अध्याय १४८
श्लोक 1
मत्स्य-पुराण १४८ शृणुध्वमसुराः सर्वे वाक्यं मम महाबलाः श्रेयसे क्रियतां बुद्धिः सर्वैः कृत्यस्य संविधौ
matsya-purāṇa 148 śṛṇudhvamasurāḥ sarve vākyaṃ mama mahābalāḥ śreyase kriyatāṃ buddhiḥ sarvaiḥ kṛtyasya saṃvidhau
हिन्दी अर्थ
प्रकार बोले--' भो वृष! तुम कहाँ जा रहे हो? वृष! अभी मैं क्रोधके बलसे तुम्हारा संहार कर डालता हूँ।' तब वह वृषभ उस विप्रको परास्तकर आकाशमें चला गया। उसे आकाशमें देखते हुए भृगु सोचने लगे-'यह तो महान् आश्चर्य है ।' इतनेमें ही वहाँ भगवान् रुद्र हँसते हुए ऋषिके सम्मुख उपस्थित हो गये। तब तृतीय नेत्रधारी रुद्रको देखकर भृगु व्याकुल होकर पृथ्वीपर गिर पड़े और दण्डके समान भूमिपर लेटकर प्रणाम कर भगवान् शंकरकी स्तुति करने लगे
English
All these Riis of the Brigu vaina are most illustrioas. They are the promoters of the clan. By the mere mention of their name all the sins are dispelled. — 46.