Matsya Purana· Matsya Purāṇa
156
अध्याय 156 / 176

Adhyaya 156

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अध्याय १५६

श्लोक 1

मत्स्य-पुराण १५६ देवीं सापश्यद् आयान्तीं सखीं मातुर्विभूषिताम् कुसुममोदिनीं नाम तस्य शैलस्य देवताम्

matsya-purāṇa 156 devīṃ sāpaśyad āyāntīṃ sakhīṃ māturvibhūṣitām kusumamodinīṃ nāma tasya śailasya devatām

हिन्दी अर्थ

भक्षयिष्याम्यहं घोरं कालकूटं महाविषम्। सुरा ब्रह्मादयः सर्वे समाश्वस्ताः सुमानसाः

English

Thou art void of affection like Thy ashes. Thy heart is more vilified than Moon by Her spot. Thou art inferior even to this bull in under- standing. What is the use of talking more. Thou art fearless by living in tho cremation ground. Thori art shameless, because, Thou art naked.. Thou dost not dislike disguishing things on account of Thy constantly wearing skulls and mercy has left Thee once for all." — 21-23.

अध्याय १५६

श्लोक 2

सापि दृष्ट्वा गिरिसुतां स्नेहविक्लवमानसा क्व पुत्रि गच्छसीत्युच्चैर् आलिङ्ग्योवाच देवता

sāpi dṛṣṭvā girisutāṃ snehaviklavamānasā kva putri gacchasītyuccair āliṅgyovāca devatā

हिन्दी अर्थ

आसाद्य दुग्धसिन्धुं त॑ कालकूटं विषं यतः। ततो देवो महादेवो विलोक्य विषमं विषम् पीयमाने विषे तस्मिंस्ततो देवा महासुराः भगवन्! जिस प्रकार अभागोंके अर्थ भी अनर्थके कारण बन जाते हैं तथा आपत्तिकालमें दुर्बलोंके संकल्प विपरीत फल देनेवाले हो जाते हैं, उसी प्रकार अमृतकी अभिलाषासे युक्त हमलोगोंके लिये यह विष उत्पन्न हुआ है। अतः

English

Sfita said: — With these words, P&rvati left that place. At that time, the attendants of Siva made a noise and Virabhadra running up to her said, crying, 0 Mother! where are you going leaving us alone? Saying so, he threw himself round Her feet and said: — " 0 Mother! what has happened? Where are you going so angrily? If you go away so ruth- lessly I will follow you; else, forsaken by you, I will throw myself down from the peak of the mountain where you may practise penances." — 24 27.

अध्याय १५६

श्लोक 3

सा चास्यै सर्वमाचख्यौ शंकरात्कोपकारणम् पुनश्चोवाच गिरिजा देवतां मातृसंमताम्

sā cāsyai sarvamācakhyau śaṃkarātkopakāraṇam punaścovāca girijā devatāṃ mātṛsaṃmatām

हिन्दी अर्थ

आप इस भयसे हमलोगोंको मुक्त कीजिये, आप ही एकमात्र हम सबके शरणदाता हैं। आप भक्तोंपर अनुकम्पा करनेवाले, मनके भावोंके ज्ञाता, सभी भुवनोंके ईश्वर, सर्वव्यापक, यज्ञोंमें सर्वप्रथम भाग ग्रहण करनेवाले, सकल हवनीय द्रव्यस्वरूप, सौम्य, उमाके साथ स्थित और कामदेवके विनाशक हैं देवताओंका कल्याण करनेवाले देव! एकमात्र आप ही हमलोगोंके शरणदाता हैं। विरूपाक्ष! (सबको) खा लेनेके विचारवाले इस विषके कष्टसे हमलोगोंकी

English

On his having thus spoken to P&rvati, She said after fondling him with her right arm, " Son! do not be sorry. You should not throw your- self down from the mountain nor should you accompany me. Son! I tell you what you ought to do. iva has despised me by calling me KrispS (black), so I shall practise austerities in order that I may become fair complexiniied. This fiva is desirous of women. After 1 go away you should keep guard at the gate so that no other woman might come. Son! If you find any other woman coming in do report it to me and I shall at once arrange about it." — 28-33.

अध्याय १५६

श्लोक 4

नित्यं शैलाधिराजस्य देवता त्वमनिन्दिते सर्वतः संनिधानं ते मम चातीव वत्सला

nityaṃ śailādhirājasya devatā tvamanindite sarvataḥ saṃnidhānaṃ te mama cātīva vatsalā

हिन्दी अर्थ

रक्षा कीजिये। यह सुनकर भगदेवताके नेत्रोंका विनाश करनेवाले भगवान् शंकरने कहा देवाधिदेव बोले देवासुरगण! मैं उस कालकूट नामक महान् भयंकर विषको तो पी ही जाऊँगा, इसके अतिरिक्त तुमलोगोंका जो कोई अन्य भी कष्टसाध्य कार्य होगा, उसे भी सिद्ध कर दूँगा, तुम लोग चिन्तारहित हो जाओ। इस प्रकार कहे जानेपर ब्रह्मा आदि सभी देवताओंका मन प्रसन्न हो गया, वे भलीभाँति आश्वस्त हो गये, उनके शरीर रोमाञ्चित हो उठे, कण्ठ आँसुओंसे गद्गद हो गये, नेत्रॉंमें आनन्दाश्रु छलक आये और वे उस समय अपनेको

English

Hearing that, Virabhadra said " I shall do as you say "; and then he cheerfully set himself to caiTy out the injunctions of his mother, after duly saluting Her. — 34-35.

अध्याय १५६

श्लोक 5

अतस्तुते प्रवक्ष्यामि यद्विधेयं तदा धिया अन्यस्त्रीसंप्रवेशस्तु त्वया रक्ष्यः प्रयत्नतः

atastute pravakṣyāmi yadvidheyaṃ tadā dhiyā anyastrīsaṃpraveśastu tvayā rakṣyaḥ prayatnataḥ

हिन्दी अर्थ

सनाथ मानने लगे। तदनन्तर जगत्पति भगवान् शंकर वेगशाली नन्दिकेश्वरपर आरूढ़ होकर वायुके समान वेगसे आकाशमार्गसे उस ओर चले। उस समय असुरों तथा सुरोके अधिपतिगण अपने-अपने वाहनोंपर आरूढ़ हो चमर डुलाते हुए उनके आगे-आगे दौड़ रहे थे। इस प्रकार अग्निको ज्चालासे भूरे रंगवाली जरासे युक्त इन्द्रियजयी भगवान् शिव मङ्गलके आधारस्वरूप उन देवताओंके साथ शोभायमान हो रहे थे। तदनन्तर वे जहाँसे कालकूट विष

English

Here ends the one hundred aad fifty fifth chapter on Kumara Sambhava {the birth of Kdrtikeya).

अध्याय १५६

श्लोक 6

रहस्यत्र प्रयत्नेन चेतसा सततं गिरौ पिनाकिनः प्रविष्टायां वक्तव्यं मे त्वयानघे

rahasyatra prayatnena cetasā satataṃ girau pinākinaḥ praviṣṭāyāṃ vaktavyaṃ me tvayānaghe

हिन्दी अर्थ

उत्पन्न हुआ था, उस क्षीरसागरपर पहुँचे । तत्पश्चात् भगवान् महादेवने उस विषम विषको देखकर एक छायायुक्त स्थानमें बैठकर अपने बायें हाथसे उसे पी लिया। उस विषके पी लिये जानेपर इन्द्रादि देव तथा हिरण्याक्ष प्रभृति असुर हर्षपूर्वक नाचने-गाने और भयंकर सिंहनाद स्तुवन्तश्चैव देवेशं प्रसन्नाश्वाभवंस्तदा । कण्ठदेशे ततः प्राप्ते विषे देवमथान्नुवन्

English

Sfita said: — Afterwards P&rvat! beheld the mountain Goddess, Kusumamodini, the comrade of Her mother, coming to Her. — 1.

अध्याय १५६

श्लोक 7

ततो ऽहं संविधास्यामि यत्कृत्यं तदनन्तरम् इत्युक्ता सा तथेत्युक्त्वा जगाम स्वगिरिं शुभम्

tato 'haṃ saṃvidhāsyāmi yatkṛtyaṃ tadanantaram ityuktā sā tathetyuktvā jagāma svagiriṃ śubham

हिन्दी अर्थ

विरिञ्चिप्रमुखा देवा बलिप्रमुखतोऽसुराः। शोभते देव कण्ठस्ते गात्रे कुन्दनिभप्रभे इत्युक्तः शंकरो देवस्तथा प्राह पुरान्तकृत्

English

Tho Goddess also seeing P&rvati lovingly embraced Her and said; — " 0 Daughter! where are you going?" — 2.

अध्याय १५६

श्लोक 8

उमापि पितुरुद्यानं जगामाद्रिसुता द्रुतम् अन्तरिक्षं समाविश्य मेघमालामिव प्रभा

umāpi piturudyānaṃ jagāmādrisutā drutam antarikṣaṃ samāviśya meghamālāmiva prabhā

हिन्दी अर्थ

पीते विषे देवगणान् विमुच्य तस्मिन् गते देवगणाः पुनस्तं करने लगे तथा देवेशकी स्तुति करते हुए प्रसन्न हो गये। उस समय विषके भगवान् शंकरके गलेमें पहुँचनेपर ब्रह्मादि देवता और बलि आदि असुरोंने उनसे इस प्रकार कहा--' देव! कुन्दकी-सी उज्ज्वल कान्तिवाले आपके

English

In reply to that qiierry P4rvati narrated to Her, all about the agony that was inflicted on Her by Siva and looking upon Her as Her own mother She said: — 3.

अध्याय १५६

श्लोक 9

ततो विभूषणान्यस्य वृक्षवल्कलधारिणी ग्रीष्मे पञ्चाग्निसंतप्ता वर्षासु च जलोषिता

tato vibhūṣaṇānyasya vṛkṣavalkaladhāriṇī grīṣme pañcāgnisaṃtaptā varṣāsu ca jaloṣitā

हिन्दी अर्थ

शरीरमें कण्ठको विचित्र शोभा हो रही है। अब यह भृङ्ावलीकी भाँति काला विष यहीं आपके कण्ठमें स्थित रहे ।' इस प्रकार कहे जानेपर त्रिपुरविनाशक भगवान् शंकरने ' तथास्तु--वैसा ही हो ' यों कहकर उसे स्वीकार कर लिया। इस प्रकार विषपान कर लेनेके बाद शंकरजी

English

" O Pleasing one! You always remain here as the Goddess of this mountain. You tire most dear to Me, consequently, you should do what I tell you. Pray, inform me if any woman comes in private to the abode of Siva; you should also try not to allow any woman enter in private to Siva. On receiving your information, I shall arrange what ought to be done." Pfirvati went to the presiding goddess and said " 1 will act accordingly " and went away. — 4-7.

अध्याय १५६

श्लोक 10

शैशिरासु च रात्रीषु शुष्कस्थण्डिलशायिनी एवं साधयती तत्र तपसा संव्यवस्थिता

śaiśirāsu ca rātrīṣu śuṣkasthaṇḍilaśāyinī evaṃ sādhayatī tatra tapasā saṃvyavasthitā

हिन्दी अर्थ

उनके चले जानेपर देवगण पुन: उस समुद्रको विविध विविधप्रकारैः॥ ६९ प्रकारसे मथने लगे इति श्रीमत्स्ये महापुराणेऽमृतमन्थने कालकूटोत्पत्तिर्नाम पञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः

English

UmA, on the other hand, entered Her father's pleasure gardens as clouds wander in the sky. In that way. She left all the ornaments and

अध्याय १५६

श्लोक 11

ज्ञात्वा तु तां गिरिसुतां दैत्यस्तत्रान्तरे वशी अन्धकस्य सुतो दृप्तः पितुर्वधमनुस्मरन्

jñātvā tu tāṃ girisutāṃ daityastatrāntare vaśī andhakasya suto dṛptaḥ piturvadhamanusmaran

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणके अमृतमन्थन-प्रसंगमें कालकूटोत्पत्ति नामक दो सौ पचासवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ अमृतका प्राकट्य, मोहिनीरूपधारी भगवान् विष्णुद्वारा देवताओंका अमृत-पान तथा देवासुरसंग्राम

English

THE MAT8YA PVBAHAM.

अध्याय १५६

श्लोक 12

देवान्सर्वान्विजित्याजौ बकभ्राता रणोत्कटः आडिर्नामान्तरप्रेक्षी सततं चन्द्रमौलिनः

devānsarvānvijityājau bakabhrātā raṇotkaṭaḥ āḍirnāmāntaraprekṣī satataṃ candramaulinaḥ

हिन्दी अर्थ

धन्वन्तरिः स भगवानायुर्वेदप्रजापतिः मदिरा चायताक्षी सा लोकचित्तप्रमाथिनी। ततोऽमृतं च सुरभिः सर्वभूतभयापहा जग्राह कमलां विष्णुः कौस्तुभं च महामणिम्। गजेन्द्रं च सहस्त्राक्षो हयरत्नं च भास्करः

English

dWnned barks of trees on Her body, • Daring the hot wfeather, She warmed Herself in the fire burning around Her She remaiiied in water during the rainy seison. Sometimes She lived on the jungle fruits and some- times observed fast. She slept on the floor. Thus She carried on Her penances. Her body became dried op and lean and thin.—8-lO.

अध्याय १५६

श्लोक 13

आजगामामररिपुः पुरं त्रिपुरघातिनः स तत्रागत्य ददृशे वीरकं द्वार्यवस्थितम्

ājagāmāmararipuḥ puraṃ tripuraghātinaḥ sa tatrāgatya dadṛśe vīrakaṃ dvāryavasthitam

हिन्दी अर्थ

धन्वन्तरिं च जग्राह लोकारोग्यप्रवर्तकम्। छत्रं जग्राह वरुणः कुण्डले च शचीपतिः धन्वन्तरिस्ततो देवो वपुष्मानुदतिष्ठत

English

Afterwards the son of the demon Andhaka, named' Adi, coming to knew about Parvatfs resolution and practice of Tapasyfi remembered the destruction of his father; and he turned up to take mvenge. Adi, the son of Andhaka, and brother of Vaka, was trying to discover weak points

अध्याय १५६

श्लोक 14

विचिन्त्यासीद्वरं दत्तं स पुरा पद्मजन्मना हते तदान्धके दैत्ये गिरिशेनामरद्विषि

vicintyāsīdvaraṃ dattaṃ sa purā padmajanmanā hate tadāndhake daitye giriśenāmaradviṣi

हिन्दी अर्थ

सूतजी कहते हैं-ऋषियो! पुनः उस समुद्रके मथे जानेपर आयुर्वेदके प्रजापति भगवान् धन्वन्तरि दीख पड़े । पुनः लोगोंके चित्तको उन्मत्त कर देनेवाली एवं प्रकट हुआ, फिर सभी प्राणियोंके भयको दूर करनेवाली कामधेनु उत्पन्न हुई। उस समय भगवान् विष्णुने लक्ष्मी और महामणि कौस्तुभको तथा हजार नेत्रोंवाले इन्द्रने गजराज ऐरावतको ग्रहण किया। सूर्यने अश्वरत्न उच्चैः श्रवा और लोकमें आरोग्यके प्रवर्तक धन्वन्तरिको स्वीकार किया। वरुणने छत्रको और शचीपति इन््रने दोनों कुण्डलोंको ग्रहण किया। वायुदेवने बड़ी प्रसन्नतासे पारिजात वृक्षको ग्रहण किया। इसके बाद शरीरधारी धन्वन्तरि उठकर

English

of iva; and he now went to iva after conquering the Devas in battle. Going there he first saw Vlrabhadra standing at the door and became

अध्याय १५६

श्लोक 15

आडिश्चकार विपुलं तपः परमदारुणम् तमागत्याब्रवीद्ब्रह्मा तपसा परितोषितः

āḍiścakāra vipulaṃ tapaḥ paramadāruṇam tamāgatyābravīdbrahmā tapasā paritoṣitaḥ

हिन्दी अर्थ

खड़े हुए। वे एक श्वेतवर्णका कमण्डलु धारण किए हुए थे, जिसमें अमृत भरा था। उस अत्यन्त अद्भुत पात्रको देखकर अमृतके लिये “यह मेरा है, यह मेरा है' ऐसा बकनेवाले दानवोंके दलमें महान् कोलाहल मच गया। तब भगवान् विष्णुने मोहिनी मायाका आश्रय लिया। वे स्त्रीका अनृपम रूप धारण कर दानवोंके समीप उपस्थित हुए। तब उन मुग्ध चित्तवाले हैत्योंने उस अमृतको उस

English

anxious. In by — gone days when Andhaka was killed by iiva, the d< non Adi practised severe austerities when Brahmfi., being pleased with hi de- votion, appeared before him and said " Demon! what do you ( jsire as a fruit of this asceticism? " The demon said: — " That 1 be immortal is my wish." — 11-16.

अध्याय १५६

श्लोक 16

किमाडे दानवश्रेष्ठ तपसा प्राप्तुमिच्छसि ब्रह्माणमाह दैत्यस्तु निर्मृत्युत्वमहं वृणे

kimāḍe dānavaśreṣṭha tapasā prāptumicchasi brahmāṇamāha daityastu nirmṛtyutvamahaṃ vṛṇe

हिन्दी अर्थ

स्त्रिये दानवहैतेयाः सवें तद्गतमानसाः॥ ८ स्त्रीके हाथोंमें समर्पित कर दिया; क्योंकि उन सभी प्रगृह्याभ्यद्रवन् देवान् सहिता हैत्यदानवाः ततस्तदमृतं देवो विष्णुरादाय वीर्यवान्। जहार दानवेन्द्रेभ्यो नरेण सहितः प्रभुः

English

Brahma said; — "There is no one exempt from death; every embcKiied being is siire to die. You should, therefore, seek your death through some means." — 17.

अध्याय १५६

श्लोक 17

न कश्चिच् च विना मृत्युं नरो दानव विद्यते यतस्ततो ऽपि दैत्येन्द्र मृत्युः प्राप्यः शरीरिणा

na kaścic ca vinā mṛtyuṃ naro dānava vidyate yatastato 'pi daityendra mṛtyuḥ prāpyaḥ śarīriṇā

हिन्दी अर्थ

ततो देवगणाः सर्वे पपुस्तदमृतं तदा। विष्णोः सकाशात् सम्प्राप्य संग्रामे तुमुले सति ततः पिबत्सु तत्कालं देवेष्वमृतमीप्सितम्। राहुर्विबुधरूपेण दानवोऽप्यपिबत् तदा

English

The demon said: — " I may only die when there occurs a change in my form, otherwise, I may live for ever hearing which Brahmd said " You will die when your form undergoes a change." — 18-20.

अध्याय १५६

श्लोक 18

इत्युक्तो दैत्यसिंहस्तु प्रोवाचाम्बुजसंभवम् रूपस्य परिवर्तो मे यदा स्यात्पद्मसंभव

ityukto daityasiṃhastu provācāmbujasaṃbhavam rūpasya parivarto me yadā syātpadmasaṃbhava

हिन्दी अर्थ

आख्यातं चन्द्रसूर्याभ्यां सुराणां हितकाम्यया तप्तकाञ्जनमाल्यानि निपेतुरनिशं तदा रुधिरेणावलिप्ताङ्का निहताश्च महासुराः। अद्रिणामिब कूटानि धातुरक्तानि शेरते

English

Getting that boon, the Daitya considered himself immortal and afterwards in order to hide himself from Virabhadra he transformed himself into a serpent and without being noticed by Virabhadra, crawled

अध्याय १५६

श्लोक 19

तदा मृत्युर्मम भवेद् अन्यथा त्वमरो ह्यहम् इत्युक्तस्तु तदोवाच तुष्टः कमलसंभवः

tadā mṛtyurmama bhaved anyathā tvamaro hyaham ityuktastu tadovāca tuṣṭaḥ kamalasaṃbhavaḥ

हिन्दी अर्थ

परिघैश्चायसैः पातैः सन्निकर्षेश्च मुष्टिभिः। निघ्नतां समरेऽन्योन्यं शब्दो दिवमिवास्पृशत् हैत्यों और दानवोंका मन उसपर मोहित हो गया था। तदनन्तर वे सभी हैत्य-दानव संगठित होकर मुख्य- मुख्य महान् शस्त्रास्त्रोंको लेकर देवताओंपर टूट पड़े। इस समय नरके साथ-साथ पराक्रमी एवं सामर्थ्यशाली

English

inside where iva was. Then, that great Asura, leaving off the disguise of the serpent, masquedered as Parvati in order to tempt iva. After making his form exquisitely alike Parvati by his spell, ho put on sharp and strong teeth, and made up his mind to kill iva. He went near iva in the form of P&rvatt putting on neat dress and ornaments. — 21-27.

अध्याय १५६

श्लोक 20

यदा द्वितीयो रूपस्य विवर्तस्ते भविष्यति तदा ते भविता मृत्युर् अन्यथा न भविष्यति

yadā dvitīyo rūpasya vivartaste bhaviṣyati tadā te bhavitā mṛtyur anyathā na bhaviṣyati

हिन्दी अर्थ

भगवान् विष्णुने उस अमृतको दानवेन्द्रोसे छीन लिया तदनन्तर सभी देवता उस तुमुल युद्धके बीच ही विष्णु भगवानूसे उस अमृतको लेकर पान करने लगे। उस अभिलषित अमृतको पीते समय देवताओंके मध्यमें देवरूपधारी राहु नामक दानव भी अमृतका पान करने लगा। वह अमृत उसके कण्ठदेशतक ही पहुँच पाया था कि देवताओंकी कल्याण-भावनासे प्रेरित होकर चन्द्रमा और सूर्यने उसके भेदको प्रकट कर दिया। तब अमृत पीते हुए उस दानवके अलंकृत सिंरको भगवानूने अपने

English

Then, seeing the horrible demon in the form of P&rvati, lie became greatly pleased and said: — " Parvati! thou art well-dispositioned. I hope there is no false appearance in thy love. Thou hast come to me after realizing my motive. 'I'he wliole world is blank to me owing to thy separation. Thou hast done well in coming to me. It is well worthy of thee."— 28-30.

अध्याय १५६

श्लोक 21

इत्युक्तो ऽमरतां मेने दैत्यसूनुर् महाबलः तस्मिन्काले तु संस्मृत्य तद्वधोपायमात्मनः

ityukto 'maratāṃ mene daityasūnur mahābalaḥ tasminkāle tu saṃsmṛtya tadvadhopāyamātmanaḥ

हिन्दी अर्थ

पराक्रमसे चक्रद्वारा काट दिया। फिर तो उस दानवका चक्रसे कटा हुआ पर्वतशिखरकी भाँति विशाल मस्तक वसुधातलको कँपाता हुआ भूतलपर गिर पड़ा। तभीसे राहुके उस मुखने चन्द्रमा और सूर्यके साथ अटूट वैर निश्चित कर दिया, जो आज भी उन्हें पीड़ा पहुँचाता है। तत्पश्चात् विष्णु भी उस अनृपम स्त्रीरूपको त्यागकर विविध प्रकारके भयंकर शस्त्रस्त्रोंद्वारा दानवोंको प्रकम्पित करने लगे। उस समय विशाल और तीखी धारवाले

English

The demon thus addressed by iva and not knowing His glory smilingly said by slow degrees: — 31.

अध्याय १५६

श्लोक 22

परिहर्तुं दृष्टिपथं वीरकस्याभवत्तदा भुजंगरूपी रन्ध्रेण प्रविवेश दृशः पथम्

parihartuṃ dṛṣṭipathaṃ vīrakasyābhavattadā bhujaṃgarūpī randhreṇa praviveśa dṛśaḥ patham

हिन्दी अर्थ

हजारों भाले दानवोंपर गिरने लगे। भगवान्के चक्रसे करते हुए तलवार और गदाके प्रहारसे घायल होकर पृथ्वीतलपर गिरने लगे। उस समय उस युद्धमें तपाये हुए स्वर्णकी मालाओंसे सुशोभित असुरोंके सिर भीषण पट्टिशोंके प्रहारसे विदीर्ण होकर निरन्तर गिर रहे थे। वहाँ रक्तसे लथपथ हुए आङ्गोंवाले मारे गये महान् असुर गेरूसे रँगे हुए पर्वतोंके शिखरोंकी भाँति सो रहे थे। तदनन्तर सूर्यके लाल हो जानेपर परस्पर एक-दूसरेको शस्त्रोँद्वारा काटनेवालोंका महान् कोलाहल चारों ओर गूँज

English

" I had gone to practise severe penances to gain Thy affection, where I could not find myself well owing to my being away from Thee and that is why I have returned to Thee." — 32.

अध्याय १५६

श्लोक 23

परिहृत्य गणेशस्य दानवो ऽसौ सुदुर्जयः अलक्षितो गणेशेन प्रविष्टो ऽथ पुरान्तकम्

parihṛtya gaṇeśasya dānavo 'sau sudurjayaḥ alakṣito gaṇeśena praviṣṭo 'tha purāntakam

हिन्दी अर्थ

उठा। उस समरमें लोहनिर्मित परिघों और मुष्टियोंके प्रहारसे एक-दूसरेको मारनेवालोंका शब्द आकाश-मण्डलका स्पर्श-सा कर रहा था। उस समय वहाँ चारों ओर “काट डालो, विदीर्ण कर दो, दौड़ो, गिरा दो, आगे बढ़ो'- इस प्रकारके महान् भयंकर शब्द सुनायी पड़ रहे थे।

English

iva became suspicious and smilingly began to think seriously on the affair.— 33.

अध्याय १५६

श्लोक 24

भुजगरूपं संत्यज्य बभूवाथ महासुरः उमारूपी छलयितुं गिरिशं मूढचेतनः

bhujagarūpaṃ saṃtyajya babhūvātha mahāsuraḥ umārūpī chalayituṃ giriśaṃ mūḍhacetanaḥ

हिन्दी अर्थ

नरनारायणौ देवौ समाजग्मतुराहवम् तत्र दिव्यं धनुर्दृष्रा नरस्य भगवानपि। चिन्तयामास वै चक्रं विष्णुर्दानवसूदनः करिकरबाहुरच्युतः।

English

" Umfl. had become angry with me and had gone away with the fixed resolution. How has She now come back without fulfilling Her object? This is my doubt." — 34.

अध्याय १५६

श्लोक 25

कृत्वा मायां ततो रूपम् अप्रतर्क्यमनोहरम् सर्वावयवसम्पूर्णं सर्वाभिज्ञानसंवृतम्

kṛtvā māyāṃ tato rūpam apratarkyamanoharam sarvāvayavasampūrṇaṃ sarvābhijñānasaṃvṛtam

हिन्दी अर्थ

दनुकुलहैत्यदारणं तथोज्ज्चलज्ज्चलनसमानविग्रहम् करेरितं पुरुषवरेण संयुगे।

English

GH AFTER CLVII:

अध्याय १५६

श्लोक 26

कृत्वा मुखान्तरे दन्तान् दैत्यो वज्रोपमान्दृढान् तीक्ष्णाग्रान् बुद्धिमोहेन गिरिशं हन्तुमुद्यतः

kṛtvā mukhāntare dantān daityo vajropamāndṛḍhān tīkṣṇāgrān buddhimohena giriśaṃ hantumudyataḥ

हिन्दी अर्थ

ततो मही प्रचलितसाद्रिकानना तदाद्रिपाताभिहता समन्ततः वरकनकाग्रभूषणै- महेषुभिः पवनपथं समावृणोत् इस प्रकार महान् भयकारक घमासान युद्धके चलते समय भगवान् नर-नारायण युद्धस्थलमें उपस्थित हुए। वहाँ नरके दिव्य धनुषको देखकर हैत्यसूदन भगवान् नारायणने भी अपने सुदर्शन चक्रका स्मरण किया॥ ११--२५॥

English

biva now noticed the marks on her body in course of His speech and did not find the mark of a lotnp on the left region of the ribs. Instead of which, there was a bundle of hair, — 35.

अध्याय १५६

श्लोक 27

कृत्वोमारूपसंस्थानं गतो दैत्यो हरान्तिकम् पापो रम्याकृतिश्चित्रभूषणाम्बरभूषितः

kṛtvomārūpasaṃsthānaṃ gato daityo harāntikam pāpo ramyākṛtiścitrabhūṣaṇāmbarabhūṣitaḥ

हिन्दी अर्थ

तदनन्तर स्मरण करते ही वह असह्य प्रभावशाली, अत्यन्त कान्तिमान्, शत्रुनाशक, सूर्यके समान तेजस्वी, विस्तृत मण्डलोंवाला भयंकर सुदर्शन चक्र आकाशमार्गसे नीचे उतरा। तब हाथीकी शुण्डके समान बाहुवाले उग्र वेगशाली भगवान् विष्णुने प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी दानवकुलसंहारक धधकती हुई अग्निके सदूश शरीरवाले परम कान्तिशाली भयंकर चक्रको आया हुआ देखकर उसे हैत्यसेनापर चला दिया। फिर तो रिपुके

English

Then, the Lord came to know it to be a devlish freak and keeping His form bidden, took the yajra>astra and hit it on his private part and thus killed that Dfinava. Virabhadra did not know the destruc- tion of the demon in that way and the Gnddess of the mountain seeing the demon thus killed in the form of a woman and not realizing the full situation, sent the news by the messenger V&yu to P&rvati, when She began to seethe with wrath. Her eyes turned red with auger and She felt fearfully agitated in mind and pronounced a curse on Virabhadra. — 36-39.

अध्याय १५६

श्लोक 28

तं दृष्ट्वा गिरिशस्तुष्टस् तदालिङ्ग्य महासुरम् मन्यमानो गिरिसुतां सर्वैरवयवान्तरैः

taṃ dṛṣṭvā giriśastuṣṭas tadāliṅgya mahāsuram manyamāno girisutāṃ sarvairavayavāntaraiḥ

हिन्दी अर्थ

नगरोंका विध्वंस करनेवाला, संवर्तक नामक प्रलयाग्निके समान तेजस्वी, अनृपम कान्तिमान् वह सुदर्शन चक्र बारंबार वेगपूर्वक शत्रुओंपर प्रहार करने लगा। युद्धभूमिमें पुरुषोत्तमके हाथसे छोड़े गये उस चक्रने हजारों हैत्योंको विदीर्ण कर दिया। उसने वायुसे प्रेरित अग्निकी भाँति कहीं सेनाओंको भस्म कर दिया तो कहीं उन असुरोंको बलपूर्वक काट डाला। रणभूमिमें भगवानूके हाथसे प्रेरित बह सुदर्शन चक्र बारंबार आकाशमें तथा पृथ्वीतलपर पिशाचके समान रक्तपान करने लगा। इसके बाद निर्भय चित्तवाले असुर पर्वतोंद्वारा बारंबार देवताओंकी सेनाको नष्ट करने लगे। हजारों महाबलवान् असुर जलरहित मेधोंके समान आकाशमण्डलसे नीचे गिर रहे थे, जिससे वे

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अध्याय १५६

श्लोक 29

अपृच्छत्साधु ते भावो गिरिपुत्रि न कृत्रिमः या त्वं मदाशयं ज्ञात्वा प्राप्तेह वरवर्णिनी

apṛcchatsādhu te bhāvo giriputri na kṛtrimaḥ yā tvaṃ madāśayaṃ jñātvā prāpteha varavarṇinī

हिन्दी अर्थ

अतिशय भयंकर हो गये थे। उनके द्वारा फेंके गये वृक्ष मेघोंके समान दिखायी पड़ते थे। विशाल पर्वत, जिनकी चोटियाँ छिन्न-भिन्न हो गयी थीं, शब्द करते हुए एक- दूसरेसे टकरा रहे थे। उन पर्वतोंके गिरनेसे अभिहत हुई पर्वत-वनोंसहित सारी पृथ्वी कम्पायमान हो गयी। इस प्रकार जब युद्धस्थलमें एक-दूसरेपर भीषण गर्जन करते हुए बारंबार घात-प्रतिघात होने लगा और दानवोंने देव- सेनाओंको आतंकित कर दिया, तब नरने सुन्दर सुवर्णजटित

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demon Adi.

अध्याय १५६

श्लोक 30

त्वया विरहितं शून्यं मन्यमानो जगत्त्रयम् प्राप्ता प्रसन्नवदना युक्तमेवंविधं त्वयि

tvayā virahitaṃ śūnyaṃ manyamāno jagattrayam prāptā prasannavadanā yuktamevaṃvidhaṃ tvayi

हिन्दी अर्थ

अग्रभागवाले अपने विशाल बाणोंसे वायुमार्गको अवरुद्ध कर दिया और बाणोंके प्रहारसे पर्वत-शिखरोंको विदीर्ण कर दिया। इस प्रकार देवताओंद्वारा ताडित किये गये बड़े-बड़े असुर योद्धा पाताल एवं खारे समुद्रमें प्रविष्ट हो गये। जलती हुई अग्निके समान कान्तिमान् एवं अतिशय कोपमें भरे हुए सुदर्शन चक्रको आकाशमें गया

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demon Adi.

अध्याय १५६

श्लोक 31

इत्युक्तो दानवेन्द्रस्तु तदाभाषत्स्मयञ्छनैः न चाबुध्यदभिज्ञानं प्रायस्त्रिपुरघातिनः

ityukto dānavendrastu tadābhāṣatsmayañchanaiḥ na cābudhyadabhijñānaṃ prāyastripuraghātinaḥ

हिन्दी अर्थ

हुआ सुनकर देवगण विजयी हुए। तदनन्तर मन्दराचलको आदरपूर्वक अपने स्थानपर स्थापित कर दिया गया और सभी दिशाओं तथा आकाशमें फैले हुए बादलसमूह भी जैसे आये थे वैसे ही चले गये। तत्पश्चात् देवगण परम हर्षपूर्वक अमृतको सुरक्षित कर लिये और उसकी संचित निधिको बलवान् देवताओंके साथ किरीटधारी

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demon Adi.

अध्याय १५६

श्लोक 32

यातास्म्यहं तपश्चर्तुं वाल्लभ्याय तवातुलम् रतिश्च तत्र मे नाभूत् ततः प्राप्ता त्वदन्तिकम्

yātāsmyahaṃ tapaścartuṃ vāllabhyāya tavātulam ratiśca tatra me nābhūt tataḥ prāptā tvadantikam

हिन्दी अर्थ

किरीटिने बलिभिरथामरैः सह॥ ३६ भगवानूको सुरक्षाके लिये सौंप दिया गया इति श्रीमत्स्ये महापुराणेऽमृतमन्थनं नामैकपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्यायः इस प्रकार श्रीमत्स्यमहापुराणमें अमृतमन्थन नामक दो सौ इक्यावनवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ

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demon Adi.

अध्याय १५६

श्लोक 33

इत्युक्तः शंकरः शङ्कां कांचित्प्राप्यावधारयत् हृदयेन समाधाय देवः प्रहसिताननः

ityuktaḥ śaṃkaraḥ śaṅkāṃ kāṃcitprāpyāvadhārayat hṛdayena samādhāya devaḥ prahasitānanaḥ

हिन्दी अर्थ

वास्तुके प्रादुर्भावकी कथा कुर्यात् केन विधानेन कश्च वास्तुरुदाहृतः

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demon Adi.

अध्याय १५६

श्लोक 34

कुपिता मयि तन्वङ्गी प्रकृत्या च दृढव्रता अप्राप्तकामा सम्प्राप्ता किमेतत्संशयो मम

kupitā mayi tanvaṅgī prakṛtyā ca dṛḍhavratā aprāptakāmā samprāptā kimetatsaṃśayo mama

हिन्दी अर्थ

भृगुरत्रिर्वसिष्ठश्च विश्वकर्मा मयस्तथा। नारदो नग्नजिच्चैव विशालाक्षः पुरंदरः ब्रह्मा कुमारो नन्दीशः शौनको गर्ग एव च। वासुदेवोऽनिरुद्धश्च तथा शक्रबृहस्पती अष्टादशैते विख्याता वास्तुशास्त्रोपदेशकाः। संक्षेपेणोपदिष्टं यन्मनवे मत्स्यरूपिणा

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demon Adi.

अध्याय १५६

श्लोक 35

इति चिन्त्य हरस्तस्या अभिज्ञानं विधारयन् नापश्यद्वामपार्श्वे तु तदङ्गे पद्मलक्षणम्

iti cintya harastasyā abhijñānaṃ vidhārayan nāpaśyadvāmapārśve tu tadaṅge padmalakṣaṇam

हिन्दी अर्थ

ऋषियोंने पूछा--सूतजी! अब आप हमलोगोंको राजभवन आदिके संनिवेशकी और उनके बनाये जानेकी कहलाता है, इसपर भी प्रकाश डालिये

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demon Adi.

अध्याय १५६

श्लोक 36

लोमावर्तं तु रचितं ततो देवः पिनाकधृक् अबुध्यद्दानवीं मायाम् आकारं गूहयंस्ततः

lomāvartaṃ tu racitaṃ tato devaḥ pinākadhṛk abudhyaddānavīṃ māyām ākāraṃ gūhayaṃstataḥ

हिन्दी अर्थ

सूतजी कहते हैं-ऋषियो! भृगु, अत्रि, वसिष्ठ, विश्वकर्मा, मय, नारद, नग्नजित्, भगवान् शंकर, इन्द्र, ब्रह्मा, कुमार, नन्दीश्वर, शौनक, गर्ग, वासुदेव, अनिरुद्ध, शुक्र तथा बृहस्पति-ये अठारह वास्तुशास्त्रके' उपदेष्टा माने गये हें । जिसे मत्स्यरूपधारी भगवानूने संक्षेपमें मनुके प्रति उपदेश किया था, वास्तुके अर्थ बसनेकी जगह, घर, गाँव, नींव आदि हैं। इसपर समराङ्गणसूत्रधार, वास्तुराजवल्लभ, बृहत्संहिता, शिल्परत्र, गृहरत्रभूषण आदि ग्रन्थोंमें पूर्ण विचार है। पुराणोंमें अग्नि, विष्णुधर्म आदिमें ऐसी ही चर्चा है। इस विद्याका संक्षिप्त उल्लेख ऋग्वेद, शतपथ ब्राह्मण, श्रौतसूत्रों एवं मनु० ३। ८९ आदिमें भी है। इसके मुख्य प्रवर्तक एवं ज्ञाता-कर्ता विश्वकर्मा एवं मयदानव हैं।

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demon Adi.

अध्याय १५६

श्लोक 37

मेढ्रे वज्रास्त्रमादाय दानवं तमसूदयत् अबुध्यद्वीरको नैव दानवेन्द्रं निषूदितम्

meḍhre vajrāstramādāya dānavaṃ tamasūdayat abudhyadvīrako naiva dānavendraṃ niṣūditam

हिन्दी अर्थ

तदिदानीं प्रवक्ष्यामि वास्तुशास्त्रमनुत्तमम्। पुरान्धकवधे घोरे घोररूपस्य शूलिनः करालवदनं तस्माद् भूतमुदभूतमुल्बणम्

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demon Adi.

अध्याय १५६

श्लोक 38

हरेण सूदितं दृष्ट्वा स्त्रीरूपं दानवेश्वरम् अपरिच्छिन्नतत्त्वार्था शैलपुत्र्यै न्यवेदयत्

hareṇa sūditaṃ dṛṣṭvā strīrūpaṃ dānaveśvaram aparicchinnatattvārthā śailaputryai nyavedayat

हिन्दी अर्थ

ग्रसमानमिवाकाशं सप्तद्वीपां वसुंधराम्। ततोऽन्धकानां रुधिरमपिबत् पतितं क्षितौ ततः कालेन संतुष्टो भेरवस्तस्य चाह वै। वरं वृणीष्व भद्रं ते यदभीष्टं तवानघ तमुवाच ततो भूतं त्रैलोक्यग्रसनक्षमम्। भवामि देवदेवेश तथेत्युक्तं च शूलिना

English

demon Adi.

अध्याय १५६

श्लोक 39

दूतेन मारुतेनाशुगामिना नगदेवता श्रुत्वा वायुमुखाद्देवी क्रोधरक्तविलोचना अशपद्वीरकं पुत्रं हृदयेन विदूयता

dūtena mārutenāśugāminā nagadevatā śrutvā vāyumukhāddevī krodharaktavilocanā aśapadvīrakaṃ putraṃ hṛdayena vidūyatā

हिन्दी अर्थ

भीतभीतैस्ततो देवैर्ब्रह्मणा चाथ शूलिना। दानवासुररक्षोभिरवष्टब्धं समन्ततः निवासात् सर्वदेवानां वास्तुरित्यभिधीयते

English

demon Adi.

स्रोत: https://gretil.sub.uni-goettingen.de/gretil/corpustei/transformations/plaintext/sa_matsyapurANa1-176.txt · प्राप्त 3/6/2026

शास्त्रीय प्रामाणिकता एवं पारदर्शकताSources & Interpretation

स्रोत, संस्करण एवं व्याख्या वर्गीकरण

धर्म ग्रंथ पर मूल शास्त्र, पारंपरिक भाष्य और आधुनिक व्याख्या को पूर्णतः पृथक रखा जाता है ताकि पाठक को किसी भी व्याख्या के शास्त्र होने का भ्रम न हो।

सामग्री वर्गीकरण संकेत (Epistemic Content Labels)

६ स्तरिय प्रमाण व्यवस्था
मूल पाठOriginal text

अपौरुषेय / प्रामाणिक शास्त्र (Primary Canonical Scripture)

मूल संस्कृत, प्राकृत अथवा अवधी श्लोक/मंत्र। यह सर्वोच्च प्रमाण (प्रस्थान) है। इस पाठ में किसी भी आधुनिक व्याख्याकार का हस्तक्षेप नहीं है।

शाब्दिक अनुवादLiteral translation

पदार्थ व अन्वय (Direct Grammatical & Word-for-Word Meaning)

व्याकरणसम्मत प्रत्यक्ष शब्दार्थ (अन्वय)। बिना किसी दार्शनिक संप्रदाय के पूर्वाग्रह के, संस्कृत शब्दों का सटीक भाषांतर।

पारंपरिक भाष्यTraditional commentary

आचार्य परंपरा व टीका (Classical Lineage Commentary)

प्राचीन आचार्य परंपरा (यथा शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, श्रीधर स्वामी) द्वारा विरचित शास्त्रीय भाष्य व टीकाएं।

सरल व्याख्याSimple explanation

भावार्थ व सुबोध प्रबोधन (Accessible Pedagogical Exposition)

आधुनिक जिज्ञासुओं के लिए सरल भाषा में भावार्थ। यह मूल मंत्र नहीं, बल्कि पाठ को सुगम बनाने हेतु संपादकीय व्याख्या है।

आधुनिक चिंतनModern reflection

समसामयिक विमर्श व अनुप्रयोग (Contemporary Application & Analysis)

दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक व वैज्ञानिक समरूपताओं पर आधुनिक चिंतन। यह मूल शास्त्र का अंग नहीं है और इसे शास्त्रोक्त सिद्धांत के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

शोध टिप्पणीResearch note

पांडुलिपि एवं ऐतिहासिक शोध (Critical Apparatus & Manuscript Research)

पांडुलिपि विविधताएं, पाठ-भेद (variant readings), छंद रचना, और ऐतिहासिक व तुलनात्मक भाषावैज्ञानिक शोध। यह शास्त्र का मूल संदेश बदलने हेतु नहीं, बल्कि पाठ की प्रामाणिकता परखने के लिए है।

पहचानकर्ता:Matsya Purana — Chapter 156
संस्कृत संस्करण:Imported text; printed edition not recorded

Digitised text taken from the archive linked below. It has not been collated against a printed edition by this site.

पुरालेखागार / स्रोत:Open Sanskrit text archives (see the source link)
गणना पद्धति:

Numbering follows the imported source and may differ from other editions.