हुए विषयके पूछे जानेपर उसे न छिपाना, अपितु घटित हुएके अनुसार यथार्थ कह देना-यह सत्यका लक्षण है। ब्रह्मचर्यं तपो मौनं निराहारत्वमेव च। इत्येतत् तपसो रूपं सुघोरं तु दुरासदम् पशूनां द्रव्यहविषामृक्सामयजुषां तथा। ऋत्विजां दक्षिणायाश्च संयोगो यज्ञ उच्यते

English

Lambudara, 18.

अध्याय ११२

श्लोक 19

ततस्तत्र समाप्लाव्य गात्राणि सगणो नृपः यथोक्तेनाथ विधिना परां निर्वृतिमागमत्

tatastatra samāplāvya gātrāṇi sagaṇo nṛpaḥ yathoktenātha vidhinā parāṃ nirvṛtimāgamat

हिन्दी अर्थ

अदुष्टो वाङ्मनःकायैस्तितिक्षा सा क्षमा स्मृता पञ्चात्मके यो विषये कारणे चाष्टलक्षणे। न क्रुध्येत प्रतिहतः स जितात्मा भविष्यति

English

Apllaka, 12. Meghas\4ti, 18.

अध्याय ११२

श्लोक 20

तथा त्वमपि देवर्षे प्रयागाभिमुखो भव अभिषेकं तु कृत्वाद्य कृतकृत्यो भविष्यसि

tathā tvamapi devarṣe prayāgābhimukho bhava abhiṣekaṃ tu kṛtvādya kṛtakṛtyo bhaviṣyasi

हिन्दी अर्थ

श्रुतिस्मृतिभ्यां विहितो धर्मो वर्णाश्रमात्मकः । शिष्टाचारप्रवृद्धश्च धर्मोऽयं साधुसम्मतः संन्यासः कर्मणां न्यासः कृतानामकृतैः सह। कुशलाकुशलाभ्यां तु प्रहाणं न्यास उच्यते अव्यक्तादिविशेषान्तद् विकारोऽस्मिन्निवर्तते। चेतनाचेतनं ज्ञात्वा ज्ञाने ज्ञानी स उच्यते

English

Svdti (or Ali), 18 (or 12).

अध्याय ११२

श्लोक 21

एवमुक्त्वाथ नन्दीशस् तत्रैवान्तरधीयत नारदो ऽपि जगामाशु प्रयागाभिमुखस्तथा

evamuktvātha nandīśas tatraivāntaradhīyata nārado 'pi jagāmāśu prayāgābhimukhastathā

हिन्दी अर्थ

प्रत्यङ्गानि तु धर्मस्य चेत्येतल्लक्षणं स्मृतम्। ऋषिभिर्धर्मतत्त्वज्ञैः पूर्वे स्वायम्भुवेऽन्तरे ब्रह्मचर्य, तपस्या, मौनावलम्बन और निराहार रहना-- ये तपस्याके लक्षण हैं, जो अत्यन्त भीषण एवं दुष्कर हैं। जिसमें पशु, द्रव्य, हवि, ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद, ऋत्विज् तथा दक्षिणाका संयोग होता है, उसे यज्ञ कहते

English

SkandasvAti, 7. ] 2. Mrigetidra Svatikarna, 3.

अध्याय ११२

श्लोक 22

तत्र स्नात्वा च जप्त्वा च विधिदृष्टेन कर्मणा दानं दत्त्वा द्विजाग्र्येभ्यो गतः स्वभवनं तदा

tatra snātvā ca japtvā ca vidhidṛṣṭena karmaṇā dānaṃ dattvā dvijāgryebhyo gataḥ svabhavanaṃ tadā

हिन्दी अर्थ

हैं। जो अपनी ही भाँति समस्त प्राणियोंके प्रति उनके हित तथा मङ्गलके लिये निरन्तर हर्षपूर्वक व्यवहार करता है, उसकी वह श्रेष्ठ क्रिया दया कहलाती है। जो निन्दित होनेपर बदलेमें निन्दककी निन्दा नहीं करता तथा आघात किये जानेपर भी बदलेमें उसपर प्रहार नहीं करता, अपितु मन, वचन और शरीरसे प्रतीकारकी भावनासे रहित हो उसे सहन कर लेता है, उसकी उस क्रियाको क्षमा कहते हैं। स्वामीद्वारा रक्षाके लिये दिये गये तथा घबराहटमें छूटे हुए परकीय धनको न ग्रहण करना निर्लोभ नामसे कहा जाता है। मैथुनके विषयमें सुनने, कहने तथा चिन्तन करनेसे निवृत्त रहना ब्रह्मचर्य है और यही शमका लक्षण है

English

Kuntala Sv&tikarpa, 8.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_matsyapurANa1-176.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Matsya Purana — Chapter 112
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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