Matsya Purana· Matsya Purāṇa
114
अध्याय 114 / 176

Adhyaya 114

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अध्याय ११४

श्लोक 1

मत्स्य-पुराण ११४ यदिदं भारतं वर्षं यस्मिन् स्वायम्भुवादयः चतुर्दशैव मनवः प्रजासर्गं ससर्जिरे

matsya-purāṇa 114 yadidaṃ bhārataṃ varṣaṃ yasmin svāyambhuvādayaḥ caturdaśaiva manavaḥ prajāsargaṃ sasarjire

हिन्दी अर्थ

चला गया। वहाँ महातपस्वी हैत्यराज वञ्राङ्ग, जिसके नेत्र कमलदलके समान थे तथा जिसकी बुद्धि शुद्ध हो गयी थी, एक हजार वर्षतक दोनों हाथ ऊपर उठाकर तपस्या करता रहा। पुन: उसने एक हजार वर्षतक नीचे मुख किये हुए तथा एक हजार वर्षतक पञ्चाग्निके बीचमें बैठकर घोर तपस्या की। उस समय उसने भोजनका परित्याग कर दिया था। इस प्रकार वह तपस्याको राशि-जैसा हो गया था। तत्पश्चात् उसने एक हजार वर्षतक जलके भीतर बैठकर तप किया। जिस समय वह जलके भीतर प्रविष्ट होकर तप कर रहा था, उसी समय उसको अत्यन्त सुन्दरी एवं महात्रतपरायणा पल्ली वराङ्गी भी उसी सरोवरके तटपर मौन धारणकर

English

AiLOiias

अध्याय ११४

श्लोक 2

एतद् वेदितुम् इच्छामः सकाशात्तव सुव्रत उत्तरश्रवणं भूयः प्रब्रूहि वदतां वर

etad veditum icchāmaḥ sakāśāttava suvrata uttaraśravaṇaṃ bhūyaḥ prabrūhi vadatāṃ vara

हिन्दी अर्थ

तपस्या करती हुई घोर तपमें संलग्र हो गयी। उस समय वह निराहार ही रहती थी। उसके तपस्या करते समय (उसे तपसे डिगानेके निमित्त) इन्द्र तरह-तरहकी विभीषिकाएँ. उत्पन्न करने लगे वे बन्दरका विशाल रूप धारणकर उसके आश्रमपर पहुँचे और वहाँके सम्पूर्ण तुंबी, घट और पिटारी आदिको तितर-बितर कर दिया। फिर मेषरूपसे उसे भलीभाँति कँपाया। तत्पश्चात् सर्पका रूप बनाकर उसके

English

Bhalaudana

अध्याय ११४

श्लोक 3

एतच्छ्रुत्वा ऋषीणां तु प्राब्रवील्लौमहर्षणिः पौराणिकस्तदा सूत ऋषीणां भावितात्मनाम्

etacchrutvā ṛṣīṇāṃ tu prābravīllaumaharṣaṇiḥ paurāṇikastadā sūta ṛṣīṇāṃ bhāvitātmanām

हिन्दी अर्थ

दोनों चरणोंको अपने शरीरसे बाँधकर इस पृथ्वीपर घूमते हुए उसे दूरतक घसीटते रहे, किंतु वराङ्गी तपोबलसे सम्पन्न थीं, अतः इन्द्रद्वारा मारी न जा सको। तब इन्द्रने श्ृगालका रूप धारणकर उसके आश्रमको दूषित कर दिया। फिर उन्होंने बादल बनकर उसके आश्रमको भिगो दिया। इस प्रकार इन्द्र अनेकों प्रकारकी विभीषिकाओंको दिखाकर उसे कष्ट पहुँचाते रहे। जब इन्द्र इस प्रकारके कुकर्मसे विरत नहीं हुए, तब वञ्राङ्गकी पटरानी वराङ्गी इसे पर्वतकी दुष्टता मानकर उसे शाप देनेके लिये उद्यत हो गयी। इस प्रकार उसे शाप देनेके लिये उद्यत देखकर पर्वतका हृदय भयभीत हो गया। तब उसने पुरुषका शरीर धारणकर उस

English

Mithi-Janaka

अध्याय ११४

श्लोक 4

बुद्ध्या विचार्य बहुधा विमृश्य च पुनः पुनः तेभ्यस्तु कथयामास उत्तरश्रवणं तदा

buddhyā vicārya bahudhā vimṛśya ca punaḥ punaḥ tebhyastu kathayāmāsa uttaraśravaṇaṃ tadā

हिन्दी अर्थ

सुन्दरी वराङ्गीसे कहा--' वराङ्गने! मैं दुष्ट नहीं हूँ। मैं तो सभी देहधारियोंके लिये सेवनीय हुँ। यह सब उपद्रव तो ये क्रुद्ध हुए इन्द्र कर रहे हैं।' इसी बीच (जलके भीतर बैठकर तपस्या करते हुए वब्राङ्गका) एतस्मिन्नन्तरे जातः कालो वर्षसहर्त्रिकः।

English

8u(na)hotra

अध्याय ११४

श्लोक 5

अथाहं वर्णयिष्यामि वर्षे ऽस्मिन्भारते प्रजाः भरणात्प्रजनाच्चैव मनुर्भरत उच्यते

athāhaṃ varṇayiṣyāmi varṣe 'sminbhārate prajāḥ bharaṇātprajanāccaiva manurbharata ucyate

हिन्दी अर्थ

तस्मिन् गते तु भगवान् काले कमलसम्भवः। ददामि सर्वकामांस्ते उत्तिष्ठ दितिनन्दन। एवमुक्तस्तदोत्थाय हैत्येन्द्रस्तपसां निधिः।

English

Viavagasva

अध्याय ११४

श्लोक 6

निरुक्तवचनैश्चैव वर्षं तद्भारतं स्मृतम् यतः स्वर्गश्च मोक्षश्च मध्यमश्चापि हि स्मृतः

niruktavacanaiścaiva varṣaṃ tadbhārataṃ smṛtam yataḥ svargaśca mokṣaśca madhyamaścāpi hi smṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

उवाच प्राञ्जलिर्वाक्यं सर्वलोकपितामहम् आसुरो मास्तु मे भावः सन्तु लोका ममाश्रयाः। तपस्येव रतिर्मेऽस्तु शरीरस्यास्तु वर्तनम्

English

! Vatsapn j

अध्याय ११४

श्लोक 7

न खल्वन्यत्र मर्त्यानां भूमौ कर्मविधिः स्मृतः भारतस्यास्य वर्षस्य नव भेदान्निबोधत

na khalvanyatra martyānāṃ bhūmau karmavidhiḥ smṛtaḥ bhāratasyāsya varṣasya nava bhedānnibodhata

हिन्दी अर्थ

एवमस्त्विति तं देवो जगाम स्वकमालयम्। वज्राङ्गोऽपि समास्ते तु तपसि स्थिरसंयमः आहारमिच्छन्भार्या स्वां न ददर्शाश्रमे स्वके । क्षुधाविष्टः स शैलस्य गहनं प्रविवेश ह आदातुं फलमूलानि स च तस्मिन् व्यलोकयत्।

English

1 Sabhaiiara

अध्याय ११४

श्लोक 8

इन्द्रद्वीपः कशेरुश्च ताम्रपर्णो गभस्तिमान् नागद्वीपस्तथा सौम्यो गन्धर्वस्त्वथ वारुणः

indradvīpaḥ kaśeruśca tāmraparṇo gabhastimān nāgadvīpastathā saumyo gandharvastvatha vāruṇaḥ

हिन्दी अर्थ

तां विलोक्य स हैत्येन्द्रः प्रोवाच परिसान्त्वयन् केन तेऽपकृतं भीरु यमलोकं यियासुना।

English

Yuviiuariva 1

अध्याय ११४

श्लोक 9

अयं तु नवमस्तेषां द्वीपः सागरसंवृतः योजनानां सहस्रं तु द्वीपो ऽयं दक्षिणोत्तरः

ayaṃ tu navamasteṣāṃ dvīpaḥ sāgarasaṃvṛtaḥ yojanānāṃ sahasraṃ tu dvīpo 'yaṃ dakṣiṇottaraḥ

हिन्दी अर्थ

कं वा कामं प्रयच्छामि शीघ्र मे ब्रूहि भामिनि एक हजार वर्ष पूरा हो गया। उस समयके पूर्ण हो जानेपर पद्मसम्भव भगवान् ब्रह्मा प्रसन्न होकर उस जलाशयके तटपर आये और वञ्राङ्गसे बोले॥ ६३--७१॥ ब्रह्माने कहा--दितिनन्दन ! उठो। मैं तुम्हें तुम्हारी

English

ISruvasta

अध्याय ११४

श्लोक 10

आयतस्तु कुमारीतो गङ्गायाः प्रवहावधिः तिर्यगूर्ध्वं तु विस्तीर्णः सहस्राणि दशैव तु

āyatastu kumārīto gaṅgāyāḥ pravahāvadhiḥ tiryagūrdhvaṃ tu vistīrṇaḥ sahasrāṇi daśaiva tu

हिन्दी अर्थ

तपोनिधि हैत्यराज वज्राङ्ग उठ खड़ा हुआ और हाथ जोड़कर सम्पूर्ण लोकोंके पितामह ब्रह्मासे इस प्रकार कहा वञ्ाङ्गने कहा--देव ! मेरे शरीरमें आसुर भावका संचार मत हो, मुझे अक्षय लोकोंकी प्राप्ति हो। तपस्यामें ही मेरी रति हो और मेरा यह शरीर वर्तमान रहे। एवमस्तु--ऐसा ही हो” ऐसा कहकर भगवान् ब्रह्मा

English

Kftlduala

अध्याय ११४

श्लोक 11

द्वीपो ह्युपनिविष्टो ऽयं म्लेच्छैरन्तेषु सर्वशः यवनाश्च किराताश्च तस्यान्ते पूर्वपश्चिमे

dvīpo hyupaniviṣṭo 'yaṃ mlecchairanteṣu sarvaśaḥ yavanāśca kirātāśca tasyānte pūrvapaścime

हिन्दी अर्थ

अपने निवासस्थानको चले गये। वज्राङ्ग भी तपस्याके समाप्त हो जानेपर संयम-नियमसे निवृत्त हुआ। उस समय उसे भोजनकी इच्छा जाग्रत् हुई, परंतु उसे अपने आश्रममें अपनी पत्नी न दीख पड़ी। तब भूखसे पीड़ित हुआ वञ्राङ्ग फल-मूल लानेके लिये उस पर्वतके वनमें प्रविष्ट हुआ। वहाँ उसने अपनी प्रिय पल्लीको देखा, जो थोड़ा मुख ढके हुए दीनभावसे रुदन कर रही थी। उसे देखकर हैत्यराज वद्राङ्ग उसे सान्त्वना देते हुए बोला वज्राङ्गने कहा--भीरु ! यमलोकको जानेके लिये उद्यत किस व्यक्तिने तुम्हारा अपकार किया है? अथवा मैं तुम्हारी कौन-सी कामना पूर्ण करूँ ? भामिनि! तुम मुझे शीघ्र बतलाओ

English

lirihadasva

अध्याय ११४

श्लोक 12

ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या मध्ये शूद्राश्च भागशः इज्यायुतवणिज्यादि वर्तयन्तो व्यवस्थिताः

brāhmaṇāḥ kṣatriyā vaiśyā madhye śūdrāśca bhāgaśaḥ ijyāyutavaṇijyādi vartayanto vyavasthitāḥ

हिन्दी अर्थ

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे षद्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें एक सौ छियालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ

English

1 Prainsn

अध्याय ११४

श्लोक 13

तेषां स व्यवहारो ऽयं वर्तनं तु परस्परम् धर्मार्थकामसंयुक्तो वर्णानां तु स्वकर्मसु

teṣāṃ sa vyavahāro 'yaṃ vartanaṃ tu parasparam dharmārthakāmasaṃyukto varṇānāṃ tu svakarmasu

हिन्दी अर्थ

ब्रह्माके वरदानसे तारकासुरकी उत्पत्ति और उसका राज्याभिषेक रौद्रेण देवराजेन नष्टनाथेव भूरिशः एवमुक्तः स हैत्येन्द्रः कोपव्याकुललोचनः। शक्तोऽपि देवराजस्य प्रतिकर्तु महासुरः

English

KuvnlaHva

अध्याय ११४

श्लोक 14

संकल्पपञ्चमानां तु आश्रमाणां यथाविधि इह स्वर्गापवर्गार्थं प्रवृत्तिरिह मानुषे

saṃkalpapañcamānāṃ tu āśramāṇāṃ yathāvidhi iha svargāpavargārthaṃ pravṛttiriha mānuṣe

हिन्दी अर्थ

तपः कर्तुं पुनर्देत्यो व्यवस्यत महाबलः। ज्ञात्वा तु तस्य संकल्पं ब्रह्मा क्रूरतरं पुनः उवाच तस्मै भगवान् प्रभुर्मधुरया गिरा

English

Naudivardhaiia;

अध्याय ११४

श्लोक 15

यस्त्वयं मानवो द्वीपस् तिर्यग्यामः प्रकीर्तितः य एनं जयते कृत्स्नं स सम्राडिति कीर्तितः

yastvayaṃ mānavo dvīpas tiryagyāmaḥ prakīrtitaḥ ya enaṃ jayate kṛtsnaṃ sa samrāḍiti kīrtitaḥ

हिन्दी अर्थ

आहाराभिमुखो हैत्य तन्नो ब्रूहि महाव्रत क्षणेनैकेन तल्लभ्यं त्यक्त्वाऽऽहारमुपस्थितम् त्यागो ह्यप्रातकामानां कामेभ्यो न तथा गुरुः। यथा प्राप्तं परित्यज्य कामं कमललोचन

English

DIrghatapas

अध्याय ११४

श्लोक 16

अयं लोकस्तु वै सम्राड् अन्तरिक्षजितां स्मृतः स्वराडसौ स्मृतो लोकः पुनर्वक्ष्यामि विस्तरात्

ayaṃ lokastu vai samrāḍ antarikṣajitāṃ smṛtaḥ svarāḍasau smṛto lokaḥ punarvakṣyāmi vistarāt

हिन्दी अर्थ

्रुत्वैतद् ब्रह्मणो वाक्यं हैत्यः प्राञ्जलिरब्रवीत्। चिन्तयंस्तपसा युक्तो हृदि ब्रह्ममुखेरितम् किमेवं वर्त्तसे भीरु वद त्वं किं चिकीर्षसि

English

Dj'idliusva

अध्याय ११४

श्लोक 17

सप्त चास्मिन्महावर्षे विश्रुताः कुलपर्वताः महेन्द्रो मलयः सह्यः शुक्तिमानृक्षवानपि

sapta cāsminmahāvarṣe viśrutāḥ kulaparvatāḥ mahendro malayaḥ sahyaḥ śuktimānṛkṣavānapi

हिन्दी अर्थ

इत्युक्ता सा मया देव प्रोवाच स्खलिताक्षरम्। वाक्यं वाचस्पते भीता तन्वङ्गी हेतुसंहितम् वराङ्गी बोली--' पतिदेव ! क्रूर स्वभाववाले देवराज इन्द्रने मुझे एक अनाथ विधवाकी तरह बहुत प्रकारसे डराया है, अपमानित किया है, ताडना दी है और कष्ट पहुँचाया हैं। इसलिये दुःखका अन्त न देखकर मैं अपने प्राणोंका परित्याग करनेके लिये उद्यत हूँ। अतः मुझे एक ऐसा पुत्र दीजिये, जो मेरा इस दु:ख एवं शोकरूप महासागरसे उद्धार करनेमें समर्थ हो। पल्रीद्वारा ऐसा कहे जानेपर हैत्यराज वञ्राङ्गका हृदय क्रोधसे व्याकुल हो

English

Sfifijaya

अध्याय ११४

श्लोक 18

विन्ध्यश्च पारियात्रश्च इत्येते कुलपर्वताः तेषां सहस्रशश्चान्ये पर्वतास्तु समीपतः

vindhyaśca pāriyātraśca ityete kulaparvatāḥ teṣāṃ sahasraśaścānye parvatāstu samīpataḥ

हिन्दी अर्थ

गया। यद्यपि महासुर वञ्राङ्ग देवराज इन्द्रसे बदला चुकानेमें समर्थ था, तथापि उस महाबली हैत्यने पुनः तप करनेका ही निश्चय किया। तब सामर्थ्यशाली भगवान् ब्रह्मा उसके उस क्रूरतर विचारको जानकर फिर जहाँ यह दिति-पुत्र वज्राङ्ग स्थित था वहाँ आ पहुँचे और उससे मधुर वाणीमें बोले

English

Frainoila

अध्याय ११४

श्लोक 19

अभिज्ञातास्ततश्चान्ये विपुलाश्चित्रसानवः अन्ये तेभ्यः परिज्ञाता ह्रस्वा ह्रस्वोपजीविनः

abhijñātāstataścānye vipulāścitrasānavaḥ anye tebhyaḥ parijñātā hrasvā hrasvopajīvinaḥ

हिन्दी अर्थ

ब्रह्माजीने कहा--बेटा ! तुम तो तपसे निवृत्त हो भोजन करने जा रहे थे, फिर तुम पुनः कठोर नियममें किस कारणसे तत्पर होना चाहते हो? महात्रतधारी हैत्यराज! वह कारण मुझे बतलाओ। कमललोचन! एक हजार वर्षतक निराहार रहनेका जो फल होता है, वह सामने उपस्थित आहारका त्याग कर देनेसे क्षणमात्रमें ही प्राप्त हो जाता है; क्योंकि अप्राप्त मनोरथवालोंका त्याग उतना महत्त्वपूर्ण नहीं माना जाता, जितना प्राप्त कामनावालेका त्याग वरिष्ठ होता है। ब्रह्माकी ऐसी बात सुनकर तपस्वी हैत्यराज वज्राङ्ग उस ब्रह्मवाणीका हृदयमें विचार करते हुए हाथ जोड़कर बोला

English

1 Prajani

अध्याय ११४

श्लोक 20

तैर्विमिश्रा जानपदा आर्या म्लेच्छाश्च सर्वतः पिबन्ति बहुला नद्यो गङ्गा सिन्धुः सरस्वती

tairvimiśrā jānapadā āryā mlecchāśca sarvataḥ pibanti bahulā nadyo gaṅgā sindhuḥ sarasvatī

हिन्दी अर्थ

व्राङ्गने कहा-भगवन्! आपकी आज्ञासे समाधिसे विरत होनेपर मैंने देखा कि मेरी पटरानी वराङ्गी एक वृक्षके नीचे बैठी हुई दीनभावसे भयभीत होकर रो रही है। यह देखकर मेरा मन दुःखी हो गया। तब मैंने उस सुन्दरीसे पूछा--' भीरु! तुम क्यों ऐसी दशामें पड़ गयी हो? मुझे बतलाओ तो सही, तुम क्या करना चाहती हो ?' वाणीके अधीश्वर देव! मेरे ऐसा पूछनेपर भयभीत हुई सुन्दरी वराङ्गीने लड़खड़ाते हुए शब्दोंमें कारण बतलाते हुए कहा

English

Ilaryaiiva I

अध्याय ११४

श्लोक 21

शतद्रुश्चन्द्रभागा च यमुना सरयूस्तथा ऐरावती वितस्ता च विशाला देविका कुहूः

śatadruścandrabhāgā ca yamunā sarayūstathā airāvatī vitastā ca viśālā devikā kuhūḥ

हिन्दी अर्थ

त्रासितास्म्यपविद्धास्मि कर्षिता पीडितास्मि च। रौद्रेण देवराजेन नष्टनाथेव भूरिशः तपो घोरं करिष्यामि जयाय त्रिदिबौकसाम् एतच्छुत्वा वचो देवः पदमगर्भोद्भवस्तदा।

English

Nikumbha

अध्याय ११४

श्लोक 22

गोमती धौतपापा च बाहुदा च दृषद्वती कौशिकी तु तृतीया च निश्चला गण्डकी तथा

gomatī dhautapāpā ca bāhudā ca dṛṣadvatī kauśikī tu tṛtīyā ca niścalā gaṇḍakī tathā

हिन्दी अर्थ

उवाच हैत्यराजानं प्रसन्नश्चतुराननः पुत्रस्ते तारको नाम भविष्यति महाबलः

English

Purafijaya

अध्याय ११४

श्लोक 23

इक्षुर्लौहितम् इत्येता हिमवत्पार्श्वनिःसृताः वेदस्मृतिर् वेत्रवती वृत्रघ्नी सिन्धुरेव च पर्णाशा नर्मदा चैव कावेरी महती तथा

ikṣurlauhitam ityetā himavatpārśvaniḥsṛtāḥ vedasmṛtir vetravatī vṛtraghnī sindhureva ca parṇāśā narmadā caiva kāverī mahatī tathā

हिन्दी अर्थ

देवसीमन्तिनीनां तु धम्मिल्लस्य विमोक्षणः। इत्युक्तो हैत्यनाथस्तु प्रणिपत्य पितामहम् वज्राङ्केणाहितं गर्भ वराङ्गी वरवर्णिनी। पूर्ण वर्षसहस्त्रं च दधारोदर एव हि जायमाने तु हैत्येन्द्रे तस्िल्लोकभयङ्करे

English

Saiuhata.sva

अध्याय ११४

श्लोक 24

पारा च धन्वतीरूपा विदुषा वेणुमत्यपि शिप्रा ह्यवन्ती कुन्ती च पारियात्राश्रिताः स्मृताः

pārā ca dhanvatīrūpā viduṣā veṇumatyapi śiprā hyavantī kuntī ca pāriyātrāśritāḥ smṛtāḥ

हिन्दी अर्थ

जेपुर्जप्यं मुनिवरा नेदुर्व्यालमृगा अपि। चन्द्रसूयौ जहुः कान्तिं सनीहारा दिशोऽभवन् है कि-'नाथ! देवराज इन्द्रने निर्दय होकर मुझे अनाथ

English

Khanitra

अध्याय ११४

श्लोक 25

शोणो महानदश्चैव नन्दना सुकृशा क्षमा मन्दाकिनी दशार्णा च चित्रकूटा तथैव च तमसा पिप्पली श्येनी तथा चित्रोत्पलापि च

śoṇo mahānadaścaiva nandanā sukṛśā kṣamā mandākinī daśārṇā ca citrakūṭā tathaiva ca tamasā pippalī śyenī tathā citrotpalāpi ca

हिन्दी अर्थ

नारीको तरह अनेक प्रकारसे डराया, अपमानित किया, घसीटा है और कष्ट पहुँचाया है। दुःखका अन्त न देखकर मैं प्राण-त्याग करनेको उद्यत हो गयी हुँ। इसलिये मुझे इस दुःखरूपी महासागरसे उद्धार करनेवाला पुत्र प्रदान कीजिये।' उसके ऐसा कहनेपर मेरा मन संक्षुब्ध हो उठा है। इसलिये मैं उसे पुत्र प्रदान करनेके लिये उद्यत हो यह बात सुनकर पद्मसम्भव चतुर्मुख ब्रह्मा प्रसन्न हो गये और उस हैत्यराजसे बोले

English

Dhanvantari

अध्याय ११४

श्लोक 26

विमला चञ्चला चैव तथा च धूतवाहिनी शुक्तिमन्ती शुनी लज्जा मुकुटा ह्रादिकापि च ऋष्यवन्तप्रसूतास् ता नद्यो ऽमलजलाः शुभाः

vimalā cañcalā caiva tathā ca dhūtavāhinī śuktimantī śunī lajjā mukuṭā hrādikāpi ca ṛṣyavantaprasūtās tā nadyo 'malajalāḥ śubhāḥ

हिन्दी अर्थ

ब्रह्माने कहा--वत्स! तुम्हारी तपस्या पूरी हो चुकी है। अब तुम उस दुस्तर क्लेशपूर्ण कार्यमें मत प्रविष्ट होओ। तुम्हें तारक नामका ऐसा महाबली पुत्र प्राप्त होगा, जो देवाङ्गनाओंके केशकलापको खोल देनेवाला होगा (अर्थात् उन्हें विधवाकी परिस्थितिमें ला देगा) । ब्रह्माद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर हैत्यराज वञ्राङ्गका मुख हर्षसे खिल उठा। तब वह ब्रह्माजीके चरणोंमें प्रणिपात करके अपनी पटरानी वराङ्गीके पास

English

Kl'isusva

अध्याय ११४

श्लोक 27

तापी पयोष्णी निर्विन्ध्या क्षिप्रा च ऋषभा नदी वेणा वैतरणी चैव विश्वमाला कुमुद्वती

tāpī payoṣṇī nirvindhyā kṣiprā ca ṛṣabhā nadī veṇā vaitaraṇī caiva viśvamālā kumudvatī

हिन्दी अर्थ

आया और उसने (पुत्र-प्रा्िके वरदानकी बात बतलाकर) उसे आनन्दित किया। तत्पश्चात् दोनों पति-पत्नी कृतार्थ होकर प्रसन्नतापूर्वक अपने आश्रमको लौट गये। समयानुसार वञ्राङ्गद्वारा स्थापित किये गये गर्भको सुन्दरी वराङ्गी पूरे एक हजार वर्षोतक अपने उदरमें ही धारण किये रही। उस लोकभयंकर हैत्येन्द्रके जन्म लेते ही सारी पृथ्वी डगमगा उठी अर्थात् भूकम्प आ गया, समुद्रोंमें ज्वार-भाटा

English

, Devaruta

अध्याय ११४

श्लोक 28

तोया चैव महागौरी दुर्गमा तु शिला तथा विन्ध्यपादप्रसूतास् ताः सर्वाः शीतजलाः शुभाः

toyā caiva mahāgaurī durgamā tu śilā tathā vindhyapādaprasūtās tāḥ sarvāḥ śītajalāḥ śubhāḥ

हिन्दी अर्थ

झंझावात बहने लगा। श्रेष्ठ मुनिगण शान्त्यर्थं जप करने लगे, सर्प तथा वन्य पशु आदि भी उच्च स्वरसे शब्द करने लगे, चन्द्रमा और सूर्यकी कान्ति फीकी पड़ गयी तथा दिशाओंमें कुहासा छा गया। द्विजवरो! उस महासुरके जन्म लेनेपर सभी प्रधान असुर हर्षसे भरे हुए वहाँ आ पहुँचे।

English

Janaiuojaya

अध्याय ११४

श्लोक 29

गोदावरी भीमरथी कृष्णवेणी च वञ्जुला तुङ्गभद्रा सुप्रयोगा वाह्या कावेरी चैव तु दक्षिणापथनद्यस्ताः सह्यपादाद्विनिःसृताः

godāvarī bhīmarathī kṛṣṇaveṇī ca vañjulā tuṅgabhadrā suprayogā vāhyā kāverī caiva tu dakṣiṇāpathanadyastāḥ sahyapādādviniḥsṛtāḥ

हिन्दी अर्थ

विषण्णमनसो देवाः समहेन्द्रास्तदाभवन्। वराङ्गी स्वसुतं दृष्टा हर्षेणापूरिता तदा बहु मेने न देवेन्द्रविजयं तु तहैव सा। जातमात्रस्तु हैत्येन्द्रस्तारकश्चण्डविक्रमः स तु प्राप्य महाराज्यं तारको मुनिसत्तमाः।

English

Vut'aiidsuo ll

अध्याय ११४

श्लोक 30

कृतमाला ताम्रपर्णी पुष्पजा ह्युत्पलावती मलयप्रसूता नद्यस् ताः सर्वाः शीतजलाः शुभाः

kṛtamālā tāmraparṇī puṣpajā hyutpalāvatī malayaprasūtā nadyas tāḥ sarvāḥ śītajalāḥ śubhāḥ

हिन्दी अर्थ

उनके साथ राक्षसियाँ भी थीं। हर्षसे फूली हुई उन असुराङ्गनाओंमें कुछ तो नाचने लगीं और कुछ गाने लगीं। इस प्रकार वहाँ दानवोंका महोत्सव प्रारम्भ हो गया। यह देखकर इन्द्रसहित सभी देवताओंका मन खिन्न हो गया। उधर वराङ्गी अपने पुत्रका मुख देखकर हर्षसे भर गयी। उसी समय वह देवराज इन्द्रकी विजयको तुच्छ मानने लगी। प्रचण्ड पराक्रमी हैत्यराज तारक जन्म लेते ही पृथ्वीको भी उठा लेनेमें समर्थ

English

Mundhutr*

अध्याय ११४

श्लोक 31

त्रिभागा ऋषिकुल्या च इक्षुदा त्रिदिवाचला ताम्रपर्णी तथा मूली शरवा विमला तथा महेन्द्रतनयाः सर्वाः प्रख्याताः शुभगामिनीः

tribhāgā ṛṣikulyā ca ikṣudā tridivācalā tāmraparṇī tathā mūlī śaravā vimalā tathā mahendratanayāḥ sarvāḥ prakhyātāḥ śubhagāminīḥ

हिन्दी अर्थ

असुरोंके सम्राटूपदपर अभिषिक्त कर दिया गया। मुनिवरो! तब उस महान् राज्यका अधिकार पाकर तारक उन उवाच दानवश्रेष्ठान् युक्तियुक्तमिदं वचः॥ २९ दानवश्रेष्ठांसे ऐसा युक्तिसंगत वचन बोला- इति श्रीमत्स्ये महापुराणे तारकासुरोपाख्याने तारकोत्पत्तिर्नाम सप्तचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः

English

: Dfihaduktha

अध्याय ११४

श्लोक 32

काशिका सुकुमारी च मन्दगा मन्दवाहिनी कृपा च पाशिनी चैव शुक्तिमन्तात्मजास् तु ताः

kāśikā sukumārī ca mandagā mandavāhinī kṛpā ca pāśinī caiva śuktimantātmajās tu tāḥ

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके तारकासुरोपाख्यानमें तारकोत्पत्ति नामक एक सौ सैंतालीसवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ तारकासुरकी तपस्या और ब्रह्माद्वारा उसे वरदानप्राप्ति, देवासुर- संग्रामकी तैयारी तथा दोनों दलोंकी सेनाओंका वर्णन

English

Ma basil I a

अध्याय ११४

श्लोक 33

सर्वाः पुण्यजलाः पुण्याः सर्वगाश्च समुद्रगाः विश्वस्य मातरः सर्वाः सर्वपापहराः शुभाः

sarvāḥ puṇyajalāḥ puṇyāḥ sarvagāśca samudragāḥ viśvasya mātaraḥ sarvāḥ sarvapāpaharāḥ śubhāḥ

हिन्दी अर्थ

श्रेयसे क्रियतां बुद्धि: सर्वैः कृत्यस्य संविधौ वंशक्षयकरा देवाः सर्वेषामेव दानवाः। अस्माकं जातिधर्मो वै विरूढं वैरमक्षयम् तारकने कहा-महाबली असुरो! आपलोग ध्यानपूर्वक मेरी बात सुनें। आप सभी लोगोंको इस कार्यकी तैयारीमें सर्वप्रथम अपने कल्याणके लिये विचार कर लेना चाहिए। दानववृन्द! देवतालोग हम

English

Purukutna

अध्याय ११४

श्लोक 34

तासां नद्युपनद्यश्च शतशो ऽथ सहस्रशः तास्विमे कुरुपाञ्चालाः शाल्वाश्चैव सजाङ्गलाः

tāsāṃ nadyupanadyaśca śataśo 'tha sahasraśaḥ tāsvime kurupāñcālāḥ śālvāścaiva sajāṅgalāḥ

हिन्दी अर्थ

सभीके कुलका (सदा) संहार करते रहते हैं, इस कारण उनके साथ विरोध करना हमलोगोंका जातिगत धर्म है और उनके साथ हमारा (सदा) अक्षय वैर बँधा रहता है। हम सभी लोग अपने बाहुबलका आश्रय लेकर आज ही उन देवताओंका दमन करनेके लिये चलेंगे, इसमें कोई संशय नहीं है, किंतु दिति-नन्दनो! तपोबलसे सम्पन्न हुए बिना मैं

English

Trasadas\ n

अध्याय ११४

श्लोक 35

शूरसेना भद्रकारा बाह्याः सहपटच्चराः मत्स्याः किराताः कुल्याश्च कुन्तलाः काशिकोशलाः

śūrasenā bhadrakārā bāhyāḥ sahapaṭaccarāḥ matsyāḥ kirātāḥ kulyāśca kuntalāḥ kāśikośalāḥ

हिन्दी अर्थ

अहमादौ करिष्यामि तपो घोरं दितेः सुताः॥ ४ अतः मैं पहले घोर तपस्या करूँगा, तत्पश्चात् हमलोग साधु साध्वित्यवोचंस्ते तत्र हैत्याः सविस्मयाः। सोऽगच्छत् पारियात्रस्य गिरेः कन्दरमुत्तमम् सर्वर्तुकुसुमाकीर्ण

English

1 Virnia

अध्याय ११४

श्लोक 36

आवन्ताश्च कलिङ्गाश्च मूकाश्चैवान्धकैः सह मध्यदेशा जनपदाः प्रायशः परिकीर्तिताः

āvantāśca kaliṅgāśca mūkāścaivāndhakaiḥ saha madhyadeśā janapadāḥ prāyaśaḥ parikīrtitāḥ

हिन्दी अर्थ

अनेकाकारबहुलं पृथक् पक्षिकुलाकुलम् प्राप्य तत्कन्दरं हैत्यश्चचार विपुलं तपः

English

SambUilta

अध्याय ११४

श्लोक 37

सह्यस्यानन्तरे चैते तत्र गोदावरी नदी पृथिव्यामपि कृत्स्नायां स प्रदेशो मनोरमः

sahyasyānantare caite tatra godāvarī nadī pṛthivyāmapi kṛtsnāyāṃ sa pradeśo manoramaḥ

हिन्दी अर्थ

शतं शतं समानां तु तपांस्येतानि सोऽकरोत् ततः स्वदेहादुत्कृत्य कर्ष कर्ष दिने दिने। मांसस्याग्नौ जुहावासौ ततो निर्मासतां गतः एतस्मिन्नन्तरे ब्रह्मा

English

MuUavirya

अध्याय ११४

श्लोक 38

यत्र गोवर्धनो नाम मन्दरो गन्धमादनः रामप्रियार्थं स्वर्गीया वृक्षा दिव्यास्तथौषधीः

yatra govardhano nāma mandaro gandhamādanaḥ rāmapriyārthaṃ svargīyā vṛkṣā divyāstathauṣadhīḥ

हिन्दी अर्थ

प्राप्य तं शैलराजानं स गिरेः कन्दरस्थितम्। उवाच तारकं देवो गिरा मधुरया युतः उपभोग करेंगे; क्योंकि सुदृढ़ उपाय करनेवाला पुरुष ही अनपायिनी लक्ष्मीका पात्र होता है । चञ्चल बुद्धिवाला पुरुष चञ्चला लक्ष्मीकी रक्षा नहीं कर सकता। तारकासुरके उस कथनको सुनकर वहाँ उपस्थित

English

Maharnanas

अध्याय ११४

श्लोक 39

भरद्वाजेन मुनिना प्रियार्थमवतारिताः ततः पुष्पवरो देशस् तेन जज्ञे मनोरमः

bharadvājena muninā priyārthamavatāritāḥ tataḥ puṣpavaro deśas tena jajñe manoramaḥ

हिन्दी अर्थ

सभी दानव और हैत्य आश्चर्यचकित हो उठे और वे सभी 'ठीक है, ठीक है” ऐसा कहने लगे। तत्पश्चात् तारकासुर (तपस्या करनेके लिये) पारियात्र पर्वत (अरावली एवं विंध्यका पश्चिम भाग)-की उत्तम कन्दराके पास पहुँचा। वह पर्वत सभी ऋतुओंमें विकसित होनेवाले पुष्पोंसे व्याप्त, अनेक प्रकारको ओषधियोंसे उद्दीप्त विविध धातुओंके रसोंके चूते रहनेसे चित्र-विचित्र, अनेकों गुहारूपी गृहोंसे युक्त, सब ओरसे घने वृक्षासे घिरा, रंग-बिरंगे कल्पवृक्षोंसे आच्छादित और अनेकों प्रकारे आकारवाले बहुत-से पक्षि-समूहोंसे सर्वत्र व्याप्त था। उस पर्वतसे अनेकों झरने झर रहे थे तथा वह अनेकविध जलाशयासे सुशोभित था। उसकी कन्दरामें

English

Bhimaratha

अध्याय ११४

श्लोक 40

वाह्लीका वाटधानाश्च आभीराः कालतोयकाः पुरंध्राश्चैव शूद्राश्च पल्लवाश् चात्तखण्डिकाः

vāhlīkā vāṭadhānāśca ābhīrāḥ kālatoyakāḥ puraṃdhrāścaiva śūdrāśca pallavāś cāttakhaṇḍikāḥ

हिन्दी अर्थ

जाकर तारक हैत्य घोर तपस्यामें संलग्न हो गया पहले वह सौ-सौ वर्षोके क्रमसे निराहार रहकर, फिर पञ्चाग्नि तापकर, पुनः पत्ते खाकर तत्पश्चात् केवल जल पीकर तपस्या करता रहा। इसके बाद उसने प्रतिदिन अपने शरीरसे सोलह माशा मांस काट-काटकर

English

Anaranya

अध्याय ११४

श्लोक 41

गान्धारा यवनाश्चैव सिन्धुसौवीरमद्रकाः शका द्रुह्याः पुलिन्दाश्च पारदाहारमूर्तिकाः

gāndhārā yavanāścaiva sindhusauvīramadrakāḥ śakā druhyāḥ pulindāśca pāradāhāramūrtikāḥ

हिन्दी अर्थ

अग्निमें हवन करना प्रारम्भ किया, जिससे उसका शरीर मांसरहित हो गया। इस प्रकार उसके मांसरहित हो जानेपर वह तप:पुञ्-सा दीख पड़ने लगा। उसके तेजसे चारों ओर सभी प्राणी संतप्त हो उठे। समस्त देवगण उसको तपस्यासे भयभीत हो उद्दिग्र हो गये। इसी परमं तोषमागतः॥ ९४ अवसरपर ब्रह्मा उसकी भीषण तपस्यासे परम प्रसन्न हो

English

1- — -- — ■

अध्याय ११४

श्लोक 42

रामठाः कण्टकाराश्च कैकेया दशनामकाः क्षत्रियोपनिवेश्याश्च वैश्याः शूद्रकुलानि च

rāmaṭhāḥ kaṇṭakārāśca kaikeyā daśanāmakāḥ kṣatriyopaniveśyāśca vaiśyāḥ śūdrakulāni ca

हिन्दी अर्थ

गये। तब वे तारकासुरको वर प्रदान करनेके लिये स्वर्गलोकसे चल पड़े और उस पर्वतराज पारियात्रपर जा पहुँचे। वहाँ वे देवाधिदेव उस पर्वतकी कन्दरामें स्थित तारकके निकट जाकर उससे मधुर वाणीमें बोले ब्रह्माजीने कहा--पुत्र! तुम्हें अब तप करनेकी आवश्यकता नहीं, वह पूरी हो चुकी। अब तुम्हारे लिये कुछ भी असाध्य

English

P/'isad<i'va

अध्याय ११४

श्लोक 43

अत्रयो ऽथ भरद्वाजाः प्रस्थलाः सदसेरकाः लम्पकास् तलगानाश्च सैनिकाः सह जाङ्गलैः एते देशा उदीच्यास्तु प्राच्यान्देशान्निबोधत

atrayo 'tha bharadvājāḥ prasthalāḥ sadaserakāḥ lampakās talagānāśca sainikāḥ saha jāṅgalaiḥ ete deśā udīcyāstu prācyāndeśānnibodhata

हिन्दी अर्थ

वरं वृणीष्व रुचिरं यत् ते मनसि वर्तते॥ १६ नहीं है। अब तुम्हारे मनमें जो रुचे, वह उत्तम वर माँग लो। इत्युक्तस्तारको हैत्यः प्रणम्यात्मभुवं विभुम्। उवाच प्राञ्जलिर्भूत्वा प्रणतः पृथुविक्रमः देव भूतमनोवास वेत्सि जन्तुविचेष्टितम्। कृतप्रतिकृताकाङ्की जिगीषुः प्रायशो जनः

English

; VivimSa

अध्याय ११४

श्लोक 44

अङ्गा वङ्गा मद्गुरका अन्तर्गिरिबहिर्गिरी ततः प्लवंगमातंगा यमका मल्लवर्णकाः सुह्मोत्तराः प्रविजया मार्गवा गेयमालवाः

aṅgā vaṅgā madgurakā antargiribahirgirī tataḥ plavaṃgamātaṃgā yamakā mallavarṇakāḥ suhmottarāḥ pravijayā mārgavā geyamālavāḥ

हिन्दी अर्थ

वयं च जातिधर्मेण कृतवैराः सहामरैः । तैश्च निःशेषिता हैत्याः क्रूरैः संत्यज्य धर्मिताम्। तेषामहं समुद्धर्ता भवेयमिति मे मतिः

English

Divoddsa I

अध्याय ११४

श्लोक 45

प्राग्ज्योतिषाश्च पुण्ड्राश्च विदेहास्ताम्रलिप्तकाः शाल्वमागधगोनर्दाः प्राच्या जनपदाः स्मृताः

prāgjyotiṣāśca puṇḍrāśca videhāstāmraliptakāḥ śālvamāgadhagonardāḥ prācyā janapadāḥ smṛtāḥ

हिन्दी अर्थ

एतन्मे देहि देवेश नान्यो मे रोचते वरः। तमुवाच ततो हैत्यं विरिञ्रिः सुरनायकः न युज्यन्ते विना मृत्युं देहिनो हैत्यसत्तम। यतस्ततोऽपि वरय मृत्युं यस्मान्न शङ्कसे ततः सञ्चिन्त्य हैत्येन्द्रः शिशोर्वे सप्तवासरात्। वव्रे महासुरो मृत्युमवलेपनमोहितः

English

HaryasVa 11

अध्याय ११४

श्लोक 46

तेषां परे जनपदा दक्षिणापथवासिनः पाण्ड्याश्च केरलाश्चैव चोलाः कुल्यास्तथैव च

teṣāṃ pare janapadā dakṣiṇāpathavāsinaḥ pāṇḍyāśca keralāścaiva colāḥ kulyāstathaiva ca

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मा चास्मै वरं दत्त्वा यत्किञ्चिन्मनसेप्सितम्। जगाम त्रिदिवं देवो हैत्योऽपि स्वकमालयम् उत्तीर्ण तपसस्तं तु हैत्यं हैत्येश्वरास्तथा। परिबब्रुः सहस्राक्षं दिवि देवगणा यथा

English

!' Sndbriti

अध्याय ११४

श्लोक 47

सेतुकाः सूतिकाश्चैव कुपथां वाजिवासिकाः नवराष्ट्रा माहिषिकाः कलिङ्गाश्चैव सर्वशः

setukāḥ sūtikāścaiva kupathāṃ vājivāsikāḥ navarāṣṭrā māhiṣikāḥ kaliṅgāścaiva sarvaśaḥ

हिन्दी अर्थ

तस्मिन् महति राज्यस्थे तारके हैत्यनन्दने। ऋतवो मूर्तिमन्तश्च स्वकालगुणबृंहिताः अभवन् किंकरास्तस्य लोकपालाश्च सर्वशः। कान्तिरदयुतिर्धृतिर्मेधा श्रीरवेक्ष्य च दानवम् परिबदुर्गुणाकीर्णा निश्छिद्राः सर्व एव हि। कालागुरुविलिप्ताङ्गं महामुकुटभूषणम्

English

' Tlliksu, (AsUratba)

अध्याय ११४

श्लोक 48

कारूषाश्च सहैषीका आटव्याः शबरास्तथा पुलिन्दा विन्ध्यपुषिका वैदर्भा दण्डकैः सह

kārūṣāśca sahaiṣīkā āṭavyāḥ śabarāstathā pulindā vindhyapuṣikā vaidarbhā daṇḍakaiḥ saha

हिन्दी अर्थ

ब्रह्माद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर परम पराक्रमी हैत्यराज तारकने स्वयम्भू भगवान् ब्रह्माको प्रणाम किया और विनम्रभावसे हाथ जोड़कर कहा तारक बोला--सभी प्राणियोके मनमें निवास करनेवाले देव! आप सभी जीवोंकी चेष्टाको जानते हैं। प्रायः प्रत्येक मनुष्य अपने शत्रुसे बदला लेनेकी भावनासे उसे जीतनेका इच्छुक रहता है। हमलोगोंका जातिधर्मानुसार देवताओंके साथ

English

Vasumanas

अध्याय ११४

श्लोक 49

कुलीयाश्च सिरालाश्च रूपसास् तापसैः सह तथा तैत्तिरिकाश्चैव सर्वे कारस्करास्तथा

kulīyāśca sirālāśca rūpasās tāpasaiḥ saha tathā taittirikāścaiva sarve kāraskarāstathā

हिन्दी अर्थ

वैर है। उन क्रूरकर्मी देवताओंने धर्मको तिलाञ्जलि देकर प्रायः हैत्योंको निःशेष कर दिया है। मैं उनका उन्मूलन करनेवाला हो जाऊँ-एऐसा मेरा विचार है। साथ ही मैं समस्त प्राणियों तथा परम तेजस्वी अस्त्रोंद्राय अवध्य हो जाऊँ--यही उत्तम वर मेरे हृदयमें स्थित है। देवेश! मुझे यही वर दीजिये। मुझे किसी अन्य वरकी अभिलाषा नहीं है। यह सुनकर सुरनायक ब्रह्मा उस हैत्यराजसे बोले--'हैत्यश्रेष्ठ! कोई भी देहधारी जीव मृत्युसे नहीं बच सकता, अर्थात् जो जन्म धारण करता है, उसकी मृत्यु अवश्य होती है, इसलिये जिससे तुम्हें मृत्युकी आशङ्का न हो, उसीसे अपनी मृत्युका वर माँग लो।' तब गर्वसे मूढ़ हुए महासुर हैत्यराज तारकने भलीभाँति सोच-विचारकर सात दिनके बालकके

English

! EJiauIifra Tridhanvan

अध्याय ११४

श्लोक 50

वासिक्याश्चैव ये चान्ये ये चैवान्तरनर्मदाः भारुकच्छाः समाहेयाः सह सारस्वतैस्तथा

vāsikyāścaiva ye cānye ye caivāntaranarmadāḥ bhārukacchāḥ samāheyāḥ saha sārasvataistathā

हिन्दी अर्थ

हाथसे अपनी मृत्युका वर माँगा। तदनन्तर देवाधिदेव ब्रह्मा उसके मनके अभिलाषानुसार उसे वर देकर स्वर्गलोकको चले गये। इधर हैत्यराज तारक भी अपने निवासस्थानको लौट आया। तब सभी हैत्याधिपति तपस्याको पूर्ण करके लौटे हुए उस हैत्यराज तारकको घेरकर इस प्रकार बातें करने लगे, जैसे स्वर्गलोकमें देवगण इन्द्रको घेरकर बातें करते हैं

English

Trayy.Truua

अध्याय ११४

श्लोक 51

काच्छीकाश्चैव सौराष्ट्रा आनर्ता अर्बुदैः सह इत्येते अपरान्तास्तु शृणु ये विन्ध्यवासिनः

kācchīkāścaiva saurāṣṭrā ānartā arbudaiḥ saha ityete aparāntāstu śṛṇu ye vindhyavāsinaḥ

हिन्दी अर्थ

हैत्योंके उस महान् साम्राज्यपर हैत्यनन्दन तारकके अवस्थित होनेपर छहों ऋतुएँ शरीर धारण कर अपने- अपने कालके अनुसार सभी गुणोंसे युक्त हो उपस्थित हुई। सभी लोकपाल उसका किंकर बनकर रहने लगे। कान्ति, झुति, धृति, मेधा और श्री-ये सभी देवियाँ गुणयुक्त होकर निष्कपट भावसे उस दानवराजकी ओर देखती हुई उसे घेरकर खड़ी रहती थीं। जब वह हैत्यराज शरीरमें काला अगुरुका लेप कर बहुमूल्य मुकुटसे विभूषित हो कृतान्तोऽग्रेसरस्तस्य बभूवुर्मुनिसत्तमा:

English

Dhristakotu Karandhama

अध्याय ११४

श्लोक 52

मालवाश्च करूषाश्च मेकलाश्चोत्कलैः सह औण्ड्रा माषा दशार्णाश्च भोजाः किष्किन्धकैः सह

mālavāśca karūṣāśca mekalāścotkalaiḥ saha auṇḍrā māṣā daśārṇāśca bhojāḥ kiṣkindhakaiḥ saha

हिन्दी अर्थ

एवं प्रयाति काले तु वितते तारकासुरः। बभाषे सचिवान् हैत्यः प्रभूतवरदर्पितः

English

Ruaadrabba

अध्याय ११४

श्लोक 53

स्तोशलाः कोसलाश्चैव त्रैपुरा वैदिशास्तथा तुमुरास् तुम्बराश्चैव पद्गमा नैषधैः सह

stośalāḥ kosalāścaiva traipurā vaidiśāstathā tumurās tumbarāścaiva padgamā naiṣadhaiḥ saha

हिन्दी अर्थ

राज्येन कारणं किं मे त्वनाक्रम्य त्रिविष्टपम्। अनिर्याप्य सुरैवैर॑ का शान्तिईदये मम भुञ्जतेऽद्यापि यज्ञांशानमरा नाक एव हि। विष्णुः श्रियं न जहति तिष्ठते च गतभ्रम:

English

Trisdhku ' Hurisciuindra

अध्याय ११४

श्लोक 54

अरूपाः शौण्डिकेराश्च वीतिहोत्रा अवन्तयः एते जनपदाः ख्याता विन्ध्यपृष्ठनिवासिनः

arūpāḥ śauṇḍikerāśca vītihotrā avantayaḥ ete janapadāḥ khyātā vindhyapṛṣṭhanivāsinaḥ

हिन्दी अर्थ

मातापितृभ्यां न करोति कामान् बन्धूनशोकान् न करोति यो वा। कीर्तिं हि वा चार्जयते हिमाभां पुमान् स जातोऽपि मृतो मतं मे त्रैलोक्यलक्ष्मीहरणाय शीघ्रम्

English

Avlldfit

अध्याय ११४

श्लोक 55

अतो देशान्प्रवक्ष्यामि पर्वताश्रयिणश्च ये निराहाराः सर्वगाश्च कुपथा अपथास्तथा

ato deśānpravakṣyāmi parvatāśrayiṇaśca ye nirāhārāḥ sarvagāśca kupathā apathāstathā

हिन्दी अर्थ

बलं च मे दुर्जयहैत्यचक्रम् । ध्वजं च मे काञ्चनपइनद्धं और मनोहर बाजूबंद बाँधकर विशाल सिंहासनपर रहती थीं और क्षणमात्रके लिये भी उससे पृथक् नहीं होती थीं। मुनिवरो! उसके महलमें चन्द्रमा और सूर्य दीपके स्थानपर, वायुदेव पंखोंके स्थानपर तथा कृतान्त उसके अग्रेसरके स्थानपर नियुक्त हुए। इस प्रकार

English

! Uarvaava Maruita*

अध्याय ११४

श्लोक 56

कुथप्रावरणाश्चैव ऊर्णादवाः समुद्गकाः त्रिगर्ता मण्डलाश्चैव किराताश्चामरैः सह

kuthaprāvaraṇāścaiva ūrṇādavāḥ samudgakāḥ trigartā maṇḍalāścaiva kirātāścāmaraiḥ saha

हिन्दी अर्थ

दिन उत्कृष्ट वरप्रासिसे गर्वित हुआ हैत्यराज तारकासुर अपने मन्त्रियोसे बोला तारकने कहा अमात्यो ! स्वर्गलोकपर आक्रमण किये बिना मुझे इस राज्यसे कया लाभ? देवताओंसे वैरका बदला चुकाये बिना मेरे हृदयमें शान्ति कहाँ? अभी भी देवगण स्वर्गलोकमें यज्ञांशांका उपभोग कर रहे

English

(HarjasVa)

अध्याय ११४

श्लोक 57

चत्वारि भारते वर्षे युगानि मुनयो ऽब्रुवन् कृतं त्रेता द्वापरं च कलिश्चेति चतुर्युगम् तेषां निसर्गं वक्ष्यामि उपरिष्टाच्च कृत्स्नशः

catvāri bhārate varṣe yugāni munayo 'bruvan kṛtaṃ tretā dvāparaṃ ca kaliśceti caturyugam teṣāṃ nisargaṃ vakṣyāmi upariṣṭācca kṛtsnaśaḥ

हिन्दी अर्थ

हैं। विष्णु लक्ष्मीको नहीं छोड़ रहा है और निर्भय होकर स्थित है। स्वर्गलोकमें क्रीडागारोंमें मदिराकी गन्धसे युक्त दुबले-पतले शरीरवाले श्रेष्ठ देवगण सुन्दरी देवाड़नाओंद्वारा आलिङ्गित किये जा रहे हैं। कोई भी व्यक्ति यदि जन्म लेकर अपना पुरुषार्थ नहीं प्रकट करता तो उसका जन्म लेना व्यर्थ है, उससे तो जन्म न लेनेवाला ही विशिष्ट है। जो पुरुष माता-पिताकी कामनाओंको पूर्ण नहीं करता, अपने बन्धुओंका शोक नष्ट नहीं करता और हिमके समान उज्जवल कीर्तिका अर्जन नहीं करता, वह जन्म लेकर भी मरे हुएके समान है--ऐसा मेरा विचार है। इसलिये श्रेष्ठ देवताओंको जीतने तथा त्रिलोकीकी लक्ष्मीका अपहरण करनेके लिये शीघ्र ही मेरा आठ पहियेवाला रथ,

English

Chaiicha : Nariyaiita

अध्याय ११४

श्लोक 58

एतच्छ्रुत्वा तु ऋषय उत्तरं पुनरेव ते शुश्रूषवस्तमूचुस्ते प्रकामं लौमहर्षणिम्

etacchrutvā tu ṛṣaya uttaraṃ punareva te śuśrūṣavastamūcuste prakāmaṃ laumaharṣaṇim

हिन्दी अर्थ

अजेय हैत्य-सैन्यसमूह, स्वर्णपत्र-जटित ध्वज और मुक्ताकी लड़ियोंसे सुशोभित छत्र तैयार किया जाय हैत्यराज तारककी बात सुनकर उसके सेनानायक

English

(Sudeva)

अध्याय ११४

श्लोक 59

यच्च किम्पुरुषं वर्षं हरिवर्षं तथैव च आचक्ष्व नो यथातत्त्वं कीर्तितं भारतं त्वया

yacca kimpuruṣaṃ varṣaṃ harivarṣaṃ tathaiva ca ācakṣva no yathātattvaṃ kīrtitaṃ bhārataṃ tvayā

हिन्दी अर्थ

सेनानीहैँत्यराजस्य तथा चक्रे बलान्वितः ॥ ३८ महाबली ग्रसन नामक दानवने उसके आज्ञानुसार आहत्य भेरीं गम्भीरां हैत्यानाहूय सत्वरः। तुरगाणां सहस्त्रेण चक्राष्टकविभूषितम् शुक्लाम्बरपरिष्कारं

English

fciutapas i Rajyavardhana

अध्याय ११४

श्लोक 60

जम्बूखण्डस्य विस्तारं तथान्येषां विदांवर द्वीपानां वासिनां तेषां वृक्षाणां प्रब्रवीहि नः

jambūkhaṇḍasya vistāraṃ tathānyeṣāṃ vidāṃvara dvīpānāṃ vāsināṃ teṣāṃ vṛkṣāṇāṃ prabravīhi naḥ

हिन्दी अर्थ

विमानमिव देवस्य सुरभर्तुः शतक्रतोः। दशकोटीश्वरा हैत्या हैत्यास्ते चण्डविक्रमा: महिषः कुञ्जरो मेघः कालनेमिर्निमिस्तथा

English

Divoddsa II

अध्याय ११४

श्लोक 61

पृष्टस्त्वेवं तदा विप्रैर् यथाप्रश्नं विशेषतः उवाच ऋषिभिर्दृष्टं पुराणाभिमतं तथा

pṛṣṭastvevaṃ tadā viprair yathāpraśnaṃ viśeṣataḥ uvāca ṛṣibhirdṛṣṭaṃ purāṇābhimataṃ tathā

हिन्दी अर्थ

मथनो जम्भकः शुम्भो हैत्येन्द्रा दश नायकाः । अन्येऽपि शतशस्तस्य पृथिवीदलनक्षमाः हैत्येन्द्रा गिरिवर्ष्माणः सन्ति चण्डपराक्रमाः । नानायुधप्रहरणा नानाशस्त्रास्त्रपारगा: तारकस्याभवत् केतू रौद्रः कनकभूषणः।

English

' Pratindbaku 1 Sudli|lli

अध्याय ११४

श्लोक 62

शुश्रूषवस्तु यद्विप्राः शुश्रूषध्वमतन्द्रिताः जम्बूवर्षः किम्पुरुषः सुमहानन्दनोपमः

śuśrūṣavastu yadviprāḥ śuśrūṣadhvamatandritāḥ jambūvarṣaḥ kimpuruṣaḥ sumahānandanopamaḥ

हिन्दी अर्थ

केतुना मकरेणापि सेनानीर्ग्रंसनोऽरिहा महिषस्य तु गोमायुं केतोहैमं तदाभवत्। ध्वाडुंः ध्वजे तु शुम्भस्य कृष्णायोमयमुच्छितम्

English

Pratardana

अध्याय ११४

श्लोक 63

दश वर्षसहस्राणि स्थितिः किम्पुरुषे स्मृता जायन्ते मानवास्तत्र सुतप्तकनकप्रभाः

daśa varṣasahasrāṇi sthitiḥ kimpuruṣe smṛtā jāyante mānavāstatra sutaptakanakaprabhāḥ

हिन्दी अर्थ

अनेकाकारविन्यासाश्चान्येषां तु ध्वजास्तथा। कार्य करना आरम्भ किया। उसने तुरंत ही गम्भीर शब्द करनेवाली भेरी बजाकर हैत्योंको बुलाया। फिर आठ पहियोंसे विभूषित रथमें एक हजार घोड़े जोत दिये गये। (वह उसपर सवार हुआ।)वह रथ चार योजन विस्तारवाला और अनेकों क्रीडागृहॉसे युक्त था। उसपर श्वेत वस्त्रका आच्छादन पड़ा हुआ था तथा वह गीतों और वाद्योंकी मधुर ध्वनिसे मनोहर लग रहा था। उस समय वह ऐसा दीख रहा था, मानो देवराज इन्द्रदेबका विमान

English

tiafjam* AHamarij.is

अध्याय ११४

श्लोक 64

वर्षे किम्पुरुषे पुण्ये प्लक्षो मधुवहः स्मृतः तस्य किम्पुरुषाः सर्वे पिबन्तो रसमुत्तमम्

varṣe kimpuruṣe puṇye plakṣo madhuvahaḥ smṛtaḥ tasya kimpuruṣāḥ sarve pibanto rasamuttamam

हिन्दी अर्थ

हो। उस समय दस करोड़ हैत्याधिपति उपस्थित थे, वे सभी हैत्य प्रचण्ड पराक्रमी थे। उनका अगुआ जम्भ था। इसके बाद कुजम्भ, महिष, कुंजर, मेघ, कालनेमि, निमि, मथन, जम्भक और शुम्भ नामक दस हैत्येन्द्र सेनानायक थे। इनके अतिरिक्त अन्य भी सैकड़ों हैत्य थे जो पृथ्वीका मर्दन करनेमें समर्थ थे। ये सभी हैत्येन्द्र पर्वतके समान विशाल शरीरवाले, प्रचण्ड पराक्रमी, नाना प्रकारके आयुधोंका प्रयोग करनेमें निपुण और अनेकविध शतस्त्रास्त्रोंकी

English

1 Aiiisumat

अध्याय ११४

श्लोक 65

अनामया ह्यशोकाश्च नित्यं मुदितमानसाः सुवर्णवर्णाश्च नराः स्त्रियश्चाप्सरसः स्मृताः

anāmayā hyaśokāśca nityaṃ muditamānasāḥ suvarṇavarṇāśca narāḥ striyaścāpsarasaḥ smṛtāḥ

हिन्दी अर्थ

प्रयोगविधिमें पारंगत थे। तारकासुरका स्वर्णभूषित ध्वज अत्यन्त भयंकर था। शत्रुका विनाश करनेवाले सेनापति ग्रसनका ध्वज मकरके आकारसे युक्त था। जम्भका ध्वज लौहनिर्मित था और उसपर पिशाचके मुखका चिह्न बना हुआ था। कुजम्भके ध्वजपर हिलती हुई पूँछवाला गधा अङ्कित था। महिषके ध्वजपर स्वर्णनिर्मित शृगालका चित्र था। शुम्भका ध्वज काले लोहेका बना हुआ अत्यन्त ऊँचा था और उसपर फौलादका बना काकका आकार इसी प्रकार अन्य हैत्योंके ध्वजोंपर भी अनेकों प्रकारके आकारका विन्यास किया गया था। ग्रसनके रथमें सौ शीघ्रगामी व्याघ्र जुते हुए थे, जिनके गलेमें सोनेकी मालाएँ पड़ी थीं और जो क्षुद्रघंटिकाओंसे

English

Efltiratha : Kuvala

अध्याय ११४

श्लोक 66

ततः परं किम्पुरुषाद् धरिवर्षं प्रचक्षते महारजतसंकाशा जायन्ते यत्र मानवाः

tataḥ paraṃ kimpuruṣād dharivarṣaṃ pracakṣate mahārajatasaṃkāśā jāyante yatra mānavāḥ

हिन्दी अर्थ

सुशोभित थे। जम्भका दुर्जय रथ भी सौ सिंहोंद्वारा खींचा जा रहा था। कुजम्भका रथ पिशाच-सदृश मुखवाले गधोंसे युक्त था। महिषका रथ ऊँटों, कुंजरका घोड़ों, मेघका मेघस्य द्वीपिभिभीमैः कुञ्जरैः कालनेमिनः । पर्वताभैः समारूढो निमिर्मत्तैर्महागजैः

English

Dilipa I

अध्याय ११४

श्लोक 67

देवलोकच्युताः सर्वे बहुरूपाश्च सर्वशः हरिवर्षे नराः सर्वे पिबन्तीक्षुरसं शुभम्

devalokacyutāḥ sarve bahurūpāśca sarvaśaḥ harivarṣe narāḥ sarve pibantīkṣurasaṃ śubham

हिन्दी अर्थ

शतहस्तायतैः कृष्णैः तुरङ्गै्हैमभूषणैः मथनो नाम हैत्येन्द्रः पाशहस्तो व्यराजत। कालशुक्लमहामेषमारूढः शुम्भदानवः

English

Biiagiratlia* | Ba!idlHiiiiafc i

अध्याय ११४

श्लोक 68

न जरा बाधते तत्र तेन जीवन्ति ते चिरम् एकादश सहस्राणि तेषामायुः प्रकीर्तितम्

na jarā bādhate tatra tena jīvanti te ciram ekādaśa sahasrāṇi teṣāmāyuḥ prakīrtitam

हिन्दी अर्थ

प्रचण्डचित्रकर्माणः कुण्डलोष्णीषभूषणाः तदबलं हैत्यसिंहस्य भीमरूपं व्यजायत

English

Devamldha

अध्याय ११४

श्लोक 69

मध्यमं तन्मया प्रोक्तं नाम्ना वर्षमिलावृतम् न तत्र सूर्यस्तपति न च जानन्ति मानवाः

madhyamaṃ tanmayā proktaṃ nāmnā varṣamilāvṛtam na tatra sūryastapati na ca jānanti mānavāḥ

हिन्दी अर्थ

एतस्मिन्नन्तरे वायुर्देवदूतोऽम्बरालये। शशंस मध्ये देवानां तत्कार्यं समुपस्थितम् चीतों और कालनेमिका भयंकर हाथियोंसे संयुक्त था। हैत्यनायक निमि एक ऐसे रथपर सवार था जिसमें मतवाले गजराज जुते हुए थे, जो पर्वतके समान विशालकाय और चार दाँतोंसे युक्त थे, जिनके गण्डस्थलोंसे

English

Arabar'ia* DadhivShana

अध्याय ११४

श्लोक 70

चन्द्रसूर्यौ सनक्षत्राव् अप्रकाशाविलावृते पद्मप्रभाः पद्मवर्णाः पद्मपत्त्रनिभेक्षणाः

candrasūryau sanakṣatrāv aprakāśāvilāvṛte padmaprabhāḥ padmavarṇāḥ padmapattranibhekṣaṇāḥ

हिन्दी अर्थ

मदको धारा बह रही थी, जो मेघ-सदृश भयंकर गर्जना करनेवाले और युद्धकलामें शिक्षित थे। जिसके शरीरमें श्वेत चन्दनका अनुलेप लगा था और जो अनेकों प्रकारके उज्ज्वल पुष्पोंकी मालाओंसे सुशोभित था, वह मथन नामक हैत्येन्द्र हाथमें पाश लिये हुए उस सैन्यसमूहकी दक्षिण दिशामें स्थित श्वेत चामरोंसे विभूषित रथपर शोभा पा रहा था। उसके रथमें सौ हाथ लम्बे शरीरवाले स्वर्णाभरणोंसे विभूषित काले रंगके घोड़े जुते

English

Sindbudvipa

अध्याय ११४

श्लोक 71

पद्मगन्धाश्च जायन्ते तत्र सर्वे च मानवाः जम्बूफलरसाहारा अनिष्पन्दाः सुगन्धिनः

padmagandhāśca jāyante tatra sarve ca mānavāḥ jambūphalarasāhārā aniṣpandāḥ sugandhinaḥ

हिन्दी अर्थ

हुए थे। जम्भक क्षुद्र घंटिकाओंसे सुशोभित ऊँटपर सवार था। शुम्भ नामक दानव कालके समान भयंकर एवं श्वेत वर्णवाले एक विशालकाय मेषपर आरूढ़ था। दूसरे भी दानववीर नाना प्रकारके वाहनोंपर चढ़कर वे सभी हैत्य अद्भुत पराक्रमपूर्ण कर्म करनेवाले, कुण्डल और पगड़ीसे विभूषित, अनेक प्रकारके दुषट्टोंसे सुशोभित, नाना प्रकारकी मालाओंसे सुसज्जित और अनेकविध सुगन्धित पदार्थोसे सुवासित थे। उनके आगे- आगे वंदीगण स्तुति-गान कर रहे थे। उनके साथ अनेकों प्रकारके युद्धके बाजे बज रहे थे। और वे सभी अग्रेसर महारथी अनेकविध भृङ्गारसे सुसञ्जित थे। उस सेनामें प्रधान- प्रधान असुर पराक्रमपूर्ण कथाओंके कहने-सुननेमें आसक्त

English

Trinumndu Ayutayna

अध्याय ११४

श्लोक 72

देवलोकच्युताः सर्वे महारजतवाससः त्रयोदश सहस्राणि वर्षाणां ते नरोत्तमाः

devalokacyutāḥ sarve mahārajatavāsasaḥ trayodaśa sahasrāṇi varṣāṇāṃ te narottamāḥ

हिन्दी अर्थ

थे। हैत्यसिंह तारकासुरकी वह सेना मतवाले एवं पराक्रमी हाथियों, घोड़ों और रथोंसे व्याप्त होनेके कारण अत्यन्त भयंकर दीख रही थी। उसमें ध्वजाएँ फहरा रही थीं और बहुत-से पैदल सैनिक भी थे। इस प्रकार वह सेना देवदूत वायु दानवोंकी उस सेनाको प्रस्थित होते हुए देखकर इन्द्रको सूचित करनेके लिये स्वर्गलोकमें जा पहुँचे। वहाँ उन्होंने महात्मा महेन्द्रकी दिव्य सभामें जाकर

English

APPmDIX VII.

अध्याय ११४

श्लोक 73

आयुष्प्रमाणं जीवन्ति ये तु वर्ष इलावृते मेरोस्तु दक्षिणे पार्श्वे निषधस्योत्तरेण वा

āyuṣpramāṇaṃ jīvanti ye tu varṣa ilāvṛte merostu dakṣiṇe pārśve niṣadhasyottareṇa vā

हिन्दी अर्थ

तच्छुत्वा देवराजस्तु निमीलितविलोचनः। बृहस्पतिमुवाचेदं वाक्यं काले महाभुजः सम्प्राप्नोति विमर्दोऽयं देवानां दानवैः सह। कार्य किमत्र तद् ब्रूहि नीत्युपायसमन्वितम् नीतौ क्रमाददेशकालरिपुयोग्यक्रमादिदम्

English

Yadavab. Dvimidhas.

अध्याय ११४

श्लोक 74

सुदर्शनो नाम महाञ् जम्बूवृक्षः सनातनः नित्यपुष्पफलोपेतः सिद्धचारणसेवितः

sudarśano nāma mahāñ jambūvṛkṣaḥ sanātanaḥ nityapuṣpaphalopetaḥ siddhacāraṇasevitaḥ

हिन्दी अर्थ

साम हैत्येषु नैवास्ति यतस्ते लब्धसंश्रयाः। जातिधर्मेण वाभेद्या दानं प्राप्तश्रिये च किम् एकोऽभ्युपायो दण्डोऽत्र भवतां यदि रोचते। दुर्जनेषु कृतं साम महद्याति च बन्ध्यताम्

English

Paoaavah.

अध्याय ११४

श्लोक 75

तस्य नाम्ना समाख्यातो जम्बूद्वीपो वनस्पतेः योजनानां सहस्रं च शतधा च महान्पुनः

tasya nāmnā samākhyāto jambūdvīpo vanaspateḥ yojanānāṃ sahasraṃ ca śatadhā ca mahānpunaḥ

हिन्दी अर्थ

कर्तव्यतां स संचिन्त्य प्रोवाचामरसंसदि उसे सुनकर उस समय महाबाहु देवराज इन्द्रने पहले तो अपनी आँखें बंद कर लीं, फिर वे बृहस्पतिसे इस प्रकार बोले इन्द्रने कहा--गुरुदेव ! देवताओंका दानवोंके साथ यह अत्यन्त भयंकर संघर्ष आ पहुँचा है। अब इस

English

N. PANCALA. Panoala.

अध्याय ११४

श्लोक 76

उत्सेधो वृक्षराजस्य दिवम् आवृत्य तिष्ठति तस्य जम्बूफलरसो नदी भूत्वा प्रसर्पति

utsedho vṛkṣarājasya divam āvṛtya tiṣṭhati tasya jambūphalaraso nadī bhūtvā prasarpati

हिन्दी अर्थ

बतलाइये। इन्द्रके इस वचनको सुनकर वाणीके अधीश्वर उदार बुद्धिवाले महान् भाग्यशाली बृहस्पति इस प्रकार बोले--' सुरश्रेष्ठ! (इस प्रकारको) चतुरंगिणी सेनापर विजय पानेकी इच्छा रखनेवालोंके लिये सामपूर्वक नीति बतलायी गयी है-यही सनातनी स्थिति है। नीतिके साम, भेद, दान और दण्ड--ये चार अङ्ग हैं। राजनीतिके प्रयोगमें क्रमश: देश, काल और शत्रुकी योग्यता आदिका क्रम देखना चाहिए। इनमें हैत्योंपर सामनीतिका प्रयोग

English

Navaratha

अध्याय ११४

श्लोक 77

मेरुं प्रदक्षिणं कृत्वा जम्बूमूलगता पुनः तं पिबन्ति सदा हृष्टा जम्बूरसमिलावृते

meruṃ pradakṣiṇaṃ kṛtvā jambūmūlagatā punaḥ taṃ pibanti sadā hṛṣṭā jambūrasamilāvṛte

हिन्दी अर्थ

तो हो नहीं सकता; क्योंकि उन्हें आश्रय प्राप्त हो चुका है (वे मदमत्त हैं), जातिधर्मके अनुसार भेदनीतिका प्रयोग करके उनमें फूट भी नहीं डाला जा सकता तथा जिन्हें लक्ष्मी प्राप्त है, उन्हें दान देनेसे भी क्या लाभ होगा ? अत: इनपर एकमात्र दण्डका ही उपाय उपयुक्त प्रतीत हो रहा है। यदि आपको मेरी बात रुचती हो तो इसीका अवलम्बन कीजिये; क्योंकि दुर्जनोंके साथ की गयी सामनीति एकदम निरर्थक होती है। क्रूर लोग महात्माओंद्वारा प्रयुक्त की गयी सामनीतिको भयवश की हुई मानते हैं, अतः उनके साथ को गयी सरलता, उदारबुद्धिका प्रयोग और दयानीतिका विपरीत परिणाम होता है। दुर्जनलोग सामनीतिको भी सदा भयभीत होनेके

English

Vikanihana? Dabaratha

अध्याय ११४

श्लोक 78

जम्बूफलरसं पीत्वा न जरा बाधते ऽपि तान् न क्षुधा न क्लमो वापि न दुःखं च तथाविधम्

jambūphalarasaṃ pītvā na jarā bādhate 'pi tān na kṣudhā na klamo vāpi na duḥkhaṃ ca tathāvidham

हिन्दी अर्थ

कारण प्रयुक्त की हुई मानते हैं। इसलिये दुर्जनॉंपर आक्रमण करनेके लिये पुरुषार्थका ही आश्रय लेना श्रेयस्कर है। दुर्जनोंके आक्रान्त हो जानेपर ही उनपर प्रयुक्त की हुई क्रिया फलवती होती है। यह सत्पुरुषोंका महान् व्रत है। सुजन कभी (कुसङ्गवश) अपने उत्तम स्वभावका त्याग करनेकी इच्छा कर सकता है, परंतु दुर्जन कभी भी सुजन नहीं हो सकता। मेरी बुद्धिमें तो ऐसा ही आ रहा है, अब आपलोग इस विषयमें जैसा विचार करें। इस

English

Dvimidha

अध्याय ११४

श्लोक 79

तत्र जाम्बूनदं नाम कनकं देवभूषणम् इन्द्रगोपकसंकाशं जायते भासुरं च यत्

tatra jāmbūnadaṃ nāma kanakaṃ devabhūṣaṇam indragopakasaṃkāśaṃ jāyate bhāsuraṃ ca yat

हिन्दी अर्थ

प्रकार कहे जानेपर इन्द्रने बृहस्पतिसे कहा--'ऐसा ही होगा।' फिर वे अपने कर्त्तव्यके विषयमें भलीभाँति सोच-विचार कर उस देवसभामें बोले भवन्तो यज्ञभोक्तारस्तुष्टात्मानोऽतिसात्विकाः स्वे महिम्नि स्थिता नित्यं जगतः परिपालकाः। भवतश्चानिमित्तेन बाधन्ते दानवेश्वराः

English

Ajaiiiidba Yavinara

अध्याय ११४

श्लोक 80

सर्वेषां वर्षवृक्षाणां शुभः फलरसस्तु सः स्कन्नं तु काञ्चनं शुभ्रं जायते देवभूषणम्

sarveṣāṃ varṣavṛkṣāṇāṃ śubhaḥ phalarasastu saḥ skannaṃ tu kāñcanaṃ śubhraṃ jāyate devabhūṣaṇam

हिन्दी अर्थ

आधीयन्तां च शस्त्राणि पूज्यन्तामस्त्रदेवताः । वाहनानि च यानानि योजयन्तु सहामराः यमं सेनापतिं कृत्वा शीघ्रमेवं दिबौकसः। इत्युक्ताः समनह्यन्त देवानां ये प्रधानतः

English

Brihadisn

अध्याय ११४

श्लोक 81

तेषां मूत्रं पुरीषं वा दिक्ष्वष्टासु च सर्वशः ईश्वरानुग्रहाद्भूमिर् मृतांश्च ग्रसते तु तान्

teṣāṃ mūtraṃ purīṣaṃ vā dikṣvaṣṭāsu ca sarvaśaḥ īśvarānugrahādbhūmir mṛtāṃśca grasate tu tān

हिन्दी अर्थ

सम्प्राप्तं सर्वहैवतैः रथं मातलिना क्लृप्तं देवराजस्य दुर्जयम्। यमो महिषमास्थाय सेनाग्रे समवर्तत चण्डकिङ्करवृन्देन सर्वतः परिवारितः। कल्पकालोद्धतज्चालापूरिताम्बरलोचनः

English

Karambha Dovarslta

अध्याय ११४

श्लोक 82

रक्षःपिशाचा यक्षाश्च सर्वे हैमवतास्तु ते हेमकूटे तु विज्ञेया गन्धर्वाः साप्सरोगणाः

rakṣaḥpiśācā yakṣāśca sarve haimavatāstu te hemakūṭe tu vijñeyā gandharvāḥ sāpsarogaṇāḥ

हिन्दी अर्थ

भुजगेन्द्र समारूढो जलेशो भगवान् स्वयम्। नरयुक्तरथे देवो राक्षसेशो वियच्चरः महासिंहरवो देवो धनाध्यक्षो गदायुधः

English

Dhfitiinat

अध्याय ११४

श्लोक 83

सर्वे नागा निषेवन्ते शेषवासुकितक्षकाः महामेरौ त्रयस्त्रिंशत् क्रीडन्ते यज्ञियाः शुभाः

sarve nāgā niṣevante śeṣavāsukitakṣakāḥ mahāmerau trayastriṃśat krīḍante yajñiyāḥ śubhāḥ

हिन्दी अर्थ

नाकपृष्ठशिखण्डास्तु वैदूर्यमकरध्वजा: इन्द्रने कहा--स्वर्गवासियो! आपलोग सावधानीपूर्वक मेरी बात सुनें। आपलोग यज्ञके भोक्ता, संतुष्ट आत्मावाले, अत्यन्त सात्त्विक, अपनी महिमामें स्थित और नित्य जगतूका पालन करनेवाले हैं, तथापि दानवेश्वरगण अकारण ही आपलोगोंको पीड़ा पहुँचाते रहते हैं। उनपर साम आदि तीन नीतियोंके प्रयोगसे कोई लाभ है नहीं, अत: दण्डनीतिका ही विधान करना चाहिए। इसलिये अब आपलोग युद्धको तैयारी कीजिये और मेरी सेना सुसज्जित

English

Susaiiti Bfihadvasa

अध्याय ११४

श्लोक 84

नीलवैडूर्ययुक्ते ऽस्मिन् सिद्धा ब्रह्मर्षयो ऽवसन् दैत्यानां दानवानां च श्वेतः पर्वत उच्यते

nīlavaiḍūryayukte 'smin siddhā brahmarṣayo 'vasan daityānāṃ dānavānāṃ ca śvetaḥ parvata ucyate

हिन्दी अर्थ

को जाय। देवगण! आपलोग संगठित होकर शस्त्रोंको धारण कीजिये, अस्त्र-देवताओंकी पूजा कीजिये और सवारियोंको सुसज्जित करके रथोंको जोत दीजिये। इन्द्रद्वारा इस प्रकार कहे जानेपर देवताओंमें जो प्रधान देव थे, वे लोग शीघ्र ही यमराजको सेनापतिके पदपर नियुक्त कर सेनाको संगठित करनेमें जुट गये। उस युद्धमें समस्त देवताओंके साथ दस हजार घोड़े सजाये गये, जो नाना प्रकारके आश्चर्ययुक्त गुणोंसे युक्त थे तथा

English

Dcvaksatra

अध्याय ११४

श्लोक 85

शृङ्गवान् पर्वतश्रेष्ठः पितॄणां प्रतिसंचरः इत्येतानि मयोक्तानि नववर्षाणि भारते

śṛṅgavān parvataśreṣṭhaḥ pitṝṇāṃ pratisaṃcaraḥ ityetāni mayoktāni navavarṣāṇi bhārate

हिन्दी अर्थ

जिनके गलेमें सोनेके घण्टे शोभा पा रहे थे। मातलिने देवराजके दुर्जय रथको सजाकर तैयार किया। यमराज अपने महिषपर सवार होकर सेनाके अग्रभागमें स्थित हुए। उस समय उनके नेत्र महाप्रलयके समय प्रचण्ड ज्वालासे धधकते हुए आकाशकी तरह धधक रहे थे और वे चारों ओरसे प्रचण्ड पराक्रमी किंकरोंसे घिरे हुए थे। अग्निदेव हाथमें शक्ति लिये हुए छागपर आरूढ हो उपस्थित हुए। अपने महान् वेगका विस्तार करनेवाले पवनदेवके हाथमें अङ्कुश शोभा पा रहा था। स्वयं भगवान् वरुण भुजगेन्द्रपर सवार थे। जो राक्षसोंके अधीश्वर, आकाशचारी और भयंकर रूपवाले हैं, जिनके हाथमें तेज तलवार शोभा पा रही थी, गदा जिनका

English

Purujati Bfihaddhanas

अध्याय ११४

श्लोक 86

भूतैरपि निविष्टानि गतिमन्ति ध्रुवाणि च तेषां वृद्धिर्बहुविधा दृश्यते देवमानुषैः अशक्या परिसंख्यातुं श्रद्धेया च बुभूषता

bhūtairapi niviṣṭāni gatimanti dhruvāṇi ca teṣāṃ vṛddhirbahuvidhā dṛśyate devamānuṣaiḥ aśakyā parisaṃkhyātuṃ śraddheyā ca bubhūṣatā

हिन्दी अर्थ

आयुध है, जो सिंहके समान भयंकर रूपसे दहाड़नेवाले हैं, वे धनाध्यक्ष देवाधिदेव कुबेर पालकीपर बैठकर समरमें उपस्थित हुए ॥७४--८४॥ चतुरङ्गिणी सेनाके साथ चन्द्रमा, सूर्य और दोनों अश्विनीकुमार भी सम्मिलित हुए। स्वर्णनिर्मित आभूषणोंसे विभूषित गन्धर्वगण अपने अधिपतियोंके साथ उपस्थित हुए। उनके आसन स्वर्णनिर्मित थे,

English

Satyadhriti

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_matsyapurANa1-176.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Matsya Purana — Chapter 114
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

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