Matsya Purana· Matsya Purāṇa
146
अध्याय 146 / 176

Adhyaya 146

77 श्लोकWhatsApp

पूर्ण अध्याय पाठ77 श्लोक

श्लोक पर जाएं:

अध्याय १४६

श्लोक 1

मत्स्य-पुराण १४६ कथं मत्स्येन कथितस् तारकस्य वधो महान् कस्मिन्काले विनिर्वृत्ता कथेयं सूतनन्दन

matsya-purāṇa 146 kathaṃ matsyena kathitas tārakasya vadho mahān kasminkāle vinirvṛttā katheyaṃ sūtanandana

हिन्दी अर्थ

तीर्थकी यात्रा करे। राजन्! उस तीर्थमें स्नान करनेसे मानव ब्रह्मलोकमें पूजित होता है। जो जितेन्द्रिय मानव समाहितचित्तसे कार्तिकमासके कृष्णपक्षकी चतुर्दशी तिथिमें महादेवजीको घृतसे स्नान कराता है, उसका इक्कीस पीढ़ीतक महेश्वरके पदसे पतन नहीं होता। वहाँ यदि विप्रोंको धेनु, जूता, छाता, घी, कम्बल और भोजनका दान दिया जाय तो वह सभी करोड़गुना हो जाता है। राजेन्द्र! तदुपरान्त उत्तम बलाकेश्वरतीर्थमें जाना चाहिए। राजन्! उस तीर्थमें स्नान करनेसे मानव सिंहासनका

English

and reign over the three worlds." Saying this, Diti went to sleep and her long tresses of hair fell on her legs. As ill-luok would have it, Diti went over i<> sleep and liulra taking advantage of that loop-hole, entered into her ciijbryo. Tie divided the womb into seven i>arts by his bolt. After- wards out of rage ho divided each part into seven. Diti awoke and said angrily: — " India! do not destroy my progeny." — 28-34.

अध्याय १४६

श्लोक 2

त्वन्मुखक्षीरसिन्धूत्था कथेयममृतात्मिका कर्णाभ्यां पिबतां तृप्तिर् अस्माकं न प्रजायते इदं मुने समाख्याहि महाबुद्धे मनोगतम्

tvanmukhakṣīrasindhūtthā katheyamamṛtātmikā karṇābhyāṃ pibatāṃ tṛptir asmākaṃ na prajāyate idaṃ mune samākhyāhi mahābuddhe manogatam

हिन्दी अर्थ

उपोष्य रजनीमेकां स्नानं तत्र समाचरेत् गोसहस्त्रफलं तस्य विष्णुलोकं स गच्छति

English

Hearing those words, Indra came out of the embryo and stood with folded hands before his mother, shivering with fear. He said You went to sleep in course of the day with your hair unkempt. I have, there- fore, divided your womb into 49 parts. I shall allot them places in the Heavens coveted by the Devas even." — 35-37.

अध्याय १४६

श्लोक 3

पृष्टस्तु मनुना देवो मत्स्यरूपी जनार्दनः कथं शरवणे जातो देवः षड्वदनो विभो

pṛṣṭastu manunā devo matsyarūpī janārdanaḥ kathaṃ śaravaṇe jāto devaḥ ṣaḍvadano vibho

हिन्दी अर्थ

ऋषितीर्थं ततो गच्छेत् सर्वपापहरं नृणाम्। स्नातमात्रो नरस्तत्र शिवलोकं च गच्छति देवतीर्थं ततो गच्छेद् ब्रह्मणा निर्मितं पुरा। तत्र स्नात्वा नरो राजन् ब्रह्मलोके महीयते स्तातमात्रो नरस्तत्र रुद्रलोके महीयते

English

Hearing that, Diti said: — Be it so " and afterwards went to her Lord and said Prajapati! Grant me a powerful son who may have access to Heaven, may conquer Indra and be invulnerable to the Devas' weapons."— 38-39.

अध्याय १४६

श्लोक 4

एतत्तु वचनं श्रुत्वा पार्थिवस्यामितौजसः उवाच भगवान्प्रीतो ब्रह्मसूनुर्महामतिम्

etattu vacanaṃ śrutvā pārthivasyāmitaujasaḥ uvāca bhagavānprīto brahmasūnurmahāmatim

हिन्दी अर्थ

नित्यं चायतनं दृष्टा मुच्यते ब्रह्महत्यया ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र तुरासङ्गमनुत्तमम्। तत्र स्नात्वा महादेवमर्चयन् सिद्धिमाप्नुयात्

English

The sage said to his grieved consort that she would beget such a progeny after practising penances for Icn thousand years. " You will beget Vajrafiga whose body will be as massive as thunderbolt and iron, so no weapons would balHo him." — 40-41.

अध्याय १४६

श्लोक 5

वज्राङ्गो नाम दैत्यो ऽभूत् तस्य पुत्रस्तु तारकः सुरानुद्वासयामास पुरेभ्यः स महाबलः

vajrāṅgo nāma daityo 'bhūt tasya putrastu tārakaḥ surānudvāsayāmāsa purebhyaḥ sa mahābalaḥ

हिन्दी अर्थ

सोमतीर्थं ततो गच्छेत् पश्येच्चन्द्रमनुत्तमम्। तत्र स्नात्वा नरो राजन् भक्त्या परमया युत: षष्टिवर्षसहस्त्राणि रुद्रलोके महीयते अहोरात्रोपवासेन त्रिरात्रफलमाप्नुयात्

English

Diti, after being tliiis blos>ed, repaired to the forest where she practised severe austerities for Ion thousand years. At the close of her period of austerities, slie begc>t a son who was of wonderful deeds, uncon- queral)!© and invnlncral)lo even by the thuii(Ierl)olt. He became thoroughly conversant in all the Sjrstras as soon as ho was born and devoutly said to his mother: — " mother! direct me wdiat I should do for you." — 42-44.

अध्याय १४६

श्लोक 6

ततस्ते ब्रह्मणो ऽभ्याशं जग्मुर्भयनिपीडिताः भीतांश्च त्रिदशान्दृष्ट्वा ब्रह्मा तेषामुवाच ह

tataste brahmaṇo 'bhyāśaṃ jagmurbhayanipīḍitāḥ bhītāṃśca tridaśāndṛṣṭvā brahmā teṣāmuvāca ha

हिन्दी अर्थ

तावद् वर्षसहर्त्राणि रुद्रलोके महीयते। यस्तु प्राणपरित्यागं कुर्यात् तत्र नराधिप अधिपति होता है । नर्मदाके दक्षिण तटपर इन्द्रका प्रसिद्ध तीर्थ है, वहाँ एक रातका उपवास कर विधिविधानसे स्नान करे, स्नान करनेके बाद विधिपूर्वक जनार्दनकी अर्चना करे तो उसे एक हजार गौओंके दानका फल प्राप्त होता है और

English

Diti rejoicingly said: — '' Son! Indra lias killed several of my sons, you should go and take revenge and kill Indra." That valiant demon on hearing those words said " very well " and soon proceeded to Heaven.

अध्याय १४६

श्लोक 7

संत्यजध्वं भयं देवाः शंकरस्यात्मजः शिशुः तुहिनाचलदौहित्रस् तं हनिष्यति दानवम्

saṃtyajadhvaṃ bhayaṃ devāḥ śaṃkarasyātmajaḥ śiśuḥ tuhinācaladauhitras taṃ haniṣyati dānavam

हिन्दी अर्थ

वह विष्णुलोकमें जाता है ॥११--२१॥ तत्पश्चात् मनुष्योंके सभी पापोंके नाशक ऋषितीर्थकी यात्रा करे, वहाँ स्नानमात्र करनेसे मानव शिबलोकको चला जाता है। वहीं नारदजीका परम रमणीय तीर्थ है वहाँ स्नानमात्रसे मानव एक हजार गौओंके दानका फल प्राप्त करता है । राजन्! इसके बाद प्राचीनकालमें ब्रह्मद्वार निर्मित देवतीर्थमें जाय, वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य ब्रह्मलोकमें पूजित होता है । तदनन्तर प्राचीनकालमें देवोंद्वारा स्थापित अमरकण्टककी यात्रा करे। वहाँ स्नान करनेमात्रसे मनुष्य

English

G(nng there that invulnerable demon tied Indra by his infallible noose weapon (Pasiastra) and brought him before Ids mother as a lion carries away a small deer. At that time Brahma and the great sage Kaiyapa went where the mother and the son were sitting fearlessly. — 45-48

अध्याय १४६

श्लोक 8

ततः काले तु कस्मिंश्चिद् दृष्ट्वा वै शैलजां शिवः स्वरेतो वह्निवदने व्यसृजत्कारणान्तरे

tataḥ kāle tu kasmiṃścid dṛṣṭvā vai śailajāṃ śivaḥ svareto vahnivadane vyasṛjatkāraṇāntare

हिन्दी अर्थ

रुद्रलोकमें पूजित होता है। राजेन्द्र ! तत्पश्चात् श्रेष्ठ रावणेश्वर- तीर्थकी यात्रा करनी चाहिए। वहाँ मनुष्य प्रतिदिन देवमन्दिरका दर्शनकर ब्रह्महत्यासे मुक्त हो जाता है। तदुपरान्त ऋणतीर्थमें जाय, वहाँ जानेसे मानव निश्चय ही ऋणोंसे मुक्त हो जाता है। इसके बाद वटेश्वरका दर्शन करके मनुष्यजन्मका पूर्ण फल प्राप्त कर लेता है। राजन्! तदनन्तर सभी व्याधियोंको नाश करनेवाले भीमेश्वरतीर्थकी यात्रा करे। उस तीर्थमें स्नान करनेमात्रसे

English

On seeing the Daitya both Brahma and Kaeiyapa spoke: — " Son! release this Indra. What have you to do with Idin? Disgrace is worse than deatli for an honourable man. He will get his release through our intervention which will be like Ids death. O Son! one, who gets his release through the intervention of others, bears on his head a crushing load. Although alive, he is really dead on account of his being conquered. The enemy ceases to be so, the moment he comes under the shelter of a magnanimous man."— 49-52.

अध्याय १४६

श्लोक 9

तत्प्राप्तं वह्निवदने रेतो देवानतर्पयत् विदार्य जठराण्येषाम् अजीर्णं निर्गतं मुने

tatprāptaṃ vahnivadane reto devānatarpayat vidārya jaṭharāṇyeṣām ajīrṇaṃ nirgataṃ mune

हिन्दी अर्थ

मनुष्य सभी दु:खोंसे छुटकारा पा जाता है। राजेद्र! तत्पश्चात् श्रेष्ठतम तुरासङ्ग तीर्थकी यात्रा करनी चाहिए। वहाँ स्नानकर महादेवजीकी पूजा करनेसे सिद्धि प्राप्त होती है। इसके बाद सोमतीर्थमें जाय और वहाँ परम श्रेष्ठ चन्द्रमाका दर्शन करे। राजन्! उस तीर्थमें परम भक्तिसे युक्त हो स्नान करनेसे मानव उसी क्षण दिव्य शरीर धारणकर शिवके समान चिरकालपर्यन्त आनन्दका अनुभव करता है और साठ हजार वर्षोतक रुद्रलोकमें राजेन्द्र! इसके बाद श्रेष्ठ पिङ्गलेश्वरतीर्थकी यात्रा करे। वहाँ एक दिन-रात उपवास करनेसे त्रिरात्रका फल प्राप्त होता है। राजेन्द्र! उस तीर्थमें जो कपिला गौका दान ह, उस दाताके वंशके कुलवाले उस गौके शरीरमें

English

Hearing such words the demon Vajnifiga humbly said: I have nothing to do with Indra. I have only followed the injunctions of rny mother. O Dev a! you are the Lord of the Devas and the Asuras and you are my grand father, T shall, therefore, abide by your commands. I hereby release this Indra. O, Deva! let my mind be eager to practise austerities which bo gracious enough to let me pursue unmolested. Lord! let there be happiness unto me through your grace." After making this speech he became silent. — 53-55.

अध्याय १४६

श्लोक 10

पतितं तत्सरिद्वरां ततस्तु शरकानने तस्मात्तु स समुद्भूतो गुहो दिनकरप्रभः

patitaṃ tatsaridvarāṃ tatastu śarakānane tasmāttu sa samudbhūto guho dinakaraprabhaḥ

हिन्दी अर्थ

जितने रोएँ होते हैं, उतने हजार वर्षोतक रुद्रलोकमें पूजित होते हैं। नराधिप! उस तीर्थमें जो मानव प्राणका अक्षयं मोदते कालं यावच्चन्द्रदिवाकरौ।

English

TBE MAT8YA PUUAlAM.

अध्याय १४६

श्लोक 11

स सप्तदिवसो बालो निजघ्ने तारकासुरम् एवं श्रुत्वा ततो वाक्यं तम् ऊचुर् ऋषिसत्तमाः

sa saptadivaso bālo nijaghne tārakāsuram evaṃ śrutvā tato vākyaṃ tam ūcur ṛṣisattamāḥ

हिन्दी अर्थ

सुरेश्वरं ततो गच्छेन्नाम्ना कर्कोटकेश्वरम् तुष्यते तस्य नन्दीशः सोमलोके महीयते। हुंकारिता तु व्यासेन दक्षिणेन ततो गता॥

English

Brahmft said: — Son! following our advice you have practised rigid austerities and your heart is purified and you have reaped the fruits of your truth." Saying so, BrahmA created a damsel with beautiful eyes and gave her to him ifor his wife. She was named VarAfigi by Brahinfi and afterwards the lattet returned to His abode. VajrAAga went with his wife to practise penances. That valiant Daitya practised penances for a thousand years with his hands uplifted. For another 1000 years, he practised penances with his head cast downwards; for another 1000 jears, he warmed himself with the fire burning all round him and observing complete fast. For another 1000 years, he practised penances sitting in water and at the saiiio time his wife seating herself on the bank of that lake also practised austerities by observing the vow of silence. She did not take any food and became deeply merged in tapasyA. In the course of her austerities Indi a appeared in the form of a very big monkey and terrified her. — 56-03.

अध्याय १४६

श्लोक 12

अत्याश्चर्यवती रम्या कथेयं पापनाशिनी विस्तरेण हि नो ब्रूहि याथातथ्येन शृण्वताम्

atyāścaryavatī ramyā katheyaṃ pāpanāśinī vistareṇa hi no brūhi yāthātathyena śṛṇvatām

हिन्दी अर्थ

अक्षयं मोदते कालं यावच्चन्द्रदिवाकरौ॥ क्रीडते ह्यक्षयं कालं यथा रुद्रस्तथैव च।

English

He began to make a noise by beating pi tellers and broke down cucumber gourds and jars, etc., and afterwards began tu terrify lier ii the form of a sheep and caused disturbances in the hermitage. Later on, he coiled round her legs in the form of a serpent and dragged her away to a great distance and made her go about at several places all over the world. The powerful lady was strong with lior tapasyn, so India could not kill her. Indra next assumed the form of a jackal foi a frog) and began to pollute her Ajlram. Indra, then, assumed the form of a cloud and drenched the monastery with rain and when India did not cease to cause her annoyance, the consort of the Daitya Vajra/iga thinking it to be the mischief of the mountniii slie made up her mind to curse him (the mountain) when the latter appeared before her, in liiirnan form, and said fearfully: — G4-G9.

अध्याय १४६

श्लोक 13

वज्राङ्गो नाम दैत्येन्द्रः कस्य वंशोद्भवः पुरा यस्याभूत्तारकः पुत्रः सुरप्रमथनो बली

vajrāṅgo nāma daityendraḥ kasya vaṃśodbhavaḥ purā yasyābhūttārakaḥ putraḥ surapramathano balī

हिन्दी अर्थ

ऐरण्डी त्रिषु लोकेषु विख्याता पापनाशिनी ब्राह्मणं भोजयेदेकं कोटिर्भवति भोजिता। मृत्तिकां शिरसि स्थाप्य ह्यवगाह्य च वै जलम्

English

" VArafigi! I am not wi(rkecl. 1 am worthy of being adored by everybody. It is Indra who out of wratli is trying to terrify you and bring you under various delusions."- 70.

अध्याय १४६

श्लोक 14

निर्मितः को वधे चाभूत् तस्य दैत्येश्वरस्य तु गुहजन्म तु कार्त्स्न्येन अस्माकं ब्रूहि मानद

nirmitaḥ ko vadhe cābhūt tasya daityeśvarasya tu guhajanma tu kārtsnyena asmākaṃ brūhi mānada

हिन्दी अर्थ

तत: सुवर्णसलिले स्नात्वा दत्त्वा तु काञ्जनम् काञ्चनेन विमानेन रुद्रलोके महीयते।

English

At this time, the period of tliousaml years was compleie; Brahma being pleased with tlieir austerities appearofl before them on the banks of the lake and said to Vajrafiga: " O, son of Diti! get up from the

अध्याय १४६

श्लोक 15

मानसो ब्रह्मणः पुत्रो दक्षो नाम प्रजापतिः षष्टिं सो ऽजनयत्कन्या वैरिण्यामेव नः श्रुतम्

mānaso brahmaṇaḥ putro dakṣo nāma prajāpatiḥ ṣaṣṭiṃ so 'janayatkanyā vairiṇyāmeva naḥ śrutam

हिन्दी अर्थ

ततः स्वर्गाच्च्युतः कालाद् राजा भवति वीर्यवान् परित्याग करता है, वह चन्द्र और सूर्यकी स्थितिपर्यन्त अक्षय कालतक आनन्दका अनुभव करता है। जो श्रेष्ठ मानव नर्मदाके तटपर निवास करते हैं, वे मरकर सन्त और पुण्यवान् व्यक्तियोंके समान स्वर्गमें जाते हैं । तदनन्तर कर्कोटकेश्वर नामसे प्रसिद्ध सुरेश्वरकी यात्रा करनी चाहिए। वहाँ पुण्यतिथिको गङ्गाका अवतरण होता है, इसमें संदेह नहीं है। तत्पश्चात् नन्दितीर्थमें जाय और वहाँ विधिपूर्वक स्नान करे। इससे उसपर नन्दीश्वर शिव

English

water; I shall grant you everything." Hearing those words, that Daitya ascetic got up from the water and with folded hands said to BrahraA, the Father of the Universe: — 71-73.

अध्याय १४६

श्लोक 16

ददौ स दश धर्माय कश्यपाय त्रयोदश सप्तविंशतिं सोमाय चतस्रो ऽरिष्टनेमये

dadau sa daśa dharmāya kaśyapāya trayodaśa saptaviṃśatiṃ somāya catasro 'riṣṭanemaye

हिन्दी अर्थ

प्रसन्न होते हैं और वह चन्द्रलोकमें पूजित होता है। तत्पश्चात् व्यासके तपोवन दीपेश्वर-तीर्थकी यात्रा करे। वहाँ प्राचीनकालमें व्याससे डरकर महानदी पीछेकी ओर लौटने लगी थी, तब व्यासके हुंकारसे वह दक्षिणकी ओर प्रवाहित हुई, नराधिप! उस तीर्थकी जो प्रदक्षिणा करता है, वह चन्द्र और सूर्यकी स्थितिपर्यन्त अक्षय कालतक आनन्दका उपभोग करता है। उसपर व्यासदेव प्रसन्न होते हैं और उसे अभीष्ट फलकी प्राप्ति होती है।

English

" Father! free me from the Asuric tendencies; ami grant me eternal region. Let me always practise austerities and lot my body be sustained." Hearing which Brahma said: " It will bo so " and then He returned

अध्याय १४६

श्लोक 17

द्वे वै बाहुकपुत्राय द्वे वै चाङ्गिरसे तथा द्वे कृशाश्वाय विदुषे प्रजापतिसुतः प्रभुः

dve vai bāhukaputrāya dve vai cāṅgirase tathā dve kṛśāśvāya viduṣe prajāpatisutaḥ prabhuḥ

हिन्दी अर्थ

वहाँ वेदीपर सूतसे परिवेष्टित दीपका दान करना चाहिए। ऐसा करनेसे मानव रुद्रकी तरह अक्षय कालतक आनन्दपूर्वक जीवनयापन करता है राजेन्द्र ! तदुपरान्त श्रेष्ठ ऐरण्डी-तीर्थकी यात्रा करनी चाहिए। ऐरण्डी नदी पापनाशकके रूपमें तीनों लोकोंमें विख्यात है। उसके सङ्गममें स्नान करनेसे मनुष्य सभी पातकोंसे मुक्त हो जाता है। अथवा यदि मनुष्य आश्विन- मासके शुक्लपक्षमें अष्टमी तिथिको स्नान करके पवित्र हो उपवासपूर्वक एक ब्राह्मणको भोजन करा दे तो उसे एक करोड़ ब्राह्मणोंको भोजन करानेका फल प्राप्त होता हैं। जो ऐरण्डी-संगममें भक्तिभावपूर्वक उसकी मिट्टीको

English

to His abode. Afterwards Vajrafiga also fiiiislied his course of austerities. He felt hungry and went to his monastery with the intention of taking some food; but he did not see his wife; he entered into the thick hill forest and came across his wife who was crying in a very distressed condition. He consoled her and addressed Imr thus: " O Dear! who has

अध्याय १४६

श्लोक 18

अदितिर्दितिर्दनुर्विश्वा ह्य् अरिष्टा सुरसा तथा सुरभिर्विनता चैव ताम्रा क्रोधवशा इरा

aditirditirdanurviśvā hy ariṣṭā surasā tathā surabhirvinatā caiva tāmrā krodhavaśā irā

हिन्दी अर्थ

सिरपर धारणकर नर्मदाके जलसे मिश्रित जलमें अवगाहनकर स्नान करता है, वह सभी पापॉसे छूट जाता है। नराधिप! जो उस तीर्थमें जाकर प्रदक्षिणा करता है, उसने मानो सात द्वीपोंवाली वसुन्धराकी परिक्रमा कर ली। तदनन्तर सुवर्णसलिल नामक तीर्थमें स्नानकर सुवर्णका दान करनेसे मनुष्य सुवर्णमय विमानसे जाकर रुद्रलोकमें पूजित होता है। फिर वह समयानुसार स्वर्गसे च्युत होनेपर पराक्रमी राजा होता है। राजेन्द्र! तत्पश्चात्

English

injured you? He will soon go to the region of Death. What desire of thine shall I fulfil, tell me instantly without reserve: — 74-77.

अध्याय १४६

श्लोक 19

कद्रूर्मुनिश्च लोकस्य मातरो गोषु मातरः तासां सकाशाल्लोकानां जङ्गमस्थावरात्मनाम्

kadrūrmuniśca lokasya mātaro goṣu mātaraḥ tāsāṃ sakāśāllokānāṃ jaṅgamasthāvarātmanām

हिन्दी अर्थ

क्षु नदीके सङ्गमपर जाना चाहिए। यह दिव्य तीर्थ तरैलोक्यविश्रुतं दिव्यं तत्र संनिहितः शिवः॥ ४९ तीनों लोकोंमे प्रसिद्ध है। वहाँ शिवजी सदा उपस्थित स्कन्दतीर्थं ततो गच्छेत् सर्वपापप्रणाशनम्

English

Here ends the one hwidred and forty-sixth chapter on the narrative of the Daitya Vajrdfiga.

अध्याय १४६

श्लोक 20

जन्म नानाप्रकाराणां ताभ्यो ऽन्ये देहिनः स्मृताः देवेन्द्रोपेन्द्रपूषाद्याः सर्वे ते दितिजा मताः

janma nānāprakārāṇāṃ tābhyo 'nye dehinaḥ smṛtāḥ devendropendrapūṣādyāḥ sarve te ditijā matāḥ

हिन्दी अर्थ

आजन्म जनितं पापं स्नानमात्राद् व्यपोहति। लिङ्गसारं ततो गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत् गोसहस्त्रफलं तस्य रुद्रलोके महीयते। भङ्गतीर्थं ततो गच्छेत् सर्वपापप्रणाशनम्

English

OBAPTBB OXLVL

अध्याय १४६

श्लोक 21

दितेः सकाशाल्लोकास्तु हिरण्यकशिपादयः दानवाश्च दनोः पुत्रा गावश्च सुरभीसुताः

diteḥ sakāśāllokāstu hiraṇyakaśipādayaḥ dānavāśca danoḥ putrā gāvaśca surabhīsutāḥ

हिन्दी अर्थ

सप्तजन्मकृतैः पापैर्मुच्यते नात्र संशयः वटेश्वरं ततो गच्छेत् सर्वतीर्थमनुत्तमम्। तत्र स्नात्वा नरो राजन् गोसहस्त्रफलं लभेत् संगमेशं ततो गच्छेत् सर्वदेवनमस्कृतम्। स्नानमात्रान्नरस्तत्र चेन्द्रत्वं लभते श्षुवम्

English

OBAPTBB OXLVL

अध्याय १४६

श्लोक 22

पक्षिणो विनतापुत्रा गरुडप्रमुखाः स्मृताः नागाः कद्रूसुता ज्ञेयाः शेषाश्चान्ये ऽपि जन्तवः

pakṣiṇo vinatāputrā garuḍapramukhāḥ smṛtāḥ nāgāḥ kadrūsutā jñeyāḥ śeṣāścānye 'pi jantavaḥ

हिन्दी अर्थ

कोटितीर्थं ततो गच्छेत् सर्वपापहरं परम् तत्र स्नात्वा नरो राज्यं लभते नात्र संशयः तस्य तीर्थप्रभावेण सर्व कोटिगुणं भवेत्

English

OBAPTBB OXLVL

अध्याय १४६

श्लोक 23

त्रैलोक्यनाथं शक्रं तु सर्वामरगणप्रभुम् हिरण्यकशिपुश्चक्रे जित्वा राज्यं महाबलः

trailokyanāthaṃ śakraṃ tu sarvāmaragaṇaprabhum hiraṇyakaśipuścakre jitvā rājyaṃ mahābalaḥ

हिन्दी अर्थ

अथ नारी भवेत् काचित्तत्र स्नानं समाचरेत्। गौरीतुल्या भवेत् सापि त्तविन्द्रपत्नी न संशयः स्नातमात्रो नरस्तत्र रुद्रलोके महीयते अक्षयं मोदते कालं शुचिः प्रयतमानसः

English

OBAPTBB OXLVL

अध्याय १४६

श्लोक 24

ततः केनापि कालेन हिरण्यकशिपादयः निहता विष्णुना संख्ये शेषाश्चेन्द्रेण दानवाः

tataḥ kenāpi kālena hiraṇyakaśipādayaḥ nihatā viṣṇunā saṃkhye śeṣāścendreṇa dānavāḥ

हिन्दी अर्थ

अक्षयं मोदते कालमवध्यसित्रिदशैरपि। विष्णुलोकं ततो गत्वा क्रीडते भोगसंयुतः रहते हैं। राजन्! वहाँ स्नान करनेसे मानव गणाधिपतिका स्थान प्राप्त कर लेता है । तदुपरान्त स्कन्द-तीर्थकी यात्रा करे। यह तीर्थ सभी पापोंका विनाशक है । यहाँ स्नान करनेमात्रसे मानव जन्मभरके किये हुए पापोंसे छूट जाता

English

OBAPTBB OXLVL

अध्याय १४६

श्लोक 25

ततो निहतपुत्राभूद् दितिर् वरमयाचत भर्तारं कश्यपं देवं पुत्रमन्यं महाबलम्

tato nihataputrābhūd ditir varamayācata bhartāraṃ kaśyapaṃ devaṃ putramanyaṃ mahābalam

हिन्दी अर्थ

हे। इसके बाद लिङ्गसार-तीर्थमें जाय और वहाँ स्नान करे। इससे उसे एक हजार गौओंके दानका फल मिलता है और वह रुद्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है। तदनन्तर सभी पापोंके विनाशक भङ्गतीर्थकी यात्रा करनी चाहिए। राजेन्द्र ! वहाँ जाकर स्नान करनेसे मानव सात जन्मोंमें किये गये पापाँसे मुक्त हो जाता है, इसमें संशय नहीं है तदनन्तर सभी तीर्थोमें श्रेष्ठ वटेश्वरतीर्थकी यात्रा करे। राजन्! वहाँ स्नान करनेसे मानव एक हजार गौओंके दानका फल प्राप्त करता है। तत्पश्चात् सभी देवोंद्वारा नमस्कृत सङ्गमेश-तीर्थमें जाय। वहाँ स्नान-

English

OBAPTBB OXLVL

अध्याय १४६

श्लोक 26

समरे शक्रहन्तारं स तस्या अददात्प्रभुः

samare śakrahantāraṃ sa tasyā adadātprabhuḥ

हिन्दी अर्थ

मात्रसे मनुष्य निश्चित ही इन्द्र-पदको प्राप्त करता है। इसके बाद सभी पापोंको नष्ट करनेवाले श्रेष्ठ कोटितीर्थकी यात्रा करे। वहाँ स्नानकर मनुष्य राज्यकी प्राप्ति करता है-इसमें संदेह नहीं है। उस तीर्थमें आकर जो मनुष्य दान देता है, उसका सब कुछ उस तीर्थके प्रभावसे करोड़गुना हो जाता है। यदि वहाँ कोई रत्री स्नान करती है तो वह निःसंदेह गौरी अथवा इन्द्र-पत्नी शचीके समान हो जाती है। इसके बाद अङ्गारेश-तीर्थकी यात्रा

English

OBAPTBB OXLVL

अध्याय १४६

श्लोक 27

नियमे वर्त हे देवि सहस्रं शुचिमानसा वर्षाणां लप्स्यसे पुत्रम् इत्युक्ता सा तथाकरोत्

niyame varta he devi sahasraṃ śucimānasā varṣāṇāṃ lapsyase putram ityuktā sā tathākarot

हिन्दी अर्थ

करके वहाँ स्नान करे। वहाँ स्नानमात्र करनेसे मनुष्य रुद्रलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। जो मनुष्य पवित्र एवं संयत-मन होकर अङ्गारक-चतुर्थीके दिन वहाँ स्नान करता है, वह अक्षय कालतक आनन्दका उपभोग करता है। अयोनिसम्भव नामक तीर्थमें स्नान करनेसे मनुष्यको योनिसंकटका दर्शन नहीं होता। वहीं पाण्डवेश- तीर्थ है, उसमें स्नान करना चाहिए। ऐसा करनेसे वह अनुभव करता है और मरणोपरान्त विष्णुलोकमें जाकर भोगसे परिपूर्ण हो क्रीड़ा करता है तथा वहाँ उत्तम भोगोंका भोग कर मृत्युलोकमें राजा होता है। इसके बाद उत्तरायण आनेपर कठेश्वर-तीर्थमें जाकर वहाँ स्नान

English

OBAPTBB OXLVL

अध्याय १४६

श्लोक 28

वर्तन्त्या नियमे तस्याः सहस्राक्षः समाहितः उपासामाचरत्तस्याः सा चैनमन्वमन्यत

vartantyā niyame tasyāḥ sahasrākṣaḥ samāhitaḥ upāsāmācarattasyāḥ sā cainamanvamanyata

हिन्दी अर्थ

करना चाहिए। ऐसा करनेसे मानव जो इच्छा करता है, वह उसे प्रास हो जाता है॥ ५४-६३ ई॥ राजन्! इसके बाद चन्द्रभागा नदीपर जाकर वहाँ स्नातमात्रो नरो राजन् सोमलोके महीयते। ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र तीर्थ शक्रस्य विश्रुतम्

English

OBAPTBB OXLVL

अध्याय १४६

श्लोक 29

दशवत्सरशेषस्य सहस्रस्य तदा दितिः उवाच शक्रं सुप्रीता वरदा तपसि स्थिता

daśavatsaraśeṣasya sahasrasya tadā ditiḥ uvāca śakraṃ suprītā varadā tapasi sthitā

हिन्दी अर्थ

पूजितं देवराजेन देवैरपि नमस्कृतम्। तत्र स्नात्वा नरो राजन् दानं दत्त्वा तु काञ्चनम् तावद्वर्षसहस्त्राणि नरो हरपुरे वसेत्। ततः स्वर्गात् परिश्रष्टो राजा भवति वीर्यवान् ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र ब्रह्मावर्तमनुत्तमम्। तत्र स्नात्वा नरो राजंस्तर्पयेत् पितृदेवताः

English

OBAPTBB OXLVL

अध्याय १४६

श्लोक 30

पुत्रोत्तीर्णव्रतां प्रायो विद्धि मां पाकशासन भविष्यति च ते भ्राता तेन सार्धमिमां श्रियम्

putrottīrṇavratāṃ prāyo viddhi māṃ pākaśāsana bhaviṣyati ca te bhrātā tena sārdhamimāṃ śriyam

हिन्दी अर्थ

उपोष्य रजनीमेकां पिण्डं दत्त्वा यथाविधि। कन्यागते तथाऽऽदित्ये अक्षयं स्यान्नराधिप तत्र स्नात्वा नरो राजन् सर्वयज्ञफलं लभेत्। तत्र सर्वोद्यतो राजा पृथिव्यामेव जायते

English

OBAPTBB OXLVL

अध्याय १४६

श्लोक 31

भुङ्क्ष्व वत्स यथाकामं त्रैलोक्यं हतकण्टकम् इत्युक्त्वा निद्रयाविष्टा चरणाक्रान्तमूर्धजा

bhuṅkṣva vatsa yathākāmaṃ trailokyaṃ hatakaṇṭakam ityuktvā nidrayāviṣṭā caraṇākrāntamūrdhajā

हिन्दी अर्थ

दरिद्रा व्याधिनो ये तु ये तु दुष्कृतकर्मिणः। मुच्यन्ते सर्वपापेभ्यः सूर्यलोकं तु यान्ति ते माघमासे तु सम्ग्रा्े शुक्लपक्षस्य सप्तमी। बसेदायतने तत्र निराहारो जितेन्द्रियः स्नान करे। वहाँ स्नानमात्रसे मनुष्य चन्द्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है। राजेन्द्र! इसके बाद इन्द्रके प्रसिद्ध तीर्थमें जाय। वह तीर्थ साक्षात् देवराजद्वारा पूजित तथा सम्पूर्ण देवताओंद्वारा वन्दित है। राजन्! वहाँ स्नानकर जो मनुष्य सुवर्णका

English

OBAPTBB OXLVL

अध्याय १४६

श्लोक 32

स्वयं सुष्वापानियता भाविनो ऽर्थस्य गौरवात् तत्तु रन्ध्रं समासाद्य जठरं पाकशासनः

svayaṃ suṣvāpāniyatā bhāvino 'rthasya gauravāt tattu randhraṃ samāsādya jaṭharaṃ pākaśāsanaḥ

हिन्दी अर्थ

दान देता है अथवा नीलवर्णवाले वृषभका उत्सर्ग करता है तो वह वृषभके शरीरमें जितने रोएँ होते हैं, उतने हजार वर्षोतक अपने कुलमें उत्पन्न संततिके साथ शिवपुरमें निवास करता है। इसके बाद स्वर्गसे गिरनेपर वह पराक्रमी राजा होता है। नराधिप! उस तीर्थके प्रभावसे मृत्युलोकमें आकर वह श्वेतवर्णवाले हजारों अश्वोंका स्वामी होता है। राजन्! तदनन्तर ब्रह्मावर्त नामक श्रेष्ठ तीर्थकी यात्रा करे। राजन्! उस तीर्थमें

English

OBAPTBB OXLVL

अध्याय १४६

श्लोक 33

चकार सप्तधा गर्भं कुलिशेन तु देवराट् एकैकं तु पुनः खण्डं चकार मघवा ततः

cakāra saptadhā garbhaṃ kuliśena tu devarāṭ ekaikaṃ tu punaḥ khaṇḍaṃ cakāra maghavā tataḥ

हिन्दी अर्थ

स्नानकर देवताओं और पितरोंका विधिवत् तर्पण करना चाहिए। नरेश्वर! सूर्यके कन्याराशिमें स्थित होनेपर जो वहाँ एक रात उपवास करके विधिपूर्वक पिण्डदान करता है, उसका वह कर्म अक्षय हो जाता है। राजेन्द्र ! तत्पश्चात् श्रेष्ठ कपिलातीर्थकी यात्रा करनी चाहिए । राजन्! उस तीर्थमें स्तानकर जो मनुष्य कपिला गौका दान करता है, उसे सम्पूर्ण पृथ्वीका दान करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वह मिल जाता है। नर्मदेश उत्तम तीर्थस्थान है। इसके समान तीर्थ न हुआ है, न होगा। राजन्! उस तीर्थमें स्तानकर मानव अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त करता है। नर्मदाके दक्षिण तटपर श्रेष्ठ सङ्गमेश्वर-तीर्थ है। राजन्! वहाँ स्नान करनेपर मनुष्य सभी यज्ञोंके फलको

English

OBAPTBB OXLVL

अध्याय १४६

श्लोक 34

सप्तधा सप्तधा कोपात् प्राबुध्यत ततो दितिः विबुध्योवाच मा शक्र घातयेथाः प्रजां मम

saptadhā saptadhā kopāt prābudhyata tato ditiḥ vibudhyovāca mā śakra ghātayethāḥ prajāṃ mama

हिन्दी अर्थ

प्राप्त करता है और वह पृथ्वीपर सभी प्रकारके उद्यमोंसे सम्पन्न, सभी शुभ लक्षणॉसे युक्त तथा सभी प्रकारकी व्याधियोंसे रहित राजा होता हैं नर्मदाके उत्तर तटपर अत्यन्त मनोहर आदित्यायतन नामक दिव्य तीर्थ है, ऐसा महादेवजीने कहा है। राजेन्द्र ! उस तीर्थमें स्नान करके जो यथाशक्ति दान देता है, उसका वह दान उस तीर्थके प्रभावसे अक्षय हो जाता

English

OBAPTBB OXLVL

अध्याय १४६

श्लोक 35

तच्छ्रुत्वा निर्गतः शक्रः स्थित्वा प्राञ्जलिरग्रतः उवाच वाक्यं संत्रस्तो मातुर्वै वदनेरितम्

tacchrutvā nirgataḥ śakraḥ sthitvā prāñjaliragrataḥ uvāca vākyaṃ saṃtrasto māturvai vadaneritam

हिन्दी अर्थ

है। जो दरिद्र, रोगग्रस्त और दुष्कर्मी हैं, वे भी (यहाँ स्नान करनेसे) सभी पापोंसे मुक्त होकर सूर्यलोकको चले जाते हैं। जो मनुष्य माघमासके शुक्लपक्षकी सप्तमी तिथि आनेपर इन्द्रियोंका संयम कर और निराहार रहकर इस आदित्यायतन तीर्थमें निवास करता है, वह न जराव्याधितो मूको न चान्धो बधिरो5थवा। सुभगो रूपसम्पन्नः स्त्रीणां भवति बल्लभ:

English

OBAPTBB OXLVL

अध्याय १४६

श्लोक 36

दिवास्वप्नपरा मातः पादाक्रान्तशिरोरुहा सप्तसप्तभिरेवातस् तव गर्भः कृतो मया

divāsvapnaparā mātaḥ pādākrāntaśiroruhā saptasaptabhirevātas tava garbhaḥ kṛto mayā

हिन्दी अर्थ

स्नातमात्रो नरस्तत्र स्वर्गलोकमवाप्नुयात् मोदते स्वर्गलोकस्थो यावदिन्दराश्चतुर्दश। समीपतः स्थितं तस्य नागेश्वरतपोवनम्

English

OBAPTBB OXLVL

अध्याय १४६

श्लोक 37

एकोनपञ्चाशत्कृता भागा वज्रेण ते सुताः दास्यामि तेषां स्थानानि दिवि दैवतपूजिते

ekonapañcāśatkṛtā bhāgā vajreṇa te sutāḥ dāsyāmi teṣāṃ sthānāni divi daivatapūjite

हिन्दी अर्थ

तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र नागलोकमवाप्नुयात्। बह्वीभिर्नागकन्याभिः क्रीडते कालमक्षयम् कालेश्वरं परं तीर्थं कुबेरो यत्र तोषितः काळनं तु ततो दद्याद् यथाशक्ति सुबुद्धिमान्

English

OBAPTBB OXLVL

अध्याय १४६

श्लोक 38

इत्युक्ता सा तदा देवी सैवमस्त्वित्यभाषत पुनश्च देवी भर्तारम् उवाचासितलोचना

ityuktā sā tadā devī saivamastvityabhāṣata punaśca devī bhartāram uvācāsitalocanā

हिन्दी अर्थ

पुष्पकेण विमानेन वायुलोकं स गच्छति। यवतीर्थं ततो गच्छेन्माघमासे युधिष्ठिर ८८ चैत्रमासे तु सम्प्राप्ते शुक्लपक्षे चतुर्दशी

English

OBAPTBB OXLVL

अध्याय १४६

श्लोक 39

पुत्रं प्रजापते देहि शक्रजेतारमूर्जितम् यो नास्त्रशस्त्रैर्वध्यत्वं गच्छेत्त्रिदिववासिनाम्

putraṃ prajāpate dehi śakrajetāramūrjitam yo nāstraśastrairvadhyatvaṃ gacchettridivavāsinām

हिन्दी अर्थ

कामदेवदिने तस्मिन्नहल्यां यस्तु पूजयेत्। यत्र यत्र नरोत्पन्नो नरस्तत्र प्रियो भवेत् स्त्रीवल्लभो भवेच्छीमान् कामदेव इवापरः। अयोध्यां तु समासाद्य तीर्थं रामस्य विश्रुतम् स्नातमात्रो नरस्तत्र सर्वपापैः प्रमुच्यते। सोमतीर्थं ततो गच्छेत् स्नानं तत्र समाचरेत्

English

OBAPTBB OXLVL

अध्याय १४६

श्लोक 40

इत्युक्तः स तथोवाच तां पत्नीमतिदुःखिताम् दश वर्षसहस्राणि तपः कृत्वा तु लप्स्यसे

ityuktaḥ sa tathovāca tāṃ patnīmatiduḥkhitām daśa varṣasahasrāṇi tapaḥ kṛtvā tu lapsyase

हिन्दी अर्थ

स्नातमात्रो नरस्तत्र सर्वपापैः प्रमुच्यते। सोमग्रहे तु राजेन्द्र पापक्षयकरं नृणाम् न तो वृद्धावस्था और रोगसे ही ग्रस्त होता है, न गूँगा, अंधा अथवा बहरा ही होता है, अपितु भाग्यशाली, रूपवान् और स्त्रियोंका प्रिय होता है। राजेन्द्र! इस प्रकार मार्कण्डेयजीने इस महान् पुण्यदायक तीर्थका

English

OBAPTBB OXLVL

अध्याय १४६

श्लोक 41

वज्रासारमयैर् अङ्गैर् अछेद्यैरायसैर् दृढैः वज्राङ्गो नाम पुत्रस्ते भविता पुत्रवत्सले

vajrāsāramayair aṅgair achedyairāyasair dṛḍhaiḥ vajrāṅgo nāma putraste bhavitā putravatsale

हिन्दी अर्थ

वर्णन किया था। जो उस तीर्थको नहीं जानते, वे निःसंदेह वञ्चित ही हैं । इसके बाद गर्गेश्वर-तीर्थमें जाकर वहाँ स्नान करे। वहाँ स्नान करनेसे ही मानव स्वर्गलोको प्राप्त कर लेता है और चौदह इन्द्रोंके कार्यकालतक वह स्वर्गमें आनन्दपूर्वक निवास करता है। राजेन्द्र! उसीके समीपमें नागेश्वर नामक तपोवन है। वहाँ स्नानकर मनुष्य नागलोकको प्राप्त करता है और अनेकों नागकन्याओंके साथ अक्षय कालतक क्रीडा करता है। तदनन्तर कुबेरभवनमें जाय, जहाँ कुबेर विराजमान रहते हैं। जहाँ कुबेर सन्तुष्ट हुए थे। वह कालेश्वर नामक उत्तम तीर्थ है। राजेन्द्र! इस तीर्थमें स्नान करनेसे मनुष्यको सभी सम्पत्तियाँ प्राप्त हो जाती हैं ॥ ७६-८५ ३॥

English

OBAPTBB OXLVL

अध्याय १४६

श्लोक 42

सा तु लब्धवरा देवी जगाम तपसे वनम् दश वर्षसहस्राणि सा तपो घोरमाचरत्

sā tu labdhavarā devī jagāma tapase vanam daśa varṣasahasrāṇi sā tapo ghoramācarat

हिन्दी अर्थ

तत्पश्चात् उससे पश्चिममें स्थित श्रेष्ठ मारुतालय- तीर्थकी यात्रा करनी चाहिए । राजेन्द्र! जो बुद्धिमान् वहाँ स्नान करके पवित्र हो सावधानीपूर्वक यथाशक्ति सुवर्णका दान करता है, वह पुष्पकविमानद्वारा वायुलोकको चला जाता है युधिष्ठिर! तदुपरान्त माघमासके कुष्णपक्षकी चतुर्दशी तिथिको यवतीर्थमें जाकर स्नान करे और रातमें ही भोजन करे। ऐसा करनेवाले पुरुषको पुनः योनिसंकटका दर्शन नहीं करना पड्ता। इसके बाद अहल्यातीर्थमें जाय

English

OBAPTBB OXLVL

अध्याय १४६

श्लोक 43

तपसो ऽन्ते भगवती जनयामास दुर्जयम् पुत्रमप्रतिकर्माणम् अजेयं वज्रदुश्छिदम्

tapaso 'nte bhagavatī janayāmāsa durjayam putramapratikarmāṇam ajeyaṃ vajraduśchidam

हिन्दी अर्थ

और वहाँ स्नान करे। वहाँ स्नानमात्र करनेसे मानव अप्सराओंके साथ आनन्दका उपभोग करता है। उस तीर्थमें अहल्याने तपस्या कर मुक्ति पायी थी। चैत्रमासके शुक्लपक्षको चतुर्दशी तिथि एवं सोमवारको जो मनुष्य वहाँ अहल्याकी पूजा करता है, वह जहाँ-जहाँ जन्म लेता है, वहाँ-वहाँ सभीका प्रिय होता है। वह दूसरे कामदेवके समान रित्रयोंका प्रियपात्र एवं श्रीसम्पन्न होता . है। श्रीरामके प्रसिद्ध तीर्थ अयोध्यामें आकर स्तानमात्र ! करनेसे मानव सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। इसके ' बाद सोमतीर्थकी यात्रा करे और वहाँ स्नान करे। वहाँ स्नानमात्र करनेसे मानव सभी पापोंसे छुटकारा पा जाता ' है। राजेन्द्र! चन्द्रग्रहणके अवसरपर स्नान करनेसे यही

English

OBAPTBB OXLVL

अध्याय १४६

श्लोक 44

स जातमात्र एवाभूत् सर्वशस्त्रास्त्रपारगः उवाच मातरं भक्त्या मातः किं करवाण्यहम्

sa jātamātra evābhūt sarvaśastrāstrapāragaḥ uvāca mātaraṃ bhaktyā mātaḥ kiṃ karavāṇyaham

हिन्दी अर्थ

तीर्थ मनुष्यके सभी पापोंको नष्ट कर देता है राजन्! त्रैलोक्यविश्रुतं राजन् सोमतीर्थं महाफलम्। सस्तु चान्द्रायणं कुर्यात् तस्मिस्तीर्थे नराधिप

English

OBAPTBB OXLVL

अध्याय १४६

श्लोक 45

तमुवाच ततो हृष्टा दितिर्दैत्याधिपं च सा बहवो मे हताः पुत्राः सहस्राक्षेण पुत्रक

tamuvāca tato hṛṣṭā ditirdaityādhipaṃ ca sā bahavo me hatāḥ putrāḥ sahasrākṣeṇa putraka

हिन्दी अर्थ

सर्वपापविशुद्धात्मा सोमलोकं स गच्छति। अग्निप्रवेशेऽथ जले अथवापि ह्यनाशके स्नातमात्रो नरस्तत्र गोलोके तु महीयते। ततो गच्छेच्च राजेन्द्र विष्णुतीर्थमनुत्तमम्॥ योधनीपुरमाख्यातं विष्णुस्थानमनुत्तमम्। असुरा योधितास्तत्र वासुदेवेन कोटिशः तत्र तीर्थ समुत्पन्नं विष्णुः प्रीतो भवेदिह। अहोरात्रोपवासेन ब्रह्महत्यां व्यपोहति

English

OBAPTBB OXLVL

अध्याय १४६

श्लोक 46

तेषां त्वं प्रतिकर्तुं वै गच्छ शक्रवधाय च बाढमित्येव तामुक्त्वा जगाम त्रिदिवं बली

teṣāṃ tvaṃ pratikartuṃ vai gaccha śakravadhāya ca bāḍhamityeva tāmuktvā jagāma tridivaṃ balī

हिन्दी अर्थ

ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र तापसेश्वरमुत्तमम्। हरिणी व्याधसंत्रस्ता पतिता यत्र सा मृगी ततो गच्छेत् तु राजेन्द्र ब्रह्मतीर्थमनुत्तमम्

English

OBAPTBB OXLVL

अध्याय १४६

श्लोक 47

बद्ध्वा ततः सहस्राक्षं पाशेनामोघवर्चसा मातुरन्तिकमागच्छद् व्याघ्रः क्षुद्रमृगं यथा

baddhvā tataḥ sahasrākṣaṃ pāśenāmoghavarcasā māturantikamāgacchad vyāghraḥ kṣudramṛgaṃ yathā

हिन्दी अर्थ

पौणमास्याममायां तु श्राद्धं कुर्याद यथाविधि ततो गच्छेच्च राजेन्द्र सिद्धेश्वरमनुत्तमम्। तत्र स्नात्वा नरो राजन् गणपत्यन्तिकं व्रजेत् तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र विष्णुलोके महीयते

English

OBAPTBB OXLVL

अध्याय १४६

श्लोक 48

एतस्मिन्नन्तरे ब्रह्मा कश्यपश्च महातपाः आगतौ तत्र यत्रास्तां मातापुत्रावभीतकौ

etasminnantare brahmā kaśyapaśca mahātapāḥ āgatau tatra yatrāstāṃ mātāputrāvabhītakau

हिन्दी अर्थ

कामदेवः स्वयं तत्र तपोऽतप्यत वै महत् महान् फल देनेवाला यह सोमतीर्थ तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध है। नराधिप! उस तीर्थमें जो चान्द्रायण-व्रत करता है, वह सभी पापोंसे विशुद्ध होकर सोमलोकको चला जाता है। जो अग्निमें प्रवेश कर, जलमें डूबकर

English

OBAPTBB OXLVL

अध्याय १४६

श्लोक 49

दृष्ट्वा तु तावुवाचेदं ब्रह्मा कश्यप एव च मुञ्चैनं पुत्र देवेन्द्रं किमनेन प्रयोजनम्

dṛṣṭvā tu tāvuvācedaṃ brahmā kaśyapa eva ca muñcainaṃ putra devendraṃ kimanena prayojanam

हिन्दी अर्थ

या भोजनका परित्याग कर इस सोमतीर्थमें प्राणका त्याग करता है, वह पुनः मृत्युलोकमें जन्म नहीं ग्रहण करता ॥८६--९७ ३॥ तदनन्तर शुभतीर्थमें जाय और वहाँ स्नान करे। वहाँ स्नान करनेमात्रसे मनुष्य गोलोकमें पूजित होता है। राजेन्द्र ! तत्पश्चात् सर्वोत्तम विष्णुतीर्थकी यात्रा करे। विष्णुका यह सर्वश्रेष्ठ स्थान योधनीपुरके नामसे प्रसिद्ध है। यहाँ भगवान् वासुदेवने करोड़ों असुरोंसे युद्ध किया था, इसी कारण यह तीर्थस्थान बन गया। यहाँ जानेसे विष्णु प्रसन्न होते हैं। यहाँ एक दिन-रात उपवास करनेसे यह ब्रह्महत्याके पापको नष्ट कर देता है । राजेन्द्र! तदुपरान्त

English

OBAPTBB OXLVL

अध्याय १४६

श्लोक 50

अपमानो वधः प्रोक्तः पुत्र संभावितस्य च अस्मद्वाक्येन यो मुक्तो विद्धि तं मृतमेव च

apamāno vadhaḥ proktaḥ putra saṃbhāvitasya ca asmadvākyena yo mukto viddhi taṃ mṛtameva ca

हिन्दी अर्थ

श्रेष्ठ तापसेश्वर तीर्थकी यात्रा करनी चाहिए, जहाँ व्याधके भयसे डरी हुई मृगी गिर पड़ी थी और जलमें शरीरका परित्याग कर अन्तरिक्षमें चली गयी थी। यह देखकर आश्चर्यचकित हुए व्याधको महान् विस्मय हुआ। इसी कारण इसका नाम तापेश्वरतीर्थ हुआ । इसके समान दूसरा तीर्थ न हुआ है, न होगा। राजेन्द्र! इसके बाद श्रेष्ठ ब्रह्मतीर्थकी यात्रा करनी चाहिए। यह तीर्थ अमोहक नामसे भी प्रसिद्ध है। यहाँ पितरोंका तर्पण तथा पूर्णिमा

English

OBAPTBB OXLVL

अध्याय १४६

श्लोक 51

परस्य गौरवान्मुक्तः शत्रूणां भारमावहेत् जीवन्नेव मृतो वत्स दिवसे दिवसे स तु

parasya gauravānmuktaḥ śatrūṇāṃ bhāramāvahet jīvanneva mṛto vatsa divase divase sa tu

हिन्दी अर्थ

और अमावस्याको यथाविधि श्राद्ध करना चाहिए। राजन्! वहाँ स्नान कर मनुष्यकों पितरोंको पिण्ड देना चाहिए। वहाँ जलमें गजके आकारकी एक शिला प्रतिष्ठित है। उसी शिलापर विशेषतया वैशाखकी पूर्णिमाको पिण्ड देना चाहिए । ऐसा करनेसे जबतक पृथ्वी स्थित रहती है, सिद्धेश्वर तीर्थकी यात्रा करे। राजन्! वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य गणपतिके समीप पहुँच जाता है ॥ ९८--१०८॥

English

OBAPTBB OXLVL

अध्याय १४६

श्लोक 52

महतां वशमायाते वैरं नैवास्ति वैरिणि एतच्छ्रुत्वा तु वज्राङ्गः प्रणतो वाक्यमब्रवीत्

mahatāṃ vaśamāyāte vairaṃ naivāsti vairiṇi etacchrutvā tu vajrāṅgaḥ praṇato vākyamabravīt

हिन्दी अर्थ

राजेन्द्र ! तत्पश्चात् जनार्दन-लिङ्गकी यात्रा करे । राजेन्द्र वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य विष्णुलोकमें पूजित होता है । नर्मदाके दक्षिण तटपर परम रमणीय कुसुमेश्वर तीर्थ है। वहाँ स्वयं कामदेवने कठोर तपस्या की थी। उसने एक ८०२ मत्स्यपुराण

English

OBAPTBB OXLVL

अध्याय १४६

श्लोक 53

न मे कृत्यमनेनास्ति मातुराज्ञा कृता मया त्वं सुरासुरनाथो ऽसि मम च प्रपितामहः

na me kṛtyamanenāsti māturājñā kṛtā mayā tvaṃ surāsuranātho 'si mama ca prapitāmahaḥ

हिन्दी अर्थ

दिव्यं वर्षसहस्त्रं तु शंकरं पर्युपासत। समाधिभङ्गदग्धस्तु शंकरेण महात्मना मोक्षयित्वा तु तान् सर्वान् नर्मदातटमास्थितः । ततस्तीर्थप्रभावेण पुनर्देवत्वमागताः ऊचुश्च परया भक्त्या देवदेवं वृषध्वजम्। त्वत्प्रसादान्महादेव तीर्थं भवतु चोत्तमम्। अर्धयोजनविस्तीर्ण क्षेत्रं दिक्षु समंततः

English

OBAPTBB OXLVL

अध्याय १४६

श्लोक 54

करिष्ये त्वद्वचो देव एष मुक्तः शतक्रतुः तपसे मे रतिर्देव निर्विघ्नं चैव मे भवेत्

kariṣye tvadvaco deva eṣa muktaḥ śatakratuḥ tapase me ratirdeva nirvighnaṃ caiva me bhavet

हिन्दी अर्थ

कुसुमायुधरूपेण रुद्रलोके महीयते वैश्वानरो यमश्चैव कामदेवस्तस्था मरुत्। तपस्तप्त्वा तु राजेन्द्र परां सिद्द्रिमवाप्नुयुः

English

OBAPTBB OXLVL

अध्याय १४६

श्लोक 55

त्वत्प्रसादेन भगवन्न् इत्युक्त्वा विरराम सः तस्मिंस्तूष्णीं स्थिते दैत्ये प्रोवाचेदं पितामहः

tvatprasādena bhagavann ityuktvā virarāma saḥ tasmiṃstūṣṇīṃ sthite daitye provācedaṃ pitāmahaḥ

हिन्दी अर्थ

अङ्कोलस्य समीपे तु नातिदूरे तु तस्य वै। स्नानं दानं च तत्रैव भोजनं पिण्डपातनम् अग्निप्रवेशेऽथ जले अथवा तु ह्यनाशके। अनिवर्तिका गतिस्तस्य मृतस्यामुत्र जायते त्र्यम्बकेण तु तोयेन यश्चरुं श्रपयेन्नरः। अङ्कोलमूले दत्त्वा तु पिण्डं चैव यथाविधि

English

OBAPTBB OXLVL

अध्याय १४६

श्लोक 56

तपस्त्वं क्रूरमापन्नो ह्य् अस्मच्छासनसंस्थितः अनया चित्तशुद्ध्या ते पर्याप्तं जन्मनः फलम्

tapastvaṃ krūramāpanno hy asmacchāsanasaṃsthitaḥ anayā cittaśuddhyā te paryāptaṃ janmanaḥ phalam

हिन्दी अर्थ

तृप्यन्ति पितरस्तस्य यावच्चन्द्रदिवाकरौ। उत्तरे त्वयने प्राते घृतस्नानं करोति यः पुरुषो वाथ स्त्री वापि वसेदायतने शुचिः। सिद्धेश्वरस्य देवस्य प्रातः पूजां प्रकल्पयेत्

English

OBAPTBB OXLVL

अध्याय १४६

श्लोक 57

इत्युक्त्वा पद्मजः कन्यां ससर्जायतलोचनाम् तामस्मै प्रददौ देवः पत्न्यर्थं पद्मसम्भवः

ityuktvā padmajaḥ kanyāṃ sasarjāyatalocanām tāmasmai pradadau devaḥ patnyarthaṃ padmasambhavaḥ

हिन्दी अर्थ

यदावतीर्णः कालेन रूपवान् सुभगो भवेत् मर्त्ये भवति राजा च त्वासमुद्रान्तगोचरे। क्षेत्रपालं न पश्येत् तु दण्डपाणिं महाबलम् वृथा तस्य भवेद् यात्रा हादृष्ठा कर्णकुण्डलम्। एवं तीर्थफलं ज्ञात्वा सर्वे देवा: समागताः।

English

OBAPTBB OXLVL

अध्याय १४६

श्लोक 58

वराङ्गीति च नामास्याः कृत्वा यातः पितामहः वज्राङ्गो ऽपि तया सार्धं जगाम तपसे वनम्

varāṅgīti ca nāmāsyāḥ kṛtvā yātaḥ pitāmahaḥ vajrāṅgo 'pi tayā sārdhaṃ jagāma tapase vanam

हिन्दी अर्थ

हजार दिव्य वर्षोतक शंकरकी सर्वभावसे उपासना की थी, किंतु महात्मा शंकरकी समाधिके भङ्ग होनेसे वह भस्म हो गया। इसी प्रकार कुसुमेश्वरमें स्थित श्वेतपर्वा, जल गये थे। एक हजार दिव्य वर्षोतक तपस्या करनेपर महेश्वर इनपर प्रसन्न हुए। इस प्रकार प्रसन्न हुए उमासहित रुद्रने इन्हें वर प्रदान किया। तब इन लोगोंको मोक्ष प्रदानकर वे नर्मदाके तटपर प्रतिष्ठित हो गये। तदनन्तर

English

OBAPTBB OXLVL

अध्याय १४६

श्लोक 59

ऊर्ध्वबाहुः स दैत्येन्द्रो ऽचरदब्दसहस्रकम् कालं कमलपत्त्राक्षः शुद्धबुद्धिर् महातपाः

ūrdhvabāhuḥ sa daityendro 'caradabdasahasrakam kālaṃ kamalapattrākṣaḥ śuddhabuddhir mahātapāḥ

हिन्दी अर्थ

उस तीर्थके प्रभावसे उन लोगोंको पुनः देवत्व प्राप्त हो गया, तब उन्होंने अतिशय भक्तिके साथ देवाधिदेव वृषभध्वजसे कहा--' महादेव ! आपकी कृपासे दिशाओंमें चारों ओर आधा योजन विस्तृत यह क्षेत्र उत्तम तीर्थ हो जाय।' उस तीर्थमें उपवासपूर्वक स्नानकर मनुष्य कामदेवके रूपमें रुद्रलोकमें पूजित होता है राजेन्द्र! यहाँ वैश्वानर, यम, कामदेव और मरुत्ने तपस्या कर परम सिद्धि प्राप्त की थी। उस तीर्थसे थोड़ी दूरपर अंकोलके समीप स्नान, दान, भोजन तथा पिण्डदान करना चाहिए। यहाँ अग्निमें जलकर, जलमें डूबकर या

English

OBAPTBB OXLVL

अध्याय १४६

श्लोक 60

तावच्चावाङ्मुखः कालं तावत्पञ्चाग्निमध्यगः निराहारो घोरतपास् तपोराशिरजायत

tāvaccāvāṅmukhaḥ kālaṃ tāvatpañcāgnimadhyagaḥ nirāhāro ghoratapās taporāśirajāyata

हिन्दी अर्थ

अनशन करके प्राण-त्याग करनेवालेको परलोकमें अपुनर्भवको गति प्राप्त होती है । जो व्यक्ति त्र्यम्बकतीर्थके जलसे चरु पकाकर अङ्कोलके मूलमें विधिपूर्वक पिण्डदान करता है, उसके पितृगण चन्द्र और सूर्यकी स्थितिपर्यन्त तृप्त रहते हैं। उत्तरायण आनेपर चाहे पुरुष हो या स्त्री- जो कोई भी घृतसे स्नान करता है और पवित्र होकर उस आयतनमें निवास करता है तथा प्रातःकाल सिद्धेश्वरदेवकी पूजा करता है, वह जिस गतिको प्राप्त

English

OBAPTBB OXLVL

अध्याय १४६

श्लोक 61

ततः सो ऽन्तर्जले चक्रे कालं वर्षसहस्रकम् जलान्तरं प्रविष्टस्य तस्य पत्नी महाव्रता

tataḥ so 'ntarjale cakre kālaṃ varṣasahasrakam jalāntaraṃ praviṣṭasya tasya patnī mahāvratā

हिन्दी अर्थ

करता है, वह सभी यज्ञोंके करनेसे भी नहीं प्राप्त हो सकती। कालगतिसे पुनः जब वह मृत्युलोकमें जन्म ग्रहण करता है, तब सौभाग्यशाली एवं रूपसे सम्पन्न होकर समुद्रपर्यन्त पृथ्वीका राजा होता है। जो यहाँ आकर महाबली दण्डपाणि क्षेत्रपालका दर्शन नहीं करता और कर्णकुण्डलको नहीं देखता, उसकी यात्रा व्यर्थ हो जाती है। इस प्रकार तीर्थके फलको जानकर सभी देवगण वहाँ उपस्थित होकर कुसुमोंकी वृष्टि करने लगे, इसीसे मुञ्चन्ति कुसुमैर्वृष्टिं तेन तत् कुसुमेश्वरम्॥ १२५ यह कुसुमेश्वर नामसे विख्यात हुआ

English

OBAPTBB OXLVL

अध्याय १४६

श्लोक 62

तस्यैव तीरे सरसस् तत्प्रीत्या मौनमास्थिता निराहारा तपो घोरं प्रविवेश महाद्युतिः

tasyaiva tīre sarasas tatprītyā maunamāsthitā nirāhārā tapo ghoraṃ praviveśa mahādyutiḥ

हिन्दी अर्थ

इति श्रीमत्स्ये महापुराणे नर्मदामाहात्म्ये एकनवत्यधिकशततमोऽध्यायः इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके नर्मदामाहात्म्य-वर्णनमें एक सौ इक्यानबेवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ

English

OBAPTBB OXLVL

अध्याय १४६

श्लोक 63

तस्यां तपसि वर्तन्त्याम् इन्द्रश्चक्रे विभीषिकाम् भूत्वा तु मर्कटस्तत्र तदाश्रमपदं महान्

tasyāṃ tapasi vartantyām indraścakre vibhīṣikām bhūtvā tu markaṭastatra tadāśramapadaṃ mahān

हिन्दी अर्थ

शुक्लतीर्थका माहात्म्य हुंकारितास्तु देवेन दानवाः प्रलयं गताः। तत्र स्नात्वा तु राजेन्द्र सर्वपापैः प्रमुच्यते तरुणादित्यसंकाशे तप्तकाञ्जनसप्रभे। वञ्चस्फटिकसोपाने चित्रपडशिलातले

English

OBAPTBB OXLVL

अध्याय १४६

श्लोक 64

चक्रे विलोलं निःशेषं तुम्बीघटकरण्डकम् ततस्तु मेघरूषेण कम्पं तस्याकरोन्महान्

cakre vilolaṃ niḥśeṣaṃ tumbīghaṭakaraṇḍakam tatastu megharūṣeṇa kampaṃ tasyākaronmahān

हिन्दी अर्थ

तत्रासीनं महादेवं सर्वज्ञं प्रभुमव्ययम् लोकानुग्रहकर्तारं गणवृन्हैः समावृतम्। स्कन्दनन्दिमहाकालैर्वीरभद्रगणादिभिः । उमया सहितं देवं मार्कण्डिः पर्यपृच्छत

English

OBAPTBB OXLVL

अध्याय १४६

श्लोक 65

ततो भुजंगरूपेण बद्ध्वा च चरणद्वयम् अपाकर्षत्ततो दूरं भ्रमंस्तस्या महीमिमाम्

tato bhujaṃgarūpeṇa baddhvā ca caraṇadvayam apākarṣattato dūraṃ bhramaṃstasyā mahīmimām

हिन्दी अर्थ

देवदेव महादेव ब्रह्मविष्ण्वन्द्रसंस्तुत। संसारभयभीतोऽहं सुखोपायं ब्रवीहि मे भगवन् भूतभव्येश सर्वपापप्रणाशनम्। स्नानाय गच्छ सुभगं ऋषिसङ्गैः समावृतः

English

OBAPTBB OXLVL

अध्याय १४६

श्लोक 66

तपोबलाढ्या सा तस्य न वध्यत्वं जगाम ह ततो गोमायुरूपेण तस्यादूषयदाश्रमम्

tapobalāḍhyā sā tasya na vadhyatvaṃ jagāma ha tato gomāyurūpeṇa tasyādūṣayadāśramam

हिन्दी अर्थ

यमापस्तम्बसंवर्ताः कात्यायनबृहस्पती नारदो गौतमश्चैव सेवन्ते धर्मकाङ्किणः। गङ्गा कनखले पुण्या प्रयागं पुष्करं गयाम्

English

OBAPTBB OXLVL

अध्याय १४६

श्लोक 67

ततस्तु मेघरूपेण तस्याः क्लेदयदाश्रमम् भीषिकाभिर् अनेकाभिस् तां क्लिश्यन्पाकशासनः

tatastu megharūpeṇa tasyāḥ kledayadāśramam bhīṣikābhir anekābhis tāṃ kliśyanpākaśāsanaḥ

हिन्दी अर्थ

कुरुक्षेत्रं महापुण्यं राहुग्रस्ते दिवाकरे भार्गवेशतीर्थकी यात्रा करनी चाहिए। वहाँ एक बार भगवान् जनार्दन महायुद्धमें महाबली असुरोंके साथ युद्ध करते-करते थक गये, फिर उन प्रभुके हुंकारसे ही दानवगण नष्ट हो गये थे। वहाँ स्नान करनेसे मानव सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है। पाण्डुनन्दन! अब आप शुक्लतीर्थको उत्पत्ति सुनिये। किसी समय विविध धातुओंसे रंग-बिरंगे हिमवान् पर्वतके मनोरम शिखरपर, जो मध्याहकालिक सूर्यके समान देदीप्यमान, तपाये हुए

English

OBAPTBB OXLVL

अध्याय १४६

श्लोक 68

विरराम यदा नैवं वज्राङ्गमहिषी तदा शैलस्य दुष्टतां मत्वा शापं दातुं व्यवस्थिता

virarāma yadā naivaṃ vajrāṅgamahiṣī tadā śailasya duṣṭatāṃ matvā śāpaṃ dātuṃ vyavasthitā

हिन्दी अर्थ

सोनेकी प्रभासे युक्त, हीरक और स्फटिककी सीढ़ियोंसे सुशोभित था, एक दिव्य सुवर्णमय तथा अनेक पुष्पोंसे लोकोंपर अनुग्रह करनेवाले महादेव स्कन्द, नन्दी, महाकाल, वीरभद्र आदि गणों तथा अन्यान्य गणसमूहोंसे घिरे हुए उमाके साथ बैठे हुए थे। उसी समय मार्कण्डेयजीने उनसे पूछा--' ब्रह्मा, विष्णु और इन्द्रसे वन्दित, देवाधिदेव

English

OBAPTBB OXLVL

अध्याय १४६

श्लोक 69

स शापाभिमुखां दृष्ट्वा शैलः पुरुषविग्रहः उवाच तां वरारोहां वराङ्गीं भीरुचेतनः

sa śāpābhimukhāṃ dṛṣṭvā śailaḥ puruṣavigrahaḥ uvāca tāṃ varārohāṃ varāṅgīṃ bhīrucetanaḥ

हिन्दी अर्थ

महादेव! मैं संसार-भयसे भीत हुँ, मुझे सुखका साधन बतलाइये । ऐश्वर्यशाली महेश्वर! आप भूत और भविष्यके स्वामी हैं, अत: जो सभी पापोंका विनाशक एवं तीर्थोमें श्रेष्ठ हो, वह तीर्थ मुझे बतलाइये भगवान् शंकरने कहा-महाबुद्धिमान् विप्र! तुम बात सुनो और ऋषियोंके साथ स्नान करनेके लिये शुक्लतीर्थमें जाओ । मनु, अत्रि, कश्यप, याज्ञवल्क्य, उशना, अङ्गिरा, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, नारद और गौतम-ये ऋषिगण धर्मकी अभिलाषासे युक्त

English

OBAPTBB OXLVL

अध्याय १४६

श्लोक 70

नाहं वराङ्गने दुष्टः सेव्यो ऽहं सर्वदेहिनाम् विभ्रमं तु करोत्येष रुषितः पाकशासनः

nāhaṃ varāṅgane duṣṭaḥ sevyo 'haṃ sarvadehinām vibhramaṃ tu karotyeṣa ruṣitaḥ pākaśāsanaḥ

हिन्दी अर्थ

हो उसी तीर्थका सेवन करते हैं। गङ्गा कनखलमें पुण्यको देनेवाली है, सूर्यग्रहणके समय प्रयाग, पुष्कर, गया और कुरुक्षेत्र विशिष्ट पुण्यदायक हो जाते हैं, किंतु शुक्लतीर्थ

English

OBAPTBB OXLVL

अध्याय १४६

श्लोक 71

एतस्मिन्नन्तरे जातः कालो वर्षसहस्रिकः तस्मिन्गते तु भगवान् काले कमलसंभवः तुष्टः प्रोवाच वज्राङ्गं तमागम्य जलाश्रयम्

etasminnantare jātaḥ kālo varṣasahasrikaḥ tasmingate tu bhagavān kāle kamalasaṃbhavaḥ tuṣṭaḥ provāca vajrāṅgaṃ tamāgamya jalāśrayam

हिन्दी अर्थ

दिवा वा यदि वा रात्रौ शुक्लतीर्थं महाफलम्॥ १२ दिन या रात--सभी समय महान् पुण्यफल देनेवाला है। शुक्लतीर्थं महापुण्यं सर्वपापप्रणाशनम् पादपाग्रेण दुष्टेन ब्रह्महत्यां व्यपोहति। जगतीदर्शनाच्चैव भ्रूणहत्यां व्यपोहति

English

OBAPTBB OXLVL

अध्याय १४६

श्लोक 72

ददामि सर्वकामांस्ते उत्तिष्ठ दितिनन्दन एवमुक्तस्तदोत्थाय दैत्येन्द्रस्तपसां निधिः उवाच प्राञ्जलिर्वाक्यं सर्वलोकपितामहम्

dadāmi sarvakāmāṃste uttiṣṭha ditinandana evamuktastadotthāya daityendrastapasāṃ nidhiḥ uvāca prāñjalirvākyaṃ sarvalokapitāmaham

हिन्दी अर्थ

अहे तत्र ऋषिश्रेष्ठ तिष्ठामि ह्युमया सह। वैशाखे चैत्रमासे तु कृष्णपक्षे चतुर्दशी कैलासाच्चापि निष्क्रम्य तत्र संनिहितो ह्यहम्। हैत्यदानवगन्धर्वाः सिद्धविद्याधरास्तथा

English

OBAPTBB OXLVL

अध्याय १४६

श्लोक 73

आसुरो मास्तु मे भावः सन्तु लोका ममाक्षयाः तपस्येव रतिर् मेऽस्तु शरीरस्यास्तु वर्तनम्

āsuro māstu me bhāvaḥ santu lokā mamākṣayāḥ tapasyeva ratir me'stu śarīrasyāstu vartanam

हिन्दी अर्थ

गणाश्चाप्सरसो नागा: सर्वे देवा: समागताः । गगनस्थास्तु तिष्ठन्ति विमानैः सार्वकामिकैः शुक्लतीर्थं तु राजेन्द्र ह्यागता धर्मकाङ्किणः रजकेन यथा वस्त्रं शुक्लं भवति वारिणा आजन्मजनितं पापं शुक्लं तीर्थं व्यपोहति। स्नानं दानं महापुण्यं मार्कण्ड ऋषिसत्तम

English

OBAPTBB OXLVL

अध्याय १४६

श्लोक 74

एवमस्त्विति तं देवो जगाम स्वकमालयम् वज्राङ्गो ऽपि समाप्ते तु तपसि स्थिरसंयमः

evamastviti taṃ devo jagāma svakamālayam vajrāṅgo 'pi samāpte tu tapasi sthirasaṃyamaḥ

हिन्दी अर्थ

पूर्वे वयसि कर्माणि कृत्वा पापानि मानव: अहोरात्रोपवासेन शुक्लतीर्थे व्यपोहति। तपसा ब्रह्मचर्येण यज्ञेदानिन वा पुन:

English

OBAPTBB OXLVL

अध्याय १४६

श्लोक 75

आहारमिच्छन्भार्यां स्वां न ददर्शाश्रमे स्वके क्षुधाविष्टः स शैलस्य गहनं प्रविवेश ह

āhāramicchanbhāryāṃ svāṃ na dadarśāśrame svake kṣudhāviṣṭaḥ sa śailasya gahanaṃ praviveśa ha

हिन्दी अर्थ

देवार्चनेन या पुष्टिर्न सा क्रतुशतैरपि। कार्तिकस्य तु मासस्य कृष्णपक्षे चतुर्दशी घृतेन स्नापयेद् देवमुपोष्य परमेश्वरम्। एकविंशत्कुलोपेतो न च्यवेहैश्वरात् पदात् यह शुक्लतीर्थ दर्शन, स्पर्श, स्नान, दान, तप, जप, हवन और उपवास करनेसे महान् फलदायक होता है। यह महान् पुण्यदायक शुक्लतीर्थ नर्मदामें अवस्थित है। चाणक्य नामक राजर्षिने यहीं सिद्धि प्राप्त की थी। यह

English

OBAPTBB OXLVL

अध्याय १४६

श्लोक 76

आदातुं फलमूलानि स च तस्मिन्व्यलोकयत् रुदतीं तां प्रियां दीनां तनुप्रच्छादिताननाम् तां विलोक्य स दैत्येन्द्रः प्रोवाच परिसान्त्वयन्

ādātuṃ phalamūlāni sa ca tasminvyalokayat rudatīṃ tāṃ priyāṃ dīnāṃ tanupracchāditānanām tāṃ vilokya sa daityendraḥ provāca parisāntvayan

हिन्दी अर्थ

विशाल क्षेत्र एक योजन परिमाणका गोलाकार है। यह शुक्लतीर्थं महापुण्यको प्रदान करनेवाला और सम्पूर्ण पापोंका नाशक है। यह यहाँ स्थित वृक्षके अग्रभागको भ्रूणहत्याके पापको नष्ट कर देता है। ऋषिश्रष्ठ! मैं वहाँ उमाके साथ निवास करता हूँ । चैत्र तथा वैशाख- मासके कृष्णपक्षकी चतुर्दशी तिथिको मैं कैलाससे भी आकर यहाँ उपस्थित रहता हूँ॥ ९-१७ ३॥

English

OBAPTBB OXLVL

अध्याय १४६

श्लोक 77

केन ते ऽपकृतं भीरु यमलोकं यियासुना कं वा कामं प्रयच्छामि शीघ्रं मे ब्रूहि भामिनि

kena te 'pakṛtaṃ bhīru yamalokaṃ yiyāsunā kaṃ vā kāmaṃ prayacchāmi śīghraṃ me brūhi bhāmini

हिन्दी अर्थ

राजेन्द्र! हैत्य, दानव, गन्धर्व, सिद्ध, विद्याधर, गण, अप्सराएँ और नाग-ये सभी देवगण आकर सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले विमानोंपर आरूढ़ हो गगनमें स्थित रहते हैं। धर्मकी अभिलाषा रखनेवाले ये सभी शुक्लतीर्थमें आते हैं; क्योंकि जैसे धोबी मलिन वस्त्रको जलसे धोकर उज्वल कर देता है, उसी तरह शुक्लतीर्थं जन्मसे लेकर तबतकके किये गये पापोंको नष्ट कर देता है। ऋषिश्रेष्ठ मार्कण्डेय! यहाँका स्नान और दान महान् पुण्यफलको देनेवाले होते हैं। शुक्लतीर्थसे श्रेष्ठ तीर्थ न हुआ है और न होगा। मानव बचपनमें किये गये पाप-कर्मोको शुक्लतीर्थमें एक दिन-रात उपवास करके नष्ट कर देता है। यहाँ

English

OBAPTBB OXLVL

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_matsyapurANa1-176.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Matsya Purana — Chapter 146
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

Digitised text taken from the archive linked below. It has not been collated against a printed edition by this site.

पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

Numbering follows the imported source and may differ from other editions.