अध्याय १५५
श्लोक 1
मत्स्य-पुराण १५५ शरीरे मम तन्वङ्गि सिते भास्यसितद्युतिः भुजंगीवासिता शुद्धा संश्लिष्टा चन्दने तरौ
matsya-purāṇa 155 śarīre mama tanvaṅgi site bhāsyasitadyutiḥ bhujaṃgīvāsitā śuddhā saṃśliṣṭā candane tarau
हिन्दी अर्थ
तब देवश्रेष्ठ इन्द्रने इधर-उधर जलाती हुई उस अग्निको बादलके जलसे चारों ओरसे शान्त कर दिया। तदनन्तर उस समुद्रके जलमें नाना प्रकारके रस, विशाल वृक्षोंके रस और ओषधियोंके रस अधिक मात्रामें टपकने लगे। उन अमृतके समान गुणकारी रसोंसे युक्त जलसे सुवर्णकी भाँति देदीप्यमान देवगण अमरताको प्राप्त हो गये। समुद्रका जल दुग्धके रूपमें परिणत हो गया था, पुनः अनेक प्रकारके रसोंके मिश्रणसे वह दुग्धसे घृतके
English
Yudliistliira saiil: — llrahmaria! I am desirous of hearing what Lord Brahma had said in the days gone by.— 1.