Matsya Purana· Matsya Purāṇa
142
अध्याय 142 / 176

Adhyaya 142

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अध्याय १४२

श्लोक 1

मत्स्य-पुराण १४२ चतुर्युगाणि यानि स्युः पूर्वे स्वायम्भुवे ऽन्तरे एषां निसर्गसंख्यां च श्रोतुमिच्छाम विस्तरात्

matsya-purāṇa 142 caturyugāṇi yāni syuḥ pūrve svāyambhuve 'ntare eṣāṃ nisargasaṃkhyāṃ ca śrotumicchāma vistarāt

हिन्दी अर्थ

अध्ययन आदि किस प्रकार अक्षयभावको प्राप्त होते हैं? शंकर! हजारों पूर्वजन्मोंमें जो पाप सञ्चित हुए हैं, वे किस प्रकार नष्ट होते हैं? यह आप मुझे स्पष्ट बतलाइये। महेश्वर! जिस स्थानपर स्थित होकर आप भक्तिसे प्रसन्न होते हैं तथा व्रत, नियम, आचार और धर्म जहाँ सभी सिद्धियोंके प्रदाता बन जाते हैं एवं अनश्वर गति प्रदान करते हैं, ये

English

The Risis said 0 Suta! we are now desirous of liearing in detail the nature and the measurements of four yugas during the time of Svayambhuva Manu. — 1.

अध्याय १४२

श्लोक 2

पृथिवीद्युप्रसङ्गेन मया तु प्रागुदाहृतम् एतच्चतुर्युगं त्वेवं तद्वक्ष्यामि निबोधत तत्प्रमाणं प्रसंख्याय विस्तराच्चैव कृत्स्नशः

pṛthivīdyuprasaṅgena mayā tu prāgudāhṛtam etaccaturyugaṃ tvevaṃ tadvakṣyāmi nibodhata tatpramāṇaṃ prasaṃkhyāya vistarāccaiva kṛtsnaśaḥ

हिन्दी अर्थ

सभी बातें आप बतलाइये; क्‍योंकि इसे जाननेके लिये मेरे मनमें बड़ी ही उत्कण्ठा है ७५४ मत्स्यपुराण

English

Suta said: — Although I narrated about them in course of my description of the earth and celestial firmainent, 1 shall still tell you something more in detail about them. I shall first state about measure- ments. Human years are determined by ordinary ex])cricnce of men. x\nd this is the unit. The ineasurcmenls of the four yugas will be expressed on this unit. Fifteen twinklings of the eye form one kAstlni; thirty kasthas make one kahi A muhurta is made up of thirty kalas and one day and night consists of thirty muhurtas. The Sun divides the day and night; the night is for sleep and tlio day is for work. — 2-5.

अध्याय १४२

श्लोक 3

लौकिकेन प्रमाणेन निष्पाद्याब्दं तु मानुषम् तेनापीह प्रसंख्याय वक्ष्यामि तु चतुर्युगम् निमेषतुल्यकालानि मात्रालब्धेक्षराणि च

laukikena pramāṇena niṣpādyābdaṃ tu mānuṣam tenāpīha prasaṃkhyāya vakṣyāmi tu caturyugam nimeṣatulyakālāni mātrālabdhekṣarāṇi ca

हिन्दी अर्थ

महेश्वर उवाच महेश्वरने कहा-देवि! सुनो, मैं तुम्हें गुप्तसे भी श्रृणु देवि प्रवक्ष्यामि गुह्यानां गुह्यमुत्तमम्। गुप्त उत्तम विषय बतला रहा हूँ। सभी क्षेत्रॉमें प्रसिद्ध सर्वक्षेत्रेषु विख्यातमविमुक्तं प्रिय मम॥ १३ अविमुक्तकषेत्र (वाराणसी) मुझे परम प्रिय है। पहले मैं अष्टषष्टिः पुरा प्रोक्ता स्थानानां स्थानमुत्तमम्। अड्सठ ता वर्णन कर चुका हूँ, जहाँ गजतर्म यत्र साक्षात् स्वयं रुद्र: कृत्तिवासाः स्वयं स्थित: ॥ १४ धारण कर मैं साक्षात् रुद्रस्वरूपसे विराजमान रहता हूँ; संनिहितो परंतु अविमुक्तक्षेत्र (काशी )-में मैं नित्य-निरन्तर निवास यत्र संनिहितो नित्यमविमुक्ते निरन्तरम्। करता हूँ। उस क्षेत्रको में कभी नहीं छोड़ता, इसीलिये

English

One month of the liuinau beings is equal to a day and night of the Pitp's. Its division is like this: — the dark fortnight is the day of the Pitis and the bright one is the night. Thirty liuman months make one month of the Pitfis. The year of the Pitiis consists of three hundred and sixty human months. One hundred human 3 "ears is equiv'alent to (3-J-) three and one-third years of the Pitris. (Three Pitfi years and 120 i.e., (100 + 10x2) human inontlis.) One human year is equal to one da} and night of the Devas and its division is like tliis; — Uttarayana (six months when the Sun moves towards the north) forms Their day and Daksinayana (six months when the Sun moves towards the south) Their night.— 6-10.

अध्याय १४२

श्लोक 4

काष्ठा निमेषा दश पञ्च चैव त्रिंशच्च काष्ठां गणयेत्कलां तु त्रिंशत्कलाश्चैव भवेन्मुहूर्तस् तैस्त्रिंशता रात्र्यहनी समेते

kāṣṭhā nimeṣā daśa pañca caiva triṃśacca kāṣṭhāṃ gaṇayetkalāṃ tu triṃśatkalāścaiva bhavenmuhūrtas taistriṃśatā rātryahanī samete

हिन्दी अर्थ

तक्षेत्र न मया मुक्तमविमुक्तं ततः स्मृतम्॥ १५ इसे अविमुक्त कहा जाता है। उस अविमुक्त क्षेत्रमें परा अविमुक्ते परा सिद्धिरविमुक्ते परा गति: । सिद्धि और परमगति प्राप्त होती है । वहाँ किया गया जप, जप्तं दत्तं हुतं चेष्टं तपस्तप्तं कृतं च यत् ॥ १६ दान, हवन, यज्ञ, तप, शुभ कर्म, ध्यान, अध्ययन, दान ध्यानमध्ययनं दानं सर्व भवति चाक्षयम्। आदि सभी अक्षय हो जाते हें । अविमुक्त क्षेत्रमें प्रवेश

English

Thirty years of men is one month of the Devas. A century of men is 3 months and some das of the Devas. 360 human years make one year of the Devas. 3,030 human years make one year of the Sapt*Iiiiis.

अध्याय १४२

श्लोक 5

अहोरात्रे विभजते सूर्यो मानुषलौकिके रात्रिः स्वप्नाय भूतानां चेष्टायै कर्मणामहः

ahorātre vibhajate sūryo mānuṣalaukike rātriḥ svapnāya bhūtānāṃ ceṣṭāyai karmaṇāmahaḥ

हिन्दी अर्थ

पूर्वसंचितम् करनेवाले व्यक्तिके हजारों पूर्व जन्मोंमें जो पाप संचित जनात्तालकालका बात, पाव ॥१९७ हेते हैं वे सभी नष्ट हो जाते हैं। वे अविमुक्तरूपी अविमुक्तं प्रविष्टस्य तत् सर्व व्रजति क्षयम्। अग्निमें उसी प्रकार जल जाते हैं जैसे आग्निमें समर्पित अविमुक्तार्निना दग्धमग्नौ तूलमिवाहितम्॥ १८ की हुई रूई। प्रिये! यदि अविमुक्त क्षेत्रमें ब्राह्मण, ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा वै वर्णसंकराः । क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, वर्णसंकर, कृमि, म्लेच्छ एवं अन्य कृमिम्लेच्छाश्च ये चान्ये संकीर्णाः पापयोनयः ॥ १९ निम्नस्तरके पापयोनिवाले कीट, चींटें, पशु, पक्षी आदि कीटाः पिपीलिकाश्चैव ये चान्ये मृगपक्षिणः। कालके वशीभूत हो मृत्युको प्राप्त होते हैं, (तो उनको कालेन निधनं प्राप्ता अविमुक्ते शृणु प्रिये॥ २० तया गणि होती है, उसे) सुनो। देवि! वे सभी मानव-

English

human years make one year of Dhruva, called, Dhruva Samvatsara. 36,000 human years make one thousand Divine years. — 11-17.

अध्याय १४२

श्लोक 6

पित्र्ये रात्र्यहनी मासः प्रविभागस् तयोः पुनः कृष्णपक्षस् त्वहस्तेषां शुक्लः स्वप्नाय शर्वरी

pitrye rātryahanī māsaḥ pravibhāgas tayoḥ punaḥ kṛṣṇapakṣas tvahasteṣāṃ śuklaḥ svapnāya śarvarī

हिन्दी अर्थ

मौलिनः सर्वे ललाटाक्षा वृषध्वजाः। शरीर धारणकर मस्तकपर अर्धचन्द्रसे सुशोभित, ललाग्मे hae ग द्वि क्षा वृ तृतीय नेत्रसे युक्त शिवस्वरूप होकर मेरे शिवपुरमें जन्म शिवे मम पुरे देवि जायन्ते तत्र मानवाः॥ २९ लेते हैं। चाहे सकाम हो या निष्काम अथवा तिर्यग्योनिगत अकामो वा सकामो वा ह्वापि तिर्यग्गतोऽपि वा। ही क्‍यों न हो, यदि वह अविमुक्त क्षेत्रमें प्राणोंका त्याग अविमुक्ते त्यजन् प्राणान् मम लोके महीयते॥ २२ करता है तो मेरे लोकमें पूजित होता है र देवि! यदि अविमुक्तं यदा गच्छेत् कदाचित् कालपर्ययात् । मनुष्य कालक्रमानुसार कभी अविमुक्त क्षेत्रमें पहुँच जाय

English

The duration of the ages have been laid down on the Divine units. The Bharatakhanda notices four yugas or ages, t'is;., Kritayuga, Treta, DvSpara, and Kaliyuga. Of these Krila or 8atyayuga is the first, Trejia is the second after which come Dvapara and Kaliyuga. Satyayuga consists of 4,000 Divine years. Its Sandliya co»)sists of 400 Divine years and the SandhySrnsia of the same number of years. Treta consists of 3,000 Divine years. This is what has been said about it by those well-up in calculations. Its Sandhya is made up of 300 Divine years and the iSandhyamrfa is also of similar duration. DvApara consists of 2,000 Divine years and its Sandhya and Sandhyamsia of 2()0 years each. Kaliyuga is,of 1,000 Divine years and its morning and twilight are each of 100 years. —18-24.

अध्याय १४२

श्लोक 7

त्रिंशद्ये मानुषा मासाः पित्र्यो मासः स उच्यते शतानि त्रीणि मासानां षष्ट्या चाभ्यधिकानि तु पित्र्यः संवत्सरो ह्येष मानुषेण विभाव्यते

triṃśadye mānuṣā māsāḥ pitryo māsaḥ sa ucyate śatāni trīṇi māsānāṃ ṣaṣṭyā cābhyadhikāni tu pitryaḥ saṃvatsaro hyeṣa mānuṣeṇa vibhāvyate

हिन्दी अर्थ

निधनं तो वहाँ पत्थरसे अपने चरणोंको तोड़कर स्थित रहे अश्मना चरणौ भित्त्वा तत्रैव निधनं व्रजेत्॥ २३ और पुनः अविमुक्त क्षेत्रसे बाहर न जाय, वहीं मृत्युको अविमुक्तं गतो देवि न निर्गच्छेत् ततः पुनः। प्राप्त हो जाय तो वह भी मेरे पदको प्राप्त होता है। इसमें सोऽपि मत्पदमाप्नोति नात्र कार्या विचारणा॥ २४ विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है॥१३--२४॥ वस्त्रापथं रुद्रकोटिं सिद्धेश्वरमहालयम्। प्रिये! वस्त्रापथ (जूनागढ़, गिरिनार), रुद्रकोटि, गोकर्ण रुद्रकर्णं च सुवर्णाक्षं तथैव च॥ २५ सिद्धेश्वर, महालय, गोकर्ण, रुद्रकर्ण तथा सुवर्णाक्ष, अमरं च महाकालं तथा कायावरोहणम्। अमरकण्टक, महाकाल (उज्जैनी) और कायावरोहण

English

= Twilight, the period at the end of each yuga.

अध्याय १४२

श्लोक 8

मानुषेणैव मानेन वर्षाणां यच्छतं भवेत् पितॄणां तानि वर्षाणि संख्यातानि तु त्रीणि वै दश च द्व्यधिका मासाः पितृसंख्येह कीर्तिता

mānuṣeṇaiva mānena varṣāṇāṃ yacchataṃ bhavet pitṝṇāṃ tāni varṣāṇi saṃkhyātāni tu trīṇi vai daśa ca dvyadhikā māsāḥ pitṛsaṃkhyeha kīrtitā

हिन्दी अर्थ

एतानि हि पवित्राणि सांनिध्यात् संध्ययो्ृयोः ॥ २६ (कारावार, गुजरात)--ये सभी स्थान प्रातः और संध्याकाल में कालिञ्जरवनं चैव शंकुकर्णं स्थलेश्वरम्। मेरी संनिधिसे पवित्र माने जाते हैं। इसी प्रकार एतानि च पवित्राणि सांनिध्याद्धि मम प्रिये। कालिंजरवन, शङ्कुकर्ण और स्थलेश्वर (थानेश्वर)-ये अविमुक्ते वरारोहे त्रिसंध्यं नात्र संशय: ॥ २७ भी मेरी संनिधिके कारण ही पवित्र हैं। वरारोहे! अविमुक्त हरिश्चन्द्रं परं गुह्यं गुह्यामाम्रातके श्वरम्। क्षेत्रमें में तीनों संध्याओंमें स्थित रहता हूँ-इसमें संदेह जालेश्चरं परं गुह्यां गुह्यं श्रीपर्वतं तथा॥ २८ नहीं है । प्रिये! हरिश्चन्द्र, आम्रातकेश्वर, जाले श्वर, श्रीपर्वत,

English

Satyayuga, Treta, DvA para and Kaliyuga taken collectivdy last for a period of 12,000 years of the Devas. Now I shall tell you their ago in the years of men. Tlie age of Satyayuga in the years of men is 1,728,000 years; of Treta 1,296,000 years; of Dvapara 864,000 years and of Kaliyuga 432,000 years. The period of the four yiigas along with the duration of their Sandhyas and Sandhyamrfas have thus been described in the years of men. The four ages passing for 71 times make one Manvantara. — 25-29.

अध्याय १४२

श्लोक 9

लौकिकेन प्रमाणेन अब्दो यो मानुषः स्मृतः एतद्दिव्यमहोरात्रम् इत्येषा वैदिकी श्रुतिः

laukikena pramāṇena abdo yo mānuṣaḥ smṛtaḥ etaddivyamahorātram ityeṣā vaidikī śrutiḥ

हिन्दी अर्थ

गुह्यातिगुह्यं केदारं महाभैरवमेव च यानि स्थानानि श्रूयन्ते त्रिषु लोकेषु सुत्रते । अविमुक्तस्य पादेषु नित्यं संनिहितानि वै महालय तथा शुभदायक कुमिचण्डेश्वर, केदार और महाभैरव-ये आठ स्थान परम गुह्य हैं और मेरी संनिधिसे पवित्र माने जाते हैं। किंतु सुन्दरि! अविमुक्तक्षेत्रमें मैं तीनों संध्याओंमें निवास करता हूँ--इसमें संदेह नहीं है।

English

I shall now explain to you the period of a Manvantara in the years of men. One Mann takes the place of another in 311,032,980J(?) years (it should be 3i 6,720,000 years.) — 30-31.

अध्याय १४२

श्लोक 10

दिव्ये रात्र्यहनी वर्षं प्रविभागस्तयोः पुनः अहस्तु यदुदक्चैव रात्रिर्या दक्षिणायनम् एते रात्र्यहनी दिव्ये प्रसंख्याते तयोः पुनः

divye rātryahanī varṣaṃ pravibhāgastayoḥ punaḥ ahastu yadudakcaiva rātriryā dakṣiṇāyanam ete rātryahanī divye prasaṃkhyāte tayoḥ punaḥ

हिन्दी अर्थ

सुव्रते! तीनों लोकोंमें जो भी पवित्र स्थान सुने जाते हैं, वे सभी अविमुक्त क्षेत्रके चरणोंमें सदा उपस्थित रहते हैं। शोभने! अविमुक्त क्षेत्रकी इसके बादकी दिव्य कथा और माहात्म्य स्कन्द आत्मद्रष्टा ऋषियोंसे कहेंगे इति श्रीमत्स्ये महापुराणेऽविमुक्तमाहात्म्ये एकाशीत्यधिकशततमोऽध्यायः

English

Now I shall give you the duration of a Manvantara in the Divine years. It is 140,000(?) years in course of which the four ages come and go 71 times when one Mann takes the place of another. At the comple- tion of the Kalpa which is 14 times one Manvantara, the great dissolution of the World takes place wliicli lasts for a period twice as much as one Kalpa. The age of the four yugas has been thus described. — 32-37.

अध्याय १४२

श्लोक 11

त्रिंशद्यानि तु वर्षाणि दिव्यो मासस्तु स स्मृतः मानुषाणां शतं यच्च दिव्या मासास्त्रयस्तु वै तथैव सह संख्यातो दिव्य एष विधिः स्मृतः

triṃśadyāni tu varṣāṇi divyo māsastu sa smṛtaḥ mānuṣāṇāṃ śataṃ yacca divyā māsāstrayastu vai tathaiva saha saṃkhyāto divya eṣa vidhiḥ smṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अविमुक्त-माहात्म्य नामक एक सौ इक्यासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ कैलासपृष्ठमासीनं स्कन्दं ब्रह्मविदां वरम्। पप्रच्छुऋषय: सर्वे सनकाद्यास्तपोधनाः ब्रूहि त्वं स्कन्द भूर्लोके यत्र नित्यं भवः स्थित:

English

Now I shall tell you the creation of Treta, Dvapara and Kaliyuga. I told you before about Satyayuga and part of Tretayuga. 1 did not tell you anything about the remaining portion of Tretayuga, Dvapara and Kaliyuga, on account of my having been engaged in the narration of the generations of the Risis. I, therefore, 4ell you, now, about the Tretftyuga that was left unsaid. There was Mann in the beginningof the TretA. age and the then Risis dictated tiranta and Srnarta dharma by the light thrown on them by Brahma. They wrote on marriage, x\gnihotra, and other irauta dharinas according to the Rik, Yajiih, and Sama Vedas. They also gave out the injunctions of the Srnritis, truthfulness, Brahinacharya

अध्याय १४२

श्लोक 12

त्रीणि वर्षशतान्येवं षष्टिर्वर्षास्तथैव च दिव्यः संवत्सरो ह्येष मानुषेण प्रकीर्तितः

trīṇi varṣaśatānyevaṃ ṣaṣṭirvarṣāstathaiva ca divyaḥ saṃvatsaro hyeṣa mānuṣeṇa prakīrtitaḥ

हिन्दी अर्थ

महात्मा सर्वभूतात्मा देवदेवः सनातनः। घोररूपं समास्थाय दुष्करं देवदानवैः भूर्लोके नैव संयुक्तमन्तरिक्षे शिवालयम्। अयुक्तास्तु न पश्यन्ति युक्ताः पश्यन्ति चेतसा

English

(celibacy), Varnas'rama and other Achara dliarmas. — 38-43.

अध्याय १४२

श्लोक 13

त्रीणि वर्षसहस्राणि मानुषेण प्रमाणतः त्रिंशदन्यानि वर्षाणि स्मृतः सप्तर्षिवत्सरः

trīṇi varṣasahasrāṇi mānuṣeṇa pramāṇataḥ triṃśadanyāni varṣāṇi smṛtaḥ saptarṣivatsaraḥ

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मचर्यव्रतोपेताः सिद्धा वेदान्तकोविदाः। आदेहपतनाद् यावत् तत् क्षेत्रं यो न मुञ्जति सूतजी कहते हैं-ऋषियो! एक समय सनक आदि तपस्वी ब्रह्मर्षिगण, सकल राजर्षिवृन्द एवं महेश्वरके भक्तगणोंने केलास पर्वतके शिखरपर बैठे हुए ब्रह्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ स्कन्दसे पूछा--' स्कन्द! मृत्युलोकमें जहाँ भगवान् शंकर सहैव विराजमान रहते हैं, बह स्थान आप (हमें) बतलाइये

English

In the beginning of the Tretayuga, the Seven Risis and Manu by their hard tapas got the knowledge of the motions and places of the planets and stars. Also all the mantras were seen by them

अध्याय १४२

श्लोक 14

नव यानि सहस्राणि वर्षाणां मानुषाणि च वर्षाणि नवतिश्चैव ध्रुवसंवत्सरः स्मृतः

nava yāni sahasrāṇi varṣāṇāṃ mānuṣāṇi ca varṣāṇi navatiścaiva dhruvasaṃvatsaraḥ smṛtaḥ

हिन्दी अर्थ

स्कन्दने कहा-सभी प्राणियोंके आत्मस्वरूप, महात्मा, सनातन, देवाधिदेव, सामर्थ्यशाली, महादेव जहाँ स्थिररूपसे निवास करते हैं, उसे अत्यन्त गुप्त अविमुक्त क्षेत्र कहा जाता है । जहाँ शिव सदा स्थित रहते हैं, उस अविमुक्क्षेत्रमें सिद्धि सदा सुलभ है। इस स्थानका जो माहात्म्य भगवान् शङ्करने स्वयं कहा है,

English

TRE MaTSYA WRAtJAM.

अध्याय १४२

श्लोक 15

षट्त्रिंशत्तु सहस्राणि वर्षाणां मानुषाणि च षष्टिश्चैव सहस्राणि संख्यातानि तु संख्यया दिव्यं वर्षसहस्रं तु प्राहुः संख्याविदो जनाः

ṣaṭtriṃśattu sahasrāṇi varṣāṇāṃ mānuṣāṇi ca ṣaṣṭiścaiva sahasrāṇi saṃkhyātāni tu saṃkhyayā divyaṃ varṣasahasraṃ tu prāhuḥ saṃkhyāvido janāḥ

हिन्दी अर्थ

उसे सुनिये। यह स्थान परम पवित्र तीर्थ और देवालय है। महाश्मशानपर स्थित जो दिव्य एवं सुगुप्त मन्दिर है, उसका पृथ्वीलोकसे सम्बन्ध नहीं है। वह शिवका मन्दिर अन्तरिक्षमें है। योगी व्यक्ति ही ज्ञानद्वारा उसका साक्षात्कार कर पाते हैं, किंतु जो योगसे रहित हैं वे उसे नहीं देख पाते। जो ब्रह्मचारी, सिद्ध और वेदान्तको जाननेवाले मृत्युपर्यन्त उस स्थानका परित्याग नहीं करते, ७५६ मत्स्यपुराण

English

and perceived in tlieir hearts, by thinking about them once only. In the beginning of the first Kalpa, those mantras (or laws of the Universe) arose of themselves in the minds of the Uevas, in testimony whereof, those who areSiddhas iperfoot) and others also can have the knowledge of the Mantras. In the past Kalpa there were one hundred thousand mantra yogas; by the power of the sages, even those who follow them, can realise them; and those mantras now lie ludden in the Pratimas or images of the Devas.—44-46.

अध्याय १४२

श्लोक 16

इत्येतदृषिभिर्गीतं दिव्यया संख्यया द्विजाः दिव्येनैव प्रमाणेन युगसंख्या प्रकल्पिता

ityetadṛṣibhirgītaṃ divyayā saṃkhyayā dvijāḥ divyenaiva pramāṇena yugasaṃkhyā prakalpitā

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मचर्यव्रतैः सम्यक् सम्यरिष्टं मखैर्भवेत्। अपापात्मा गतिः सर्वा या तूक्ता च क्रियावताम् यस्तत्र निवसेद् विप्रोऽसंयुक्तात्मासमाहितः। त्रिकालमपि भुञ्जानो वायुभक्षसमो भवेत्

English

The Sapta-riis enunciated the Rig, Y ijuh, Sama and Atharvacu mantras very accuralel}-, aiid the sage Manu similarly dealt with his Smriti. In the Tretaynga, the four Vedas, the bridge of dharma, were all embodied in one. Tn tlie Hvaparayuga, owing to the short life and intellect of men, rho Vedas wore divide(l into four separate treatises. In days of 3 "orG, the Itisis, by virtue of their tapas, could study the entire Vedas i?i one day and niglit. The Vedas taught tlie duties of the people* in each yuga. In ancient da\'s, Svavamf)liu Bjahi)>a gave out the divine immortal Wdas with various Afigas an*! containing die Svadharmas pertaining to eveiy 3 '»iga. Under the inlliienco of rime, »>y and by, the dharmas deviated from the Vedas and liecaine perverted.- - 47-49.

अध्याय १४२

श्लोक 17

चत्वारि भारते वर्षे युगानि ऋषयो ऽब्रुवन् कृतं त्रेता द्वापरं च कलिश्चैवं चतुर्युगम्

catvāri bhārate varṣe yugāni ṛṣayo 'bruvan kṛtaṃ tretā dvāparaṃ ca kaliścaivaṃ caturyugam

हिन्दी अर्थ

ब्रह्मचर्यसमायुक्तः परमं प्राप्नुयात् तपः योऽत्र मासं वसेद् धीरो लघ्वाहारो जितेन्द्रियः । सम्यकू तेन व्रतं चीर्णं दिव्यं पाशुपतं महत् प्राप्यते क्षेत्रमाहात्म्यात् प्रभावाच्छंकरस्य तु

English

The duty of fCsatriyas is to perfoim saeriliees, that of U»e Vaij<yas is to perform haviryajua, the Madras to perform the sacrifu'O of service and the brnhmanas to perform the sacrliioo of Ja])am (repeating the mantra* and understanding tlieir meanings. The peojile and the Vanias in the Treta age thus performed tlieir duties and pros[)e]e(l with children and wealth and were ]iappy.--r)(Wjl.

अध्याय १४२

श्लोक 18

पूर्वं कृतयुगं नाम ततस्त्रेताभिधीयते द्वापरं च कलिश्चैव युगानि परिकल्पयेत्

pūrvaṃ kṛtayugaṃ nāma tatastretābhidhīyate dvāparaṃ ca kaliścaiva yugāni parikalpayet

हिन्दी अर्थ

ब्रह्महा योऽभिगच्छेत् तु अविमुक्तं कदाचन। तस्य क्षेत्रस्य माहात्म्याद् ब्रह्महत्या निवर्तते न केवलं ब्रह्महत्या प्राकृतं च निवर्तते

English

The Brahmanas liy tli(.*ir kind beliaviour should enligliten the Ksatrlyas and the lattc-r siiould cducaU" the Vaijyas and they shouhl, in

अध्याय १४२

श्लोक 19

चत्वार्याहुः सहस्राणि वर्षाणां तत्कृतं युगम् तस्य ताव् अच्छती संध्या संध्यांशश्च तथाविधः

catvāryāhuḥ sahasrāṇi varṣāṇāṃ tatkṛtaṃ yugam tasya tāv acchatī saṃdhyā saṃdhyāṃśaśca tathāvidhaḥ

हिन्दी अर्थ

प्राप्य विश्वेश्वरं देवं न स भूयोऽभिजायते। अनन्यमानसो भूत्वा योऽविमुक्तं न मुञ्जति तस्य देवः सदा तुष्टः सर्वान् कामान् प्रयच्छति। द्वारं यत् सांख्ययोगानां स तत्र वसति प्रभुः सगणो हि भवो देवो भक्तानामनुकम्पया। अविमुक्तं परं क्षेत्रमविमुक्ते परा गतिः

English

their turn, lovingly mould up the STulras in their diilies. Their liearts were directed to Varnasrauia Uhaiina. 1'lieir dharma was not fruitUss and, therefore, all tlieir a(*tions were atlended with sue(*('ss, merely hy tlieir Safikalaps or intentions. ddie peoph in tlieir orjlinary course wine longlived, healthy', hand-some, sturdy, n ligious and modest. Brahma laid down the orders of varna and j.iiramii, etc., with gnsit accuracy, ddie sons of Brahma framed the vSamhitas (or books) f)ii medicine (how their health should be kept up), and [»ractices of dharma, and other mantras. — 52-55

अध्याय १४२

श्लोक 20

इतरेषु ससंध्येषु ससंध्यांशेषु च त्रिषु एकपादे निवर्तन्ते सहस्राणि शतानि च

itareṣu sasaṃdhyeṣu sasaṃdhyāṃśeṣu ca triṣu ekapāde nivartante sahasrāṇi śatāni ca

हिन्दी अर्थ

अविमुक्तं निषेवेत देवर्षिगणसेवितम् अन्तकाले मनुष्याणां छिद्यमानेषु मर्मसु

English

The Devas set on foot the perha-maiice of sacrifices from tlie very day when the Risis, the sons of Bialima enunciated the Saiiiliita, Mantras, etc. At the end (jf Sv;'yambl}uva Manu, India was the first to propagate the performance of sacrifice's willi vari«>u8 olTorings in tto-ojieraiion with

अध्याय १४२

श्लोक 21

त्रेता त्रीणि सहस्राणि युगसंख्याविदो विदुः तस्यापि त्रिशती संध्या संध्यांशः संध्यया समः

tretā trīṇi sahasrāṇi yugasaṃkhyāvido viduḥ tasyāpi triśatī saṃdhyā saṃdhyāṃśaḥ saṃdhyayā samaḥ

हिन्दी अर्थ

अविमुक्ते ह्यन्तकाले भक्तानामीश्वरः स्वयम् कर्मभिः प्रेर्यमाणानां कर्णजापं प्रयच्छति। उन्हें वह पवित्र गति प्राप्त होती है, जो ब्रह्मचर्यपूर्वक यज्ञोद्वारा भलीभाँति अनुष्ठान करनेपर क्रियासम्पन्न व्यक्तियोंके लिये कही गयी है। जो विप्र समाधिसे रहित, योगसे शून्य एवं तीनों समय भोजन करते हुए भी वहाँ निवास

English

the Devas, Yama, Jiikla, Ja'a and Vijlvasrika. — 5(3-07.

अध्याय १४२

श्लोक 22

द्वे सहस्रे द्वापरं तु संध्यांशौ तु चतुःशतम् सहस्रमेकं वर्षाणां कलिरेव प्रकीर्तितः द्वे शते च तथान्ये च संध्यासंध्यांशयोः स्मृते

dve sahasre dvāparaṃ tu saṃdhyāṃśau tu catuḥśatam sahasramekaṃ varṣāṇāṃ kalireva prakīrtitaḥ dve śate ca tathānye ca saṃdhyāsaṃdhyāṃśayoḥ smṛte

हिन्दी अर्थ

करता है वह वायुभक्षीके समान माना जाता है। इस अविमुक्त क्षेत्रमें क्षणभर भी ब्रह्मचर्यपूर्वक निवास करनेवाला भक्तिमान् व्यक्ति परम तपको प्राप्त करता है। जो धीर पुरुष अल्प भोजन करते हुए इन्द्रियोंको वशमें कर एक मासतक यहाँ निवास करता है, वह (मानो) महान् दिव्य पाशुपत-व्रतका अनुष्ठान कर लेता है। वह पुरुष जन्म और मृत्युके भयको पारकर परमगतिको प्राप्त करता है तथा पुण्यदायक मोक्ष एवं योगगतिका अधिकारी

English

Truthfulness, meditation, asceticism and cliarity an* tlie extant dharmas. When tliey decline, adlianna becomes dominant. When to drive it away and make dharma revive, most valiant and longlived heroes take their births. They award just punishments, are great yogis, performers of sacrifices, Brahma vadis, have their eyes like lotuses, broad forehead and big faces, well-formed limbs, lion-like chests, strutting like elephants and highly powerful and virtuous. Thus in the TretAynga, the chakravarti kings were great archers and endowed with all auspicious

अध्याय १४२

श्लोक 23

एषा द्वादशसाहस्री युगसंख्या तु संज्ञिता कृतं त्रेता द्वापरं च कलिश्चेति चतुष्टयम्

eṣā dvādaśasāhasrī yugasaṃkhyā tu saṃjñitā kṛtaṃ tretā dvāparaṃ ca kaliśceti catuṣṭayam

हिन्दी अर्थ

हो जाता है। जिस दिव्य योगगतिको सैकड़ों जन्मोंमें भी नहीं प्राप्त किया जा सकता, वह स्थानके माहात्म्य और शंकरके प्रभावसे यहाँ प्राप्त हो जाती है॥३--१४॥ ब्रह्महत्या करनेवाला व्यक्ति भी यदि किसी समय इस अविमुक्तक्षेत्रमें चला जाता है तो इस क्षेत्रके प्रभावसे उसको ब्रह्महत्या निवृत्त हो जाती है । जो मृत्युपर्यन्त इस क्षेत्रका परित्याग नहीं करता, उसकी केवल ब्रह्महत्या ही नहीं, अपितु पहलेके किये हुए पाप भी नष्ट हो जाते हैं। वह भगवान् विश्वेश्वरको प्राकर पुनः संसारमें जन्म नहीं ग्रहण करता। जो अनन्यचित्त हो अविमुक्त क्षेत्रका परित्याग नहीं करता, उसपर भगवान् शङ्कर सदा प्रसन्न रहते हैं और उसकी सभी कामनाएँ पूर्ण कर देते हैं। जो

English

GHAPTER OXLIIL

अध्याय १४२

श्लोक 24

तत्र संवत्सराः सृष्टा मानुषास्तान्निबोधत नियुतानि दश द्वे च पञ्च चैवात्र संख्यया अष्टाविंशत्सहस्राणि कृतं युगमथोच्यते

tatra saṃvatsarāḥ sṛṣṭā mānuṣāstānnibodhata niyutāni daśa dve ca pañca caivātra saṃkhyayā aṣṭāviṃśatsahasrāṇi kṛtaṃ yugamathocyate

हिन्दी अर्थ

सांख्य और योगका द्वारस्वरूप है उस स्थानपर भक्तोंपर अनुकम्पा करनेके लिये सर्वशक्तिसम्पन्न भगवान् शङ्कर गणोंके साथ निवास करते हैं। अविमुक्त क्षेत्र श्रेष्ठ स्थान है। अविमुक्तमें रहनेसे श्रेष्ठ गति प्राप्त होती है। अविमुक्तमें रहनेसे परम सिद्धि प्राप्त होती है और अविमुक्तमें रहनेसे श्रेष्ठ स्थान प्राप्त होता है। यदि बुद्धिमान् मनुष्य यह चाहता हो कि मेरा पुनर्जन्म न हो तो उसे देवर्षिगणोंसे सेवित अविमुक्त क्षेत्रमें निवास करना चाहिए। मेरु

English

signR. Their regal splendour and prowess extends far and wide like the branches of the banyan tree. By Nyagrodha is meant arms; VyAsa means the extent of the arms outstreUdied. That is their growth and height measured as above. Cfiakra (discus), chariots, Queen, jewels, horses, eleptianis and gold formed their treasure and were counted as Ratnas (jewels). These gems were first attained at the end of Svayanibhuva Marm. Emperors in tlie world in all the Manvantaras (past, present and future) are horn with the parts of vinu inherent in them. They are extraordinarily endowed with power, dharma, comfort and riches. Emperors Juid a vast store of Artlia, Dharma, Kama, fame, and Aictory without any of these going against another. Thus the kings, endowed with power, defeated even the Uisis in their eight SiddJjis, such as, Animfi, IjaghirnA, etc., in their knowledge of the Jastras and in their asceticism. They were endowed with divine marks and signs and they defeated the demons and hnman bdngs by their extraordinary strength. Tliey seemed to be very fortunate. They were horn with diandsome forms bearing all the lucky signs according to palmistry, vh., fine lines on the forehead and lijie tongue, sombre radiance of tlie teeth, Jong ea?-s, liands touching the knees, slioulders like that of a bull and a lion, with tlndr f(»et marke<l with qin)its and fish and the hands with conches, etc. They lived up to 85,000 years and did not know the troubles of the old age, and had accesses to the heaven, oceans, lower regions, and mountains. Saciilices, asceticism, charity and truthfulness were the four-) imbed dlia-mas of the Treta age and were, unscrupulously, observed by tliem, — 58-73.

अध्याय १४२

श्लोक 25

प्रयुतं तु तथा पूर्णं द्वे चान्ये नियुते पुनः षण्णवतिसहस्राणि संख्यातानि च संख्यया त्रेतायुगस्य संख्यैषा मानुषेण तु संज्ञिता

prayutaṃ tu tathā pūrṇaṃ dve cānye niyute punaḥ ṣaṇṇavatisahasrāṇi saṃkhyātāni ca saṃkhyayā tretāyugasya saṃkhyaiṣā mānuṣeṇa tu saṃjñitā

हिन्दी अर्थ

पर्वत, सभी द्वीपं तथा समुद्रोंके गुणोंका वर्णन किया जा सकता है, किंतु अविमुक्त क्षेत्रके गुणोंका वर्णन नहीं किया जा सकता। मृत्युके समय वायुसे प्रेरित मनुष्योंके मर्मस्थानोके छिन्न हो जानेपर स्मृति नहीं उत्पन्न होती, किंतु अविमुक्तमें अन्तसमय कमाँसे प्रेरित भक्तोंके कानमें स्वयं ईश्वर मणिकर्ण्या त्यजन् देहं गतिमिष्टां त्रजेन्नरः॥ २४ मन्त्रका जाप करते हैं। मनुष्य मणिकर्णिकामें शरीरका

English

Thougli in that age ilharma reigned according to Aarnasrama, yet there was also a criminal procedure code to justify and maintain the order of Varnafiiama. All the people were healthy, wealthy, happy and contented. In this Tretayuga one Anla was divided into four. The people livcil uj) to 3,000 years and they were all blessed with sons and grands )ns an<i then they departed. Now, lieav of its characteristics, d'lie characteristic of the Tretayuga in Sandhya is one foot; and in the Sandliyanisia one-fourth of that of Sandhya. — 74-77.

अध्याय १४२

श्लोक 26

अष्टौ शतसहस्राणि वर्षाणां मानुषाणि तु चतुःषष्टिसहस्राणि वर्षाणां द्वापरं युगम्

aṣṭau śatasahasrāṇi varṣāṇāṃ mānuṣāṇi tu catuḥṣaṣṭisahasrāṇi varṣāṇāṃ dvāparaṃ yugam

हिन्दी अर्थ

त्याग करनेपर इष्टगतिको प्राप्त करता है। जो गति अविशुद्ध आत्माओंद्वारा दुष्प्राप्य है, उसे भी वह ईश्वरको प्रेरणाद्वारा यहाँ प्रास कर लेता है। जो मनुष्य अनेक पापोंसे परिपूर्ण इस मानवयोनिको नश्वर समझकर संसार-भयसे छुटकारा देनेवाले, योगक्षेमके प्रदाता, अनेक विघ्नोंके विनाशक,

English

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अध्याय १४२

श्लोक 27

चत्वारि नियुतानि स्युर् वर्षाणि तु कलिर्युगम् द्वात्रिंशच्च तथान्यानि सहस्राणि तु संख्यया एतत्कलियुगं प्रोक्तं मानुषेण प्रमाणतः

catvāri niyutāni syur varṣāṇi tu kaliryugam dvātriṃśacca tathānyāni sahasrāṇi tu saṃkhyayā etatkaliyugaṃ proktaṃ mānuṣeṇa pramāṇataḥ

हिन्दी अर्थ

दिव्य अविमुक्त (काशी)-में निवास करता है तथा अनेक विघ्नोंसे आलोडित होनेपर भी अविमुक्तको नहीं छोड़ता, वह वृद्धावस्था, मृत्यु और इस नश्वर जन्मसे छुटकारा पा लेता है तथा अविमुक्तके माहात्म्यसे अविमुक्तप्रसादात् तु शिवसायुज्यमाप्नुयात्॥ २७ शिवसायुज्यको प्राप्त करता है इति श्रीमत्स्ये महापुराणेऽविमुक्तमाहात्म्ये द््यशीत्यधिकशततमोऽध्यायः

English

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अध्याय १४२

श्लोक 28

एषा चतुर्युगावस्था मानुषेण प्रकीर्तिता चतुर्युगस्य संख्याता संध्या संध्यांशकैः सह

eṣā caturyugāvasthā mānuṣeṇa prakīrtitā caturyugasya saṃkhyātā saṃdhyā saṃdhyāṃśakaiḥ saha

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके अविमुक्तमाहात्म्य-वर्णनमें एक सौ वयासीवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ अविमुक्तमाहात्म्यके प्रसङ्गमें शिव-पार्वतीका प्रश्नोत्तर

English

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अध्याय १४२

श्लोक 29

एषा चतुर्युगाख्या तु साधिका त्वेकसप्ततिः कृतत्रेतादियुक्ता सा मनोरन्तरमुच्यते

eṣā caturyugākhyā tu sādhikā tvekasaptatiḥ kṛtatretādiyuktā sā manorantaramucyate

हिन्दी अर्थ

देवोद्यानानि रम्याणि नन्दनं वनमेव च येन त्वं रमसे नित्यं भूतसम्पदगुणैर्युतः तेषामनुग्रहः कश्चित् तत्सर्वं ब्रूहि शङ्कर

English

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अध्याय १४२

श्लोक 30

मन्वन्तरस्य संख्या तु मानुषेण निबोधत एकत्रिंशत्तथा कोट्यः संख्याताः संख्यया द्विजैः

manvantarasya saṃkhyā tu mānuṣeṇa nibodhata ekatriṃśattathā koṭyaḥ saṃkhyātāḥ saṃkhyayā dvijaiḥ

हिन्दी अर्थ

वाराणस्यां नदी पुण्या सिद्धगन्धर्वसेविता। प्रविष्टा त्रिपथा गड्डा तस्मिन् क्षेत्रे मम प्रिये ममैव प्रीतिरतुला कृत्तिवासे च सुन्दरि। सर्वेषां चैव स्थानानां स्थानं तत्तु यथाधिकम्

English

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अध्याय १४२

श्लोक 31

तथा शतसहस्राणि दश चान्यानि भागशः सहस्राणि तु द्वात्रिंशच् छतान्यष्टाधिकानि च

tathā śatasahasrāṇi daśa cānyāni bhāgaśaḥ sahasrāṇi tu dvātriṃśac chatānyaṣṭādhikāni ca

हिन्दी अर्थ

देवी पार्वतीने पूछा-कल्याणकारी पतिदेव! विशाल मानस पर्वत, रमणीय देव-उद्यान, नन्दनवन, देवस्थानों, मुख्य तीर्थो और मन्दिरों-इन सभी स्थानोंको छोड़कर आपका अविमुक्तक्षेत्रमें इतना अधिक प्रेम क्यों है ? यहाँ अतिशय गोपनीय कोन-सा बहुत बड़ा पुण्य है, जिससे आप प्रमथोंके साथ यहाँ नित्य रमण करते हैं। उस क्षेत्रकी तथा वहाँके निवासियोंकी जो श्रेष्ठता है और उन लोगोंपर आपका जो अपूर्व अनुग्रह है-वे

English

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अध्याय १४२

श्लोक 32

अशीतिश्चैव वर्षाणि मासाश्चैवाधिकास्तु षट् मन्वन्तरस्य संख्यैषा मानुषेण प्रकीर्तिता

aśītiścaiva varṣāṇi māsāścaivādhikāstu ṣaṭ manvantarasya saṃkhyaiṣā mānuṣeṇa prakīrtitā

हिन्दी अर्थ

शिवजी बोले भामिनि! तुम जो प्रश्‍न कर रही हो यह अतिशय अद्भुत है। मैं वह सब स्पष्टरूपसे कह रहा हुँ, सुनो। प्रिये! सिद्धों और गन्धर्वोसे सेवित वाराणसीमें प्रविष्ट होती हैं। सुन्दरि! कृत्तिवासलिङ्गपर मेरा अपार प्रेम है, इसीलिये वह स्थान सभी स्थानोंसे

English

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अध्याय १४२

श्लोक 33

दिव्येन च प्रमाणेन प्रवक्ष्याम्यन्तरं मनोः सहस्राणां शतान्याहुः स च वै परिसंख्यया

divyena ca pramāṇena pravakṣyāmyantaraṃ manoḥ sahasrāṇāṃ śatānyāhuḥ sa ca vai parisaṃkhyayā

हिन्दी अर्थ

तेन कार्येण सुश्रोणि तस्मिन् स्थाने रतिर्मम। तस्मिँल्लिङ्गे च सांनिध्यं मम देवि सुरेश्वरि याञ्भ्रुत्वा सर्वपापेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः यदि पापो यदि शठो यदि वाधार्मिको नरः। मुच्यते सर्वपापेभ्यो ह्यविमुक्तं व्रजेद् यदि

English

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अध्याय १४२

श्लोक 34

चत्वारिंशत्सहस्राणि मनोरन्तरमुच्यते मन्वन्तरस्य कालस्तु युगैः सह प्रकीर्तितः

catvāriṃśatsahasrāṇi manorantaramucyate manvantarasya kālastu yugaiḥ saha prakīrtitaḥ

हिन्दी अर्थ

प्रलये सर्वभूतानां लोके स्थावरजङ्गमे। न हि त्यक्ष्यामि तत्स्थानं महागणशतैर्वृतः यत्र देवाः सगन्धर्वाः सयक्षोरगराक्षसाः। वक्त्रं मम महाभागे प्रविशन्ति युगक्षये

English

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अध्याय १४२

श्लोक 35

एषा चतुर्युगाख्या तु साधिका ह्येकसप्ततिः क्रमेण परिवृत्ता सा मनोरन्तरमुच्यते

eṣā caturyugākhyā tu sādhikā hyekasaptatiḥ krameṇa parivṛttā sā manorantaramucyate

हिन्दी अर्थ

यो मां पूजयते नित्यं तस्य तुष्याम्यहं प्रिये सर्वदानानि यो दद्यात् सर्वयज्ञेषु दीक्षितः । सर्वतीर्थाभिषिक्तश्च स प्रपद्यत मामिह अविमुक्तं सदा देवि ये व्रजन्ति सुनिश्चिताः। ते तिष्ठन्तीह सुश्रोणि मद्भक्ता्च त्रिविष्टपे

English

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अध्याय १४२

श्लोक 36

एतच्चतुर्दशगुणं कल्पमाहुस्तु तद्विदः ततस्तु प्रलयः कृत्स्नः स तु संप्रलयो महान्

etaccaturdaśaguṇaṃ kalpamāhustu tadvidaḥ tatastu pralayaḥ kṛtsnaḥ sa tu saṃpralayo mahān

हिन्दी अर्थ

मत्प्रसादात् तु ते देवि दीव्यन्ति शुभलोचने। दुर्धराश्चैव दुर्धर्षां भवन्ति विगतज्चराः निधूतपापा विमला भवन्ति विगतज्चराः

English

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अध्याय १४२

श्लोक 37

कल्पप्रमाणो द्विगुणो यथा भवति संख्यया चतुर्युगाख्या व्याख्याता कृतं त्रेतायुगं च वै

kalpapramāṇo dviguṇo yathā bhavati saṃkhyayā caturyugākhyā vyākhyātā kṛtaṃ tretāyugaṃ ca vai

हिन्दी अर्थ

दक्षयज्ञस्त्वया देव मत्त्रियार्थ निषूदितः । अविमुक्तगुणानां तु न तृप्तिरिह जायते क्रोधेन दक्षयज्ञस्तु त्वत्त्रयार्थे विनाशितः। महाप्रिये महाभागे नाशितोऽयं वरानने श्रेष्ठ है। सुश्रोणि! इसी कारण मेरा उस स्थानपर अधिक राग है तथा सुरेश्वरि! उस लिङ्गमें मेरा सदा निवास रहता है। सभी गुणवानोंमें श्रेष्ठ देवि! अब मैं क्षेत्रके गुणोंका वर्णन करता हूँ जिन्हें सुनकर मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त

English

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अध्याय १४२

श्लोक 38

त्रेतासृष्टं प्रवक्ष्यामि द्वापरं कलिमेव च युगपत्समवेतौ द्वौ द्विधा वक्तुं न शक्यते

tretāsṛṣṭaṃ pravakṣyāmi dvāparaṃ kalimeva ca yugapatsamavetau dvau dvidhā vaktuṃ na śakyate

हिन्दी अर्थ

हो जाता है, इसमें संदेह नहीं है। पापी, दुष्ट अथवा अधार्मिक मनुष्य भी यदि अविमुक्त (काशी)-में चला जाय तो वह सभी पापोंसे छूट जाता है। सभी प्राणियोंके स्थावर एवं जंगमसे व्याप्त लोकके प्रलयकालमें भी मैं सैकड़ों विशिष्ट गणोंके साथ रहकर उस स्थानको नहीं छोड़्ता। महाभागे ! जहाँ देवता, गन्धर्व, यक्ष, नाग, राक्षस- सभी युगके नाशके समय मेरे मुखमें प्रवेश कर जाते हैं। पार्वति! उनकी पूजाको मैं साक्षात्-रूपसे ग्रहण करता हूँ।

English

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अध्याय १४२

श्लोक 39

क्रमागतं मयाप्येतत् तुभ्यं नोक्तं युगद्वयम् ऋषिवंशप्रसङ्गेन व्याकुलत्वात्तथा क्रमात्

kramāgataṃ mayāpyetat tubhyaṃ noktaṃ yugadvayam ṛṣivaṃśaprasaṅgena vyākulatvāttathā kramāt

हिन्दी अर्थ

यह शुभदायक अतिशय रहस्यमय स्थान मुझे परम प्रिय है। सुश्रोणि! वहाँ निवास करनेवाले मेरे भक्त द्विजातिगण धन्य हैं । सदा मेरी भक्तिमें तत्पर जो मेरे भक्त हैं वे वहाँ अपने शरीरका त्याग कर परम गतिको प्राप्त होते हैं। जो मनुष्य अविमुक्त क्षेत्र (काशी) -में निवास करता है, वह सदा रुद्रसूक्तसे पूजा करता है, सदा दान देता है और सदा तपस्यामें रत रहता है। प्रिये! जो मेरी नित्य पूजा करता है उससे मैं प्रसन्न रहता हूँ। जो सभी प्रकारका दान करता हे, सभी तरहके यज्ञोंमें दीक्षित होता है और सभी तीर्थोके जलोंके अभिषेकसे सम्पन्न है वही यहाँ मुझे प्राप्त करता हैं। देवि! जो सदा सुनिश्चित रूपसे अविमुक्त क्षेत्रमें जाते रहते हैं तथा यहाँ निवास करते हैं वे स्वर्गमें भी मेरे भक्त

English

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अध्याय १४२

श्लोक 40

नोक्तं त्रेतायुगे शेषं तद्वक्ष्यामि निबोधत अथ त्रेतायुगस्यादौ मनुः सप्तर्षयश्च ये श्रौतस्मार्तं ब्रुवन्धर्मं ब्रह्मणा तु प्रचोदिताः

noktaṃ tretāyuge śeṣaṃ tadvakṣyāmi nibodhata atha tretāyugasyādau manuḥ saptarṣayaśca ye śrautasmārtaṃ bruvandharmaṃ brahmaṇā tu pracoditāḥ

हिन्दी अर्थ

बने रहते हैं शुभलोचने देवि! मेरी कृपासे वे देदीप्यमान रहते हैं तथा किसीसे पराजित न होनेवाले, पराक्रमशाली और संतापरहित होते हैं। स्थिर निश्चयवाले मेरे भक्त शुभप्रद अविमुक्तको प्राकर पापरहित, निर्मल और उद्वेगशून्य हो जाते हैं॥ ६--२१॥

English

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अध्याय १४२

श्लोक 41

दाराग्निहोत्रसम्बन्धम् ऋग्यजुःसामसंहिताः इत्यादिबहुलं श्रौतं धर्मं सप्तर्षयो ऽब्रुवन्

dārāgnihotrasambandham ṛgyajuḥsāmasaṃhitāḥ ityādibahulaṃ śrautaṃ dharmaṃ saptarṣayo 'bruvan

हिन्दी अर्थ

पार्वतीने कहा--देव! आपने मेरा प्रिय करनेके लिये दक्ष-यज्ञको विनष्ट किया था, किंतु अविमुक्तके गुणोंको सुननेसे मुझे यहाँ संतोष नहीं हो रहा है ईश्वर बोले-महाभागे! तुम्हें प्रसन्न करनेके लिये मैंने क्रोधवश दक्ष-यज्ञका विनाश किया था; क्योंकि वरानने! तुम तो मेरी अतिशय प्रियतमा हो, इसीलिये उस यज्ञको नष्ट किया था। जो मेरे भक्त अविमुक्तक्षेत्रमें निश्चयपूर्वक यज्ञ करते हैं उनका सैकड़ों करोड़ कल्पोंमें

English

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अध्याय १४२

श्लोक 42

परम्परागतं धर्मं स्मार्तं त्वाचारलक्षणम् वर्णाश्रमाचारयुतं मनुः स्वायम्भुवो ऽब्रवीत्

paramparāgataṃ dharmaṃ smārtaṃ tvācāralakṣaṇam varṇāśramācārayutaṃ manuḥ svāyambhuvo 'bravīt

हिन्दी अर्थ

न तेषां पुनरावृत्तिः कल्पकोटिशतैरपि॥ २४ भी पुनः संसारमें आगमन नहीं होता दुर्लभास्तु गुणा देव अविमुक्ते तु कीर्तिताः सर्वांस्तान् मम तत्त्वेन कथयस्व महेश्वर

English

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अध्याय १४२

श्लोक 43

सत्येन ब्रह्मचर्येण श्रुतेन तपसा तथा तेषां सुतप्ततपसाम् आर्षेणानुक्रमेण ह

satyena brahmacaryeṇa śrutena tapasā tathā teṣāṃ sutaptatapasām ārṣeṇānukrameṇa ha

हिन्दी अर्थ

कौतूहलं महादेव हृदिस्थं मम वर्तते। तत्सर्वं मम तत्त्वेन आख्याहि परमेश्वर न तृसिमधिगच्छामि ब्रूहि देव पुनर्गुणान् वृक्षमूलनिकेताश्च शिलाशय्यास्तथा परे

English

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अध्याय १४२

श्लोक 44

सप्तर्षीणां मनोश्चैव आदौ त्रेतायुगे ततः अबुद्धिपूर्वकं तेन सकृत्पूर्वकमेव च

saptarṣīṇāṃ manoścaiva ādau tretāyuge tataḥ abuddhipūrvakaṃ tena sakṛtpūrvakameva ca

हिन्दी अर्थ

त्रिकालमपि भुञ्जाना येऽविमुक्तनिवासिनः। अविमुक्ते परो मोक्षः क्षेत्रं नैवास्ति तादृशम्

English

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अध्याय १४२

श्लोक 45

अभिवृत्तास्तु ते मन्त्रा दर्शनैस्तारकादिभिः आदिकल्पे तु देवानां प्रादुर्भूतास्तु ते स्वयम्

abhivṛttāstu te mantrā darśanaistārakādibhiḥ ādikalpe tu devānāṃ prādurbhūtāstu te svayam

हिन्दी अर्थ

देवीने पूछा-देव! आपने अविमुक्तक्षेत्रके जिन दुर्लभ गुणोंका वर्णन किया है, महेश्वर! आप उन सभी गुणोंका रहस्यपूर्वक मुझसे वर्णन कीजिये। महादेव! मेरे हृदयमें परम आश्चर्य हो रहा है, अत: परमेश्वर! उन सभी विषयोंको मुझे रहस्यपूर्वक बतलाइये ईश्वर बोले-सुन्दरि! जो अविमुक्तक्षेत्रमें निवास करते हैं वे मेरी कृपासे विदेह, अक्षय और अमर हो जाते हैं तथा अन्तमें निश्चय ही मुझमें लीन हो जाते हैं।

English

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अध्याय १४२

श्लोक 46

प्रमाणेष्वथ सिद्धानाम् अन्येषां च प्रवर्तते मन्त्रयोगो व्यतीतेषु कल्पेष्वथ सहस्रशः ते मन्त्रा वै पुनस्तेषां प्रतिमायामुपस्थिताः

pramāṇeṣvatha siddhānām anyeṣāṃ ca pravartate mantrayogo vyatīteṣu kalpeṣvatha sahasraśaḥ te mantrā vai punasteṣāṃ pratimāyāmupasthitāḥ

हिन्दी अर्थ

देवीने पूछा--देव ! अविमुक्त नामक विशाल क्षेत्रका आश्चर्यजनक पुण्य है एवं आश्चर्यजनक गुण हैं, इनके सुननेसे मुझे तृप्ति नहीं हो रही है, अतः पुनः उन गुणोंका वर्णन कीजिये ईश्वरने कहा-महेश्वरि! तुम तो परम सुन्दरी एवं मेरी प्रिया हो, अत: अविमुक्तक्षेत्रमें जो गुण हैं, उन्हें तथा उनके अतिरिक्त अन्यान्य गुणोंको भी सुनो । जो शाक एवं पत्तोंपर जीवन-निर्वाह करनेवाले, संयमी, भलीभाँति स्नानसे

English

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अध्याय १४२

श्लोक 47

ऋचो यजूंषि सामानि मन्त्राश्चाथर्वणास्तु ये सप्तर्षिभिश्च ये प्रोक्ताः स्मार्तं तु मनुरब्रवीत्

ṛco yajūṃṣi sāmāni mantrāścātharvaṇāstu ye saptarṣibhiśca ye proktāḥ smārtaṃ tu manurabravīt

हिन्दी अर्थ

निर्मल सूर्य-किरणोंका पान करनेवाले, दाँतरूपी ओखलीसे निर्वाह करनेवाले, पत्थरपर कूटकर भोजन करनेवाले, प्रतिमास कुशके अग्रभागसे जलका आस्वादन करनेवाले, वृक्षको जड्में निवास करनेवाले, पत्थरपर शयन करनेवाले, आदित्यके समान तेजस्वी शरीरधारी, क्रोधविजयी और जितेन्द्रिय हैं, तथा इसी तरह अनेक प्रकारके धर्मोसे अन्य स्थानोंमें व्रतका आचरण करनेवाले हैं अथवा तपस्यामें संलग्न हैं, वे सभी तीनों कालोंमें भोजन करनेवाले अविमुक्तनिवासी व्यक्तिकी सोलहवीं कलाकी बराबरी नहीं कर सकते। जो अविमुक्तक्षेत्रमें निवास कर रहे हैं वे मानो स्वर्गमें ही निवास कर रहे हें

English

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अध्याय १४२

श्लोक 48

त्रेतादौ संहता वेदाः केवलं धर्मसेतवः संरोधादायुषश्चैव व्यस्यन्ते द्वापरे च ते ऋषयस्तपसा वेदान् अहोरात्रमधीयते

tretādau saṃhatā vedāḥ kevalaṃ dharmasetavaḥ saṃrodhādāyuṣaścaiva vyasyante dvāpare ca te ṛṣayastapasā vedān ahorātramadhīyate

हिन्दी अर्थ

विश्वमें मेरे समान न कोई दूसरा पुरुष है, न तुम्हारे समान कोई स्त्री है और न अविमुक्तके समान कोई अन्य तीर्थस्थान हुआ है, न होगा। अविमुक्तमें परम योग, अविमुक्तमें श्रेष्ठ गति, अविमुक्तमें परम मोक्ष प्राप्त होता है, इसके समान अन्य कोई भी क्षेत्र नहीं है। शोभने ! महाक्षेत्र अविमुक्तके विषयमें मैंने जो पूर्वमें कहा है, उस परम रहस्यको मैं यथार्थरूपसे कह रहा हूँ।

English

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अध्याय १४२

श्लोक 49

अनादिनिधना दिव्याः पूर्वं प्रोक्ताः स्वयम्भुवा स्वधर्मसंवृताः साङ्गा यथाधर्मं युगे युगे विक्रियन्ते स्वधर्मं तु वेदवादाद्यथायुगम्

anādinidhanā divyāḥ pūrvaṃ proktāḥ svayambhuvā svadharmasaṃvṛtāḥ sāṅgā yathādharmaṃ yuge yuge vikriyante svadharmaṃ tu vedavādādyathāyugam

हिन्दी अर्थ

जन्मान्तरशतैर्देवि योगोऽयं यदि लभ्यते। मोक्षः शतसहस्त्रेण जन्मना लभ्यते न वा एकेन जन्मना सोऽपि योगं मोक्षं च विन्दति अविमुक्ते नरा देवि ये व्रजन्ति सुनिश्चिताः । ते विशन्ति परं स्थानं मोक्षं परमदुर्लभम्

English

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अध्याय १४२

श्लोक 50

आरम्भयज्ञः क्षत्रस्य हविर्यज्ञा विशः स्मृताः परिचारयज्ञाः शूद्राश्च जपयज्ञाश्च ब्राह्मणाः

ārambhayajñaḥ kṣatrasya haviryajñā viśaḥ smṛtāḥ paricārayajñāḥ śūdrāśca japayajñāśca brāhmaṇāḥ

हिन्दी अर्थ

चतुर्मूर्तिः सदा धर्मस्तस्मिन् संनिहितः प्रिये। चतुर्णामपि वर्णानां गतिस्तु परमा स्मृता वदस्व भुवि विप्रेन्द्राः कं वा यज्ञैर्यजन्ति ते

English

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अध्याय १४२

श्लोक 51

ततः समुदिता वर्णास् त्रेतायां धर्मशालिनः क्रियावन्तः प्रजावन्तः समृद्धाः सुखिनश्च वै

tataḥ samuditā varṇās tretāyāṃ dharmaśālinaḥ kriyāvantaḥ prajāvantaḥ samṛddhāḥ sukhinaśca vai

हिन्दी अर्थ

अमन्त्रो मन्त्रको देवि द्विविधो विधिरुच्यते। सांख्यं चैवाथ योगश्च द्विविधो योग उच्यते एतत् ते कथितं देवि यन्मां त्वं परिपृच्छसि श्रृणु पार्वति देवेशि भक्तानां भक्तिवत्सले। प्राप्य सांख्यं च योगं च दुः खान्तं च नियच्छति

English

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अध्याय १४२

श्लोक 52

ब्राह्मणैश्च विधीयन्ते क्षत्रियाः क्षत्रियैर्विशः वैश्याञ्छूद्रा अनुवर्तन्ते परस्परमनुग्रहात्

brāhmaṇaiśca vidhīyante kṣatriyāḥ kṣatriyairviśaḥ vaiśyāñchūdrā anuvartante parasparamanugrahāt

हिन्दी अर्थ

देवि! करोड़ों जन्मोंके पश्चात् मोक्षकी प्राप्ति होती है या नहीं, इसमें भी संदेह है, परंतु यदि कहीं सैकड़ों जन्मोंके भक्त अविमुक्तक्षेत्रमें एक ही जन्ममें योग और मोक्षको प्राप्त कर लेता है। देवि! जो दृढ़ निश्चयसे सम्पन्न पुरुष अविमुन्तक्षेत्रमें जाते हैं वे परम दुर्लभ श्रेष्ठ मोक्षपदको प्राप्त करते हैं। प्रिये ! पृथ्वीमें ऐसा क्षेत्र न हुआ है और न होगा।

English

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अध्याय १४२

श्लोक 53

शुभाः प्रकृतयस्तेषां धर्मा वर्णाश्रमाश्रयाः संकल्पितेन मनसा वाचा वा हस्तकर्मणा त्रेतायुगे ह्यविकले कर्मारम्भः प्रसिध्यति

śubhāḥ prakṛtayasteṣāṃ dharmā varṇāśramāśrayāḥ saṃkalpitena manasā vācā vā hastakarmaṇā tretāyuge hyavikale karmārambhaḥ prasidhyati

हिन्दी अर्थ

चार मूर्तिवालाधर्म इस क्षेत्रमें सदा निवास करता है। यहाँ चारों वर्णोकी परम गति कही गयी है ॥३५--४१॥ देवीने पूछा--प्रभो! आपके क्षेत्रके लौकिक और पारलौकिक गुणोंको मैंने सुन लिया। अब यह बतलाइये कि पृथ्वीपर जो श्रेष्ठ विप्रवृन्द हैं वे यज्ञोंद्वारा किसका यजन करते हैं ? ईश्वरने कहा--जो यज्ञ और मन्त्रद्वारा मेरा ही यजन करते हैं उन लोगोंको कोई भय नहीं रह जाता; क्योंकि वे भव और रुद्रकी आराधना करनेवाले हैं। देवि!

English

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अध्याय १४२

श्लोक 54

आयूरूपं बलं मेधा आरोग्यं धर्मशीलता सर्वसाधारणं ह्येतद् आसीत्त्रेतायुगे तु वै

āyūrūpaṃ balaṃ medhā ārogyaṃ dharmaśīlatā sarvasādhāraṇaṃ hyetad āsīttretāyuge tu vai

हिन्दी अर्थ

गयी हैं। इसी प्रकार सांख्य और योगके भेदसे योग भी दो प्रकारका कहा गया है। जो सजातीय, विजातीय एवं स्वगत भेदोंसे शून्य हो सबको एक मानकर सभी प्राणियोंमे स्थित मेरी आराधना करता है वह योगी सदा अपने स्वरूपमें रहता हुआ भी मुझमें ही स्थित रहता है। जो सर्वत्र सबको आत्मसदूृश मुझमें अवस्थित देखता है, उससे न तो मैं वियुक्त होता हुँ और न वह मुझसे अलग होता है। भूतलपर निर्गुण और सगुण--दो प्रकारके योग

English

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अध्याय १४२

श्लोक 55

वर्णाश्रमव्यवस्थानम् एषां ब्रह्मा तथाकरोत् संहिताश्च तथा मन्त्रा आरोग्यं धर्मशीलता

varṇāśramavyavasthānam eṣāṃ brahmā tathākarot saṃhitāśca tathā mantrā ārogyaṃ dharmaśīlatā

हिन्दी अर्थ

कहे गये हैं। उनमें सगुण योग ही ज्ञानके द्वारा जाना जा सकता है, निर्गुण योग मनसे परे है। देवि! जो तुमने मुझसे पूछा है, वह मैंने तुम्हें बतला दिया ॥४३--४८ ॥ देवीने पूछा--आपने भक्तोंकी जो तीन प्रकारकी भक्ति अनेक बार कही है उसे मैं सुनना चाहती हूँ। आप उसका यथार्थरूपमें मुझसे वर्णन कीजिये ईश्वर ( शिव )-ने कहा--भक्तोंके प्रति वात्सल्य भाव रखनेवाली देवेश्वरी पार्वती! सुनो। जो सांख्य और योगको प्राकर दुःखका सर्वथा विनाश कर लेता है,

English

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अध्याय १४२

श्लोक 56

संहिताश्च तथा मन्त्रा ऋषिभिर् ब्रह्मणः सुतैः यज्ञः प्रवर्तितश्चैव तदा ह्येव तु दैवतैः

saṃhitāśca tathā mantrā ṛṣibhir brahmaṇaḥ sutaiḥ yajñaḥ pravartitaścaiva tadā hyeva tu daivataiḥ

हिन्दी अर्थ

सदा यः सेवते भिक्षां ततो भवति रञ्जितः। रञ्जनात् तन्मयो भूत्वा लीयते स तु भक्तिमान् शास्त्राणां तु वरारोहे बहुकारणदर्शिनः। न मां पश्यन्ति ते देवि ज्ञानवाक्यविवादिनः

English

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अध्याय १४२

श्लोक 57

यामैः शुक्लैर्जयैश्चैव सर्वसाधनसंभृतैः विश्वसृड्भिस् तथा सार्धं देवेन्द्रेण महौजसा स्वायम्भुवे ऽन्तरे देवैस् ते यज्ञाः प्राक्प्रवर्तिताः

yāmaiḥ śuklairjayaiścaiva sarvasādhanasaṃbhṛtaiḥ viśvasṛḍbhis tathā sārdhaṃ devendreṇa mahaujasā svāyambhuve 'ntare devais te yajñāḥ prākpravartitāḥ

हिन्दी अर्थ

तुष्टिं च परमां प्राप्य योगं मोक्षं परं तथा। त्रिभिर्गुणैः समायुक्तो ज्ञानवान् पश्यतीह माम् एतत् ते कथितं देवि किमन्यच्छोतुमर्हसि। भूय एव वरारोहे कथयिष्यामि सुव्रते त्वद्रूपं कीदृशं देव युक्ताः पश्यन्ति योगिनः। एतं मे संशयं ब्रूहि नमस्ते सुरसत्तम

English

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अध्याय १४२

श्लोक 58

सत्यं जपस्तपो दानं पूर्वधर्मो य उच्यते यदा धर्मस्य ह्रसते शाखाधर्मस्य वर्धते

satyaṃ japastapo dānaṃ pūrvadharmo ya ucyate yadā dharmasya hrasate śākhādharmasya vardhate

हिन्दी अर्थ

तस्योपलब्धिमन्विच्छन् यत्न: कार्यो विजानता यत्र नित्यं स्थितो देवो महादेवो गणैर्युतः

English

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अध्याय १४२

श्लोक 59

जायन्ते च तदा शूरा आयुष्मन्तो महाबलाः न्यस्तदण्डा महायोगा यज्वानो ब्रह्मवादिनः

jāyante ca tadā śūrā āyuṣmanto mahābalāḥ nyastadaṇḍā mahāyogā yajvāno brahmavādinaḥ

हिन्दी अर्थ

भीष्मचण्डिकमारभ्य पर्वतेश्वरमन्तिके सदा भिक्षासे जीवन-यापन करता है और उसीसे प्रसन्न रहता है तथा इस प्रकार प्रसन्नताके कारण उसीमें तन्मय होकर लीन हो जाता है, वह भक्तिमान् कहलाता है। वरारोहे ! जो शारत्रोंके अनेकों कारणोंपर विचार करनेवाले हैं, वे ज्ञानवाक्योंमें विवाद करनेवाले लोग मेरा दर्शन नहीं कर पाते। देवि! जो परमार्थ-ज्ञानसम्पन्न योगी हैं तथा जो द्विजातिवृन्द योगके ज्ञानसे आत्मज्ञानको प्राप्त कर चुके हैं, वे ही मुझे जान पाते हैं। जिसका आत्मा

English

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अध्याय १४२

श्लोक 60

पद्मपत्त्रायताक्षाश्च पृथुवक्त्राः सुसंहताः सिंहोरस्का महासत्त्वा मत्तमातंगगामिनः

padmapattrāyatākṣāśca pṛthuvaktrāḥ susaṃhatāḥ siṃhoraskā mahāsattvā mattamātaṃgagāminaḥ

हिन्दी अर्थ

प्रत्याहारके द्वारा विशुद्ध हो गया है, जो परम संतोष, उत्कृष्ट योग और मोक्षको पाकर अन्यथा विचार नहीं करते और तीनों गुणोंसे सम्पन्न हैं, ऐसे ज्ञानी इस अविमुक्तक्षेत्रमें मेरा साक्षात्कार कर पाते हैं। देवि! यह तो मैंने तुमसे कह दिया, अब तुम और क्या सुनना चाहती हो? उत्तम पातित्रत धारण करनेवाली सुन्दरि! मैं पुनः उसका वर्णन करूँगा। प्रिये! जो गोपनीय, पावन अथवा हृदयमें वर्तमान है, वह सब मैं कहूँगा, तुम

English

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अध्याय १४२

श्लोक 61

महाधनुर्धराश्चैव त्रेतायां चक्रवर्तिनः सर्वलक्षणपूर्णास्ते न्यग्रोधपरिमण्डलाः

mahādhanurdharāścaiva tretāyāṃ cakravartinaḥ sarvalakṣaṇapūrṇāste nyagrodhaparimaṇḍalāḥ

हिन्दी अर्थ

एकाग्रचित्त होकर सुनो॥ ५०--५६ ॥ देवीने पूछा-देव! योगसिद्धिसम्पन्न योगिगण आपके कैसे स्वरूपका दर्शन करते हैं? देवश्रेष्ठ ! मैं आपको नमस्कार करती हुँ, आप मेरे इस संदेहपर प्रकाश डालिये श्रीभगवानूने कहा-मेरा वह ज्योति:स्वरूप अमूर्त और मूर्त-दो प्रकारका कहा गया हैं। विद्वान् पुरुषको उसे प्राप्त करनेको अभिलाषासे प्रयत्न करना चाहिए। जो प्राणी गुणोंसे रहित है, वह इस प्रकार

English

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अध्याय १४२

श्लोक 62

न्यग्रोधौ तु स्मृतौ बाहू व्यामो न्यग्रोध उच्यते व्यामेन सूच्छ्रयो यस्य अत ऊर्ध्वं तु देहिनः समुच्छ्रयः परीणाहो न्यग्रोधपरिमण्डलः

nyagrodhau tu smṛtau bāhū vyāmo nyagrodha ucyate vyāmena sūcchrayo yasya ata ūrdhvaṃ tu dehinaḥ samucchrayaḥ parīṇāho nyagrodhaparimaṇḍalaḥ

हिन्दी अर्थ

इसका वर्णन नहीं कर सकता। यदि करना चाहे तो सैकड़ों दिव्य वर्षोमें कर सकता है या नहीं-इसमें भी संदेह हैं देवीने पूछा-जहाँ देवाधिदेव महादेव अपने गणोंके साथ नित्य स्थित रहते हैं, वह क्षेत्र चारों ओर सभी दिशाओंमें कितनी दूरतक विस्तृत है ?

English

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अध्याय १४२

श्लोक 63

चक्रं रथो मणिर्भार्या निधिरश्वो गजस्तथा प्रोक्तानि सप्त रत्नानि पूर्वं स्वायम्भुवे ऽन्तरे

cakraṃ ratho maṇirbhāryā nidhiraśvo gajastathā proktāni sapta ratnāni pūrvaṃ svāyambhuve 'ntare

हिन्दी अर्थ

भगवान् शङ्करने कहा--वह क्षेत्र पूर्वसे पश्चिमतक दो योजन और दक्षिणसे उत्तरतक आधा योजन विस्तृत बतलाया जाता है। जहाँतक वरुणा और असी नदियाँ हैं, वहाँतक भीष्मचण्डिकसे लेकर पर्वतेश्वरके समीपतक शुक्लनदी है। गणा यत्रावतिष्ठन्ति सन्नियुक्ता विनायका: । कूष्माण्डगजतुण्डश्च जयन्तश्च मदोत्कटा: सिंहव्याप्रमुखा: केचिद् विकटाः कुब्जवामनाः। सत्र नन्दी महाकालश्चण्डघण्टो महेश्वरः

English

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अध्याय १४२

श्लोक 64

विष्णोरंशेन जायन्ते पृथिव्यां चक्रवर्तिनः मन्वन्तरेषु सर्वेषु ह्य् अतीतानागतेषु वै

viṣṇoraṃśena jāyante pṛthivyāṃ cakravartinaḥ manvantareṣu sarveṣu hy atītānāgateṣu vai

हिन्दी अर्थ

दण्डचण्डेश्वरश्चैव घण्टाकर्णो महाबल: । एते चान्ये च बहवो गणाश्चैव गणेश्वराः महोदरा महाकाया वञ्रशक्तिधरास्तथा। रक्षन्ति सततं देवि ह्यविमुक्तं तपोवनम्। द्वारे द्वारे च तिष्ठन्ति शूलमुद्रपाणयः

English

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अध्याय १४२

श्लोक 65

भूतभव्यानि यानीह वर्तमानानि यानि च त्रेतायुगानि तेष्वत्र जायन्ते चक्रवर्तिनः

bhūtabhavyāni yānīha vartamānāni yāni ca tretāyugāni teṣvatra jāyante cakravartinaḥ

हिन्दी अर्थ

वाराणस्यां तु यो दद्यात् सवत्सां कांस्यभाजनाम् तदवाप्नोति धर्मात्मा तत्र स्नात्वा वरानने। बहुस्वल्पे च यो दद्याद् ब्राह्मणे वेदपारगे वाराणसीजाह्ववीभ्यां संगमे लोकविश्रुते

English

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अध्याय १४२

श्लोक 66

भद्राणीमानि तेषां च विभाव्यन्ते महीक्षिताम् अत्यद्भुतानि चत्वारि बलं धर्मं सुखं धनम्

bhadrāṇīmāni teṣāṃ ca vibhāvyante mahīkṣitām atyadbhutāni catvāri balaṃ dharmaṃ sukhaṃ dhanam

हिन्दी अर्थ

एतत् ते कथितं देवि तीर्थस्य फलमुत्तमम् सौत्रामणेश्च यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः

English

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अध्याय १४२

श्लोक 67

अन्योन्यस्याविरोधेन प्राप्यन्ते नृपतेः समम् अर्थो धर्मश्च कामश्च यशो विजय एव च

anyonyasyāvirodhena prāpyante nṛpateḥ samam artho dharmaśca kāmaśca yaśo vijaya eva ca

हिन्दी अर्थ

एकाहारस्तु यस्तिष्टेन्मासं तत्र वरानने। यावज्जीवकृतं पापं सहसा तस्य नश्यति विनायकगण भलीभाँति नियुक्त होकर विराजमान रहते हैं। उनमें कुछ सिंह एवं बाघके-से मुखवाले , कुछ भयंकर, कुबडे और वामन (बोने) हैं। जहाँ नन्दी, महाकाल, चण्डघण्ट, महेश्वर, दण्डचण्डेश्वर, महाबली घण्टाकर्ण-ये एवं अन्य अनेक गणसमूह और गणेश्वरवृन्द विद्यमान रहते हैं। देवि! ये सभी विशाल उदरवाले एवं विशालकाय हैं तथा हाथमें वज्र और शक्ति धारण करके इस अविमुक्त तपोवनकी सदा रक्षा

English

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अध्याय १४२

श्लोक 68

ऐश्वर्येणाणिमाद्येन प्रभुशक्तिबलान्विताः श्रुतेन तपसा चैव ऋषींस्ते ऽभिभवन्ति हि

aiśvaryeṇāṇimādyena prabhuśaktibalānvitāḥ śrutena tapasā caiva ṛṣīṃste 'bhibhavanti hi

हिन्दी अर्थ

करते हैं। ये सभी हाथमें शूल और मुदूर धारण कर प्रत्येक द्वारपर स्थित रहते हैं वरारोहे ! जो स्वर्णजटित सींगोंवाली, चाँदीसे युक्त खुरोंवाली, सुन्दर वस्त्र और मृगचर्मसे सुशोभित, दूध देनेवाली, कांसदोहनीसे युक्त सवत्सा गौका वाराणसीमें वेदपारङ्गत ब्राह्मणको दान करता है, वह अपनी सात

English

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अध्याय १४२

श्लोक 69

बलेनाभिभवन्त्येते तेन दानवमानवान् लक्षणैश्चैव जायन्ते शरीरस्थैरमानुषैः

balenābhibhavantyete tena dānavamānavān lakṣaṇaiścaiva jāyante śarīrasthairamānuṣaiḥ

हिन्दी अर्थ

पीढ़ियोंको तार देता है-इसमें संदेह नहीं है वरानने ! जो उस क्षेत्रमें थोड़ा अथवा अधिक मात्रामें सुवर्ण, रजत, वस्त्र, अन्न आदि ब्राह्मणको दान करता है, सुलोचने! उसका वह दान अक्षय एवं अविनाशी हो जाता है। महाभागे! इस तीर्थकी वास्तविक विभूति और विशिष्ट फलको सुनो। वहाँ स्नान कर मनुष्य रोगरहित हो जाते हैं। वरानने! दस अश्वमेध याग करनेसे मनुष्य जो फल प्राप्त करता है, वह उस धर्मात्मा व्यक्तिको वहाँ स्नान करनेसे ही प्राप्त हो जाता है। जो वेदके पारङ्गत ब्राह्मणको अधिक या स्वल्प-जो भी अपनी शक्तिके अनुसार दान देता है, उस दानसे उसे शुभ गति प्राप्त होती है और वह अग्निके समान तेजस्वी हो जाता है। जो संसारमें प्रसिद्ध

English

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अध्याय १४२

श्लोक 70

केशाः स्थिता ललाटेन जिह्वा च परिमार्जनी श्यामप्रभाश्चतुर्दंष्ट्राः सुवंशाश्चोर्ध्वरेतसः

keśāḥ sthitā lalāṭena jihvā ca parimārjanī śyāmaprabhāścaturdaṃṣṭrāḥ suvaṃśāścordhvaretasaḥ

हिन्दी अर्थ

वरुणा-असी और गङ्गाके संगमपर विधानपूर्वक अन्नका दान देता है, उसका पुनर्जन्म नहीं होता। देवि! मैंने इस तीर्थका यह उत्तम फल तुम्हें बतला दिया ॥६७--७४॥ अब मैं पुनः इस तीर्थका अन्य उत्तम फल बतला रहा हूँ। जो मनुष्य इस तीर्थमें उपवासपूर्वक विप्रोंको भलीभाँति तृप्त करता है, वह मानव सौत्रामणि नामक यज्ञका फल प्राप्त करता है । वरानने ! जो वहाँ एक मासतक

English

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अध्याय १४२

श्लोक 71

आजानुबाहवश्चैव तालहस्तौ वृषाकृती परिणाहप्रमाणाभ्यां सिंहस्कन्धाश्च मेधिनः

ājānubāhavaścaiva tālahastau vṛṣākṛtī pariṇāhapramāṇābhyāṃ siṃhaskandhāśca medhinaḥ

हिन्दी अर्थ

एक समय भोजन कर जीवन व्यतीत करता है, उसका जीवनपर्यन्त किया हुआ पाप अनायास ही नष्ट हो न तेषां पुनरावृत्तिः कल्पकोटिशतैरपि अर्चयेद् यस्तु मां देवि अविमुक्ते तपोवने। तस्य धर्म प्रवक्ष्यामि यदवाप्नोति मानवः

English

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अध्याय १४२

श्लोक 72

पादयोश्चक्रमत्स्यौ तु शङ्खपद्मे च हस्तयोः पञ्चाशीतिसहस्राणि जीवन्ति ह्यजरामयाः

pādayoścakramatsyau tu śaṅkhapadme ca hastayoḥ pañcāśītisahasrāṇi jīvanti hyajarāmayāḥ

हिन्दी अर्थ

सम्मार्जने पञ्चशतं ससहस्त्रमनुलेपने। मालया शतसाहस्त्रमनन्तं गीतवाद्यतः अत्यद्भुतमिदं देवं स्थानमेतत् प्रकीर्तितम्। रहस्यं श्रोतुमिच्छामि यदर्थं त्वं न मुञ्जसि

English

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अध्याय १४२

श्लोक 73

असङ्गा गतयस्तेषां चतस्रश्चक्रवर्तिनाम् अन्तरिक्षे समुद्रेषु पाताले पर्वतेषु च

asaṅgā gatayasteṣāṃ catasraścakravartinām antarikṣe samudreṣu pātāle parvateṣu ca

हिन्दी अर्थ

आसौत् पूर्व वरारोहे ब्रह्मणस्तु शिरो वरम्। पञ्चमं शृणु सुश्रोणि जातं काञ्जनसप्रभम् तदेवमब्रवीद् देवि जन्म जानामि ते ह्याहम् ब्रह्महत्याकुलो भूत्वा चर तीर्थानि भूतले

English

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अध्याय १४२

श्लोक 74

इज्या दानं तपः सत्यं त्रेताधर्मास्तु वै स्मृताः तदा प्रवर्तते धर्मो वर्णाश्रमविभागशः मर्यादास्थापनार्थं च दण्डनीतिः प्रवर्तते

ijyā dānaṃ tapaḥ satyaṃ tretādharmāstu vai smṛtāḥ tadā pravartate dharmo varṇāśramavibhāgaśaḥ maryādāsthāpanārthaṃ ca daṇḍanītiḥ pravartate

हिन्दी अर्थ

ततोऽहं गतवान् देवि हिमवन्तं शिलोच्ययम्। जाता है। वरानने! जो इस अविमुक्तक्षेत्रमें विधानपूर्वक अग्निमें प्रवेश कर जाते हैं, वे निश्चय ही मेरे मुखमें प्रवेश करते हैं, जो मेरे भक्त यहाँ दृढ़ निश्चयपूर्वक निराहार रहते हैं उनका सैकड़ों करोड़ कल्पोंमें भी पुन: संसारमें आगमन

English

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अध्याय १४२

श्लोक 75

हृष्टपुष्टा जनाः सर्वे अरोगाः पूर्णमानसाः एको वेदश्चतुष्पादस् त्रेतायां तु विधिः स्मृतः त्रीणि वर्षसहस्राणि जीवन्ते तत्र ताः प्रजाः

hṛṣṭapuṣṭā janāḥ sarve arogāḥ pūrṇamānasāḥ eko vedaścatuṣpādas tretāyāṃ tu vidhiḥ smṛtaḥ trīṇi varṣasahasrāṇi jīvante tatra tāḥ prajāḥ

हिन्दी अर्थ

नहीं होता। देवि! जो इस अविमुक्त तपोवनमें मेरी पूजा करता है, उसका धर्म बतला रहा हूँ, जो उस मनुष्यको प्राप्त होता है। वह निःसंदेह दस अश्वमेध यागके फलको प्रात करता है। जो इस अविमुक्तमें दस सुवर्णनिर्मित पुष्पका दान करता है तथा वहाँ धूप दान करता हे, उसे अग्निहोत्रका फल प्राप्त होता है। अब गन्धदानका फल सुनो । भूमिदानके समान ही गन्ध-दानका फल कहा गया हैं। भलीभाँति स्नान करनेपर पाँच सौ, चन्दन लगानेसे एक हजार, माला समर्पण करनेसे एक लाख और गाने-बजानेसे अनन्त अग्निहोत्रके फलकी प्राप्ति होती है

English

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अध्याय १४२

श्लोक 76

पुत्रपौत्रसमाकीर्णा म्रियन्ते च क्रमेण ताः एष त्रेतायुगे भावस् त्रेतासंख्यां निबोधत

putrapautrasamākīrṇā mriyante ca krameṇa tāḥ eṣa tretāyuge bhāvas tretāsaṃkhyāṃ nibodhata

हिन्दी अर्थ

देवीने पूछा-देव! जैसा आपने बतलाया है, सचमुच ही यह स्थान अतिशय अद्भुत है। अब मैं उस रहस्यको सुनना चाहती हूँ, जिसके कारण आप इस स्थानको नहीं छोड़ते ईश्वरने कहा-सुन्दर कटिभागवाली वरारोहे! सुनो । प्राचीनकालमें ब्रह्माका सुवर्णके समान कान्तिमान् पाँचवाँ सुन्दर सिर उत्पन्न हुआ। देवि! उस महात्माके उत्पन्न हुए उस पाँचवें देदीप्यमान मुखने इस प्रकार

English

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अध्याय १४२

श्लोक 77

त्रेतायुगस्वभावेन संध्यापादेन वर्तते संध्यापादः स्वभावाच्च यो ऽंशः पादेन तिष्ठति

tretāyugasvabhāvena saṃdhyāpādena vartate saṃdhyāpādaḥ svabhāvācca yo 'ṃśaḥ pādena tiṣṭhati

हिन्दी अर्थ

कहा कि मैं तुम्हारा जन्म जानता हूँ। यह सुनकर मैं क्रोधसे परिव्याप्त हो गया और मेरी आँखें लाल हो गयीं। तब मैंने बायें अँगूठेके नखके अग्रभागसे उनके सिरको काट दिया ब्रह्मा बोले-आपने बिना अपराधके ही मेरा सिर काट दिया है, अतः आप भी शापसे युक्त हो कपाली हो जायँगे। साथ ही आप ब्रह्महत्यासे व्याकुल होकर भूतलपर तीर्थोमें भ्रमण कीजिये। देवि! तब मैं हिमालय पर्वतपर चला गया और वहाँ मैंने श्रीमान् नारायणसे भिक्षाकी याचना की। इसके बाद उन्होंने नखके अग्रभागसे अपने पार््वभागको विदीर्ण कर दिया, तब उससे रक्तकी विपुल धारा प्रवाहित हुई। वह धारा

English

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स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_matsyapurANa1-176.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Matsya Purana — Chapter 142
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

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पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
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