अध्याय ११४
श्लोक 1
मत्स्य-पुराण ११४ यदिदं भारतं वर्षं यस्मिन् स्वायम्भुवादयः चतुर्दशैव मनवः प्रजासर्गं ससर्जिरे
matsya-purāṇa 114 yadidaṃ bhārataṃ varṣaṃ yasmin svāyambhuvādayaḥ caturdaśaiva manavaḥ prajāsargaṃ sasarjire
हिन्दी अर्थ
चला गया। वहाँ महातपस्वी हैत्यराज वञ्राङ्ग, जिसके नेत्र कमलदलके समान थे तथा जिसकी बुद्धि शुद्ध हो गयी थी, एक हजार वर्षतक दोनों हाथ ऊपर उठाकर तपस्या करता रहा। पुन: उसने एक हजार वर्षतक नीचे मुख किये हुए तथा एक हजार वर्षतक पञ्चाग्निके बीचमें बैठकर घोर तपस्या की। उस समय उसने भोजनका परित्याग कर दिया था। इस प्रकार वह तपस्याको राशि-जैसा हो गया था। तत्पश्चात् उसने एक हजार वर्षतक जलके भीतर बैठकर तप किया। जिस समय वह जलके भीतर प्रविष्ट होकर तप कर रहा था, उसी समय उसको अत्यन्त सुन्दरी एवं महात्रतपरायणा पल्ली वराङ्गी भी उसी सरोवरके तटपर मौन धारणकर
English
AiLOiias